Monday, 22 June 2020

लॉकडाउन ने दिखाए नए रास्ते

इस लॉकडाउन ने जीने का तरीका बदल दिया है। तकनीक के इस्तेमाल से जहां लोग अपनों से संपर्क की कोशिश में हैं तो कई तरह के आयोजनों का स्वरूप भी बदल गया है।

मिलना जुलना काफी कम हो गया है तो लोग व्हाट्सएप कॉलिंग और गूगल डियो से कॉलिंग करके एक दूसरे को देखने की कोशिश कर रहे हैं। भला हो कि अब इंटरनेट गांव गांव पहुंच गया है इसलिए यह सब कुछ संभव हो पा रहा है।
स्कूल कॉलेज की कक्षाएं जूम एप, एमएस टीम पर लगने लगी हैं। लॉकडाउन से ठीक पहले मेरे बेटे पटना चले गए थे। पर उनके दिल्ली स्थित स्कूल  की कक्षाएं पहले जूम एप लगने लगीं बाद में माइक्रोसाफ्ट के टिम्स पर। कई कॉलेजों के शिक्षक भी कक्षाएं भी टीम ले रहे हैं। भुवनेश्वर के आकाश इंस्टीट्यूट कोचिंग में फैकल्टी में कार्यरत वीरेंद्र कुमार वर्मा भी कोचिंग में फिजिक्स की कक्षाएं रोज ऑनलाइन ले रहे हैं। जीमेल ने भी गूगल मीट नामक एप अपने फीचर में जोड़ा है जिसमें एक साथ ज्यादा लोग लाइव हो सकते हैं।

तो क्या आने वाले दौर में स्कूल, कॉलेज कोचिंग का स्वरूप बदल जाएगा। हमारे स्कूल शिक्षक साथी दिग्विजय नाथ सिंह कहते हैं कि कई स्कूलों ने इसके लिए पहले से ही तैयारी करनी शुरू कर दी थी। मतलब ऑनलाइन कक्षाएं और उसके लिए सक्षम साफ्टवेयर की तैयारी। तो फिर स्कूलों के विशाल भवन की क्या जरूरत रह जाएगी। छात्र एकलव्य की तरह शिक्षा लिया करेंगे। कई जगह अभिभावक आंदोलन कर रहे हैं कि जब कक्षाएं नहीं तो स्कूल इतनी मोटी मोटी फीस क्यों ले रहे हैं। गाजियाबाद के अभिभावक कह रहे हैं कि स्कूल फीस लेना बंद करें।

शैक्षिक सेमिनारों की जगह वेबिनार ने ले ली है। अब शिक्षाविद लोग जूम एप पर वेबिनार का आयोजन कर रहे हैं। हालांकि कई लोग ऐसे वेबिनार के खिलाफ भी हैं।
वैसे सेमिनार, गोष्ठी या सांस्कृतिक आयोजनों में जाने पर लोगों से जो प्रत्यक्ष संवाद होता था वह इन वेबिनारों में कहां संभव है। कुछ पुराने लोगों से मुलाकात और कुछ नए लोगों से दोस्ती के मौके खत्म हो गए हैं। वेबिनार में सिर्फ पुराने मठाधीशों की चलती है। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के आयोजन भी ऑनलाइन होने लगे हैं। रोज मिलने वाले लोग अब आभासी दुनिया में मिलने लगे हैं। 

कई संस्थाओं ने फेसबुक लाइव का चलन शुरू किया है। गायक, संस्कृतिकर्मी और शिक्षाविद अलग अलग लोकप्रिय पेज पर फेसबुक लाइव कर रहे हैं। इसका फायदा है देशदुनिया के अलग अलग शहरों के लोग निश्चित समय पर जुड़ कर एक दूसरे को सुनते हैं।

छपरा, दिल्ली, पटना, बनारस, न्यूयार्क सब एक साथ ये फेसबुक लाइव पर संभव है। यहां कमेंट्स के माध्यम से दो तरफा संवाद भी संभव हो पाता है। पिछले 21 जून को मुझे सारण भोजपुरिया समाज के फेसबुक पेज पर बतकही करने का मौका मिला। भोजपुरी में एक घंटे बोलना था। भोजपुरी क्षेत्र के पर्यटक स्थलों के बारे में। कई सौ लोग जुड़े। बाद में इस लाइव को हजारों लोगों ने सुना। इतनी रोचकता रही कि समय कम पड़ गया। यह सब कुछ तकनीक से संभव है।

हिन्दुस्तान हिंदी दैनिक के मुख्य संपादक शशि शेखर जी पिछले दिनों हम बीएचयू के लोग के फेसबुक पेज पर लाइव हुए। फिर वे हरि सिंह गौड़ विश्वविद्यालय सागर के छात्रों को फेसबुक लाइव से संबोधित करते नजर आए। फेसबुक लाइव का फायदा है कि आपको घर से कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं। और देश दुनिया के लोग आपको सुन सकते हैं। रियल टाइम में भी और बाद में भी। तो यह सब कुछ भविष्य में भी जारी रहने वाला है। लॉकडाउन ने हमें कुछ नए रास्ते दिखा दिए हैं।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( LOCKDOWN, SEMINAR, WEBINAR, FACEBOOK LIVE, ZOOM APP, MS TEAM )  


  


Sunday, 14 June 2020

अलविदा, पर बहुत याद आओगे सुशांत


अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत ने आत्महत्या की।  सिर्फ 34 साल के थे सुशांत । आखिर क्या मजबूरी थी कि खुद को फांसी लगा ली ?? जो जैसा दिखता है , वैसा होता नहीं । खुशियों की चादर और शोहरत के नीचे का दर्द किसी को नजर नहीं आता । ये लिखती हैं टीवी पत्रकार सुचित्रा कुकरेती।

वाकई एक मोहक अभिनेता जिसने कई खूबसूरत फिल्में दी हो इस तरह अपनी इह लीला खत्म कर ले तो बड़ा दुखद लगता है। सुशांत सिंह राजपूत बिहार के रहने वाले थे। पटना के सेंट करेन हाईस्कूल से पढ़ाई की।

