Wednesday, 10 October 2007

बाजार में सस्ता बेचने की होड़

बड़े बड़े शापिंग माल खुल रहे हैं और उनमें सस्ता बेचने की होड़ लगी है। किशोर बियानी के पेंटालून समूह का यह नारा ही है कि इससे सस्ता और अच्छा और कहां। कई सामानों पर वे चैलेंज भी करते हैं। अब अगर हम एक सस्ती जींस की बात करें तो वह बिग बाजार में 299 रुपए की मिल जाती है।

 रफटफ ब्रांड की जींस  20 फीसदी छूट पर 240 रुपए में भी कई बार मिल जाती है। बिग बाजार को भारत में मुकाबला दे रहे आरपीजी समूह के दूसरे सुपर मार्केट चेन में भी जींस की कीमत न्यूनतम 299 रुपए ही है। वहीं जल्द ही इस दौड़ में शामिल होने वाले रिलायंस रिटेल की भी सस्तेमें जींस बेचने की बात चल रही है। इसके तहत वह महज 200 रुपए में जींस बेचने की सोच रही है। इसके लिए वह कई निर्माताओं से बात कर रही है। दुनिया के सबसे बड़े शापिंग माल की चेन वालमार्ट में एक जींस महज 10 डालर में मिल जाती है। यानी यह 450 रुपए के बराबर पड़ता है। विदेशों के हिसाब से यह सस्ता है। भारत के परिपेक्ष्य में देखें तो अभी यहां कपड़े और जूते विदेशों की तुलना में सस्ते हैं। बिग बाजार के फुटवियर बाजार में जूते 200 रुपए से मिलने आरंभ हो जाते हैं। हर सुपर मार्केट और हाईपर मार्केट के बीच कंप्टिशन चल रहा है। वे अपने कई प्रोडक्ट को सस्ता कहकर बेच रहे हैं। अगर परंपरागत बाजारों से तुलना करें तो ये चीजें वास्तव में सस्ती हैं। बिग बाजार में कोट सूट महज 1500 रुपए में मिल जाता है। अगर कपड़ा खरीदकर दर्जी से सिलवाने जाएं तो यह काफी महंगा पड़ सकता है।
जाहिर है सुपर मार्केट कच्चा माल या तैयार माल सीधे निर्माताओं से खरीदते हैं इसलिए उनके लिए सस्ते में बेच पाना संभव हो पा रहा है। बिग बाजार समूह की कंपनी पैंटालून तो रेडीमेड कपड़ों के कारोबार में पहले से ही रही है। बिग बाजार में एक रेडीमेड पैंट भी 200 रुपए से मिलना आरंभ हो जाता है। बिग बाजार को चुनौती देने वाली प्रमुख कंपनियां रिलायंस और आदित्य विक्रम बिड़ला भी मूल रूप से वस्त्र निर्माता कंपनियां है इसलिए वहां भी सस्ते में बेचने की होड़ होगी।
जांच परख कर करें खरीददारी-
फिर भी ग्राहकों को चाहिए कि इन सुपर मार्केट से सामान खरीदने से पहले भी अन्य सुपर बाजारों से रेट की जांच पड़ताल करनी चाहिए। यह तस्दीक जरूर करें कि सुपर बाजारों के रेट दावा क्या वाकई सही है। इसलिए अन्य बाजारों का भी दौरा करते रहें। कई प्रोडक्ट्स में देखा गया है कि वह सुपर मार्केट की तुलना में बाजार में सस्ता मिल जाता है। बाजार के छोटे-मोटे दुकानदारों से आप रेट को लेकर बारगेन भी कर सकते हैं। इसलिए सुपर मार्केट से भी आंखे मूंद कर खरीददारी न करें। अगर आप कोई ब्रांडेड प्रोडक्ट खऱीद रहे हैं तो उसके आफ्टर सेल्स सर्विस के बारे में भी जानकारी प्राप्त कर लें। हो सकता है उस प्रोडक्ट का सर्विस सेंटर आपके शहर में न हो और आपको परेशानी झेलनी पड़ जाए। कई बार देखा गया है कि लक्जरी आईटम और खिलौने आदि सुपर मार्केट में सस्ते नहीं मिलते। ब्रांडेड सामानों के रेट भी मिला लें। हां ग्राहकों को यह संतोष हो सकता है कि ऐसे सुपर बाजारों में किसी प्रोडक्ट के नकली मिलने की संभावना बहुत कम रहती है। इसलिए कई तरह के लोकप्रिय उत्पादों की खरीददारी आप बेहिचक कर सकते हैं।
vidyutp@gmail.com




