Saturday, 28 June 2008

जीरो बैलेंस एकाउंट

अभी तक जीरो बैलेंस एकाउंट सिर्फ वेतन भोगी लोगों को ही खोलने की सुविधा मिल पाती थी। पर अब कई बैंक समान्य लोगों के लिए भी जीरो बैलेंस एकाउंट लेकर आ गए हैं। यूनियन बैंक आफ इंडिया ने कई शहरों में कैंप लगाकर आम आदमी का जीरो बैलेंस एकाउंट खोलना शुरू किया है, तो हाल में भारत में कदम रखने वाले ब्रिटेन के बड़े बैंक बार्कलेज ने भी लोगों का जीरो बैलेंस एकाउंट खोलना शुरु किया है।
क्या है जीरो बैलेंस खाता
जीरो बैलेंस एकाउंट का मतलब है कि आपको अपने बचत खाते में कोई न्यूनतम रकम रखने की आवश्यकता नहीं है। आप चाहें तो अपने खाते का पूरा पैसा भी किसी समय निकाल सकते हैं। आमतौर पर सरकारी बैंक चेक बुक और एटीएम की सुविधा वाले खाते में एक हजार रुपये मासिक बैलेंस हमेशा मेनटेन करने को कहते हैं। शहरी क्षेत्र में न्यूनतम एक हजार तो देहाती क्षेत्र के लिए यह राशि पांच सौ रुपये है। अगर आप न्यूनतम बैलेंस नहीं मेनटेन करते हैं तो आपके खाते पर पेनाल्टी लगाया जाता है। जैसे एसबीआई ( स्टेट बैंक आफ इंडिया) ऐसे खातों से 65 रुपये की कटौती करता है।

नए ग्राहकों को लुभाने के लिए
अब बैंक नए खातेदारों को लुभाने के लिए जीरो बैलेंस की सुविधा दे रहे हैं। जाहिर है इसके लिए एक हजार रुपये का न्यूनतम बैलेंस खाते में हमेशा रखना जरूरी नहीं है। इससे समाज के नीचले तबके के लोग भी बैंकिंग की सुविधा का पूरा लाभ उठा सकते हैं। कुछ सरकारी बैंको ने चयनित शिक्षण संस्थानों के छात्रों को भी जीरो बैलेंस एकाउंट की सुविधा दे रखी है। ऐसी सुविधा देने का उद्देश्य बैंक से आने वाली पीढ़ी को जोड़ना है। अच्छे संस्थानों में पढ़ने वाले छात्र बाद में आर्थिक रुप से सक्षम होने पर बैंक के लिए अच्छे ग्राहक हो सकते हैं। जैसे पंजाब नेशनल बैंक ने कई संस्थानों में छात्रों के लिए प्रोमोशनल जीरो बैलेंस खाते की सुविधा दे रखी है।
निजी बैंकों की नीति

अगर निजी बैंकों की बात की जाए तो अधिकांश बैंक अपने यहां खाता चलाने वालों के लिए 10 से 15 हजार रुपये का औसत तिमाही बैलेंस मेनटेन करने की शर्त रखते हैं। ऐसे खाते में आप चाहें तो बीच में कभी भी जीरो बैलेंस रख सकते हैं। पर यह ध्यान रखना जरूरी होता है कि तीन महीने का औसत बैलेंस बैंक द्वारा निर्धारित राशि के बराबर जरूर है। ऐसा नहीं होने पर निजी क्षेत्र के बैंक पेनाल्टी के तौर पर बड़ी राशि की कटौती करते हैं। लेकिन निजी क्षेत्र के बैंक विभिन्न संस्थानों में कार्यरत वेतन भोगी लोगों के लिए जिनका सेलरी एकाउंट उनके बैंक में है उनके लिए जीरो बैलेंस की सुविधा प्रदान करते हैं। पर अब निजी बैंक भी आम लोगों के लिए जीरो बैलेंस एकाउंट लेकर आए हैं। जैसे ब्रिटेन के सबसे बड़े बैंकों में एक बार्कलेज ने भारत में अपने ग्राहकों के लिए जीरो बैलेंस खाता पेश किया है। पर बैंक ऐसे खाते पर 750 रुपये सालाना सेवा शुल्क के रुप में वसूलेगा। हालांकि बैंक इसके एवज में फ्री में ड्राफ्ट बनवाने और घर बैठे पैसा जमा करवाने जैसी कई सुविधाएं अपने ग्राहकों को प्रदान कर रहा है। बैंक ने अपने खाता धारकों के लिए किसी भी बैंक का एटीएम फ्री में इस्तेमाल करने की सुविधा भी प्रदान की है। उम्मीद है कि धीरे-धीरे बाकी बैंक भी अपने ग्राहकों को लुभाने के लिए जीरो बैलेंस एकाउंट की सुविधा दे सकते हैं।
-विद्युत प्रकाश मौर्य
Email --- vidyutp@gmail.com

