Thursday, 17 August 2017

ओ कान्हा इस देस में मत आना...

इस बार श्रीकृष्ण जन्माष्टमी अगस्त में आया। और अगस्त में ही गोरखपुर में सैकड़ो नौनिहाल इनसेफेलाइटिस यानी जापानी बुखार से मर गए। रोजाना बच्चों की मौत का सिलसिला जारी है। सारा देश नटवर नागर कान्हा के जन्म की तैयारियां में जुटा था और उधर अस्पताल में एक एक कर नौनिहाल मर रहे थे। भला वह मां कैसे जन्माष्टमी मनाएगी जिसका लाल ठीक से दुनिया भी नहीं देख पाया। हम कान्हा के लिए दूध, मलाई मिश्री और माखन का इंतजाम करते हैं पर ये मां के लाडले तो महज ऑक्सीजन की कमी से मरे जा रहे हैं।

सरकार के पास तो हवा देने के लिए पैसे नहीं हैं तो माखन मिश्री मलाई कहां से आएगी... हम कान्हा के इंतजार में बड़े दिल से स्वागत गान गाते हैं... बड़ी देर भई नंदलाला तेरी राह तके बृजबाला...पर इस बार हम कान्हा कैसे बुलाएं... जो पहले से आ चुके हैं उनके लिए सांस लेने का भी इंतजाम नहीं है हमारे पास। ऊपर से मंत्री जी कहते हैं कि अगस्त में तो हर साल बच्चे मरते ही हैं। तो इस जन्माष्टमी में यह कहने की इच्छा हुई ओ कान्हा इस देस में मत आना। फिर सुनने में आया कि जन्माष्टमी के बाद भी दो दिन में 34 नौनिहालों ने गोरखपुर के इस अस्पताल में दम तोड़ दिया।

कान्हा तुम पांच हजार साल पहले आए थे, अब दुबारा भले मत आयो और इन नौनिहालों की सांसे तो बचाने का कुछ जुगत लगाओ। इस योगी से कोई उम्मीद नहीं बची अब पर तुम्हे लोग महायोगी कहते हैं। तो अब तुमसे ही उम्मीद बंधी हैं। तुम्ही सच्चे भारत के रखवाले हो तो सारी माताएं तुम्हारी राह ताक रही हैं। कान्हा कुछ करो. चमत्कार करो कुछ, सुदर्शन चक्र चलाओ, उन दुश्मनों का नाश करो जो इन माताओं की लगातार गोद सूनी किए जा रहे हैं। अब कोई भारत का रखवाला नहीं है। कहां हो मुरली वाले...हमारी सुन भी रहे हो या नहीं...
- विद्युत प्रकाश मौर्य


Saturday, 12 August 2017

गोरखपुर के मासूमों का हत्यारा कौन...

यूपी का शहर गोरखपुर। यहां के बीआरडी मेडिकल कालेज हास्पीटल में 32 बच्चों की आक्सीजन की कमी से एक दिन में ही मौत हो गई। आक्सीजन की कमी से 5 दिन में 63 बच्चे दम तोड़ चुके हैं। यूपी में भाजपा की सरकार बनने के छह महीने के अंदर की सबसे बड़ी हृदयविदारक घटना है। इसी पूरी घटना में सरकारी मिशनरी की पूरी लापरवाही नजर आती है। 11 अगस्त को बड़ी संख्या में बच्चों की मौत होती है, वहीं 9 अगस्त को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस अस्पताल का दौरा किया था। लेकिन उन्हें अस्पताल में अव्यवस्थाओं की जानकारी नहीं मिली।

अब ये साफ हो चुका है कि 69 लाख का बिल बकाया होने के कारण अस्पताल को आक्सीजन सप्लाई करने वाली कंपनी ने सिलेंडरों की सप्लाई बंद कर दी थी। इस संबंध में 30 जुलाई को ही समाचार पत्रों में खबर छपी थी- बीआरडी में ठप हो सकती है लिक्विड आक्सीजन की सप्लाई... तो इसके बाद भी प्रशासन नहीं चेता था। तो ये बहुत बड़ी लापरवाही का मामला है। 


नियम के अनुसार किसी सरकारी सप्लायर का बकाया 10 लाख रुपये से ज्यादा हो जाए तो वह सप्लाई रोक सकता है। भाजपा सरकार जो बेहतर गवर्ननेंस की बात करती है उसके राज में ये और भी शर्मनाक है। अगर किसी कंपनी का 69 लाख रुपये का बिल रोका गया तो इसमें भ्रष्टाचार, रिश्वत और कमिशनखोरी की भी गंध आती है। भला कंपनी के रुपये क्यों रोके गए। इस पर सरकार को जवाब देना होगा।

अब सरकार की लीपापोती का नमूना देखिए। सरकार ने क्राइसिस मैनेजमैंट की जगह दम तोड़ रहे बच्चों की खबर के बीच यह मैनेज करने की कोशिश में लग गई कि बच्चों की मौत आक्सीजन सिलेंडर की कमी से नहीं हुई है। 

यूपी सरकार के अधिकृत ट्विटर खाते से ट्वीट किया गया - गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन की कमी से किसी रोगी की मृत्यु नहीं हुई है।

