Sunday, 30 July 2006

विकास के लिए जरूरी है एसईजेड

रियाणा में कांग्रेस के सांसद कुलदीप बिस्नोई अपनी सरकार के रिलायंस के साथ मिलकर एसईजेड यानी स्पेशल इकोनोमिक जोन बनाए जाने के फैसले के खिलाफ हैं। इसलिए उन्होंने हाल में उन पांच गांवों की तूफानी पदयात्रा की जिन गांवों की जमीनें इस आर्थिक जोन के लिए ली जाने वाली हैं। उनका आरोप है कि इस आर्थिक जोन के नाम पर किसानों की जमीन बहुत सस्ते में ली जा रही है। वे खुलेआम ऐसे किसी आर्थिक जोन का विरोध कर रहे हैं। अब किसानों की हितों की रक्षा एक मुद्दा हो सकता है। यह जरूरही है कि जिन किसानों की जमीनें इस आर्थिक जोन के लिए ली जाने वाली है, उनको अपनी जमीन का वास्तविक मुआवजा मिले। निश्चय ही किसानों के हितों की अनदेखी नहीं होनी चाहिए। पर किसी राज्य में आर्थिक जोन का अगर निर्माण किया जा रहा है तो यह किसी भी सूरत में गलत नहीं ठहराया जा सकता है।

क्यों चाहिए आर्थिक जोन- देश के समग्र आद्योगिक विकास के लिए आर्थिक जोनों का निर्माण जरूरी है। तभी हम चीन जैसे देश से मुकाबला कर सकेंगे। रिलायंस का हरियाणा में बनने वाला प्रस्तावित आर्थिक जोन 25 हजार एकड़ का है जबकि चीन में इससे कई बड़े बड़े आर्थिक जोनों का निर्माण हो चुका है। अब पंजाब हरियाणा जैसे राज्य बड़े औद्योगिक घरानों को अपने यहां आकर आर्थिक जोन बनाने का न्योता दे रहे हैं तो इसमें कोई बुराई नहीं नजर आनी चाहिए।
आर्थिक जोन में उद्योग स्थापित होने से उद्योग जगत को लाभ है। इसमें एक खास तरह के सभी उत्पादन केंद्रों की स्थापना एक ही परिसर में की जाती है। इसके साथ ही वेयरहाउस मजदूरों व अधिकारियों के लिए आवासीय क्षेत्र का निर्माण भी इसी क्षेत्र में किया जाता है। इससे उत्पादन की प्रणाली एकीकृत हो जाती है। जाहिर है कि इसका असर उत्पादन पर भी पड़ेगा। जैसे गारमेंट के क्षेत्र सभी उद्योगों को एक खास जोन में स्थापित किया जाए। पेट्रोलियम आटोमोबाइल आदि जुड़े उद्योगों को एक ही परिसर में स्थापित किया जाए तो उत्पादन प्रक्रिया को बेहतर बनाया जा सकेगा।
सरकार की रियायतें- यह आरोप लगाया जा रहा है कि सरकार ऐसे आर्थिक जोन बनाने के नाम पर उद्योगों को रियायतें दे रही है। यह सही है कि उद्योगों को आकर्षित करने के लिए रियायतें घोषित करनी पड़ती है। उद्योगपति भी कोई उद्योग वहीं लगाएगा जहां उसे सबसे बेहतर सुविधाएं प्राप्त हो सकेंगी। अभी पिछले कुछ सालों से टाटा समूह एक लाख रुपए की कार बनाने की बात कर रहा है। हालांकि उसने यह तय नहीं किया था कि यह कार कहां पर बनाई जाएगी। कभी उत्तरांचल, कभी पं बंगाल के नाम की चर्चा चल रही थी। अंत में पंजाब सरकार से समझौते केबाद यह तय हुआ कि टाटा की सस्ती कार का यह प्रोजेक्ट पंजाब में रोपड़ जिले में लगाया जाएगा। जाहिर है कि टाटा ने वहीं प्लांट लगाना पसंद किया जहां उसे सबसे बेहतर सुविधाएं प्राप्त हुईं। उद्योगपतियों को अगर रियायत नहीं प्राप्त हो तो वे अपना उद्योग एक राज्य से उठाकर दूसरे राज्य में ले जाने की बात करने लगते हैं। पिछले कुछ सालों में कई उद्योग धंधे पंजाब से शिफ्ट होकर हिमाचल प्रदेश में शिफ्ट होने लगे क्योंकि वहां उन्हें सस्ती बिजली और कई साल तक करों में रियायत मिल रही थी। इसलिए हर सरकार को अपने यहां उद्यमियों को आकर्षित करने के लिए कई उपक्रम करने पड़ते हैं। कोई उद्योगपति सबसे पहले कानून व्यवस्था की बेहतर स्थितियां उसके बाद बिजली पानी सड़क जैसी मूलभूत सुविधाओं की ओर देखता है।
-विद्युत प्रकाश



