Thursday, 3 July 2008

पोस्टकार्ड की ताकत

कई दोस्त यह लिख रहे हैं कि यह फोन, फैक्स, ईमेल और वीडियो कान्फ्रेंसिंग का जमाना है। अब लोगों को चिट्ठियां लिखना छोड़ दिया है। लिखते भी हैं तो कूरियर करते हैं। पर मुझे लगता है कि अभी पोस्टकार्ड की ताकत कायम है। भले ही ईमेल तेजी के लोकप्रिय हो रहा हो, पर क्या अभी ईमेल देश की एक बड़ी आबादी तक पहुंच गया है। अगर देश में 65 फीसदी लोग साक्षर हो गए हैं तो इमेल कितने लोगों तक पहुंच गया है। जाहिर अभी आमलोगों में ईमेल इतना लोकप्रिय नहीं हुआ है। कई जगह एक्सेसेब्लिटी नहीं है। पर इतना जरूर है कि अब बायोडाटा भेजने और कई तरह की अन्य जरूरी जानकारियां भेजने के लिए लोग ईमेल का इस्तेमाल कर रहे हैं। पर ईमेल के इस दौर में भी पोस्टकार्ड की मह्ता अभी भी कायम है। देश के 70 फीसदी आबादी गांवों रहती है, उनके पास संदेश भेजने के लिए पोस्टकार्ड ही जरिया है। ये जरूर है कि काफी गांवों में अब लोगों के पास मोबाइल फोन हो गए हैं। ऐसी सूरत में अब फोन करके और एसएमएस करके काम चल जाता है। पर फोन और एसएमएस के बाद भी चिट्ठियां लिखने का महत्व कम नहीं हुआ है। हां, यह जरूर है कि फोन और एसएमएस ने पोस्ट आफिस के टेलीग्राम सिस्टम को बीते जमाने की चीज बना दिया है।
पर जब आप किसी को पोस्ट कार्ड लिखते हैं तो आपकी हस्तलिपी में जे लेख्य प्रभाव होता है वह फोन फैक्स या एसएमएस में गौण हो जाता है। हस्तलिपी के साथ व्यक्ति का व्यक्तित्व भी जाता है। तमाम लोगों ने अपने रिस्तेदारों और नातेदारों की चिट्ठियां अपने पास संभाल कर रखी होती हैं। कई लोगों के पास जाने माने साहित्यकारों और समाजसेवियों के पत्र हैं। ये पत्र कई बार इतिहास बन जाते हैं। मैं महान गांधीवादी और समाजसेवी एसएन सुब्बाराव के संग एक दशक से ज्यादा समय से जुड़ा हूं। उनके हाथ से लिखे कई पोस्टकार्ड मेरे पास हैं। समाजसेवी और पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा का पत्र मेरे पास है। हिंदी प्रचारक संस्थान के निदेशक कृष्णचंद्र बेरी सबको नियमित पत्र लिखा करते थे। मैंने पूर्व सांसद और साहित्यकार बालकवि बैरागी को देखा है कि वे खूब पत्र लिखते हैं। हर पत्र का जवाब देते हैं। इसी तरह सासंद और साहित्यकार डा. शंकर दयाल सिंह भी हर पत्र का जवाब दिया करते थे। कई पुराने चिट्ठी लिखाड़ अब ईमेल का इस्तेमाल करने लगे हैं। पर उन्होंने पत्र लिखना नहीं छोड़ा है। मैंने मनोहर श्याम जोशी का एक लेख पढ़ कर उन्हें पत्र लिखा तो उनका जवाब आया।
कहने का लब्बोलुआब यह है कि हमें पत्र लिखने की आदत को बीते जमाने की बात नहीं मान लेना चाहिए। जो लोग अच्छे ईमेल यूजर हो गए हैं, उन्हें भी पत्र लिखना जारी रखना चाहिए। क्या पता आपके लिखे कुछ पत्र आगे इतिहास का हिस्सा बन जाएं। आप यकीन मानिए कि ईमेल और एसएमएस के दौर में भी पोस्टकार्ड ने अपनी ताकत खोई नहीं है। 50 या फिर 25 पैसे में आप पोस्टकार्ड से वहां भी संदेश भेज सकते हैं जहां अभी ईमेल या एसएमएस की पहुंच नहीं है। भारतीय डाकविभाग द्वारा जारी मेघदूत पोस्टकार्ड तो 25 पैसे में ही उपलब्ध है।
-विद्युत प्रकाश मौर्य
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3 comments:

प्रभाकर पाण्डेय said...

क्या पता आपके लिखे कुछ पत्र आगे इतिहास का हिस्सा बन जाएं।

सटीक एवं यथार्थ लेखन।

दिनेशराय द्विवेदी said...

आभार, आप ने पोस्टकार्ड को याद किया।

Udan Tashtari said...

जमाना गुजरा. मगर आपने याद दिलाया तो कुछ किया जायेगा. आभार.