सुशांत सिंह राजपूत का अभिनय में कैरियर टीवी पर शुरू हुआ था। सबसे पहले उन्होंने 2008 में स्टार प्लस के किस देश में है मेरा दिल-  नामक धारावाहिक में काम किया। उनको मुकम्मल पहचान एकता कपूर के धारावाहिक पवित्र रिश्ता से मिली। इसके बाद उन्हें फ़िल्मो के प्रस्ताव मिलना शुरू हो गए। साल 2013 में फ़िल्म काय पो छे में वो मुख्य अभिनेता थे और उनके अभिनय की खूब तारीफ़ भी हुई। उन्होंने क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी पर बनी बायोपिक एमएस धोनी में अभिनय के लिए याद किया जाता है। फिल्म केदारनाथ में तो उन्होंने गजब का यादगार अभिनय किया। पर उनकी फिल्मी कैरियर सिर्फ सात साल का रहा। वे फिल्म शुद्ध देसी रोमांस, डिटेक्टिव व्योमकेश बक्षी में भी नजर आए थे।

सुशांत सिंह राजपूत उन अभिनेताओं में थे जो चॉकलेटी चेहरा होने के बावजूद सिल्वर स्क्रीन पर अपने दमदार अभिनय से छाप छोड़ते थे। अभिनय जगह में 34 साल कोई उम्र नहीं होती। अभी वे एक से बढ़ कर एक दमदार चरित्र निभाने वाले थे।

सुशांत का परिवार बिहार के पूर्णिया जिले का का रहने वाला था।  21 जनवरी 1986 को पटना में जन्मे। पढ़ाई में वे शानदार थे। कुल 13 इंजीनियरिंग की परीक्षाएं पास की थी। पर अभिनय को कैरियर बनाया। यहां भी शानदार पारी रही।

पर यह शानदार अभिनेता 14 जून 2020 को हमें छोड़कर चला गया। पता नहीं किससे किस बात से नाराज था। उसे तो दर्शकों का खूब प्यार मिला था। एक अभिनेता सिर्फ अपने परिवार और रिश्तेदारों का नहीं होता। उस पर उसके प्रशंसकों का हक बन जाता है। पर इस लोक को छोड़ने का फैसला करने से पहले उसने इस एंगिल से नहीं सोचा। बहुत याद आओगे सुशांत।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( SUSHANT SINGH RAJPUT, KEDARNATH, MS DHONI , BIHAR, PURNIA ) 





Friday, 5 June 2020

सारा आकाश, रजनीगंधा और चितचोर वाले बासु चटर्जी

10 जनवरी 1930 – 4 जून 2020

बासु चटर्जी का नाम बिमल राय, ऋषिकेश मुखर्जी की पंक्ति में लिया जाना चाहिए जिन्होंने हिंदी सिनेमा को सार्थक फिल्में दी। चार जून को फिल्मकार बासु चटर्जी हमारे बीच नहीं रहे। उन्होंने 'छोटी सी बात', 'रजनीगंधा' के अलावा 'उस पार', 'चितचोर', 'पिया का घर', 'खट्टा मीठा' और बातों बातों में' जैसी फिल्में बनाई।   फिल्मकार के तौर पर उन्होंने राजेंद्र यादव के उपन्यास पर बनी फिल्म सारा आकाश से शुरुआत की। उन्होंने एक रुका हुआ फैसला और चमेली की शादी जैसी फिल्में भी बनाईं।

बासु चटर्जी हिन्दी सिनेमा के बहुमुखी प्रतिभा के धनी फिल्मकार थे। वे एक निर्देशक और पटकथा लेखक थे। पर शुरुआत एक कार्टूनिस्ट के तौर पर की थी।  साल 1970 और 1980 के दशक के दौरान, वह मध्यम सिनेमा नाम से जाने जाने वाले सिनेमाकाल से जुड़े हुए थे, जहां वे हृषिकेश मुखर्जी और बासु भट्टाचार्य जैसे फिल्म निर्माता थे।  

बासु चटर्जी ने शुरुआती दौर में कई फिल्मों में असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर काम किया। इससे पहले वे मुंबई में मशहूर कार्टूनिस्ट के तौर पर स्थापित हो चुके थे।
बासु दादा का जन्म 1930 में राजस्थान के अजमेर में हुआ था। मुंबई के एक अखबार में कार्टूनिस्ट और इलस्ट्रेटर का काम करने वाले बासु के बारे में किसने तब नहीं सोचा होगा कि वो भारतीय सिनेमा को अगली सीढ़ी पर कदम रखने में मदद करने वाले दिग्गज फिल्ममेकर साबित होंगे।

राज कपूर और वहीदा रहमान की फिल्म तीसरी कसम में उन्होंने बासु भट्टाचार्य के सहायक के तौर पर काम किया था। ये फिल्म साल 1966 में रिलीज हुई थी और इसमें बेस्ट फीचर फिल्म का अवॉर्ड जीता था। उनके डायरेक्टोरियल डेब्यू की बात करें तो उन्होंने निर्देशन के क्षेत्र में फिल्म सारा आकाश से शुरुआत की थी। ये फिल्म साल 1969 में रिलीज हुई थी और इसके लिए बेस्ट स्क्रीन प्ले का फिल्मफेयर अवॉर्ड जीता था।

टीवी पर भी बेहतरीन पारी - टीवी पर भी अस्सी के दशक में बासु चटर्जी क्रांति लेकर आए थे धारावाहिक रजनी के साथ। उन्होंने भारतीय टेलीविजन को दी थी टीवी की पहली गृहणी, जो क्रांतिकारी बातें करती थी।  टीवी पर बासु चटर्जी ने कई और धारावाहिक बनाए जैसे 'दर्पण  और 'कक्का जी कहिन ' दर्पण में उन्होंने विदेशी कहानियों को देसी अंदाज में पेश किया।
 'कक्का जी कहिन ' मनोहर श्याम जोशी के उपन्यास नेताजी कहिन पर आधारित था जिसमें  ओम पुरी को लेकर टीवी का पहला नेताओं पर व्यंगात्मक शो बनाया। वे साल 1993 में वे सिरियल ब्योमकेश बख्शी लेकर आए जिसके अभिनेता थे रजित कपूर। यह धारावाहिक भी खूब लोकप्रिय हुआ।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( BASU CHATARJEE, RAJNIGANDHA ) 