Saturday, 29 July 2006

बोरवेल में गिरे प्रिंस के बहाने

मीडिया हर बिकाउ आइटम को पकड़ता है। खासकर समाचार चैनल प्रतियोगिता में अपनी व्यूअरिशप बढ़ाने के लिए हर उस खबर को पकड़ने की कोशिश में लगे रहते हैं जिसमें बिकाउ एंगल हो। इसी क्रम में रोचक और फिल्मी खबरों को समाचार चैनलों पर ज्यादा तरजीह मिल पाती है। पर हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले में एक हैंडपंप में बोरवेल में फंसे पांच साल के नन्हें प्रिंस को बचाने का आपरेशन दिखाने के लिए कई चैनलों ने लगभग 40 घंटे का लाइव शो दिखाया। इसका टीवी चैनलों को लाभ भी हुआ। माना जाता है कि इस दौरान उनकी टीआरपी में जबरदस्त इजाफा हुआ। देश भर के लोगों की नजरें टीवी स्क्रीन की तरफ थीं। इस दौरान टीवी देखने वालों की संख्या इतनी बढ़ी जितनी की भारत पाकिस्तान मैच के दौरान भी नहीं होती। अभी तक देश में सबसे ज्यादा टीआरपी भारत पाकिस्तान के मैच के दौरान ही देखने को मिलता है। जहां प्रिंस को बचाने के आपरेशन के दौरान टीवी चैनलों के व्यूअरशिप में जबरदस्त इजाफा हुआ वहीं कुछ चैनलों ने इस दौरान विज्ञापनों से जबरदस्त कमाई भी की।
सब कुछ टीआरपी के लिए - हालांकि इस दौरान जी न्यूज जैसे चैनल ने कहा कि वह बीच में कोई विज्ञापन नहीं दिखाएगा और मानवतावादी धर्म का निर्वहन करते हुए प्रिंस को बचाने को लेकर पल पल की खबरें प्रसारित करेगा। प्रिंस प्रकरण में टीवी चैनलों को अपने बारे में एक सकारात्मक संदेश यह ज्ञापित करने का मौका मिला कि वे सकारात्मक खबरों को भी प्राथमिकता देते हैं। नहीं तो अभी तक समचार चैनलों के बारे में माना जाता था कि वे अपराध और मनोरंजन की खबरों को चासनी लगाकर परोसते हैं। इसमें काफी हद तक सच्चाई भी है। चाहे व राखी सावंत पर कोल्हापुर में मुकदमा का प्रकरण हो या फिर मीका और राखी सावंत चुंबन प्रकरण सभी समाचार चैनलों ने घंटों इसपर कवरेज की। इन घटनाओं का देश के सरोकार से कोई जुड़ाव नहीं था। हां इसका फायदा राखी सावंत और मीका जैसे लोगों को जरूर मिला। हासिए पर रहने वाले लोग अचानक लाइमलाइट में आ गए थे। पर क्या प्रिंस प्रकरण को दिखाकर टीवी चैनलों ने सचमुच में अपना मानवतावादी चेहरा प्रस्तुत किया। नहीं इसके पीछे असली मकसद तो था ज्यादा से ज्यादा दर्शक बटोरने की कोशिश। कई समाचार चैनलों के बीच आजकल असली लड़ाई इसी बात को लेकर है। हालांकि टीवी चैनलों पर शानदार कवरेज का प्रिंस को और प्रिंस के गांव हल्दाहेड़ी के लोगों को जबरदस्त लाभ हुआ है। गांव में विकास की लहर चल पड़ी है। सरकार वहां सारी सुविधाएं जुटाने में लगी है, वहीं सरकारी व गैर सरकारी संस्थाएं प्रिंस के परिवार वालों को मदद करने मे जुटी है।

