Saturday, 19 May 2018

येदियुरप्पा - दूसरे सबसे कम दिन के मुख्यमंत्री

कर्नाटक में बीएस येदियुरप्पा को तीसरे दिन ही मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। इस तरह येदियुरप्पा के नाम दूसरे सबसे छोटे कार्यकाल वाले मुख्यमंत्री बनने का रिकॉर्ड जुड़ गया है। सबसे छोटे कार्यकाल वाले सीएम का रिकॉर्ड जगदंबिका पाल के नाम है। इससे पहले कर्नाटक में ही यही बी एस येदियुरप्पा 12 नवंबर 2007 से 19 नवंबर 2007 तक सात दिन के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं। कई राज्यों में पहले भी ऐसा हुआ है जब मुख्यमंत्रियों को समर्थन के अभाव में कुछ दिनों में ही इस्तीफा देना पड़ा।

जगदंबिका पाल - 1 दिन
सबसे कम दिन के लिए मुख्यमंत्री बनने का रिकॉर्ड यूपी के नेता जगदंबिका पाल का है। 21 फरवरी 1998 को राज्यपाल रोमेश भंडारी ने कल्याण सिंह की सरकार को बर्खास्त कर जगदंबिका पाल को सीएम की शपथ दिलाई थीलेकिन अगले ही दिन गवर्नर के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। हाईकोर्ट ने गवर्नर का आदेश बदल दिया।

सतीश प्रसाद सिंह - 5 दिन
सतीश प्रसाद सिंह बिहार में 28 जनवरी 1968 में मुख्यमंत्री बने थेलेकिन उन्हें 5दिन के बाद ही यानी 1 फरवरी को इस्तीफा देना पड़ा था। वे बिहार के पहले मुख्यमंत्री थे जो पिछड़ी जाति से आते थे।

ओम प्रकाश चौटाला ( 5 दिन, 16 दिन )
हरियाणा में ओम प्रकाश चौटाला के दो कार्यकाल अत्यंत छोटे रहे। वे 1990 में महज पांच दिन (12 जुलाई से 17 जुलाई)और एक बार फिर 1991 में ( 22 मार्च से 6अप्रैल ) 16 दिनों के लिए मुख्यमंत्री रह पाए थे।

नीतीश कुमार - 8 दिन
सन 2000 में 3 मार्च को बिहार में समता पार्टी से नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने। पर पर्याप्त अंक संख्या नहीं होने के कारण उन्हें 10 मार्च को ही इस्तीफा देना पड़ा। अपने पहले कार्यकाल में नीतीश महज 8 दिन ही मुख्यमंत्री रह सके।

शिबू सोरेन - 10 दिन
मार्च, 2005 को झारखंड में झामुमो प्रमुख शिबू सोरेन ने अल्पमत में होते हुए भी मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गई। बहुमत के लिए पर्याप्त संख्या नहीं जुगाड़ कर पाने पर शक्ति परीक्षण से पहले ही 12 मार्च को शिबू सोरेन को इस्तीफा देना पड़ा।

एससी मारक - 12 दिन
पूर्वोत्तर के राज्य मेघालय में कांग्रेस के नेता एससी मारक को भी अपने दूसरे कार्यकाल में सिर्फ 12 दिन यानी 27 फरवरी 1998 से 10 मार्च 1998 के लिए मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला था। 

केंद्र में 13 दिन के प्रधानमंत्री
1996 में हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा देश की अकेली सबसे बड़ी पार्टी बनी। लेकिन अंकों के लिहाज से बहुमत से पीछे रह गई। उस समय अटल बिहारी वाजपेयी ने विश्वास मत पेश करते हुए अपने भाषण के आखिर में अपने इस्तीफे का एलान किया था। वाजपेयी 16 मई 1996 को प्रधानमंत्री बने और 28 मई 1996 को 13 दिनों बाद उन्होंने इस्तीफा सौंप दिया।



Monday, 14 May 2018

पूर्व सांसद बाल कवि बैरागी की यादें

बालकवि बैरागी न सिर्फ राजनीति में सक्रिय रहे बल्कि उन्होंने युवाओं को जागृत करने वाले अति लोकप्रिय गीत लिखे। सुब्बराव जी द्वारा राष्ट्रीय युवा योजना में गाया जाने वाला जागरण गीत – नौ जवान आओ रे नौ जवान गाओ रे ... उन्होंने लिखा था। 1993 में  सुब्बराव जी के आग्रह पर उन्होंने  - एक दुलारा देश हमारा प्यारा हिंदुस्तान रे... लिखा।

कवि एवं लेखक और पूर्व सांसद बालकवि बैरागी का निधन 13 मई 2018 को उनके गृह नगर मनासा में हो गया। वह 87 वर्ष के थे। उनके पुत्र गोरकी ने बताया कि दोपहर में एक कार्यक्रम में शामिल होने के बाद वह घर लौटे। इसके बाद वह आराम करने के लिए अपने कमरे में चले गए। उन्होंने बताया कि नींद में ही उनका निधन हो गया।

