Saturday, 9 October 2010

लो फ्लोर बसों ने बदला सफर का अंदाज

याद किजिए दिल्ली की ब्लूलाइन बसों की भीड़ में बदबूदार सफर को...लेकिन डीटीसी की नई लो फ्लोर बसों ने सफर का मजा बदल दिया है। जितना आरामदायक सफर आप मारूति 800 मॉडल की कार में करते हैं कुछ उतना ही आरामदेह सफर है डीटीसी की नई लो फ्लोर बसों का। परंपरागत बसों की तुलना में ऊंचाई कम होने के कारण बच्चे बड़े और बुजुर्ग सबके लिए बसों में चढ़ पाना भी आसान हो गया है। जिन रूट पर लो फ्लोर बसें चलने लगीं हैं वहां लोगों को सफर पहले की तुलना में बहुत अरामदेह हो गया है। बसों के दरवाजे हमेशा बंद रहने के कारण गेट पर लटक कर सफर करने की भी कोई संभावना नहीं रह गई है। इससे कई तरह की दुर्घटनाओं भी निजात मिली है। दिल्ली की सड़कों पर दौड़ रही कुछ सौ बसों ने शहर का नजारा बदलने में मदद की है। अब दिल्ली सरकार 1600 से अधिक लो फ्लोर बसें और लाने जा रही है। इसके बाद दिल्ली वासियों को और आरामदेह सफर का मजा मिल सकेगा। कामनवेल्थ गेम्स से पहले दिल्ली को अंतराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप शहर बनाने की दिशा में ये प्रयास भर है। लेकिन जब दिल्ली की सड़कों से ब्लू लाइन बसें और डीटीसी की पुरानी खटारा बसें पूरी तरह अलविदा हो जाएंगी तब दिल्ली का नजारा बदल चुका है और दिल्ली का आम आदमी राहत का सफर कर सकेगा। लो फ्लोर बसों के आरामदेह सफर के बाद लोग अपनी कार या टैक्सी आटो रिक्सा से चलना छोड़कर बसों में सफर करना पसंद करेंगे। इससे दिल्ली की सड़कों पर ट्रैफिक का बोझ कम हो सकेगा। दिल्ली सड़कों पर वाहनों की बढ़ती अंधाधुंध भीड़ से निजात के लिए यह जरूरी है कि ज्यादा से ज्यादा लोग बसों में सफर करें। न सिर्फ आम आदमी बल्कि वीआईपी कहे जाने वाले और अमीर लोग भी बसों में सफर करें। इसके लिए बसों के सफर को और आरामदायक बनाना होगा। इसमें एसी बसों के परिचालन भी बढ़ाना होगा। डीटीसी ने लो फ्लोर वाले एसी बस भी सड़कों पर उतार दिए हैं। इन बसों की आवाजाही भी लोकप्रिय रूट पर ज्यादा से ज्यादा बढ़ानी चाहिए। इससे आटो रिक्सा में बैठकर जल्दी पहुंचने वाला लोग इन बसों का सहारा ले सकते हैं। एसी बसों में सफर करना आटो रिक्सा या टैक्सी में सफर करने से सस्ता है। मुंबई में जैसे शहरों के लिए एसी बसें कोई नई बात नहीं है पर दिल्ली में यह शुरूआत काफी देर से हुई है। साथ ही जो कम लोकप्रिय रूट हैं वहां मिनी बसें चलानी चाहिए। मेट्रो स्टेशनों से चलने वाली फीडर बसें जो छोटे आकार की हैं उनका जाल भी ज्यादा रूट पर बढ़ाना जरूरी है।

बसों का सफर आरामदेह होने से यह भी उम्मीद की जा सकती है कि दिल्ली के वातावरण में प्रदूषण की मात्रा भी कम होती जाएगी। क्योंकि सीएनजी से चलने वाली लो फ्लोर बसों संख्या बढ़ने से सड़कों पर डीजल पेट्रोल चलित निजी वाहनों का शोर थमता नजर आएगा। अगर हम चाहते हैं कि नई पीढ़ी के लिए राष्ट्रीय राजधानी रहने लायक सांस लेने लायक शहर हो तो हमें प्रदूषण करने की हर कवायद के साथ खड़ा होना पड़ेगा।
-विद्युत प्रकाश मौर्य, ई मेल vidyutp@gmail.com

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