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Sunday, 4 April 2021

शशिकला – हिंदी फिल्मों की बुरी औरत

शशिकला का 4 अप्रैल 2021 को मुंबई में निधन हो गया। हिंदी फिल्मों में शशिकला की पहचान एक खलनायिका और नृत्यांगना के तौर पर थी। उन्होंने ज्यादातर नकारात्मक किरदार निभाये पर उनकी निजी जीवन भी काफी चुनौतियों भरा रहा। वह एक मराठी परिवार से आती थीं। बॉलीवुड में सौ से ज्यादा फिल्मों में काम करने वाली शशिकला का पूरा नाम शशिकला जावलकर था। उनका जन्म 4 अगस्त 1932 को महाराष्ट्र के शहर सोलापुर में हुआ था। उन्होंने 70 के दशक में कुछ हिंदी फिल्में में हीरोइन का किरदार भी निभाया था।

सन 1945 में फिल्म जीनत में उन्हें पहली बार छोटी सी भूमिका मिली, जो अभिनेत्री नूरजहां ने दिलवाई थी। इस फिल्म के लिए उन्हें 25 रुपये पारिश्रमिक मिला था। साल 2004 में आई सलमान खान की फिल्म मुझसे शादी करोगी में दादी की भूमिका में उन्हें काफी पसंद किया गया था।


मुश्किलों भरा जीवन - शशिकला का निजी जीवन मुश्किलों भरा रहा। पिता को कारोबार में घाटा होने के बाद उन्होंने मुंबई आकर कम उम्र में ही काम करना शुरू कर दिया था ताकि वह अपने परिवार का भार उठा सके। उन्होंने दो बार शादी की पर वैवाहिक जीवन भी ज्यादा सफल नहीं रहा। अपने आखिरी समय में वे अपनी छोटी बेटी और दामाद के साथ मुंबई में रहती थीं।

आध्यात्म की ओर – हिंदी फिल्मों उनकी इमेज बुरी औरत वाली बन गई थी। नब्बे के दशक में उनका झुकाव आध्यात्म की ओर हो गया था। उन्होंने विपश्यना का सहारा लिया। कई आश्रमों में जाकर रहीं। फिर मदर टेरेसा की संस्था के लिए काम करने लगीं।


टीवी पर भी नजर आईं - फिल्मों के साथ-साथ शशिकला ने टीवी में भी काम किया था। वह मशहूर सीरियल सोन परी में फ्रूटी की दादी के रोल में नजर आई थीं।

प्रमुख फिल्में – हरियाली और रास्ता, हिमालय की गोद में, सुजाता, गुमराह, फूल और पत्थर, अनुपमा, सरगम, दुल्हन वही जो पिया मन भाए, क्रांति, तवायफ, अनोखा बंधन, कभी खुशी कभी गम

 

2007 में उन्हें भारत सरकार ने पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा था

100 से ज्यादा हिंदी फिल्मों में काम किया

09 साल तक मदर टेरेसा के साथ रहकर गरीबों के लिए काम किया

 

 

Saturday, 13 February 2021

साल 2021 में आई अर्थपूर्ण फिल्म है आखेट


साल 2021 में आई अर्थपूर्ण फिल्म है आखेट। फिल्म की कहानी बाघ संरक्षण जैसे संवेदनशील विषय को छूती है। फिल्म की कहानी का प्रवाह और निर्देशन का कमाल कुछ इस तरह का है कि कुल एक घंटे 20 मिनट की फिल्म को देखते हुए आपकी रोचकता बनी रहती है। तो कहानी शुरू होती है झारखंड के पलामू जिले के एक डाकघर से। नेपाल सिंह इस बार अपनी दशहरे छुट्टियां यादगार बनाना चाहते हैं। वे अपने पुरखों की बंदूक उठाकर जंगल में शिकार के लिए निकल पड़ते हैं। आगे की कहानी बेतला के जंगलों में बाघ के शिकार के इर्द गिर्द घूमती है। नेपाल सिहं की बंदूक किसी बाघ को तो नहीं मार पाती पर जंगल के इस प्रसंग में उनकी सोच में बहुत बड़ा बदलाव आता है।


जंगल में शिकार के इस प्रसंग को निर्देशक रवि बुले के बेहतरीन निर्देशन और नेपाल सिंह के रूप में आशुतोष पाठक के अभिनय ने काफी जीवंत बनाया है।

इस फिल्म में दो यादगार चरित्र हैं  मुर्शीद मियां और जुल्फिया।  मुर्शिद मिंया लोकल गाइड हैं तो जुल्फिया उनकी पत्नी.  फिल्म का अंत का संदेश अत्यंत सार्थक है जो देश के जंगलों खत्म हो रहे बाघ के बारे में गंभीर संदेश देता है।  जो आपको भावुक भी कर देता है। पर इतने गंभीर विषय पर बनी फिल्म आपको कहानी के साथ लगातार बांधे रखती है। पात्र कहीं भी बोर नहीं करते.  कहानी तेज गति से आगे बढ़ती है। रवि बुले की निर्देशन पक पकड़ लगातार बनी हुई दिखाई देती है। वैसे तो डेढ़ घंटे के फिल्म में गाने की ज्यादा गुंजाइश नहीं रहती.  पर अनुपम ओझा की लिखी ठुमरी.. सैंया शिकारी शिकार पर गए.... अदभुत बन पड़ी है।


आखेट एक अंतर राष्ट्रीय स्तर की फिल्म है जो आपको कुरेदती है,  झकझोरती है और सोचने को भी मजबूर करती है।  फिल्म को ओटीटी प्लेटफॉर्म पर देखा जा सकता है ।  यह हंगामा,  वोडाफोन,  एयरटेल आदि पर उपलब्ध है। 

- विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com

 


Thursday, 20 August 2020

फिल्म पत्रकारिता को अधिक महत्व नहीं दिया जा रहा - संपत लाल पुरोहित

( 1947 में प्रकाशित उपन्यास धरती के देवता में प्रकाशित तस्वीर)
हिंदी फिल्मों के मशहूर पत्रकार संपत लाल पुरोहित से ये साक्षात्कार 1996 में लिया गया था। ये साक्षात्कार भारतीय जन संचार संस्थान की पत्रिका संचार माध्यम के जनवरी मार्च 1997 अंक में प्रकाशित हुआ। बुजुर्ग होने पर पुरोहित जी का स्वास्थ्य ज्यादा ठीक नहीं रहता था। वे ज्यादा देर तक बोल नहीं पाते थे। इसलिए यह साक्षात्कार उनके दरियागंज स्थित आवास में दो बैठकों में पूरा हुआ। अपने आखिरी दिनों में वे 7 बटा 21 दरियागंज में एक विशाल भवन के आंगन वाले कमरे में किराये पर रहते थे। पुरोहित जी सन 1998 में चल बसे, पर उनकी यादें शेष हैं। 


