Sunday, 18 March 2012

सस्ते चीनी मोबाइल...

-विद्युत प्रकाश मौर्य
आखिर मोबाइल फोन कितना सस्ता हो सकता है। कई साल पहले इंट्री लेवल के हैंडसेट तीन-चार हजार रुपये से कम के नहीं थे। पर अब लगभग सभी ब्रांडेड कंपनियों ने एक हजार रुपये में इंट्री लेवेल के मोबाइल हैंडसेट उतार दिए हैं। कई कंपनियां तो एक हजार रुपये में रंगीन स्क्रीन वाले हैंडसेट आफर कर रही हैं। वहीं ग्राहकों के लुभाने के लिए एक हजार से 1200 रुपये में लाइफ टाइम कनेक्सन के साथ मोबाइल हैंडसेट आफर किए जा रहे हैं। अब हम इंट्री लेवेल के मोबाइल फोन के इससे भी सस्ता होने की बात नहीं सोच सकते। हां अगर कोई सेकेंड हैंड मार्केट में जाए तो उसे 500 रुपये वाले मोबाइल फोन भी मिल सकते हैं बिल्कुल चालू हालत में।

वहीं बाजार दूसरी ओर सस्ते चीनी मोबाइल फोनों से भी पटा पड़ा है। भारतीय बाजार में आपको बड़े आराम से जगह जगह चीनी फोन बिकते हुए मिल जाएंगे। आमतौर पर ये चीनी मोबाइल फोन नान ब्रांडेड होते हैं। पर इनमें उपलब्ध सुविधाओं की बात करें तो ये बड़े बडे दावे के साथ आते हैं। जैसे आपको 1.3 मेगा पिक्सेल कैमरा वाले मोबाइल फोन महज ढाई हजार रुपये तक में मिल जाएंगे। इसमें सांग डाउनलोड मेमोरी जैसी सुविधा तो होगी ही। यही नहीं तीन हजार से 3500 रुपये के रेंज में दो मेगा पिक्सेल के कैमरे वाले मोबाइल फोन मिल जाते हैं। इतनी सुविधा वाला मोबाइल फोन अगर आप किसी ब्रांडेड कंपनी का खरीदने जाएं तो सात हजार रुपये तक देने पड़ सकते हैं। यही चीनी कंपनियों का कमाल है कि वे इतने सस्ते में टेक्नोलाजी उपलब्ध करा रही हैं।
अब आपके जेहन में सवाल उठ सकता है कि आखिर सस्ता है तो कितना टिकाऊ हो सकता है। जाहिर सी बात है सस्ता है तो कोई गांरटी-वारंटी नहीं है। लेकिन शौक पूरा करने वाली नई पीढी गांरटी वारंटी की बात भी नहीं करती। भले गारंटी नहीं है पर ऐसा भी नहीं है कि ये मोबाइल फोन यू एंड थ्रो वाले हैं। देश के सबसे बड़े मोबाइल फोन बाजार यानी दिल्ली के करोलबाग का गफ्फार मार्केट का एक दुकानदार कहता है कि जैसे ब्रांडेड मोबाइल फोन की मरम्मत हो जाती है उसी तरह इन सस्ते मोबाइल फोन की भी मरम्मत हो जाती है। यह अलग बात है कि बहुत जटिल सुविधाओं वाले मोबाइल फोन के मरम्मत करने वाले हर छोटे शहर में नहीं मिलते हैं।
अगर आप शौक पूरा करने के लिए कोई सस्ता और बहुत सारी सुविधाओं से लैस मोबाइल फोन खरीदते हैं तो अपने जोखिम पर खरीदें। ऐसे मोबाइल खरीदने के बाद आपको मरम्मत के लिए परेशान होना पड़ सकता है। कई बार ऐसा भी हो सकता है कि आपका मोबाइल फोन मरम्मत कराते कराते किसी ब्रांडेड कंपनी के मोबाइल फोन के बराबर ही जा बैठे। लेकिन आप मोबाइल फोन में तेजी से आ रही सुविधाओं के लिहाज से देखते हैं और सस्ते में ढेर सुविधाएं भी चाहते हैं तो बेशक कोई चाइनीज मोबाइल फोन आजमा सकते हैं। सिर्फ दिल्ली ही नहीं बल्कि लगभग सभी महानगरों में ऐसे चीनी मोबाइल फोन का बाजार पहुंच चुका है। पर नोकिया जैसे किसी ब्रांडेड कंपनी के मोबाइल की तरह ये फोन सालों साल साथ निभाने वाले नहीं हैं, ये बात आपको अपने दिमाग में पहले से बिठा लेना चाहिए।


Saturday, 17 March 2012

खुले बोरवेल बच्चों के लिए खतरा....

-विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com
पहले कुरुक्षेत्र का प्रिंस और और आगरा की नन्हीं सी जान वंदना कुशवाहा। भले ही इन दोनों को बड़ी कोशिश करके बचा लिया गया। पर बोरवेल में बच्चों का गिर जाना कोई पहला हादसा नहीं है। ऐसे हादसे आए दिन देश के किसी न किसी कोने में हो रहे हैं। इसमें कुछ खुशकिस्मत बच्चे हैं जो समय पर सहायता मिल जाने के कारण बच जा रहे हैं। पर कई ऐसे हादसे में नन्हें मुन्नों को अपनी जान से हाथ धोना भी पड़ा है। ऐसे में जरूरत इस बात की है, हम ऐसे खुले बोरवेल से सावधान रहे हैं। साथ ही जरूरत खत्म होने के बाद ऐसे बोरवेल को तुरंत बंद किया जा जिससे की बोरवेल और नौनिहालों की जान नहीं ले सकें। प्रिंस और वंदना के मामले में सेना का धन्यवाद करना पड़ेगा कि जवानो ने मुस्तैदी दिखाकर इन बच्चों को बचा लिया। पर हमें यह भी देखना पड़ेगा कि ऐसे आपरेशन में कितनी बड़ी राशि खर्च हो जाती है। सेना और प्रशासन के लोगों को कई दिनों तक बाकी के काम छोड़कर इसी में लगे रहना पड़ता है।

अगर हम प्रिंस या वंदना की बात करें तो उनकी जान बच गई इसमें उनकी जीजिविषा और जैसे हालात में वे जीवन गुजारते हैं वह भी खूब जिम्मेवार है। वर्ना बिना कुछ खाए पीए एक दिन से ज्यादा संकरे से बोरवेल में पड़े रहना कितना मुश्किल हो सकता है। कई लोगों की जान तो ऐसी जगह पर पड़े पड़े ही जा सकती है। प्रिंस के बारे में कहा गया कि वह गरीब का बच्चा था इसलिए बच गया। गरीब के बच्चे को कई कई घंटे तक खाना नहीं मिलता तो भी जीते रहते हैं। ऐसी हालात में उनकी भूखे रहने की क्षमता में इजाफा हो जाता है। अगर वे किसी मिड्ल क्लास या अमीर के बच्चे हों तो उनका ऐसे में बच पाना ज्यादा मुश्किल हो जाता है। ऐसे में हमें खुले बोरवेल को लेकर ज्यादा सावधान रहने की जरूरत है। जो लोग कच्चे बोरवेल की खुदाई करते हों उन्हें चाहिए वे काम खत्म होने के बाद इस बोरवेल को अच्छी तरह ढक दें।
अगर हम इस मामले में मीडिया की बात करते हैं तो उन्हें ऐसी किसी खबर के समय लाइव शो करने का अच्छा मौका मिल जाता है। ऐसे लाइव शो दिखाकर अच्छी खासी टीआरपी गेन करने की संभावना बढ़ जाती हैं। जब कुरूक्षेत्र में प्रिंस गड्ढे के नीचे गिरा था तब सभी चैनलों ने अपने ओबी वैन घटनास्थल पर लगा दिए और लाइव शो दिखाना शुरू कर दिया। सारे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। ऐसी किसी खबर के समय लोग अन्य चैनल भी देखना छोड़कर समाचार चैनलों की ओर ही स्विच कर लेते हैं। हालांकि प्रिंस या वंदना को गड्ढे से निकाल पाने में इन समाचार चैनलों की कोई भूमिका नहीं होती। पर ऐसा लाइव ड्रामा दिखाने का मौका कोई चूकना नहीं चाहता।
 प्रिंस के समय में भी और आगरा की वंदना कुशवाहा के समय भी सभी चैनलों ने पल पल की लाइव खबर दिखाकर खूब टीआरपी बटोरी। प्रिंस को तो कुछ चैनलों ने बड़ा बहादुर लड़का घोषित किया और उसे मुंबई लेकर गए और बड़े बड़े सितारों से ले जाकर मिलवाया। यह सब कुछ प्रिंस के परिवार वालों के लिए किसी सपने जैसा था। अब प्रिंस की पढ़ाई लिखाई भी अच्छे स्कूल में हो रही है। पर देश में लाखों करोड़ो गरीब परिवारों के बच्चों के साथ ऐसा नहीं होता, जो विपरीत परिस्थितियों में धीरे-धीरे बड़े होते जाते हैं। लोगों की रूचि किसी लाइव ड्रामा में तो जरूर है, पर गरीब के बच्चों से असली संवेदना किसे है....किसी शायर ने लिखा है...
बहुत बेशकिमती है आपके बदन का लिबास, किसी गरीब के बच्चे को प्यार मत करना....


