Monday, 26 March 2018

दास बाबू का जूता ( कहानी )

हर किसी की अपनी अपनी किस्मत होती है, लेकिन भला जूते की...जूते की भी कोई किस्मत होती है। जूते तो पांव में रौंदे जाने के लिए ही होते हैं, चाहे वे अमीर के पांव में हों या फिर गरीब के पांव में। लेकिन नहीं जनाब जूतों की भी अपनी किस्मत होती है। हमें याद आता है दास बाबू का जूता। जो कई सालों तक अपनी किस्मत पर रश्क फरमाता रहा।

वैसे तो एक जूता मेरे पास भी था जो अपनी अच्छी किस्मत लिखवा कर लाया था। वह हमें ज्यादा सुख नहीं दे सका पर खुद अच्छा खासा सुख भोग कर रुखसत हुआ। वह जूता मुझे अपनी शादी में ससुराल से मिला था। ससुर जी ने खुद एक जाने माने ब्रांड का जूता स्टोर से जाकर दिलवाया था। कीमत होगी कुछ तीन हजार रुपये। अब इतना महंगा जूता था सो हम भी उसे बड़े जतन से पहनते थे। शादी के बाद खास खास मौकों पर उसे निकालते थे। दिल में हसरत थी कि शादी का जूता है सो बीवी की तरह ये भी लंबा साथ निभाए। इसलिए जस की तस धर दीनी चदरिया की तर्ज पर हम भी अपने प्यारे जूते को खास मौकों पर पहनते फिर उसे बड़े जतन से पालिश करके रख देते थे।

दो साल में कुल जमा छह सात बार जूते को पहना होगा, एक दिन जब जते को निकाला तो उसका सोल ( पेंदी) क्रेक (टूट) कर गया था। बड़ा दुख हुआ जूते का हश्र देखकर। हम जूते के साथ पहुंचे उस कंपनी के शोरूम में। सारा वाकया सुनकर शोरुम वाले ने समझाया हमारी कंपनी अपने महंगे जूतों में खास किस्म का सोल ( पेंदा ) लगाती है। आपको इस जूते को लगातार पहनना चाहिए था जिससे जूता सांस ले पाता। अब आपने जूते को ज्यादातर समय पैक करके रखा तो उसका अंत ऐसा ही होना था। मुझे बड़ा दुख हुआ अपने ससुराली जूते का ये अंजाम देखकर। खैर कहानी भटक गई थी मैं आपको सुनाने चला था दास बाबू के जूते की कहानी...और कहां अपने जूते की बात सुनाने लगा।


दास बाबू के जूते के बारे में जानने से पहले थोड़ा सा दास बाबू के पृष्ठभूमि के बारे में जान लेना जरूरी है। दास बाबू बिहार के एक बाढ़ प्रभावित जिले के गांव से आते थे। बचपन उनका गरीबी में गुजरा था। स्कूली शिक्षा में  दसवीं क्लास तक तो चप्पल भी नहीं पहनी थी। कालेज पहुंचे तो हवाई चप्पल पहनना शुरू किया। पढ़ाई में होशियार थे। लेकिन घर की खराब माली हालत के बीच बड़ी मुश्किल से बीए पास किया। किस्मत ने साथ दिया बैंक में मैनेजर की नौकरी लग गई। वैसे तो आफिसर हो गए थे लेकिन रहन सहन में कोई बदलाव नहीं आया था। कुल जमा दो शर्ट और दो पैंट बनवा रखी थी। एक लेदर का चप्पल पहन कर दफ्तर जाते थे। दफ्तर से आने के बाद लूंगी और बनियान में आ जाते। रात का खाना खुद बनाकर खाते। खाना बनाने से पहले चावल चुनकर उसकी सफाई करते। इस दौरान बीबीसी पर खबरें सुनते और देश दुनिया के हालात से खुद को बाखबर रखते।