इतना ही नहीं आगे लिखा गया - कुछ चैनलों पर चलाई गई ऑक्सीजन की कमी से पिछले कुछ घंटों में अस्पताल में भर्ती कई रोगियों की मृत्यु की खबर भ्रामक है।
वहीं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आधिकारिक ट्विटर खाते - @myogiadityanath से बच्चों की मौत पर कोई ट्वीट नहीं किया गया। कोई शोक नहीं जताया गया। बल्कि वे अपने खाते पर अमितशाह को बधाई देते हुए फोटो पोस्ट करने में व्यस्त रहे।

हाल में एनडीए के परिवार में शामिल हुए हैं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार। वही नीतीश कुमार हैं जो केंद्र में रेल मंत्री रहते हुए 2 अगस्त 1999 में बंगाल के उत्तर दिनाजपुर जिले के गैसाल रेलवे स्टेशन ( बिहार के किशनगंज से 17 किलोमीटर आगे) पर हुए हादसे में अपनी नैतिक जिम्मेवारी लेते हुए रेल मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था। क्या गवर्ननेंस के मामले में यूपी के सीएम योगी बिहार के सीएम नीतीश से कुछ प्रेरणा लेंगे।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य

Tuesday, 18 July 2017

क्या मायावती दीए की बुझती हुई लौ हैं....

राज्यसभा में मंगलवार 18 जुलाई को बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती ने इस्तीफा देने की धमकी दी। उनका आरोप है कि उन्हें यूपी के सहारनपुर में हुए दलितों पर अत्याचार के मुददे पर बोलने नहीं दिया जा रहा है। वहीं राज्यसभा के सभापति का कहना था कि उनका जितना समय तय था उतना समय मिला है। वास्तव में बहनजी को पता है कि अगली बार जीत कर उच्च सदन में तो आ नहीं सकती, इसलिए जाते जाते शहादत का ड्रामा कर लो. अब तो मायावती जी का दलित जनाधार भी दरक चुका है इसलिए बहन जी. चंद्रशेखर आजाद रावण जैसों को रास्ता दें।
यहां यह बात भी गौर फरमाने की है कि मायावती जी का राज्यसभा में कार्यकाल अगले आठ महीने बाद ही खत्म होने वाला है। यूपी में 2017 के विधानसभा चुनाव में बुरी तरह हार के बाद उनके पास इतना भी संख्याबल नहीं है कि वे अगली बार उच्च सदन में प्रवेश कर सकें। इसलिए सदस्यता का कार्यकाल पूरा होने से थोड़ा पहले कोई मुद्दा गर्म करके इस्तीफा दे देने से वे अपने दलित समाज के भाई बहनों में कोई मजबूत संदेश देने में वे सफल हो जाएंगी। पर अब ऐसा मुश्किल लगता है। देश के कई दलित नेतृत्व एक एक कर हासिए पर जा रहे हैं। बिहार के दलित नेता रामविलास पासवान भाजपा के गोद में जाकर बैठ चुके हैं। अब वे दलित मुद्दों पर कोई बयान भी देते। वहीं एक और दलित नेता उदित राज तो अपनी पार्टी का विलय भाजपा में करके दिल्ली के रास्ते से संसद में भी पहुंच चुके हैं। वहीं आरपीआई का रामदास अठावले भी भाजपा के साथ आकर मंत्रीपद की मलाई खा रहे हैं। ऐसे में इस खालीपन को भरने के लिए नए चेहरे आ रहे हैं। सहारनपुर आंदोलन के साथ चंद्रशेखर आजाद रावण जैसे तेजतर्रार युवा चेहरा उभर कर सामने आ चुका है। गुजरात में जिग्नेश मेवानी जैसे नेता आए हैं जिनके अंदर काफी आग है।
हालांकि हमारे कुछ साथियों को लगता है कि अभी मायावती का दौर खत्म नहीं हुआ है। पत्रकार अभय मेहता लिखते हैं - मेरे ख्याल से राजनीति में किसी को इतनी जल्दी ख़ारिज नहीं किया जा सकता। हो सकता है उनका जनाधार दरक रहा हो। पर कोई गठबंधन जैसी सूरत में वो दमदार वापसी कर सकती हैं। आप इस इस्तीफे की तात्कालिकता को देख रहे हैं। मायावती का वोट बैंक (कोई 15 फीसदी ) बद से बदतर हालात में उनके साथ रहेगा। हालांकि वोटबैंक किसी गणितीय सिद्धांत पर हमेशा साथ नहीं रहता। उत्तरप्रदेश के कई दलित पिछड़े और मुस्लिम नेता उनका साथ छोड़ चुके हैं। वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप भटनागर लिखते हैं – माया का खेल खत्म। क्या सचमुच मायावती दीये की बुझती हुई लौ हैं... आगे खेल कौन खेलेगा ये अभी कहना भले मुश्किल हो लेकिन देश को बेहतर दलित नेतृत्व की जरूरत है।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य



Friday, 16 June 2017

कैसे बचें साइबर धोखाधड़ी से


तकनीक ने कई काम आसन किए हैं तो ठगे जाने की संभावनाएं भी बढ़ी है। कई बारे आपके भोलेपन का लाभ उठाकर साइबर ठग आपका खाता खाली कर सकते हैं।

अपना एटीएम पिन किसी को न बताएं
-  किसी को कभी अपने बैंक के एटीएम पिन नहीं बताएं
याद रखें कभी किसी बैंक का अधिकारी या स्टाफ फोन पर आपका पिन नहीं पूछता है।
अपना आधार नंबर किसी को भी फोन पर पूछने पर नहीं बताएं
हमेशा सुरक्षित यानी  https:/ से शुरू होने वाले वेब साइट पर ही भरोसा करें।
अपने बारे में बड़ी जानकारियां किसी वेबसाइट पर सेव न करें
कंप्यूटर पर कभी भी डाटा ऑटो फिल न करें
इंटरनेट की बैंकिंग और बैंकिंग लेन-देन का इस्तेमाल कभी भी सार्वजनिक स्थान साइबर कैफेऑफिस से न करें।
बैंकिंग लेन-देन के लिए आप अपने पर्सनल कम्प्यूटर या लैपटॉप का ही इस्तेमाल करें.

