Friday, 23 March 2007

तो तुम्हें साथ-साथ रहने की आजादी चाहिए...

भला किसी को किसी के साथ रहने के से कौन रोक सकता है। अमृतसर में ऐसे दो मामले सामने आ चुके हैं जब दो लड़कियों ने आपस में शादी रचा ली। इसी तरह का एक मामला हाल के दिनों में मेरठ में सामने आया है। इस बारे में देश के कानून भी मौन हैं। वास्तव में दो लोगों के साथ साथ रहने को लेकर कोई कानून बनाना भी मुश्किल काम है। किसी को अगर किसी का साथ अच्छा लगता है तो इसमें भला कानून कर भी क्या सकता है। मेरठ में ऐसे सह जीवन (इसे विवाह तो कह नहीं सकते) के खिलाफ वहां की कुछ सामाजिक संस्थाओं ने विरोध प्रदर्शन भी किया। बकौल कुछ समाज सेवक यह सब कुछ ठीक नहीं है। पर यह किसी की अभिव्यक्ति या जीवन जीने के पद्धति की आजादी छीनने जैसा नहीं है। किन्ही दो लोगों का जीवन जब तक समाज को प्रभावित नहीं कर रहा हो तब तक समाज के लोगों को इस पर छींटाकशी करने या विरोध करने का कोई मतलब नहीं होना चाहिए। देश में ऐसे मामले तो हमेशा से सामने आते रहे हैं जब दो पुरूष साथ साथ रहते हों। जब दो पुरूष साथ रहते हों तो आमतौर पर लोगों को यह शक भी नहीं होता है कि उनके बीच कोई शारीरिक संबंध भी हो सकता है। पर जब दो लड़कियां साथ रहने की सार्वजनिक तौर पर घोषणा करती हैं तो बवाल मचता है। हो सकता है दो स्त्रियों में भी भावनात्मक संबंध इतना मजबूत हो कि वे साथ साथ रहना चाहती हों। अभी हाल में हरियाणा के एक जिले में भी ननद भौजाई ने साथ साथ रहने की घोषणा कर डाली।
हमें यह मान कर चलना चाहिए कोई भी समाज हो वहां कुछ अनकनवेंशनल रिश्ते हो सकते हैं। ऐसा हमेशा से होता आया है। जब तक ऐसे रिश्ते दूसरों को हानि न पहुंचाते हों, हाय तौबा मचाने का क्या फायदा। कोई अपने बाथरूम में कपड़े पहन कर नहाता हो या नंगा होकर क्या फर्क पड़ता है। जब वह सड़क पर नंगा नहाने लगे तो आप उसे पत्थर जरूर मारिए। कहिए कि ऐसा मत करो हमारे बच्चों पर बुरा असर पड़ रहा है।
कई ऐसे लोग साथ-साथ रहने का फैसला कर लेते हैं जिनके बीच उम्र का बहुत बड़ा अंतर होता है। ऐसे संबंधों पर कुछ टीवी कार्यक्रम भी बने हैं। केस स्टडी भी की गई है। पर ऐसे मामलों तो तूल देना हवा देना प्रचारित करना शायद गलत होगा। पर अगर किसी भी उम्र, जाति अथवा लिंग के लोगों को अगर साथ अच्छा लगता हो तो लगने दीजिए। उसपर समाज की ढेर सारी बंदिशें मत लगाइए। न उम्र की सीमा हो न जन्म का हो बंधन, जब प्यार करे कोई तो देखे केवल मन। यह मन माने की बात है भाई। किसी शायर ने लिखा है- आंसूओं से धुली खुशी की तरह रिश्ते होते हैं शायरी की तरह।


-    विद्यत प्रकाश मौर्य

Saturday, 3 March 2007

आउटसोर्सिंग के खतरे

आजकल आउटसोर्सिंग का दौर है। हर कंपनी अपने बहुत से काम को आउटसोर्स कर रही है। इसका सीधा मतलब है कंपनी बहुत से कामों को ठेके पर दूसरी कंपनी को दे देती है। इस आउटसोर्सिंग से जहां कई बड़ी कंपनियों को लाभ हो रहा है वहीं उपभोक्ताओं को इससे परेशानी भी हो रही है। अगर आप किसी काम के लिए कोई शिकायत लेकर जाते हो तो ठेके पर काम करने वाली कंपनी का मुलाजिम आपसे कुछ तयशुदा सवाल पूछता है और आपके सवालों के नपेतुले जबाव ही दे पाता है। वह कभी आपकी समस्या का पूरी तरह समाधान नहीं कर पाता है। मान लिजिए आपने कोई अपनी समस्या किसी काल सेंटर में दर्ज कराई। दो दिन बाद आप उस बार में जानना चाहते हैं कि क्या कार्रवाई हुई तो आपको काल सेंटर में फोन करने पर फिर एक नया एक्जक्यूटिव मिलेगा जो आपसे नए सिरे से फिर आपकी समस्या को पूछेगा। हो सकता है। आपकी समस्या का निदान कई दिनों तक न हो। काल सेंटर में अक्सर छोटी मोटी समस्याओं का निदान तो हो जाता है पर बड़ी समस्याएं बनी रह जाती हैं। 


कई बार उपभोक्ता अपनी समस्याएं सुनाते सुनाते परेशान हो जाता है, पर कालसेंटर की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। भले ही आपकी समस्या का निदान नहीं हो सके पर काल सेंटर की एक्जक्यूटिव आपसे पूछेगा मैं आपकी और कोई सहायता कर सकता हूं सर। वे भले ही आपकी कोई सहायता नहीं कर पाएं पर यह पूछना मानो उसका धर्म है।
कई बड़ी कंपनियां शायद यह सोचती हैं कि हमने अपने अमुक सर्विसेज आउटसोर्स करके उपभोक्ताओं को खुश कर दिया है। पर वास्तव में ऐसा नहीं होता। काल सेंटर में काम करने वाला आदमी जिस कंपनी के लिए काम कर रहा है उसके प्रति कभी पूरी तरह लायल नहीं होता। जबकि जो व्यक्ति स्थायी तौर पर किसी नामचीन कंपनी के लिए काम करता है वह अपनी कंपनी के लिए निष्ठावान होता है। उसे अपनी कंपनी की ब्रांड वैल्यू की बेहतर चिंता होती है। कुछ कंपनियों ने भले ही 24 घंटे के काल सेंटर की व्यवस्था कर रखी हो पर इसका सही मायने में कोई फायदा नहीं हो रहा है।
जो काल सेंटर किसी तरह का प्रोडक्ट बेचने का काम कर रहे हैं वे ऐन केन प्रकारेण उपभोक्ता को फंसा लेना चाहते हैं। इसके लिए उपभोक्ता को वे कई तरीके से फोन करके परेशान करते हैं। कई लोग तो इस तरह के काल्स से काफी परेशान दिखते हैं। एक बार मना कर देने के बाद भी काल सेंटर वाले किसी न किसी तरीके से बार बार फोन करते रहते हैं। एक बार प्रोडक्ट बेच देने के बाद इन कालसेंटर वालों का आपसे कोई मतलब नहीं रह जाता है क्योंकि वे आउटसोर्स किए गए कंपनी के कर्मचारी होते हैं। आगे की सेवाओं से उनका कोई मतलब नहीं होता।

विद्युत प्रकाश मौर्य