Tuesday, 17 January 2012

रिटेल में बड़ी कंपनियों से खतरा....

देश भर में रिलायंस जैसी बड़ी कंपनियों के आने का विरोध शुरू हो चुका है। पर इसमें यह समझने की जरूरत है कि इसका विरोध कौन लोग कर रहे हैं। इन बड़ी कंपनियों के रिटेल सेक्टर में आने से घाटा किसे उठाना पड़ रहा है। छोटे कारोबारियों को यह खतरा नजर आ रहा है कि इन बड़ी कंपनियों के आने से उनका धंधा पूरी तरह बंद हो जाएगा। पर ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। रिलायंस ने अपने रिटेल सेक्टर की शुरूआत हैदराबाद से की। पर यहां रेहड़ी पटरी के सब्जी विक्रेताओं ने इनका कोई विरोध नहीं किया। अक्सर रिलायंस ने अपना फ्रेश आउटलेट वहीं खोला है जहां सब्जी बाजार पहले से ही है। वहीं हैदराबाद जैसे शहर में कई और बड़ी कंपनियां ब्रांडेड माल में सब्जी बेचने का कारोबार कर रही हैं। पर इनसे छोटे मोटे सब्जी विक्रेताओं के व्यापार पर कोई बुरा असर नहीं पड़ा है। हाट में सब्जी बेचने वाले प़ड़ोस के गांव से लाकर ताजी सब्जी बड़े स्टोरों से भी सस्ते दरों पर बेच रहे हैं। उपभोक्ताओं को जहां बेहतर लगता है वहां से खरीददारी कर रहे हैं। पर रिलायंस, बिड़ला, आईटीसी, गोदरेज जैसी कंपनियों के सब्जी बाजार में प्रवेश करने से आढ़तियों और कमीशन एजेंटों को जरूर परेशानी हो रही है। ये लोग कई सदी से इस परंपरागत व्यापार को असंगठित तरीके से करते चले आ रहे हैं। आमतौर पर वे अपने खाताबही में हेरफेर करके बिक्री कर और मार्केट फीस में सरकार को बड़ा चूना लगाते हैं।

रिलायंस जैसी कंपनियां जहां रिटेल सेक्टर में आई हैं वहीं देश की कई प्रमुख मंडियों में वे कमीशन एजेंट के रूप में भी प्रवेश कर रही हैं। इससे पुराने आढ़तियों की परेशानी बढ़ गई है। क्योंकि ये ब्रांडेड कंपनियां किसानों से महंगी दरों में सब्जियों की खरीद फरोख्त करती हैं वहीं उपभोक्ताओं को सस्ती दरों पर बेच देती हैं यानी वे मुनाफा कम रखती हैं। इसलिए आढ़ती और कमीशन एजेंट चाहते हैं कि रिलायंस उनके कारोबार में प्रवेश नहीं करे। जबकि सरकार से वैध तरीके से लाइसेंस प्राप्त करके रिलायंस जैसी कंपनियां मंडी में कारोबार के लिए उतरी हैं। ठीक इसी तरह आईटीसी ने देश के कई राज्यों के गांवों में चौपाल सागर की शुरूआत की है। इसमें जहां किसानों को अपने अनाज को बेचने की सुविधा है वहीं यहां खाद बीज व उनके जरूरत की अन्य सभी वस्तुओं के खरीदने के लिए स्टोर भी है। यह एक ग्रामीण डिपार्टमेंटल स्टोर का नमूना है जहां किसानों के लिए जाना एक अच्छा अनुभव तो है ही साथ ही ऐसी मंडियां किसानों को परंपरागत व्यापारियों की तुलना में उपज का बेहतर मूल्य भी प्रदान करती हैं। परंपरागत मंडियों की तुलना में यहां तौल की प्रक्रिया में होने वाले खर्चों को भी कम किया गया है। पर पुराने परंपरागत व्यापारी अपने व्यापार करने के तरीके को बदलने के बजाय विरोध पर उतरना चाहते हैं।
विरोध की वास्तविक तस्वीर भी दूसरी है जिन शहरों में इस तरह के बड़े व्यापारियों का संगठित होकर विरोध हो रहा है उससे इन बड़ी कंपनियों को थोड़ी बहुत हानि अवश्य उठानी पड़ रही है। पर इस विरोध के बीच ही उन्हें व्यापक तौर पर प्रचार भी मिल रहा है। इस निगेटिव पब्लिसटी की सकारात्मक फायदा इन कंपनियों को मिल रहा है। कुछ लोगों को भविष्य में इनको मोनोपोली का डर जरूर सता रहा है पर चूंकि हर क्षेत्र में कई बड़ी कंपनियों का प्रवेश हो रहा है इसलिए मोनोपोली का संकट नहीं होगा, हर जगह प्रतियोगिता होगी जिसका लाभ उपभोक्ताओं को ही मिलेगा।


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