Showing posts with label DELHI. Show all posts
Showing posts with label DELHI. Show all posts

Friday, 14 August 2015

प्रिंट मीडिया में महिलाओं की भागीदारी पर सार्थक चर्चा

खालसा कालेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय सेमिनार

भारतीय जन संचार संघ और दौलतराम कालेज दिल्ली विश्वविद्यालय की ओर से एक राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन दिल्ली विश्वविद्यालय के खालसा कालेज सभागार में 12 अगस्त को कराया गया। इस सेमिनार में देश के अलग अलग राज्यों से 40 से ज्यादा विद्वानों, जन संचार के शिक्षकों और पत्रकारों ने अपने विचार रखे।
कार्यक्रम के उदघाटन सत्र में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल के कुलपति प्रो.बीके कुठियाला, लोकसभा के महासचिव पीडी अचारी, आकाशवाणी के पूर्व समाचार वाचक कृष्ण कुमार भार्गव, महामंडलेश्वर संत स्वामी मार्तंड पुरी, प्रो. कुमद शर्मा, दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. हरिमोहन शर्मा, हंसराज महाविद्यालय की प्रिंसिपल डा. रमा शर्मा, दौलतराम कालेज की प्रिंसिपल सविता राय वरिष्ठ महिला पत्रकार अपर्णा द्विवेदी ने अपने विचार रखे। 

भारतीय जन संचार संघ के निदेशक प्रो. रामजीलाल जांगिड ने विषय प्रवेश करते हुए कहा कि ईश्वर ने महिलाएं अपनी भूमिका को लेकर रामायण काल से ही सवाल उठाती रही हैं। लक्ष्मण जब सीता को वन में छोड़ने जा रहे थे तब सीता ने भी राम से कई सवाल किए थे। आज मुद्रित माध्यम में महिलाओं की भागीदारी पर सवाल उठना भी लाजिमी है।

प्रो. बीके कुठियाला ने कहा कि विज्ञान कहता है कि महिलाओं में संकटकाल में संघर्ष करने की क्षमता महिलाओं में पुरुषों से ज्यादा है। यानी महिलाओं को प्रकृति ने ही पुरुषों से बेहतर बनाया है। आज मीडिया में महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है। इलेक्ट्रानिक मीडिया में जहां 40 फीसदी महिलाएं काम कर रही हैं वहीं प्रिंट मीडिया में 22 फीसदी महिलाएं काम कर रही हैं।

 वहीं स्वामी मार्तंड पुरी ने कहा कि महिलाएं पुरुषों से हर मामले में श्रेष्ठ हैं। उन्होंने प्रसंगवश जिक्र किया कि मैंने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका लगा रखी है जिसमें हर दस्वावेज में माता का नाम अनिवार्य रूप से लिखे जाने की मांग की गई है। स्वामी मार्तंड पुरी ने कहा कि मां होने जहां सत्य है वहीं पिता का होना एक विश्वास है।
सेमिनार में दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, चंडीगढ़, मुंबई, उत्तर प्रदेश समेत देश के अलग अलग हिस्सों से 40 से अधिक लोगों ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए।

भारतीय जन संचार संघ और दौलत राम कालेज का आयोजन

सेमिनार में प्रो. शिल्पी झा ने महिलाओं के नाम टीवी और अखबारों में होने वाली पत्रकारिता के संदर्भ में कहा कि महिलाओं के मुद्दे पर सनसनी फैलाने वाले या फिर उनके प्रति सहानुभूति जताने वाली पत्रकारिता नहीं होनी चाहिए। बल्कि पत्रकारिता को हमेशा सच के साथ रहना चाहिए।अगर महिला भी अपराधी है तो हमें वहीं चेहरा दिखाना चाहिए। इसी क्रम में निभा सिन्हा ने महिला पत्रिकाओं के संदर्भ सामग्री का पाठकों की नजरों से तुलनात्मक विश्लेषण पेश किया। 


विद्युत प्रकाश मौर्य ने अपने शोध पत्र में मुद्रित माध्यम में महिला पत्रकारों की समाचार पत्रों में उच्च पदों पर कम भागीदारी होने पर चिंता जताई। उनके मुताबिक मुद्रित माध्यम में बड़े पदों पर महिलाओं को मौके कम मिलते हैं। जहां मौका मिला है महिलाओं ने बेहतर काम करके अपनी उच्च दक्षता का परिचय दिया है। 

कार्यक्रम में धन्यवाद ज्ञापन करते हुए प्रो. प्रदीप माथुर ने मीडिया में भाषा के गिरते स्तर पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि हमें महिला उत्पीडन और बलात्कार जैसे मामलों की खबरों में संवदेनशील होना चाहिए।सेमिनार के दौरान पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़ के गुरमीत सिंह, गुरनानक देव यूनीवर्सिटी अमृतसर की नवजोत ढिल्लन ने अपने शोध पत्रों में ज्वलंत मुद्दों को उठाया।

