Friday, 30 December 2005

राजश्री ने बचा रखी है परंपरा

भले ही कई निर्माताओं ने फिल्में बनाने के सिलसिले में खुद को समय के अनुसार बदल लिया हो पर राजश्री ने अपनी परंपराओं को बचा कर रखा हुआ है। वे आज भी कहानी चुनने में पूरी सावधानी बरतते हैं और ऐसी ही फिल्में बनाते हैं जो भारतीय परिवार की सांसकृतिक परंपराओं को बचा कर रखती हो। उनका हाल में प्रदर्शित फिल्म विवाह इसी का ताजा उदाहरण है। उन्होंने उस दौर में भी जबकि छोटा परदा भी नंगापन परोसने में पीछे नहीं है एक साफ सुथरी फिल्म देने की कोशिश की है। राजश्री की फिल्मों की विशेषता रही है कि फिल्म हिट होने पर ऐसा सामाजिक प्रभाव छोड़ती है कि लोग अपनी जड़ों की ओर लौटने की कोशिश करते हैं। जब हम आपके हैं कौन सुपर हिट हुई तो शादी विवाह समारोहों में जूता जुराने की रश्म फिर से जीवित हो गई। इसके साथ ही फिल्म में पारिवारिक रिश्तों के बीच जिस सम्मान का भाव था उसे भी लोगों ने काफी गहराई से आत्मसात किया। यानी हम यों कहें कि राजश्री जब कोई अच्छी फिल्म बनाती है तो उससे समाज में कमजोर होते रिश्ते नाते को एक मजबूती मिलती है, एक नया आयाम मिलता है तो कत्तई गलत नहीं होगा।


राजश्री की हर फिल्म में भारतीयता की खूशबु होती है। हालांकि यश चोपड़ा भी कभी कभी और सिलसिला जैसी फिल्में बनाने के साथ पारिवारिक फिल्मों के लिए ही जाने जाते थे। उनकी फिल्म चांदनी, लम्हे और दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे भी इसी पृष्ठभूमि पर केंद्रित थीं। पर दिल तो पागल है के बाद यश चोपड़ा की फिल्मों का स्वरूप बदलने लगा है। उन्होंने एमटीवी और चैनल वी की पीढ़ी से प्रभावित पीढ़ी के लिए फिल्में बनानी आरंभ कर दी। दिल वाले दुल्हिनया ले जाएंगे में पूरब और पश्चिम का संगम देखने के मिला था। पर अब यश चोपड़ा की फिल्मों में पश्चिमी बयार ही बह रही है। अब यश चोपड़ा का प्रोडक्शन हाउस भी राजश्री की तरह ही बाहरी निर्माताओं से फिल्में बनवाने लगा है। पर वे सब लोग भी उसी तरह की फिल्में बना रहे हैं। 2006 में प्रदर्शित सलाम नमस्ते में तो बिल्कुल नई मान्यताएं देखने को मिली। इसमें हीरो में सभी स्त्रियोचित गुण देखे जा सकते हैं। वह इंजीनयरिंग पढ़कर भी खाना पकाने का काम करता है। पर इसके उलट राजश्री ने जिन बाहरी निर्देशकों से अपने लिए फिल्में बनावाई उन्होंने भी बिल्कुल साफ सुथरी फिल्में बनाई। कमोबेश यश चोपड़ा की राह पर कर जौहर भी चल रहे हैं। उनकी इस साल प्रदर्शित फिल्म कभी अलविदा ना कहना में कहानी का तानाबाना विवाहेत्तर संबंधों के आसपास घूमता है। हम अभी ऐसी कहानी को भारतीय परिवेश में आत्मसात करने को तैयार नहीं हैं।
हम यह नहीं कह सकते हैं कि जैसी कथानक का चयन करन जौहर और यश चोपड़ा जैसे निर्माता कर रहे हैं वैसे पात्र समाज में नहीं हैं। समाज में तो अच्छे बुरे पात्र हमेशा ही मौजूद रहे हैं। पर यह निर्माता पर निर्भऱ करता है कि वह फिल्म बनाते समय कैसे पात्रों का चयन करे। यह ध्रुव सत्य बात है कि फिल्मों का समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। लोग अपने हीरो की नकल करते हैं ऐसे में प्रोड्यूसर का दायित्व बनता है कि वह कहानी के चयन में गंभीरता बरते। इस मामले मे यश चोपड़ा और करण जौहर जैसे लोग चुक गए लगते हैं। वहीं सूरज बड़जात्या ने अपनी पारिवारिक परंपरा को न सिर्फ बचाए रखा है बल्कि उसे बड़ी ही सुंदरता से आगे बढ़ा रहे हैं।
विद्युत प्रकाश vidyutp@gmail.com

Tuesday, 27 December 2005

विंडो का ओरिजिनल साफ्टवेयर अभियान

भारत में कंप्यूटरों में जो साफ्टवेयर इस्तेमाल हो रहा है वह बड़ी संख्या में अभी भी पाइरेटेड है। अब माइक्रोसाफ्ट की कंपनी इस अभियान में जुट गई है कि लोग असली साफ्टवेयर का ही इस्तेमाल करें। हालांकि पिछले कुछ सालों से जब आप कंप्यूटर खरीदते थे तो उसमें जो साफ्टवेयर लोड करके दिए जा रहे थे वे आमतौर पर पायरेटेड यानी दूसरे शब्दों में कहें तो गैर लाइसेंसी या चोरी के ही होते थे। जैसे विंडो का कोई भी संस्करण हो या किसी तरह के इस्तेमाल किए जाने वाले साफ्टवेयर। मसलन पेजमेकर, फोटोशाप, क्वार्क एक्सप्रेस, एमएस वर्ड, एक्सेल जैसे सभी साफ्टवेयर आमतौर पर पाइरेसी से ही इस्तेमाल में आ रहे हैं। खास तौर पर जो कंप्यूटर किसी मैकेनिक से एसेंबल करके खरीदे जाते हैं उनमें पाइरेटेड साफ्टवेयर ही लोड किए जाते हैं।