Monday, 24 September 2007

बीमा कंपनियों का कारोबार बढ़ा

बीमा कई निजी क्षेत्र की बीमा कंपनियों के आने के बाद भी जीवन बीमा का कारोबार तेजी से बढ़ रहा है। सरकारी क्षेत्र की बीमा कंपनी भारतीय जीवन बीमा निगम को निजी क्षेत्र की कई कंपनियों से चुनौती मिल रही है। इसके बावजूद एलआईसी का कारोबार बढ़ रहा है। कुछ साल पहले यह आशंका जताई जा रही थी कि निजी क्षेत्र की बीमा कंपनियों के आने के बाद सरकारी एलआईसी के कारोबार में कमी आ सकती है। पर ऐसा नहीं हुआ। कुल बीमा कारोबार में जरूर निजी क्षेत्र की कंपनियों ने अपनी हिस्सेदारी बढ़ा ली है। पर भारतीय जीवन बीमा निगम का कारोबार भी हर साल बढ़ रहा है।

लोगों में आई जागरुकता - आज बीमा सेक्टर में कुल 13 कंपनियां हैं जो जीवन बीमा की पालिसियां बेच रही हैं। पर पिछले कुछ सालो में लोगो में आई जागरुकता के कारण सभी कंपनियों का कारोबार बढ़ा है। अब लोग बीमा सिर्फ सुरक्षा के लिए ही नहीं बल्कि बचत के लिहाज से भी करवा रहे हैं। देश में ऐसे एक लाख लोग हैं जिन्होंने एक करोड़ रुपए से ज्यादा की बीमा पालिसी खरीदी है। वहीं एक करोड़ से ज्यादा की बीमा पालिसी खरीदने वालों की संख्या हर साल पांच हजार या उससे ज्यादा है। अपेक्षाकृत कम आय वर्ग के लोगों का रुझान भी अब बीमा के क्षेत्र में बढ़ा है। लोग अपने परिवार के सभी सदस्यों के नाम अलग अलग बीमा करवाने में भी विश्वास रखने लगे हैं।

कई कंपनियों में प्रतिस्पर्धा- बीमा के क्षेत्र में कई कंपनियां आ जाने के कारण कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ी है। अब कंपनियों के एजेंट घर घर जाने लगे है। वे अपनी बीमा कंपनी द्वारा दिए जा रहे प्लान को बेहतर ढंग से समझाने की कोशिश करते हैं। आज हर बीमा कंपनी के पास आपकी जरूरतों के हिसाब से अलग अलग तरह का प्लान है। कामकाजी महिलाओं के लिए , बच्चों के लिए या ऐसे लोग जिनकी आमदनी अनियमित अलग अलग तरह के प्लान डिजाइन किए गए हैं। कुछ कंपनियों ने यूनिट लिंक्ड बीमा पालिसियां पेश की हैं जिसके तहत आपका बीमा मे जमा कराया हुआ रुपया शेयर बाजार में जाकर तेजी से बढ़ता हुआ दिखाई देता है।
अगर हम सिर्फ भारतीय जीवन बीमा निगम को ही देखें जो कि सरकारी कंपनी है तो हम यह पाएंगे कि भले ही बाजार में उसका कुल शेयर घट रहा हो फिर भी उसका कारोबार बढ़ रहा है। पिछले साल जहां उसने कुल 2.39 करोड़ पालिसियां बेचीं थीं वहीं 2005-06 वित्तीय वर्ष में उसने कुल 3.17 करोड़ पालिसियां बेचीं। यानी बाजार में कई निजी क्षेत्र के खिलाड़ी आने के बाद भी सरकारी कंपनी की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ा है। इसका बड़ा कारण है निजी क्षेत्र की कंपनियां जहां अभी शहरी क्षेत्र में ही सिमटी हुई हैं वहीं एलआईसी का नेटवर्क गांव गांव तक पहुंच चुका है। इसके साथ ही एलआईसी ने अपने देश भर के दफ्तरों को नेटवर्क से जोड़ दिया है। अब आप पालिसी कहीं भी जमा कर सकते हैं।
निजी क्षेत्र में आईसीआईसीआई प्रू और बिरला सनलाइफ अच्छा कारोबार कर रहे हैं। वहीं एसबीआई लाइफ, मैक्स न्यूयार्क, टाटा एआईजी, अवीवा, चोलामंडलम, एचडीएफसी स्डैंटर्ड लाइफ भी तेजी से अपना कारोबार बढ़ा रहे हैं। पर इनकी नजर ज्यादातर बड़े ग्राहकों पर है। अब कई बैंक भी कारपोरेट एजेंट बन कर बीमा के कारोबार मे घुस गए हैं।