पासवर्ड को लेकर सावधान रहें

अपने पासवर्ड या बाकी जानकारी सेव करने का विकल्प क्लिक न करें।
पासवर्ड टाइप करने के बाद कंप्यूटर द्वारा पूछे जा रहे विकल्प रिमेब्बर पासवर्ड या कीप लॉगिन में क्लिक नहीं करें।
हमेशा बहुत सही मजबूत पासवर्ड का प्रयोग करेंजिससे आसानी से किसी को पता न चले।
आपका पासवर्ड कम से कम आठ कैरेक्टर का होना चाहिए जो कि लोअर केस लेटर्स,  अपर केस लेटर्स,  नंबर्स और स्पेशल कैरेक्टर्स का मिश्रण होना चाहिए।

ऑनलाइन दोस्ती में सावधानी बरतें
ग्लोबल (इंटरनेशनल) सिम से कोई व्यक्ति व्हाट्स एप पर संपर्क करता है तो बचकर रहें।
चैटिंग भले ही करते रहेंमगर चैटिंग के दौरान निजी सूचनाओं का आदान-प्रदान न करें।
चैटिंग के दौरान सामने वाले द्वारा दिए गए प्रलोभन के झांसे में न आएं।
अगर कोई आपको किसी बैंक खाते में कोई धनराशि जमा करने को कहता है तो इस प्रलोभन में न आएं कि वह आपको कोई लाभ कराएगा।

शुरुआत में कभी भी फेसबुक मैसेंजर पर आने वाले एड्रेस पर संपर्क न करें।


- vidyutp@gmail.com 

Monday, 5 June 2017

1972 में हुआ था पहला पर्यावरण सम्मेलन

1. पर्यावरण प्रदूषण की समस्या पर 1972 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने स्टाकहोम (स्वीडन) में विश्व भर के देशों का पहला पर्यावरण सम्मेलन आयोजित किया। इसमें 119 देशों ने भाग लिया। 

2
संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित विश्व पर्यावरण दिवस वैश्विक स्तर पर राजनीतिक और सामाजिक जागृति लाने के लिए मनाया जाता है। इसकी शुरुआत 5 जून 1973 से हुई।

3
भारत में 19 नवंबर 1986 से पर्यावरण संरक्षण अधिनियम लागू हुआ। जल, वायु, भूमि। इन तीनों से संबंधित कारक तथा मानव, पौधों, सूक्ष्म जीव अन्य जीवित पदार्थ आदि पर्यावरण के अंतर्गत आते हैं।


4 भारत में 50 करोड़ से भी अधिक जानवर हैं जिनमें से पांच करोड़ प्रति वर्ष मर जाते हैं वन्य प्रणियों की घटती संख्या पर्यावरण के लिए घातक है।

5
गिद्ध की प्रजाति वन्य जीवन के लिए वरदान है पर अब 90 प्रतिशत गिद्ध मर चुके हैं इसीलिए देश के विभिन्न भागों में सड़े हुए जानवरों को खाने वाले नहीं रहे। 

6
हमारी धरती का तीन चौथाई हिस्सा जल है फिर भी करीब 0.3 फीसदी जल ही पीने लायक है। डब्लूएचओ के अनुसार पेयजल का पीएच मानक 7 से 8.5 के बीच होना चाहिए। 

7
धरती पर उपलब्ध पीने योग्य 0.3 फीसदी जल का 70 फीसदी हिस्सा भी इतना प्रदूषित हो गया है कि वह पीने लायक नहीं रहा। 

8
भारत सरकार के पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा एक-एक लाख रुपये का इंदिरा गांधी पर्यावरण पुरस्कार प्रति वर्ष 19 नवंबर को प्रदान किया जाता है।

9
जब वायु में कार्बनडाई ऑक्साइड, नाइट्रोजन के ऑक्साइडों की वृद्धि हो जाती है, तो ऐसी वायु को प्रदूषित वायु त्और इस प्रकार के प्रदूषण को वायु प्रदूषण कहते हैं।

10
 विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक दुनिया भर में वायु प्रदूषण की वजह से साल 2012 में 70 लाख लोगों की मौतें हुई। 

11
दुनिया भर में हर साल होने वाली आठ मौतों में से एक वायु प्रदूषण के कारण होती है। 

12
देश की कुल ऊर्जा का आधा भाग केवल रसोई घरों में खर्च होता है। देश के कुल प्रदूषण का बड़ा हिस्सा केवल रसोई घरों से उत्पन्न होता है।