Tuesday, 2 June 2020

सत्यकाम – हिंदी सिनेमा इतिहास की बेहतरीन प्रेरक फिल्म


हिन्दी फिल्म इतिहास की चंद वे फिल्में जिन्हे बार बार देखने की इच्छा होती है उसमें एक है सत्यकाम। सन 1969 में बनी यह फिल्म कहानी की दृष्टि से अत्यंत उम्दा फिल्म है। फिल्म का नायक किसी भी सूरत में भ्रष्टाचार से समझौता नहीं करता। वह टूट जाता है, कैंसर से पीड़ित होकर मर जाता है पर सत्य और न्याय के मार्ग से समझौता नहीं करता। फिल्म में आदर्शवादी इंजीनियर सत्य प्रिय आचार्य की भूमिका में हैं धर्मेंद्र। सत्यकाम धर्मेंद्र की कालजयी फिल्मों में से है।

फिल्में उनके साथ संजीव कुमार, अशोक कुमार और शर्मिला टैगोर प्रमुख भूमिकाओं में हैं। फिल्म की कहानी सन 1946 से आरंभ होती है जब देश आजादी की दहलीज पर है। एक आदर्शवादी व्यक्ति सत्यप्रिय एक लड़की से मिलता है जिसका बलात्कार हुआ था। वह उसे अपनाता है। उससे शादी करता है। वह अपने आदर्शवाद के साथ उस बच्चे को भी अपनाता है जो उसका अपना नहीं है।
सन 1969 में 4 अप्रैल को प्रदर्शित इस फिल्म के निर्देशक थे ऋषिकेश मुखर्जी। फिल्म की कहानी नारायण सान्याल ने लिखी थी। फिल्म की पटकथा नारायण सान्याल के बांग्ला में इसी नाम के उपन्यास पर आधारित है। संवाद लेखक थे राजिंदर सिंह बेदी। फिल्म को उस साल सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म की श्रेणी में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिला था। सन 1971 में इस फिल्म के लिए राजिंदर सिंह बेदी को बेस्ट डॉयलॉग का फिल्म फेयर अवार्ड मिला।
मैं इंसान हूं, भगवान की सबसे बड़ी सृष्टि, मैं उसका प्रतिनिधि हूं, किसी अन्याय के साथ सुलह नहीं करूंगा।
कुछ साल पहले जब धर्मेंद्र से उनकी श्रेष्ठ फिल्मों के बारे में पूछा गया तो उन्होंने सत्यकाम का नाम लिया था। फिल्म का एक संवाद है – सत्य बोलने का अंहकार नहीं, सत्य बोलने का साहस होना चाहिए, चाहे सत्य कितना ही कठोर या अप्रिय क्यों न हो।
फिल्म की कहानी संजीव कुमार के वायस ओवर से शुरू होती है। वह अपने दोस्त सत्यकाम की कहानी सुना रहे हैं।

फिल्म के अंतिम दृश्यों में इंजीनियर धर्मेंद्र की मौत हो जाती है। उनके दादा सत्य शरण आचार्य (अशोक कुमार) वहां पहुंच गए हैं। वह सत्यप्रिय की बेसहारा हो चुकी पत्नी और उसके बेटे काबुल ( जो रक्त संबंध से सत्यप्रिय का पुत्र नहीं है) को अपनाने पर मजबूर जता हैं। वे काबुल की सत्य निष्ठा देखकर उसका नाम देते हैं सत्यकाम और कहते हैं - 

खून से वंश की परंपरा नहीं चलती। तो विश्वास का वहन करते हैं वही वंश को चलाते हैं।

आज समाज में जब हम आगे बढ़ने के लिए तुरंत शार्ट कट गलत तरीके अपनाने और भ्रष्ट आचरण करने के लिए तुरंत तैयार हो जाते हैं सत्यकाम जैसी फिल्में आपको प्रेरित करती हैं सत्य और न्याय के पथ पर चलते रहने के लिए।

अनुपमा, आनंद, अभिमान जैसी फिल्मेंन बनाने वाले ऋषिकेश मुखर्जी की बेहतरीन फिल्मों में से है सत्यकाम। फिल्म के कई – दृश्य आपको भावुक कर देते हैं। कई बार अंतर को उद्वेलित करते हैं। मौका मिले तो जरूर देखिए।
सन 1984 में जब मैं आठवीं कक्षा का छात्र था तब एक रविवार को दूरदर्शन पर सत्यकाम पहली बार देखी थी। इसके बाद इस फिल्म को कई बार देख चुका हूं।
-         - विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com 
(  ( SATYAKAM MOVIE, DHARMENDRA, SHARMILA TAGORE ) 

Saturday, 30 May 2020

कहीं दूर जब दिन ढल जाए….चले जाना योगेश का


जिन्होंने सजाये यहां मेले,
सुख-दुःख संग-संग झेले
वही चुनकर खामोशी,
यूं चले जाएं अकेले कहां

और अकेले  ही चले गए योगेश। 29 मई 2020 को तीन लोग इस दुनिया से रुखसत हो गए। हिंदी फिल्मों में अर्थपूर्ण गीत लिखने वाले योगेश नहीं रहे। तो छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व नौकरशाह अजीत जोगी और ज्योतिषी बेजान दारुवाला का निधन हो गया।
गीतकार योगेश ने फिल्म आनंद के लिए – कहीं दूर जब दिन ढल जाए, सांझ की दुल्हन नजर चुराए, जिंदगी कैसी है पहेली....लिखा। उन्होंने रिमझिम गिरे सावन, सुलग सुलग जाए मन जैसे गीत भी लिखे थे।
योगेश 16 साल की उम्र में गीत लिखने के लिए लखनऊ से मुंबई पहुंच गए थे। योगेश ने एक फिल्म में गाने लिखे। उन्हें ऋषिकेश मुखर्जी ने सुना और 'आनंद' फिल्म में मौका दिया।
रजनीगंधा का 'कई बार यूं भी देखा है'  फिल्म मिली का 'आए तुम याद मुझे' छोटी सी बात का 'न जाने क्यों होता है ये जिंदगी के साथ' जैसे गीतों के शब्द योगेश के थे।

उनके निधन पर लता मंगेशकर ने लिखा – मुझे अभी पता चला कि दिल को छूने वाले गीत लिखने वाले कवि योगेश जी का आज स्वर्गवास हो गया। ये सुनके मुझे बहुत दुख हुआ। योगेश जी बहुत शांत और मधुर स्वभाव के इंसान थे। मैं उनको विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करती हूं।