जब हम कोई भी साफ्टवेयर असली खरीदना चाहते हैं तो कंप्यूटर की कीमत के साथ ही हमें साफ्टवेयरों की भी अच्छी खासी कीमत चुकानी पड़ती है। ऐसे में ग्राहक भी सोचता है कि चलो पाइरेटेड साफ्टवेयर से ही काम चला लेते हैं। अभी तक साफ्टयवेयर बनाने वाली कंपनियां भी इस मामले मे ढील देने की नीति बरत रही थीं। उनका लक्ष्य था कि लोग भले ही पाइरेसी का साफ्टवेयर इस्तेमाल करें पर धीरे धीरे लोग इसके बड़ी संख्या में उपयोक्ता बन जाएं। अब देश में कंप्यूटर उपयोक्ताओं की संख्या करोड़ों में पहुंच गई है तो कंपनियों का ध्यान अब लोगों को ओरिजिनल साफ्टवेयर इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित करने की ओर है। इसके लिए कंपनियां अखबारों में बड़े ब़ड़े विज्ञापन भी दे रही हैं।

आखिर असली ही क्यों - जब आप अपने कंप्यूटर के साथ इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं तो आपका कंप्यूटर विश्व व्यापी नेटवर्क से जुड़ जाता है। ऐसी हालात में आपके कंप्यूटर में मौजूद विभिन्न साफ्टवेयर अपनी वेबसाइटों से जुड़कर खुद को अपडेट करना चाहते हैं। ऐसे अपडेट की स्थिति में कंपनी को पता चल जाता है कि कहां उसका असली साफ्टवेयर इस्तेमाल हो रहा है और कहां पायरेटेड। असली साफ्टवेयर का इस्तेमाल करने से आपको कोई भी साफ्टवेयर फुल वर्जन में प्राप्त होता है वहीं आप उसको समय समय पर कंपनी की वेबसाइट पर जाकर अपडेट कर सकते हैं। जबकि पाइरेसी वाले साफ्टवेयर को अपडेट करने में मुश्किल आती है। अब जहां विंडो ने अपने एक्सपी और उसके आगे के संस्करणों के असली वर्जन के इस्तेमाल करने की मुहिम चला रखी है वहीं टैली और दूसरी कई कंपनियां भी ऐसा ही कर रही हैं।

फिलहाल इन साफ्वेयर कंपनियों की नजर ऐसे लोगों पर है जो व्यवसायिक यूजर हैं। जैसे बड़े दफ्तरों और बैंकों और दुकानों में कंपनियां चाहती हैं कि असली साफ्टवेयर ही इस्तेमाल हो। आने वाले समय में घरों में निजी उपयोग वाले कंप्यूटरों में भी पाइरेसी के साफ्टवेयर का इस्तेमाल करना मुश्किल हो जाएगा। अगर आप कोई नया ब्रांडेड पीसी खरीदते हैं तो आपको उसके साथ विंडो का ओरिजिनल संस्करण मिलता है साथ ही कुछ साफ्टवेयर भी मिलते हैं। अगर आप साफ्टवेयर पर पैसा लगाने को इच्छुक नहीं हैं तो आपके पास लाइनेक्स और ओपन आफिस जैसे विकल्प मौजूद हैं जो दुनिया भर में फ्री साफ्टवेयर उपलब्ध कराते हैं। इनका इस्तेमाल भी आप अपने पीसी में कर सकते हैं।
-- vidyutp@gmail.com 




Friday, 23 December 2005

नैनो टेक्नोलाजी यानी जिंदगी हुई आसान

कल्पना कीजिए की कड़कड़ाती ठंड पड़ रही हो और एक आदमी पतला सा शर्ट पहने मस्ती मे घूम रहा हो। ऐसा आने वाले दिनों में संभव है। यह सब कुछ नैनो टेक्नोलाजी के बदौलात संभव है। इसकी बदौलत सिर्फ इलेक्ट्रानिक उपकरण ही नहीं बल्कि कई चीजों को छोटा करके जीवन को आसान बनाया जा सकता है। आजकल वैज्ञानिक हर क्षेत्र में चीजों को छोटा करने की कोशिश में लगे हुए हैं। 

अब हम टीवी के पिक्चर ट्यूब का ही उदाहरण लें। परंपरागत टीवी स्क्रीन पिक्चर ट्यूब के पीछे निकलती उसकी नली के कारण वजनी और बड़े होते हैं। अभी हाल में कुछ टीवी कंपनियों ने उसमें कुछ सुधार कर 30 फीसदी चौड़ाई कम कर दी है। पर टीएफटी स्क्रीन वाले एलसीडी और प्लाज्मा स्क्रीन ने तो टीवी की दुनिया ही बदल कर रख दी है। अब ऐसा टीवी सिर्फ तीन ईंच मोटा ही होता है। आप ऐसे टीवी को सुटकेस में पैक करके कहीं भी ले जा सकते हैं। वहीं अपने घर में आप ऐसे टीवी को कहीं भी दीवार पर स्थापित कर सकते हैं। यानी दीवार में कैलेंडर की तरह टीवी टंगा हुआ दिखाई देगा। ऐसा नैनो टैक्नोलाजी की बदौलत ही संभव हो सका है। ठीक इसी तरह कंप्यूटर का भी सबसे भारी भरकम भाग मानीटर में एलसीडी स्क्रीन के आ जाने के बाद कंप्यूटर का वजन कम हो गया है। अभी एलसीडी स्क्रीन थोड़े महंगे जरूर हैं पर उनकी कीमतें लगातार गिरती जा रही हैं।