बैरागी अपने जीवन के आखिरी दिनों में नीमच जिले के मनासा इलाके में रहते थे। उनका जन्म मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले की मनासा तहसील के रामपुरा गांव में 10 फरवरी 1931 को हुआ था। उनके जन्म का नाम नंदराम दास बैरागी था।
तू चंदा मैं चांदनी तू तरुवर मैं शाख रे
बालकवि बैरागी ने बॉलीवुड की फिल्मों के लिए 25 से अधिक गीत लिखे, जिनमें से फिल्म रेशमा और शेरा का गीत तू चंदा मैं चांदनी, तू तरुवर मैं शाख रेशामिल है। इसे लता मंगेश्कर ने गाया था। यह राग मांड पर आधारित बहुत ही सुमधुर गीत है। उन्होंने कई हिंदी कविताएं भी लिखीं, जिनमें से झर गए पात बिसर गए टहनीप्रसिद्ध है। उन्होंने कई युवा गीतों की भी रचना की। 

मध्य प्रदेश सरकार में मंत्री रहे
बालकवि बैरागी वर्ष 1980 से 1984 तक मध्यप्रदेश के मंत्री रहे और वर्ष 1984 से 1989 तक लोकसभा के सदस्य रहे। वह बाद में राज्यसभा के सदस्य भी रहे। वे 1945 से कांग्रेस में सक्रिय रहे। 1967 में उन्होंने विधानसभा चुनाव में प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा को शिकस्त दी थी। 1969 से 1972 तक पंडित श्यामाचरण शुक्ल के मंत्रिमंडल में राज्यमंत्री रहे। वे 1980 में मनासा से दोबारा विधायक निर्वाचित हुए। अर्जुन सिंह की सरकार में भी वे मंत्री रहे। 1984 तक लोकसभा में रहे। 1995-96 में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी में संयुक्त सचिव रहे। 1998 में मध्य प्रदेश से राज्यसभा में गए। 29 जून 2004 तक वे निरंतर राज्यसभा सदस्य रहे। 2004 में उन्हें राजस्थान प्रदेश कांग्रेस के आंतरिक संगठनात्मक चुनावों के लिए उन्हें चुनाव प्राधिकरण का अध्यक्ष बनाया गया। 2008 से 2011 तक मध्य प्रदेश कांग्रेस में उपाध्यक्ष रहे। मध्य प्रदेश कांग्रेस चुनाव समिति के अध्यक्ष भी रहे हैं। वर्तमान में वे केंद्रीय हिंदी सलाहकार समिति के सदस्य थे।
 - श्रद्धांजलि - 
अनेक कविताएं रचकर लोगों के हृदय में बस जाने वाले प्रसिद्ध कवि, जन सेवक श्रद्धेय बालकवि बैरागी जी का निधन प्रदेश के लिए अपूरणीय क्षति है। ईश्वर से दिवंगत आत्मा की शांति और परिजनों को संबल प्रदान करने की प्रार्थना करता हूं।
- शिवराज सिंह चौहान, मुख्यमंत्री, मध्य प्रदेश

बालकवि बैरागी संघर्षशील, व्यक्तित्व के धनी थे। वे अपनी कविताओं व लेखनी के माध्यम से सदैव समाज में जागृति लाने का प्रयास करते थे। भावभीनी श्रद्धांजलि।
- कमलनाथ, अध्यक्ष, मप्र कांग्रेस

बचपन से ही कविताएं लिखने लगे थे
बैरागी ने नन्ही उम्र से ही कविताएं लिखना शुरू कर दिया था। इसलिए उन्हें बालकवि कहा जाने लगा। विक्रम विश्वविद्यालय से हिंदी में स्नातकोत्तर करने वाले कवि बैरागी ने छात्र जीवन से ही राजनीति में हिस्सा लेना शुरू कर दिया था।
1998 में बैरागी जी से वे मुलाकातें
बैरागी बड़े ही सरल और सहज स्वभाव के थे। साल 1998 में कुबेर टाइम्स मेंकार्यकरने के दौरान बैरागी जी से दो बार मिलना हुआ। उनका एक साक्षात्कार प्रकाशित करने के सिलसिले में दिल्ली के चाणक्यपुरी स्थित मध्य प्रदेश सदन में उनसे मुलाकात हुई। इस दौरान वहीं वरिष्ठ पत्रकार विनोद वर्मा से भी मुलाकात हुई। बाद में साक्षात्कार प्रकाशित होने पर मैं उन्हें अखबार की प्रति पहुंचाने गया। इन मुलाकातों के दौरान उनका आत्मीय व्यवहार मन पर अमिट छाप छोड़ गया।
-        - विद्युत प्रकाश मौर्य

Thursday, 10 May 2018

दीपिका सिंह राजावत - साहसी वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता

दीपिका सिंह राजावत वह साहसी वकील हैं जो कठुआ की रेप पीड़ित बालिका का मुकदमा लड रही हैं। वे कश्मीर में गरीब और जरूरतमंदों की आवाज बनकर उभरी हैं।
मूल रूप से कुपवाड़ा जिले के कारीहामा गांव की रहने वाली 38 साल की दीपिका थुसू की शादी राजस्थानी राजावत परिवार में हुई है। उन्होंने नेशनल लॉ यूनीवर्सिटी जोधपुर से 2008 में एलएलबी की पढ़ाई पूरी की । दीपिकामानवाधिकारों के लिए भी काम करती हैं। उनके पति सेना में रह चुके हैं। उनकी एक पांच साल की बेटी भी है।
खुद लिया केस
दीपिका ने बताया कि पीड़ित लड़की के माता-पिता बहुत गरीब हैं। इसलिए मैंने उनके माता-पिता से संपर्क किया, और यह केस खुद लड़ने के लिए लिया।
जरूरतमंदों की आवाज बनीं
दीपिका एक एनजीओ वायस फॉर राइट्स चलाती हैं। वह इस एनजीओ कीचेयरपर्सन हैं। यह एनजीओ जरूरतमंद बच्चों और महिला अधिकारों के लिए काम करता है। जम्मू कश्मीर में ऐसे लोगों के लिए एनजीओ ने एक टोल फ्री नंबर भी जारी किया है। दीपिका बच्चों के लिए काम करने वाले संगठन क्राई और चरखा फाउंडेशन से भी जुड़ी रही हैं।
बारुदी सुरंग में घायल बच्चों को मुआवजा दिलवाया
दीपिका ने साल 2012 में एक जनहित याचिका दायर कर कोर्ट से ये मांग की थी कि वे ऐसे बारूदी सुरंग के हमलों में घायल बच्चों की गिनती करवाए और उन्हें पर्याप्त मुआवजा दे। इस पीआईएल की वजह से बारूदी सुरंग से घायल होने वाले बच्चों को दो-दो लाख रुपये की सहायता मिल रही है।
इंदिरा जय सिंह के साथ काम किया
दीपिका को 2014-15 में महिला अधिकारों पर काम करने के लिए चुना गया था। इस दौरान उन्होंने भारत की पूर्व अडिशनल सॉलिसिटर जनरल इंदिरा जयसिंह के साथ काम किया। दीपिका कहती हैं मुझे हिंदू और राष्ट्रवादी होने पर गर्व है। पर जब हम वकील का गाउन पहनते हैं तो हमारा लक्ष्य जाति धर्म से ऊपर उठकर सुविधाविहीन लोगों को न्याय दिलाना होना चाहिए।
बार एसोसिएशन  की नाराजगी झेली
2012 में दीपिका एक 12 साल की कामवाली के लापता होने का केस लड़ रही थी, तब उन्हें वकीलों की नाराजगी झेलनी पड़ी थी। तब उनकी जम्मू बार एसोसिएशन की सदस्यता खत्म कर दी गई थी।
 - प्रस्तुति - विद्युत प्रकाश मौर्य

Monday, 23 April 2018

पूर्वोत्तर के तीन राज्यों से हट चुका है विवादित अफ्स्पा कानून

पूर्वोत्तर के सात राज्यों में से तीन राज्यों में विवादित अफ्स्पा कानून को हटाया जा चुका है। मेघालय से पहले यह कानून त्रिपुरा और मिजोरम में भी अप्रभावी हो चुका हैवहीं अरुणाचल प्रदेश में यह आंशिक रूप से ही लागू है। पूर्वोत्तर के बाहर यह जम्मू कश्मीर में भी 90 के दशक से ही लागू है। हालांकि वहां भी बार-बार इसे हटाने मांग उठती रही है।

जम्मू कश्मीर में भी लागू
अफ्स्पा कानून 28 साल से जम्मू कश्मीर में भी लागू है। 1990 में अशांत कश्मीर में इसे लागू किया गया। फरवरी 2018 में जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने हालात का हवाला देते हुए कश्मीर में विवादित अफ्सपा को हटाने से इनकार किया।

60 साल पुराना कानून
1958 में  एक सितंबर को 07 राज्यों में ‘अफ्स्पा’ लागू किया गया।(असममणिपुरत्रिपुरामेघालयअरुणाचल प्रदेशमिजोरम और नगालैंड )
1986 में मिजो समझौता के बाद मिजोरम में अफ्स्पा निष्क्रिय हो गया।
2015 के मई महीने में त्रिपुरा में कानून व्यवस्था की स्थिति की संपूर्ण समीक्षा के बाद अफ्स्पा हटा लिया गया।
2018 में 31 मार्च को मेघालय से भी अफ्स्पा कानून को हटाया गया।

सेना को विशेष अधिकार देता है ‘अफ्स्पा
भारतीय संसद ने 1958 में ‘अफ्स्पा’ यानी ‘आर्म्ड फोर्स स्पेशल पावर एक्टको लागू किया। यह एक फौजी कानून हैजिसे उन राज्यों में लागू किया गया जहां कानून व्यवस्था के हालात ज्यादा खराब थे। यह कानून सुरक्षा बलों और सेना को कई विशेष अधिकार देता है।