13
एक मोटरगाड़ी एक मिनट में इतनी अधिक मात्रा में ऑक्सीजन खर्च करती है जितनी कि 1135 व्यक्ति सांस लेने में खर्च करते हैं।

14
1952 में पांच दिन तक लंदन शहर रासायनिक धुएं से घिरा रहा, जिससे 4000 लोग मौत के शिकार हो गए एवं करोड़ों लोग हृदय रोग और ब्रोंकाइटिस के शिकार हो गए थे।

15 
भारत में वाहनों से प्रतिदिन 60 टन सूक्ष्म कण, 630 टन सल्फर डाई ऑक्साइड, 270 टन नाइट्रोजन आक्साइड और 2040 टन कार्बन डाईआक्साइड उत्सर्जित होता है। 

16 
दुनिया के 20 सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरों में 13 भारतीय शहर शमिल हैं। दिल्ली दुनिया के सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरों में शामिल है। 

17
वायु प्रदूषण से दमा, ब्रोंकाइटिस, सिरदर्द, फेफड़े का कैंसर, खांसी, आंखों में जलन, गले का दर्द, निमोनिया, हृदय रोग, उल्टी और जुकाम आदि रोग होते हैं।

18
पानी की कमी के कारण प्रति हेक्टेयर पैदावार घट रही है, हिमनदियों का सिकुड़ना, बीमारियों में वृद्धि और अनेक प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा लगातार बढ़ रहा है।

19 
धरती पर सन 1800 के बाद ग्लेशियर पिघलने लगे हैं। अनुमान है कि यदि ग्रीनलैंड की सारी बर्फ पिघल गई तो समुद्र के स्तर में लगभग सात मीटर की बढ़ोतरी होगी।

20 
आईपीसीसी के अनुसार पिछले 250 सालों में धरती के वातावरण में कार्बन डाईआक्साइड गैस की मात्रा 280 पीपीएम से बढ़कर 379 पीपीएम हो गई है। 

21 
हर घर की छत पर वर्षा जल का भंडारण करने के लिए एक या दो टंकी बनाई जाए और इन्हें मजबूत जाली या फिल्टर कपड़े से ढक दिया जाए तो काफी जल संरक्षण किया जा सकेगा।

22
पर्यावरण बचाने के लिए इंटेग्रेल प्लान ऑफ क्लाइमेट चेंज बनाया गया है जिसमें दुनिया भर के 2000 पर्यावरण वैज्ञानिक शामिल हैं। 

23 
1988 में भारत सरकार ने राष्ट्रीय वन नीति और 2006 में राष्ट्रीय पर्यावरण नीति बनाई जिसके तहत वन संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण के उपाय किए जाते हैं।

24 
नदियों के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय नदी परिरक्षण निदेशालय और राष्ट्रीय गंगा नदी घाटी प्राधिकरण का गठन पर्यावरण और वन मंत्रालय के तहत किया गया है।
 
25 
हर रोज 1200 करोड़ लीटर गंदा पानी देश की सबसे बड़ी नदी गंगा में डाला जाता है। गंगा का जल स्नान करने लायक भी नहीं बचा।

26 
पर्यावरण से संबंधित कानूनी मामलों सहित, पर्यावरण संरक्षण एवं वनों और अन्य प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के निपटारे के लिए 2010 को राष्ट्रीय हरित अधिकरण की स्थापना की गई।
 
27 
ई-कचरा से भी पर्यावरण को बड़ा खतरा है। 2004 में देश में ई-कचरे की मात्रा 1.46 लाख टन थी जो 2012 में आठ लाख टन तक पहुंच गई। 

28 
बेंगलुरु में 1700 आईटी कंपनियां काम कर रही हैं। उनसे हर साल 6000 हजार से 8000 टन इलेक्ट्रॉनिक कचरा निकलता है। 

29 
जल प्रदूषण के नियंत्रण और रोकथाम और देश में पानी की स्वास्थ्य-प्रदता बनाए रखने के लिए भारत सरकार ने 1974 में अधिनियम बनाया। 

30 
अप्रैल 2010 के बाद भारत में बनने वाले सभी वाहनों को बीएस-4 मानकों के तहत लाया गया जिससे कम से कम प्रदूषण हो।

Friday, 12 May 2017

खतरनाक होगा चारधाम को रेल नेटवर्क से जोड़ना

उत्तराखंड में बद्रीनाथ, गंगोत्री तक रेल मार्ग बनाने की योजना निहायत बेवकूफी भरी है। 327 किलोमीटर के इस रेल परियोजना पर 40 हजार करोड़ खर्च होंगे। सर्वे में 21 नए स्टेशन, 61 सुरंगे और 59 पुल बनाने की सिफारिश की गई है। 

हकीकत यह है कि अभी उत्तराखंड के चार धाम के लिए ऑल वेदर रोड भी नहीं है। लैंड स्लाइडिंग के कारण कभी भी सड़क मार्ग तक बंद हो जाता है। ऐसे क्षेत्र में रेल लाइन बनाना अक्लमंदी नहीं होगी। 40 हजार करोड के खर्च के बाद इस मार्ग पर कितने लोग सफर करेंगे। वहां रेल पहुंचना पहाड़ों की प्राकृतिक संपदा के साथ भारी छेड़छाड़ को बढ़ावा देगा। साथ ही हिमालय के पर्यावरण को भी भारी नुकसान पहुंचाएगा। 

