Thursday, 8 September 2011

क्यों अन्ना पर मेहरबान हुआ मीडिया


भला अन्ना पर क्यों इतना मेहरबान रहा मीडिया। जब अन्ना ने 16 अगस्त से रामलीला मैदान में भ्रष्टाचार को लेकर जन लोकपाल बिल बनाने की मांग लेकर अनशन का ऐलान किया तो सारा मीडिया उनके साथ था। रामलीला मैदान के बाहर सभी टीवी चैनलों के ओबी वैन तैनात हो गईं और शुरू हो गया 24 घंटे लाइव करवरेज का खेल। तकरीब 25 से ज्यादा चैनलों के ओबी वैन रामलीला मैदान के बाहर तैनात थे जो लगातार अपने दफ्तर को लाइव फीड भेज रहे थे। इस 12 दिन के अनशन के दौरान अधिकतर राष्ट्रीय चैनलों ने कोई भी दूसरी बड़ी खबर नहीं दिखाई चाहे वह कितनी भी बड़ी खबर क्यों न हो। अन्ना का या अनशन खबरिया चैनलों के लिए एक सेलेब्रेशन की तरह था। एक ऐसा सेलेब्रेशन जैसा मौका बार बार नहीं आता है। क्या समाचार चैनल सामाजिक जिम्मेवारी निभाने के लिहाज से ये सब कुछ कर रहे थे। या ये सब कुछ आसानी से टीआरपी बटोरने के लिए था। अगर इतिहास में जाएं तो हम ये आसानी से समझ सकते हैं कि बहुत कम चैनल ही सामाजिक जिम्मेवारी को समझते हुए खबरें दिखाते हैं सबका लक्ष्य होता है किसी भी तरीके से टीआरपी में ऊंचाई हासिल करना इसके लिए कई बार वे साधन की पवित्रता का भी ख्याल नहीं रखते। अगर अन्ना से पहले किसी बड़ी खबर की बात करें जिसको सभी राष्ट्रीय चैनलों ने सबसे ज्यादा कवरेज दी थी तो वह था आरूशि तलवार हत्याकांड। नोएडा की इस हत्या कांड में सभी चैनलों ने हर एंगिल से जमकर खबरें दिखाई थीं। सवाल है कि क्या आरूशि तलवार कोई जबलपुर की लड़की होती तो भी सभी चैनल इतनी कवरेज करते। जाहिर है नहीं। क्योंकि नोएडा में अधितकर राष्ट्रीय समाचार चैनलों के दफ्तर हैं और नोएडा में रहकर कवरेज करना बहुत आसान होता है। ठीक इसी तरह राष्ट्रीय चैनल दिल्ली और मुंबई में होने वाली घटना को प्रमुखता देते हैं। खबरों के कवरेज में खर्च भी कम आता है और राष्ट्रीय चैनलें का दर्शक वर्ग भी इसी दिल्ली मुंबई में ज्यादा है।

अगर राष्ट्रीय चैनल अन्ना को बहुत सम्मान करते थे। क्या कभी दस सालों में किसी चैनल ने अन्ना की ओर से उनके गांव रालेगांव सिद्धि में कराए जा रहे है अच्छे काम पर कोई डाक्यूमेंटरी, कोई फीचर या कोई पैकेज चलाया था। क्या साक्षात्कारों के कार्यक्रम में किसी कभी अन्ना का आधाघंटा का साक्षात्कार दिखाया गया था। नहीं।
अन्ना ने इससे पहले अपने गांव में और मुंबई, पुणे में कई धरना प्रदर्शन आंदोलन किए थे लेकिन कभी उनके ये आंदोलन राष्ट्रीय समाचार चैलनें की सुर्खी नहीं बने थे। राष्ट्रीय स्तर पर अन्ना को सिर्फ वही लोग जानते थे जो देश दुनिया की हर छोटी बड़ी खबरों को पढ़ते हैं। क्योंकि समाचार चैनल देश भर में चल रहे अच्छे काम, विकास के काम, या सरकार के खिलाफ चलने वाले छोटे छोटे जन आंदोलन को कोई खबर नहीं बनाते। क्योंकि इसके बीच उनको कोई बिकाउ माल नहीं नजर आता। लेकिन जब अन्ना ने भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन करने के लिए दिल्ली आने का फैसला लिया तब वे टीवी चैलनों के लिए सेलेबल आइटम बन गए। उसके बाद स्टार न्यूज के किशोर आजवाणी अन्ना गांव पहुंचे। लोगों को अन्ना को अन्ना के अन्ना हजारे बनने की कहानी सुनाई। शायद पहली बार किसी राष्ट्रीय टीवी चैलन पर किसी गांव के विकास की कहानी सुनाई जा रही थी।