Thursday, 15 March 2012

ये ब्रांड का दौर है....हाट बाजार पर खतरा

अब किसी महानगर में जब बाजार को जाएं तो सब कुछ आप किसी ब्रांडेड शाप से खरीद सकते हैं। हो सकता है आने वाले दिनों में महानगरों से हाट बाजार जैसी चीजें विलुप्त हो जाएं। जी हां अब आप आलू प्यार माचिस और चटनी बनाने के लिए धनिया का पत्ता सब कुछ किसी वातानुकूलित माल से खरीद सकते हैं। वहां से आप एक रुपये का सामान भी खरीद सकते हैं। यानी की परंपरागत सब्जी बाजार जिसे उत्तर भारत में हाट या दक्षिण में रायतु बाजार बोलते हैं इस पर बड़े उद्योगपतियों का तेजी से कब्जा हो रहा है। इससे बाजार की तस्वीर तेजी से बदल रही है। अब जब आप सब्जी खरीदने जाते हैं तो बाजार की भीड़भाड़ गंदगी से आपको निजात मिलती है।

वातानुकूलित चमचमती रिलायंस की दुकान रिलायंस फ्रेश पर आपका स्वागत किया जाता है और आप हर प्रकार की सब्जियां और फल अपनी मर्जी के वजन से खरीद सकते हैं। यहां परंपरागत हाट की तरह मोलजोल करने की कोई जरूरत नहीं है। अगर आपके पास रुपए नहीं हैं तो आप भुगतान क्रेडिट कार्ड से भी कर सकते हैं। माल का स्टाफ आपका सामान आपकी कार तक ले जाकर रख आएगा। रिलायंस फ्रेश की शुरआत हैदराबाद से हुई पर उसने अब देश की राजधानी दिल्ली में दस्तक दे दी है। हैदराबाद शहर में तो सिर्फ रिलायंस ही नहीं कई और ब्रांडेड शाप शहर के हर हिस्से में खुल चुके हैं जो बाजार के लगभग हर हिस्से पर कब्जा जमा चुके हैं। यहां दक्षिण की सबसे पुरानी त्रिनेत्रा डिपार्मेंटल स्टोर की चेन है जो अब आदित्य विक्रम बिड़ला समूह का हिस्सा बन चुकी है। वहीं शुभिक्षा, फूड लैंड, हेरिटेज, फूड लैंड जैसे स्टोरों की चेन हर जगह खुल चुकी है। यहां दवाएं, घरेलू राशन और सब्जियां तथा क्राकरी आदि सब कुछ उपलब्ध है। बिग बाजार और स्पेंसर की तुलना में इनकी उपस्थिति महानगर के बाहर इलाकों और विकसित हो रही कालोनियों में भी है।
लोगों का एक बड़ा वर्ग इनसे शापिंग कर रहा है। ये दुकानें जहां अपने नियमित ग्राहकों को लायल्टी प्वाइंट प्रदान करती हैं वहीं किसी ने मुफ्त में स्वास्थ्य बीमा देने का आफर भी आरंभ किया है। विभिन्न प्रकार के सामन को कम कीमत पर बेजने के लेकर इनके बीच एक प्रतिस्पर्धा भी देखने को मिल रही है। जाहिर है कि इसका फायदा ग्राहकों को ही मिलता है। परंपरागत किराना के दुकानदारों के लिए इन बड़े ब्रांडेड स्टोरों के सामने टिकपाना मुश्किल हो रहा है। वहीं अब सब्जी के हाट में जाने वाले ग्राहक भी बड़े रिटेल स्टोरों के चेन की ओर ही रुख कर रहे हैं। महानगरों में किराने की दुकान चलाने वाले कई दुकानों की रोजाना की सेल में गिरावट आने लगी है वहीं उनमें से कई अपना शटर गिराने की भी सोचने लगे हैं।
अगर हम किराना के दुकानों के मामले में देखें तो इस तरह की खरीददारी में ग्राहकों को लाभ है क्योंकि उसे कई तरह के सामान पहले की तुलना में सस्ती दरों पर मिल रहे हैं। वहीं बड़े रिटेल स्टोर ग्राहकों को कई बड़े सामान के साथ छोटे सामान मुफ्त का भी आफर मिलता रहता है। फिर भी ग्राहकों को किसी रिटेल चेन से सामान खरीदने से पहले दूसरे रिटेल स्टोर से दरों की तुलना करते रहना चाहिए। वहीं हमेशा किसी एक स्टोर से खरीददारी करने के बजाए कभी कभी दूसरे स्टोर में जाकर वहां के दरों की भी तुलना करते रहना चाहिए। कई बार अलग अलग स्टोरों में एक ही सामान के रेट में अंतर हो सकता है। इसलिए यहां से आंखें बंद करके खरीददारी करना उचित नहीं है।