पत्रकारिता की विभिन्न विधाओं में फिल्म पत्रकारिता का महत्वपूर्ण स्थान है। फिल्म पत्रकारिता को पत्रकारिता के क्षेत्र में कभी उतनी गंभीरता से नहीं लिया गया जितना लिया जाना चाहिए था, जबकि फिल्मों का समाज पर व्यापक प्रभाव होता है। ऐसा मानना है कई दशकों तक फिल्म पत्रकारिता कर चुके विख्यात हिंदी पत्रकार संपत लाल पुरोहित का। संपत लाल पुरोहित फिल्म पत्रकारिता के क्षेत्र में एक सम्मानित नाम है। आजादी से चार पहले 1943 में फिल्म पत्रकारिता से जुड़े श्री पुरोहित लगभग चार दशक तक अपनी फिल्म पत्रिका युग छाया का संपादन करते रहे।
( फोटो सौजन्य - दीपक दुआ ) 
इसके बाद वे लंबे समय तक देश के प्रमुख हिंदी समाचार पत्रों में फिल्म पर कॉलम लिखते रहे। इनमें नवभारत टाइम्स, सांध्य टाइम्स, जनसत्ता, हिन्दुस्तान, अमर उजाला, कुबेर टाइम्स जैसे अखबार प्रमुख हैं। वे फिल्मी दुनिया पत्रिका के लिए लेखन करते रहे। वे मिस्टर संपत और फिल्म ज्ञानी नाम से कुछ पत्रिकाओं मे पाठकों के फिल्मी सवालों जवाब भी देते रहे।
जीवन के 75 वसंत देख चुकने के बाद भी संपत लाल पुरोहित फिल्म पर लेखन में सतत सक्रिय रहे। प्रस्तुत है संपत लाल पुरोहित से उनकी फिल्म पत्रकारिता पर एक बातचीत।

आपका बचपन कैसा था, कहां किन परिस्थितियों में गुजरा...
मैं मध्य प्रदेश धार एस्टेट के एक गांव में पैदा हुआ था। धार अब जिला बन चुका है। मेरा बचपन अमोदिया ग्राम ( रतलाम के पास ) में गुजरा। मेरा जन्म 1 जून 1922 को हुआ था। मुझे याद आता है कि प्राथमिक विद्यालय जाने के लिए मुझे प्रतिदिन तीन मिल पैदल चलना पड़ता था। जब मैं बहुत छोटा सा था तभी पिताजी का देहांत हो गया। माता जी का भी देहांत हो गया जब मैं तीसरी कक्षा में पढ़ रहा था। भाई बहनों में मैं अकेला था। तो मेरी पैत्रिक जमीन की देखभाल मेरे मामाजी करने लगे। उन्होंने ही मेरा पालन पोषण भी किया। चौथी कक्षा की परीक्षा में मैं 11-12 विद्यालयों की संयुक्त परीक्षा में पहले नंबर पर आया।
उसके बाद आगे की पढ़ाई के लिए मैं बदनावर चला गया। यह धार जिले का छोटा सा कस्बा है। वहीं से मैंने मिड्ल पास किया। मेरी नियमित पढ़ाई इंटरमिडिएट यानी 12वीं तक ही हुई। उसके बाद मैंने प्रभाकर की परीक्षा स्वंतत्र रूप से उत्तीर्ण की।

बचपन में क्या बनने की सोचते थे...
मुझे बचपन में गाने और बजाने का खूब शौक था। गांव में छोटी जाति के लोगों की गाने बजाने की मंडली होती थी, उसमें जाकर मैं शामिल हो जाता था। नौटंकी देखने में मैं सबसे आगे बैठता था। एक बार हमारे यहां अमर सिंह राठौर की नौटंकी आई। इसमें मैंने हाड़ी रानी का रोल किया। मेरी माता जी को यह बहुत पुरा लगा।  इसके बाद गाने बजाने का साथ छूट गया।

फिल्मों से लगाव कब हुआ...
मैट्रिक का इम्तहान देने के बाद जब मैं इंदौर गया तब पहली बार बोलती फिल्म कंगन देखी। इसमें अशोक कुमार और लीला चिटनिस थे। उससे पहले पहली बार बदनावर में ही चंद्रहास नामक मूक फिल्म देखी थी।

वह कौन सी घटना थी जिससे आपका जीवन बदल गया...
बदनाव में मैं एक डॉक्टर साहब के पास रहता था। एक दिन उनके पास एक सज्जन बैठे थे। उनका नाम था रामचंद्र द्विवेदी उर्फ कवि प्रदीप। उसी समय नित्यानंद जी महाराज हरिद्वार में प्रणव मंदिर बनवा रहे थे। इस मंदिर के उद्यापन समारोह में हमलोग भाग लेने कवि प्रदीप के साथ चले गए। दरअसल वहां समारोह में बड़ी संख्या में पंडितों की आवश्यकता थी। मैं भी पंडित के रूप में इस समारोह में शामिल हुआ। इस समारोह में शामिल होन के लिए हम जिस ट्रेन से हरिद्वार जा रहे थे, उसमें कवि प्रदीप मथुरा में हमारे साथ चढ़े। हरिद्वार में कवि प्रदीप रोज रात में नित्यानंद जी महाराज के दरबार में कविता पढ़ते थे। कवि प्रदीप के साथ एक माह हरिद्वार में रहने का मेरा अनुभव काफी प्रेरक रहा। उसके बाद मैं बदनावर लौट आया।

लेखन के प्रति कैसे झुकाव हुआ...
जो मैंने पहली बोलती फिल्म कंगन देखी थी उसमें कवि प्रदीप ने ही गीत लिखे थे। उसके बाद फिल्मों से मेरा झुकाव बढ़ता गया। इसी दौरान मैंने कविताएं और कहानियां भी लिखनी शुरू कर दीं। उन दिनो मुंबई से दो फिल्म पत्रिकाएं आती थीं। एक गुजराती की मौजमजा हुआ करती थी। मैं इनका नियमित पाठक बन गया। इंदौर हिंदी साहित्य सम्मेलन की पत्रिका निकलती थी। इसके संपादक कालिका प्रसाद कुसुमाकर दीक्षित थे। साल 1938 में वीणा पत्रिका में मेरी पहली कविता प्रकाशित हुई।

फिल्म पत्रकारिता की तरफ झुकाव कैसे हुआ...
बदनावर में रहते हुए दिल्ली से प्रकाशित प्रथम फिल्म पत्रिका चित्रपट का नियमित पाठक बन गया। इस दौरान मेरे ऊपर फिल्मों का काफी प्रभाव बढ़ गया था। मैं रंग बिरंगे कपड़े पहनकर फिल्म सितारों की नकल किया करता था। फिल्म स्टार मजहर खान धार के रहने वाले थे। उन्होंने पड़ोसी फिल्म में काफी अच्छी भूमिका निभाई थी। एक बार उनके धार आने पर मैं उनसे जाकर मिला। मैंने बताया कि मैं चित्रपट में नियमित लिखता हूं और आपका साक्षात्कार लेना चाहता हूं। वे इंटरव्यू देने को तैयार हो गए। इस प्रकार मेरा पहला फिल्मी साक्षात्कार सन 1938 में चित्रपट में प्रकाशित हुआ। तब मेरी सिर्फ 16 साल की थी। इस प्रकार मेरी फिल्म पत्रकारिता की शुरुआत हुई। इससे पहले मैंने प्रेमचंद का सारा साहित्य पढ़ डाला था। कवि गोष्ठियों में हिस्सा लेने लगा था।