अब इस नैनो टेक का कमाल जीवन के हर क्षेत्र में दिखाई देने वाला है। आप कल्पना कर सकते हैं कि कड़कड़ाती ठंग में कोई व्यक्ति सिर्फ एक शर्ट पहने घूम रहा हो। वास्तव में उस शर्ट के उपर थीन फिल्म की ऐसी कोटिंग कर दी जाएगी जो हवा की आवाजाही तो रोकेगा ही साथ ही शरीर को उष्णता भी प्रदान करेगा। फिर शरीर पर भारी भरकरम स्वेटर डालने की कोई जरूरत नहीं रह जाएगी। यानी सरदी में कपड़ों का बोझ कम हो सकेगा। ऐसे शर्टों की दूसरी विशेषताएं भी होंगी। इन पर दाग धब्बे और खरोंचे भी नहीं लग सकेंगी। साथ ही क्रिज की भी कोई समस्या नहीं होगी। आपकी कलाई घड़ी या मोबाइल फोन पर थिन फिल्म की कोटिंग की जा सकती है जो उपकरणों के जीवन को बढ़ाएगा साथ ही उन्हें खरोंच लगने से भी बचाएगा।
नैनो टेक का इस्तेमाल सेना के लिए काफी लाभकारी सिद्ध हो सकता है। सीमा पर पहाड़ी और बरफीली वादियों में सैनिकों को भारी भरकम कीट और कपड़े आदि लेकर रहना पड़ता है। कश्मीर की वादियों रहने वाले फौजियों का कीट 35 किलो का होता है। सेना में इस बात पर भी लगातार शोध चल रहे हैं कि फौजियों के सामानों का वजन कैसे कम किया जाए। अमेरिका के नेशनल साइंस फाउंडेशन को इस बात का भरोसा का है कि 2015 तक बाजार में नैनो टेक्लनोलाजी प्रोडक्ट की बाढ़ आ चुकी होगी। लोग हर तरह की वस्तुओं में छोटी चीजें ढूंढते नजर आएंगे। एक रिपोर्ट के अनुसार ड्रग डिलेवरी सिस्टम में भी इस तकनीक का योगदान होगा। ट्यूमर थेरेपी और कैंसर की दवाओं के निर्माण में भी नैनो टेक्नोलाजी अपना महत्वपूर्ण योगदान करेगी। इससे जहां कम दवाएं लेने से काम चल सकेगा वहीं कई तरह की बीमारियों के इलाज खर्च में भी कमी आने उम्मीद है। यानी नैनो टेक न सिर्फ आपके जीवन को आसान और सुगम बनाएगा बल्कि कई तरह के खर्चों को कम भी कर सकता है।
-माधवी रंजना madhavi.ranjana@gmail.com



Saturday, 17 December 2005

जल्द आम लोगों के पहुंच में होगा इंटरनेट

वह दिन अब दूर नहीं जबकि इंटरनेट आम लोगों के बीच लोकप्रिय होता हुआ दिखाई देगा। कुछ साल पहले जब भारत में इंटरनेट आया तब तेजी से वेबसाइटों का पंजीकरण होने लगामीडिया सहित अलग अलग क्षेत्रों में कारोबार होने लगा। पर जल्द ही यह इंटनेट बूम टांय टायं फिस्स हो गया। इसका प्रमुख कारण यह था कि इंटरनेट तब देश में ज्यादा लोगों की पहुंच में नहीं था इसलिए इस माध्यम से संदेश भेजने वाले लोगों को ज्यादा सफलता नहीं मिली। पर अब स्थितियां तेजी से बदल रही हैं। अब देश में कंप्यूटरों की संख्या तेजी से बढ़ रही है वहीं इंटरनेट के वेबसाइटों की लोकप्रियता में भी इजाफा हो रहा है। अब गली गली में इंटरनेट ढाबा और साइबर कैफे खुल गए हैं। कई चीजों के लिए तो इंटरनेट की वेबसाइटें सबसे लोकप्रिय माध्यम साबित हो रही हैं। अब किसी भी परीक्षा का रिजल्ट जारी करना हो तो इंटरनेट सबसे मुफीद साधन है। क्योंकि किसी भी माध्यम से लाखों लोगों के रिजल्ट छाप कर भेजना संभव नहीं है। अखबार में छपवाना महंगा सौदा है वहीं गजट छाप कर हर जिले में भेजने में भी लंबा समय और खर्च लग जाता है। वहीं कुछ रुपए खर्च करके अब लोग कहीं भी रिजल्ट देख लेते हैं। इसी तरह किसी भी काम के लिए ठेके (टेंडरभी अब आनलाइन निकाले जा रहे हैं। इससे ठेकेदार या संबंधित लोग नियम व शर्ते कहीं भी पढ़ लेते हैं। 

शेयर कारोबार, म्युचुअल फंड और बैंकिंग, क्रेडिट कार्ड आदि के लिए भी अब इंटरनेट वरदान बन गया है। आप जहां आनलाइन शेयर ट्रे़डिंग कर सकते हैं वहीं म्युचुअल फंडों के नव (नेट एसेट वैल्यू) रोज देख सकते हैं। आप जिन सेवाओं के भी उपभोक्ता हैं उसकी वेबसाइट पर लागिन करके अपने खाते के स्टेटस को आनलाइन देख सकते हैं। अब यह सब कुछ बड़े ही कम खर्च पर उपलब्ध है।


खासकर ब्राड बैंड के सस्ता और लोकप्रिय हो जाने से देश में इंटरनेट के उपभोक्ताओं को संख्या बड़ी तेजी से बढ़ रही है। अब स्कूली विद्यार्थी इंटरनेट का इस्तेमाल करके अपने ज्ञान को बढ़ा रहे हैं। किसी भी प्रोडक्ट के बारे में सूचना प्राप्त करने के लिए इंटरनेट एक गेटवे का काम कर रहा है। कुछ साल पहले हम जिन बातों को कल्पना में कहा करते थे वे अब हकीकत बनते जा रहे हैं।
आज आप भारतीय रेल की वेबसाइट को ही देखें रोज लाखों को लोग उसे हिट करके ट्रेनों की आवाजाही के बारे में पता करते हैं साथ ही आनलाइन टिकट भी बुक करवाते हैं। वहीं किसी भी एयरलाइन के फ्लाइट शिड्यूल और सीटों की उपलब्धता और टिकट बुकिंग आदि सब कुछ इंटरनेट के माध्यम से करवाया जा सकता है। जिस सूचना को पाने के लिए अथवा जिस सुविधा का प्राप्त करने के लिए आपको पहले 100 से 200 रुपए खर्च करने पड़ रहे थे वही अब आपको 10 से 20 रुपए के खर्च करने पर ही उपलब्ध हो पा रहा है। इस प्रकार अब सही मायने में लोगों को इंटरनेट का लाभ मिलना आरंभ हो गया। इंटरनेट से आनलाइन कारोबार को भी बढ़ावा मिलने लगा है। अगर आन लाइन कारोबार नहीं भी होता है तो भी लोग किसी भी प्रोडक्ट अथवा सेवा के बारे में इंटरनेट से जानकारी प्राप्त करते हैं। इस प्रकार यह किसी प्रोडक्ट के विज्ञापन का अच्छा काम कर रहा है। मान लिजिए आपको किसी बैंक में खाता खोलना है तो आप विभिन्न बैंकों की वेबसाइटों पर जाकर उनके द्वारा दी जारही सुविधाओं का तुलनात्मक अध्ययन कर सकते हैं। इसके बाद आपको जहां अच्छा लगे वहां खाता खोलें। ऐसा ही किसी अन्य उत्पाद के बारे में भी लागू होता है।
- विद्युत प्रकाश मौर्य


