Tuesday, 28 December 2010

पुराने दोस्तो से एक मुलाकात

कई साल पुराने कई दोस्त एक साथ मिल जाएं तो अनुभव कितना सुखद हो सकता है, इसे सिर्फ महसूस ही किया जा सकता है। दिल्ली की एक सर्द भरी शाम में ऐसे ही कुछ पुराने दोस्तों से मुलाकात हो गई। मौका था 25 दिसंबर को मालवीय जयंती का। वैसे तो मालवीय जयंती हर साल मनाई जाती है। लेकिन दीन दयाल उपाध्याय मार्ग पर नव निर्मित मालवीय स्मृति भवन में इस बार मेरे बैच के कई दोस्तों ने तय किया कि हमलोग आयोजन में पहुंचने की कोशिश करेंगे। तो 1993 बैच के स्नातक और 1995 बैच के एमए के कई साथ मिल गए इस मौके पर। संजीव गुप्ता, राजेश गुप्ता बंधु तो कई सालों से दिल्ली में हैं।  अमिताभ चतुर्वेदी, गाजियाबाद, शक्तिशरण सिंह, उत्तम कुमार, ज्ञान प्रकाश, अमित कौशिक का एक साथ मिल जाना महज संयोग ही था। बीएचयू एलुमिनी एशोसिएशन में सक्रिय रोहित सिन्हा जो दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट में वकालत करते हैं हमारे समकालीन ही हैं। आदर्श सिंह, ( जनसत्ता में कार्यरत ) और हरिकेश बहादुर (दूरदर्शन ) और चंदन कुमार पहुंच नहीं सके। लेकिन सबसे सुखद रहा अलख निरंजन से मिलना। मनोविज्ञान के साथी अलख इन दिनों अरूणाचल प्रदेश में एक आवासीय विद्यालय चला रहे हैं। वे अपनी पत्नी और नन्ही सी बिटिया के साथ थे। दक्षिण भारत दौरे से लौटे अलख अपने दोस्तों से मुलाकात के लिए ही दिल्ली में रूक गए थे। इस बार के हुए कार्यक्रम में लोक गायिका मालिनी अवस्थी ने सुरों की धार बहाई।
अब थोड़ी सी बात मालिनी के गीतों की कर लें तो मालिनी जी की स्टेज परफारमेंस बड़ा ही रोचक, मनभावन और नाट्य प्रस्तुति लिए होता है। उन्हें टीवी पर सुनना और लाइव सुनना दोनो ही अलग अलग अनुभूति है। गिराजा देवी की शिष्या मालिनी अपने ट्रूप के साथ आई थीं। ईश वंदना के बाद उन्होने सोहर पेश किया। इस मौके पर सोहर का इतिहास और उसकी बारिकियां भी बताती गईं। उनकी दूसरी प्रस्तुति मां शारदे का गीत था। और फूट पड़ी बनारस की कजरी...मिर्जापुर कइल गुलजार कचौड़ी गली सुन कईल बलमू....इस कजरी की रचयिता गौहर जान की कहानी भी मालिनी जी ने साथ साथ सुनाई....
और पुराना लोकगीत...बन्ना बुलाए बन्नी नहीं आए...अटरिया सुनी पड़ी...( दूर कोई गाए धुन ये सुनाए....तेरे बिन छलिया रे...ये फिल्मी गीत इसी धुन पर है)  इसके बाद रेलिया बैरन पिया को लिए जाए रे.....तो सुरों की गंगा बहती रही घंटो...इसके साथ ही मालवीय स्मृति भवन में सभी पूर्व छात्रों के लिए भोजन का भी उम्दा प्रबंध था। सबसे पुराने एलुमनी डा. पीएल जायसवाल, एल एंड टी में कार्यरत आईटी बीएचयू के एलुमनी शक्तिधर सुमन की मेहनत आयोजन मे साथ झलक रही थी....
विद्युत प्रकाश ( MA BHU, 1995)