 -विद्युत प्रकाश vidyutp@gmail.com



Thursday, 13 September 2007

बढ़ रही है ब्लॉग पर हिंदी

हिंदी का प्रसार कंप्यूटर पर ब्लॉग में खूब हो रहा है। बड़ी संख्या में कंप्यूटर हिंदी का इस्तेमाल करने वाले लोग ब्लाग्स का इस्तेमाल करने लगे हैं। ब्लाग्स के कारण वर्ल्ड वाइड वेब पर हिंदी का प्रसार तेजी से हो रहा है। पूरी दुनिया में हिंदी जानने वाले लोग अब अपनों से संवाद स्थापित करने के लिए हिंदी में बने ब्लाग का सहारा ले रहे हैं।

 अगर आप अपने कंप्यूटर पर विंडो एक्सपी संस्करण का इस्तेमाल कर रहे हैं तो इसमें आप अपनी भाषा हिंदी को एक्टिवेट कर सकते हैं। इसके बाद गूगल सहित कई और साइटों पर जाकर अपने ब्लाग बना सकते हैं। इन ब्लाग पर आप अपनी मन की बात खुल कर कह सकते हैं। हिंदी के साहित्य प्रेमियों ने बड़ी संख्या में कंप्यूटर पर ऐसे ब्लाग का निर्माण कर रखा है जिस पर कविताएं कहानियां और संस्मरण आदि उपलब्ध हैं। इन्हें न सिर्फ आप खोल कर पढ़ सकते हैं बल्कि इनमें अपनी बातें जोड़ भी सकते हैं।
कंप्यूटर पर हिंदी को लोकप्रिय बनाने में ब्लाग की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। 

ब्लाग का मतलब है कि बिना किसी खर्च के आप इंटरनेट पर अपनी साइट बना सकते हैं। ब्लाग शब्द वेब लाग से मिल कर बना है। गूगल डाट की ब्लाग साइट का पता है www.blogger.comआप इस साइट पर जाकर अपने लिए नए ब्लाग का निर्माण कर सकते हैं। या फिर मौजूदा ब्लाग में जाकर कुछ भी खोज सकते हैं। गूगल की ब्लाग साइट आपको हिंदी में अपनी बात लिखने का मौका देती है। आप www.wordpress.com पर भी ब्लाग बना सकते हैं।

आप अपने विचार, लेख, कविता कहानी कुछ भी अपने ब्लाग पर जारी कर सकते हैं। इस तरह के ब्लाग को आप कुछ लोगों के साथ मिलकर शेयर भी कर सकते हैं। इसमें सभी सदस्य अपनी अपनी इंट्री को समय समय पर इंटरनेट पर जारी कर सकते हैं। कुछ लोगों ने तो अपना पारिवारिक ब्लाग बना रखा है। जैसे आप कहीं घूमने गए तो उसके संस्मरण और उससे संबंधित फोटोग्राफ को अपने ब्लाग पर जारी कर दें। अपने मित्रों और रिश्तेदारों को अपना ब्लाग पता बताएं वे जाकर सबकुछ देख सकते हैं। कोई चाहे तो तस्वीरों को डाऊनलोड भी कर सकता है।