अन्ना के धरना स्थल से जिस तरह रिपोर्टिंग शुरू हुई सरकार भी परेशान हो गई। क्योंकि अन्ना के आंदोलन के हर पल की हर एंगिल से खबर मीडिया में आ रही थी। आंदोलन से जुड़े हर कार्यकर्ता की बाइटें लगातार चैनलों पर चल रही थीं लेकिन इन सबके बीच में सरकारी पक्ष के बयान प्रमुखता से नहीं आ रहे थे। जाहिर है इससे सरकार परेशान हो उठी। खबरें के प्रस्तुतिकरण में संतुलन गायब था। सभी चैनल अपने अपने पैनल बिठाकर अपनी अपनी ओर से फैसला देने में लगे थे। अन्ना के मीडिया मैनेजर भी शानदार थे। उनके मीडिया मैनेजरों में दो पत्रकार भी हैं जो दो बड़े राष्ट्रीय न्यूज चैनलों में लंबे समय तक काम कर चुके हैं वे जानते थे कि टीवी पर खबरें कैसे चलवानी है। जाहिर अन्ना का आंदोवन जो मान सकते हैं कि एक अच्छे कारण के लिए था उसको आम लोगों तक पहुंचाने में इलेक्ट्रानिक मीडिया की बड़ी भूमिका रही। बाद में प्रिंट मीडिया ने भी अन्ना की खबरों को प्रमुखता देनी शुरू की। लेकिन प्रिंट मीडिया में देश दुनिया की खबरें भी छप रही थीं लेकिन अन्ना के आंदोलन के दिनों टीवी पर खबरों के बुलेटिन भी अन्ना को समर्पित थे तो टीकर पर भी अन्ना अन्ना ही चल रहा था। टीवी के इस एक पक्षीय व्वयहार से सूचना प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी को बयान जारी करना पड़ा। अंबिका सोनी ने टीवी चैनलों के कवरेज के तरीके पर सवाल उठाए। भारत में मीडिया को आजादी है। लेकिन मीडिया इस आजादी का लाभ अपने तरीके से उठाता है। जाहिर है वह सरकार के गुड वर्क को बहुत कम ही दिखाता है। मीडिया पर लंबे समय से लिखने वाली शिवंती निनान कहती हैं कि टीवी चैनलों की भूमिका लोगों को सीखाने की होनी चाहिए लेकिन अन्ना के आंदोलन में टीवी चैनलों ने ऐसी भूमिका निभाई मानो में आंदोलन का हिस्सा बन गए हों। कुछ समाचार चैनलों ने अन्ना के आंदोलन के समर्थन मे एसएमएस अभियान शुरू कर दिया, फोन लाइने भी खोल दीं। इसमें अंग्रेजी चैनल और हिंदी के समाचार चैनल सभी एक ही राह पर चलते हुए दिखाई दीए। आंदोलनकारी तो आंदोलन कर रहे थे, सरकार के समाने चुनौती थी कोई बीच का रास्ता निकालने की लेकिन टीवी चैलन वाले इस आंदोलन में कोई समझौते का रास्ता निकालते हुए नजर नहीं आए। वे इस आंदोलन को बड़ा होता हुआ देखना चाहते थे जिससे उनके टीआरपी का ग्राफ बढ़ता रहे। टीआरपी आएगी तो प्राडक्ट  के विज्ञापन भी साथ आएंगे और इससे कमाई भी बढ़ेगी। मतलब मीडिया मना रहा था दीवाली से पहले दीवाली। इससे पहले अन्ना ने 5 अप्रैल से 11 अप्रैल तक जंतर मंतर पर धरना दिया था तब भी मिडिया ने लगातार इस आंदोलन की कवरेज की थी।
मीडिया की मानिटरिंग करने वाली इशा न्यूज सर्विस के मुताबिक अन्ना के आंदोलन का लगातार 655 घंटे कवरेज दिखाया गया। कुल 5657 समाचार अन्ना पर ही प्रसारित किए गए। कुल 175 करोड़ से ज्यादा के विज्ञापन टीवी चैनलों को आंदोलन के दौरान मिले। अन्ना के पक्ष में 5592 खबरें दिखाई गईं जबकि विरोध में सिर्फ 65 खबरें चलीं। जाहिर है अप्रैल का अनुभव देखते हुए मीडिया एक बार फिर अगस्त में लाइव कवरेज पर टूट पड़ा। जाहिर है ये आंदोलन टीवी चैनलों के कारण ही बड़ा हो गया। लेकिन ये बड़ा सवाल है जिसका जवाब ढूंढा जाना जरूरी है कि क्या मीडिया की कवरेज इस पूरे मामले में निष्पक्ष रही। जब बिहार में दर्जनों जिले के लोग 2008 में कोसी के बाढ़ के कहर से जूझ रहे थे कब बहुत कम चैनलों ने सामाजिक जिम्मेवारी निभाई थी। कुछ चैनल जनता का दर्ज जानने के लिए मौके पर पहुंचे थे लेकिन ज्यादातर चैनल दिल्ली मुंबई की खबरों में खोए थे। समाचार चैनल जो खाते पीते लोगों का मीडिया है। अन्ना के आंदोलन के दौरान जो लोग ट्रैफिक के नियम तोड रहे थे, जो लोग आंदोलन की आड़ में लोगों को लूट रहे थे, लोगों की जेबें काट रहे थे उनकी खबरें कहीं नहीं दिखा रहा था। इसके साथ ही जब हम किसी खबर को बडी प्रमुखता से दिखाते हैं तो उसके साथ ही हमारी जिम्मेवारी उस खबर के अंजाम तक पहुंचने में उसका फालोअप देखने की भी होती है। लेकिन टीआरपी की मार में खबरें ढूंढने वाले चैनल अक्सर फालोअप की बात भूल जाते हैं। अभी तो अन्ना के गांव पहुंचने पर कुछ चैनलों का कैमरा भी उनके साथ पहुंचा था लेकिन हो सकता है यही मीडिया एक दिन अन्ना के लिए निर्दयी भी हो जाए।