बिना वारंट के गिरफ्तारी
1. यदि कोई व्यक्ति कानून तोड़ता है और अशांति फैलाता हैतो सेना बल का प्रयोग कर सकती है।
2. अफसर किसी आश्रय स्थल या ढांचे को तबाह कर सकता हैजहां से हथियार बंद हमले का अंदेशा हो।
3. सशस्त्र बल किसी भी असंदिग्ध व्यक्ति को बिना किसी वारंट के गिरफ्तार कर सकते हैं।
4 . सेना किसी परिवार में बिना वारंट के घर के अंदर जा कर तलाशी ले सकता है।
6. वाहन को रोक कर या गैर-कानूनी ढंग से हथियार ले जाने पर उसकी तलाशी ली जा सकती है।
7. सेना के अधिकारियों को उनके वैध कार्यों के लिए कानूनी प्रतिरक्षा दी जाती है।

नगालैंड में अभी भी लागू
2015 में 3 अगस्त को नगा विद्रोही समूह एनएससीएन (आईएम)महासचिव टी मुइवा और सरकार की ओर से वार्ताकार आरएन रवि के बीच प्रधानमंत्री की मौजूदगी में मसौदा समझौते पर हस्ताक्षर होने के बावजूद नगालैंड में यह कानून लागू है।

इन्होंने किया था विरोध -

इरोम शर्मिला ने 16 साल संघर्ष किया
2000 में 4 नवंबर को अफ्स्पा कानून के विरोध में मणिपुर की मानवाधिकार कार्यकर्ता इरोम शर्मिला ने उपवास शुरू किया। उनका उपवास16 साल तक चला। उनके विरोध की शुरुआत सुरक्षा बलों की कार्यवाही में कुछ निर्दोष लोगों के मारे जाने की घटना से हुई।
औपनिवेशिक कानून बताया था
2009 में संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार आयोग के कमिश्नर नवीनतम पिल्लई ने इस कानून के खिलाफ जबरदस्त आवाज उठाई थी। उन्होंने इस कानून को देश के सभी हिस्सों से पूरी तरह से हटाने की मांग की थी। पिल्लई ने  इसे औपनिवेशिक कानून की संज्ञा दी थी।-
vidyutp@gmail.com
(AFSPA, NORT EAST, J &K , 1958 LAW ) 

Monday, 9 April 2018

कर्नाटक : लिंगायतों का मुद्दा गरमाया


19 मार्च 2018 को कर्नाटक में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस ने बड़ा दांव खेला। सिद्धारमैया सरकार ने लिंगायत समुदाय को अलग धर्म का दर्जा देने की सिफारिश मंजूर कर ली है। लिंगायत समुदाय वर्षों से हिंदू धर्म से अलग होने की मांग करता रहा है।
नागमोहन दास समिति
समुदाय की मांगों पर विचार के लिए नागमोहन दास समिति गठित की गई थी। राज्य कैबिनेट ने समिति की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया है। कर्नाटक ने इस प्रस्ताव को अंतिम स्वीकृति के लिए केंद्र के पास भेजा है। राज्य की कांग्रेस सरकार ने लिंगायत समुदाय को अलग धर्म का दर्जा देने का फैसला ऐसे समय किया हैजब अप्रैल-मई में विधानसभा के चुनाव होने हैं।

वीरशैव लिंगायत फैसले के खिलाफ
कर्नाटक सरकार के इस फैसले का वीरशैव लिंगायत समुदाय ने विरोध किया है। उनका कहना है कि वीरशैव लिंगायत को लिंगायत से अलग धर्म घोषित किया जाए।

पुराना मुद्दा
लिंगायत समुदाय दशकों से भाजपा का समर्थन करता रहा है। हिंदू से अलग धर्म का दर्जा देने पर पर राज्य में भाजपा का मजबूत वोट बैंक खिसक सकता है। लिंगायत को कर्नाटक में फिलहाल ओबीसी का दर्जा मिला हुआ है।
18 फीसदी लिंगायत
कर्नाटक में इस समुदाय की आबादी 18 फीसदी है। लिंगायत का विधानसभा की तकरीबन 100 सीटों पर प्रभाव माना जाता है। कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता बीएस येदियुरप्पा इसी समुदाय से आते हैं।
भाजपा करती रही है विरोध
भाजपा लिंगायत को हिंदू धर्म से अलग करने की मांग का विरोध करती रही है। येदियुरप्पा कांग्रेस पर लिंगायत को अलग धर्म का दर्जा देकर समुदाय में फूट डालने की कोशिश करने का आरोप लगाते रहे हैं।
केंद्र के पास अंतिम अधिकार
अलग धर्म का दर्जा देने का अंतिम अधिकार केंद्र सरकार के पास है। राज्य सरकारें इसको लेकर सिर्फ अनुशंसा कर सकती हैं। लिंगायत को अलग धर्म का दर्जा मिलने पर समुदाय को मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 25-28) के तहत अल्पसंख्यक का दर्जा भी मिल सकता है। इसके बाद लिंगायत समुदाय अपना शिक्षण संस्थान भी खोल सकता है। फिलहाल मुस्लिमसिखईसाईबौद्धपारसी और जैन को अल्पसंख्यक का दर्जा हासिल है।
मोइली का समर्थन
कांग्रेस नेता और कन्नड़ साहित्य के लेखक वीरपप्पा मोइली ने कहा कि बीजेपी के पास लिंगायत मुद्दे पर कोई नरेटिव नहीं है। यह कोई नई बात नहीं है कि लिंगायत को हिंदू धर्म से अलग देखा जाए। जैसे बुद्ध और महावीर को अलग से मान्यता है और किसी धर्म के साथ नहीं बांधा गया है। उसी तरह लिंगायत को अल्पसंख्यक दर्जा देना उचित है।


