Monday, 30 March 2020

अंतहीन सड़क पर पैदल (कविता)

छह साल की मुनिया पकड़े हाथ
अंतहीन सड़क पर चला जा रहा
है बृजमोहन
न जाने की कितने दिन में
पहुंचेगा अपने गांव
उस शहर को वह पीछे
छोड़ आया है जहां
दिन भर पसीना बहाकर
जुटाता था अपने घर वालों के लिए
निवाला।

लोगों ने बताया था किसी
अदृश्य बीमारी से दुनिया डरी हुई है
तब बहुत याद आई 
अपने गांव की मिट्टी की
तो निकल पड़ा खुली सड़क पर

नन्ही मुनिया बोल रही
बापू मुझसे और चला नहीं जा रहा
न जाने कितनी दूर है 
अभी हमारा गांव

अपनी पोटली से थोड़ा
चबेना निकालकर मुनिया को देता है
चलते रहो बिटिया
एक दिन जरूर पहुंच जाएंगे
अपने गांव....

-         ------- विद्युत प्रकाश मौर्य


Sunday, 29 March 2020

रोक लो उन्हें... ( कविता)



उन्होंने ही तो
तुम्हारे घर की दीवार जोड़ी थी
जिस आलीशान अपार्टमेट में तुम
आज रहते हो
उसका रंग रोगन
उन्होंने ही तो किया था
तुम्हारे घर की बिजली जब जब
खराब है जाती है
तुम्हारे नालियां जब जब 
जाम हो जाती हैं
वे ही तो ठीक करने आते हैं।

इस महानगर में कदम कदम पर
तुम्हारी सहायता के लिए
वे खड़े मिल जाते थे।
आज उनके लिए ये शहर
बेगाना क्यों हो गया है।

अपनी छह साल की बिटिया
की उंगली पकड़े वे
एक हजार मील की पैदल यात्रा कर
अपने गांव को जाने के लिए
मजबूर क्यों हुए

आखिर उनका देश कहां है...
तुम जो रोटी खाते हो उसमें
उनका भी तो हिस्सा
रोक लो उन्हें
कि उनके बिना तुम्हारा
ये सिस्टम नहीं चल पाएगा।

एक दिन तुम्हें जब फिर
उनकी जरूरत पड़ेगी तो
वे तब बहुत दूर जा चुके होंगे।
हां रोक लो उन्हें

--- विद्युत प्रकाश मौर्य
( 29 मार्च 2020 )

Friday, 27 March 2020

तालाबंदी के बीच गांव की याद (कविता )


देश भर में तालाबंदी के बीच
दिल्ली के बहुमंजिले इमारत के छोटे से
फ्लैट में कैद होना...
ये किसी कारावास की तरह ही तो है...
आप खिड़की से झांक सकते हैं
पर बाहर कदम नहीं रख सकते।

इस अकेलेपन के बीच
बचपन का गांव खूब याद आया
नहर के किनारे का पीपल का पेड़
जेठ की दुपहरी में जिसकी छांव
भली लगती थी
कुएं के किनारे वो नीम का पेड़ भी
अब भी वहीं खड़ा है...

पर हम चाह कर भी
अभी वहां नहीं जा सकते।  

गांव में चाचा से बात हुई फोन पर
उन्होंने कहा, सब ठीक है बबुआ
यहां कोई परेशानी नहीं है
आंगन की धूप में बैठो या फिर खेत खलिहान में
घूम के आ जाओ
अपना हाल सुनाओ
कैसे हाल सुनाऊं
मेरे पास आज शब्दों की दरिद्रता है...
भाव शून्य हैं...
मैं ही बड़ा गरीब हूं
चाचा तुम ही अमीर हो...