एक दिन उनके सहकर्मियों ने सलाह दी। दास बाबू अब आप अधिकारी हो गए हैं सो इन चप्पलों में दफ्तर आना शोभा नहीं देता। सो आप एक जोड़ी जूता खरीद लिजिए। दास बाबू ने टका सा जवाब दिया- इंसान की फितरत उसके जूतों, कपड़ों से नहीं उसकी दिमाग से होती है। जवाब तो दे दिया लेकिन जूतों वाली बात कहीं न कहीं दास बाबू के दिमाग में बैठ गई। अगले दिन से वे अपने सहकर्मियों के जूतों पर नजर रखने लगे। उन्होंने पाया कि उनके जूनियर किरानी टाईप के लोग भी चमचमाते जूते में दफ्तर आते हैं। सो एक दिन वे अपने सहकर्मी के साथ बाजार गए तो जूता खरीदने को तय कर लिया। तब के लोकप्रिय ब्रांड बाटा के शोरूम में गए। वहां से बाटा का सम्मानित जूतों का माडल यानी एंबेस्डर जूतों की एक जोड़ी खरीद ही लिया। शोरूम के मैनेजर ने कैशमेमो के साथ गत्ते के डिब्बे में जूता लाकर उन्हें सौंप दिया।

अपना जूता लेकर दास बाबू उस दिन जब घर को लौटे तब रिक्शा पर बैठने के बाद अपने सहकर्मी को दुनिया के तमाम जूतों के ब्रांड के बारे में बताने लगे जिनके जूते भारत में तब नहीं मिलते। कहने का मतलब कि उनको जूतों की तमाम कंपनियों के नाम मालूम थे। अब वे हक से जूतों की अच्छाई बुराई के बारे में चर्चा कर सकते थे, क्योंकि एंबेस्डर खरीदकर वे इलीट क्लब में शामिल हो गए थे।
घर आकर दास बाबू ने अपने जूते के पैकेट को अपने रैक पर किताबों के ऊपर रख दिया। जूते का डिब्बा कुछ इस तरह रखा था कि बाटा एंबेस्डर कमरे में आने वालों को पहली नजर में ही दिखाई दे जाता था। लेकिन यह क्या अगले दिन दास बाबू अपनी पुरानी चप्पल में ही दफ्तर गए। शाम को दफ्तर से लौटने पर मुझसे रहा नहीं गया, हमने पूछ ही डाला जूता खरीद लिया तो उसे पहन कर क्यों नहीं गए। दास बाबू बोले अब जूता ले लिया इसका मतलब ये तो नहीं कि इसे आज ही पहन लिया जाए। कुछ दिन गुजर गए। एक दिन दफ्तर में चेयरमैन के साथ सभी अधिकारियों की बैठक थी। हमलोगों ने सलाह दी- चाचा जी आज तो आप जूता धारण कर ही लिजिए। उस दिन दास बाबू की इच्छा हुई की नए जूते का उद्घाटन कर ही डालें। पर एक मुश्किल आ गई। जूता खरीद लिया था पर उसका मोजा नहीं खरीदा था। सो दास बाबू बैठक में चप्पल में ही चल पड़े या यूं कहिए की जाना पड़ा।

शाम को दास बाबू जूते से मैचिंग का मोजा, जूते साफ करने वाला ब्रश, पालिश व क्रीम भी लेकर आ गए। हालांकि अगले दिन भी उन्होंने जूते को धारण नहीं किया। उन्होंने कहा कि कोई खास मौका आएगा उस दिन जूता पहनूंगा। दास बाबू हर शनिवार को अपने गांव चले जाते थे। वे सोमवार को वापस लौटते थे। हर सोमवार को वापस लौटने पर अपने जूते को डिब्बे से निकालते। बड़ी हशरत से उसे देखते थे। उसे ब्रश से चमका कर फिर डिब्बे में पैक कर देते।

