Wednesday, 20 March 2013

आईआईएमसी का साक्षात्कार और बेरी जी का संदर्भ

मैं एमए की पढ़ाई पूरी कर चुका था। मेरा चयन भारतीय जन संचार संस्थान में हिंदी पत्रकारिता पाठ्यक्रम में हो गया। जब मैं आईआईएमसी के साक्षात्कार कक्ष में जुलाई 1995 में पहुंचा तो बोर्ड के लोगों ने मेरे पत्रकारिता में किसी तरह के कार्य के अनुभव के बारे में पूछा।
 मैंने बताया कि इन दिनों मैं हिंदी प्रचारक संस्थान के निदेशक कृष्णचंद्र बेरी की आत्मकथा लिख रहा हूं। बोर्ड के लोग थोड़े चकित हुए। सभी लोग बेरी जो को सम्मान से जानते थे। एक सदस्य ने सवाल किया- बेरी जी ने किसी महानपुरूष की आत्मकथा पर काम किया था आपको पता है...मैंने बताया- हां 18 साल की आयु में ही उन्होंने हिटलर की आत्मकथा मेनकेंफ का पहला हिंदी अनुवाद पेश किया था। ये पुस्तक एक बार फिर नए रूप में प्रकाशित हो रही है।
बोर्ड के सदस्यों ने मुझसे और भी सवाल पूछे थे- मसलन इतिहास के छात्र होते आपने किन इतिहासकारों की पुस्तकें पढ़ी उनकी क्या खासियत है...मैंने ताराचंद, सुमित सरकार के नाम लिए। मेरे गृह नगर सासाराम के ऐतिहासिक नाम शेरशाह की इतिहास में प्रमुख देन- मैंने बताया डाक व्यवस्था, न्याय व्यवस्था और बाद में जीटी रोड। एक सदस्य ने पूछा पत्रकारिता बीएचयू में भी पढ़ाई जाती है फिर यहां क्यों आना चाहते हो। मैंने कहा आईआईएमसी की अच्छी फैकल्टी और आधारभूत संरचना के बारे में सुन रखा है। मेरा 20 मिनट का इंटरव्यू एक भी जवाब नकारात्मक नहीं रहा। पर बेरी जी पर शुरू हुए प्रसंग ने मेरे साक्षात्कार को लंबा खींचा और सुखद संवादों के साथ समापन हुआ। मैं बाहर आकर आश्वस्त हो चुका था कि मेरा चयन पक्का है। मैंने बनारस पहुंच कर बेरी जो ये बात बताई। साक्षात्कार बोर्ड में सबने उनका नाम सम्मान से लिया ये जानकर मैं व बेरी जी दोनों ही प्रसन्नचित थे। सचमुच उस दौर में कोई भी हिंदी का लेखक या पत्रकार नहीं होगा जो बेरी जो को न जानता हो। उन्होंने कमलेश्वर, राजेंद्र अवस्थी, शानी, विश्वनाथ प्रसाद ( आलोचक) जैसे कई नामचीन लेखकों की पहली किताब छापी वह भी  बिना किसी सिफारिश के। जब सक्रिय पत्रकारिता शुरू करने के बाद दिल्ली ली मीरिडयन होटल में टीवी धारावाहिक युग की प्रेस कान्फ्रेंस में मेरी कथाकार कमलेश्वर से मुलाकात हुई तब उन्होंने मुझसे बेरी जी का नाम अति सम्मान से लिया और उनकी प्रशंसा में न जाने कितने वाक्य कह डाले।
-      
   - विद्युत प्रकाश मौर्य 

Tuesday, 19 March 2013

हिंदी प्रकाशन के शलाका पुरूष कृष्णचंद्र बेरी और मैं

अपने कक्ष में कृष्ण चंद्र बेरी - 1996 ( फोटो-विद्युत) 
किसी के जीवन में उसका पहला काम पहला अनुबंध (एसाइनमेंट) बहुत महत्व रखता है। मेरा परिचय हिंदी प्रकाशन जगत के शलाका पुरुष कृष्ण चंद्र बेरी से होना एक संयोग था। तब मैं काशी हिंदू विश्वविद्यालय में एमए की पढ़ाई के साथ पत्रकारिता में फ्रीलांसिंग कर रह रहा था। दीप जगत के फीचर प्रभारी जीतेंद्र मुग्ध ने एक विषय दिया महंगी होती पुस्तकों के लिए जिम्मेवार कौन...इस पर प्रमुख प्रकाशकों से बातें करके फीचर तैयार करो। मैं विश्वविद्लाय प्रकाशन के पुरूषोत्तम दास मोदी, चौखंबा विद्या भवन के स्वामी और हिंदी प्रचारक संस्थान के निदेशक श्री कृष्णचंद्र बेरी से इसी क्रम में जून 1994 में मिला। 
बेरी जी की आदत थी हर नए व्यक्ति को भी उत्साहित करने की। सो उन्होंने विषय पर अपने विचार देने के साथ मुझे उत्साहित भी किया था। 