Friday, 25 November 2005

नौकरी के साथ डिग्री भी

आप कोई नौकरी कर रहे हैं। इसके साथ ही आपको इससे मिलती जुलती डिग्री भी मिल जाए तो आपके लिए तो सोने में सुहागा जैसी बात हो सकती है। सोनिया ने इतिहास जैसे विषय में बीए करने के बाद काल सेंटर में नौकरी करने का निर्णय लिया तो उसके पापा को यह बात नागवार गुजरी। पर दो साल की नौकरी के बाद उसके पास मैनजमेंट का डिप्लोमा था और अब वह बाजार में बेहतर बारगेन करने की हालात में थी। यानी काल सेंटर की नौकरी के साथ उसने ठीकठाक रुपया तो कमाया ही इसके साथ ही वह दो साल में अपने फील्ड में एक और डिग्री ले चुकी थी। इसके कारण वह किसी अन्य संस्थान में इससे बड़ी नौकरी प्राप्त कर सकती है।

सीमा ने बीए करने के बाद एक स्कूल में शिक्षक की नौकरी प्राप्त कर ली। पर जल्द ही उसे लग गया कि शिक्षक की नौकरी में आगे बढ़ने के लिए डिग्री जरूरी है। उसने पढ़ाने के साथ ही एनटीटी (नर्सरी टीचर ट्रेनिंग ) का कोर्स किया। जब दो साल गुजर गए तब उसे पता चला कि वह अपने अनुभव के आधार पर प्राइवेट से बीएड भी कर सकती है। अब उसने अगले दो साल में बीएड कर लिया। इसके बाद अपने ही स्कूल के सीनियर विंग में वह शिक्षिका हो गई। नौकरी में उसे बेहतर प्रोमोशन मिला। साथ ही उसे बेरोजगारी का मुंह भी नहीं देखना पड़ा। इसी तरह हर प्रोफेशन में मिलती जुलती डिग्री प्राप्त की जा सकती है। बशर्ते आपके अंदर आगे पढ़ते रहने का हौसला होना चाहिए।


खास कर कई प्रतिष्ठित काल सेंटर में नौकरी के साथ डेस्कटाप पर ही एमबीए करने की सुविधा प्रदान की जा रही है। इसमें आप उचित फीस चुका कर नौकरी बाद कुछ समय देकर प्रबंधन में डिप्लोमा कर सकते हैं। एमबीए की डिग्री हासिल कर सकते हैं। कई काल सेंटरों में काम करने वाले युवा इस सुविधा का लाभ उठा रहे हैं। कई उच्च पदों पर आसीन लोगों के कैरियर रिकार्ड का अगर आप सूक्ष्मता से अध्ययन करें तो पाएंगे कि उन्होंने एक छोटी सी नौकरी से शुरुआत की। पर नौकरी के साथ पढ़ाई जारी रखते हुए उन्होंने उच्च शिक्षा के क्षेत्र में कदम रखे और इसका उन्हें लाभ मिला।

सिर्फ छोटी -मोटी नौकरियों में ही नहीं बल्कि आईएएस उत्तीर्ण करने वाले लोग भी अपनी नौकरी के साथ पढ़ाई करते हैं। इनमें से कई लोग तो स्टडी लीव लेकर पढ़ाई करने भी जाते हैं। खास कर जो लोग शिक्षा के क्षेत्र में हैं उन्हें पढ़ने के लिए पर्याप्त समय मिलता है। पढ़ते रहना उनके कैरियर एडवांसमेंट का हिस्सा होता है। वहीं वे अपने छात्रों को बेहतर ज्ञान दे सकते हैं अगर वे अपने विषय में लगातार अध्ययन जारी रखते हैं। जैसे कोई व्यक्ति एमए पास करके किसी कालेज में लेक्चरर के रुप में नौकरी प्राप्त कर लेता है। अगर वह आगे पीएचडी कर ले और कुछ शोध पत्र लिखे तभी वह रीडर और प्रोफेसर आदि के लिए पात्र बन सकता है। अब तो प्रिंसिपल बनने के लिए सिर्फ अनुभव ही नहीं बल्कि पीएचडी ती डिग्री अनिवार्य कर दी गई है। ठीक इसी तरह दूसरे पेशे के लोगों को भी अपनी पेशेगत पढ़ाई जारी रखनी चाहिए। जैसे अगर कोई बैंक में है तो इंडियन इंस्टीट्यूट आफ बैंकर्स से सीएआईआईबी का पाठ्यक्रम कर सकता है। इससे उसे अपने विभाग में इन्क्रीमेंट का लाभ मिलता है। यह किसी व्यक्ति की क्षमता पर निर्भर करता है कि वह अपनी पढ़ाई को लेकर कितना जागरुक है।
 -विद्युत प्रकाश

Thursday, 17 November 2005

बाजारवाद के बीच अर्थ खोते त्योहार

-राष्ट्रपति कलाम का का मानना है कि उपहार जहर के समान होते हैं। इनके लेनदेन के पीछे कोई न कोई उद्देश्य छिपा होता है।