सबसे बड़ा लाइव शो - एक मायने में प्रिंस प्रकरण पर कवरेज ने भारतीय टेलीविजन जगत में इतिहासा रच दिया है। यह है टीवी स्क्रीन पर सबसे लंबे लाइव शो का। लगभद 40 घंटे तक कई चैनल इस प्रोग्राम का जीवंत प्रसारण करते रहे। यह रियलिटी टीवी पर दिखाए जाने वाले किसी लाइव शो की तरह ही था। इस प्रोग्राम का अंत भी सुखांत रहा क्योंकि प्रिंस को बचा लिया गया। पर इसमें टीवी चैनलों की भूमिका क्या रही। प्रिंस को तो गांव वालों के अथक परिश्रम और थल के सेना के रेजिमेंट के जवानों के विशेष प्रयास से बचाया जा सका। टीवी चैनलों ने तो इसे अपने लिए भी एक मसाले की तरह भुनाया। स्टार न्यूज ने प्रिंस और उसके परिवार वालों को मुंबई लेजाकर घुमाया। फिल्मी सितारों से मुलाकात कराई और इस घटना में इंटरटेनमेंट एंगिल निकालकर इसे कैश कराया।

सामाजिक सरोकार और मीडिया
अगर हम टीवी चैनलों की बात करें तो क्या दिन भर दिखाई जाने वाली खबरों में भला कितनी खबरें ऐसी होती हैं जिनका सामाजिक सरकोकार से कोई जुड़ाव होता है। वास्तव में आजकल ऐसी खबरें बहुत कम देखने को मिलती हैं। हर जगह बिकाउ माल पेश करने की होड़ सी लगी है। अगर कोई चीज बिकाउ नहीं है तो उसे बिकाउ कैसे बनाया जाए इसकी होड़ लगी है। सभी चैनलों ने बोरवेल में फंसे प्रिंस को सकुशल बाहर निकालने की घटना को लाइव दिखाया। हालांकि उसे बाहर निकालने में इन चैनलों की कोई खास भूमिका नहीं रही। वे इस दौरान चाहते तो अपने नेटवर्क का इस्तेमाल करते हुए देश के किसी भी कोने से विशेषज्ञ बुलाते और इस बचाव आपरेशन में मददगार भी बन सकते थे। पर गरीब प्रिंस को तो कुदरत ने ही बचा लिया। यह उसकी उत्कट जीजिविषा ही थी कि वह 50 घंटे तक बोरवेल के छेद में 53 फीट नीचे जीवित बचा रहा और बाहर से आ रही रोशनी के साथ जीवन के लिए संघर्ष करता रहा। इसके इस संघर्ष को हर किसी ने सलाम किया।
मनोरंजन का मसाला - पर प्रिंस के बचने के बाद एक टीवी चैनलों को इसमें जबरदस्त मनोरंजन का मशाला मिल गया। वह प्रिंस और उसके परिवार वालों को चुपके से मुंबई ले गया। वहां प्रिंस दो दिनों तक फिल्म इंडस्ट्री के लोगों से मिलता जुलता रहा। हालांकि किसी भी फिल्म स्टार से मिलकर प्रिंस के चेहरे पर कोई एक्सप्रेशन नहीं आ रहा था। आता भी कैसे प्रिंस कोई शहरी लड़ता तो है नहीं जो किसी फिल्म स्टार को पहचानता हो और टीवी पर उनका चेहरा देखकर खुश हो जाता हो। वह तो इन सब चीजों से निस्पृह है। उसके लिए सन्नी दयोल, अनुपम खेर, शिल्पा शेट्टी, मलयिका अरोरा, सलमान खान आदि का कोई मतलब नहीं है। सारे चेहरे अजनबी जैसे हैं। हां समाचार चैनल दो दिन तक इन सब सितारों को अनौपचारिक रुप में टीवी पर दिखाता रहा। दर्शकों को उसने आदत डलवा दिया। मनोरंजन दिखाने की समचार की शक्ल में। इसलिए उसे अपनी पसंद का साफ्टवेयर मिल गया था। पर अभागे प्रिंस को मुंबई का वातावरण पसंद नहीं आया। 50 घंटे बोरवेल में रहकर वह भले ही सकुशल रहा हो पर मुंबई से आने के बाद वह जबरदस्त बीमार पड़ गया। कई दिनों तक वह अस्पताल में पड़ा रहा। पर इस दौरान किसी ने भी प्रिंस की सुध नहीं ली।