कई लेखक अपने विचारों और लेखों को भी अपने ब्लाग पर जारी करने लगे हैं। एक तरह के विचार के लोगों को आपसी चर्चा करने के लिए ब्लाग बहुत अच्छा माध्यम बन गए हैं। आपके विचार चाहे कितने भी लंबे क्यों न हों आप उन्हें ब्लाग पर जारी कर सकते हैं। यहां तक कि इंटरनेट पर हास्य व्यंग्य और अश्लील विचारों वाले ब्लाग भी लोगों ने बनाने आरंभ कर दिए हैं। पर किसी भी तरह के विचार रखने वाले छोटे समूहों के लिए ब्लाग आशा की किरण हैं। आपका लेख कोई अखबार नहीं छापता हो, कोई संपादक आपकी चिट्ठी नहीं छापता है तो आप उसे ब्लाग पर जो जारी कर ही सकते हैं।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य


Sunday, 9 September 2007

बाबा रामदेव और बिहार.......

बाबा बिहार क्या गए बिहार के होकर रह गए। वे बिहारियों के मुरीद हे गए। वे बिहार पर इतने खुश हुए कि खुद को बिहार का ब्रांड एंबेस्डर बनना स्वीकार कर लिया। अब बाबा बिहार के बाहर बिहार का प्रचार करेंगे। हालांकि हमारी जानकारी के अनुसार वे बिहार के रहने वाले नहीं है। उनका पालन पोषण भी बिहार में नहीं हुआ है। पर ठीक उसी तरह जैसे कोई फिल्मी हीरोइन किसी साबुन का प्रचार करती है, बाबा शायद बिहार का प्रचार करेंगे। बिहार की सरकार ने बाबा को अपना ब्रांड एंबेस्डर बना दिया और बाबा ने उसे स्वीकार कर भी लिया। पर सवाल यह उठता है कि बाबा बिहार की किन चीजों का बिहार से बार प्रतिनिधित्व करेंगे। बिहार का सबसे लोकप्रिय खानपान है लिट्टी चोखा। वह गरीब गुरबों की खास पसंद है। क्या बाबा उसका प्रचार करेंगे। या फिर वे क्या सत्तु का प्रचार करेंगे। पर ठहरिए सत्तु का प्रचार तो लालू प्रसाद यादव जी करते हैं। वे प्रेस कान्फ्रेंस में पत्रकारों को सत्तु दिखाते रहते हैं। इसलिए बाबा लालू प्रसाद जी के फेवरिट सत्तू को उनसे छीन नहीं सकते। वैसे बाबा योग के प्रचारक हैं। योगासन करने वालों के लिए सत्तु बडे़ काम की चीज है। क्योंकि यह सात्विक है प्रोटीन भी ताकत भी बढ़ाती है। इसमें कोई मिलावट भी नहीं है।