Friday, 17 December 2010

नए जमाने का ड्रेस कोड

जब कभी आप दिल्ली की मेट्रो में चलें या फिर दिल्ली विश्वविद्यालय सड़कों पर तब आप बखूबी महसूस कर सकते हैं कि नए जमाने का ड्रेस कोड क्या है। जी हां, नए जमाने का ड्रेस कोड है शार्ट्स और टी शर्ट। या इसे आम बोलचाल की भाषा में कहें तो नेकर और बनियान है। अगर आप बाबा आदम की फिल्में देखें तो लड़कियां साड़ी पहन कर कालेज जाती दिखाई देती थीं तो लड़के धोती...उसके बाद का दौर आया सलवार सूट का..जमाना बदला बेलबाटम आया..उसके जींस...फिर कालेजों में दिखाई देने लगा...स्कर्ट-टॉप। लेकिन अब जमाना और आगे निकल चुका है। अब बारी है शार्टस और बनियान की। अगर हम किसी फिल्म में कॉलेज का दृश्य देखते हैं तो ये लगता है कि वे अंग प्रदर्शन करते हुए कपड़े फिल्म को ग्लैमरस बनाने के लिए दिखाते हैं। लेकिन फिल्म बनाने वाले अगर आकर दिल्ली यूनीवर्सिटी का कैंपस या मेट्रो ट्रेन देखें तो उन्हें लगेगा कि इस नए जमाने के ड्रेस कोड से उन्हें ही कुछ सीखने की जरूरत है।
मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि अब कालेज में पढने वाली बालाओं ने गांधीवाद से प्रेरणा ली है। गांधी जी भी कम कपडे पहनते थे। वे एक धोती को ही लपेट लेते थे। अब एक मिनी स्कर्ट या शार्ट और बनियान भी उतने ही कपड़े में तैयार हो जाता है। यानी गांधी जी से प्रेरणा लेकर कपड़े की बचत...ये अलग बात है कि गांधी जी की ये सीख देर से पल्ले पड़ी। चलो कुछ तो अच्छी चीज सीखी। इन कपड़ों के कई फायदे हैं। ये इको फ्रेंडली हैं। कपड़ों की बचत होती है...तो पेड़ पौधे कम काटे जाएंगे। तो हुई न पर्यावरण की रक्षा। शऱीर को भी ज्यादा भारी भरकम कपड़ों को ढोना नहीं पड़ता है। इसके साथ ही दूसरा बडा फायदा है कि कम कपड़ों में शरीर की सुंदरता बेहतर ढंग से उभर कर आती है। अब कोई देखता है तो देखता रहे....वैसे भी हर सुंदर चीज तो देखने दिखाने के ले ही होती है। भला छुपने छुपाने की क्या बात है। जाने माने प्रकृतिक चिकित्सक एडोल्फ जस्ट ने कहा था कि आदमी को ज्यादा से ज्यादा समय प्राकृतिक अवस्था में रहना चाहिए। जैसे जंगल में ऋषि मुनि और उनके आश्रम में शिक्षा ग्रहण करने वाले लोग कम कपड़ों में रहा करते थे।नई उम्र को नवजवानों ने भी इसी कथन से प्रेरणा ली है। इसलिए अब कपडों का आकार भी छोटा होता जा रहा है। नए जमाने के फैशन डिजाइनर भी कम कपड़ो वाले ही डिजाइन तैयार कर रहे हैं। अब फैशन डिजाइनर भी गांधी से प्रेरणा लेकर कम कपड़ों में अच्छे ड्रेस डिजाइन करना सीख गए हैं।

अब कॉलेज जाने वाले नई उम्र के लोग क्या करें पूरी तरह से प्राकृतिक अवस्था में रह नहीं सकते ना...इसलिए कपड़ों का आकार और छोटा करते जा रहे हैं। लेकिन जीवन की ये रीत भी प्राकृति के करीब है। कई लोगों को ट्रेन बस में घूरने की आदत होती है। लेकिन अब कम कपड़ों में फुदकती इन परियों को घूरने वालों से कोई परेशानी नहीं होती....आखिर कोई कब तक घूरेगा...अंत में घूरने वाले को शर्म आ जाएगी। वैसे आपकी नजर फिसलती है तो फिसले मेरी बला से...क्या फर्क पड़ता है। कहां कहां नजर घूमाओगे..जिधर नजर उठाइए बहार ही बहार है।

विद्युत प्रकाश मौर्य