एक दिन दास बाबू का चेयरमैन के साथ दौरा लगा। दियारा क्षेत्र में जाना था जांच पड़ताल के लिए। मैंने सलाह दी चेयरमैन के साथ जा रहे हैं तो जूते पहन कर जाएं। गांव में लोग देखेंगे दो अफसर आए हैं। लेकिन दास बाबू को मेरी सलाह रूचिकर नहीं लगी। उन्होंने तर्क दिया- गांव में जीप से उतरकर पैदल घूमना होगा। क्या ये अकलमंदी होगी कि इतने महंगे जूते को गांव की धूल में खराब किया जाए। मुझे उनके साथ सहमत होना पड़ा। जूते का मुहुर्त नहीं हो सका।

मुझे याद आया गांव में कीचड़ पंकीले रास्ते होते हैं तो गांव के लोग इससे अपने जूतों की संभाल करते हैं। मेरे गांव के कंजूस दादा जी जब किसी रिश्तेदारी में जाते थे, तब अपनी पनही को गमछे में बांध कर नंगे पांव जाते थे। जब रिश्तेदारी के गांव की सीमा में पहुंच जाते थे तब जूते तो गमछे से निकाल कर पांव साफ करके पहन लेते थे। गांव के तमाम लोगों को सालों भर जूते चप्पल पहनने की आदत नहीं होती। खैर लौटते हैं दास बाबू के पास।

बैंक एक सहयोगी की शादी थी। उसने दास बाबू को भी बारात में चलने के लिए आमंत्रित किया। मैंने सलाह शादी में जा रहे हैं नए जूते पहन लिजिए।लेकिन दास बाबू ने कहा नहीं शादी में भीड़ भाड़ होती है। लोग एक दूसरे का पांव कुचल देते हैं। मेरे नए जूते का कबाड़ा हो सकता है। फिर शादियों में जूते चुराने का भी रिवाज है। इसलिए अच्छा यही होगा कि मैं अपने पुराने चप्पलों में ही शादी में जाऊं। उनका तर्क सोलह आने सही था। फिर जूते की किस्मत नहीं खुली। शादियों के मौसम के बाद बरसात का मौसम आ गया। इन चार महीने जूते पहनना दास बाबू की नजर में अक्लमंदी बिल्कुल नहीं थी। न जाने कब बारिश में फंस जाएं महंगे लेदर के जूते का सत्यानाश हो जाए।

फिर मौसम बदला। बैंक के चेयरमैन का तबादला हो गए। नए चेयरमैन आ रहे थे। स्वागत समारोह व विदाई पार्टी का आयोजन साथ साथ था। अब दास बाबू को भी पार्टी में जाना था। जूते खरीदे छह महीने से ज्यादा हो चुके थे। मैंने सलाह दी ये पार्टी आपके जूते पहनकर जाने के लिए ठीक रहेगी। दास बाबू को सलाह जंच गई। शुभ मुहुर्त आ चुका था। दास बाबू दिन में दफ्तर तो चप्पल में ही गए। शाम को पार्टी में जाने से पहले दास बाबू अपने कमरे में आए बड़े जतन से जूते को पहना। नए जूते को पहनकर चलने में दास बाबू को मानो से कुछ परेशानी हो रही थी। वे खुद को असहज महसूस कर रहे थे। तीन घंटे की पार्टी में वे बार बार नीचे झुक कर अपने जूते को निहार रहे थे। कई बार तीरछी नजर से अपने जूते को देख लेते थे। पार्टी में कई लोगों उनकी पर्सनलिटी की तारीफ की। 

दास बाबू को लगा कि इसमें जरूर मेरे जूतों का भी कुछ योगदान है। पार्टी से लौटे तो अपने नए जूतों के साथ सहज हो चुके थे। देर रात अपने कमरे में पहुंचने के बाद बड़े जतन से अपने जूतों को उन्होंने उतारा। उसकी सफाई की और फिर से डिब्बे में पैक कर दिया। अगले दिन से दास बाबू फिर अपनी पुरानी चप्पल में ही दफ्तर जाने लगे। मुझे याद आता है कि अगले एक साल में उन्होंने अपने प्यारे जूते को दो बार और पहना होगा। दरअसल में इतने मंहगे जूते को पहन कर जिस दिन जाते उन्हें लगता मानो वे अपने जूतों का शोषण कर रहे हों। जूते का डिब्बा अभी भी किताबों की रैक पर सबसे ऊपर सुशोभित हो रहा था। हमलोगों ने कई बार कहा जूते डिब्बे को सबसे नीचे रखें, लेकिन वे नहीं माने। उनका जूता प्रेम किताबों पत्र पत्रिकाओं से उपर था।