Wednesday, 14 March 2012

टैक्स बचत की अप्रैल से ही करें प्लानिंग

आमतौर पर फरवरी और मार्च में नौकरी पेशा लोग काफी परेशान दिखाई देते हैं। उन्हें यह परेशानी होती है कि आखिर रुपया कहां लगाएं जिससे की कर बचत की जा सके। कई लोगों की हालत होती है कि मार्च का पूरा वेतन कर देने से बचने के लिए सेविंग में चला जाता है। कई लोगों का तो दो महीने का वेतन भी टैक्स में चला जाता है। अगर नहीं भी जाए तो फरवरी मार्च में उनके परिवार का बजट जरूर खराब हो जाता है। अगर आपने किसी तरह लोन ले रखा है तो उसकी किस्त देने में और भी हालत बुरी हो जाती है। इन सबसे बचा जा सकता है अगर आप थोड़ी अक्लमंदी से काम लें। आप नया वित्तीय वर्ष आरंभ होने के समय ही यह जांच कर लें कि आपका इस साल का सालाना वेतन या कुल आमदनी कितनी बनेगी इस पर टैक्स कितना देना पड़ेगा। इसके साथ ही यह गणना करवाएं कितना रुपया आप अमूमन साल भर में बचत कर सकते हैं। उसके बाद कितना राशि बचती है जिस पर आप सरकार को कर अदा करना चाहते हैं।
कर बचाएं या अदा करें-
कर बचाने के लिए बचत का सीधे अर्थों में यह फंडा है कि आप जितना टैक्स बचाना चाहते हैं उसका पांच गुना रुपया आपको टैक्स सेविंग स्कीम में बचत करनी पड़ती है। यह राशि विभिन्न सरकारी योजनाओं में जाती है। इसमें आमतौर पर आठ से नौ फीसदी तक ब्याज होता है साथ ही इस राशि का लाक इन पीरियड भी होता है। इसलिए आप यह भी देखें की कर के लिए रुपया बचाना अच्छा है यह उस राशि पर कर अदा कर देना ही अच्छा है। आमतौर पर हर व्यक्ति को साल में कुछ राशि कर के रुप में भी अदा करनी चाहिए। कर के लिए आप जो रुपया बचाते हैं वह राशि आपको आठ साल बाद दुगुनी होकर मिलती है। पर महंगाई की दर से देखें तो उस राशि की क्रय शक्ति उस समय कम हो जाती है।
हर महीने करें बचत

टैक्स बचत के लिए आप जो रुपया विभिन्न सेविंग स्कीम में लगाना चाहते हैं उसे आप फरवरी मार्च के महीने में भी न लगाकर हर महीने बचत की योजना पर काम करें। आप अप्रैल से अगले मार्च महीने तक 12 महीने तक कर बचाने के लिए बचत करें। इससे आपके बजट पर बोझ नहीं पड़ेगा। जैसे आपको वेतन के साथ करने वाले ईपीएफ या जीपीएफ से मिलने वाली कर रियायत, मकान किराया, बच्चों की फीस आदि के बाद आपको 40 हजार रुपए साल में टैक्स सेविंग स्कीम में लगाने की जरूरत पड़ती है। इसमें पहला तरीका यह हो सकता है कि फरवरी या मार्च में आप 40 हजार रुपए किसी एक योजना में लगाएं। दूसरा तरीका यह हो सकता है कि आप हर महीने साढ़े तीन हजार रुपए किसी एक योजना में लगाएं।
अगर आपने जीवन बीमा करा रखा है तो उसमें की जाने वाली बचत से मिलने वाले कर लाभ का भी लाभ उठाएं। मकान खऱीदने के लिए मिलने वाले लोन पर भी कर रियायत मिलती है। इस बारे में भी अपने कर सलाहकार से राय लें।
अब महत्वपूर्ण तथ्य की कर बचाने के लिए किन योजनाओं में पैसा लगाएं। अब राष्ट्रीय बचत पत्र (एनएससी) खरीदना अच्छे विकल्पों में नहीं है। आप हर महीने आवर्ती जमा की तरह पीपीएफ में पैसा जमा कर सकते हैं या फिर इक्विटी लिंक्ड सेविंग स्कीम( इएलएसएस) यानी म्युचुअल फंड में भी पैसा लगा सकते हैं।
- विद्युत प्रकाश मौर्य 