ऐसी कितना घटनाएं होती हैं जो खबर बनती हैं। प्रिंस जैसे और भी लोग होते हैं जो आपदा में फंसे होते हैं। उनके निकालने के लिए आपरेशन होता है। पर वे मीडिया में खबर नहीं बनते। अभी गुजरात में सैकड़ों स्कूली बच्चे बाढ़ के कारण अपने बोर्डिंग स्कूल की बिल्डिंग में ही फंस गए। उन्हें भी सेना ने आपरेशन करके सकुशल निकाला। हालांकि गड्ढे में किसी बच्चे के गिर जाने की प्रिंस के रुप में कोई पहली घटना नहीं है। इससे पहले हरियाणा और मध्य प्रदेश में कई और बच्चों को ऐसी घटनाओं में सफलतापूर्वक निकाला जा चुका है। पर तब टीवी चैनलों को या तो पता नहीं चला था, या फिर तब उनको इसमें कोई बिकाउ एंगिल नहीं नजर आया था। जब भी टीवी चैनल वाले कोई खबर बनाते हैं तो उन्हें एक बार इस एंगिल से भी सोचना चाहिए कि इस खबर के साथ सामाजिक सरोकार कितना जुड़ा हुआ है। जल्दबाजी के चक्कर में अभी हाल में सोनीपत के पास नहर में गिरी स्कूली बस के प्रकरण में पहले टीवी चैनलों ने कहना शुरु कर दिया कि 50 बच्चों में से छह को बचा लिया गया है बाकि के बचे होने की कोई उम्मीद नहीं है। जबकि कुछ घंटे बाद ही यह साफ हो गया कि 29 बच्चों में से 23 को सफलतापूर्वक बचा लिया गया था।
- विद्युत प्रकाश मौर्य 
( 23 जुलाई 2006 को हरियाणा के कुरुक्षेत्र ज़िले के एक गाँव में 60 फुट गहरे गड्ढे में गिरे एक बच्चे को 48 घंटे के प्रयास के बाद भारतीय सेना के अधिकारी बचाने में कामयाब हो सके थे।) 

Wednesday, 5 July 2006

आखिर हम क्यों दे रिश्वत..

हमारे समाज के हर तबके का आदमी टैक्स चुकाता है। चाहे वह रिक्सावाला हो, चायवाला हो या खोमचे वाला। आप जो भी छोटी मोटी खरीददारी करतेहैं उसमें सरकार को दिया जाने वाले टैक्स शामिल होता है। यह टैक्स सेल्स टैक्स, एक्साइज ड्यूटी या सर्विस टैक्स के रुप में हो सकता है। ऐसे में हमें यह जानने का पूरा हक है कि हमारा यह पैसा कहां इस्तेमाल हो रहा है। साथ ही हमें चाहिए कि हम रोजाना के काम काज में सरकारी दफ्तरों में छोटे-मोटे काम काज के लिए भी रिश्वत नहीं दें। अगर सरकारी स्कूल में शिक्षक पढ़ाने नहीं आते, बिजली कर्मचारी समय पर बिजली ठीक करने नहीं आता तो हमें चाहिए कि हम इसके लिए भी जांच पड़ताल करें। ऐसे ही सवाल अरविंद केजरीवाल के जेहन में आए। उन्होंने क्लास वन की सरकारी नौकरी से छुट्टी ले ली और एक संस्था परिवर्तन का गठन किया। लोग मानते हैं कि दिल्ली में समाजसेवा करने की गुंजाइस नहीं है। पर उनकी संस्था पूर्वी दिल्ली के निम्न मध्यमवर्गीय इलाके से संचालित होती है। उनके कार्यों का सम्मान देते हुए उन्हें सन 2006 के लिए रामन मैग्सेसे अवार्ड के लिए चुना गया है।
अरविंद केजरीवाल को मैग्सेसे अवार्ड