लिंगायत और वीर शैव

लिंगायत और वीरशैव कर्नाटक के दो बड़े समुदाय हैं। इन दोनों समुदायों का जन्म 12वीं शताब्दी के समाज सुधार आंदोलन के स्वरूप हुआ। इस आंदोलन का नेतृत्व समाज सुधारक बसवन्ना ने किया था। बसवन्ना खुद ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे। उन्होंने ब्राह्मणों के वर्चस्ववादी व्यवस्था का विरोध किया। वे जन्म आधारित व्यवस्था की जगह  कर्म आधारित व्यवस्था  में विश्वास करते थे। लिंगायत समाज पहले हिन्दू वैदिक धर्म का ही पालन करता था लेकिन इसकी कुरीतियों को दूर करने के लिए इस नए सम्प्रदाय की स्थापना की गई।

बासवन्ना ने जाति व्यवस्था में भेदभाव के खिलाफ आंदोलन छेड़ा था। वेदों और मूर्ति पूजा को नहीं माना। लिंगायत अपने शरीर पर गेंद की तरह एक इष्टलिंग बांधते हैं। उनका मानना है कि इससे मन की चेतना जागती है। लिंगायत खुद को वीरशैव से अलग बताते हैं। उनका कहना है कि वीरशेव बासवन्ना से भी पहले से हैं। वे शिव को मानते हैंजबकि लिंगायत शिव को नहीं मानते।
राजनीति में लिंगायत

224 सदस्यों वाली राज्य की विधानसभा में 52 विधायक लिंगायत हैं।

18 फीसदी है कर्नाटक में इस समुदाय की आबादी।

1980 के बाद लिंगायत वोट कर्नाटक में सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं।

 - प्रस्तुति - विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
(LINGAYAT, KARNATKA) 


Wednesday, 14 March 2018

ब्रह्मांड के रहस्यों से पर्दा उठाने वाला वैज्ञानिक

1965 में शादी के वक्त ( फोटो - द विंटाज न्यूज)
स्टीफन हॉकिंग को आधुनिक युग के बड़े वैज्ञानिक थे। उन्हें खासतौर पर ब्रह्मांड के रहस्यों पर से पर्दा उठाने के लिए जाना जाता है। हॉकिंग ने अपनी थ्योरी ऑफ एवरीथिंग में बताया था कि ब्रह्मांड का निर्माण स्पष्ट रूप से परिभाषित सिद्धांतों के आधार पर हुआ है। उन्होने ईश्वर के अस्तित्व को साफ तौर पर नकारा था। बिग बैंग थ्योरी और ब्लैसक होल पर उनके खोज ने सबको चकित कर दिया था। मशहूर भौतिक विज्ञानी और कॉस्मोलॉजिस्ट ने अपना जीवन ब्रह्मांड के रहस्यों  का पता लगाने के लिए समर्पित कर दिया था। स्टी फेंस ने विज्ञान को ही अपनी नियति माना और वैज्ञानिक सोच पर आधारित कई ऐसी बातें सामने रखीं, जिनसे ब्रह्मांड की समझ में बदलाव लाने वाला क्रांतिकारी मोड़ आए।

स्टीफन तार्किक दिमाग वाले व्यक्तियों थे और उन्हों ने सृष्टि  की रचना में कभी भगवान की मौजूदगी को नहीं माना। वह अपने दिमाग को भी एक कंप्यूटर ही मानते थे। उनका कहना था कि जिस दिन इसके पुर्जे खराब हो जाएंगे, उस दिन मैं भी नहीं रहूंगा। वह पुर्नजन्म में भी कोई सच्चाई नहीं मानते थे।

मजेदार बात है कि स्टीफन कॉलेज में गणित पढ़ना चाहते थे। उनके पिता ने उन्हें मेडिकल की पढ़ाई करने की सलाह दी थी। कॉलेज में गणित विषय उपलब्ध नहीं था, ऐसे में उन्होंने भौतिकी को चुना। तीन साल बाद उन्हें नेचुरल साइंस में फर्स्ट क्लास ऑनर्स डिग्री मिली। वह 1973 का साल था जब 21 साल के स्टीकफन हॉकिंग ऑक्सफोर्ड से भौतिकी में प्रथम श्रेणी से डिग्री लेने के बाद कॉस्मोलॉजी में पोस्टग्रेजुएट रिसर्च करने के लिए कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय चले गए। उसके बाद कैंब्रिज उनका स्थायी ठिकाना बन गया।