अगर हम पहाड़ों पर रेल की बात करें तो ब्रिटिश काल में कालका शिमला नैरो गेज और पठानकोट-जोगिंदरनगर नैरोगेज और सिलिगुड़ी दार्जिलिंग जैसी रेलवे लाइनें बिछाई गईं। ये सभी लाइनें नैरोगेज थीं। इनके लिए ज्यादा जमीन की जरूरत नहीं है। नैरोगेज रेल से पहाड़ों के पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचता। नैरोगेज रेल तीखे मोड़ पर मुड़ भी जाती है। सौ साल से ज्यादा समय से सफलतापूर्वक दौड़ रहीं कालका शिमला और दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे विश्व विरासत का हिस्सा भी हैं। पर खेद की बात है कि आजादी के बाद किसी भी पहाड़ को नैरोगेज रेल से नहीं जोड़ा गया। 

हिमालय की उत्तराखंड की पर्वतमाला की चट्टाने कोमल हैं। यहां अक्सर लैंडस्लाइडिंग का खतरा रहता है। वहीं भूकंप के लिहाज से भी संवेदनशील है। ऐसे क्षेत्र में ब्राडगेज रेलवे का निर्माण एक खतरनाक कदम होगा। हिमालय के पारिस्थिक तंत्र से भारी छेड़छाड़ होगा। सरकार को ये मूर्खतापूर्ण परियोजना जितनी जल्दी हो बंद कर देनी चाहिए। इसकी जगह चाहे तो नैरो गेज रेलवे के संचालन के बारे में विचार किया जा सकता है। हालांकि साल के छह महीने की कनेक्टिविटी के लिए उसकी भी जरूरत नहीं है। इसकी जगह रेलवे को मैदानी इलाके में विस्तार पर ध्यान देने की ज्यादा जरूरत है। खासकर उन जिला मुख्यालय और लाखों की आबादी वाले शहरों को तक रेल पहुंचाने की जरूरत हैं जहां अभी तक रेल की सिटी नहीं बजी है।

शंकराचार्य भी पक्ष में नहीं - शंकराचार्य वासुदेवानन्द सरस्वती ने कहा कि चार धामों को रेल लाइन से जोड़ा जाना ठीक नहीं है। कहा कि प्रथम राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद जब श्रीनगर गढ़वाल आए थे तो लोगों ने उनसे बदरीनाथ तक रेल लाइन की मांग की थी, लेकिन राजेन्द्र प्रसाद ने इसे धार्मिक मान्यता एवं परंपरा के विपरीत बताते हुए अस्वीकार किया था। कहा कि सरकार को प्रदेश की आर्थिकी बढ़ाने के लिए पर्यटन स्थलों का विकास करना होगा। लेकिन धार्मिक एवं तीर्थ स्थलों को पर्यटन स्थल की तरह विकसित करना धर्म संगत नहीं है। 

रेल लाइन बिछने से जहां पहाड़ कमजोर होंगे वहीं भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदा का भी भय रहेगा। रेल लाइन बिछाने के लिए कई सुरंगें बनानी होंगी जिससे पहाड़ खोखले होंगे। कहा कि रेल लाइन से बेहतर है कि सरकार चारों धामों तक फोर लेन सड़क विकसित करें।
- vidyutp@gmail.com

Thursday, 20 April 2017

लाल बत्ती सुरक्षा कम ठसक ज्यादा

चार दशक से ज्यादा समय से चले आ रहे लाल बत्ती के वीआईपी कल्चर से देश को निजात मिलने वाली है। 1970 से पहले वीआईपी सुरक्षा को लेकर देश में ज्यादा तामझाम नहीं दिखाई देता था। पर बाद में नेताओं और अफसरों के वाहनों में लाल, नीली और पीली बत्ती लगाने का रिवाज बढ़ा। यह धीरे धीरे वीवीआईपी होने की पहचान बन गया। तमाम वैसे नेता और अधिकारी भी ठसक में लालबत्ती लगे वाहन में घूमने लगे जो इसके लिए अधिकृत नहीं थे।

 1939 में पहली बार देश में बने मोटर ह्वीकल्स एक्ट के नियम 70 के तहत राज्यों को वाहन से संबंधित कानून बनाने की इजाजत दी गई।

1980 के सेंट्रल मोटर ह्वीकल्स रूल्स के नियम 108(3) के अंतर्गत प्रावधान किया गया कि वाहनों में कौन लगा सकता है लाल और नीली बत्ती।

लाल बत्ती (फ्लैशर के साथ) 

राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, पूर्व राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, उप प्रधानमंत्री, भारत के मुख्य न्यायाधीश, लोकसभा स्पीकर, कैबिनेट मंत्री, हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, पूर्व प्रधानमंत्री, नेता विपक्ष, राज्यों के मुख्यमंत्री, राज्यपाल, नीति आयोग के उपाध्यक्ष, राष्ट्रमंडल देशों के हाई कमिश्नर।

लाल बत्ती (बिना फ्लैशर के)