अब बचते हैं बिहार के रिक्सेवाले। पर उनको शायद किसी ब्रांड एंबेस्डर की जरूरत ही नहीं है। वे जहां भी जाते हैं अपनी मेहनत के बल पर रिक्सा खींच कर लोगों को उनकी छोटी-छोटी मंजिलों तक पहुंचाते हैं। बाबा ने इतना जरूर कहा कि वे बिहारियों के मेहनतकश दमखम को सलाम करते हैं। पर वे उनका प्रतिनिधित्व किस तरह करेंगे इसका उन्होंने ठीक से खुलासा नहीं किया। अब बचते हैं। बिहार के बेरोजगार। पर उनकी अगुवाई को बेरोजगार ही कर सकता है। पर बाबा के पास तो पहले से ही तरह के रोजगार हैं। ब्रांड एंबेस्डर के सामने बहुत बड़ी जिम्मेवारी होती है इमेज बिल्डिंग की। सो अब बाबा तो गए बिहार के। पर क्या बाहर के लोग उन्हें बिहारी मान लेंगे। क्या बाबा बिहार से बाहर भोजपुरी बोलकर दिखाएंगे। क्या वे बिहार से बाहर बार बार बिहार का नाम लेकर लोगों को बिहार में पूंजी निवेश के लिए कहेंगे। वैसे बाबा जब से बिहार से निकल कर बाहर आए हैं उन्होंने एक बार भी बिहार का नाम नहीं लिया है।
बाबा जब एक दो साल बाद बिहार में फिर योगासन के शिविर लगाने जाएंगे तो लोग उनसे पूछेंगे कि बाबा आपने बिहार के ब्रांड एंबेस्डर के रुप में क्या किया। बाबा का मुकाबला महेंद्र सिंह धोनी से है जो पड़ोसी राज्य झारखंड के ब्रांड एंबेस्डर हैं। धोनी का तो बचपन ही रांची में गुजरा है। वे लंबे समय से वहीं रह भी रहे हैं। जब वे क्रिकेट नहीं खेलते तब वे रांची में ही रहते हैं। पर बाबा ने अभी तक पटना में कोई घर नहीं बनाया। हम बाबा को यह सलाह देंगे कि वे बिहार में एक घर जरूर बना लें जिससे उनके बिहारी होने के एहसास हो। साथ ही वे घर बिहार के ऐसे गांव में बनाएं जहां सड़क नहीं है। बिहार के 50 फीसदी गांवों में अभी भी बैलगाड़ी से जाना पड़ता है। उन गांवों में बिजली नहीं है। लालटेन जलता रहता है। लालटेन पर भी फिलहाल लालू प्रसाद जी का कब्जा है। बाबा अगर गांव में घर बना रहने जाते भी हैं तो उन्हें यह समस्या आएगी कि वे अपने घर में रोशनी कैसे करें। खैर मोमबत्ती या दीए से काम चलाया जा सकता है। पर बाबा से हम गुजारिश करेंगे कि वे एक बार बिहार के गांवों का दौरा जरूर करें। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य 

Tuesday, 4 September 2007

माइक्रो फाइनेंस के जनक -विक्रम आकुला

एक अनिवासी भारतीय का दिल भारत की गरीबी को देखकर द्रवित हो उठा। उसने भयंकर गरीबी को देखते हुए माइक्रो फाइनेंस की अवधारणा पर काम करना आरंभ किया। भारत में जन्मे विक्रम आकुला का उच्च अध्ययन विदेश में हुआ है। उन्होंने टफ्ट्स विश्वविद्यालय से बीए येल से एमए तथा शिकागो यूनीवर्सिटी से पीएचडी की है।

 पीएचडी के दौरान उनके शोध का विषय गरीबी उन्मूलन की विभिन्न रणनीतियां थी जिसे उन्होंने बाद में जीवन में उतारा भी। सन 1998 में उन्होंने एसकेएस माइक्रो फाइनेंस उद्यम की स्थापना की। आज आंध्र प्रदेश, उड़ीसा, महाराष्ट्र, कर्नाटक और मध्य प्रदेश में इसकी 85 शाखाएं हैं। विक्रम के कार्यों का मूल्यांकन करते हुए टाइम पत्रिका ने उन्हें 2006 के 100 सबसे प्रभावशाली लोगों में चयनित किया है। पर विक्रम इसे अपने लिए कोई बड़ा सम्मान नहीं मानते हैं। हां उन्हें इस बात की खुशी जरूर है कि उनके कार्यों को पहचान मिल रही है।

मेडक से हुई शुरूआत - एनआरआई विक्रम आंध्र प्रदेश के मेडक जिले में अपने एक रिश्तेदार के घर आए। वहां उन्होंने जो आसपास में गरीबी देखी उससे वे विचलित हो गए। उसके बाद उन्होंने ने मेडक से ही अपने इस ड्रीम प्रोजेक्ट की शुरूआत की। आज आकुला के प्रोजेक्ट की सफलता देखकर कई विदेशी संस्थान भी इसमें पैसा लगाने को तत्पर हैं।