Tuesday, 13 March 2012

कैरियर में बने रहें लगातार एक्टिव


कैरियर के बीच में कई बार ऐसा समय आ जाता है जब आपको नौकरी ढूंढने में दिक्कत होती है या वर्तमान स्थान पर खुद को एडजस्ट करने में परेशानी होती है। ऐसी दिक्कतों से थोड़ी कोशिश करके निपटा जा सकता है। आप अपनी नौकरी भी बदल सकते हैं, परेशानी दूर कर सकते हैं और जीवन खुशहाल बना सकते हैं। अक्सर देखा गया है कि कुछ लोग किसी भी पड़ाव पर जॉब बदल लेते हैं, लेकिन कुछ लोग अंतिम विकल्प के रूप में ही अपनी नौकरी बदलते हैं। इसका कारण लीडरशिप क्वालिटी में अंतर का होना है। जो लोग कैरियर में लगातार एक्टिव बने रहते हैं उन्हें ज्यादा दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़ता है वहीं जो लोग ज्यादा एक्टिव नहीं रहते हैं उन्हें परेशानी पेश आती है। 


जीवन में सार्थक मिशन बनाएं
अक्सर करियर के मध्यकाल में लोग आपके काम अर्थ को लेकर ज्यादा सवाल उठाते हैं, साथ ही कंपनी के मिशन की वैल्यू, नौकरी में आजादी और अपने योगदान आदि के बारे में ज्यादा सोचा जाता है। कई बार ऐसा भी होता है कि इस स्तर पर आकर खुद को कंपनी के साथ जोड़कर रखना मुश्किल लगने लगता है। 


ऐसे में लोगों का अपनी वर्तमान जगह और नौकरी, दोनों से मोह टूटने लगता है। काम करने में मन नहीं लगता है और व्यक्ति तनावग्रस्त हो जाता है। कई बार ऐसा तब होता है जब आपके जीवन में कोई मिशन नहीं हो। अगर आप जीवन में मिशन लेकर चल रहे हैं तो करियर में बोरियत भरा नहीं होता। 


दीर्घकालिक योजना बनाएं 
कभी भी करियर को एक दो महीनों या साल में नहीं बल्कि लंबी अंतराल के रूप में देखना चाहिए और इसी के हिसाब से योजना बनानी चाहिए। करियर का लक्ष्य तय करते समय लंबी अवधि के विकल्प पर विचार करना चाहिए। इसके साथ ही करियर में हमेशा पारदर्शिता बरतनी चाहिए। इससे एक तरफ जहां कार्य स्थल में आपकी विश्वसनीयता बढ़ेगी वहीं दूसरी तरफ खुद आपका आत्मविश्वास भी बना रहेगा। 




खुद को नया बनाएं
समय कुछ नया करने का है। चाहे कोई भी क्षेत्र हो अगर आगे बढऩा है तो हमेशा कुछ नए की जरूरत होती है। इसलिए हमेशा इस बात की कोशिश करते रहना चाहिए जो कुछ भी नया हो रहा है उसे सीखा जाए और अच्छे से अपनाया जाए। हर प्रोफेशनल क्षेत्र में विशेष रूप से लागू होता है। कुछ लोग करियर के शुरुआत में जो सीखते हैं उससे आगे कुछ नया नहीं सीखना चाहते हैं। 

Monday, 12 March 2012

मैनेजमेंट गुरू से राजनीति का सफर

अभिषेक मिश्रा यूपी में समाजवादी पार्टी के बदलते हुए चेहरे के प्रतीक हैं। लखनऊ उत्तर से चुनाव जीत कर विधान सभा में कदम रखने वाले अभिषेक मिश्रा आईआईएम अहमदाबाद में प्रोफेसर की नौकरी छोड़कर आए हैं। 

भले ही कुछ लोग समाजवादी पार्टी को गुंडों और जेल से चुनाव लड़ने वाले नेताओं की पार्टी मानते हैं लेकिन अब समाजवादी पार्टी तेजी से बदल रही है। मुलायम सिंह यादव के बेटे अखिलेश खुद भी विदेशी विश्वविद्यालयों से ऊंची पढ़ाई पढ़कर राजनीति में आए हैं। 


बताया जा रहा है कि आईआईएम में पढ़ा रहे अभिषेक को अखिलेश यादव ने दो साल पहले समाजवादी पार्टी से जोड़ा। पार्टी की नीतियां बनाने में इस मैनेजमेंट गुरू की बड़ी भूमिका रही है।

