Sunday, 17 September 2006

सभी रेलगाड़ियां वातानूकुलित होंगी

 गरीब रथ के साथ एक प्रयोग की शुरुआत हुई है। आने वाले दौर में सभी लंबी दूरी की ट्रेनों को पूरी तरह वातानूकुलित करने का प्रयास किया जाएगा।

कई साल पहले भारतीय रेल ने जब एसी में थ्री टीयर कोच का प्रावधान किया तो यह काफी लोकप्रिय हुआ। एसी 2 टीयर में जहां 46 लोग ही यात्रा कर पाते थे वहीं उतने ही बड़े डिब्बे में अब 64 लोग यात्रा करते हैं। एसी थ्री से जहां लोगों को 25 फीसदी तक कम किराए में ही वातानूकुलित क्लास में सफर करने का फायदा मिला वहीं रेलवे का भी राजस्व बढ़ने लगा है। अब वातानूकुलित वर्ग मे एसी थर्ड यात्रियों को बीच सर्वाधिक लोकप्रिय है। आजकल रेल कोच फैक्ट्रियों में ज्यादा डिब्बे एसी 3 के ही बनाए जा रहे हैं। कई रेलगाड़ियों में एसी-3 के डिब्बे तुरंत भर जाते हैं पर एसी-2 खाली ही रहता है।

अब गरीब रथ के साथ एक नई शुरूआत हुई है। अगर वर्तमान रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव का यह प्रोजेक्ट लोकप्रिय हो जाता है तो आने वाले दिनों में अधिकांश रेलगाडि़यों के सभी डिब्बों को एसी करने का प्रयास किया जाएगा। यानी आम जनता के लिए चलने वाली सभी ट्रेनें भी राजधानी और शताब्दी की तरह पूरी तरह से वातानूकुलित हुआ करेंगी। यह सब कुछ स्पेश मैनेजमेंट की नई नीति के तहत संभव हो सका है। यानी की उतनी ही जगह में ज्यादा सीटें देने की कोशिश करना। अगर यह सब कुछ सफल रहा तो मध्यम वर्ग क्या फैक्टरी में काम करने वाले मजदूर वर्ग के लोग भी वातानूकुलित क्लास में चलने का सुख उठा सकेंगे। अभी तक रेलगाड़ियों में वातानूकुलित क्लास में सफर सिर्फ उच्च वर्ग के लोग कर पाते हैं। आमतौर पर मध्यम वर्ग के लोग भी स्लीपर क्लास में ही सफर करते हैं। भारत जैसे देश में जहां पूरे देश का मौसम एक सा नहीं रहता है वहां सभी लंबी दूरी की गाड़ियों को वातानूकुलित बनाने की कोशिश स्वागत योग्य है।

लालू का अर्थशास्त्र-
अब यह देंखें की गरीब रथ के मामले में लालू का अर्थ शास्त्र कैसे काम करता है। अगर 17 डिब्बों वाली को वातानूकुलित रेलगाड़ी है तो एसी कोच में प्रति यात्री प्रति किलोमीटर 47 पैसे परिचालन दर आती है। वहीं अगर गरीब रथ हो तो यह परिचालन दर 39 पैसे आ जाती है। क्योंकि इतनी जगह में गरीब रथ में ज्यादा यात्री सफर करते हैं। रेलवे को अनुमान है कि इस तरह की व्यवस्था से रेलवे के राजस्व में 63 फीसदी तक की बढ़ोतरी हो सकती है वहीं लोग रेलगाड़ी में सस्ती यात्रा का भी सुख उठा सकते हैं।
स्पेश मैनेजमेंट
एसी 3 में जहां एक कोच में कुल 64 यात्रियों के लिए सोने की जगह होती है वहीं गरीब रथ के कोच नए डिजाइन से तैयार किए गए हैं। इनमें 74 यात्रियों के लिए सोने की जगह है। कपूरथला स्थित रेल कोच फैक्टरी ने इन डिब्बों को डिजाइन किया है। अब इसमें कुछ और बदलाव कर इसे 84 सीटों वाला करने की योजना पर काम चल रहा है। इसी तरह गरीब रथ में लंबी दूरी की यात्रा करने वालों के लिए भी चेयरकार की व्यवस्था की गई है। परंपरागत एसी चेयरकार में 70 सीटें होती हैं पर इसमें 102 सीटों का प्रावधान किया गया है। इसका किराया लगभग स्लिपर क्लास के बराबर ही रखा गया है। यह अग बात है कि लंबी दूरी की यात्रा कोई बैठकर नहीं करना चाहता है। पर लंबी दूरी की अधिकांश ट्रेनों में मजदूर वर्ग के लोग बैठकर क्या आलू प्याज की तरह ठूंसकर सफर करते भी देखे जाते हैं। उनके लिए एसी सिटिंग बहुत अच्छी रहेगी। इससे गरीब व मध्यमवर्गीय जनता को एक सुखद विकल्प भी मिल सकेगा।
-माधवी रंजना madhavi.ranjana@gmail.com