सेमिनार की संयोजक डा. साक्षी चावला थीं, जबकि डा. सीमा रानी, डा. वंदना त्रिपाठी, श्रीमती गीतांजलि कुमार ने आयोजन में सक्रिय भागीदारी निभाई। भारतीय जन संचार संघ के अध्यक्ष डा.रामजीलाल जांगिड ने बताया कि सेमिनार में प्रस्तुत सभी शोध पत्रों को पुस्तक रुप में प्रकाशित किया जाएगा।

- रिपोर्ट – माधवी रंजना  

Sunday, 12 July 2015

मैजिक का मैजिक ( व्ंयग्य)

ये टाटा वालों ने बहुत शानदार गाड़ी बनाई है मैजिक। इसमें बैठी सवारियों को देखकर लगता है इसका नाम मैजिक बड़ा ही मुफिद है। कहने को तो यह सेवेन सीटर है। पर इसमें सात की जगह 17 लोग कैसे बिठाए जा सकते हैं ये समझना है तो आपको एक बार सशरीर मैजिक में सफर करना ही पडेगा। महानगर में सफर करने वाले कई लोगों ने मैजिक का जादू देखा होगा। तीन की सीट वाली जगह पर चार सवारी बैठते हैं। गाडी के आंतरिक सज्जा में थोड़ा बदलाव कर बीच में दो सीटें और लगा दी गई हैं। तो जनाब छह की जगह आठ हो गए। दो अतिरिक्त सीटों पर पांच लोग तो इस तरह हो गए 13 लोग। 

गिनते जाईए। आगे की सीट पर एक सीट पर दो लोग तो हो गए ना 15 और ड्राइवर क बगल में एक और लटक गया तो हो गए ड्राइवर समेत 17 ना। अभी इसमें खालासी भी साथ होता है तो वह गेट पर लटककर सवारी को रास्ते में आवाज लगाता हुआ चलता है। इस तरह 17 लोगों को शान से लेकर लुढकती हुई चलती है टाटा की मैजिक अपनी मंजिल की ओर। कई बार खाते पीते घरों की तंदुरुस्त महिलाएं ( मोटी नहीं कहेंगे अपमान होगा) आ जाती हैं तो तीन की जगह 4 के बैठने में एतराज करती हैं तो खालासी उन्हें कहता है कि या तो दो सवारी के पैसे दो या फिर अगली मैजिक का इंतजार करो। अब क्या करें मोहतरमा को बैठना ही पड़ता है। 

मैजिक खूब मेल कराती है। अनजान सवारियों को भी काफी एक दूसरे से चिपकर बैठना पड़ता है। मानो फेविकोल का मजबूत जोड़ हो। ये मंजिल आने के बाद ही अलग हो पाता है। तब तक आप किसी नामचीन ब्रांड के परफ्यूम का आनंद ले सकते हैं। हां कई बार सह सवारी की पसीने की बदबू भी मिल सकती है। ये आपकी किस्मत पर निर्भर करता है। इस बात पर भी निर्भर करता है कि सुबह किसता मुंह देखकर उठे थे। मैजिक वालों का बस चले तो ये छत पर भी सवारी बिठा सकते हैं। पर वे ऐसा नहीं कर पाते। मैजिक के मुकाबले कई गाड़ियां आईं पर वे मैजिक को चुनौती नहीं दे सकीं। क्योंकि जो बात मैजिक में है वह किसी और में कहां।
सात की जगह 17 सवारियां बिठाने के कारण मैजिक ड्राइवरों के घर की तिजोरी भर रही है। भला नाम मैजिक है तो मैजिक तो होगा ही न। ड्राइवर लोग रोज रतन टाटा को ऐसी नायाब गाड़ी के लिए धन्यवाद देते हैं। अगर आपकी जिंदगी बोरिंग है, और आप चाहते हैं कि थोड़ा तूफानी हो तो दिल्ली में तो जरूर किसी मैजिक की सवारी करें। हो सकता है आपको किसी मोहतरमा साहचर्य मिल जाए। और आपकी जिंदगी में भी आ जाए मैजिक। हां मगर अपनी जेब संभाल कर रखिएगा।
- विद्युत प्रकाश मौर्य ( vidyutp@gmail.com)




Tuesday, 19 March 2013

हिंदी की उपेक्षा क्यों

नई दिल्ली स्थित भारतीय जन संचार संस्थान का प्रवेश द्वार जहां विराजती हैं मां सरस्वती। 