ब्लैक होल के बारे में
हॉकिंग ने बताया था कि ब्लैक होल का आकार सिर्फ बढ़ सकता है, ये कभी भी घटता नहीं है। ब्लैक होल के पास जाने वाली कोई भी चीज उससे बच नहीं सकती और उसमें समा जाती है और इससे ब्लैक होल का भार बढ़ता ही जाएगा। ब्लैक होल का भार ही उसका आकार निर्धारित करता है जिसे उसके केंद्र की त्रिज्या से नापा जाता है। ये केंद्र (घटना क्षितिज) ही वह बिंदू होता है जिससे कुछ भी नहीं बच सकता। इसकी सीमा किसी फूलते हुए गुब्बारे की तरह बढ़ती रहती है। हॉकिंग ने आगे बढ़कर बताया था कि ब्लैक होल को छोटे ब्लैक होल में विभाजित नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा था कि दो ब्लैक होल के टकराने पर भी ऐसा नहीं होगा। हॉकिंग ने ही मिनी ब्लैक होल का सिद्धांत भी दिया था।

खुद को नास्तिक बताया
स्टीफन हॉकिंग ने कहा था कि भगवान का अस्तित्व नहीं है और मैं 'नास्तिक' हूं। साल 2014 में स्टीफन ने एक साक्षात्कार में कहा था कि सेंट अल्बंस स्कूल में एक स्कूल के लड़के के रूप में उन्होंने ईसाई धर्म के बारे में अपने सहपाठियों के साथ तर्क किया और कॉलेज के दिनों में भी वह एक प्रसिद्ध नास्तिक थे। उनकी पहली पत्नी जेन ईसाई धर्म पर पक्का विश्वास करने वाली महिला थी।मगर, उन दोनों के बीच भी कभी धार्मिक मामलों को लेकर एक मत नहीं रहे थे। दुनिया के महान वैज्ञानिकों में शुमार स्टीफन हॉकिंग ने संसार के सृजन में ईश्वंर की भूमिका को लेकर भी एक अलग तरह का सिद्धांत दिया।

दुनिया को बनाने वाला कोई भगवान नहीं ( हॉकिंग की जुबानी ) 
मेरा मानना है कि कोई भगवान नहीं है। किसी ने भी हमारे ब्रह्मांड नहीं बनाया है और कोई भी हमारे भाग्य को निर्देशन नहीं करता है। यह दुनिया भौतिकी के नियमों के मुताबिक अस्तित्व में आई है। ब्रह्मांड की रचना को एक स्वतः स्फूर्त घटना है। जिस बड़े धमाके यानी बिग बैंग के बाद धरती और अन्य ग्रहों का जन्म हुआ वह वैज्ञानिक दृष्टि से अवश्यंभावी था। ब्रह्मांड एक भव्य डिजाइन है, लेकिन इसका भगवान से कोई लेना देना नहीं है।

अगर हमारे सौर मंडल जैसे दूसरे सौर मंडल मौजूद हैं तो यह तर्क गले नहीं उतरता कि ईश्वर ने मनुष्य के रहने के लिए पृथ्वी और उसके सौर मंडल की रचना की होगी। ब्रह्मांड में गुरुत्वाकर्षण जैसी शक्ति है इसलिए वह नई रचनाएं कर सकता है उसके लिए उसे ईश्वर जैसी किसी शक्ति की सहायता की आवश्यकता नहीं है। हम एक बहुत ही औसत तारे के एक छोटे ग्रह पर बसे बंदरों की उन्नत नस्ल हैं। मगर, हम ब्रह्मांड को समझ सकते हैं। यह बात हमें बहुत खास बना देती है। धर्म और विज्ञान के बीच एक बुनियादी अंतर है। धर्म जहां आस्था और विश्वास पर टिका है, वहीं विज्ञान ऑब्जर्वेशन (अवलोकन) और रीजन (कारण) कारण पर चलता है। विज्ञान जीत जाएगा क्योंकि यह काम करता है। हम सभी जो चाहें, उस पर विश्वास करने के लिए स्वतंत्र हैं।
अगर ईश्वर के बारे में कोई पक्का सिद्धांत बन सके तो वह विज्ञान की सबसे बड़ी कामयाबी होगी,तब हमारे पास ईश्वर के दिमाग को समझने का बच जाएगा। मैं हमेशा से ही सृष्टि की रचना पर हैरान रहा हूं। समय और अंतरिक्ष हमेशा के लिए रहस्य बने रह सकते हैं, लेकिन इससे मेरी कोशिशें नहीं रुकी हैं।

मानव को दूसरा घर खोजने की दी थी सलाह

स्टीफेन हॉकिंग ने कहा था कि इस धरती की उम्र ज्यादा नहीं बची है। अगर मानव प्रजाति को बचाना है तो अगले कुछ सौ सालों में हमें पृथ्वी से अलग किसी दूसरे ग्रह पर अपना घर तलाशने की शुरुआत कर देनी होगी। उन्होंने एक थ्योरी की माध्यम से इस बात की संभावना जाहिर की थी कि आने वाले कुछ सौ या हजार सालों में पृथ्वी पर क्लाइमेट चेंज,  महामारी,  जनसंख्या वृद्धि या एस्टेरॉयड के टकराने जैसा कोई बड़ा हादसा हो सकता है। अगर हम ब्रह्मांड में दूसरा घर तलाश लेंगे तो ही मानव प्रजाति को बचाया जा सकता है।