मुख्य चुनाव आयुक्त,  कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल ऑफ इंडिया, राज्यसभा के उपसभापति, लोकसभा के डिप्टी स्पीकर, केन्द्र सरकार के राज्यमंत्री, योजना आयोग के सदस्य,  अल्पसंख्यक,  अनुसूचित जाति व जनजाति आयोग के अध्यक्ष,  अटार्नी जनरल,  कैबिनेट सचिव,  तीनों सेनाओ के प्रमुख,  सेंन्ट्रल ऐडमिनिस्ट्रेटिव के अध्यक्ष,  यूपीएससी के अध्यक्ष,  हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस,  साँलिसिटर जनरल, राज्यों के उपमुख्यमंत्री,  दूसरे देशों के राजदूत।

पीली बत्ती 

कमिश्नर इनकम टैक्स, रिवेन्यू कमिश्नर, डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक।

नीली बत्ती 

एम्बुलेंस और पुलिस की गाड़ियां

सिर्फ सरकारी दौरे में इस्तेमाल 

लाल बत्ती का इस्तेमाल सिर्फ सरकारी दौरा के दौरान ही किया जा सकता है। वाहन में अधिकारी के परिवार के सदस्य हों फिर दौरा गैर सरकारी हो तो लालबत्ती का इस्तेमाल वर्जित है। तब लालबत्ती को काले कवर से ढकना जरूरी है।

सायरन

दिल्ली मोटर वीकल्स के रुल्स 1993 के अनुसार सिर्फ इमरजेंसी वाहन जैसे फायर ब्रिगेड़, एंबुलेंस, पुलिस कंट्रोल रुम की वैन में चमकने वाली या घूमने वाली लाल बत्ती के साथ सायरन लगा सकते है। वीआईपी की पायलट गाडी पर भी सायरन लगाया जा सकता है।

चमकने वाली नीली वीआईपी लाइट

चमकने वाली नीली वीआईपी लाइट को पुलिस पैट्रोलिंग वाहन, पायलट वाहन लगा सकते है

2013 में में 11 दिसंबर को उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि वाहनों पर लालबत्ती की इजाजत केवल संवैधानिक पद पर आसीन लोगों और उच्च पदस्थ हस्तियों को ही दी जानी चाहिए।


यहां पहले ही लग चुकी है रोक

2014 में दिल्ली सरकार ने मंत्रियों की गाड़ियों से लाल बत्ती हटवाई। सिर्फ उप राज्यपाल, हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस और जज ही फ्लैशर के साथ लाल बत्ती का इस्तेमाल कर सकते हैं।

2017 मे 18 मार्च को पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने लालबत्ती के इस्तेमाल पर रोक लगाने का फैसला किया। इसके तहत मुख्यमंत्री, विधायक और शीर्ष अधिकारी अपनी सरकारी गाड़ियों में लालबत्ती का इस्तेमाल नहीं करेंगे। लालबत्ती सिर्फ पंजाब के गवर्नर, चीफ जस्टिस और हाईकोर्ट के जज कर सकेंगे।
(19 अप्रैल 2017 )

Tuesday, 28 February 2017

जरूर पढ़ने वाली किताब - लाल नदी नीले पहाड़

अगर आप भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को जानना चाहते हैं तो आपके लिए बेहतरीन किताब हो सकती है लाल नदी नीले पहाड़। वैसे हिंदी में पूर्वोत्तर पर बहुत कम किताबें लिखी गई हैं। इन सबके बीच एक ऐसी समग्र किताब जो आपको पूर्वोत्तर के आठ राज्यों से परिचित कराए, इसकी तलाश इस किताब के साथ आकर खत्म होती है। रविशंकर रवि की इस पुस्तक में कुल 53 आलेख हैं। इनमें से ज्यादातर आलेख संस्मरण या फिर रिपोर्ताज की शैली में हैं। इसलिए हर पन्ने को पढ़ने हुए आगे बढ़ना रोचकता लिए हुए है। अरुणाचल प्रदेश, असम, मेघालय, मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा और सिक्किम,  हर राज्य पर आपको कुछ आलेख यहां पढ़ने को मिल जाएंगे। पर सबसे अच्छी बात है कहने की शैली, जो अत्यंत सरल और सधे हुए शब्दों में है। लेखक रविशंकर रवि 1989 में पूर्वोत्तर गए तो फिर वहीं के होकर रह गए। पुस्तक में उनकी तीन दशक की पूर्वोत्तर की पत्रकारिता के अनुभव को बखूबी महसूस किया जा सकता है। पुस्तक के शुरुआती लेखों में असम के महान संगीतकार, गायक भूपेन हजारिका से उनकी मुलाकात का प्रसंग आता है। आगे के कुछ अध्याय में भूपेन दादा की मृत्यु और उनकी संपत्ति को लेकर विवाद का भी प्रसंग है।
पुस्तक उन लोगों के लिए एक दोस्त की और गाइड की तरह भी काम करती है जो पूर्वोत्तर के राज्यों में घूमने की तमन्ना रखते हैं। दरअसल पूर्वोत्तर के कई राज्य खासकर अरुणाचल, सिक्किम और मेघालय बेइंतहा खूबसूरती समेटे हैं, पर वहां सैलानियों की आमद अपेक्षाकृत कम है। अपने कई लेखों में लेखक ये बताते हैं कि अरुणाचल घूमना कितना भयमुक्त है। साथ ही पूर्वोत्तर के अधिकांश क्षेत्रों में एक पर्यटक के तौर पर जाने पर आपको भयभीत होने की कोई जरूरत नहीं है। पुस्तक में लेखक की अरुणाचल प्रदेश की कई यात्राओं का विवरण है। लाल नदी नीले पहाड़ ब्रह्मपुत्र नदी और इससे जुड़े कई मिथ और हकीकत का भी खुलासा करती है। आपको दुनिया के सबसे बड़े नदी द्वीप माजुली में भी ले जाती है, तो कभी असम के चाय बगानों में भी सैर कराती है। इसमें कई आलेख ऐसे हैं जो आपको पूर्वोत्तर के राज्यों की पर्व त्योहार और सांस्कृतिक विशेषताओं से रुबरू कराते हैं। एक आम हिंदुस्तानी के लिए कई जानकारियां चमत्कृत करने जैसी हैं। उनके पढ़ते हुए ऐसा लग सकता है कि क्या हमारे देश में ऐसा भी होता है।
पुस्तक के कई लेख पहले विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं पर उनका लेखक ने बाद में संस्मरण शैली में परिमार्जन किया है, जो पढ़ने को और भी रोचक बना देता है। हालांकि कई लेखों में रचना काल का जिक्र किया जाता तो बेहतर होता। वे सभी अध्येता जो देश की सांस्कृति विभिन्नता के बारे में जानने को उत्सुक रहते हैं, लाल नदी नीले पहाड़ एक बहुमूल्य पुस्तक है, जिसे पढ़ने का मौका आपको गंवाना नहीं चाहिए।
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  पुस्तक – लाल नदी नीले पहाड़
-     लेखक - रवि शंकर रवि
-      मूल्य –   250 रुपये पृष्ठ – 264 ( पेपरबैक)
-      प्रकाशक -  बोधि प्रकाशन, जयपुर

