Monday, 17 June 2013

रसोई गैस का विकल्प

रसोई गैस की कीमतें आसमान छू रही हैं। फिलहाल ये 400 रूपये प्रति सिलेंडर से ज्यादा हो गई हैं। वहीं सरकार और सब्सिडी घटाने की योजना रखती है। माना जा रहा है कि एक गैस सिलेंडर की कीमत 800 रूपये पहुंच सकती है। वहीं सरकार आम लोगों को साल में कुछ निश्चित सिलेंडर ही रियायती मूल्य पर देने की योजना लाने वाली है। अगर ये योजना लागू हो जाती है तो एक घरेलू उपभोक्ता को सिर्फ चार सिलेंडर ही रियायती दरों पर मिला करेंगे। उसके बाद बाद के सिलेंडर के लिए बाजार दर यानी 800 रूपये तक देना पड़ सकता है। ऐसे में ये जरूरी हो गया है कि रसोई गैस के दूसरे विकल्पों के बारे में गंभीरता से सोचा जाए। अब कई गांवों तक गैस कनेक्शन पहुंचा दिया गया है। लेकिन गैस पर खत्म होने वाली सब्सिडी का असर सभी जगहों पर पड़ेगा।

 रसोई गैस की किल्लत से निपटने के लिए गुजरात के कच्छ जिले के गंगापर गांव के लोगों ने अनूठा इंतजाम किया है। इस गांव में गोबर गैस प्लांट की स्थापना की गई है। ये प्लांट गांव के 60 घरों के लोगों को महज 20 रूपये मासिक मासिक पर चार घंटे गैस की सप्लाई दे रही है। गैस की सप्लाई का समय सुबह 10 से 12 बजे और शाम 7 से नौ बजे तक रखा गया है। गोबर गैस प्लांट की स्थापना में 25 लाख रूपये खर्च आया है जिसमें मिनिस्ट्री और नेचुरल रिसोर्सेज ने 90 फीसदी सब्सिडी दी है। ये गैस प्लांट शहर के पीएनजी से मिलता जुलता है। गांव के हर घर को पाइप से गैस की सप्लाई की जा रही है। गांव में बने इस गैस प्लांट से गांव के कई लोगों को रोजगार भी मिल सका है। अमूमन हर गांव में इतने पशु होते हैं जिससे कि गोबर गैस प्लांट की स्थापना की जा सकती है। गुजरात के भुज जिले के इस गांव के माडल को अब दूसरे गांव भी अपना सकते हैं।

वैसे तो गोबर गैस प्लांट लगाने का प्रोजेट बहुत पुराना है। लेकिन गांव में वही लोग अपना स्वतंत्र गोबर गैस प्लांट लगा पाते हैं जिनके पास जानवरों की संख्या 4-6 से ज्यादा हो। लेकिन गांव में कम्यूनिटी गोबर गैस प्लांट लगाने के इस प्रोजेक्ट से पूरे गांव लोगों को फायदा होगा। गुजरात के इस प्रोजेक्ट को देश के उन तमाम गांवों में लागू किया जा सकता है जहां भी लोगों के पास पशु संपदा है। वैसे गांव जहां 50 से अधिक घर हैं ऐसे प्लांट बड़े आराम से लगाए जा सकते हैं। ऐसे प्लांट लगाए जाने से गांव के लोगों लकड़ी और गोबर के उपलों से चलने वाले चूल्हे से छुटकारा मिल सकता है। साथ ही धुआं रहित रसोई घर में गृहणियां अपनी मनमाफिक खाना बना सकती हैं। गांव में बड़ी संख्या में महिलाएं लकड़ी और उपले पर खाना बनाने के कारण सांस की बीमारियों का शिकार होती हैं उन्हें भी गोबर गैस के चुल्हे के कारण ऐसी बीमारियों से निजात मिल सकती है। साथ ही गांव के लोगों को शहर के गैस सप्लाई की तरह खाना बनाने का एक सस्ता विकल्प मिल सकेगा। जरूरत है तो बस इस प्रोजेक्ट का प्रचार प्रसार करने की।