दूरदर्शन के राज्यसभा चैनल पर शख्शियत कार्यक्रम में योगेश का एक साक्षात्कार सुनने को मिला था।  योगेश गौड़ शहर लखनऊ के रहने वाले थे। उनका जन्म 1943 में हुआ था। सन 1962 में महज 19 साल की उम्र में सखी राबिन फिल्म के लिए उन्होंने छह गीत लिखे थे।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( YOGESH, GEET, FILMS ) 

Wednesday, 27 May 2020

लंगड़ा राजकुमार – एक सार्थक फिल्म


हाल में एक सार्थक फिल्म देखने को मिली। लंगड़ा राजकुमार। फिल्म बेहतरीन है, संवेदनाओं से भरी हुई। फिल्म कहानी को प्रिंस के गड्ढे में गिरने के कथानक के आसपास बुना गया है। फिल्म शिक्षा के महत्व को दर्शाती है। गरीबी और लाचारी के पहलू को उजागर करती है।  

हालांकि इस फिल्म में हिट होने का मसाला नहीं है, क्योंकि कहानी दुखांत है। अक्सर दुखांत कहानियां सफल नहीं होती। पर जिंदगी सच्चाई में तो दुखांत भी शामिल है। हर कहानी का सुखद अंत भी नहीं होता न। पर लंगड़ा राजकुमार फिल्म का संदेश काफी मजबूत है। 

मुझे इस  बात का गर्व है कि हमारे साथी रहे अजय आनंद ने इतनी बेहतरीन फिल्म बनाई है। फिल्म में एक सुंदर गीत भी है। मां बेटे के रिश्तों पर केंद्रित ये बड़ा भावुक गीत है। गीत के बोल हैं-  है मां की यही दुआएं ... मेरे लाल हमेशा खुश रहना...जिंदगी में कभी न दुख सहना... 

फिल्म की कहानी गांव के एक पात्र चिमटा और उसके बेटे राजकुमार के आसपास घूमती है। फिल्म का निर्माण मदारी आर्ट्स एवं पिस्का इंटरटेनमेंट ने किया है। फिल्म देखने के बाद अजय आनंद से संवाद हुआ तो उन्होंने कहा, मेरी रूचि सार्थक फिल्मों में है। मैं आगे भी ऐसा ही करता रहूंगा।

दरअसल अजय आनंद साल 1996 से 1998 तक हमारे साथ थे हमारी पहली नौकरी में। वे कला संस्कृति पक्ष पर रिपोर्टिंग करते थे। पर तब भी वे पहुंचे हुए कलाकार थे। मंडी हाउस में होने वाले कई नाटकों में नामी-गिरामी निर्देशकों के साथ अभिनय कर चुके थे। कलम के धनी के साथ वे अभिनय के भी धनी थे। एक दिन वे सब छोड़कर मुंबई चले गए। कई सालों बाद संपर्क हुआ तो पता चला कि वे अब निर्देशन में हाथ आजमा रहे हैं।

तो आप भी उनकी फिल्म लंगड़ा राजकुमार जरूर देखें। पसंद आएगी। आपको यह श्याम बेनेगल की परंपरा की फिल्म लगेगी। फिल्म यूट्यूब पर उपलब्ध है। नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके फिल्म को देख सकते हैं। लॉकडाउन के दौरान 21 अप्रैल को फिल्म यूट्यूब पर रीलीज की गई है।    (https://www.youtube.com/watch?v=AdiUIhKnMcM )
-         विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
  ( LANGDA RAJKUMAR, MOVIE, AJAY ANAND ) 

Sunday, 24 May 2020

लॉकडाउन डायरी-चौथा चरण, मामले तेजी से बढ़े पर ढील जारी

हम कोरोना महामारी के बीच देशव्यापी लॉकडाउन के चौथे चरण में पहुंच गए हैं। भले मामलों में इजाफा जारी है पर अब अलग- अलग राज्य अपने अपने हिसाब से लॉकडाउन में ढील की योजना पर काम कर रहे हैं।
18 मई, सोमवार, 55वां दिन - देश में कोरोना संक्रमण के मामले एक लाख के करीब पहुंचने वाले हैं। कोरोना से आज 157 लोगों की मौत हुई। कुल मामले 96 हजार को पार कर गए। पिछले दो दिनों से एक दिन में पांच हजार के आसपास नए मामले आ रहे हैं। पर इस बीच दिल्ली, यूपी कर्नाटक जैसे राज्यों में कुछ ढील की शुरुआत हो रही है। दिल्ली में बस, टैक्सी, आटो, ग्रामीण सेवा, बाइक का संचालन नियंत्रित तरीके से शुरू हो रहा है। 