अरविंद केजरीवाल उस व्यक्ति का नाम है जिसने समाज में फैले छोटे छोटे भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाई है। उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री के बाद भारत सरकार में लोक सेवक की ग्लैमरस नौकरी से छुट्टी ले रखी है। इन दिनों दिल्ली के निम्न मध्यमवर्गीय इलाके में अपनी संस्था परिवर्तन चला रहे हैं। उनके द्वारा किए गए कार्यों को महत्व प्रदान करते हुए उन्हें 2006 के मैग्सेसे अवार्ड के लिए चुना गया है। अरविंद केजरीवाल ने समाज सेवा के लिए कोई क्रांतिकारी रास्ता नहीं चुना बल्कि सरकारी नियम कानून के ही लोगों को सही इस्तेमाल करने की तरकीब सुझाई जिसे भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए हथियार के रुप में इस्तेमाल किया है।
आरटीआई मंच
लोगों को सूचना के अधिकार के बारे में सही जानकारी देने के लिए और उसका कारगार इस्तेमाल करने के लिए उन्होने फरवरी 2004 में दिल्ली आरटीआई (राइट टू इन्फारमेशन) मंच का गठन किया। यह मंच समय समय पर लोगों को सूचना के अधिकार के प्रति जागरूक करने के लिए अभियान चलाता है। साथ ही मीटिंग और सेमिनार का आयोजन करता है।
यह शायद बहुत मुश्किल काम हो कि भारत के किसी राज्य के सरकारी दफ्तर में आपका कोई काम बिना रिश्वत दिए नियत समय पर हो जाए। इसके पीछे बहुत बड़ा कारण यह भी है कि हम कई तरह के नियमों से अनजान हैं। चाहे राशन कार्ड बनवाना हो, बिजली का नया कनेक्शन लेना हो, ड्राइविंग लाइसेंस या पासपोर्ट बनवाना हो। ये काम बिना रिश्वत दिए हो सकते हैं। बस आपको अपने अधिकारों की जानकारी होनी चाहिए। कई सरकारी विभागों में हर काम के लिए एक नियत समय तय किया हुआ है। अगर उतने दिन में आपका काम नहीं होता है तो आप सूचना अधिकार के तहत शिकायत कर सकते हैं। आखिर आप किसी सरकारी कर्मचारी को रिश्वत क्यों दें जबकि वह अपने काम के लिए सरकार की ओर से अच्छी तनख्वाह पाता है। यह तनख्वाह उसको आपके द्वारा दिए गए टैक्स से ही मिलती है।
 क्या करें अगर काम न हो

किसी सरकारी दफ्तर में आपका कोई काम लंबित हो तो आपको क्या करना चाहिए। इसका सीधा सा उपाय है आप रिश्वत देने को ना कहें और अपने काम के लिए सूचना के अधिकार के तहत शिकायत करें। इसके लिए आपको आरटीआई एक्ट के बारे में पता होना चाहिए जो हर राज्य में लागू है। दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की संस्था परिवर्तन अब तक सूचना के अधिकार के तहत 200 से ज्यादा लोगों को न्याय दिलवा चुकी है। रिश्वत दिए बगैर ही बिजली का कनेक्शन मिला है। खराब मीटर बदले गए हैं वहीं गलत बिल का सुधार भी किया गया है। उनकी संस्था ने न सिर्फ झुग्गी झोपड़ी वाले इलाके बल्कि दिल्ली के पाश इलाके ईस्ट आफ कैलाश के रहने वाले लोगों के लिए भी उनके अधिकारों लड़ाई लड़ी है।