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 - विद्युत प्रकाश मौर्य ( vidyutp@gmail.com ) 

Tuesday, 29 November 2016

आदमी को चाहिए वक्त से डरकर रहे...

जब आप देश के अलग अलग शहरों में हो रही घटनाओं को नहीं देख पा रहे हों, या देखकर अनदेखा कर रहे हों तो इसे क्या कहेंगे। आप सच सुनने और देखने को तैयार नहीं हैं तो इससे अराजक स्थिति कुछ और नहीं हो सकती। भले आप आत्ममुग्धता की स्थिति में जी रहे हों पर याद रखिए इतिहास आपको माफ नहीं करेगा।  आबादी में देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के तकरीबन हर जिले में 29 नवंबर को बैंकों केबाहर अपनी ही नकदी निकालने क लिए लंबी लंबी लाइनों में लोगों के सब्र का बांध टूटता नजर आया। कहीं लोगों ने बैंक अधिकारियों पर गुस्सा निकाला तो कहीं पुलिस पर। पर हुक्मरान इन दृश्यों को बिल्कुल नजर अंदाज कर रहे हैं। बिहार के नौगछिया में और यूपी के हमीरपुर में 29 नवंबर को एक एक किसान अपने रुपये के इंतजार में अल्लाह को प्यारे हो गए। पर उनके दर्द से भला किसे सरोकार है। सत्ता का नशा बड़ा खतरनाक होता है। पर उससे भी खतरनाक होता है जब आप सही फीडबैक लेने और सुनने को तैयार नहीं हों।
बैंक की शाखाओं को लोगों को बांटने के लिए पर्याप्त राशि तो दूर उनकी मांग का 10 फीसदी भी नहीं मिल पा रहा है। लेकिन आप झूठ पर झूठ बोले जा रहे हैं कि कहीं कोई नोटों की कमी ही नहीं है। जबकि हर जिले के बैंक के मैनेजर कह रहे हैं कि 40 लाख मांगों तो 4 लाख भी नहीं मिल रहा है। हम पब्लिक को कहां से रुपये दें। गांव की शाखाओं में तो एक एक बैंक को रोज एक दो लाख रुपये भी नहीं मिल रहे हैं। गांव के हालात कितने विकराल उसका अंदाजा सिर्फ इसी बात से लगाया जा सकता है कि यूपी में हर 20 से 25 गांवों के बीच एक बैंक है। लोग कई किलोमीटर चल कर दो से चार हजार रुपये के लिए आते हैं और निराश लौटकर जाते हैं। आपकी तैयारी नहीं है। पर आपको सच बोलने और सच सुनने में शर्म आ रही है। कोई अगर सच्चाई दिखाना चाहता है तो आप उसका मजाक उड़ा रहे हैं। उन लोगों को जो रोज 200 रुपये भी मुश्किल से कमा पाते हैं उन्हें आप मोबाइल एप से रुपये लेन देन करने और कैशलेस इकोनोमी समझा रहे हैं। यह जमीनी सच्चाइयों से बहुत दूर रहने जैसा ही है। पर ऐसे लोगों को वक्त जवाब देगा जरूर...बकौल शायर
आदमी को चाहिए वक्त से डर कर रहे, जाने किस घड़ी वक्त का बदले मिजाज...