19 मई, मंगलवार - 56वां दिन - बहुत दुखद है, कोरोना ने मीडिया सेक्टर में पांव पसारना शुरू कर दिया है। समाचार चैनल जी न्यूज के 28 साथी कोरोना पॉजीटिव पाए गए हैं। हमारे साथियों का कहना है कि भारत में जून और जुलाई में कोरोना का पीक सीजन आने वाला है।
कोरोना संक्रमितों की संख्या  एक लाख को पार कर गई है। आज पांच हजार मामले आए नए। वहीं कुल 124 लोगों की जान गई। दिल्ली में एक दिन में सबसे ज्यादा 500 मामले आए। उधर आज से दिल्ली के बाजार ऑड इवन की तर्ज पर खुल गए हैं। 
दिन भर मजदूरों के घर भेजने पर सियासत जारी रही। रेलवे अब तक श्रमिक स्पेशनल ट्रेनों 20 लाख लोगों को भेजने का दावा कर रही है। पर दिल्ली, गुजरात, पंजाब से लाखों लोग अभी भी घर जाने के लिए मारा मारी कर रहे हैं। इस मोर्चे पर सरकार बुरी तरह फेल हो गई है। लॉकडाउन की तैयारी से पहले सारे लोगों को उनके सेफ जोन में जाने का मौका दिया जाना चाहिए था। आज जो मजदूर सड़क पर निकलकर भीड़ का हिस्सा बने हैं वहां किसी तरह की सोशल डिस्टेंसिंग का पालन नहीं हो रहा है। 
20 मई 2020, बुधवार - 57वां दिन - देश भर में जब करोड़ों मजदूरों के सब्र का बांध टूटने लगा है तब सरकार ने एक जून से हर रोज 200 रेलगाड़ियां चलाने का ऐलान किया है जो गैर वातानुकूलित होगी। इसमें ऑनलाइन टिकट बुक कराकर कोई भी सफर कर सकेगा।
अब भारतीय रेलवे की क्षमता के बारे में जानिए।
  • 13652 पैसेंजर और मेल एक्सप्रेस रेलगाड़ियां संचालित होती हैं हर रोज। 
  • 3500 मेल और एक्सप्रेस ट्रेनें संचालित की जाती हैं रोजाना। 
  • 9000 से ज्यादा पैसेंजर ट्रेनें संचालित होती हैं। 
  • 2.30 करोड़ यात्री रोजाना रेल से सफर करते हैं 
  • 7349 कुल रेलवे स्टेशन हैं देश में 
  • 1,23,436 किलोमीटर का कुल रेल पटरियों का नेटवर्क है।
  • 9141 मालगाड़ियों का परिचालन होता है हर रोज 
  • 3 करोड़ टन माल ढोन की क्षमता है हर रोज की। 
( स्रोत - https://www.ibef.org/industry/indian-railways.aspx )
तो इतनी क्षमतावान है हमारी रेलवे जो दो करोड़ से ज्यादा लोगों को एक दिन मेें मंजिल तक पहुंचा सकती है। पर इस लॉकडाउन में करोड़ों लोगों को भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है। 
बीस मई को देश में पांच हजार से ज्यादा मामले आए। दिल्ली में पांच सौ से ज्यादा। इस बीच सरकार ने 25 मई विमान सेवाएं शुरू करने का भी ऐलान कर दिया है। 
21 मई, गुरुवार, 58वां दिन -  नए वर्गीकरण में गाजियाबाद और नोएडा रेड जोन में आ गए हैं। सरकार ने एक जून से चलाए जाने वाली रेलगाड़ियों की सूची जारी कर दी है। सौ जोड़ी नॉन एसी ट्रेनें चलाई जाएंगी। 
कोरोना से देश भर में 132 जान गई। कुल संक्रमित 112359 हैं देश में। इस बीच एक जून से चलने वाली रेलगाड़ियों और 25 मई से शुरू हो रही घरेलू विमान सेवा के लिए बुकिंग शुरू हो गई है। आज अक्षरा मेरी भांजी का जन्मदिन है। वह 19 की हो गई। वहीं रींकू जी के छोटे बेटे अरनब का भी जन्मदिन है। 

22 मई शुक्रवार, 59वां दिन -  दिल्ली में बाजार खुलने लगे हैं। पटना में भी बाजार खुलने लगे हैं। हालांकि किसी भी तरह के आयोजन पर पाबंदी जारी है।आज कोरोना ने 148 लोगों की जान ली। मुंबई में एक युवा टीवी पत्रकार की भी मौत हो गई। उधर, विमान सेवा की बुकिंग आज आरंभ हुई घरेलू उड़ानों के लिए। पहले ही दिन काफी टिकटे बुक हुई। एक जून से चलने वाली रेलगाड़ियों के लिए भी अब काउंटर टिकट बुकिंग शुरू हो गई है। 
एक तरफ ढील दी जा रही है पर देश में कोरोना के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। आज विपक्षी दलों की संयुक्त बैठक हुई। इसमें शामिल 22 दलों ने सरकार पर कोरोना मामले में विफल रहने का आरोप लगाया। 
23 मई, शनिवार, 60वां दिन - कोरोना को लेकर लॉकडाउन के आज साठ दिन यानी दो माह पूरे हो गए हैं। देश में संक्रमितों की संख्या सवा लाख पार कर गई है। आज 137 लोगों की मौत हुई। 
दिल्ली में गरमी बढ़ गई। लू चलने लगी है। पार 44 डिग्री के पार हो गया है। अभी कुछ दिन और लू चलने का अनुमान है। अनादि और माधवी से वीडियो कालिंग पर और तड़ित से फोन पर बात हुई। माधवी और अनादि को बुलाने पर पर मैं कोई फैसला नहीं कर पा रहा हूं। गर्मियों में बेल का शरबत मेरा फेवरिट होता है। आज मैंने खुद घर में बेल का शरबत बनाया। 
24 मई रविवार , 61वां दिन - आज रमजान के महीने का आखिरी दिन है। कल ईद होगी। देश में 147 लोगों की मौत हुई वहीं सात हजार के करीब नए केस सामने आए। वैसे मेरे कई दोस्तों का आकलन है कि सही मायने में देश में 20 लाख से ज्यादा लोग कोरोना संक्रमित हो गए हैं। चूंकि सबकी जांच नहीं हो रही है इसलिए सही आंकड़ा नहीं पता चल पा रहा है। उधर, गरमी अचनाक तेजी से बढ़ी है। लू चलने लगी है। तापमान कई जगह 46-47 तक पहुंच गया है। मां ने आज बताया कि सासाराम में भी गरमी तेज पड़ रही है। इस गरमी में माधवी वंश का आना अभी टाल रखा है। 
आज मैंने शाम को मिक्स दाल, भात और आलू का चोखा, टमाटर, प्याज की चटनी बनाई। 
 25 मई, सोमवार, 62वां दिन - दफ्तर गए ठीक दो महीने हो चुके हैं। देश दुनिया में ईद मनाई जा रही है। पर सारे लोग घर में ही नमाज अदा कर रहे हैं। मैंने अपनी मोबाइल डाइरेक्टरी में मौजूद सौ के करीब मुस्लिम दोस्तों की ईद की मुबारकबाद भेजी। ज्यादातर लोगों ने पलटकर जवाब भी दिया।
कोरोना से आज 145 मौत हुई कुल संख्या 4021 हो गई। कुल संक्रमित 138845 हो गए हैं। पर क्या अब इस तरह रोज गिनती गिनने का कोई फायदा है। पहले दिन आज विमान सेवा शुरू हुई है। पर ऐन मौके पर कुल 82 विमान रद्द हो गए क्योंकि कई राज्यों ने अपने यहां उतरने की अनुमति नहीं दी। लोग एयरपोर्ट चले गए। उन्हें रद्द होने की कोई सूचना नहीं थी। 