अगर किसी मुहल्ले में सफाई कर्मचारी नहीं आता है तो आपके उसके उपस्थिति रजिस्टर की चेकिंग करवा सकते हैं। आप अपने इलाके के एमएलए से मांग कर सकते हैं कि एमएलए फंड से आपके मुहल्ले की भी सड़क बननी चाहिए। अगर आपका एमएलए झूठे वादे करता है तो आप उसकी भी चेकिंग करवा सकते हैं। अरविंद केजरीवाल की संस्था ने दिल्ली में ऐसे कई मामलों में मुहल्ले के लोगों के लिए लड़ाई लड़ी है। इसमें उन्हें बड़े ही शांतिपूर्ण ढंग से काम करते हुए सफलता मिली है।
गुप्ता को मिला बिजली कनेक्शन
दिल्ली में रहने वाले अशोक गुप्ता ने 3 फरवरी 2001 को अपने नए मकान के लिए बिजली के कनेक्शन के लिए आवेदन किया। उनसे विभाग में रिश्वत मांगी गई। नहीं देने पर उनका बिजली का कनेक्शन नहीं लगा। उन्होने फरवरी 2002 में सूचना के अधिकार के तहत शिकायत कर दिया। इसके एक महीने बाद ही उनका कनेक्शन लग गया। दरअसल बिजली विभाग में नियम है कि कोई भी नया कनेक्शन 30 दिनों के अंदर लग जाना चाहिए। इसी तरह टेलीफोन ट्रांसफर व कई अन्य कार्यों को लेकर भी समयअवधि के नियम बनाए गए हैं। जिन्हें पता करके आप शिकायत कर सकते हैं।
खुद तय करें अपनी किस्मत
कहा जाता है कि समय बलवान होता है वह हर किसी की किस्मत तय करता है। पर परिवर्तन संस्था का मोटो वाक्य है कि हम खुद अपनी किस्मत तय कर सकते हैं सूचना के अधिकार का सही प्रयोग करके। हां इसके लिए आपको भी ईमानदार और सही स्थान पर होना पड़ेगा। आप सरकार से मांग कर सकते हैं कि हमारा पैसा तो हमारा हिसाब। यानी अगर हमने टैक्स दिया है तो हमें यह जानने का हक भी है कि पैसा कहां से आ रहा है और कहां जा रहा है।
अरविंद केजरीवाल के काम देश भर के अलग अलग इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए एक मिसाल की तरह है। उनसे आप प्रेरणा ले सकते हैं और शांतिपूर्ण ढंग से कहीं भी सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांग सकते हैं। अब हर राज्य में सूचना आयुक्तों की भी बहाली कर दी गई है।
इसलिए आगे जब आपसे छोटेमोटे कामों के लिए कोई सरकारी मुलाजिम रिश्वत मांगे तो आप एक बार अपने अधिकारों प्रयोग जरूर करें। याद रखें कि किसी को रिश्वत देकर आप सरकारी कर्मचारी को भ्रष्ट बनाने में योगदान करते हैं।
-माधवी रंजना