बिना गिरवी के कर्ज - उनकी संस्था एसकेएस का उद्देश्य है साधनहीन लोगों को सस्ती ब्याज दर पर ऋण देकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाना। इस क्रम में अब तक एसकेएस दो लाख 21 हजार महिलाओं को 240 करोड़ रुपए ऋण के रुप में बांट चुकी है। ये महिलाएं भारत के उन क्षेत्रों से आती हैं जहां भयंकर गरीबी है। भारत में माइक्रो फाइनेंस अभी नया क्षेत्र है। इसका काम करने का तरीका समान्य बैंकिंग से अलग है। यह बिना कुछ गिरवी रखे ऋण प्रदान करता है। साथ ही इसकी ब्याज दरें भी बैंक से कम होती हैं।

विक्रम ने भारत में गरीबी के कारणों का गंभीरता से अध्ययन किया है। अपनी संस्था आरंभ करने से पहले वे फुलब्राइट स्कालरशिप के तहत भारत सरकार द्वारा संचालित जवाहर रोजगार योजना के अंतर्गत खाद्य सुरक्षा के अंतर्गत माइक्रो फाइनेंस उपलब्ध करवाने का काम किया। इसके बाद उन्होंने आंध्र प्रदेश में डेक्कन डेवलपमेंट सोसाइटी का गठन किया।

नए क्षितिज की ओर - आकुल अपनी संस्था का विस्तार आने वाले एक साल में पांच नए राज्यों में करना चाहते हैं और इससे लाभान्वितों की संख्या सात लाख तक पहुंचाना चाहते हैं। पिछले साल एसकेएस की विकास दर 300 फीसदी थी। तमाम बैंक जो सभी कर्ज कुछ गिरवी रख कर ही देते हैं भले ही वसूली के संकट से गुजर रहे हों पर एसकेएस की वापसी (रिकवरी) का दर 98 फीसदी है। जबकि बैंक 90 फीसदी रिकवरी रेट को बहुत शानदार मानते हैं। आकुला ने इस भ्रम को भी तोड़ा है कि गरीब आदमी कर्ज का रुपया नहीं वापस करता है। आकुल की कंपनी एसकेएस आधुनिक तकनीक पर काम करती है। वह अपने ग्राहकों को पैसा उपलब्ध करवाने के लिए स्मार्ट कार्ड का इस्तेमाल करते हैं। उनकी सफलता का एक बहुत बड़ा कारण पारदर्शिता पर जोर देना भी है।

-विद्युत प्रकाश



Sunday, 2 September 2007

आखिर क्यों डरे हैं बुश भारत से

भारत एक वैश्विक शक्ति के रुप में स्थापित हो रहा है इसका बेहतर अंदाजा हम हाल की कि कुछ खबरों से लगा सकते हैं। पिछले दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने अमेरिका के स्कूली बच्चों को चेताया कि सावधान हो जाओ वरना सारी नौकरियां भारतीय ले जाएंगे। उन्होंने कहा कि अमेरिकी छात्रों से कहा कि खुद को भारतीय छात्रों से प्रतिस्पर्धा करने के लिए तैयार करें। बुश को ऐसा इसलिए कहना पड़ा क्योंकि अमेरिका में आज की तारीख में सबसे अधिक आमदनी वाला जातीय समूह भारतीय हैं। 


अमेरिका में प्रोफेशनल व अन्य सेवाओं की 60 फीसदी नौकिरयों में भारतीयों का दबदबा है। इसी तरह अमेरिकी लेबर फोर्स में 80 फीसदी तक भारतीय हैं। भारत के टेक्नोक्रेट दुनिया भर में देश की इमेज को बेहतर बनाने में लगे हैं। 90 के दशक के बाद आए सूचना क्रांति के बूम ने भारत को वैश्विक शक्ति के रुप में स्थापित करने में काफी मदद की है। आज दुनिया के सभी विकसित देशों की नजर भारत की ओर है। वे भारत की एक अरब आबादी जिसमें बड़ी संख्या में मध्यम वर्ग है जो खर्च करने की क्षमता रखता है उसे एक बड़े बाजार में के रुप में देखते हैं। 