तमाम उपभोक्ता कंपनियों की नजर सभी त्योहारों को अपने तरीके से कैश कराने पर है। ऐसे में बाजारवाद के बीच त्योहार अपना अर्थ खोते जा रहे हैं। तमाम हिंदू त्योहारों के बीच बाजार ने अपनी पैठ गहराई से बना ली है। जैसे रक्षा बंधन पर भाई बहन को क्या गिफ्ट दे इस बारे में आपको सलाह देने के लिए तमाम कंपनियों के पैकेज उपलब्ध हैं। रिश्तों में इस बाजार के घुस आने से रिश्ते अपना वास्तिवक अर्थ खोते जा रहे हैं। जिससे कई जगह रिश्तों की गरमाहट को उपहारों की कीमतों से मापा जाने लगा है। सुधीर की बहन सुमन ने इस बार अपने भाई से कहा कि तुम इस रक्षा बंधन में मुझे अमुक ब्रांड का मोबाइल फोन ही गिफ्ट करना। अब भाई का बजट उसके अनुकूल नहीं था पर उसे कहीं न कहीं से इंतजाम करके वह सब कुछ देना ही पड़ा। इसी तरह डिंपी के भांजों ने अपने अपने मामा से कहा कि इस दिवाली पर आप हमें वाशिंग मशीन और वीडियो गेम गिफ्ट कर ही दो।

उपहार का भले ही मतलब होता है कि जो अपनी मरजी और श्रद्धा से दिया जाए पर कई रिश्तों में लोग खुलकर उपहार मांगने लगे हैं। कई लोग दिल खोलकर उपहार देते हैं तो कई लोगों को मजबूरी में ही सही देना पड़ता है। इस उपहार संस्कृति का प्रभाव रिश्तों पर भी पड़ता है। दिपावली को तो अब उपहार देने लेने का ही त्योहार बना दिया गया है। सभी बिजनेस क्लाएंट अपने ग्राहकों को खुश करने के लिए उपहार देते हैं। यह कारपोरेट गिफ्ट का कारोबार तो करोड़ों में चलता है। पर रिश्तेदारी नातेदारी में भी ड्राइफ्रूट के डिब्बों से लेकर मिठाइयां और महंगे उपहारों का कारोबार खूब चलता है। मध्यम वर्गीय परिवारों को भी ढेरों उपहार खरीदने पड़ते हैं। कुछ लोग इस दौरान अक्लमंदी से उपहारों को एक दूसरे के यहां शिफ्ट करते हैं। जैसे ही दिवाली नजदीक आती है उपहारों के लेनदेन की तैयारी शुरू हो जाती है। लोग योजना बनाने लगते हैं। फलां ने मुझे पिछले साल क्या उपहार दिया था। इस बार उसको उसकी कीमत से बड़ा उपहार जवाब में देना है। कई बार यह उपहार नहीं बल्कि आपके गाल पर एक जवाबी तमाचा होता है।
उपहारों को लेकर हाल में राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम का संस्मरण याद करने योग्य है। उन्होंने बताया कि एक बार उन्हें किसी ने उपहार दिया तो कलाम के पिता ने उसे उपहार वापस कर आने को कहा। उनके पिता ने समझाया कि ये उपहार जहर के समान है। यह रिश्वत से भी बुरा है। वास्तव में जब आपको कोई उपहार देता है तो उसके पीछे उसका कोई न कोई स्वार्थ छिपा होता है। इसलिए हमें उपहारों को जहां तक हो सके नकारना ही चाहिए। अगर हम वर्तमान संदर्भ में भी राष्ट्रपति कलाम के इस संस्मरण से कोई प्रेरणा ले सकें तो बड़ी अच्छी बात होगी। अगर हम इस उपहार संस्कृति से उपर उठ कर सोचें और व्यवहार करें तभी हम भारतीय संस्कृति के इन त्योहारों का सही अर्थ को समझ पाएंगे और उसके अनुरूप आचरण करके त्योहार के महत्व को बचाए रख सकेंगे। साथ ही हर त्योहार के पीछे छूपे मर्म को समझ सकेंगे। वर्ना आने वाले पीढ़ी तो इन त्योहारों को लेनदेन के व्यापार के रुप में ही समझा करेगी।
- विद्युत प्रकाश मौर्य

Thursday, 20 October 2005

मोबाइल में समाता जा रहा है कंप्यूटर

जी हां अब मोबाइल में कंप्यूटर के कन्वरजेंस का दौर है। बाजार में ऐसे मोबाइल उपलब्ध हो रहे हैं जिनमें इंटरनेट यूज करने जैसी सुविधा उपलब्ध है। यानी ऐसे मोबाइल जिनमें कंप्यूटर जैसी कई सुविधाएं उपलब्ध हैं। इस तरह के मोबाइल हैंडसेटों की कीमत 8500 से लेकर 25 हजार के बीच है।

इस क्रम में नोकिया ने एन सीरिज के मोबाइल पेश किए हैं। ये फिलहाल जीएसएम तकनीक पर उपलब्ध हैं। इनमें याहू गो डाट काम इंस्टाल कर सकते हैं। इसके बाद याहू मैसेंजर, याहू मेल, याहू सर्च, याहू फोटोज, याहू एड्रेस बुक, कैलेंडर, रिंगटोन्स, गेम्स, लोगोज, वालपेपर्स, टास्क आदि विकल्पों का अपने मोबाइल फोन पर ही इस्तेमाल कर सकते हैं। फिलहाल नोकिया एन सीरिज के मोबाइल फोन भारत मोबाइल सेवा प्रदाता हच के साथ उपलब्ध है। पर उम्मीद है कि शीघ्र अन्य कंपनियां भी इस तरह की सेवा प्रदान करेंगी। कंपनी ने पोस्ट पेड उपभोक्ताओं के लिए यह सेवा फ्री रखी है जबकि प्रीपेड वालों के लिए 49 रुपए किराए की राशि तय की गई है।