-         --- विद्युत प्रकाश मौर्य

Thursday, 26 March 2020

लॉकडाउन, इमरजेंसी, कर्फ्यू और बेघर लोग

साल 2020 के फरवरी के आखिरी सप्ताह में दिल्ली दंगों की आग में झुलसी। मुझे बनारस के दंगे याद हैं। तब में काशी हिंदू विश्वविद्यालय में पढ़ता था। हालांकि हम बीएचयू कैंपस में सुरक्षित थे। पर शहर जल रहा था। ठीक इसी तरह दिल्ली में मेरे पड़ोस में मेरे घर से चार किलोमीटर आगे का इलाका कई दिन तक झुलसता रहा है। इस असर मेरे बेटे की पढ़ाई पर पड़ा। उसके स्कूल में हो रही सालाना परीक्षाएं स्थगित हो गईं। बाद में ये परीक्षाएं शुरू हुईं। होली 10 मार्च को थी तो नौ मार्च को पहला पेपर। फिर 11 मार्च को दूसरा पेपर। ऐसे में होली कौन मनाए। अनादि की परीक्षा 19 मार्च को खत्म हो रही थी। इसलिए मैंने उनका और उनकी मां का 19 मार्च की शाम हमसफर एक्सप्रेस में पटना जाने का टिकट बना दिया था। स्कूल से संदेश था कि 7 अप्रैल को अगले सत्र में स्कूल खुलेगा।



19 मार्च की शाम को मैं उन्हें आनंद विहार रेलवे स्टेशन पर हमसफर एक्सप्रेस में विदा कर आया। इस बीच देश में कोरोना को लेकर दहशत बढ़ती जा रही थी। हर रोज कुछ नए संक्रमित मिल रहे थे। बीमारी चीन से आगे बढ़ कर स्पेन, इटली और इरान में कहर ढा रही थी। रेलवे स्टेशन पर यात्रा करने वाले दहशत में थे। होली के बाद काफी लोग अपनी छुट्टियां रद्द करा रहे थे। रेलवे ने 40 फीसदी ट्रेनें यात्री कम होने के कारण रद्द कर दी थीं।

माधवी और वंश सुबह सुबह सकुशल पटना पहुंच गए। इस बीच 19 मार्च को रात आठ बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी टीवी पर प्रकट हुए। राष्ट्र के नाम संदेश में कहा कि 22 मार्च को देश भर में आप लोग जनता कर्फ्यू लगाएं जिससे कोरोना से निपटा जा सके।

मैं 20 और 21 मार्च को अवकाश पर घर में रहा। 22 मार्च को बंद के दिन दफ्तर जाकर काम किया। इन दिनों हिन्दुस्तान हिंदी दैनिक का दफ्तर नोएडा के सेक्टर 63 में है।

कड़ी चावल वाला – 21 मार्च की दोपहर में मैं अपनी कालोनी के गेट पर कड़ी चावल वाले के पास गया। उससे अपने लिए एक प्लेट पैक कराया। कड़ी चावल वाले ने बताया कि आज से छुट्टी कर रहा हूं। स्टाफ को भी घर भेज रहा हूं। कल देश भर में जनता कर्फ्यू है। पता नहीं ये कब तक चले। उस दुकानदार को अंदेशा था कि बंदी ज्यादा दिन चलने वाली है।

22 मार्च जनता कर्फ्यू -  देश भर में लोगों ने 22 मार्च को जनता कर्फ्यू को सफल बनाया। पर कुछ जगह लोग नहीं माने। घंटी शंख बजाते लोगों ने अहमदाबाद, पीलीभीत में रैली निकाल दी। पर कोरोना के अंदेशे से कई राज्यों ने अपने यहां लॉकडाउन का ऐलान शुरू कर दिया। 23 मार्च को पंजाब, चंडीगढ़, महाराष्ट्र, कर्नाटक आंध्र, तेलंगाना जैसे राज्य सख्त कदम उठा चुके थे।
22 मार्च को देश भर में यात्री रेलगाडियों का संचालन बंद कर दिया गया था। बाद में रेलवे ने 25 मार्च तक रेलबंदी का ऐलान किया। 24 मार्च को रेलबंदी को बढ़ाकर 14 अप्रैल तक कर दिया गया। रेलवे के 160 साल के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ। तमाम राज्य बसों और टैक्सियों का संचालन रोक चुके हैं।

21 दिनों का लॉकडाउन - 24 मार्च को रात आठ बजे एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी टीवी पर आए। इस बार उन्होंने आधे घंटे के भाषण में 25 मार्च से 14 अप्रैल तक देश भर में पूर्ण लॉकडाउन का ऐलान किया। यह कर्फ्यू और इमरजेंसी जैसा होगा।  हमने 1975 की इमरजेंसी नहीं देखी। पर यह इमरजेंसी से कुछ ज्यादा स्वास्थ्य इमरजेंसी। एक अदृश्य वायरस ने पूरी दुनिया को तबाह कर दिया है। मंदिर में रहने वाले भगवान से कोई उम्मीद नहीं। उनके दरवाजे भी बंद चुके हैं। देश के सारे प्रमुख मंदिरों के पट बंद किए जा चुके हैं।
चलों चलें ये शहर हुआ बेगाना...