उत्तर कथा-
कहानी में लोग अक्सर जानना चाहते हैं फिर क्या हुआ। तो लिजिए साहब आते हैं क्लाइमेक्स पर। दो साल गुजर गए थे। दास बाबू ने जूता कुल जमा तीन बार ही पहना था। होली की छुट्टियां आईं। तीन दिनों के लिए दास बाबू और हम सब लोग अपना कमरा बंद करके अपने अपने घर चले गए। इन छुट्टियों में कोई छोटा-मोटा चोर हमारे कमरे का ताला तोड़कर दाखिल हुआ। उसने पूरा कमरा छान मारा। उसे चुराने लायक कोई वस्तु नहीं मिली। चोर बड़ा दुखी हुआ। उसने सारे डिब्बे खोल कर देखना शुरू किया। उसने जूते वाला डिब्बा देखा। बिल्कुल नए चमचमाते जूते। चोर ने फटाफट उन जूतों को अपने पांव में धारण किया। हां उसने अपनी चप्पलों को इस डिब्बे में स्थापित कर दिया। और रफ्फूचक्कर। होली की छुट्टी के बाद दास बाबू लौटे। सारी खबर मिली। दास बाबू शोकग्रस्त हो गए। मन ही मन उन्होंने तय कर लिया था अब फिर कभी जूते नहीं खरीदेंगें। दास बाबू जूता अब किस हाल में है ये इस कहानीकार को भी नहीं मालूम।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य
( 2013 )      


Wednesday, 14 March 2018

ब्रह्मांड के रहस्यों से पर्दा उठाने वाला वैज्ञानिक

1965 में शादी के वक्त ( फोटो - द विंटाज न्यूज)
स्टीफन हॉकिंग को आधुनिक युग के बड़े वैज्ञानिक थे। उन्हें खासतौर पर ब्रह्मांड के रहस्यों पर से पर्दा उठाने के लिए जाना जाता है। हॉकिंग ने अपनी थ्योरी ऑफ एवरीथिंग में बताया था कि ब्रह्मांड का निर्माण स्पष्ट रूप से परिभाषित सिद्धांतों के आधार पर हुआ है। उन्होने ईश्वर के अस्तित्व को साफ तौर पर नकारा था। बिग बैंग थ्योरी और ब्लैसक होल पर उनके खोज ने सबको चकित कर दिया था। मशहूर भौतिक विज्ञानी और कॉस्मोलॉजिस्ट ने अपना जीवन ब्रह्मांड के रहस्यों  का पता लगाने के लिए समर्पित कर दिया था। स्टी फेंस ने विज्ञान को ही अपनी नियति माना और वैज्ञानिक सोच पर आधारित कई ऐसी बातें सामने रखीं, जिनसे ब्रह्मांड की समझ में बदलाव लाने वाला क्रांतिकारी मोड़ आए।

स्टीफन तार्किक दिमाग वाले व्यक्तियों थे और उन्हों ने सृष्टि  की रचना में कभी भगवान की मौजूदगी को नहीं माना। वह अपने दिमाग को भी एक कंप्यूटर ही मानते थे। उनका कहना था कि जिस दिन इसके पुर्जे खराब हो जाएंगे, उस दिन मैं भी नहीं रहूंगा। वह पुर्नजन्म में भी कोई सच्चाई नहीं मानते थे।