26 मई , मंगलवार, 63वां दिन - दिल्ली से लग रही गाजियाबाद की सीमा पर भी आने जाने की सख्ती बढ़ा दी गई है। गाजियाबाद प्रशासन अब बिना पास वालों को दिल्ली आने जाने नहीं देगा। आज मैं अवकाश पर रहा। कोरोना से 145 लोगों की मौत हुई। कुल संक्रमित 1.45 लाख के पार हो गई है। 
बाजार बंद होने के कारण मैं बेल का शरबत बाहर नहीं पी पा रहा हूं, तो बेल घर में लाकर खुद उसका शरबत तैयार कर रहा हूं। मैं सारी गरमी जब तक उपलब्ध हो रोज बेल का शरबत पीने की कोशिश करता हूं। अब बाजार में स्थानीय आम की भी थोड़ी थोड़ी आमद होने लगी है। इस बीच दिल्ली में भीषण गर्मी का कहर जारी है।  
27 मई बुधवार, 64वां दिन घरेलू विमान से यात्रा करने वालों में पॉजीटिव केस निकलने लगे हैं। पहले दिन की फ्लाईट के कुछ यात्री कोरोना पॉजिटिव निकले हैं। आज संक्रमित 151767 मौत 4337 तक पहुंचा। 
आज भी दिन में दिल्ली में भीषण गर्मी का प्रकोप रहा। मैं तरबूज, खरबूज, बेल, आम सब कुछ लेकर सेवन कर रहा हूं। हमारे संघर्ष के दिनों या पहली नौकरी के दौर के साथी रहे अजय आनंद ने एक फिल्म निर्देशित की है लंगड़ा राजकुमार। सार्थक फिल्म है यूट्यूब पर आ गई है। मैंने उसे देखने के बाद उसकी छोटी सी समीक्षा लिखी है।
28 मई, गुरुवार, 65वां दिन - 26 मई को हमारे दफ्तर के बड़े हिस्से को दुबारा से दफ्तर बुलाने की शुरुआत हुई थी। मेरा उस दिन अवकाश था। पर 27 तारीख से दुबारा घर से काम करने का निर्णय हुआ। जी न्यूज के न्यूज रूम में संक्रमित लोगों की संख्या 50 के पार हो गई है। उनमें कुछ मेरे जानने वाले भी हैं। आज देश में 194 लोगों की मौत हो गई। दिल्ली में आज मौसम में नरमी आई। तेज हवा और शाम को बारिश से गरमी में काफी राहत मिली। वरना पिछले चार पांच दिनों से लू के मारे बुरा हाल था। 

29 मई शुक्रवार, 66वां दिन - कोरोना के दवा और टीके को लेकर कई सकारात्मक खबरें आ रही हैं। पर इन सबके बीच अभी कई महीने लग सकते हैं। कोरोना से मरने वालों की संख्या 4706 हो गई। भारत कुल संक्रमितों के मामले में नौंवे नंबर पर आ गया है। 
आज छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी, फिल्मों के जाने माने गीतकार योगेश और ज्योतिषी बेजान दारुवाला का निधन हो गया। मतलब एक दिन में तीन बड़ी हस्तियां चली गईं। लॉकडाउन के दौरान कई मीडिया संस्थानों में वेतन कटौती के बाद छंटनी का भी दौर शुरू हो गया है। 
30 मई शनिवार, 67वां दिन -  सरकार एक जून से लॉकडाउन के पांचवे चरण की रुपरेखा पर विचार कर रही है। सरकार ने ऐलान कर दिया चरणबद्ध तरीके से अनलॉक किया जाएगा। धीरे धीरे शापिंग मॉल और मंदिर भी खुलेंगे। पर जिन इलाकों में केस ज्यादा हैं वहां सख्त लॉकडाउन जारी रहेगा। इस बीच आज दिल्ली और देश में बड़े पैमाने पर केस आए। दिल्ली में एक हजार से ज्यादा। हमारी डीएलएफ कालोनी में भी दो मामले आ गए हैं। 
31 मई रविवार, 68वां दिन - आज लॉकडाउन 4 का आखिरी दिन है। आज भारत कोरोना संक्रमितों के मामले में दुनिया के देशों में सातवें नंबर पर आ गया। दो दिन पहले नौंवे नंबर पर था। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश में कुल संक्रमितों की संख्या 1.82 लाख को पार कर गई है। इसमें 25 हजार मामले तो पिछले तीन दिल में आए हैं। देश में अब तक कोरोना वायरस से कुल मौत 5164 लोगों की हुई है। 
पर 25 मार्च से 31 मई के बीच देश में मजदूर वर्ग और मध्यम वर्ग पर जो चोट पड़ी है उसे सदियां याद रखेंगी। दैनिक वेतनभोगी मजदूरों का जो पलायन देखने को मिला है वह अभूतपूर्व रहा है। इसी बीच कुछ सरकारों ने संवेदना भी दिखाई है। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने मुंबई, लेह और अंदमान में फंसे अपने राज्य के मजदूरों की घर वापसी के लिए निजी चार्टर्ड विमानों तक का प्रबंध किया। 
आने वाले कल में भी लॉकडाउन जारी ही रहेगा पर कई रियायतों के साथ। अब गुलशन का कारोबार चलाने की कोशिश की जा रही है। पर बहुत कठिन है डगर पनघट की।  

  - विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
 ( LOCKDOWN DAYS, CORONA, COVID 19 ) 

Friday, 22 May 2020

खुशबू का एहसास – बाबा आमटे

कुष्ठ रोगियों के लिए अपना सारा जीवन होम कर देने वाले महान समाजसेवी बाबा आमटे के जीवन पर अनूठी पुस्तक है खुशबू का एहसास – बाबा आमटे। पुस्तक के लेखक हैं अशोक गुजराती। पुस्तक का प्रकाशन नेशनल बुक ट्रस्ट ने किया है। कुछ माह पहले पुस्तक खरीदी थी, लॉकडाउन के दौरान पढ़ डाली। 

