Wednesday, 16 February 2011

गंडक घाटी वाले चौहान चाचा की याद

मई 2010 की एक मनहूस सुबह थी वो जब तेज प्रताप चौहान इस दुनिया में नहीं रहे। तेज प्रताप चौहान हाजीपुर के ऐसे पत्रकारों में थे जो पत्रकारिता के जीता जागता इतिहास थे। सिर्फ मैंने और मेरे छोटे भाई बहनों ने ही नहीं बल्कि हाजीपुर से जुड़े तमाम पत्रकारों ने चौहान जी से पत्रकारिता का ककहरा सीखा था। मैं भारतीय जन संचार संस्थान में जाने से पहले या फिर जब सक्रिय पत्रकारिता शुरू करने के बाद भी जब कभी हाजीपुर में होता चौहान जी से मार्गदर्शन लेता था। चौहान जी ने आजादी से पहले से पत्रकारिता शुरू की थी। देश आजाद होने के बाद 50 सालों का बनता बिगड़ता बिहार देखा था। कभी ललित नारायण मिश्र जैसे राजनेता के करीब थे तो रामविलास पासवान जैसे नेता उनका सम्मान करते थे. लेकिन चौहान जी वैसे पत्रकार थे जो जीवन में कभी पैसे के पीछे नहीं भागे। 

इतिहास में उनकी गहरी रूचि थी। वैशाली जिले के बलवा कोआरी गांव के रहने वाले थे। हर साल अप्रैल महीने में वीर कुअंर सिंह जयंती पर बड़ा आयोजन करते थे। जब मैं वाराणसी में बीएचयू में पढ रहा था तब उन्होंने मुझसे चंद्रशेखर मिश्र रचित वीर कुअंर सिंह महाकाव्य जो भोजपुरी में है उसकी एक प्रति मंगाई थी।

चौहान जी के बारे में कहा जाता है कि महापंडित राहुल सांकृत्यान के साथ भी उन्होंने थोड़े वक्त काम किया था। 80 साल से ज्यादा के उम्र में हाजीपुर शहर में अकेले रहते थे। तमाम नए पत्रकारों लेखकों और रंगकर्मियों का उत्साहवर्धन करते रहते। उनकी एकेडमिक शिक्षा भले ही ज्यादा न रही हो लेकिन इतिहास के प्रकांड विद्वान थे। वे गंडक घाटी सभ्यता शोध उन्नयन परियोजना नामक संस्था चलाते थे। सभी नए लोगों  को इतिहास को सहेजने और याद रखने की प्रेरणा देते थे। वैशाली जिले ने एक माटी बड़ा सपूत खो दिया है। मुझे दुख है कि नई पीढ़ी के मेरे जैसे पत्रकार उनसे उतना नहीं सीख गुन सके जीतना उनसे पाना चाहिए था।
- विद्युत प्रकाश मौर्य

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