सिर्फ इतना ही नहीं भारतीय दिमाग ने जापान, जर्मनी, इंग्लैंड व अमेरिका के सभी बड़ी कंपनियों में अपने मेधा, प्रतिभा और झमता का लोहा मनवाया है।
भारत की एनआरआई कम्युनिटी ने भी अपने उद्योगों से भारत का सम्मान विश्व पटल पर बढ़ाया है। इनमें स्टील किंग लक्ष्मी नारायण मित्तल का नाम प्रमुख है जिन्हें फोर्ब्स मैगजीन ने यूरोप का तीसरा सबसे बड़ा अमीर घोषित किया है। इसके अलावा ब्रिटेन के लार्ड स्वराज पाल, होटलियर विक्रम चटवाल, ब्रिटेन की सबसे बड़ी मोबाइल कंपनी वोडाफोन के मालिक भी भारतीय मूल के हैं। अब भारतीयों की बदलती छवि न सिर्फ कुशल मजदूर की है बल्कि वे सफल उद्यमी भी हैं।
भारतीय परिवेश में भी बदलाव आया है। उन्नत दूर संचार सेवाओं के कारण अब भारतीय शहर दुनिया के अच्छे शहरों में गिने जा रहे हैं। दिल्ली में मेट्रो रेल, मिलेनियम सिटी गुड़गांव जहां दुनिया की सभी प्रमुख कंपनियों के काल सेंटर काम कर रहे हैं, साइबर सिटी हैदराबाद, इन्फारमेशन टेक्नोलाजी का शहर बेंगलूर, इन्फो सिटी के रुप में विकसित होता मोहाली ने भारत की छवि और शक्ति दोनों को नया आयाम दिया है। भारत जो दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है वहां देश ने राष्ट्रपति के रुप में एपीजे कलाम को पाया है जिनकी गिनती दुनिया के जानेमाने वैज्ञानिकों में होती है। वहीं प्रधानमंत्री के रुप में मनमोहन सिंह मिले हैं जो कुशल अर्थशास्त्री हैं। इस संयोजन ने भी भारत को मजबूत देश बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। दुनिया में भारत को एक मजबूत होती अर्थव्यवस्था के रुप में देखा जा रहा है। विदेशी निवेशकों को विश्वास भारतीय शेयर बाजार में बढ़ा है। तभी तो मुंबई शेयर सूचकांक ने 12 हजार का आंकड़ा पार कर लिया है।

 देश की अर्थव्यवस्था 8 फीसदी की गति से बढ़ रही है। प्रधनमंत्री मनमोहन सिंह चाहते हैं कि हम 10 फीसदी का विकास लक्ष्य हासिल करें। अगर सब कुछ ठीक रहा तो हम इस विकास लक्ष्य को प्राप्त भी कर लेंगे। एक सर्वेक्षण तो यह भी बताता है कि आने वाले दस सालों में हम चीन को भी पीछे छोड़ देंगे। यानी की ड्रेगन (चीन) को उपर हाथी (भारत) बैठा हुआ होगा। जरूरत सिर्फ इस बात की है कि हम भारतीय उत्पादों को विश्व बाजार के लायक बनाएं और कानून व्यवस्था में सुधार लाकर भारत के इमेज को और चमकदार बनाएं।
-         विद्युत प्रकाश मौर्य


Monday, 20 August 2007

शादी-शुदा मर्द से प्यार

अभी हाल में हेमा मालिनी की बेटी ईशा दयोल ने यह बयान जारी किया कि उन्हें किसी शादी शुदा मर्द से प्यार करने में कोई आपत्ति नहीं है। अगर उनके जीवन में कोई ऐसा संबंध बनता है तो वे इसका स्वागत करेंगी। यह बयान उन्होंने अपनी नई फिल्म के रेफरेंस में दिया जिसकी कहानी में वे किसी शादी शुदा मर्द के प्यार में पड़ जाती हैं। ईशा ने कहा कि उनकी मां (हेमा मालिनी ) ने भी तो एक शादी शुदा मर्द से ही प्यार किया था इसलिए वे इसमें कोई बुराई नहीं देखतीं। फिल्म इंडस्ट्री में शादी शुदा मर्द से ईश्क लड़ाने और फिर शादी रचाने का चलन पुराना रहा है।