मजेदार बात है कि स्टीफन कॉलेज में गणित पढ़ना चाहते थे। उनके पिता ने उन्हें मेडिकल की पढ़ाई करने की सलाह दी थी। कॉलेज में गणित विषय उपलब्ध नहीं था, ऐसे में उन्होंने भौतिकी को चुना। तीन साल बाद उन्हें नेचुरल साइंस में फर्स्ट क्लास ऑनर्स डिग्री मिली। वह 1973 का साल था जब 21 साल के स्टीकफन हॉकिंग ऑक्सफोर्ड से भौतिकी में प्रथम श्रेणी से डिग्री लेने के बाद कॉस्मोलॉजी में पोस्टग्रेजुएट रिसर्च करने के लिए कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय चले गए। उसके बाद कैंब्रिज उनका स्थायी ठिकाना बन गया।

ब्लैक होल के बारे में
हॉकिंग ने बताया था कि ब्लैक होल का आकार सिर्फ बढ़ सकता है, ये कभी भी घटता नहीं है। ब्लैक होल के पास जाने वाली कोई भी चीज उससे बच नहीं सकती और उसमें समा जाती है और इससे ब्लैक होल का भार बढ़ता ही जाएगा। ब्लैक होल का भार ही उसका आकार निर्धारित करता है जिसे उसके केंद्र की त्रिज्या से नापा जाता है। ये केंद्र (घटना क्षितिज) ही वह बिंदू होता है जिससे कुछ भी नहीं बच सकता। इसकी सीमा किसी फूलते हुए गुब्बारे की तरह बढ़ती रहती है। हॉकिंग ने आगे बढ़कर बताया था कि ब्लैक होल को छोटे ब्लैक होल में विभाजित नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा था कि दो ब्लैक होल के टकराने पर भी ऐसा नहीं होगा। हॉकिंग ने ही मिनी ब्लैक होल का सिद्धांत भी दिया था।

खुद को नास्तिक बताया
स्टीफन हॉकिंग ने कहा था कि भगवान का अस्तित्व नहीं है और मैं 'नास्तिक' हूं। साल 2014 में स्टीफन ने एक साक्षात्कार में कहा था कि सेंट अल्बंस स्कूल में एक स्कूल के लड़के के रूप में उन्होंने ईसाई धर्म के बारे में अपने सहपाठियों के साथ तर्क किया और कॉलेज के दिनों में भी वह एक प्रसिद्ध नास्तिक थे। उनकी पहली पत्नी जेन ईसाई धर्म पर पक्का विश्वास करने वाली महिला थी।मगर, उन दोनों के बीच भी कभी धार्मिक मामलों को लेकर एक मत नहीं रहे थे। दुनिया के महान वैज्ञानिकों में शुमार स्टीफन हॉकिंग ने संसार के सृजन में ईश्वंर की भूमिका को लेकर भी एक अलग तरह का सिद्धांत दिया।

दुनिया को बनाने वाला कोई भगवान नहीं ( हॉकिंग की जुबानी ) 
मेरा मानना है कि कोई भगवान नहीं है। किसी ने भी हमारे ब्रह्मांड नहीं बनाया है और कोई भी हमारे भाग्य को निर्देशन नहीं करता है। यह दुनिया भौतिकी के नियमों के मुताबिक अस्तित्व में आई है। ब्रह्मांड की रचना को एक स्वतः स्फूर्त घटना है। जिस बड़े धमाके यानी बिग बैंग के बाद धरती और अन्य ग्रहों का जन्म हुआ वह वैज्ञानिक दृष्टि से अवश्यंभावी था। ब्रह्मांड एक भव्य डिजाइन है, लेकिन इसका भगवान से कोई लेना देना नहीं है।