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ये कैसे पत्रकार
अन्ना के गांव रालेगण सिद्धि में पूरी तरह शराबबंदी है। वहां कोई धूमपान भी नहीं करता। ये सब अन्ना के आंदोलन के कारण हो सकता है। ये सारा मीडिया जानता है। लेकिन जब अन्ना के आंदोवन के दौरान टीवी मीडिया की पत्रकार अन्ना के गांव पहुंचे तो उन्होने गांव वालों की खातिरदारी का गलत लाभ उठाया। पत्रकारों ने टीवी कवरेज के दौरान गांव में रहते हुए जमकर शराब और सिगरेट पी। बाद में पत्रकारों की टीम के जाने पर गांव के लोगों ने उन शराब की बोतलों की सफाई की। इसके बाद अन्ना के गांव में पहुंचने वाली मीडिया टीम की किसी भी तरह की खातिरदारी करने से गांव के लोगों ने तौबा कर ली।
रामलीला मैदान से लाइव
दिल्ली के रामलीला मैदान में पिकनिक जैसा माहौल है। ये देशभक्ति का पिकनिक है। नव यौवनाएं गोरे गालों पर तिरंगा टैटू गुदवा रही हैं। लोग अन्ना की टोपी पहने घूम रहे हैं। लोग हाथों में तिरंगा लिए आ रहे है। बाइक पर तीन लोग सवार होकर बिना हेलमेट पहने अन्ना तुम संघर्ष करो हम तुम्हारे साथ हैं के नारे लगा रहे हैं। लोग आ रहे हैं जा रहे हैं। कुछ जत्थे दिल्ली के आसपास के शहरों से भी आ रहे हैं। 21 अगस्त रविवार का दिन अन्ना के अनशन का छठा दिन। रामलीला मैदान में बेतरतीब सी भीड़ है। अन्ना के मंच के पास लोगों की भीड़ जरूर दिखाई देती है लेकिन पीछे पूरा मैदान खाली है। टीवी का कैमरा वहीं फोकस करता है जहां भीड़ दिखाई देती है। यहां बाबा रामदेव के आंदोलन के बराबर लोग भी नहीं है। साइड में काउंटर लगे हैं। सभी लोगों के मिनरल वाटर बांटा जा रहा है। बिस्कुट के पैकेट बांटे जा रहे हैं। भूखे हैं तो लंगर का भी इंतजाम है। बीमार होनेवालों के लिए डाक्टर भी हैं। कई संस्थाएं अन्ना के समर्थन में अपनी संस्था का प्रचार करने पहुंची हैं। अन्ना संत हैं। कई आंदोलन किए हैं। कई बार सरकार हिला दी है। लेकिन दिल्ली के रामलीला मैदान के इस आंदोलन में पांच हजार लोगों की भीड़ बमुश्किल जुट रही है। वह भीड़ भी आते जाते लोग की है। जाहिर है मीडिया के प्रचार से ज्यादा लोग पहुंच रहे हैं। अन्ना के सपोर्ट में पूरा मीडिया है। रामलीला मैदान के बाहर 30 से ज्यादा ओबी वैन लगे हैं। लगातार लाइव फीड जा रही है।  लेकिन जिस तरह ये हल्ला मचाया जा रहा है कि पूरा देश अन्ना के साथ आ चुका है। वैसा बिल्कुल नहीं लगता। तमाम राजनीतिक और गैर राजनीतिक संगठनों के लोग एनजीओ के लोग अन्ना के साथ आ रहे हैं। लेकिन इसके बावजूद कोई व्यापक जन आंदोलन देश में खड़ा हो चुका है, ऐसा बिल्कुल नहीं कहा जा सकता। क्या इस आंदोलन की तुलना जेपी के आंदोलन से या राजीव गांधी के खिलाफ कांग्रेस से बाहर हुए वीपी सिंह के आंदोलन से की जा सकती है? भ्रष्टाचार के खिलाफ इस आंदोलन में क्या सचमुच भ्रष्टाचार से आजीज लोग पहुंच रहे हैं?  नहीं बल्कि बड़ी फेहरिस्त उन लोगों की भी है जो भ्रष्ट तरीके से अपना काम तो कराते हैं लेकिन वे चाहते हैं कि दूसरे लोग इमानदार हो जाएं।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य


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