Monday, 20 August 2007

शादी-शुदा मर्द से प्यार

अभी हाल में हेमा मालिनी की बेटी ईशा दयोल ने यह बयान जारी किया कि उन्हें किसी शादी शुदा मर्द से प्यार करने में कोई आपत्ति नहीं है। अगर उनके जीवन में कोई ऐसा संबंध बनता है तो वे इसका स्वागत करेंगी। यह बयान उन्होंने अपनी नई फिल्म के रेफरेंस में दिया जिसकी कहानी में वे किसी शादी शुदा मर्द के प्यार में पड़ जाती हैं। ईशा ने कहा कि उनकी मां (हेमा मालिनी ) ने भी तो एक शादी शुदा मर्द से ही प्यार किया था इसलिए वे इसमें कोई बुराई नहीं देखतीं। फिल्म इंडस्ट्री में शादी शुदा मर्द से ईश्क लड़ाने और फिर शादी रचाने का चलन पुराना रहा है।

कई हीरोइनों को दूसरी पत्नी बनने में कोई आपत्ति नहीं होती। पर ये महिलाएं ये नहीं देखतीं कि इसके साथ वे कितने घर फूंकने चली हैं। हालांकि प्यार हो जाने में किसी एक पक्ष को जिम्मेवार नहीं ठहराया जा सकता है। इसमें दो पक्ष होते हैं...और ताली दोनों हाथों से ही बजती है। अभी हाल में बालीवुड की खूबसूरत अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी चर्चा में हैं। शिल्पा के कारण निर्देशक अनुभव सिन्हा का घर तबाह होने को है। उनकी पत्नी अनुभव से तलाक लेना चाहती हैं। कारण अनुभव का शिल्पा से ज्यादा मेलजोल है। ठीक इसी तरह का वाकया रघुबीर यादव के साथ हुआ। मुंगेरी लाल के हसीने सपने वाले रघुबीर यादव से मुंबई फिल्म इंडस्ट्री को असीम संभावनाएं थीं। रघुबीर का मुंबई आने से पहले से ही भरा पूरा परिवार था। पर फिल्म इंडस्ट्री में आने के बाद वे सांवली सलोनी नंदिता दास के प्यार में फंस गए। प्यार का परवान कुछ इस तरह चढ़ा की रघुबीर की पहली पत्नी और बच्चे उन्हे छोड़कर गांव चले गए। उसके थोड़े दिनों बाद नंदिता दास ने भी उन्हें छोड़ दिया। उसके बाद रघुबीर की हालत बीमारों जैसी हो गई। उनका फिल्मी कैरियर और परिवार दोनों ही तबाह हो गए। अब वे फिल्मों में बहुत कम ही नजर आते हैं। ठीक इसी तरह का वाकया बोनी कपूर के साथ हुआ। बोनी ने जब श्रीदेवी को दूसरी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया तो उनकी पहली पत्नी मोना कपूर को गहरा धक्का लगा।


मोना कपूर फिल्म इंडस्ट्री मजबूत महिला सत्ती सौरी की बेटी हैं। खैर सत्ती सौरी ने इस दुख की घड़ी में मोना कपूर को सहारा दिया और उन्हें टीवी धारावाहिकों के प्रोडक्शन में व्यस्त कर दिया। पर सत्ती सौरी को दूसरी पत्नी के रुप में किसी महिला को आकर किसी का घर तबाह करने पर बड़ा दुख हुआ। दुखी सत्ती सौरी ने एक फिल्म के सेट पर हेमा मालिनी को काफी भला बुरा कहा। बकौल सत्ती सौरी हेमा मालिनी ने ही फिल्म इंडस्ट्री में दूसरी महिला के ट्रेंड की शुरूआत की। हालांकि फिल्म इंडस्ट्री में दक्षिण भारतीय निर्माताओं में भी दूसरी पत्नी रखने का रिवाज बहुत पुराना है। 

गाहे बगाहे कई फिल्मकार इसलिए अपनी कहानी में भी दो पत्नियों के बीच झूलते पति का चित्रांकन करते हैं। गोविंदा की साजन चले ससुराल इसी तरह की फिल्म थी। जब पुरानी अभिनेत्रियों ने इस मामले में इतना साहस दिखाया तो अगली पीढ़ी के इशा दयोल और शिल्पा शेट्टी को भला क्या आपत्ति हो सकती है। 

आज के दौर में तो रिश्तों में स्थायीत्व का भाव और भी कम होता जा रहा है। पुरूष मानसिकता हमेशा से दूसरी स्त्रियों में रुचि रखने की रही है पर महिलाओं में इस तरह का बढ़ता ट्रेंड खतरनाक हो सकता है। हमारा समाज कभी भी ऐसे पुरूष या ऐसी स्त्रियों को अच्छी नजर से नहीं देखता है।
-माधवी रंजना madhavi.ranjana@gmail.com