अगर हमारे सौर मंडल जैसे दूसरे सौर मंडल मौजूद हैं तो यह तर्क गले नहीं उतरता कि ईश्वर ने मनुष्य के रहने के लिए पृथ्वी और उसके सौर मंडल की रचना की होगी। ब्रह्मांड में गुरुत्वाकर्षण जैसी शक्ति है इसलिए वह नई रचनाएं कर सकता है उसके लिए उसे ईश्वर जैसी किसी शक्ति की सहायता की आवश्यकता नहीं है। हम एक बहुत ही औसत तारे के एक छोटे ग्रह पर बसे बंदरों की उन्नत नस्ल हैं। मगर, हम ब्रह्मांड को समझ सकते हैं। यह बात हमें बहुत खास बना देती है। धर्म और विज्ञान के बीच एक बुनियादी अंतर है। धर्म जहां आस्था और विश्वास पर टिका है, वहीं विज्ञान ऑब्जर्वेशन (अवलोकन) और रीजन (कारण) कारण पर चलता है। विज्ञान जीत जाएगा क्योंकि यह काम करता है। हम सभी जो चाहें, उस पर विश्वास करने के लिए स्वतंत्र हैं।
अगर ईश्वर के बारे में कोई पक्का सिद्धांत बन सके तो वह विज्ञान की सबसे बड़ी कामयाबी होगी,तब हमारे पास ईश्वर के दिमाग को समझने का बच जाएगा। मैं हमेशा से ही सृष्टि की रचना पर हैरान रहा हूं। समय और अंतरिक्ष हमेशा के लिए रहस्य बने रह सकते हैं, लेकिन इससे मेरी कोशिशें नहीं रुकी हैं।

मानव को दूसरा घर खोजने की दी थी सलाह

स्टीफेन हॉकिंग ने कहा था कि इस धरती की उम्र ज्यादा नहीं बची है। अगर मानव प्रजाति को बचाना है तो अगले कुछ सौ सालों में हमें पृथ्वी से अलग किसी दूसरे ग्रह पर अपना घर तलाशने की शुरुआत कर देनी होगी। उन्होंने एक थ्योरी की माध्यम से इस बात की संभावना जाहिर की थी कि आने वाले कुछ सौ या हजार सालों में पृथ्वी पर क्लाइमेट चेंज,  महामारी,  जनसंख्या वृद्धि या एस्टेरॉयड के टकराने जैसा कोई बड़ा हादसा हो सकता है। अगर हम ब्रह्मांड में दूसरा घर तलाश लेंगे तो ही मानव प्रजाति को बचाया जा सकता है।

द थ्योरी ऑफ एवरीथिंग समेत कई बेस्ट सेलर किताबें लिखीं

1974 में ब्लैक होल्स पर असाधारण तौर पर शोध करके उसकी थ्योरी में नया मोड़ देने वाले स्टीफन हॉकिंग द ग्रैंड डिजाइन,  यूनिवर्स इन नट शेल,  माई ब्रीफ हिस्ट्री,  द थ्योरी ऑफ एवरीथिंग जैसी पुस्तकें लिखीं। इन पुस्तकों ने उनकी वैज्ञानिक समझ और चिंतन को दुनिया के सामने रखा। 1988में उन्हें सबसे ज्यादा चर्चा मिली थी, जब उनकी पहली पुस्तक 'ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम: फ्रॉम द बिग बैंग टू ब्लैक होल्स' प्रकाशित होकर बाजार में आई। इसके बाद कॉस्मोलॉजी पर आई उनकी पुस्तक की 1 करोड़ से ज्यादा प्रतियां बिक गईं। इसे दुनिया भर में विज्ञान से जुड़ी सबसे ज्यादा बिकने वाली पुस्तक माना जाता है।

2014 में स्टीफन के जीवन पर फिल्म आई 

दुनिया के सबसे प्रसिद्ध भौतिकीविद और ब्रह्मांड विज्ञानी पर 2014 में थ्योरी ऑफ एवरीथिंग नामक फिल्म भी बन चुकी है। इस फिल्मा में स्टी1फन का किरदार एडी रेडमेने ने निभाया था। इसके लिए उन्होंसने उस साल बेस्ट  एक्ट र का ऑस्कएर पुरस्कार भी जीता। निर्देशक जेम्स मार्श ने निर्देशन में बनी इस फिल्म को 87वें एकेडमी अवॉर्ड्स में कुल पांच नोमिनेशन मिले थे। अभिनेत्री फेलिसिटी जोन्स नेफिल्म में उनकी पार्टनर की भूमिका निभाई थी।

