Friday, 13 October 2006

दुनिया का सबसे छोटा वेब डिजाइनर

कई कहते हैं पूत के पांव पालने में ही दिखाई दे जाते हैं। सो नन्हें अजय पुरी ने नौ महीने की उम्र से ही कंप्यूटर के की बोर्ड से खेलना शुरू कर दिया था। दो साल की उम्र में प्रेजेंटेशन देने लगे। तीन साल की उम्र में उन्होंने अपनी वेबसाइट www.microsftkid.com बना डाली। उन्हें विश्व के सबसे कम उम्र के वेब डिजाइनर होने का गौरव प्राप्त है। नौ साल के मास्टर अजय पुरी को जनवरी 2006 में हैदराबाद में मनाए गए प्रवासी भारतीय दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह द्वारा सम्मानित किया गया। वे अपने पिता के साथ थाइलैंड में रहते हैं। वर्ष 2001 में अजय पुरी जब चार साल के थे तब एडमिंस्ट्रेटिव स्टाफ कालेज हैदराबाद खुद का डिजाइन किया हुआ प्रेजेंटेशन पेश किया था तो देखने वालों ने दांतों तले उंगलियां दबा ली थीं। अजय की प्रस्तुति तीन पन्ने की वेबसाइट थी जो उन्होंने फ्रंट पेज 2000 की मदद से बनाई थी। इसमें उन्होंने तस्वीरों, ग्राफ, डाटा लिस्ट, मेल मर्ज व एनीमेडेट साउंड आदि का इस्तेमाल किया था।


बिल गेट्स ने दी बधाई
अजय पुरी को अपनी वेबसाइट बनाने के लिए माइक्रोसाफ्ट के चेयरमैन बिल गेट्स ने बधाई दी। वे 14 नवंबर 2002 को बिल गेट्स से मिले तब गेट्स ने उन्हें कहा कि तुम भारत के बिल गेट्स बनोगे। तब अजय ने गेट्स को याद दिलाया-आपके दादा एक बैंक के वाइस प्रेसिडेंट थे तो मेरे दादा एक कंपनी के वाइस प्रेसिडेंट। आपके परदादा राजनीति में थे तो मेरे परदादा भी राजनेता थे। यहां यह बताते चलें कि अजय भारतीय राजनीति के देदीप्यमान नक्षत्र आचार्य नरेंद्र देव के परपोते हैं। उनके दादा जी विष्णु नारायण पुरी ने उन्हें होश संभालने के साथ कंप्यूटर सीखाना आरंभ कर दिया था। अजय के पिता रवि पुरी बैंकांक की एक कंपनी सेंचुरियन टेक्सटाइल्स में मार्केटिंग मैनेजर हैं।
अजय बताते हैं कि उनकी वेबसाइट पूरी तरह के उनके बारे में वे क्या सोचते हैं। मैं क्या जानता हूं। मैं किन लोगो से मिल चुका हूं। उनकी वेबसाइट पर आप उनकी बिल गेट्स, अटल बिहारी बाजपेयी, के आर नारायणन, एनआर नारायण मूर्ति, कई फिल्म स्टार सहित दुनिया की प्रमुख हस्तियों के साथ उनकी तस्वीर भी देख सकते हैं। अजय पुरी अपनी वेबसाइट पर हर किसी को अपने साथ संवाद स्थापित करने का भी मौका भी देते हैं। आप उन्हें ई मेल कर सकते हैं। वे उसका जवाब भी दे सकते हैं। नौ साल की उम्र में उनका कंप्यूटर ज्ञान काफी बढ़ चुका है। वे कंप्यूटर पर वीडियो कान्फ्रेंसिंग करना जानते हैं। अब वे डिजिटल मूवी बनाने की तैयारी में हैं। अब उनका लक्ष्य गिनिज बुक आफ वर्ल्ड रिकार्डस में अपना नाम दर्ज कराने का है। वे सबसे कम उम्र के एनीमेटर के रुप में वहां अपना नाम देखना चाहते हैं। खैर अजय को हमारी शुभकामनाएं।
-माधवी रंजना



