Sunday, 13 August 2006

क्या नाम से जाति सूचक शब्द हटाए जाएं

भला नाम में क्या रखा है। नहीं नाम मे बहुत कुछ रखा है। पिछले दिनों एक सुझाव आया कि नाम से जातिसूचक शब्द हटाए जाने चाहिएं इससे देश में जातपात के भेदभाव को मिटाने मे मदद मिल सकती है। इसको लेकर कानून बनाने का भी सुझाव आया है। पर क्या ऐसा कोई कानून बनाया जा सकता है। क्या लोगों को इस बात के लिए कानून मजबूर किया जा सकता है कि आप अपने नाम में कोई भी जातिसूचक शब्द न लगाएं। शायद इसको लेकर कई तरह की मुश्किलें आ सकती हैं। 

पहले यह तय करना मुश्किल हो सकता है कि कौन शब्द जाति सूचक हैं कौन से शब्द नहीं। जैसे उत्तर भारत में शर्मा और सिंह जैसे टाइटल हैं जो कई जातियों के लोग लगते हैं। कानून बनाकर इन शब्दों के प्रयोग पर पाबंदी लगाना कठिन होगा। पंजाब में काफी लोग अपने नाम के साथ अपने गांव का नाम लगाते हैं। वहीं गुजरात में अपने नाम के साथ अपने नाम के साथ पिता का नाम लगाते हैं। उन्हें ऐसा करने से रोकना कानून बनाने से संभव नहीं हो सकेगा।
वहीं कोई भी नाम रखना और नाम के आगे कोई भी टाइटल लगाना हर किसी का मौलिक अधिकार है। इस पर कानून बनाकर रोक नहीं लगाया जा सकता है। ऐसा करने पर बड़ी संख्या में लोग विद्रोह कर सकते हैं। नाम से जाति सूचक शब्द हटाने को लेकर आपत्ति देश भर की जातीय संगठनों को भी हो सकती है। ये जाति संगठन अपने अपने समाज में लोगों को इस बात के लिए अभिप्रेरित करते हैं आप अपने नाम के साथ खुलकर जाति सूचक शब्द लगाएं जिससे की सामने वाले को आपकी जाति का पता चल जाए। दलित व पिछड़ी जातियों में पहले अपनी जाति छुपाने का प्रचलन था इसलिए इन समुदाय से आने वाले लोग बड़ी संख्या में टाइटल नहीं लगाया करते थे। पर अब पिछले एक दशक में दलित जातियों में स्वाभिमान जगा है। वे खुल कर अपनी जाति सूचक टाइटल लगाने लगे हैं।
बहुत कम लोग ऐसे हैं जो नाम से जातिसूचक शब्दों को हटाए जाने के पक्ष में हैं। दुनिया के हर देश में नाम के साथ किसी न किसी तरह का शीर्षक लगाए जाने का प्रचलन है। देश में कुछ ऐसे लोग हुए हैं जिन्होंने अपने नाम से जाति सूचक शब्द हटाए हैं। जैसे राजनीति में चंद्रशेखर। पर ऐसे लोग जो नाम के साथ जाति नहीं लगाते उनकी भी जाति लोग बखूबी जानते हैं। जो नहीं जानते वे उनकी जाति पता कर ही डालते हैं। बिहार के करिश्माई नेता का असली नाम लालू प्रसाद है पर उन्हें ज्यादा लोग लालू प्रसाद यादव या लालू यादव के नाम से बुलाते हैं। अगर लोग अपनी प्रेरणा से ही अपने नाम इस तरह के रखने लग जाएं जिससे उनकी जाति के बारे में पता न चले तो यह बड़ी अच्छी बात हो सकती है। पर इसको लेकर किसी तरह के कानून थोपने की कोई जरूरत नहीं है।
अगर कानून बनता है तो काफी लोग इस कानून के खिलाफ अपील करेंगे। सबसे बड़ी बात है किसीको कोई भी नाम रखने से रोका नहीं जा सकता है। अगर कोई दलित समाज से आने वाला व्यक्ति किसी सवर्ण जाति की कोई टाइटल को लिखना चाहता है तो उसे भी ऐसा करने से लोग अथवा कानून नहीं रोक सकते हैं। कुछ लोग को अजीबोगरीब किस्म के उपनाम रख लेते हैं। जैसे मप्र के भाजपा नेता बाबू लाल गौर। कहते हैं वे स्कूल में अपने शिक्षक की बात गौर से सुनते थे इसलिए उनका नाम शिक्षक ने ही बाबूलाल गौर रख दिया।

-विद्युत प्रकाश मौर्य


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