कैशलेस इकोनामी बहुत कठिन है डगर पनघट की...
जो मित्र कैशलेस लेनदेन की वकालत करते फिर रहे हैं वे कैशलेस ट्रांजेक्शन में देखें कि चीन और जापान कहां हैं। चीन आबादी में दुनिया का सबसे बड़ा देश काफी नीचे है, क्योंकि टेक्नोलाजी में आगे होने के बावजूद चीन और जापान इसके खतरे जानते हैं। जर्मनी कहां है जहां 73 फीसदी नकदी का चलन है। कैशलेस सिर्फ 100 फीसदी साक्षर और अमीर देशों में चल सकता है। सिंगापुर और स्वीडन तो हमारे देश के एक राज्य के बराबर भी नही हैं। वहीं कैशलेस के अपने खतरे हैं। सारा डाटा चोरी होने का।आपको पता है न पेटीएम में सबसे बड़ी हिस्सेदारी चीन के अलीबाबा समूह की है। अभी कैशलेस की तरफदारी पेटीएम, जीओ मनी, मोबीक्वीक, ओला मनी, एयरटेल मनी जैसी कंपनियां कर रही हैं क्योंकि ऐसे ट्रांजेक्शन में उनकी 1.5 से 4 फीसदी तक दलाली चलेगी।

- विद्युत प्रकाश मौर्य



Sunday, 27 November 2016

सन 2016 में मोदी बाबा लाए नोट क्रांति

1857 में मंगल बाबा ( मंगल पांडे ) 1942 में गान्ही बाबा ( महात्मा गांधी) 1977 में जेपी बाबा और अब 2106 में मोदी बाबा। इन सब में क्या साम्यता है. सभी क्रांति लेकर आए। मंगल बाबा सिपाही क्रांति किहिन तो आजादी के लिए लड़ने का बिगुल बजा। गान्ही बाबा कहिन अंगरेजन भारत छोड़ो तो जेपी बाबा कहिन संपूर्ण क्रांति अब नारा है भावी इतिहास हमारा है। तो 2016 में मोदी जी काला धन पर बहुते चोट किहिन। इ नोट क्रांति है... एतना चोट की पूरा देस बिलिबिला गया। सब करिया धन वाला लोग ओकरा के उजर करे के उपाय खोज रहा है लेकिन कुछो बुझा नहीं रहा है कि क्या करें। कौने कौने के समझ में आ रहा है त उ कुछ जुगत भिड़ा ले रहा है।

अब आवे वाला पीढ़ी जे लोग स्कूल में टेक्स बुक पढिहें इतिहास के. ओमा मोदी बाबा के नाम नया क्रांतिलावे खातिर लिखल जाई जरूर। ओकरा संगे मोदी बाबा के साथ जेटली बाबा के नाम भी लिखल जाई जरूर से। हमारा सुरेश प्रभु जी से अनुरोध है कि आप एगो ट्रेन चलाईए नोटक्रांति शहीद एक्स्प्रेस। 1857 की क्रांति पर ट्रेन है। 1942 के क्रांति पर अगस्त क्रांति राजधानी एक्सप्रेस ट्रेन है। 1977 के क्रांति पर संपूर्ण क्रांति एक्सप्रेस है त नोट क्रांति पर भी एगो रेल गाड़ी का नाम होना चाहिए। उ रेल गाड़ी मोदी जी के शहर बनारस से दिल्ली के बीच चले तो अच्छा रहेगा। प्रभु जी अगर देरी किए त इसका श्रेय आने वाले कउनो दूसर रेल मंत्री को मिल जाएगा, एहिसे हम  कहते हैं कि तनी जल्दी करिए। अपना नाम भी मोदी अउर जेटली संघे अमर किजिए।

1942 के क्रांति से आजादी मिला देश को. त हम लोग खुलली हवा में सांस लेने लगे। संपूरण क्रांति में बहुत बवाल मचा पर बाद में सब फुस फुस हो गया। पर सुना है कौनो कौनो राज्य में जेपी आंदोलन मे शामिल लोगिन के पेंसिन मिल रहा है। भक्त लोग कह रहिन है कि इ नोट क्रांति से बहुते लाभ होने वाला है आने वाला दिनन में । माने कि देश में कहूं दू नंबर के धन रहिए नहीं जाएगा। सब जगह एक नंबर। दारू,  सिगररेट, जुआ सब एक नंबर में होगा। पुलिस वाला बिल्कुले रिश्वत नहीं मांगे। सब सरकारी दफ्तर के बाबू लोग सत्यवादी हो जाएगा। माने कौनो मंदिर में दान अउर भिखारी लोग के भीख देना होगा तो एहिजो स्वाइप मशीन चाहे पेटीएम चलेगा नू। 

एकदम देश में सब लोग श्रीमान सत्यवादी हो जाएगा। राजा हरिश्चचंदर के जुग जमाना आ जाएगा। राशन के दोकान वाला लोग सब सामान रशीद काट के बेचेगा। अपना टैक्स एकदम इमानदारी से जमा करेगा। सब लोग जो कई कई ठो घर बनवा के किराया नकद नारायण में वसूलता है उ लोग किरायेदार से किराया बैंक खाता में जमा करवाएगा चाहे स्वाइप मशीन लेके किराया वसूलने आएगा। पक्का रसीद देगा। तमाम निजी यूनीवर्सिटी वाला जो एडमिशन मे डोनेशनन लेता है उ भी चेक लेगा पक्का रसीद देगा। एको पइसा का बेइमानी अब कहीं नहीं चलेगा। इ नोट क्रांति सब क्रांति पर भारी पडेगा। एकदम राम राज आ जाएगा देश में। तब तक लाइन में लगे रहिए।

 - विद्युत प्रकाश मौर्य