Monday, 2 October 2006

आज भी प्रासंगिक हैं गांधी

एक बार फिर गांधी चर्चा में हैं। पहला कारण तो है सत्याग्रह आंदोलन के 100 साल पूरे होना। 11 सितबंर 1906 गांधी जी दुनिया को लड़ाई के लिए एक नया अस्त्र प्रदान किया। सत्याग्रह निर्बलों के लिए बहुत बड़ा अस्त्र साबित हुआ। पर अभी हास्य फिल्मों की श्रंखला में मुन्नाभाई एमबीबीएस का नया सिक्वल आया है लगे रहो मुन्नाभाई। इसमें टपोरी मुन्ना की मुलाकात गांधी जी से हो जाती है। वह अपनी कई समस्याओं को गांधीवाद से सुलझाने की कोशिश की गई है। फिल्म में हास्य व्यंग्य के माध्यम से ही गांधीवाद के कई पहलूओं को छूने की बड़ी सफल कोशिश की गई है। गांधी जी के पोते तुषार गांधी को भी इस फिल्म का संदेश बहुत अच्छा लगा। पिछले साल भी गांधीजी पर केंद्रित एक फिल्म आई थी मैंने गांधी को नहीं मारा। इसमें अनुपम खेर ने शानदार अभिनय किया था। इसमें गांधी को अपराध बोध शैली में याद करने की कोशिश की गई।

वास्तव में गांधी विचार समग्र जीवन दर्शन है। यह एक व्यवहारिक एप्रोच है। इससे दुनिया के कई बड़े आंदोलनों ने प्रेरणा ली है। तभी कुछ साल पहले हुए के सर्वेक्षण में गांधी जी को 20 वीं सदी का दुनिया का सबसे लोकप्रिय नेता घोषित किया गया।
कुछ लोग गांधी को श्रेष्ठ राजनेता मानते हैं तो कुछ समाजसुधारक तो कुछ लोग सफल अर्थशास्त्री। गांधी एक सफल संचारक भी थे। इसके बावजूद की वे कोई ओजपूर्ण वाणी के वक्ता नहीं थे। गांधी का मजाक उड़ाने वाले उन्हें देश आजाद होने के कुछ साल बाद ही आउटडेटेड मानने लगे। पर हर कुछ साल बाद कुछ ऐसे प्रकरण आते हैं जो गांधी को एक बार फिर प्रासंगिक सिद्ध कर देते हैं। गांधी जी ने हमें लड़ने के लिए अंहिंसा जैसा अस्त्र दिया जिससे दुनिया में लाखों लोगों ने प्रेरणा ली है। आज भी दुनिया के कई देशों में गांधीवादी तरीके से लोकतंत्र की बहाली के लिए लड़ाई लड़ी जा रही है।
हालांकि लगे रहो मुन्नाभाई फिल्म में जिस तरह गांधी जी के दर्शन को गांधीगिरी के नाम से दिखाया गया है उस पर कई गांधीवादियों को आपत्ति है। वास्तव में गांधीगिरी को दादागिरी जैसे मुहावरे से जोड़कर देखा जा रहा है जो ठीक नहीं हैं। हमें शब्दों के हमेशा शाब्दिक अर्थ पर ही नहीं बल्कि उसके भाव पर जाना चाहिए। गांधीजी के ही वंशज तुषार गांधी जी को आज भी गांधीवाद के प्रचार प्रसार को लेकर चिंतित और सक्रिय रहते हैं उन्हें यह फिल्म एकदम झक्कास लगी है। एक ही संदेश को ज्ञापित करने का सबका अपना अलग अलग तरीका हो सकता है। हमें किसी फिल्म निर्माता की तारीफ करनी चाहिए जो फिल्म में कोई अच्छा मैसेज डालने की कोशिश करता है।
यह तो तय बात है कि मीडिया के रूप में फिल्मों का समाज पर जबरदस्त प्रभाव है। फिल्में आम जनता पर बहुत गहरा प्रभाव डालती हैं। लोग फिल्मों के पात्रों और उनकी गतिविधियों को हर रूप में नकल करने की कोशिश करते हैं। ऐसे में कोई फिल्म अगर अच्छे संदेश देगी तो इसका समाज पर कुछ न कुछ अच्छा प्रभाव तो पड़ेगा ही। यह उसी शिक्षक की तरह है जो खेल खेल में बच्चों को ज्ञान की बातें याद करा देता है। वहीं कई शिक्षक उसे बोरिंग ढंग से पेश करते हैं जिसका बच्चों पर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ता है। बहरहाल गांधी जी आज भी हमारे बीच में ही हैं। यह हमारे ऊपर निर्भऱ करता है कि हम उन्हें कितना आत्मसात करते हैं।
-विद्युत प्रकाश vidyutp@gmail.com