द थ्योरी ऑफ एवरीथिंग समेत कई बेस्ट सेलर किताबें लिखीं

1974 में ब्लैक होल्स पर असाधारण तौर पर शोध करके उसकी थ्योरी में नया मोड़ देने वाले स्टीफन हॉकिंग द ग्रैंड डिजाइन,  यूनिवर्स इन नट शेल,  माई ब्रीफ हिस्ट्री,  द थ्योरी ऑफ एवरीथिंग जैसी पुस्तकें लिखीं। इन पुस्तकों ने उनकी वैज्ञानिक समझ और चिंतन को दुनिया के सामने रखा। 1988में उन्हें सबसे ज्यादा चर्चा मिली थी, जब उनकी पहली पुस्तक 'ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम: फ्रॉम द बिग बैंग टू ब्लैक होल्स' प्रकाशित होकर बाजार में आई। इसके बाद कॉस्मोलॉजी पर आई उनकी पुस्तक की 1 करोड़ से ज्यादा प्रतियां बिक गईं। इसे दुनिया भर में विज्ञान से जुड़ी सबसे ज्यादा बिकने वाली पुस्तक माना जाता है।

2014 में स्टीफन के जीवन पर फिल्म आई 

दुनिया के सबसे प्रसिद्ध भौतिकीविद और ब्रह्मांड विज्ञानी पर 2014 में थ्योरी ऑफ एवरीथिंग नामक फिल्म भी बन चुकी है। इस फिल्मा में स्टी1फन का किरदार एडी रेडमेने ने निभाया था। इसके लिए उन्होंसने उस साल बेस्ट  एक्ट र का ऑस्कएर पुरस्कार भी जीता। निर्देशक जेम्स मार्श ने निर्देशन में बनी इस फिल्म को 87वें एकेडमी अवॉर्ड्स में कुल पांच नोमिनेशन मिले थे। अभिनेत्री फेलिसिटी जोन्स नेफिल्म में उनकी पार्टनर की भूमिका निभाई थी।

फिल्म में निजी जिंदगी समाने आई

स्टीफन हॉकिंग ने 1965 मे जेन से शादी की थी। फिल्म थ्योरी ऑफ एवरीथिंग से स्टी5फन की निजी जिंदगी और इसकी हलचल लोगों के सामने आई थी। और साथ ही इस बात का खुलासा भी हुआ था कि उनकी पत्नी जेन के साथ बेहद प्याकर भरा रिश्ताउ कैसे वक्तस के साथ कड़वाहट में बदल गया। पहली पत्नी जेन ने फिल्म‍ की रिलीज के बाद एक साक्षात्कार में कहा था कि बीमारी के बावजूद मैं उनसे पहले जैसा प्यार करती थी। लेकिन एक दिन आया जब स्टीफन और मुझे अलग होना पड़ा। कई बार वो अपना पूरा हफ्ता अपनी कुर्सी पर बिता देते थे। वो कई बार मुझे और हमारे बच्चों को देखते भी नहीं थे। अपनी हालत के बारे में बताते नहीं थे। रिसर्च के बाद वो एक हस्ती बन चुके थे। मुझे इस बात से जलन नहीं थी, लेकिन इस वजह से हमारे रिश्तों में परेशानी आने लगी थी।

1995 में दूसरी शादी की
1995 में पहली पत्नी जेन से अलग होने के बाद स्टीफन ने अपनी नर्स एलेन मेसन से शादी कर ली।2006 में इन दोनों का भी तलाक हो गया। हॉकिंग की बेटी लूसी ने एलेन पर केस किया था वो हॉकिंग के साथ अमानवीय व्यवहार कर रही थीं। लेकिन 2004 में इस केस की जांच पूरी हुई और एलेन इस मुकदमे से बरी हो गईं। 

आइंस्टीन के जन्मदिन के दिन दुनिया छोड़ी
आइंस्टीन और हॉकिंग में कई समानताएं देखी जाती हैं। अल्बर्ट आइंस्टीन के बाद दुनिया केस्टीफन हॉकिंग को दुनिया का सबसे महान सैद्धांतिक भौतिकीविद माना जाता है। पर यह संयोग ही कहा जाएगा कि स्टीफन हॉकिंग की निधन का दिन और आइंस्टीन की जन्म का दिन एक ही यानी 14 मार्च है।

हॉकिंग का भारत का यादगार दौरा

साल 2001 में स्टीफन हॉकिंग ने भारत का यादगार दौरा किया था। यह उनका पहला भारत दौरा था, जो उनके लिए बेहद यादगार रहा था। कुल 16 दिन की भारत यात्रा पर आए स्टीफन हॉकिंग ने दिल्ली  और मुंबई का दौरा करने के साथ ही तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायणन से भी मुलाकात की थी। उन्होंने कुतुब मीनार और जंतर-मंतर भी देखा था। इस दौरान वे दिल्ली के संसद मार्ग स्थित जंतर-मंतर को देखने भी पहुंचे थे। तब जंतर मंतर के गाइड प्रेम दास ने उन्हें जंतर मंतर जो कि वेधशाला है उसके बारे में जानकारी दी थी।