फिल्म में निजी जिंदगी समाने आई

स्टीफन हॉकिंग ने 1965 मे जेन से शादी की थी। फिल्म थ्योरी ऑफ एवरीथिंग से स्टी5फन की निजी जिंदगी और इसकी हलचल लोगों के सामने आई थी। और साथ ही इस बात का खुलासा भी हुआ था कि उनकी पत्नी जेन के साथ बेहद प्याकर भरा रिश्ताउ कैसे वक्तस के साथ कड़वाहट में बदल गया। पहली पत्नी जेन ने फिल्म‍ की रिलीज के बाद एक साक्षात्कार में कहा था कि बीमारी के बावजूद मैं उनसे पहले जैसा प्यार करती थी। लेकिन एक दिन आया जब स्टीफन और मुझे अलग होना पड़ा। कई बार वो अपना पूरा हफ्ता अपनी कुर्सी पर बिता देते थे। वो कई बार मुझे और हमारे बच्चों को देखते भी नहीं थे। अपनी हालत के बारे में बताते नहीं थे। रिसर्च के बाद वो एक हस्ती बन चुके थे। मुझे इस बात से जलन नहीं थी, लेकिन इस वजह से हमारे रिश्तों में परेशानी आने लगी थी।

1995 में दूसरी शादी की
1995 में पहली पत्नी जेन से अलग होने के बाद स्टीफन ने अपनी नर्स एलेन मेसन से शादी कर ली।2006 में इन दोनों का भी तलाक हो गया। हॉकिंग की बेटी लूसी ने एलेन पर केस किया था वो हॉकिंग के साथ अमानवीय व्यवहार कर रही थीं। लेकिन 2004 में इस केस की जांच पूरी हुई और एलेन इस मुकदमे से बरी हो गईं। 

आइंस्टीन के जन्मदिन के दिन दुनिया छोड़ी
आइंस्टीन और हॉकिंग में कई समानताएं देखी जाती हैं। अल्बर्ट आइंस्टीन के बाद दुनिया केस्टीफन हॉकिंग को दुनिया का सबसे महान सैद्धांतिक भौतिकीविद माना जाता है। पर यह संयोग ही कहा जाएगा कि स्टीफन हॉकिंग की निधन का दिन और आइंस्टीन की जन्म का दिन एक ही यानी 14 मार्च है।

हॉकिंग का भारत का यादगार दौरा

साल 2001 में स्टीफन हॉकिंग ने भारत का यादगार दौरा किया था। यह उनका पहला भारत दौरा था, जो उनके लिए बेहद यादगार रहा था। कुल 16 दिन की भारत यात्रा पर आए स्टीफन हॉकिंग ने दिल्ली  और मुंबई का दौरा करने के साथ ही तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायणन से भी मुलाकात की थी। उन्होंने कुतुब मीनार और जंतर-मंतर भी देखा था। इस दौरान वे दिल्ली के संसद मार्ग स्थित जंतर-मंतर को देखने भी पहुंचे थे। तब जंतर मंतर के गाइड प्रेम दास ने उन्हें जंतर मंतर जो कि वेधशाला है उसके बारे में जानकारी दी थी।

हॉकिंग जब भारत आए थे तो उन्होंने कहा था कि भारतीय गणित और फिजिक्स में काफी अच्छे होते हैं। उन्होंने मुंबई स्थित टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च में अंतरराष्ट्रीय फिजिक्स सेमिनार को भी संबोधित किया था। स्ट्रिंग 2001 कॉन्फ्रेंस के दौरान उन्हें प्रथम सरोजिनी दामोदरन फैलोशिप से भी सम्मानित किया गया था। उन्होंने भारत में ओबरॉय टावर्स होटल में अपना 59वां जन्मदिन भी मनाया था।

दुर्लभ बीमारी के साथ 55 साल जीवित रहे...