कई हीरोइनों को दूसरी पत्नी बनने में कोई आपत्ति नहीं होती। पर ये महिलाएं ये नहीं देखतीं कि इसके साथ वे कितने घर फूंकने चली हैं। हालांकि प्यार हो जाने में किसी एक पक्ष को जिम्मेवार नहीं ठहराया जा सकता है। इसमें दो पक्ष होते हैं...और ताली दोनों हाथों से ही बजती है। अभी हाल में बालीवुड की खूबसूरत अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी चर्चा में हैं। शिल्पा के कारण निर्देशक अनुभव सिन्हा का घर तबाह होने को है। उनकी पत्नी अनुभव से तलाक लेना चाहती हैं। कारण अनुभव का शिल्पा से ज्यादा मेलजोल है। ठीक इसी तरह का वाकया रघुबीर यादव के साथ हुआ। मुंगेरी लाल के हसीने सपने वाले रघुबीर यादव से मुंबई फिल्म इंडस्ट्री को असीम संभावनाएं थीं। रघुबीर का मुंबई आने से पहले से ही भरा पूरा परिवार था। पर फिल्म इंडस्ट्री में आने के बाद वे सांवली सलोनी नंदिता दास के प्यार में फंस गए। प्यार का परवान कुछ इस तरह चढ़ा की रघुबीर की पहली पत्नी और बच्चे उन्हे छोड़कर गांव चले गए। उसके थोड़े दिनों बाद नंदिता दास ने भी उन्हें छोड़ दिया। उसके बाद रघुबीर की हालत बीमारों जैसी हो गई। उनका फिल्मी कैरियर और परिवार दोनों ही तबाह हो गए। अब वे फिल्मों में बहुत कम ही नजर आते हैं। ठीक इसी तरह का वाकया बोनी कपूर के साथ हुआ। बोनी ने जब श्रीदेवी को दूसरी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया तो उनकी पहली पत्नी मोना कपूर को गहरा धक्का लगा।


मोना कपूर फिल्म इंडस्ट्री मजबूत महिला सत्ती सौरी की बेटी हैं। खैर सत्ती सौरी ने इस दुख की घड़ी में मोना कपूर को सहारा दिया और उन्हें टीवी धारावाहिकों के प्रोडक्शन में व्यस्त कर दिया। पर सत्ती सौरी को दूसरी पत्नी के रुप में किसी महिला को आकर किसी का घर तबाह करने पर बड़ा दुख हुआ। दुखी सत्ती सौरी ने एक फिल्म के सेट पर हेमा मालिनी को काफी भला बुरा कहा। बकौल सत्ती सौरी हेमा मालिनी ने ही फिल्म इंडस्ट्री में दूसरी महिला के ट्रेंड की शुरूआत की। हालांकि फिल्म इंडस्ट्री में दक्षिण भारतीय निर्माताओं में भी दूसरी पत्नी रखने का रिवाज बहुत पुराना है। 

गाहे बगाहे कई फिल्मकार इसलिए अपनी कहानी में भी दो पत्नियों के बीच झूलते पति का चित्रांकन करते हैं। गोविंदा की साजन चले ससुराल इसी तरह की फिल्म थी। जब पुरानी अभिनेत्रियों ने इस मामले में इतना साहस दिखाया तो अगली पीढ़ी के इशा दयोल और शिल्पा शेट्टी को भला क्या आपत्ति हो सकती है। 

आज के दौर में तो रिश्तों में स्थायीत्व का भाव और भी कम होता जा रहा है। पुरूष मानसिकता हमेशा से दूसरी स्त्रियों में रुचि रखने की रही है पर महिलाओं में इस तरह का बढ़ता ट्रेंड खतरनाक हो सकता है। हमारा समाज कभी भी ऐसे पुरूष या ऐसी स्त्रियों को अच्छी नजर से नहीं देखता है।
-माधवी रंजना madhavi.ranjana@gmail.com