हॉकिंग जब भारत आए थे तो उन्होंने कहा था कि भारतीय गणित और फिजिक्स में काफी अच्छे होते हैं। उन्होंने मुंबई स्थित टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च में अंतरराष्ट्रीय फिजिक्स सेमिनार को भी संबोधित किया था। स्ट्रिंग 2001 कॉन्फ्रेंस के दौरान उन्हें प्रथम सरोजिनी दामोदरन फैलोशिप से भी सम्मानित किया गया था। उन्होंने भारत में ओबरॉय टावर्स होटल में अपना 59वां जन्मदिन भी मनाया था।

दुर्लभ बीमारी के साथ 55 साल जीवित रहे...

स्टीफन हॉकिंग ने शारीरिक अक्षमताओं को पीछे छोड़ते हु्ए यह साबित किया था कि अगर इच्छा शक्ति हो तो इंसान कुछ भी कर सकता है।  8 जनवरी, 1942 को इंग्लैंड को ऑक्सफोर्ड में दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जन्मे स्टीफन अपने जीवन के  55 साल तक मोटर न्यूरॉन नामक दुर्लभ बीमारी से पीड़ित रहे।  घुड़सवारी और नौका चलाने के शौकीन स्टीलफन  1963 में पहली बार हॉकिंग को मोटर न्यूरॉन बीमारी का पता चला। तब डॉक्टरों ने कहा था कि उनके जीवन के सिर्फ दो साल बचे हैं। आमतौर पर इस बीमारी से ग्रस्त मरीज 3 से 10 साल तक ही जी पाते हैं, लेकिन हॉकिंग ने इस लाइलाज बीमारी के साथ भी 55 साल तक जीवित रहे। स्टीफन हॉकिंग ह्वीलचेयर के जरिए हीचलफिर पाते थे। इस बीमारी के साथ इतने लंबे अरसे तक जीवित रहने वाले वे पहले शख्स थे। वह बोल और सुन नहीं पाते थे और मशीनों की मदद से उन्होंयने इतने साल तक विज्ञान में शोध जारी रखा। 

इस बीमारी में दिमाग का मांसपेसियों पर नियंत्रण खत्म हो जाता है। रीढ़ की हड्‌डी की नसें काम करना बंद कर देती हैं। इसमें शरीर की नसों पर लगातार हमला होता है और शरीर के अंग धीरे-धीरे काम करना बंद कर देते हैं और व्यक्ति चल-फिर पाने की स्थिति में भी नहीं रह जाता है। मोटर न्यूरॉन नर्व सेल होती है जो मांसपेसियों को इलेक्ट्रिकल सिग्नल भेजती है, जिससे हमारे शरीर का संचालन होता है। आमतौर पर यह बीमारी 40 साल के बाद के लोगों को होती है लेकिन कई बार कम उम्र के लोगों को भी हो जाती है।

पुरस्कार और सम्मान
12  मानद डिग्रियां और अमेरिका का सबसे उच्च नागरिक सम्मान प्राप्त हुआ।
1978 - अल्बर्ट आइंस्टीन पुरस्कार
1988 - वॉल्फ प्राइज
1989 - प्रिंस ऑफ ऑस्टुरियस अवाडर्स
2006 - कोप्ले मेडल
2009 - प्रेसिडेंशियल मेडल ऑफ फ्रीडम
2012 - विशिष्ट मूलभूत भौतिकी पुरस्कार।

डेटलाइन स्टीफन हॉकिंग
    1942 में 8 जनवरी को स्टीफन हॉकिंग का ब्रिटेन में जन्म हुआ।
    1959 में हॉकिंग ने ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में स्नातक की पढ़ाई शुरू की
    1965 में 'प्रॉपर्टीज ऑफ एक्सपैंडिंग यूनिवर्सेज' विषय पर अपनी पीएचडी पूरी की थी।
    1970 में एक शोधपत्र प्रकाशित कराया जिसमें दर्शाया कि ब्रह्मांड ब्लैक होल के केंद्र से ही शुरूहुआ होगा।
    1973 में कॉस्मोलॉजी में पोस्टग्रेजुएट रिसर्च करने के लिए कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय चले गए।
    1988 उनकी पुस्तक 'ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम: फ्रॉम द बिग बैंग टू ब्लैक होल्स' प्रकाशित हुई।
    2014 में जब हॉकिंग फेसबुक पर पहली बार आए । उन्होंने लिखा - मैं इस यात्रा को आपके साथ बांटने के लिए उत्सुक हूं।
-    कथन -
मुझे सबसे ज्यादा खुशी इस बात की है कि मैंने ब्रह्माण्ड को समझने में अपनी भूमिका निभाई। इसके रहस्य लोगों के खोले और इस पर किए गए शोध में अपना योगदान दे पाया। मुझे गर्व होता है जब लोगों की भीड़ मेरे काम को जानना चाहती है।
-    स्टीफन हॉकिंग