उन किन लोगों का नाम लेना चाहेंगे जो आपके लेखक पत्रकार निर्माण में सहायक रहे...
इसमें मैं कवि प्रदीप पहला नाम लेना चाहूंगा। उनके सानिध्य में रहकर काफी कुछ सीखने को मिला। प्रेमचंद साहित्य का मैंने काफी अध्ययन किया था, इसलिए उनकी लेखनी से प्रभावित रहा। धार में रहते हुए मैं कांग्रेस सेवा दल का सक्रिय सदस्य बन गया था। सेवा दल में काम करते हुए उसकी समाजसेवा से जुड़ी गतिविधियों से भी प्रेरणा मिली।

आपका धार से दिल्ली कैसे आना हुआ ...
लंबे समय से मैं दिल्ली से प्रकाशित चित्रपट पत्रिका के लिए लिख रहा था। एक दिन चित्रपट पत्रिका की ओर से एक तार मिला की आप दिल्ली आ जाएं। लिखा था, आपको हम संपादकीय विभाग में बहाल करना चाहते हैं। 1933 से प्रकाशित हो रही इस पत्रिका को ऋषभ चरण जैन ने निकाला था। यह देश की सम्मानित फिल्म पत्रिका थी। बस मैंने दिल्ली का टिकट खरीदा और ट्रेन में सवार होकर पहुंच गया देश की राजधानी में। दिल्ली में लंबे समय तक मैं 1092 सतघरा, धर्मपुरा मुहल्ले में रहा।

आज मीडिया जगत फिल्म पत्रकारिता को जितना महत्व दिया जा रहा है वह पर्याप्त है या फिर और स्थान मिलना चाहिए...
इस समय भी या इससे पहले भी फिल्म पत्रकारिता को कभी ज्यादा महत्व नहीं मिला। फिल्म पत्रकारिता में बहुत से लोग ऐसे हैं जो अपने विषय का गहरा ज्ञान नहीं रखते। परंतु लिखते जा रहे हैं। ऐसे लोगों ने फिल्म पत्रकारिता को बड़ा अहित पहुंचाया है।
अगर आप फिल्म समीक्षक हैं तो आपको कैमरा मूवमेंट, लाइट, लोकेशन जैसी तकनीकी समझ भी होनी चाहिए। कहानी पक्ष का ज्ञान होना चाहिए। फिल्म देखते समय उन बातों को उजागर करना जरूरी है जो निर्देशक और कलाकार के दिमाग में नहीं आई हो।

फिल्मों की अच्छी समीक्षा कैसी होनी चाहिए...
अच्छी समीक्षा के लिए निष्पक्ष दृष्टिकोण का होना आवश्यक है। निर्माता निर्देशक कलाकार सबके प्रति आपकी दृष्टि साफ होनी चाहिए। कथाकार, संवाद लेखक, गीतकार आदि के विषय में भी निष्पक्ष भाव होना चाहिए। ऐसा नहीं होना चाहिए कि फलां प्रोड्यूसर या आर्टिस्ट मेरा दोस्त है तो उसके लिए अच्छा नहीं लिखा तो वह नाराज हो जाएगा।
रामानंद सागर से मेरी अच्छी दोस्ती रही. पर मैंने कभी उनके लिए आशक्त होकर समीक्षा नहीं लिखी। सबसे महत्वपूर्ण है कि फिल्म की कहानी का देश और समाज पर क्या प्रभाव पड़ता है, यह बताना जरूरी है।

फिल्म पत्रकारिता आजकल जन संपर्क (पीआर) बनकर रह गई है। इस पर आपके क्या विचार हैं...
मैं इस विचार से काफी हद तक सहमत हूं। आज जन संपर्क अधिकार प्रकार के लोग फिल्मी पत्रकारों पर हावी होने की स्थिति में हैं। पत्रकारों के पास अपने स्रोत नहीं है। वे इस मामले में पीआरओ पर आश्रित हैं। जब आप पीआरओ से सुविधाएं प्राप्त करेंगे तो वह आपसे अपेक्षा रखेगा कि आप वैसा ही लिखो जैसा कि वह चाहता है।

फिल्म पत्रकारिता में गॉसिप का क्या महत्व है...
बिना आग के धुआं नही होता। और बिना धुआं के भी आग का आभास हो जाता है। चीजें होती हैं, और अखबारों में आती हैं। उसका प्रोफेशन से संबंध नहीं होता। जैसे उसका उससे रोमांस चल रहा है। दोनों साथ देखे गए हैं। कुछ बातें होती हैं। कुछ बातें पत्रकारों द्वारा गढ़ ली जाती हैं। अतः फिल्मी पत्रिकाओं में काफी कुछ गॉसिप प्रकाशित होता रहता है। चूंकि आम आदमी को अपने हीरो के व्यक्तिगत जीवन के बारे में भी जानने की इच्छा रहती है। इसलिए यह सब कुछ मजे लेकर पढ़ा जाता है।
कई बार कलाकार खुद दूसरे कलाकार पर इस तरह के आरोप लगाते हैं। इन सब चीजों को सरासर गप नहीं कहा जा सकता। जब दुर्गा खोटे और मुबारक साथ-साथ रहते और घूमते थे तो उनके बारे में लोगों ने खूब लिखा। परंतु तील का ताड़ बना लिया जाना भी उचित नहीं कहा जा सकता।

अब तक के जीवन में जो कार्य किए  हैं उनमें से कौन सा ऐसा कार्य है जिसे करके आपको सर्वाधिक संतोष हुआ है..
चित्रपट के संपादकीय टीम से अलग होकर मैंने अपनी फिल्म पत्रिका युग छाया निकाली। वह 1947 का साल था, जब देश आजाद हुआ था। यह पत्रिका 1980 तक प्रकाशित होती रही। इसमें बड़े-बड़े फिल्मी कलाकारों के इंटरव्यू प्रकाशित होते थे। वे फिल्मी सितारे दिल्ली आते थे तो मुझसे मिलने आते थे। फिल्म स्टार धर्मेंद्र ने तो मेरे लिए दिल्ली में पार्टी का आयोजन कर मुझे सम्मानित भी किया था। मैंने पूरे जीवन में जो कार्य किए हैं उसे पाठक भी और फिल्म पत्रकार भी महत्व प्रदान करते हैं। यही सबसे बड़ा सुख है।

इतनी लंबी साधना में कभी आपका जी उबा है...
जी तो कभी नहीं उबा। कुछ दुख की घड़ियां आईं पर जिंदगी अपनी रफ्तार से चलती रही। हां, कभी-कभी वित्तीय संकट जरूर आया, जिससे थोड़ी घबराहट हुई, लेकिन फिर सब ठीक होता गया। 