24 मार्च की रात को दफ्तर से लौटते वक्त एनएच 9पर देखा बड़ी संख्या में लोग सामान लिए हुए पैदल पैदल अपने घर जा रहे थे। वाहन बंद होने पर लोग कई सौ किलोमीटर दूर अपने घर पैदल चलकर जाने को मजबूर हैं। ये ऐसे लोग हैं जिनका दिल्ली में कोई स्थायी आशियाना नहीं है। काम बंद होने के बाद रोटी के लाले पड़ गए हैं। पीठ पर बैग लादे हाईवे पर चलते हुए कई लोग दिल्ली से बरेली पहुंच गए। कई इससे भी आगे। रास्ते में खाने की दुकाने बंद। पीने का पानी भी मयस्सर नहीं।

देश में 9.38 लाख शहरों में बेघर लोग रहते हैं। ये जानकारी सरकार ने संसद में दी है। पर बेघरों की वास्तविक संख्या इससे कहीं ज्यादा होगी। आखिर इस बंदी में वे लोग कहां रहेंगे। कैसे बसर करेंगे। 24 मार्च को हमारे दफ्तर ने कोशिश की। लोग घर से काम करें। हमें कंप्यूटर सिस्टम दिए गए।

25 मार्च, पहला दिन  - आज से दफ्तर नहीं जाना है। वर्क फ्रॉम होम की शुरुआत हो रही है। हमने अपनी कालोनी के केबल वाले से आग्रह करके ब्राडबैंड कनेक्शन लगवा लिया है। हालांकि ज्यादा दबाव के कारण वह पूरी गति से नहीं चल पा रहा है। हमारी कालोनी में लोग अनुशासन से लॉकडाउन का पालन कर रहे हैं।

26 मार्च दूसरा दिन - सरकार ने शहर और गांव के गरीबों के लिए कुछ राहतों का ऐलान किया। इस बीच देश में कोरोना से मरने वालों की संख्या 16 हुई जबकि 600 से ज्यादा संक्रमित हैं। प्रसार की गति धीमी है। हमें आशावादी रहना चाहिए। गांव में चाचा से बात हुई। लॉकडाउन में उन लोगों को ज्यादा परेशानी नहीं है।

27 मार्च तीसरा दिन - दिल्ली समेत महानगरो से बड़ी संख्या में मजदूरों का पलायन जारी है। ये लोग पैदल ही अपने घरों को चल पड़े हैं। दिल्ली के यूपी गेट पर रात को भारी भीड़ जमा हो गई। बिहार सूचना केंद्र ने बिहार के लोगों के लिए हेल्पलाइन नंबर जारी किया है। 
 28 मार्च चौथा दिन -- आनंद विहार और यूपी गेट पर दस हजार से ज्यादा लोग इकट्ठे हो गए। बिहार और यूपी जाने वाले लोग। एक किलोमीटर के करीब लंबी लाइन लग गई। हालांकि दिल्ली सरकार कह रही है कि दैनिक वेतन वाले मजदूर पलायन न करें उनके रहने के लिए यहां स्कूल और रैन बसेरे खोले जा रहे हैं। हमारे साथ मनोज कुमार बोस बता रहे हैं कि शाहजहांपुर, लखनऊ सीमा पर दिल्ली, पंजाब आदि स्थानों से पैदल चलते हुए लोग अपने घर जाने के लिए पहुंच रहे हैं। 
29 मार्च - पांचवा दिन -  दिल्ली बार्डर से बड़ी संख्या में दूसरे राज्यों के मजदूरों को बसों में भरकर उनके जिले में भेजा गया। पर इसमें खतरा भी है। सरकार ने सभी राज्यों की सीमा सील करने का आदेश दिया। दिल्ली के सभी स्कूल श्रमिकों के रहने के लिए खोल दिए गए हैं। वहां उनके खाने का भी इंतजाम है।