Tuesday, 14 August 2007

कौन देगा गरीबों को कर्ज

क्या आप जानते हैं कि अभी बहुत से ऐसे रोजगार हैं जो 100 से 1000 रुपए की जमा पूंजी से आरंभ किए जाते हैं। भारत जैसे विकासशील देश में बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जो इतनी छोटी सी पूंजी से रोजगार कर अपना जीवन यापन करते हैं। गली में घूमघूम कर सब्जी बेचने वाले, अंडे बेचने वाले, फल बेचने वाले, छोले कुलचे बेचने वाले। इन सबका कारोबार थोड़ी सी पूंजी में ही चलता है।


साइकिल पर चलती है दुकानः कई ऐसे बिजनेस हैं जो एक साइकिल पर ही चलते हैं। जैसे दूध बेचने वाले, गली मे घूम-घूम कर सामान ठीक करने वाले, आइसक्रीम बेचने वाले आदि। कई ऐसे कारोबार ठेल पर या तिपहिया वाहन पर चलते हैं। इसमें थोड़ी सी पूंजी की आवश्यकता होती है। पर यह छोटी सी पूंजी भी उन्हें कर्ज में लेनी पड़ती है। पर उन्हें नहीं पता होता है कि यह छोटा सा कर्ज भी वह कहां से लें। कोई भी बैंक इतनी छोटी सी राशि कर्ज में नहीं देता। फिर बैंक से कर्ज लेने के लिए एक लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। सबसे बड़ी बात की साधनहीन लोगों को पास गिरवी रखने के लिए भी कुछ नहीं होता जिससे कि वे बैंक से कर्ज ले सकें।
साहूकारों का द्वारा शोषण - देश के कोने कोने में छोटी पूंजी कर्ज लेकर रोजगार करने वाले लोग साहूकारो के शोषण के शिकार हैं। साहूकार इन्हें जहां मोटी ब्याज दरों पर ऋण देते वहीं वसूली में दिक्कत आने पर उन्हें गुंडों से पिटवाते भी हैं। ऐसे लोगों के लिए बैंक जाकर कर्ज लेना मुश्किल है। साहूकर निजी जानपहचान पर बिना गारंटी के कर्ज दे देता है। पर बैंक को हर कर्ज के लिए जमानतदार चाहिए होता है।

ग्रामीण बैंकों की अवधारणा फेल - छोटे कर्ज देने के लिए इंदिरा गांधी द्वारा शुरू किए गए ग्रामीण बैंकों की अवधारणा अब बदल चुकी है। अब वे सभी व्यवसायिक बैंको की तरह ही बड़े कर्ज देने लगे हैं। लिहाजा अब वहां साधनहीन और थोड़ी सी पूंजी लेकर रोजगार करने वालों के लिए गुंजाइश कम ही बची हुई है। अब ग्रामीण बैंको मर्ज कर व्यवसायिक बैंकों की तरह ही बनाया जा रहा है।

स्वसहायता समूह की अवधारणा - कम पूंजी से रोजगार करने वाले छोटे लोगों को सहायता पहुंचाने के लिए ही स्व सहायता समूह की अवधारणा शुरू की गई है। स्व सहायता समूह (सेल्फ हेल्प ग्रूप की अवधारण के जनक बांग्लादेश के अर्थशास्त्री मोहम्मद युनूस हैं। उन्होंने रोज सुबह मार्निंग वाक के दौरान एक बूढ़ी महिला को देखा जो साहूकार से कर्ज लेकर अंडे बेचती थी। साहूकार उसे छोटी सी राशि कर्ज में देने के एवज बहुत ज्यादा ब्याज लेता था। ऐसे लोगों को मदद करने के लिए स्वसहायता समूह का जन्म हुआ। इसमें एक तरह का कारोबार करने वाले 10 या उससे ज्यादा लोग एक समूह बनाते हैं। वे रोज अपनी कमाई में से कुछ राशि कामन पुल में डालते हैं। यह राशि मिल कर बड़ी हो जाती है। इससे राशि से समूह के सदस्यों को किसी भी तरह की जरूरत पड़ने पर कर्ज दिया जाता है साथ ही ऐसे समूहों को बैंक रजिस्टर करते हैं। इन समूहों को बैंक भी अपनी ओर से कर्ज देते हैं। देश के कई हिस्सों में इस तरह के समूह लोकप्रिय हो रहे हैं।

माइक्रोफाइनेंस की अवधारणा- ऐसे साधनहीन लोग जिन्हें कोई बैंक कर्ज नहीं देता उन्हें कर्ज देने के लिए माइक्रोफाइनेंस की अवधारण का जन्म हुआ है। इस तरह का कर्ज आमतौर पर बिना किसी गारंटी के दिया जाता है। कर्ज की राशि 500 रुपए से लेकर 2000 के बीच हो सकती है। पात्र का चयन करके उसे तुरंत ही कर्ज मुहैय्या करा दिया जाता है।
-विद्युत प्रकाश vidyutp@gmail.com