देश में पत्रकारिता प्रशिक्षण के लिए श्रेष्ठ संस्थान माने जाने वाले भारतीय जन संचार संस्थान नए सत्र में प्रवेश के लिए विज्ञापन जारी कर दिए हैं। कभी सिर्फ दिल्ली से शुरू हुए आईआईएमसी की अब देश भर में कई शाखाएं खुल चुकी हैं जहां पूर्णकालिक पाठ्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं। उत्तर में जम्मू,  महाराष्ट्र में अमरावती, ओडिसा में ढेंकानाल, केरल में कोट्टायम पूर्वोत्तर के मिजोरम में आईजोल में आईआईएमसी की शाखाएं खुल चुकी हैं। इन सभी शाखाओं में अंग्रेजी पत्रकारिता का पाठ्यक्रम है, पर हिंदी का पाठ्यक्रम सिर्फ दिल्ली में ही है। देश के सबसे बड़े संस्थान में राष्ट्रभाषा का सम्मान पाने वाली हिंदी के साथ भेदभाव की स्थिति दिखाई देती है। सवाल है कि आखिर अन्य शाखाओं में हिंदी पत्रकारिता के पाठ्यक्रम में क्यों नहीं संचालित किए जा रहे हैं।


जम्मू की बात करें तो वहां हिंदी का माहौल है। चार बड़े हिंदी के समाचार पत्र वहां से प्रकाशित होते हैं। महाराष्ट्र में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति सक्रिय है। इसी राज्य में अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की स्थापना हुई है। नागपुर, मुंबई, पुणे से हिंदी के समाचार पत्र प्रकाशित होते हैं। लेकिन अमरावती आईआईएमसी में हिंदी का पाठ्यक्रम नहीं है। अब चलें ढेंकानाल। वहां अंग्रेजी और उड़िया पत्रकारिता पढ़ाई जाती है पर हिंदी नहीं। ओडिशा में हिंदी का कोई विरोध नहीं हैं। स्थानीय स्तर पर ढेंकानाल में रोजगार की संभावनाएं नहीं है। यहां से पाठ्यक्रम उतीर्ण करने वाले छात्रों को हिंदी प्रदेशों में नौकरी के लिए जाना पड़ता है। केरल की बात करें तो वहां हिंदी का कोई विरोध नहीं है। केरल में दक्षिण भारतीय हिंदी प्रचार सभा से बड़ी संख्या में हर साल लोग हिंदी सीखते हैं लेकिन पाठ्यक्रम स्तर पर आईआईएमसी कोट्टायम में भी हिंदी का पाठ्यक्रम नहीं है। उत्तर पूर्वी राज्यों में भी स्कूल स्तर पर छात्रों को हिंदी पढाई जाती है। पर आईआईएमसी आइजोल भी हिंदी से अछूता है।
अब आईआईएमसी में नामांकन की इच्छा रखने वाले छात्रों की बात करें तो हर साल बड़ी संख्या में हिंदी पट्टी के छात्र प्रवेश परीक्षा में हिस्सा लेते हैं। हजारों छात्रों में से महज 62 छात्रों को ही मौका मिल पाता है जबकि अंग्रेजी पाठ्यक्रम में कुल 184 सीटें हैं। अगर पढ़ाई के बाद नौकरी की संभावनाओं की बात करें तो हिंदी पत्रकारिता में नौकरी की संभावनाएं अंग्रेजी से कहीं ज्यादा है। अगर 25 साल के हिंदी पत्रकारिता पाठ्क्रम की बात करें तो टीवी, प्रिंट, शोध, शिक्षण आदि माध्यमों में हिंदी पाठ्यक्रम के छात्रों ने परचम लहराया है।
फिर विज्ञापन पर आते हैं। 15 मार्च को समाचार पत्रों में प्रकाशित विज्ञापन में बताया गया है कि दिल्ली को छोड़कर सभी आईआईएमसी में छात्रों के लिए अच्छी सुविधाओं से युक्त छात्रावास उपलब्ध है। पर हिंदी के छात्रों के लिए दिल्ली में भी छात्रावास की सुविधा नहीं है। यहां सिर्फ छात्राओं के लिए सीमित संख्या में आवासीय सुविधा है।  

अब कुछ सवाल हैं-

-    आखिर देश के सबसे बड़े पत्रकारिता प्रशिक्षण संस्थान  में हिंदी के साथ ये भेदभाव क्यों...

-    हिंदी पत्रकारिता के छात्रों के लिए पिछले 25 साल में छात्रवास के इंतजाम क्यों नहीं किया जा सका है...