फिल्म पत्रकारिता से जुड़े कुछ यादगार संस्मरण साझा करना चाहेंगे...
राजेंद्र कुमार और रामानंद सागर से मेरी बड़ी अच्छी दोस्ती थी। जब राजेंद्र कुमार ने लव स्टोरी फिल्म बनानी शुरू की तो अपनी पूरी टीम के साथ बेटे कुमार गौरव को लेकर हमारे पास आए। राजेंद्र कुमार ने बेटे का परिचय कराते हुए कहा, ये संपत लाल पुरोहित जी हैं, मेरे स्टार होने में इनका बड़ा योगदान है। तुम इनके पांव छुओ। परंतु आजकल के लड़के पांव कहां छू पाते हैं।

एक और वाकया। जब राज कपूर की बॉबी रीलिज हुई तो कई दिल्ली के पत्रकारों ने बॉबी की अच्छी समीक्षा नहीं लिखी। इससे बॉबी के सह निर्माता रहे शशि कपूर गुस्सा था। दिल्ली की एक प्रेस कान्फ्रेंस में शशि कपूर साहब बाहें चढाते हुए बोले, किस किस ने हमारी बॉबी के खिलाफ लिखा है... हमलोग अवाक थे। अचानक हम बोल पड़े हमने भी कोई चूड़ियां नहीं पहन रखी है... इस बीच राजकपूर साहब आ गए और मामला शांत हुआ।

कभी फिल्मों के लिए लिखा...
फिल्मों के लिए तो कभी नहीं लिखा। परंतु मैंने कई उपन्यास जरूर लिखे थे। जो कई दशक पूर्व प्रकाशित हुए थे। वे थे – धरती के देवता, मजहब और ईमान, ऊपर नीचे, मालवा की माटी, भ्रष्टाचार और दो कदम आगे। इन सब उपन्यासों को मैंने अपने प्रकाशन से ही छापा था। अंधी उपासना नामक उपन्यास एक अन्य प्रकाशन ने छापी थी।

हिंदी फिल्मों के इतिहास  में आप सबसे अच्छा शो मैन किसे मानते हैं...
अभिनेता मोतीलाल राजवंश 
शो मैन के तौर पर निर्विवाद रूप से मैं राज कपूर का ही नाम लूंगा। हां अच्छे निर्देशकों की बात करें तो महबूब और शांताराम के नाम लूंगा। महबूब खान की 1942 में आई फिल्म रोटी को मैं बेहतरीन फिल्मों में गिनता हूं। फिल्म कहानी पूंजीवाद पर गहरी चोट करती है। इस फिल्म में चंद्रमोहन, शेख मुख्तार और सितारा, अख्तरीबाई फैजाबादी की प्रमुख भूमिकाएं थीं। 

आपकी नजर में सबसे अच्छे अभिनेता कौन हैं...
आप अच्छे एक्टर की बात करें तो मोतीलाल का नाम लूंगा। मेरी नजर में तो मोतीलाल अकेले ऐसे एक्टर हुए जिन्होंने भारत में स्वतंत्र और स्वाभाविक अभिनय किया। ( अभिनेता मोतीलाल  राजवंश का जन्म 1910 में शिमला में हुआ था , उनका निधन 1965 में हुआ )  दिलीप कुमार ने भी मोतीलाल की नकल की। आगे दिलीप कुमार की नकल अमिताभ बच्चन ने की। अभिनेत्रियों में सरदार अख्तर जबरदस्त थीं। अभिनेत्री सरदार अख्तर का जन्म 1915 में लाहौर में हुआ था। उन्होंने निर्माता महबूब खान से विवाह किया था। उनका निधन 1984 में अमेरिका में हुआ। )  वहीं धार्मिक पिक्चरों की बात करें तो इनमें शोभना समर्थ अच्छी थीं।

सरदार अख्तर अभिनेत्री 
फिल्मों और फिल्म पत्रकारिता का भविष्य कैसा लगता है...
देखिए फिल्मोंका भविष्य फिल्मकारों के हाथ में है। और फिल्म पत्रकारिता का भविष्य फिल्म पत्रकारों के हाथ में है। वही उसको बना सकते हैं। वही बिगाड़ सकते हैं। फिल्म पत्रकार ही इसके लिए जिम्मेवार हैं कि वे ऐसा लिखें जो समाज के लिए अभिप्रेरक हो। 

अब जब इलेक्ट्रानिक मीडिया का प्रसार हुआ है फिल्म पत्रकार के सामने चुनौतियां बढ़ी हैं। फिल्म पत्रकारिता में ईमानदारी की बहुत जरूरत है। नए पत्रकारों को चाहिए कि वे खूब अध्ययन करें और काफी सोच समझकर लिखें। फिल्म निर्माता और पत्रकार दोनों को अंतररात्मा की आवाज सुननी चाहिए।

-----           ( संचार माध्यम के जनवरी मार्च 1997 अंक में प्रकाशित, भारतीय जन संचार संस्थान, नई दिल्ली का प्रकाशन 

पोस्ट स्क्रिट - कुछ लोग दावा करते हैं कि संपत लाल पुरोहित के उपन्यास - दो कदम आगे की कहानी पर हिंदी फिल्म एक फूल दो माली (1969) बनी थी। यह फिल्म सुपर हिट हुई थी। हालांकि इस फिल्म की कास्टिंग में कहानी में मुस्ताक जलाली का नाम दिया गया है। पर पुरोहित जी ने मुझसे बातचीत में एक फूल दो माली को लेकर कोई दावा नहीं किया था। 

जब मैंने 1996 में कुबेर टाइम्स हिंदी दैनिक में फिल्म, टीवी मनोरंजन के पन्नों  पर नौकरी शुरू की तब दिल्ली में तीन वयोवृद्ध फिल्म पत्रकार थे जो कभी भी मिलते थे। वे थे - बच्चन श्रीवास्तव, ब्रजेश्वर मदान और संपतलाल पुरोहित। पुरोहित जी का कालम हमारे अखबार में हर हफ्ते छपता था। यह कालम लेने हमारे दफ्तर का एक चपरासी हर हफ्ते जाया करता था। एक बार वह चपरासी छुट्टी पर था। दफ्तर में पुरोहित जी का फोन आया कॉलम ले जाने के लिए। मैंने फोन उठाया, मैंने कहा, कोई बात नहीं संदेशवाहक नहीं है मैं खुद आ रहा हूं। मैं पहुंच गया दरियागंज के उनके आवास में। लेख प्राप्त करने के बाद पुरोहित जी से थोड़ी बातचीत हुई। उसके बाद चपरासी की ड्यूटी खत्म। हर हफ्ते पुरोहित जी के पास कॉलम लेने मैं खुद जाने लगा। इसके कई फायदे हुए। हर हफ्ते में पुरोहित जी के पास आधे घंटे बैठता। बहुत सारी फिल्म जगत की जानकारियां उनसे मिलतीं। उनके अलबम में फिल्मी पार्टियों की पुरानी तस्वीरें देखता। उनका नेपाली सहायक मुझे चाय के साथ सैंडविच पेश किया करता। 