 समाजवादी पार्टी के घोषणा पत्र में छात्रों को मुफ्त में लैपटॉप और टैबलेट देने की बात हो या फिर बेरोजगारी भत्ता और शिक्षा को लेकर नई योजनाएं इन सबके पीछे थींक टैंक के रूप में अभिषेक मिश्रा काम कर रहे थे। ये अभिषेक और अखिलेश द्वारा बनाई गई चुनावी रणनीति का एक भाग है, जिसे पार्टी पूरा करने के हर संभव प्रयास करेगी। इतना ही नहीं प्रचार प्रसार के लिए अखिलेश यादव ने वही तरीके अपनाए, जो अभिषेक मिश्रा ने उन्हें  सुझाया। हालांकि अभिषेक पार्टी के थींक टैंक ही बने रहना चाहते थे लेकिन बताया जा रहा है कि अखिलेश यादव ने अभिषेक को चुनाव लड़ने के लिए तैयार किया।

अभिषेक मिश्रा आईआईएम में मैनेजमेंट के छात्रों को बिजनेस पॉलिसी पढ़ाते थे। वे पूर्व आईएएस जेएस मिश्र के बेटे हैं लेकिन अब मैनजमेंट की क्लास छोड़कर राजनीति की रपटीली राहों पर चल पड़े हैं। अभिषेक जैसे चेहरे से उम्मीद की जा सकती है कि यूपी की राजनीति का चेहरा जरूर बदलेगा। साथ ही वे समाजवादी पार्टी की छवि को भी बदलने में सहायक होंगे जिसे आमतौर पर यूपी में लाठी भांजने वालों की पार्टी माना जाता है। उम्मीद है अखिलेश यादव उनका बेहतर उपयोग करेंगे और दोनों युवा मिलकर यूपी में नई इबारत लिखेंगे।

- विद्युत प्रकाश मौर्य

Wednesday, 7 March 2012

छोटे निवेशक बाजार पर रखें नजर....

आप छोटे निवेशक हैं तो भी आपको बाजार पर नजर रखना चाहिए। शेयर बाजार में पैसा लगाना और धन कमाना अच्छी चीज है पर आपके आंख और कान खुले होने चाहिए। आम तौर पर बाजार में दो तरह के निवेशक हैं एक वे जो पैसा लंबे समय के लिए लगाते हैं और एक वे जो पैसा लगाकर तुरंत लाभ कमाना चाहते हैं। जो लोग पैसा लगाकर तुरंत लाभ कमाना चाहते हैं उन्हें और भी सावधान रहना चाहिए। बाजार से तुरंत लाभ कमाना जोखिम भरा है। यह एक तरह का जुआ भी है।

रोज लाभ कमाना जुआ- कुछ लोग शेयर में निवेश करते हैं और रोज लाभ कमाते हैं। सुबह एक लाख रूपया किसी शेयर में निवेश किया और चार घंटे बाद अगर दो रूपये प्रति शेयर का लाभ होता दिखाई दिया तो बेच दिया। इसमें कई बार लाभ होता है तो कई बार घाटा भी हो जाता है। जो लोग पहली बार निवेश करते हैं और उन्हें घाटा हो जाता है तो वे बाजार से बहुत निराश हो जाते हैं। साथ बहुत बड़ी राशि निवेश करने वालों को भी बाजार कई बार बड़ा घाटा देता है। पर ऐसे लोग ये भूल जाते हैं कि इसी बाजार ने उन्हे कई बार बहुत बड़ा फायदा भी कराया है। बाजार के नियमित निवेशकों को बाजार के ऐसे उतार-चढ़ाव के समय संयम बरतना चाहिए। जो लोग बाजार में यह सोच कर आते हैं कि उन्हें अपने धन से तुरंत कोई बड़ा लाभ हो जाएगा तो कई बार उन्हें लाभ हो जाता है पर कई बार उन्हें इसमें बड़ा घाटा भी हो जाता है।