30 मार्च - छठा दिन - दिल्ली के निजामुदद्दीन में तबलीगी जमात के दफ्तर से 24 कोरोना के संदिग्ध अस्पताल में भर्ती कराए गए। रोज देश में कोरोना पीड़ितों की संख्या बढ़ रही है। मैं दिन में रोज अपने विश्वविद्यालय के दिनों के कुछ पुराने दोस्तों से बात करने की कोशिश कर रहा हूं। 

31 मार्च - सातवां दिन -  मैं कई दिन से अपने फ्लैट से बाहर नहीं निकला हूं। देर रात गए धर्मेंद्र की एक पुरानी फिल्म यूट्यूब पर देखता हूं। के स्कूल ने मोबाइल एप पर ऑनलाइन कक्षाएं शुरू कर दी है। अनादि दसवीं कक्षा में चले गए हैं। सरकार सख्त कदम उठाने की योजना बना रही है। शहरों को सेनेटाइज करने पर काम हो रहा है। 


 - vidyutp@gmail.com

Monday, 10 February 2020

मिट्टी की खुशबू में रची बसी कहानियां

ब्रह्मभोज नाम है इस कथा संग्रह का। इसमें कुल 17 कहानियां हैं। इन सबका परिवेश बिहार झारखंड का गांव गिरांव है। पर लेखक अपनी शैली से आपको बांधे रखते हैं। कहने शैली सहज और चमत्कारी है। पहली कहानी पकड़वा दमदार है। यह बिहार के पकड़वा विवाह पर आधारित है।

पुस्तक के लेखक सचिदानंद सिंह पेशे से बैंकर हैं । सेंट स्टीफेंस में पढ़ाई की है। पर उनकी कहानियों में बिहार झारखंड की मिट्टी की खुशबू रची बसी है। उनकी कहानियों के पात्र आपके अड़ोस पड़ोस में रहने वाले लोग हैं। आप जब कहानियां पढते हैं तो इन पात्रों के संग चलने लगते हैं। कहानियां मौलिकता से रची बसी हैं। वे आपका खूब मनोरंजन भी करती हैं और बिहार झारखंड के लोगों से आपका परिचय भी कराती हैं।

पुस्तक : ब्रह्मभोज
प्रकाशक : अनुज्ञा बुक्स
मूल्य : 200 रुपये

: विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com 




Wednesday, 22 January 2020

भारतीय रेल के अनोखे पुल


भारतीय रेल के अनोखे पुल विमलेश चंद्र की नई पुस्तक है। यह आपको देश के सौ से ज्यादा रेल पुलों के बारे में बताती है। यह पुस्तक आपको रेलवे के इतिहास की रोचक दुनिया में  ले जाती है। क्या आपको पता है कि रेलवे के कई पुल 150 साल से ज्यादा पुराने हैं।
दरअसल रेलगाड़ियों से सारे लोग सफर करते हैं। पर रेलवे के विकास की कहानी से ज्यादातर लोग ज्यादा अनजान रहते हैं। अहमदाबाद में पदस्थापित रेलवे में अधिकारी विमलेश चंद्र रेलवे पर कई पुस्तकें लिख चुके हैं। पर उनकी नई पुस्तक रेलवे के पुलों पर केंद्रित है। रेलवे में वैसे तो हजारों पुल हैं। पर इनमें से कई पुल तकनीक के आदर्श नमूना हैं। कई जगह रेल के साथ सड़क पुल भी बने हुए हैं। जैसे आपने वाराणसी और मुगलसराय के बीच गंगा नदी का पुल देखा होगा। इसी तरह पटना से पहले सोन नदी पर कोईलवर का ऐतिहासिक पुल है। ये पुस्तक आपको दक्षिण से लेकर उत्तर भारत के तमाम ऐसे पुलों से आपका परिचय कराती है। इन पुलों को निर्माण तकनीक और उनकी खासियत पर नजर डालती है। रेलवे में रूचि रखने वालों के लिए यह एक संग्रहणीय पुस्तक है।
प्रकाशक -  पुस्तक का प्रकाशन भारत सरकार की संस्था नेशनल बुक ट्रस्ट ने किया है। साल 2019 में आई पुस्तक 135 रुपये में उपलब्ध है। अगर एनबीटी आप बुक क्लब के मेंबर हैं तो आपको 20 फीसदी की छूट भी मिलेगी। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( RAIL, BRIDGE, BOOK, NBT, BIMLESH CHANDRA ) 