वैसे पुरोहित जी के जीवन में और कई गम थे। बुढ़ापे में अकेले रहते थे। उनके दो बेटों का निधन हो चुका था। बेटी और दामाद थे जो उनसे कभी कभी मिलने आते थे। आखिरी दिनों में प्रेस कान्फ्रेंस में जाना उन्होंने छोड़ दिया था। पर प्रेस शो में फिल्में देखने जाया करते थे। हमने होटल ब्राडवे में फिल्म अभिनय का प्रशिक्षण देने वाली आशा चंद्रा की प्रेस कान्फ्रेंस आयोजित की थी। उसमें मेरे विशेष आग्रह पर पुरोहित जी पहुंचे थे। सात बटा 21 का वह कमरा किराये का था। उस पर भी मकान मालिक से मुकदमा चल रहा था। पर जब तक जीेये पूरी जिंदादिली से रहे। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
 ( SAMPAT LAL PUROHIT, FILM JOURNALIST, DARIYAGANJ, YUGCHAYA MAGZINE, CHITRAPAT MAGZINE ) 

Sunday, 14 June 2020

अलविदा, पर बहुत याद आओगे सुशांत


अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत ने आत्महत्या की।  सिर्फ 34 साल के थे सुशांत । आखिर क्या मजबूरी थी कि खुद को फांसी लगा ली ?? जो जैसा दिखता है , वैसा होता नहीं । खुशियों की चादर और शोहरत के नीचे का दर्द किसी को नजर नहीं आता । ये लिखती हैं टीवी पत्रकार सुचित्रा कुकरेती।

वाकई एक मोहक अभिनेता जिसने कई खूबसूरत फिल्में दी हो इस तरह अपनी इह लीला खत्म कर ले तो बड़ा दुखद लगता है। सुशांत सिंह राजपूत बिहार के रहने वाले थे। पटना के सेंट करेन हाईस्कूल से पढ़ाई की।

सुशांत सिंह राजपूत का अभिनय में कैरियर टीवी पर शुरू हुआ था। सबसे पहले उन्होंने 2008 में स्टार प्लस के किस देश में है मेरा दिल-  नामक धारावाहिक में काम किया। उनको मुकम्मल पहचान एकता कपूर के धारावाहिक पवित्र रिश्ता से मिली। इसके बाद उन्हें फ़िल्मो के प्रस्ताव मिलना शुरू हो गए। साल 2013 में फ़िल्म काय पो छे में वो मुख्य अभिनेता थे और उनके अभिनय की खूब तारीफ़ भी हुई। उन्होंने क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी पर बनी बायोपिक एमएस धोनी में अभिनय के लिए याद किया जाता है। फिल्म केदारनाथ में तो उन्होंने गजब का यादगार अभिनय किया। पर उनकी फिल्मी कैरियर सिर्फ सात साल का रहा। वे फिल्म शुद्ध देसी रोमांस, डिटेक्टिव व्योमकेश बक्षी में भी नजर आए थे।

सुशांत सिंह राजपूत उन अभिनेताओं में थे जो चॉकलेटी चेहरा होने के बावजूद सिल्वर स्क्रीन पर अपने दमदार अभिनय से छाप छोड़ते थे। अभिनय जगह में 34 साल कोई उम्र नहीं होती। अभी वे एक से बढ़ कर एक दमदार चरित्र निभाने वाले थे।

सुशांत का परिवार बिहार के पूर्णिया जिले का का रहने वाला था।  21 जनवरी 1986 को पटना में जन्मे। पढ़ाई में वे शानदार थे। कुल 13 इंजीनियरिंग की परीक्षाएं पास की थी। पर अभिनय को कैरियर बनाया। यहां भी शानदार पारी रही।

पर यह शानदार अभिनेता 14 जून 2020 को हमें छोड़कर चला गया। पता नहीं किससे किस बात से नाराज था। उसे तो दर्शकों का खूब प्यार मिला था। एक अभिनेता सिर्फ अपने परिवार और रिश्तेदारों का नहीं होता। उस पर उसके प्रशंसकों का हक बन जाता है। पर इस लोक को छोड़ने का फैसला करने से पहले उसने इस एंगिल से नहीं सोचा। बहुत याद आओगे सुशांत।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( SUSHANT SINGH RAJPUT, KEDARNATH, MS DHONI , BIHAR, PURNIA ) 





Friday, 5 June 2020

सारा आकाश, रजनीगंधा और चितचोर वाले बासु चटर्जी

10 जनवरी 1930 – 4 जून 2020

बासु चटर्जी का नाम बिमल राय, ऋषिकेश मुखर्जी की पंक्ति में लिया जाना चाहिए जिन्होंने हिंदी सिनेमा को सार्थक फिल्में दी। चार जून को फिल्मकार बासु चटर्जी हमारे बीच नहीं रहे। उन्होंने 'छोटी सी बात', 'रजनीगंधा' के अलावा 'उस पार', 'चितचोर', 'पिया का घर', 'खट्टा मीठा' और बातों बातों में' जैसी फिल्में बनाई।   फिल्मकार के तौर पर उन्होंने राजेंद्र यादव के उपन्यास पर बनी फिल्म सारा आकाश से शुरुआत की। उन्होंने एक रुका हुआ फैसला और चमेली की शादी जैसी फिल्में भी बनाईं।

बासु चटर्जी हिन्दी सिनेमा के बहुमुखी प्रतिभा के धनी फिल्मकार थे। वे एक निर्देशक और पटकथा लेखक थे। पर शुरुआत एक कार्टूनिस्ट के तौर पर की थी।  साल 1970 और 1980 के दशक के दौरान, वह मध्यम सिनेमा नाम से जाने जाने वाले सिनेमाकाल से जुड़े हुए थे, जहां वे हृषिकेश मुखर्जी और बासु भट्टाचार्य जैसे फिल्म निर्माता थे।  

बासु चटर्जी ने शुरुआती दौर में कई फिल्मों में असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर काम किया। इससे पहले वे मुंबई में मशहूर कार्टूनिस्ट के तौर पर स्थापित हो चुके थे।
बासु दादा का जन्म 1930 में राजस्थान के अजमेर में हुआ था। मुंबई के एक अखबार में कार्टूनिस्ट और इलस्ट्रेटर का काम करने वाले बासु के बारे में किसने तब नहीं सोचा होगा कि वो भारतीय सिनेमा को अगली सीढ़ी पर कदम रखने में मदद करने वाले दिग्गज फिल्ममेकर साबित होंगे।

राज कपूर और वहीदा रहमान की फिल्म तीसरी कसम में उन्होंने बासु भट्टाचार्य के सहायक के तौर पर काम किया था। ये फिल्म साल 1966 में रिलीज हुई थी और इसमें बेस्ट फीचर फिल्म का अवॉर्ड जीता था। उनके डायरेक्टोरियल डेब्यू की बात करें तो उन्होंने निर्देशन के क्षेत्र में फिल्म सारा आकाश से शुरुआत की थी। ये फिल्म साल 1969 में रिलीज हुई थी और इसके लिए बेस्ट स्क्रीन प्ले का फिल्मफेयर अवॉर्ड जीता था।