-   -------- विद्युत प्रकाश मौर्य


हमारी बुद्धि को कमजोर कर रहे हैं सर्च इंजन

क्या गूगल हमें लाचार बना रहा है। क्या गूगल जैसे सर्च इंजनों के कारण लोगों की स्मरण शक्ति कमजोर पड़ती जा रही है। ये एक बड़ा सवाल आजकल हमारे सामने है। कुछ शोध में परिणाम सामने आया है कि गूगल जैसे सर्च इंजनों पर लगातार बढ़ती निर्भरता के कारण लोगों की स्मरण शक्ति कमजोर पड़ती जा रही है। पहले जहां कोई भी नई जानकारी लेनी हो तो हम सबसे पहले अपने दिमाग पर जोर डालते थे, लेकिन अब जब किसी के बारे में जानकारी लेने की बात सामने आती है तो लोग सर्च इंजन का सहारा लेने लगते हैं। इंटरनेट पर गूगल के अलावा बिंग, खोज, याहू सर्च जैसे कई सर्च इंजन हैं।  लेकिन गूगल पर बढ़ती आत्मनिर्भरता घातक भी हो सकती है। हो सकता है आप एक दिन वैचारिक रूप से विकलांग बन जाएं। 

याद किजिए जिस जमाने में सर्च इंजन नहीं थे आखिर कैसे काम होता था। हमें किसी भी तरह की जानकारी के लिए अपनी स्मरण शक्ति पर भरोसा करना पड़ता था, या फिर आसपास के किसी काबिल आदमी से पूछना पड़ता था। जब किसी को नहीं पता होता था तब इयर बुक रेफरेंस बुक का सहारा लिया जाता था। लोग अपनी जानकारी के लिए डायरी तैयार करते थे। अब रेफरेंस बुक, इयर बुक और लाइब्रेरी का इस्तेमाल कम हो गया है। लोग कोई भी जानकारी लेने के लिए फटाफट सर्च इंजनों का सहारा लेने लगते हैं। लेकिन सर्च इंजनों के लगातार इस्तेमाल ने जाहिर है हमें लापरवाह बना दिया है। लोगों में डायरी बनाने की प्रवृति कम हो गई है। हमलोग सब कुछ आनलाइन ढूंढना चाहते हैं। जाहिर सर्च इंजन ने कई मुश्किलें आसान तो की हैं। एक माउस के क्लिक भर से दर्जनों रिजल्ट आपकी आंखों के सामने होते हैं लेकिन इससे दिमाग का इस्तेमाल करने की प्रवृति भी कम हुई है।

वैसे भी हमें सर्च इंजनों के इस्तेमाल से मिले रिजल्ट को लेकर सावधान रहना चाहिए क्योंकि कई बार सर्च इंजन के रिजल्ट भी गलत हो सकते हैं। क्योंकि सर्च इंजन या विकिपिडिया जैसी साईटों पर जानकारी भी हमारे आपके जैसे लोग ही अपडेट करते हैं। एक ही सर्च की गई जानकारी के रिजल्ट कई बार अलग अलग भी निकल आते हैं। ऐसे में सही क्या है इसको तय करने में विवेक का इस्तेमाल भी जरूरी है। दुनिया भर में बड़ी संख्या में ब्लागर भी बन चुके हैं। ब्लाग पर भी डाली गई जानकारियां सर्च इंजन में दिखाई गई हैं। लेकिन कई बार ब्लाग पर दी गई जानकारियां गलत और भ्रामक भी हो सकती हैं।

भले ही आज इंटरनेट यूजर सर्च इंजनों का इस्तेमाल करते हैं लेकिन सूचनाओं को सहेजने के लिए आज भी डायरी लिखना अच्छी प्रवृति हो सकती है। आप जिस क्षेत्र में जानकारी बढ़ाना चाहते हों उसकी फाइलिंग करें। हर साल इयर बुक खरीदें। इससे पढ़ने और याद रखने की प्रवृति बची रहेगी। यानी सिर्फ सर्च इंजनों पर आत्मनिर्भरता सही प्रवृति नहीं है। हमेशा नई नई किताबें पढ़ते रहना और मेमोरी टिप्स को आजमाना भी अच्छा रहेगा।


-          विद्युत प्रकाश मौर्य