दीर्घकालिक निवेश में फायदा - अगर हम बाजार के लंबे ट्रैक रिकार्ड को देखें तो यह पाएंगे कि जिन लोगों ने अपना धन लंबे समय के लिए निवेश किया है उन्हें बाजार से कोई घाटा नहीं हुआ है। अगर आपका पैसा म्चुअल फंडों में तीन साल या उससे ज्यादा समय के लिए जमा रहा है तो आमतौर पर यह बहुत फायदा देकर गया है। अगर कोई 15 साल से शेयर बाजार में नियमित निवेश करता आ रहा है तो उसे भी बाजार से कोई घाटा नहीं हुआ है। अगर हम बाजार में हर्षद मेहता और केतन पारिख जैसे बड़े घोटालों पर भी नजर डालें तो भी बाजार इन सबसे उबर कर फिर से उठ खड़ा हुआ है और लंबे समय से धन का निवेश करने वालों को कोई घाटा नहीं हुआ है। जनवरी 2008 में एक बार फिर बाजार में तेज गिरावट आई है। दुनिया की कई बड़ी कंपनियों के घाटे के कारण भारत के शेयर बाजार अचानक 25 से 30 फीसदी तक नीचे गिरा है। पर इसके आधार पर ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि हमें भारतीय शेयर बाजार से निराश होने की जरूर है। दरअसल बांबे स्टाक एक्सचेंज के सेंसेक्स ने एक साल में 13 हजार से 21 हजार तक का सफर तय कर लिया तो लोगों को लगने के लगा कि बाजार में बढ़त इसी गति से हमेशा जारी रहेगी। पर हमेशा ऐसा नहीं होता। अगर बैंक के फिक्स डिपाजिट या अन्य जमा योजनाओं में आपका रूपया आठ फीसदी की गति से बढ़ता है तो शेयर बाजार में आपका रुपया 20 से 25 फीसदी की गति से भी बढ़े तो इसको बहुत अच्छा रिटर्न मानना चाहिए। पर शेयर और म्यूचुअल फंड कई बार साल में 50 से 100 फीसदी तक रिटर्न दे जाते हैं। पर इसमें जब तेजी से गिरावट आती है तो निवेशकों के दिल की धड़कन तेज होने लगती है। पर शेयर बाजार में निवेश करने वालों को यह बात अच्छी तरह याद रखनी चाहिए कि बाजार में निवेश में जोखिम है। जनवरी फरवरी में बाजार में बड़ी गिरावट आने के बाद भी जिन लोगों ने आठ दस महीने पहले बाजार में पैसा लगाया है उन्हें कोई नुकसान नहीं हुआ है।



Monday, 5 March 2012

छोटे परदे पर ये कैसे कैसे गुरू....

भारतीय संस्कृति में गुरू की तुलना ऐसे कुम्हार से की गई है जो घड़े के अंदर हाथ डालता और बाहर धीरे धीरे चोट मारता है जिससे घड़ा सुंदर आकार ले पाता है। ठीक उसी तरह गुरु भी शिष्य के अंदर की तमाम अच्छाईयों को बाहर लाता है और उसे सुंदर बनाता है, ठीक उसी कुम्हार की तरह जो घड़े को सुंदर बनाता है। पर समय के अनुसार गुरूओं की नई पीढ़ी आ रही है।


आजकल टीवी पर संगीत प्रतियोगिताओं में गुरूओं का नया रुप देखने को मिल रहा है। ये गुरु अपने शिष्यों की अच्छाई और बुराई का मंच पर ही छिद्रान्वेषण करते हैं। इस दौरान अगर तारीफ की जा रही है तो शिष्य बड़े खुश होता हैं उनका सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है, पर अगर गुरू उनकी निंदा करने लगे तो वे आंखों में आंसू ले आते हैं। मजे की बात एक गुरू तारीफ करता है तो दूसरा टांग खींचता है..यह सब कुछ चलता रहता है और देश दुनिया के करोडो लोग इस शो को देख रहे होते हैं। लोगों को यह सब कुछ बड़ा नेचुरल सा लगता है। यह ठीक उसी तरह होता है जैसे किसी बडे मामले पर फैसला करने के लिए अदालत में जूरी बैठती है। ये गुरू भी कुछ कुछ जूरी के मेंबरों की तरह ही तो होते हैं। पर अदालत में जो जूरी बैठती वह बंद कमरे में होती है। पर यहां पर गुरू करोड़ों लोगों को अपने अपने अंतर्विरोध दिखाते हैं। अगर आप संगीत प्रतियोगिताओं में होने वाली वास्तविक मानते हैं तो आप किसी गलतफहमी में जी रहे हैं। दरअसल यह सब कुछ एक हाई प्रोफाइल नाटक की तरह होता है। ऐसा लगता है मंच पर दो संगीत के जानकार किसी बात को लेकर लड़ रहे हैं। पर यह लड़ाई एक दम नाटकीय होती है। लोगों को तो लगता है कि एक शिष्य को लेकर दो गुरू लड़ रहे हैं पर यह लड़ाई महज धारावाहिक को सेलेबल बनाने के लिए होता है। दर्शकों का ध्यान खींचने के लिए होता है। कोई संगीतकार किसी टैलेंट को लेकर कहता है कि तुमने इतना खराब गाया कि उम्मीद ही नहीं थी। तुम बिल्कुल चल नहीं पाओगे....जैसे बिल्कुल हतोत्साहित करने वाले शब्दों का इस्तेमाल ये गुरु करते हैं। यह सब कुछ मंच पर किसी को अपमानित करने के जैसा ही होता है। अगर किसी की गायकी में कमी है तो उसके बारे में सरेआम मंच पर बताने की क्या जरूरत है।