मोटोरोला ने भी अपने मोटोरेजर रेंज के मोबाइल हैंडसेट पेश किए हैं। ये सीडीएमए और जीएसएम दोनों ही तकनीक पर उपलब्ध हैं। इसमें भी जीपीआरएस के साथ इंटरनेट उपयोग करने की सुविधा उपलब्ध है। इसके अलावे भी अन्य सभी मोबाइल बनाने वाली कंपनियां प्रीमियम रेंज में अपने ग्राहकों के लिए ऐसे महंगे मोबाइल लेकर आई हैं जिनमें कंप्यूटर अप्लिकेशन की सुविधा मौजूद है। आप कंप्यूटर की सारी सुविधाएं अपने मोबाइल में इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं पर काफी हद तक कंप्यूटर की सुविधाएं मौजूद हैं। जैसे जो लोग याहू मेल के अलावा कुछ और इस्तेमाल करते हैं उनके लिए यह कुछ खास फायदे का सौदा नहीं हो सकता है। आप यात्रा करते हुए भी सर्च इंजन का इस्तेमाल कर सकते हैं।
वहीं अब कई ईमेल सेवा प्रदाता किसी भी ईमेल एड्रेस से किसी भी मोबाइल पर एसएमएस भेजने की सुविधा मुफ्त प्रदान कर रहे हैं। वहीं कुछ वेबसाइटों ने इस सुविधा को पेड कर दिया है। यानी यह मोबाइल और कंप्यूटर के बीच धीरे-धीरे निकटता आने का दौर है।

आने वाले दौर में ऐसा मोबाइल फोन भी आएगा जिसमें आप पूरी तरह से इंटरनेट एक्सेस कर सकते हैं। आप इस पर टीवी भी देख सकेंगे साथ ही कंप्यूटर भी एक्सेस कर सकते हैं। हां आपको एक ही समस्या आएगी यह सब कुछ आपको एक छोटे से स्क्रीन में ही करना पड़ेगा। यानी कंप्यूटर टीवी की तरह बड़े स्क्रीन पर यह सब कुछ नहीं देख सकते। कुछ लोगों को इसमें असुविधा जरूर हो सकती है। पर जिन लोगों को इसमें कोई दिक्कत नहीं है उनके लिए तो ठीक है। पूरी दुनिया की सभी प्रमुख मोबाइल फोन बनाने वाली कंपनियां इन दिनों बाजार में जो फोन पेश कर रही हैं उनमें दो बातें ही प्रमुख हैं। पहला उसमें उत्तम क्वालिटी के कैमरे जोड़ना। यानी ज्यादा मेगा पिक्सेल वाले कैमरे जो बेहतर क्वालिटी की तस्वीरें खींचने की सुविधा प्रदान कर सके। इसके बाद उसमें कंप्यूटर अप्लिकेशन की आधुनिक सुविधाएं जोड़ना। जो लोग मोबाइल फोन पर बात करने के अलावा भी काफी कुछ पाना चाहते हैं उनके लिए यह सब कुछ बहुत अच्छा दीख सकता है। यानी आपका मोबाइल फोन धीरे-धीरे तब्दील हो रहा है कंप्यूटर में तो आपका कंप्यूटर बदल रहा है टेलीविजन में। कंप्यूटर में लगाएए टीवी ट्यूनर कार्ड और देखिए इसमें टीवी के सारे चैनल।
-माधवी रंजना



Thursday, 15 September 2005

आखिर कितने घंटे करें काम

हमने अपने पड़ोस में एक लड़के को देखा और उसकी कार्य कुशलता को देखकर मैं अत्याधिक प्रभावित हुआ। 18 साल का यह युवक सुबह चार बजे अपने काम में जुट जाता है। वह सुबह में छोले कुलचे का स्टाल लगाता है। फिर शाम को बर्गर और हाट डाग का स्टाल चलाता है। यानी एक दिन में दो बिजनेस। मैंने उक उत्सुकतावश उसका रूटीन जानना चाहा। उसने कहा कि वह 24 घंटे में सिर्फ चार घंटे ही सोता है। इसके बाद भी वह स्वस्थ और तंदुरुस्त है। उसके पिता का छोले कुलचे बेचने का खानदानी काम था। 

परिवार में ही यह काम सीखने के बाद उसने अपने बूढ़े पिता को इस काम से मुक्ति दे दी है। पर विरासत में मिले इस रोजगार हो उसने 18 साल की उम्र में ही दुगुना कर दिया। वह चाहता है कि वह एक दो घंटे का तीसरा कारोबार भी आरंभ करें। आमतौर पर 18 साल के लड़के कालेज जाते हैं। बाकी समय में लड़कियों से दोस्ती करते हैं। पर अपने काम की धुन में मगन है। उसने अपनी आमदनी को तो खुलासा नहीं किया पर हमारा अनुमान है कि वह इन दोनों का कारोबार से 20 हजार रुपए मासिक तक बडे़ आराम से कमाता है। यानी कि बिना किसी बड़े डिप्लोमा डिग्री के वह अच्छा खासा रुपया कमा रहा है। वह शायद पढ़ने लिखने में अपना वक्त लगाता तो भी इतना शायद नहीं कमा पाता।

अब अगर हम एक समान्य आदमी का रुटीन देंखे तो वह किसी नौकरी में आमतौर पर सात घंटे रोज देता है। बाकी के समय वह कोई काम नहीं करता। परिवार की समस्याओं में उलझा रहता है। पर जिन लोगों ने भी अपने जीवन में प्रगति की है उन्होंने 24 घंटे में सिर्फ सात घंटे ही नहीं काम किया है बल्कि उसके बाद के समय में भी अपने रोजगार को आगे बढ़ाया है। हमें मालूम है कि निरमा केमिकल्स के मालिक ने वाशिंग पाउडर बनाने के काम को पार्ट टाइम रोजगार के रुप में आरंभ किया था। 