और सस्ता हो सकता है मोबाइल

मोबाइल फोन के दाम मे कमी आने का क्रम जारी है। देश का पहला मेड इन इंडिया मोबाइल भी पेश किया जा चुका है। मोटोरोला ने सी 115 माडल को पहली बार मेड इन इंडिया के लेबल के साथ बाजार में उतार दिया है। इसकी कीमत रखी गई है 1700 रुपए जो अब तक का भारतीय बाजार में सबसे सस्ता मोबाइल भी है। नोकिया का सबसे सस्ता माडल ढाई हजार में उपलब्ध है वहीं एलजी सेमसंग और सोनी इरिक्सन के सेट इससे भी कुछ ज्यादा कीमतों में हैं। हालांकि कुछ कंपनियां इससे भी सस्ते में मोबाइल फोन आफर कर रही हैं। जैसे आप 2000 रुपए में मोबाइल खरीदें और एक हजार रुपए का टाक टाइम फ्री में प्राप्त करें। यानी मोबाइल की कीमत सिर्फ 1000 रुपए में पड़ी। वहीं रिलायंस के एक आफर में 2500 रुपए के मोबाइल फोन के साथ 2500 रुपए का टाक टाइम भी फ्री है। इसी तरह का आफर टाटा इंडिका में भी उपलब्ध है। अगर दो साल तक फ्री इनकमिंग का मोबाइल आप आफर में लेतें हैं। अगर 100 से 150 रुपए मासिक किराया मान कर चलें तो भी मोबाइल फोन फ्री में ही बैठता है। यानी मोबाइल फोन की मार्केटिंग में एक नए दौर की शुरूआत हो चुकी है। अगर आप किसी भी कंपनी में दो साल या अधिक का कमिटमेंट देते हैं तो आपको मोबाइल फोन लगभग मुफ्त में ही प्राप्त हो जाता है। यह मोबाइल फोन बेचने की नई रणनीति है। इसमें निम्न आय वर्ग के लोग मोबाइल फोन के तेजी से उपयोक्ता होते जा रहे हैं।
कुछ साल पहले इंग्लैंड और अमेरिका में भी कंपनियां मोबाइल फोन इसी तरह बेच रही थीं। अगर आप तीन साल के लिए एक ही कंपनी का ग्राहक बने रहने का वादा करें तो आपको एक हैंडसेट मुफ्त में ही प्राप्त हो जाता है। इससे कंपनी को यह लाभ होता है कि उसे एक निष्ठावान ग्राहक मिल जाता है। आजकल लोगों में एक कंपनी छोड़कर दूसरी कंपनी की ग्राहकी लेने की भी प्रथा तेजी से चल पड़ी है। ऐसे में कमिटमेंट वाले उपभोक्ता की तलाश भी किसी भी कंपनी के लिए चुनौती है।
पर हम बात कर रहे हैं मोबाइल फोन के सस्ते होने की। अगर कोई कंपनी आपको किसी स्कीम के तहत मोबाइल फोन देती है यह आपको बाजार से सस्ती दर पर तो प्राप्त होता ही है इसके साथ ही कंपनी को भी यह मोबाइल हैंडसेट निर्माता से सस्ते में ही प्राप्त होता है क्योंकि कंपनी निर्माताओं से मोबाइल बल्क में खरीदती है। थोक खरीददारी में उसे ये सेट सस्ते पड़ते हैं। आने वाले समय में कई हैंडसेट निर्माता कंपनियां बड़े सर्विस प्रोवाइडरों के साथ हैंडसेट बेचने के लिए गठजोड़ करती नजर आएंगी। ऐसा सीडीएमए खंड में काफी पहले से ही शुरू हो चुका है। टाटा इंडीकाम या रिलायंस का मोबाइल कनेक्शन लेने के समय उपभोक्ता को कंपनी हैंडसेट खरीदने के विभिन्न विकल्प पेश करती है। पर अब इसी तरह का समझौता जीएसएम खंड में एयरटेल, हच जैसी कंपनियां भी कर रही हैं। यह विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में कई कंपनियां 1000 रुपए में ही इंट्री लेवेल का मोबाइल पेश करेंगी। देश के संचार मंत्री दयानिधि मारन का भी सपना है कि लोगों को एक हजा रुपए में हैंडसेट मिले। अगर कंपनियां ईमानदार कोशिश करें तो 500- 600 रुपए में भी हैंडसेट पेश किया जा सकता है। यानी जनता जनार्दन का मोबाइल।
- विद्युत प्रकाश मौर्य 
( 2005 ) 


Saturday, 1 July 2006

ब्लाग पर प्रतिबंध उचित नहीं

अभी हाल में सरकार ने कई ब्लाग साइटों पर अचानक प्रतिबंध लगा दिया। इसका ब्लागरों ने जोरदार विरोध किया। इंटरनेट पर ब्लाग लोगों की अभिव्यक्ति का बहुत अच्छा माध्यम बन कर उभरे हैं। इसमें किसी को भी अपने विचारों को अभिव्यक्त करने की पूरी आजादी है। पर साथ ही यह सही है कि ब्लाग में कई लोग अश्लील संदेशों का आदान प्रदान करने में जुटे हैं तो कुछ लोग उग्रवादी विचारों को लेकर ब्लाग चला रहे हैं। पर इसका यह समाधान नहीं हो सकता कि किसी के ब्लाग पर पूरी तरह रोक लगा दी जाए।