Thursday, 19 June 2008

भोजपुरी फिल्मों के गीतकार उमाकांत वर्मा

डा. उमाकांत वर्मा हमारे हाजीपुर शहर में रहते थे। या यूं कहें कि मैं उनके मुहल्ले में रहता था। वे हाजीपुर के राजनारायण कालेज में हिंदी के प्राध्यापक थे। मूल रुप से सारण ( छपरा) जिले के रहने वाले थे। भोजपुरी उनके रग रग में रची बसी थी। हालांकि वे हिंदी के गंभीर साहित्यकार थे पर उन्होंने कई लोकप्रिय भोजपुरी फिल्मों के गाने लिखे। उन्हीं में से एक फिल्म थी बाजे शहनाई हमार अंगना। इस फिल्म के कई गीत डा.उमाकांत वर्मा जी ने लिखे थे। उनमें से एक लोकप्रिय गीत था- चना गेहूं के खेतवा तनी कुसुमी बोअइह हो बारी सजन ( आरती मुखर्जी और सुरेश वाडेकर के स्वर में) इसी फिल्म में अंगिया उठेला थोड़े थोड़...भिजेंला अंगिया हमार हाय गरमी से जैसे गीत भी उन्होंने लिखे। इस फिल्म का म्यूजिक एचएमवी ( अब सारेगामा) ने जारी किया था। एक और भोजपुरी फिल्म घर मंदिर के गाने भी उन्होंने लिखे। बाद में उन्होंने कुछ लोकप्रिय गीत भी निर्माताओं की मांग पर लिखे। जिनमें पिया की प्यारी फिल्म का गीत - आईल तूफान मेल गड़िया हो साढ़े तीन बजे रतिया भी शामिल था।
डा. उमाकांत वर्मा के लिखे गीतों को महेंद्र कपूर, आशा भोंसले और दिलराज कौर जैसे लोगों ने स्वर दिया। भोजपुरी फिल्मों में गीत लिखने के क्रम में वे बिहार के छोटे से शहर हाजीपुर से मुंबई जाया करते थे। इस दौरान आशा भोंसले समेत मुंबई फिल्म इंडस्ट्री के कई महान हस्तियों ने उन्हें मुंबई में ही बस जाने को कहा। मुंबई में बसकर स्थायी तौर पर फिल्मों में गीत लिखने के लिए। पर उन्होंने अपना शहर हाजीपुर कभी नहीं छोड़ा। कालेज से अवकाश लेने के बाद भी। एक निजी मुलाकात में उमाकांत वर्मा ने जी बताया था कि पांच बेटियों की जिम्मेवारी थी इसलिए मुंबई को स्थायी तौर पर निवास नहीं बना सका। उन्होंने कई और भोजपुरी फिल्मों के लिए गीत लिखे जो फिल्में बन नहीं सकीं।
कई भोजपुरी फिल्मों के निर्माण के गवाह रहे डा. उमाकांत वर्मा जी। वे भोजपुरी फिल्मों ऐसे गीतकारों में से थे जो साहित्य की दुनिया से आए थे। इसलिए उनके लिखे भोजपुरी फिल्मों के गीतों में भी साहित्यिक गहराई साफ नजर आती थी। एक बार राजनेता यशवंत सिन्हा जो भोजपुरी गीतों के शौकीन हैं को कोई अपनी पसं का भोजपुरी गीत गुनगुनाने का आग्रह किया गया तो उन्होंने वही गीत सुनाया- चना गेहूं के खेतवा...तनी कुसुमी बोइह ए बारी सजन.....डा. उमाकांत वर्मा जब वे साहित्य की चर्चा करते थे तो जैनेंद्र कुमार की कहानियों के पात्रों की मनःस्थियों की चर्चा करते थे, अज्ञेय की बातें करते थे। उनके निजी संग्रह में देश के कई बड़े साहित्यकारों की खतो किताबत देखी जा सकती थी। डा. उमाकांत वर्मा ने जीवन में बहुत उतार चढ़ाव देखे, निराशाएं देखीं, पर वे हर मिलने वाले व्यक्ति को बहुत उत्साहित करते थे। यह परंपरा वे जब तक जीवित रहे चलती रही। नए पत्रकार हों या नए साहित्यकार या फिर सामाजिक कार्यकर्ता सभी उनके पास पहुंचकर प्रेरणा लेते थे। विचार चर्चा के लिए वे सदैव उपलब्ध रहते थे। एक साक्षात्कार के दौरान उन्होंने एक लाइन सुनाई थी- सुख संग दुख चले काहे हारे मनवा.......
कभी किसी नवसिखुआ पत्रकार या साहित्यकार को उन्होंने निराश नहीं किया। उनके सभी बच्चों ने ( जो अब बहुत बड़े हो चुके हैं) जिस क्षेत्र में जैसा कैरियर बनाना चाहा उन्हें पूरी छूट दी। डा. उमाकांत वर्मा के एक ही बेटे हैं जो मुंबई फिल्म इंडस्ट्री के जाने पहचाने पत्रकार और भोजपुरी फिल्मों और टीवी धारावाहिकों के पटकथा लेखक हैं। उनका नाम है आलोक रंजन। आजकल वे मुंबई में रहते हैं।
-विद्युत प्रकाश मौर्य

(UMAKANT VERMA, BHOJPURI FILMS, ) 

Tuesday, 3 June 2008

कहीं कहीं से हर चेहरा...


कहीं कहीं से हर चेहरा तुम जैसा लगता है ।
तुमको भूल न पाएंगे हम ऐसा लगता है।



ऐसा भी इक रंग है जो करता है बातें भी
जो भी उसको पहन ले अपना सा लगता है।



तुम क्या बिछड़े हम भूल गए हम अदाबे मुहब्बत,
जो भी मिलता है कुछ देर ही अपना लगता है।


अब भी हमसे मिलते हैं फूल यूं चमेली के ,
जैसे इनसे अपना सा कोई रिश्ता लगता है।


और तो सब ठीक है लेकिन कभी कभी यू हीं
चलता फिरता शहर अचानक तन्हा लगता है।
-निदा फाजली