कई लोग अपनी नौकरी के अलावा सुबह में अखबार बेचने का काम कर लेते हैं। कई लोग नौकरी के साथ ही बीमा कंपनी या म्युचुअल फंड के एजेंट के रुप में अपने कारोबार की शुरूआत करते हैं। इससे उनकी आमदनी में इजाफा होता ही है साथ ही वे अपने साथियों की तुलना में आर्थिक रुप से काफी आगे निकल जाते हैं। हमारे एक जानने वाले बैंक कलर्क ने देखा कि सिर्फ इस नौकरी से वह ज्यादा प्रगति नहीं कर सकता। उसने एक स्टेशनरी की दुकान खोली। जहां वह सुबह और शाम को मिलाकर तीन घंटे समय देता था। कुछ सालों में दुकान ने इतनी प्रगति की कि उसने एक होल सेल स्टेशनरी की दुकान भी खोल ली। नौकरी भी साथ चलती रही।

दुनिया में तमाम उद्योगपति तथा वैसे लोग जिन्होंने काफी प्रगति की है उनका अगर कैरियर का ग्राफ देखा जाए तो पाएंगे कि उन्होंने 17-18 घंटे तक रोज काम किया है। हालांकि शरीर की भी अपनी क्षमता होती है वह ज्यादा काम करने से थकता है। पर उससे सात घंटे के अलावा भी कुछ काम तो अवश्य ही लिया जा सकता है। अगर सरकारी नौकरी में काम की हकीकत पर बात करें तो अधिकांश कर्मचारी सात घंटे दफ्तर में ईमानदारी से काम नहीं करते। कई दफ्तरों के कर्मचारी तो दिन भर में जितना काम निपटाते हैं वह महज दो घंटे का ही काम होता है। आप खुद से ईमानदारी से पूछ कर देखें कि क्या आप अपनी कार्य क्षमता का पूरा इस्तेमाल कर रहे हैं। अगर नहीं तो थोड़ी मेहनत और करके आप अपने जीवन की रफ्तार को बढ़ा सकते हैं।
-         माधवी रंजना 




Monday, 1 August 2005

समझदारी से करें क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल


तेज दौड़ती भागती जिंदगी के बीच क्रेडिट कार्ड बड़े काम की चीज है। क्रेडिट कार्ड को आम भाषा में कहें तो यह आपकी उधार की खरीददारी का पावर है। पर इसका सही इस्तेमाल जरूरी है। अगर क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल समझदारी से किया जाए तो काम की चीज है। अगर थोड़ी लापरवाही हुई तो जी का जंजाल भी है। आमतौर पर जब आप क्रेडिट कार्ड बनवाते हैं तो कंपनियां आपकी एक महीने की आमदनी के तीन गुना या उससे ज्यादा भी क्रेडिट कार्ड की सीमा बनाती हैं। अगर आपके पास एक बैंक का क्रेडिट कार्ड है तो दूसरे कई बैंक वाले भी आपका कार्ड बनाने को उतावले रहते हैं। पर कई कार्डों के भंवर फंस कर कई बार लोग अपने उपर ढेर सारा उधार कर लेते हैं। उसके बाद इस उधार को चुकाने के लिए मोटी राशि ब्याज के रुप में देते रहते हैं। इन सबसे बचने के लिए जरूरी है कि आप कुछ बातों पर ध्यान दें तो कार्ड आपके लिए सुविधाजनक हो सकता है।

अपनी लिमिट में रहें - भले ही आपके क्रेडिट कार्ड की सीमा कितनी भी ज्यादा हो पर हर महीने खरीददारी उतनी ही करें जिसे आप अगले माह में चुका सकें। इससे आपको क्रेडिट कार्ड कंपनी के भारी भरकम ब्याज चुकाने से राहत मिल सकती है। आमतौर पर क्रेडिट कार्ड आपकी परचेजिंग पावर को बढ़ा देता है। ऐसे में आप कई बार ऐसी खरीददारी भी कर लेते हैं जिसकी आपको जरूरत नहीं होती। पर बाद में आपको उसका बिल तो भरना ही पड़ता है। इसलिए कार्ड का इस्तेमाल करने से पहले एक बार सोच लें कि जो चीजें आप खरीद रहे हैं उसकी आपको जरूरत है भी या नहीं। यानी क्रेडिट कार्ड के जाल में फंस कर फिजुलखर्ची को बढ़ावा न दें। 

क्रेडिट साइकिल का ध्यान रखें- हर क्रेडिट कार्ड कंपनी आमतौर पर 45 से 50 दिनों का फ्री क्रेडिट लिमिट देती है। इसको अच्छी तरह से समझना जरूरी है। दरअसल हर क्रेडिट कार्ड कंपनी यह सब कुछ एक साइकिल के तहत करती है। जैसे किसी बैंक की साइकिल 10 तारीख से 30 तारीख तक है। इसका मतलब है कि 11 तारीख को की गई खरीददारी का भुगतान अगर आपक अगले महीने की 30 तारीख तक कर देते हैं तो आपको कोई ब्याज या फाइन नहीं देना होगा। पर जैसे आप 11 के बाद आगे की तारीखों में बढ़ते हैं तो आपकी 50 दिनों की लिमिट कम होती जाती है। जैसे आपने 20 तारीख को खरीददारी की तो आपको 40 दिन की ही फ्री लिमिट मिल रही है। अगर आप 9 तारीख को खरीददारी करते हैं तो महज 21 दिन की लिमिट मिल रही है। इसलिए अगर क्रेडिट लिमिट साइकिल अवधि नजदीक हो तो कोई बड़ी खरीददारी नहीं करने में समझदारी है। जैसे आपको एक फ्रीज खऱीदना है। आप अगर 10 तारीख को यह फ्रीज खरीद लेते हैं तो उसका भुगतान उसी महीने की 30 तारीख को यानी 20 दिन बाद ही करना होगा। अगर आप एक दिन रूक जाते हैं तो आपको 50 दिनों का फ्री पीरियड मिल जाता है। 