टीवी पर भी बेहतरीन पारी - टीवी पर भी अस्सी के दशक में बासु चटर्जी क्रांति लेकर आए थे धारावाहिक रजनी के साथ। उन्होंने भारतीय टेलीविजन को दी थी टीवी की पहली गृहणी, जो क्रांतिकारी बातें करती थी।  टीवी पर बासु चटर्जी ने कई और धारावाहिक बनाए जैसे 'दर्पण  और 'कक्का जी कहिन ' दर्पण में उन्होंने विदेशी कहानियों को देसी अंदाज में पेश किया।
 'कक्का जी कहिन ' मनोहर श्याम जोशी के उपन्यास नेताजी कहिन पर आधारित था जिसमें  ओम पुरी को लेकर टीवी का पहला नेताओं पर व्यंगात्मक शो बनाया। वे साल 1993 में वे सिरियल ब्योमकेश बख्शी लेकर आए जिसके अभिनेता थे रजित कपूर। यह धारावाहिक भी खूब लोकप्रिय हुआ।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( BASU CHATARJEE, RAJNIGANDHA ) 

Tuesday, 2 June 2020

सत्यकाम – हिंदी सिनेमा इतिहास की बेहतरीन प्रेरक फिल्म


हिन्दी फिल्म इतिहास की चंद वे फिल्में जिन्हे बार बार देखने की इच्छा होती है उसमें एक है सत्यकाम। सन 1969 में बनी यह फिल्म कहानी की दृष्टि से अत्यंत उम्दा फिल्म है। फिल्म का नायक किसी भी सूरत में भ्रष्टाचार से समझौता नहीं करता। वह टूट जाता है, कैंसर से पीड़ित होकर मर जाता है पर सत्य और न्याय के मार्ग से समझौता नहीं करता। फिल्म में आदर्शवादी इंजीनियर सत्य प्रिय आचार्य की भूमिका में हैं धर्मेंद्र। सत्यकाम धर्मेंद्र की कालजयी फिल्मों में से है।

फिल्में उनके साथ संजीव कुमार, अशोक कुमार और शर्मिला टैगोर प्रमुख भूमिकाओं में हैं। फिल्म की कहानी सन 1946 से आरंभ होती है जब देश आजादी की दहलीज पर है। एक आदर्शवादी व्यक्ति सत्यप्रिय एक लड़की से मिलता है जिसका बलात्कार हुआ था। वह उसे अपनाता है। उससे शादी करता है। वह अपने आदर्शवाद के साथ उस बच्चे को भी अपनाता है जो उसका अपना नहीं है।
सन 1969 में 4 अप्रैल को प्रदर्शित इस फिल्म के निर्देशक थे ऋषिकेश मुखर्जी। फिल्म की कहानी नारायण सान्याल ने लिखी थी। फिल्म की पटकथा नारायण सान्याल के बांग्ला में इसी नाम के उपन्यास पर आधारित है। संवाद लेखक थे राजिंदर सिंह बेदी। फिल्म को उस साल सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म की श्रेणी में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिला था। सन 1971 में इस फिल्म के लिए राजिंदर सिंह बेदी को बेस्ट डॉयलॉग का फिल्म फेयर अवार्ड मिला।
मैं इंसान हूं, भगवान की सबसे बड़ी सृष्टि, मैं उसका प्रतिनिधि हूं, किसी अन्याय के साथ सुलह नहीं करूंगा।
कुछ साल पहले जब धर्मेंद्र से उनकी श्रेष्ठ फिल्मों के बारे में पूछा गया तो उन्होंने सत्यकाम का नाम लिया था। फिल्म का एक संवाद है – सत्य बोलने का अंहकार नहीं, सत्य बोलने का साहस होना चाहिए, चाहे सत्य कितना ही कठोर या अप्रिय क्यों न हो।
फिल्म की कहानी संजीव कुमार के वायस ओवर से शुरू होती है। वह अपने दोस्त सत्यकाम की कहानी सुना रहे हैं।

फिल्म के अंतिम दृश्यों में इंजीनियर धर्मेंद्र की मौत हो जाती है। उनके दादा सत्य शरण आचार्य (अशोक कुमार) वहां पहुंच गए हैं। वह सत्यप्रिय की बेसहारा हो चुकी पत्नी और उसके बेटे काबुल ( जो रक्त संबंध से सत्यप्रिय का पुत्र नहीं है) को अपनाने पर मजबूर जता हैं। वे काबुल की सत्य निष्ठा देखकर उसका नाम देते हैं सत्यकाम और कहते हैं - 

खून से वंश की परंपरा नहीं चलती। तो विश्वास का वहन करते हैं वही वंश को चलाते हैं।

आज समाज में जब हम आगे बढ़ने के लिए तुरंत शार्ट कट गलत तरीके अपनाने और भ्रष्ट आचरण करने के लिए तुरंत तैयार हो जाते हैं सत्यकाम जैसी फिल्में आपको प्रेरित करती हैं सत्य और न्याय के पथ पर चलते रहने के लिए।

अनुपमा, आनंद, अभिमान जैसी फिल्मेंन बनाने वाले ऋषिकेश मुखर्जी की बेहतरीन फिल्मों में से है सत्यकाम। फिल्म के कई – दृश्य आपको भावुक कर देते हैं। कई बार अंतर को उद्वेलित करते हैं। मौका मिले तो जरूर देखिए।
सन 1984 में जब मैं आठवीं कक्षा का छात्र था तब एक रविवार को दूरदर्शन पर सत्यकाम पहली बार देखी थी। इसके बाद इस फिल्म को कई बार देख चुका हूं।
-         - विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com 
(  ( SATYAKAM MOVIE, DHARMENDRA, SHARMILA TAGORE ) 

Wednesday, 27 May 2020

लंगड़ा राजकुमार – एक सार्थक फिल्म


हाल में एक सार्थक फिल्म देखने को मिली। लंगड़ा राजकुमार। फिल्म बेहतरीन है, संवेदनाओं से भरी हुई। फिल्म कहानी को प्रिंस के गड्ढे में गिरने के कथानक के आसपास बुना गया है। फिल्म शिक्षा के महत्व को दर्शाती है। गरीबी और लाचारी के पहलू को उजागर करती है।  

हालांकि इस फिल्म में हिट होने का मसाला नहीं है, क्योंकि कहानी दुखांत है। अक्सर दुखांत कहानियां सफल नहीं होती। पर जिंदगी सच्चाई में तो दुखांत भी शामिल है। हर कहानी का सुखद अंत भी नहीं होता न। पर लंगड़ा राजकुमार फिल्म का संदेश काफी मजबूत है। 

मुझे इस  बात का गर्व है कि हमारे साथी रहे अजय आनंद ने इतनी बेहतरीन फिल्म बनाई है। फिल्म में एक सुंदर गीत भी है। मां बेटे के रिश्तों पर केंद्रित ये बड़ा भावुक गीत है। गीत के बोल हैं-  है मां की यही दुआएं ... मेरे लाल हमेशा खुश रहना...जिंदगी में कभी न दुख सहना... 