स्टीफन हॉकिंग ने शारीरिक अक्षमताओं को पीछे छोड़ते हु्ए यह साबित किया था कि अगर इच्छा शक्ति हो तो इंसान कुछ भी कर सकता है।  8 जनवरी, 1942 को इंग्लैंड को ऑक्सफोर्ड में दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जन्मे स्टीफन अपने जीवन के  55 साल तक मोटर न्यूरॉन नामक दुर्लभ बीमारी से पीड़ित रहे।  घुड़सवारी और नौका चलाने के शौकीन स्टीलफन  1963 में पहली बार हॉकिंग को मोटर न्यूरॉन बीमारी का पता चला। तब डॉक्टरों ने कहा था कि उनके जीवन के सिर्फ दो साल बचे हैं। आमतौर पर इस बीमारी से ग्रस्त मरीज 3 से 10 साल तक ही जी पाते हैं, लेकिन हॉकिंग ने इस लाइलाज बीमारी के साथ भी 55 साल तक जीवित रहे। स्टीफन हॉकिंग ह्वीलचेयर के जरिए हीचलफिर पाते थे। इस बीमारी के साथ इतने लंबे अरसे तक जीवित रहने वाले वे पहले शख्स थे। वह बोल और सुन नहीं पाते थे और मशीनों की मदद से उन्होंयने इतने साल तक विज्ञान में शोध जारी रखा। 

इस बीमारी में दिमाग का मांसपेसियों पर नियंत्रण खत्म हो जाता है। रीढ़ की हड्‌डी की नसें काम करना बंद कर देती हैं। इसमें शरीर की नसों पर लगातार हमला होता है और शरीर के अंग धीरे-धीरे काम करना बंद कर देते हैं और व्यक्ति चल-फिर पाने की स्थिति में भी नहीं रह जाता है। मोटर न्यूरॉन नर्व सेल होती है जो मांसपेसियों को इलेक्ट्रिकल सिग्नल भेजती है, जिससे हमारे शरीर का संचालन होता है। आमतौर पर यह बीमारी 40 साल के बाद के लोगों को होती है लेकिन कई बार कम उम्र के लोगों को भी हो जाती है।

पुरस्कार और सम्मान
12  मानद डिग्रियां और अमेरिका का सबसे उच्च नागरिक सम्मान प्राप्त हुआ।
1978 - अल्बर्ट आइंस्टीन पुरस्कार
1988 - वॉल्फ प्राइज
1989 - प्रिंस ऑफ ऑस्टुरियस अवाडर्स
2006 - कोप्ले मेडल
2009 - प्रेसिडेंशियल मेडल ऑफ फ्रीडम
2012 - विशिष्ट मूलभूत भौतिकी पुरस्कार।

डेटलाइन स्टीफन हॉकिंग
    1942 में 8 जनवरी को स्टीफन हॉकिंग का ब्रिटेन में जन्म हुआ।
    1959 में हॉकिंग ने ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में स्नातक की पढ़ाई शुरू की
    1965 में 'प्रॉपर्टीज ऑफ एक्सपैंडिंग यूनिवर्सेज' विषय पर अपनी पीएचडी पूरी की थी।
    1970 में एक शोधपत्र प्रकाशित कराया जिसमें दर्शाया कि ब्रह्मांड ब्लैक होल के केंद्र से ही शुरूहुआ होगा।
    1973 में कॉस्मोलॉजी में पोस्टग्रेजुएट रिसर्च करने के लिए कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय चले गए।
    1988 उनकी पुस्तक 'ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम: फ्रॉम द बिग बैंग टू ब्लैक होल्स' प्रकाशित हुई।
    2014 में जब हॉकिंग फेसबुक पर पहली बार आए । उन्होंने लिखा - मैं इस यात्रा को आपके साथ बांटने के लिए उत्सुक हूं।
-    कथन -
मुझे सबसे ज्यादा खुशी इस बात की है कि मैंने ब्रह्माण्ड को समझने में अपनी भूमिका निभाई। इसके रहस्य लोगों के खोले और इस पर किए गए शोध में अपना योगदान दे पाया। मुझे गर्व होता है जब लोगों की भीड़ मेरे काम को जानना चाहती है।
-    स्टीफन हॉकिंग