Wednesday, 13 September 2006

हिंदी अब विश्व भाषा बनेगी

संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति जार्ज बुश ने अपने देश के लोगों से अपील की है कि वे हिंदी जैसी भाषा सीखें। यूएसए के सैनिक, गुप्तचर अधिकारी और राजनेता भी अब हिंदी के जानकार मिलेंगे। यानी अमेरिका ने हिंदी को एक मजबूत भाषा के रुप में स्वीकार कर लिया है। पहले माइक्रोसाफ्ट और अब अमेरिका जैसा देश। यानी हमारी भाषा विश्व पटल पर मजबूत हो रही है। यह दूसरा पहलू हो सकता है कि अमेरिका में हिंदी सीखने का जो अभियान चलाया जा रहा है उसके मूल कारण रणनीतिक है। पर इतना तय है कि उन्हें इस भाषा के पीछे एक ताकत नजर आती है। पहली ताकत जो एनआरआई लाखों की संख्या में अमेरिका में रहते हैं और अमेरिका की सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण दखल देने लगे हैं। भारतीय टीवी चैनल और और भारतीय में बनने वाले हिंदी सिनेमा की ग्लोबल मार्केट में उपस्थिति। हिंदी के साथ एक बहुत बड़ा बाजार है। हमें अगर कुछ पुरी दुनिया में बेचना है, पूरी दुनियाको समझाना है तो हिंदी में उतरना ही पड़ेगा। 


अमेरिका ने इस सच को समझ लिया है कि दुनिया की जो मजबूत भाषाएं हैं उनका सम्मान करना ही पड़ेगा। इसके लिए इस भाषा को लिखना पढ़ना आना ही चाहिए।
अगर हिंदी के लोगों ने कंप्यूटर को और पहले अपना लिया होता तो हिंदी का विकास और भी तेज हो सकता था। हिंदी ऐसी भाषा है जो कुछ सौ वर्षों में ही करोड़ों लोगों की जुबान बनी है। खड़ी बोली का जो स्वरूप हम आज अपनाए हुए हैं वह अंग्रेजों के भारत में आगमन के बाद ही विकसित हुआ है। भारतेंदु हरिश्चंद्र के बाद से पल्लवित होने वाली हिंदी अब देश की सीमाएं लांघ चुकी है। माक्रोसाफ्ट के एक्सपी संस्करणों में रीजनल भाषा विकल्प में हिंदी को किसी भी कंप्यूटर में सक्रिय किया जा सकता है। दुनिया के किसी भी कंप्यूटर में कुछ मिनटों के प्रयास के बाद आप हिंदी में टाइपिंग शुरू कर सकते हैं। हो सकता है आने वाले दिनों में आप अमेरिका जाएं तो आपको होटलों में हिंदी समझने वाले लोग मिल जाएं। पर्यटक स्थानों पर हिंदी में बातें करने वाले गाइड मिल जाएं। हिंदी के विकास में इसका लचीलापन और इसकी सारग्राहिणी प्रवृति का बहुत बड़ा योगदान है। हालांकि कि तत्सम हिंदी के पुरोधा इन चीजों से विरोध रखते हैं। पर हमें हिंदी को और उदार बनाना होगा। दूसरी भाषा के शब्दों के प्रयोग में उदारता बरतनी होगी। जो लोग खिचड़ी भाषा को हिंग्लिश कहकर धिक्कारते हैं उन्हें यह समझना होगा इसी तरह के लोग हिंदी की वैश्विक पहचान बना रहे हैं। टीवी के समाचार चैनल, मनोरंजन चैनल और हिंदी फिल्में हिंदी को ग्लोबल बना रही हैं। आज अमेरिका ने स्वीकारा कल दुनिया के कुछ और देश स्वीकारेंगे। इस परिपेक्ष्य में अब भारत के कुछ राज्यों में हिंदी विरोध की बात बेमानी लगती है। हमें अब इस तरह की बातों से उपर उठना होगा। आने वाले सौ सालों हिंदी और ऊपर जाएगी। बहुत ऊपर।

-विद्युत प्रकाश,   मेल vidyutp@gmail.com