फिल्म की कहानी गांव के एक पात्र चिमटा और उसके बेटे राजकुमार के आसपास घूमती है। फिल्म का निर्माण मदारी आर्ट्स एवं पिस्का इंटरटेनमेंट ने किया है। फिल्म देखने के बाद अजय आनंद से संवाद हुआ तो उन्होंने कहा, मेरी रूचि सार्थक फिल्मों में है। मैं आगे भी ऐसा ही करता रहूंगा।

दरअसल अजय आनंद साल 1996 से 1998 तक हमारे साथ थे हमारी पहली नौकरी में। वे कला संस्कृति पक्ष पर रिपोर्टिंग करते थे। पर तब भी वे पहुंचे हुए कलाकार थे। मंडी हाउस में होने वाले कई नाटकों में नामी-गिरामी निर्देशकों के साथ अभिनय कर चुके थे। कलम के धनी के साथ वे अभिनय के भी धनी थे। एक दिन वे सब छोड़कर मुंबई चले गए। कई सालों बाद संपर्क हुआ तो पता चला कि वे अब निर्देशन में हाथ आजमा रहे हैं।

तो आप भी उनकी फिल्म लंगड़ा राजकुमार जरूर देखें। पसंद आएगी। आपको यह श्याम बेनेगल की परंपरा की फिल्म लगेगी। फिल्म यूट्यूब पर उपलब्ध है। नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके फिल्म को देख सकते हैं। लॉकडाउन के दौरान 21 अप्रैल को फिल्म यूट्यूब पर रीलीज की गई है।    (https://www.youtube.com/watch?v=AdiUIhKnMcM )
-         विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
  ( LANGDA RAJKUMAR, MOVIE, AJAY ANAND ) 

Thursday, 30 April 2020

‘बॉबी’ का ‘राज’ चला गया...

तीन साल की फिल्म और टीवी रिपोर्टिंग के दौरान हालांकि ऋषि कपूर से कभी मिलने का मौका नहीं मिला, पर ऋषि कपूर की फिल्मों से एक भावनात्मक रिश्ता बनता था। जब मैंने फिल्म मेरा नाम जोकर देखी तब फिल्म में जैसा किशोर किरदार ऋषि के हिस्से में था उसी वय से तब मैं गुजर रहा था। हालांकि वह फिल्म राजकपूर की थी पर ऋषि ने उसमें राजकपूर के बचपन की भूमिका निभाई थी।

बाद में उन्हें परिवार की मतलब आरके बैनर की दूसरी फिल्म बॉबी में मौका मिला। बॉबी में वे राजदूत मोटरसाइकिल की छोटी बाइक मिनी राजदूत मतलब राजदूत जीटीएस चलाते नजर आते हैं। संयोग से मैंने भी बचपन में इसी बाइक पर सबसे पहले हाथ साफ किया था। बॉबी सुपर डुपर हिट रही। इसकी अभिनेत्री डिंपल कपाडिया ने बाद में राजेश खन्ना से विवाह किया। पर ऋषि कपूर की आगे जोड़ी बनी नीतू सिंह के साथ। बाद में नीतू सिंह उनकी जीवन संगिनी भी बनीं।

ऋषि कपूर की फिल्म कभी कभी और आरके फिल्म्स की प्रेम रोगी में यादगार भूमिकाएं थीं। अमिताभ बच्चन के साथ वे कुली में नजर आए। कुली का गीत लंबू लंबू जी हां बोलो टींगू जी में उन दोनो की केमिस्ट्री खूब नजर आई। तब उनके निधन पर अमिताभ बच्चन भावुक हो उठे। नब्बे के दशक में फिल्म चांदनी में उनका अभिनय यादगार था।
हालांकि ऋषि कपूर उन अभिनेताओं की फेहरिस्त में थे जिन्हे स्टार संस का साथ मिला। अभिनय उन्हें चांदी की कटोरी में रखकर मिली थी। पर एक समय में वे युवा वर्ग के बीच लोकप्रिय चेहरा बन गए थे। हालांकि एक अभिनेता के तौर पर वे अपने पिता राजकपूर या चाचा शशि कपूर के सामने कहीं नहीं ठहरते। पर इस दुनिया से कूच करने के लिए 67 साल कोई उम्र होती है क्या... नहीं ना। ऋषि कपूर को भावभीनी श्रद्धांजलि।
( ऋषि कपूर - 4 सितंबर 1952 -- 30 अप्रैल 2020 ) 
-         --- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmai.com  
   ( RISHI KAPOOR, 30 APR 2020 ) 



Monday, 6 January 2020

प्रेम नाम है मेरा - प्रेम चोपड़ा


प्रेम नाम है मेरा - प्रेम चोपड़ा, वैसे तो ये बड़ा चर्चित डॉयलाग है। पर हिंदी फिल्मों के मशहूर खलनायक प्रेम चोपड़ा की संस्मरणात्मक आत्मकथा की पुस्तक इसी नाम से हिंदी में प्रकाशित हुई है। प्रेम चोपड़ा अब 84 साल के हो चुके हैं। हिंदी से लेकर हॉलीवुड तक 400 फिल्मों में अभिनय करने वाले प्रेम चोपड़ा पर प्रकाशित ये पुस्तक हिंदी में यश पब्लिकेशन ने प्रकाशित की है। इसी पुस्तक के विमोचन के लिए प्रेम चोपड़ा 5 जनवरी 2020 को दिल्ली के प्रगति मैदान में चल रहे विश्व पुस्तक मेले में पधारे। उन्हे देखते ही कार्यक्रम में हर उम्र के लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। 
प्रेम चोपड़ा ने भी किसी को निराश नहीं किया। लोगों के सवालों के खूब जवाब दिए। अपने जीवन से जुड़े कई किस्से सुनाए। अपने लोकप्रिय संवाद सुनाए। - दुनिया जानती है मैं कितना शरीफ आदमी हूं। 

प्रेम चोपड़ा पर ये पुस्तक उनकी बेटी रितिका नंदा ने लिखी है। रितिका जाने माने उपन्यासकार गुलशन नंदा की बहू हैं। पुस्तक प्रेम चोपड़ा की फिल्म इंडस्ट्री में संघर्ष की गाथा बड़े रोचक अंदाज में बयां करती है। हालांकि प्रेम चोपड़ा हिंदी फिल्म जगत में राजकपूर और प्रेम नाथ जैसे नामचीन लोगों के रिश्तेदार थे। पर उन्हें फिल्मों में जगह बनाने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा। पुस्तक उनके संघर्ष पर भी प्रकाश डालती है।