मजे की बात है इन संगीत प्रतियोगिताओं में जज हैं सभी भारतीय शास्त्रीय संगीत की महान परंपराओं से अवगत है। जहां पर गुरू शिष्य़ का इतना सम्मान करता है कि उनका जितनी बार नाम लेता है उतनी बार कान को उंगली लगता है। वहीं पर शिष्य भी अपने गुरू का काफी सम्मान करता है। दोनों कभी किसी की सार्वजनिक रूप से निंदा नहीं करते हैं। रिश्तों को नाटकीय नहीं बनाते हैं। पर यहां चीजों को नेचुरल टच देने के नाम पर एक अजीब सा नाटक किया जा रहा है। मजे की बात है कि ऐसे संगीत प्रतियोगिताओं में जावेद अख्तर, इला अरूण, उदित नारायण, अनु मलिक जैसे लोग जज हैं। पर सभी इन धारावाहिकों को कामर्सियल रुप से सफल बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं।

यह जान पाना मुश्किल है कि वे संगीत प्रतियोगिताओं में जज की कुरसी पर बैठ कर जो कुछ एक्सपर्ट कमेंट देते हैं उनमें कितनी असलियत होती है। पर कई बड़े मनोरंजन चैनलों पर नाटक का यह सिलसिला जारी है। चूंकि इन संगीत सितारों की खोज के साथ चल रहा एसएमएस और अन्य तरीके से लोगों को जोड़कर रखने का सिल। इसलिए इन गुरुओं को भी नाटक करने को कहा जाता है...और ये गुरू व्यावसायिकता की होड़ में गुरू जैसी पवित्र संस्था को कलंकित कर रहे हैं।


Sunday, 4 March 2012

डीटीएच कंपनी का फर्जीवाड़ा


मैं कभी अपने डीटीएच पर मूवी बुक करके फिल्में नहीं देखता। लेकिन एक दिन मेरे मोबाइल पर अचानक मैसेज आता है कि आपके डीटीएच पर चैनल नंबर 155 और 156 पर दो मूवी बुक कर दी गई हैं। आपके खाते से सौ रूपये भी काट लिए गए हैं। यही संदेश अगले दिन भी आता है। यानी मेरे खाते में दौ सौ रूपये का डाका। जबकि मैंने फोन या एसएमएस किसी भी तरीके से कोई मूवी बुक ही नहीं कराई थी। मैंने अपने डीटीएच काल सेंटर को फोन लगाकर शिकायत दर्ज कराई। डीटीएच सेवा की काल एडेंट करने वाली बाला का व्यवहार बड़ा ही बदतमीजी भरा था। उसने कहा कि ऐसा हो ही नहीं सकता। आपने जरूर मूवी बुक कराई होगी। मैंने जवाब दिया न तो आनलाइन या फिर मोबाइल या एसएमएस से मैंने कोई मूवी बुक ही नहीं कराई। लेकिन काल सेंटर की एक्जक्यूटिव मेरा तर्क मानने को तैयार नहीं। मैंने कहा मेरे खाते से जो रूपये कटे हैं उसे रिवर्ट कराओ। लेकिन वे इसका रास्ता भी बताने को तैयार नहीं। खैर काफी बकझक के बाद भी मेरी समस्या का समाधान नहीं हुआ। तब मैंने कंपनी के नोडल आफिसर का नंबर मांगा। नोडल आफिसर को काल किया सारी परेशानी फिर से बताई। नोडल आफिसर ने मेरी समस्या को समझा और कंपनी की गलती मानी। मेरे खाते से कटे 200 रूपये अगले 24 घंटे में वापस आ गए। मुझे परेशानी हुई ये एक मुद्दा है। लेकिन सबसे बड़ा मुद्दा है कि कई डीटीएच कंपनियां अपनी कमाई बढ़ाने के लिए इस तरह का फर्जीवाड़ा बड़े पैमाने पर कर रही हैं। अगर आपने गंभीरता से अपना एसएमएस नहीं देखा तो आपके खाते से रूपये कटे। इस तरह लाखों कस्टमर के साथ धोखाध़ड़ी करके कंपनी ने करोड़ो कमा लिए। ये है उपभोक्ताओं को लूटने का एक तरीका। ये सब कुछ करने वाली कंपनी है एयरटेल डिजिटल। अगर आपके खाते में भी इस तरह का फर्जीवाड़ा हुआ है तो चुप मत बैठिए आवाज उठाइए...

-    विद्युत प्रकाश मौर्य