-    आखिर जम्मू, अमरावती, ढेंकानाल में हिंदी पत्रकारिता का पाठ्यक्रम क्यों नहीं शुरू किया जा सका है। 

Monday, 16 February 2009

फ्लाई ओवर का शहर दिल्ली

कुछ दिन में दिल्ली को फ्लाई ओवरों के शहर के रुप में याद किया जाएगा। अगर आपने दससाल पहले दिल्ली की यात्रा की हो, और अब जाएं तो दिल्ली आपको काफी बदली हुई नजर आएगी। दो दशक पहले की दिल्ली का मतलब यह होता था कि लाल बत्ती और हरी बत्ती का शहर। अगर लाल बत्ती हो तो जिंदगी ठहरी हुई है। अगर हरी बत्ती हो तो जिंदगी चल पड़ी। कितनी कहानियां और व्यंग्य रचनाएं इस लाल बत्ती और हरी बत्ती पर लिखी गई हैं। रफ्तार चाहने वाले लोगों के लिए लाल बत्ती बहुत बड़ा संकट थी। अगर आप दिल्ली में किसी से मिलने जाते हों तो न जाने कितने चौराहों पर आपको यह इंतजार करना पड़ता था कि कब हरी बत्ती होगी और आप चल पाएंगे।
दिन लदे गोल चक्कर के - इस लाल बत्ती खत्म करने के लिए बड़े चौराहों पर राउंड एबाउट की परिकल्पना को स्वरुप प्रदान किया गया। इसमें गर चौक पर एक गोल चक्कर होता है। इस गोल चक्कर में घूमते हुए आप अपने लेन का चयन कर लेते हैं। इसमें लाल बत्ती तो नहीं मिलती। पर इस राउंड एबाउट का लोगों को सही तरीक से इस्तेमाल करना नहीं आया। इसका परिणाम हुआ कि गोल चक्कर पर काफी एक्सीडेंट की घटनाएं सुनने को मिलने लगीं।
फ्लाईओवर या भूल भुलैय्या - अब बढ़ते ट्रैफिक के दबाव के कारण दिल्ली में फ्लाई ओवर बनाए जाने का सिलसिला जारी है। दिल्ली में 50 किलोमीटर के रिंग रोड पर लगभग हर चौराहे पर फ्लाई ओवर बनाए जा रहे हैं जिससे वहां कभी रेडलाइट की स्थिति न हो और ट्रैफिक निर्बाध गति से चलता रहे। अगर आप रिंग रोड पर चलें तो आजादपुर, वजीरपुर डिपो, पीतमपुरा, ब्रिटानिया, पंजाबी बाग, राजा गार्डन, राजौरी गार्डन, नारायणा, धौलाकुआं, मोतीबाग, सफदरजंग, मेडिकल, आश्रम आदि में सब जगह आपको फ्लाई ओवर मिलेंगे। दिल्ली में धौला कुआं और मेडिकल के फ्लाई ओवर तो काफी कलात्मक ढंग से बनाए गए हैं। ये इतने घुमावदार हैं कि किसी नए व्यक्ति के लिए यह समझना बहुत मुश्किल होगा कि उसे किधर जाने के लिए कौन सा लेन चयन करना चाहिए। यहां तक सालों से दिल्ली में ही रहने वालों के लिए ये फ्लाई ओवर भूलभूलैया जैसे साबित हो रहे हैं।

दिल्ली को 2010 में होने वाले राष्ट्र मंडल खेलों के लिए तैयार करने के लिए शहर के ट्रैफिक को बेहतर बनाने की कवायद की जा रही है। इसी के तहत फ्लाईओवर और अंडर पास बनाए जा रहे हैं। इससे पूर्व भारत में बेंगलूर शहर की सड़कों को बेहतर बनाया गया है। वहां पर चौक पर फ्लाईओवर और अंडरपास बनाए गए हैं। निश्चय ही फ्लाईओवर से समय की बचत होती है। साथ ही घंटो प्रदूषित वातावरण में रहने से छुट्टी मिल जाती है।
पदयात्रियों का भी रखे ख्याल - हां इन फ्लाईओवरों ने पैदल चलने वालों के लिए मुश्किल खड़ी जरूर की है। कई जगह सड़क पार करने के लिए आधे किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है। इससे सड़क पार करना मुश्किल हो गया है। रेडलाइट नहीं होने के कारण सड़कों पर अब हमेशा तेज गति से वाहन चलते रहते हैं। इसलिए जितनी बड़ी संख्या में फ्लाई ओवर बन रहे हैं उसी अनुपात में पैदल पार पथ भी बनाए जाने चाहिएं। इससे सड़क पार करने वालों को सुविधा हो सकेगी। साथ ही हर फ्लाईओवर के आसपास कौन सी लेन किसमें जाकर मिल रही है इसकी सूचना सही ढंग से लिखी होनी चाहिए। ऐसा नहीं होने से कई लोगों को भ्रमित होना पड़ता है।
- विद्युत प्रकाश मौर्य