जब यह लेख प्रकाशित हो गया तब उसे दिखाने के बहाने मैं एक बार फिर बीएचयू से 9 किलोमीटर अपनी साइकिल चलाता हुआ पिशाचमोचन में हिंदी प्रचारक संस्थान के दफ्तर पहुंचा। मुझे देखते ही बेरी जी आह्लादित स्वर में बोले मैं इंटरव्यू पढ़ लिया है। तुमने जैसा मैंने कहा था वैसा ही हूबहू उतार दिया है। बात आगे बढ़ी, वे बातों बातों में अतीत में चले गए। वे कुछ भावुक हुए और कहा, मैं अपने कुछ पुराने संस्मरण लिपिबद्ध कराना चाहता हूं। तुम कुछ दिन बाद मुझे मिलो। बात आई गई हो गई। लेकिन उन्होंने थोड़े दिन बाद संदेश देकर मुझे बुलवाया। उनका प्रस्ताव था कि मैं अपनी आत्मकथा लिखवाना चाहता हूं। तुम इस काम को लिप्यांतरकार के तौर करो। उन्होंने जुबानी वादा किया पुस्तक में तुम्हारा नाम रूपांतरकार के तौर पर जाएगा। मेरे लिए पत्रकार बनने से पहले ये किसी काम का सुंदर प्रस्ताव लगा। अस्वीकार करने का कोई कारण नहीं था।
 एक दिन उनकी जीवनी प्रकाशकनामा पर काम शुरू हो गया। बेरी जी की उम्र 80 साल हो चुकी थी। बोलने में मुश्किल होती थी। लिख नहीं पाते थे। लिहाजा रोज मैं उनके घर और लाइब्रेरी में पुरानी फाइलों पुस्तकों से उनके जीवन के बारे में शोध करता। हर सुबह सात से आठ बजे एक घंटा वे अपने पुराने अनुभव सुनाते। मैं प्रश्नावली के साथ भी तैयार रहता। ये सब कुछ मैं अपने डिक्टाफोन में रिकार्ड करता। हर रोज एक कैसेट। फिर दोपहर में उसकी स्क्रीप्ट तैयार करता। इसके बाद अगले दिन के लिए फिर शोध और तैयारी। रहना खाना पीना सब बेरी जी के आवास में उनके परिवार के सदस्यों के साथ ही। उनके रसोई घर से बनकर आने वाली हिंग की खूशबु वाली थी का स्वाद नहीं भूलता। बेरी जी कभी कभी काम से खुश होने पर रसगुल्ले जरूर मंगाकर खिलाते थे। कभी लगातार कभी कुछ दिनों के ब्रेक के साथ काम जारी रहा। लगभग एक साल में 450 पृष्ठों की पुस्तक प्रकाशकनामा का मसौदा तैयार हो गया।

पुस्तक के संपादन का काम मैंने आईआईएमसी की छुट्टियों के दौरान और उसके बाद कुबेर टाइम्स में नौकरी मिल जाने के बाद भी छुट्टियों के दौरान वाराणसी जाकर पूरा किया। इस दौरान मैं बेरी जी के आवास में उनके सानिध्य में ही रहता था। पुस्तक प्रकाशकनामा 2001 में प्रकाशित हुई। इसे 2002 में भारत सरकार की ओर से भारतेंदु हरिश्चंद्र पुरस्कार भी मिला। 

-    - विद्युत प्रकाश मौर्य

Friday, 1 March 2013

ये दरिद्रनारायण का बजट है...

खाद्य सुरक्षा के लिए 10 हजार करोड़ का इंतजाम है 2013-14 के बजट में 

हर साल बजट पेश होता है। केंद्र सरकार से इस बजट से हर वर्ग को उम्मीद होती है। अमीर चाहता है उसे रियायत मिले, गरीब भी चाहता है उसे रियायत मिले। मध्यम वर्ग को लगता है महंगाई दूर करने की कोई जुगत वित्तमंत्री पेश कर दें। जिसे बजट सुनकर निराशा होती है वह इसमें ढेर सारी कमियां निकालना शुरू करता है। कई साल से बजट सुन रहा हूं। शायद ही किसी साल यह सुनने में आया हो कि हर वर्ग ने बजट को सराहा हो।
आखिर हम उम्मीद क्यों रखते हैं। क्या बजट सरकार लोगों को राहत देने के लिए पेश करती है। या फिर अपना एक साल का हिसाब किताब आगे बढ़ाने के लिए। 28 फरवरी की रात आजतक चैनल पर एक बजट लांज बना था। वहां अलग-अलग वर्गों के खास तौर अमीर लोग जमा थे जो काफी पीकर चिदंबरम के खिलाफ अपनी उबकाइयां निकाल रहे थे। किसी को बजट पसंद नहीं आया था। प्रसिद्ध पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी भी अमीरों के सरमाएदार की तरह बातें कर रहे थे।

 इस बार के बजट में चिदंबरम ने अमीरों से लिया और गरीबों को ज्यादा देने की कोशिश की है। ये बात अमीरों को हजम नहीं हो रही थी। भला एसयूवी महंगा हो गया, सुपरबाइक, एसी रेस्टोरेंट में खाना पीना महंगा हुआ, 50 लाख से ज्यादा वाले घर महंगे हुए तो अमीरों को थोड़ा दर्द तो होना ही था। लेकिन दरिद्रनारायण के लिए फूड सिक्योरिटी का इंतजाम किया, बेरोजगारों की सुध ली, युवाओं महिलाओं की सुध ली तो भला क्या गलत किया। भले ही इसे चुनावी बजट कहा जा रहा हो लेकिन इसमें पसमांदा लोगों खबर लेने की कोशिश की गई तो खाते पीते लोगों के पेट में दर्द तो होना ही था। लेकिन हम क्या करें हमारी फितरत है हम थोड़े में खुश होना नहीं जानते, हमें हमेशा थोड़े और की उम्मीद रहती है। 

विद्युत प्रकाश मौर्य ( 01 मार्च 2013 )