इसके के फायदे भी - अगर देखा जाए तो यह 50 दिन का फ्री पिरियड बहुत लाभ का है। मान लिजिए आप 10 हजार रूपए का कोई सामान खरीदते हैं और आपको उसके पैसे 50 दिन बाद देने हैं तो ये 50 दिन आप बिना ब्याज चुकाए ही सेवाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसलिए हर महंगी चीज जो आप किसी ब्रांडेड स्टोर से खरीदते हैं आमतौर पर क्रेडिट कार्ड से ही खरीदना चाहिए। सिर्फ उन छोटे दुकानों पर जहां क्रेडिट कार्ड लागू नहीं होता वहां आप नकद खरीदें बाकी सभी स्थानों पर कार्ड का ही इस्तेमाल करें तो अच्छा। 

सब कुछ खरीदें कार्ड से - जब आप क्रेडिट कार्ड से कोई सामान खऱीदते हैं तो इस खरीददारी पर कुछ प्वाइंट्स मिलते हैं। इन प्वाइंट्स को आप बाद में कैश करा सकते हैं या फिर इसके बदले में कोई गिफ्ट हैंपर प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए सभी बड़ी खरीददारियां आप कार्ड से ही करें तो अच्छा है। हां अगर दुकानदार नकद खऱीदे जाने पर किसी तरह की डिस्काउंट देने की बात करता हो तो आप इस पर बारगेन कर सकते हैं।
दो कार्ड रखें-  क्रेडिट कार्ड साइकिल का बेहतर इस्तेमाल करने के लिए आप दो कंपनियों का कार्ड रख सकते हैं। यह ध्यान रखें की दोनों की खरीद की साइकिल अलग अलग हो। जब खरीददारी करने निकलें तो इस बात का ध्यान रखें कि किस कंपनी का साइकिल देर से खत्म होने वाला है। फिर उसी कंपनी के कार्ड का उस दिन इस्तेमाल करें। 

बिल पर रखें नजर - क्रेडिट कार्ड की हर चार्ज स्लिप को संभाल कर रखें। जब कार्ड का बिल आ जाए तो अपनी खरीददारी से उसका मिलान कर लें। यह देख लें कि बैंक ने सही बिल भेजा है और आपके पिछले भुगतान को एडजस्ट कर दिया गया है। कई बार बैंक बिल में गड़बड़ी कर देते हैं, इसलिए इस मामले में सावधानी जरूरी है।
- vidyutp@gmail.com

(CREDIT CARD, BANK, BILLING CYCLE ) 

Tuesday, 5 July 2005

बीमा से भी होती है बचत

जब आप बीमा करवाते हैं तो यह समझते हैं कि चलो जीवन को सुरक्षित कर लिया। पर बीमा करनावाने का मतलब सिर्फ जीवन के जोखिम से सुरक्षा ही नहीं है बल्कि आप इसके द्वारा भी रुपयों की बचत कर सकते हैं। इसलिए हर थोड़ी से आय वाले व्यक्ति को भी अपना बीमा जरूर करवाना चाहिए।

 मान लिजिए आपने 25 साल की आयु में एक बीमा करवा लिया तो आप 10 साल बाद पाएंगे कि आपने बहुत बड़ी राशि बचत कर ली है। वास्तव में बीमा के रुप में बचत की जाने वाली राशि अनिवार्य बचत के रुप में हर तिमाही, छमाही या सालाना किश्त के रुप में जमा होती जाती है। इसका फायदा आपको कई सालों बाद जाकर दिखाई देता है।

कम उम्र में करें प्रवेश - आमतौर पर लोग बीमा आयकर बचाने के लिए ही करवाते हैं। यह सही है कि बीमा आयकर बचाने का अच्छा साधन है। पर जो लोग आयकर की सीमा में नहीं आते हैं उन्हें भी बीमा करवा लेना चाहिए। अगर आप कोई भी बीमा पालिसी जितनी छोटी उम्र में खरीदते हैं उसमें आपको प्रीमियम की राशि भी कम देनी पड़ती है। साथ ही जब आप आयकर की सीमा में आएंगे आप अपने बीमा में की गई सालाना बचत पर आयकर में छूट का लाभ ले सकते हैं।


नौनिहालों का बीमा कराएं- अगर आपके घर किसी नई संतान का आगमन हो तो उसके नाम भी बीमा जरूर कराएं। अगर आप उसके जन्म के साल से ही बचत की शुरूआत कर देते हैं तो 20 साल की उम्र के होने पर एक अच्छी खासी राशि जमा हो जाती है। जो बेटे के कैरियर संवारने में या बेटी की शादी में मददगार हो सकता है। 


बचत का अच्छा विकल्प -आजकल बाजार में ऐसी बीमा पालिसियां भी मौजूद हैं जो बीमा के साथ ही बचत करने का भी अच्छा विकल्प प्रदान करती हैं। इसलिए कोई भी बीमा कराने से पहले अलग अलग कंपनियों द्वारी दी जा रही बीमा पालिसियों का अच्छी तरह अध्ययन कर लें। फिर आप देखें की कोई नसी पालिसी आपके काम की है। जैसे कुछ पालिसियां म्यूच्यूल फंड के बाजार से लिंक्ड होती हैं। उनमें आपके रुपए तेजी से बढ़ते हैं। यानी बीमा के साथ अच्छा रिटर्न भी।

अगर आपके पास किसी साल निवेश करने को अतिरिक्त पैसा है तो आप अपनी बीमा पालिसी में ही टाप अप कर सकते हैं। इसके लिए किसी और फंड में जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। बाजार में आजकल जीवन बीमा निगम के अलावा एक दर्जन निजी बीमा कंपनियों के भी विकल्प मौजूद है। कोई भी बीमा करवाने से पहले कंपनियों द्वारा दिए जाने वाले आफरों का अच्छी तरह अध्ययन कर लें। इससे आपको कई तरह के लाभ हो सकते हैं। हर बीमा में एक फ्री लुक पीरियड भी होता है। अगर आपको बीमा की शर्तें मंजूर नहीं हैं तो आप अपना बीमा रद्द करवा कर पैसे वापस भी ले सकते हैं।
 


-         विद्युत प्रकाश मौर्य   vidyutp@gmail.com

( BIMA, LIC, SAVING, BANK  )