प्रेम चोपड़ा की पहचान हिंदी फिल्मों के बड़े खतरनाक विलेन के तौर पर है। जिसके पर्दे पर आते ही लोगों को साजिश की बू आने लगती है। लोग उनसे परदे पर देखते ही नफरत का भाव मन में ले आते हैं। पर प्रेम चोपड़ा निजी जिंदगी में उस रजत पट की छवि से काफी अलग हैं।  
पुस्तक मेले में प्रेम चोपड़ा के साथ बैठे थे मशहूर पत्रकार राजीव शुक्ला, जिन्होंने प्रेम चोपड़ा के व्यक्तित्व से जुड़े कई अनछुए पहलुओं पर प्रकाश डाला। हिंदी सिनेमा में रुचि रखने वालों के लिए संग्रहणीय और पठनीय पुस्तक है - प्रेम नाम है मेरा। आप इसे प्राप्त कर सकते हैं यश पब्लिकेशंस से। 
प्रकाशक का फेसबुक पेज देखें - - https://www.facebook.com/yashprakashan/

- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com   


Tuesday, 18 September 2018

मूक फिल्मों के दौर में तीन दिन

देश की पहली कामर्सियल फिल्म राजा हरिश्चंद्र 1913 में बनी। ये बात सभी जानते हैं। पर दादा साहब फाल्के की यह मूक फिल्म कितने लोगों ने देखी। राजा हरिश्चंद्र समेत दादा साहेब फाल्के की कई और मूक फिल्मों को देखने का सौभाग्य मिला दिल्ली के इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फार आर्ट्स में 14 से 16 सितंबर 2018 के बीच हुए मूक फिल्म समारोह में।
पत्रकार इकबाल रिजवी की पुस्तक पोस्टर बोलते हैं का विमोचन भी हुआ। ( 14  सितंबर 2018 ) 


यह अतीत में खो जाने का एक सुनहरा मौका था। समारोह के दौरान विषय परावर्तन करते हुए आईजीएनसीए के डाक्टर सचिदानंद जोशी ने मूक फिल्मों के महत्व को काफी सुगम ढंग से रेखांकित किया। इसे सफल बनाने में वरिष्ठ पत्रकार सुरेश शर्मा की बड़ी भूमिका रही। पहले दिन मूक फिल्म समरोह के उदघाटन के मौके पर प्रसिद्ध फिल्मकार श्याम बेनेगल और पटकथा लेखक अतुल तिवारी मौजूद थे।

दादा साहेब फाल्के की राजा हरिश्चंद्र – 1913
सिनेमा के अतीत के दौर पर सार्थक चर्चा के बाद दादा साहेब फाल्के की उस फिल्म का प्रदर्शन हुआ जिसने भारतीय सिनेमा जगत के इतिहास की नींव रखी। ये फिल्म सिर्फ 14 मिनट की बची है। फिल्म में कहानी को आगे बढ़ाने के लिए बीच बीच में अंग्रेजी-हिंदी में शीर्षकों का सहारा लिया गया था। पुणे फिल्म आर्काईव ने इसका डिजिटल वर्जन बनाने के साथ बैक स्कोर म्युजिक लगा दिया है। दादा साहेब फाल्के ने राजा हरिश्चंद्र की कहानी के लिए मार्कडेय पुराण की कथा को आधार बनाया था। फिल्म की कहानी में महर्षि विश्वामित्र विलेन की भूमिका में हैं,  हालांकि फिल्म का अंत सुखांत है। बाद में राजा हरिश्चंद्र पर कई और फिल्में भी बनीं। खुद दादा साहेब फाल्के 1943 के बाद इस फिल्म को सवाल बनाना चाहते थे। पर उनके गरम दल से जुड़ाव के कारण ब्रिटिश सरकार ने उन्हें अनुमति नहीं दी। देश आजाद होने से पहले दादा साहब का निधन हो चुका था। 


1400 मूक फिल्में बनी 1913 से 1931 के बीच।

09 फिल्में ही उपलब्ध है मूक दौर की बाकी सारी फिल्में नष्ट हो गईं।

1944 में 16 फरवरी को दादा साहेब फाल्के का निधन हो गया। 


1870 में 30 अप्रैल को फाल्के साहब का जन्म नासिक जिले में तीर्थ स्थल त्रयंबकेश्वर में हुआ था। 


पहले दिन समारोह में दादा साहेब फाल्के की 1918 में बनी श्रीकृष्ण जन्म और 1919 में बनी कालिया मर्दन का प्रदर्शित की गईं। श्रीकृष्ण जन्म का 12 मिनट का और कालिया मर्दन का 48 मिनट का फुटेज उपलब्ध है।

मूक फिल्म समारोह के तीसरे और आखिरी दिन 1903 में बनी फिल्म लाइफ एंड पैसन ऑफ जीसस क्राइस्ट देखने का मौका मिला। यह विश्व की शुरुआती फीचर फिल्मों में शामिल की जाती है। दादा साहेब फाल्के फ्रांस में बनी इस फिल्म से बहुत प्रेरित थे। उन्होंने लंदन में इस फिल्म के कई शो देखे थे। उन्हें इस फिल्म को देखकर ही भारत में फिल्में बनाने की प्रेरणा मिली थी।

इस शो में हमें दादा साहेब की अगली फिल्म लंका दहन देखने का मौका मिला । यह फिल्म 1917 में बनी थी। पर इस फिल्म की अब महज 5 मिनट की फुटेज ही उपलब्ध है। इसमें अशोक वाटिका का दृश्य है। अन्ना सालुंके ने इसमें दोहरी भूमिकाएं की थी। फिल्म में दादा साहेब फाल्के के कैमरामैन गणपत शिंदे हनुमान बने हैं। ये भारतीय फिल्मों के इतिहास में पहला डबल रोल था।

क्या आपको पता है कि 1928 में बनी शिराज ताजमहल पर बनी पहली फिल्म थी। एक घंटे 24 मिनट की इस मूक फिल्म में ताजमहल की कहानी बिल्कुल अलग अंदाज में है। इसकी कहानी निरंजनपाल ने लिखी थी। वे गरम दल के नेता बिपिन चंद्रपाल के बेटे थे। 

फिल्म शिराज का दृश्य ( 1928 ) 
शिराज की कहानी शाहजहां और उसकी रानी मुमताज की प्रेम कहानी तो है। पर शिराज इसमें वह चरित्र है जिसके घर बचपन में नूरजहां पली थी। शिराज भी नूरजहां से प्रेम करता था। इस फिल्म की कहानी के मुताबिक शिराज ही ताजमहल का वास्तुकार है। हालांकि निरंजन पाल को शिराज की कहानी कहां से मिली ये नहीं पता चलता। ये फिल्म ब्रिटेन और जर्मनी के फिल्म कपंनियों के सहयोग से बनी थी। इसमें हिमांशु राय शिराज की भूमिका में हैं।

हमने आखिरी फिल्म देखी नोटिर पूजा। 1932 में बनी इस फिल्म मेंकवि गुरु रविंद्रनाथ टैगोर ने भी छोटी सी भूमिका की थी। फिल्म 21 मिनट की है। टैगोर इस फिल्म के निर्देशक भी हैं। वास्तव मेंयह फिल्म टैगोर के 1926 के एक ड्रामा की रिकार्डिंग है।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com

( RAJA HARISHCHANDRA, NOTIR PUJA, SHIRAJ, LANKA DAHAN, KALIA MARDAN, SRI KRISHNA JANAM )