क्या हैं ब्लाग- ब्लाग सब वेब लाग से बना है। इंटनेट पर आप मुफ्त में अपना ब्लाग बना सकते हैं। बिल्कुल किसी न्यूज लेटर की तरह नियमित तौर पर आप लेख फोटो आदि जारी कर सकते हैं। कई वेबसाइट इंटरनेट यूजरों को ब्लाग बनाने की सुविधा प्रदान करते हैं। इसके लिए वे कोई शुल्क नहीं लेते हैं। किसी भी विचार को ब्लाग पर प्रकाशित करना बहुत ही आसान प्रक्रिया है। इससे उन लोगों को बहुत लाभ पहुंचा है जो किसी खास विचारधारा के लोग हैं और वे सीमित संख्या में दुनिया के किसी भी कोने में फैले हुए हैं। वे ब्लाग पर अपने संदेशों का आदान प्रदान करके एक दूसरे के संपर्क में रह सकते हैं।

मुंबई में बम धमाको के बाद जब सरकार ने अचानक ब्लाग साइटों को प्रतिबंधित किया तो इससे ब्लागरों में बड़ी तीखी प्रतिक्रिया हुई। यह सही है कि कई आतंकी संगठनों ने अपने संदेशों के आदान प्रदान के लिए इंटरनेट का सहारा लिया है। वे इंटरनेट पर कोड लैंग्वेज में संदेशों का आदान प्रदान करने में लगे हैं। इन्हें गुप्ततर संगठनों के लिए डिकोड करके समझना मुश्किल होता है। इस मामले में पुलिस डाल-डाल तो आतंकी संगठन पात-पात हैं। यह देखने में आ रहा है कि कई आईटी के जानकार, वैज्ञानिक और प्रोफेसर भी इन आतंकी संगठनों की मदद कर रहे हैं। ऐसे में पुलिस विभाग को अपना आईटी विभाग और साइबर क्राइम से जुड़े एक्सपर्ट को और शोध सुविधाएं प्रदान करनी चाहिए। अगर आईटी का इस्तेमाल आतंकी संगठनों द्वारा हो रहा है तो उसका समाधान अवश्य ढूंढा जाना चाहिए। पर इसकी एवज में समान्य इंटरनेट यूजरों को परेशानी नहीं होनी चाहिए।

मुंबई बम विस्फोट के बाद कुल 20 ऐसे इंटरनेट साइटों पर प्रतिबंध की बात उठी थी जो उग्रवादी विचारों का प्रचार प्रसार कर रहे हैं। इनमें कुछ ब्लाग साइटें भी थीं। पर इन साइटों को नाम पर सैकड़ों ऐसी साइटें भी कुछ दिनों के लिए ब्लाक कर दी गईं जिनका आतंकी संगठनों की गतिविधियों से कोई लेना-देना नहीं था। इससे उन लोगों को को बड़ी परेशानी हुई जो इंटरनेट का इस्तेमाल एक वैकल्पिक मंच के रुप में कर रहे थे। इसमें कोई शक नहीं है कि इंटरनेट अब एक नए वैकल्पिक मीडिया के रुप में भारत में भी उभर रहा है अब किसी न किसी रुप में इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले लोगों की संख्या करोड़ो में पहुंच रही है। इंटरनेट पर जो ब्लाग बन रहे हैं वे धर्म, भाषा, जाति, विचारधारा को लेकर हैं।

जैसे तमिलनाडु की किसी खास जाति के लोगों ने अपना मंच बना लिया और दुनिया भर में फैले लोग एक दूसरे से संवाद बनाने में लगे हैं। शाकाहारियों ने अपना एक मंच बना लिया है। 

इसी तरह हिंदी भाषा में कविता, कहानी, व्यंग्य और संस्मरण लिखने वालों के दर्जनों ब्लाग हैं। अगर कोई संपादक आपका लेख नहीं छापता है। संपादक के नाम पत्र में आपकी चिट्ठी नहीं छपती है तो आपके पास अपना ब्लाग बनाकर अपने विचार दुनिया भर में लोगों के साथ साझा करने का विकल्प मौजूद है। इसलिए सरकार को इस माध्यम पर रोक नहीं लगानी चाहिए।
- Vidyut Prakash Maurya