बाबा आमटे 26 दिसंबर 1914 को हुआ। वे 94 साल इस धरती पर रहे। 9 फरवरी 2008 को उन्होंने देहत्याग किया। मराठी ब्राह्मण परिवार में जन्में बाबा का व्यक्तित्व विलक्षण था। अपनी 450 एकड़ की पारिवारिक विरासत जमींदारी का त्याग कर दिया। काफी ऊंची पढ़ाई की। पर एक दिन अचानक कुष्ठ रोगियों की सेवा में लगे तो सारा जीवन यही उनका लक्ष्य बन गया। अपने जीवन काल में न सिर्फ 55 हजार कुष्ठ रोगियों को निरोग किया बल्कि उनके पुनर्वास का भी इंतजाम किया।
महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले में वरोरा के पास आनंदवन उनका आश्रम है। उसके आसपास कई और प्रकल्प हैं। उनके इस महान परंपरा को उनके बेटे विकास आमटे और प्रकाश आमटे आगे बढ़ा रहे हैं।
मैंने सन 1991 में पहली बार बाबा का नाम सुना था। हर साल मई में आनंदवन में देश भर के युवाओं के लिए श्रम संस्कार शिविर का आयोजन करते थे। मैं कई बार चाहकर भी उस शिविर में नहीं जा पाया, क्योंकि उसी समय मेरी वार्षिक परीक्षाएं होती थीं।
बाबा को कुष्ठ रोगियों की सेवा के लिए दुनिया का सबसे बड़ा पुरस्कार टेंपलटन पुरस्कार मिला था। देश के युवाओं को जोड़ने के लिए उन्होंने 1985 में भारत जोड़ो यात्रा निकाली थी।
अशोक गुजराती की लिखी इस पुस्तक ने बाबा और उनके कार्यों को समझने का मौका दिया है। पुस्तक की भाषा में प्रवाह है। दो सौ से ज्यादा पृष्ठों की पुस्तक में लेखक ने बाबा और उनके परिवार के बारे में तमाम अनछुए पहलूओं पर प्रकाश डाला है।
-         विद्युत प्रकाश मौर्य – Vidyutp@gmail.com
-         ( BABA AMTE, MURLI DHAR DEVIDAS AMTE )


Thursday, 14 May 2020

लॉकडाउन डायरी - कोरोना के साथ जीना सीखना होगा

सरकार भी समझ गई है कि बहुत दिनों तो लॉकडाउन नहीं रखा जा सकता। इसका असर देश में उत्पादन पर पड़ रहा है। साथ ही बड़े पैमाने पर बेरोजगारी बढ़ रही है। इसलिए अब लॉकडाउन में धीरे धीरे ढील देने पर विचार हो रहा है। तो क्या इसका मतलब कि हमें कोरोना वायरस के साथ ही जीना सीखना पड़ेगा।   
14 मई गुरुवार, 51वां दिन - सरकार सभी मेल एक्सप्रेस रेलगाड़ियां भी चलाने पर विचार कर रही है। बहुत संभावना है कि 18 मई से लॉकडाउन के चौथे चरण में कई तरह की रियायतों दी जाएं। तो आज कोरोना से 134 लोगों की मौत के साथ कुल आंकड़ा 2494 पहुंच गया। देश भर में 78 हजार से ज्यादा संक्रमित। इस बीच आज मौसम ने अंगड़ाई ली। दिल्ली में जमकर आंधी चली। 72 किलोमीटर की गति से उसके बाद बारिश हुई। शाम को मेरी बालकोनी में एक कबूतर फड़फड़ाता हुआ आया और गिर गया। थोड़ी देर में उसके प्राण पखेरू उड़ गया। मुझे यह देखकर बड़ा दुख हुआ। आंधी ने और भी सितम ढाया। शाम को पांच बजे इंटरनेट डाउन हो गया। केबल का भी और वाईफाई का भी। रात 10 बजे जाकर डाटा मिल सका। इस दौरान दफ्तर का काम ठप्प हो गया। मतलब हम डाटा के आगे मजबूर हैं। अब तो मानो डाटा ही जिंदगी की धड़कन है।

भले ही आंशिक तौर पर रेलगाड़ियां चलने लगी हों पर इस बीच बड़ी हृदय विदारक खबरें और तस्वीरें आ रही हैं। 
पहली तस्वीर- एक मां स्ट्राली बैग को खिंचते हुए गांव चली जा रही है। उसका नन्हा बच्चा साथ चल रहा है। जब बच्चा थक जाता है तो मां उसे बैग पर सुला लेती है। पर वह स्ट्राली बैग खींचना और अपनी यात्रा जारी रखती है। इस तस्वीर का वीडियो दिन भर सोशल मीडिया पर खूब वायरल होता रहा। पर इससे क्या... उस मां का संघर्ष कम तो नहीं हो गया न। और फिर ये किसी एक मां की कहानी नहीं है। 

दूसरी तस्वीर - एक बच्चा ठेला चला रहा है। बच्चे की उम्र महज 13 साल है। उसने ठेले पर अपने पिता को बिठा रखा है। पिता पुत्र चल पड़े हैं बनारस से दूर अपने उत्तर बिहार के घर की ओर। लोग इस बच्चे को आधुनिक श्रवण कुमार कह रहे हैं। पर यह तो उससे भी कुछ ज्यादा है। ये तो इस नन्हें नागरिक की मजबूरी है। 

सरकार भरोसा दे रही है। रुकने को कह रही है। पर मजदूरों के पलायन का सिलसिला जारी है। दिल्ली यूपी बार्डर पर अब भी दिन रात पलायन करने वालों की भीड़ लगी है। ये लोग कई दिनों से भूखे प्यासे हैं। कुछ संस्थाएं उन्हें जाकर कुछ खाने पीने की सामग्री देने की कोशिश कर रही हैं। पर यही है आजाद भारत की सच्ची तस्वीर जहां कामगारों की कोई पूछ नहीं है। 

तीसरी तस्वीर - एक व्यक्ति यूपी बार्डर पर बैठा अपने छोटे से फोन से बातें करता हुआ रो रहा है। बेगुसराय में उसका इकलौता बेटा मर गया है। पर वह घर चाह कर भी नहीं जा पा रहा है। तीन दिन तक वह यूपी गेट पर बैठा रहा। अंत में हमारे अखबार हिन्दुस्तान के संवाददादाताओं के प्रयास से उस व्यक्ति के गांव जाने का इंतजाम किया जा सका। 

15 मई शुक्रवार - 52वां दिन -  पिछले 19 मार्च से लगातार अपने फ्लैट में अकेला हूं औ खुद खाना बना रहा हूं तो इस दौरान कई बार अपम स्टैंड में लिट्टी भी बनाता हूं। आजकल हर दूसरे दिन कच्चा आम, पुदीना और धनिया की चटनी भी बनाता हूं। और हां रोटियों के साथ भी नए नए प्रयोग जारी है। गेहूं का आटा 50 फीसदी उसके साथ मकई, ज्वार, चने का आटा उसमें काला नमक, आजवाईन और कसूरी मेथी डालकर आटा गूंथ कर रोटियां बना रहा हूं। कई बार बिना चकला और बेलन के थपकी देकर रोटी पकाने का अभ्यास भी कर रहा हूं।


