Monday, 3 January 2011

यादें अतुल जी की...

मैं अपने जालंधर के दिन याद करता हूं तो अतुल माहेश्वरी याद आते हैं। नवंबर 1999 में हमने अमर उजाला में योगदान किया था। अमर उजाला के पंजाब संस्करण की लांचिंग के दौरान अतुल माहेश्वरी जी संपादकीय विभाग के लोगों के साथ कई बैठकें लीं। इस दौरान उनकी दूर दृष्टि पत्रकारीय कौशल और एक सह्रजय मालिक का रूप देखने को मिला। ये सहज भरोसा करना मुश्किल है कि 55 साल की उम्र में एक बड़ा संपादक और बड़े समाचार पत्र समूह का मालिक इस दुनिया को अलविदा कह गया। कहा जाता है कि हिंदी पट्टी के पत्रकारों को अच्छा वेतन, कार्य स्थल पर सम्मान देने की परंपरा अतुल माहेश्वरी ने शुरू की, जिसके लिए हजारों पत्रकार जिन्होंने अमर उजाला के अलग अलग संस्करणों में कार्य किया, हमेशा ऋणी रहेंगे। न सिर्फ एक अखबार के मालिक बल्कि अतुल माहेश्वरी की खबरों की समझ भी काफी अच्छी थी। वे अपने अखबार के सभी पन्नों की हर छोटी बड़ी खबर देख लिया करते थे। मीटिंग, सभा समारोह में स्टाफ के साथ ऐसे घुले मिले होते थे जिसमें मालिक नौकर जैसा कोई भेदभाव नहीं दिखाई देता था। जूनियर स्टाफ भी अपनी समस्याओं को लेकर उनसे बड़ी आसानी से मिल सकता था। वे लोगों की समस्याएं सुनते थे और हर संभव मदद और निदान भी करते थे। सैकड़ों पत्रकारों के पास उनकी सह्रदयता के हजारों किस्से हो सकते हैं। मुझे अमर उजाला की दो बैठकें याद आती हैं जब उन्होंने अखबार की बेहतरी के लिए सबको खुलकर सुझाव देने को कहा। सबके सुझावों को उन्होंने गंभीरता से सुना। अमर उजाला में एक जूनियर पत्रकार भी पूरा सम्मान पाता है। समाचार पत्र समूह ये सुंदर परंपरा अतुल माहेश्वरी जैसे मालिकों की बदौलत ही आ सकी है। ( फोटो- सौजन्य- हिमाचल आनलाइन- ब्लॉग )

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