कोरोना से आज 100 लोगों की मौत हो गई। कुल आंकड़ा है 2649 पर वर्ल्ड मीटर में कुल संक्रमित लोगों की संख्या के मामले में हम अब चीन से आगे निकल चुके हैं। भारत 11वां सबसे बड़ासंक्रमित देश बन चुका है। चीन 12वें नंबर पर है। 
16 मई, शनिवार 53वां दिन- सरकार मजदूरों किसानों के लिए रियायतें गिना रही है। पर मजदूरों दर्द कम नहीं हो रहा है। वे देश के अलग अलग राज्यों में पलायन को मजबूर हैं। उधर 18 मई से कई तरह की रियायतों की तैयारी चल रही है।  
देश में आज कोरोना से 102 लोगों की जान गई। कुल मौत 2652 हो गई है। वहीं हमलोग कुल संक्रमण के आंकड़ो में 86 हजार को पार कर चुके हैं। यह कोरोना संक्रमण के पहले देश चीन के आंकड़ों से भी ज्यादा हो चुका है। आज यूपी के औरैया में सड़क हादसे में 26 मजदूरों की तो मध्य प्रदेश में एक और सड़क हादसे में आठ मजदूरों की मौत हो गई। 
17 मई, रविवार - 54वां दिन - सरकार भले ही श्रमिक स्पेशल रेलगाड़ियां चलाने की  बात कर रही हो पर पैदल चलकर अपने देस जाने वाले श्रमिकों का सिलसिला जारी है। आज देश में 120 लोगों की मौत हो गई। कुल संक्रमितों की संख्या 91 हजार पहुंच गई है। आज एक दिन में संक्रमितों की संख्या पांच हजार के करीब बढ़ी। बिहार में भी बड़ी संख्या में नए केस आए हैं। रोहतास जिले में अचानक दर्जन से ज्यादा लोग संक्रमित मिले हैं। 
इस बीच सरकार ने लॉकडाउन को 31 मई तक बढ़ाने का फैसला कर लिया है। हां इसमें कहां कैसी ढील देनी है ये राज्य सरकारें तय करेंगी। पर कुछ राज्यों ने पहले से ही 31 मई तक बंद रखने का फैसला लिया है। 
  - विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
 ( LOCKDOWN DAYS, CORONA, COVID 19 ) 

Sunday, 10 May 2020

तुमसे दूर रहके हमने जाना प्यार क्या है.. (व्यंग्य )

निकलो न बेनकाब जमाना खराब है... जिस गीतकार ने ये पंक्तियां लिखी होंगी वह बड़ा दूरदर्शी रहा होगा। उसे पता था कि एक दिन कोरोना का कहर दुनिया में छाने वाला है। तब जमाने के सितम से बचने के लिए हर कोई नकाब पहनकर ही घर से निकलेगा।
पर बॉलीवुड के तमाम गीतकार तो सच्चाई से दूर रहे। वे लिखते रहे – जाने दो न, पास आओ न आओ ना... सन 1985 में फिल्म सागर में ये गीत सुनने को मिला था। अब तो ये गीत आप हरगिज मत सुनिएगा। तब उनको नहीं पता था कि पास आने के कितने खतरे हैं। अब तो लोग कह रहे हैं कि कोई कितने भी प्रलोभन देकर बुलाए मगर जाना मत। घर में ही रहना।

थोड़ा पीछे चलते हैं साल 1965 में तो रुश्तमे हिंद फिल्म में एक गीतकार ने लिख मारा – बैठो मेरे पहलू में खुदा के वास्ते। नहीं जनाब  ऐसा न कहो आजकल तो खुदा के वास्ते दूर दूर ही रहो तो अच्छा।
इसके बाद 1976 में आई फिल्म नौनिहाल के लिए कैफी आजमी साहब ने गीत लिखा – तुम्हारे जुल्फों के साए में शाम कर लूंगा. सफर एक उम्र का पल में तमाम कर लूंगा। तब कैफी साहब को गुमां न रहा होगा कि प्रेयसी के जुल्फों के साये में शाम करना कितना महंगा सौदा साबित हो सकता है।

भला पास आने की क्या जरूरत है प्यार का एहसास तो दूर रहकर भी किया जा सकता है। सन 1976 में फिल्म अदालत के गीत के बोल पर गौर फरमाइए तुमसे दूर रहके  हमने जाना की प्यार क्या है...दिल ने माना यार क्या है... तो इन पंक्तियों को लिखने वाले गुलशन बावरा भी बड़े समझदार थे।

कुछ और गीतकारों ने भी समझदारी भरे बोल लिखे – वो पास रहें या दूर नजरों में समाये रहते हैं, इतना तो बता दे कोई, क्या इसी को प्यार कहते हैं। वो गीतकार कमर जलालाबादी थे जो इतनी समझदारी भरी बातें करते थे। उन्होंने 1949 में ही इतनी समझदारी भरी बात कह दी थी।

थोडा आगे बढ़िए तो सन 1985 में फिल्म यादों की कसम में गीत आया। बैठ मेरे पास तुझे देखती रहूं... अब भला देखने के लिए पास जाकर बैठने की क्या जरूरत है। छह फीट की दूरी से भी तो देखा जा सकता है। पर गीतकार ने अगली पंक्ति बड़ी समझदारी पूर्ण लिखी- ना तू कुछ कहे ना मैं कुछ कहूं।

सबसे समझदारी वाला गीत तो था – एक डाल पर तोता बोले, एक डाल पर मैना. दूर दूर तक बैठे हैं दोनों पर प्यार तो बोलो है ना... मतलब दूर दूर रहकर भी प्यार हो सकता है...सन 1974 में आए इस गीत के शब्दकार थे इंद्रजीत सिंह। अब कोरोना काल में में मुहब्बत करने का दस्तूर यही है कि आप अलग अलग डाल पर बैठे रहिए। मतलब फिजिकल डिस्टेंसिंग बनाए रखिए। पर सोशल डिस्टेंसिंग नहीं। ये बड़ा गलत शब्द है। शरीर से शरीर की दूरी बनी रहनी चाहिए। पर दिल से दिल की दूरी तो हरगिज नहीं।
-         विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( (CORONA AND SONGS )