Monday, 6 January 2020

प्रेम नाम है मेरा - प्रेम चोपड़ा


प्रेम नाम है मेरा - प्रेम चोपड़ा, वैसे तो ये बड़ा चर्चित डॉयलाग है। पर हिंदी फिल्मों के मशहूर खलनायक प्रेम चोपड़ा की संस्मरणात्मक आत्मकथा की पुस्तक इसी नाम से हिंदी में प्रकाशित हुई है। प्रेम चोपड़ा अब 84 साल के हो चुके हैं। हिंदी से लेकर हॉलीवुड तक 400 फिल्मों में अभिनय करने वाले प्रेम चोपड़ा पर प्रकाशित ये पुस्तक हिंदी में यश पब्लिकेशन ने प्रकाशित की है। इसी पुस्तक के विमोचन के लिए प्रेम चोपड़ा 5 जनवरी 2020 को दिल्ली के प्रगति मैदान में चल रहे विश्व पुस्तक मेले में पधारे। उन्हे देखते ही कार्यक्रम में हर उम्र के लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। 
प्रेम चोपड़ा ने भी किसी को निराश नहीं किया। लोगों के सवालों के खूब जवाब दिए। अपने जीवन से जुड़े कई किस्से सुनाए। अपने लोकप्रिय संवाद सुनाए। - दुनिया जानती है मैं कितना शरीफ आदमी हूं। 

प्रेम चोपड़ा पर ये पुस्तक उनकी बेटी रितिका नंदा ने लिखी है। रितिका जाने माने उपन्यासकार गुलशन नंदा की बहू हैं। पुस्तक प्रेम चोपड़ा की फिल्म इंडस्ट्री में संघर्ष की गाथा बड़े रोचक अंदाज में बयां करती है। हालांकि प्रेम चोपड़ा हिंदी फिल्म जगत में राजकपूर और प्रेम नाथ जैसे नामचीन लोगों के रिश्तेदार थे। पर उन्हें फिल्मों में जगह बनाने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा। पुस्तक उनके संघर्ष पर भी प्रकाश डालती है।

प्रेम चोपड़ा की पहचान हिंदी फिल्मों के बड़े खतरनाक विलेन के तौर पर है। जिसके पर्दे पर आते ही लोगों को साजिश की बू आने लगती है। लोग उनसे परदे पर देखते ही नफरत का भाव मन में ले आते हैं। पर प्रेम चोपड़ा निजी जिंदगी में उस रजत पट की छवि से काफी अलग हैं।  
पुस्तक मेले में प्रेम चोपड़ा के साथ बैठे थे मशहूर पत्रकार राजीव शुक्ला, जिन्होंने प्रेम चोपड़ा के व्यक्तित्व से जुड़े कई अनछुए पहलुओं पर प्रकाश डाला। हिंदी सिनेमा में रुचि रखने वालों के लिए संग्रहणीय और पठनीय पुस्तक है - प्रेम नाम है मेरा। आप इसे प्राप्त कर सकते हैं यश पब्लिकेशंस से। 
प्रकाशक का फेसबुक पेज देखें - - https://www.facebook.com/yashprakashan/

- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com   


Wednesday, 20 November 2019

महंगा हो जाएगा भूटान घूमना


भारत के लोगों के लिए भूटान घूमना महंगा हो सकता है। भूटान क्षेत्रीय देशों से पर्यटकों के आने पर शुल्क लगाने की योजना बना रहा है। इनमें मालदीव और बांग्लादेश के साथ भारत भी शामिल है। अब तक इन देशों को भूटान में पर्यटन के लिए किसी भी तरह का शुल्क नहीं देना पड़ता था।
पर्यटन नीति के ड्राफ्ट को अगले महीने तक भूटानी मंत्रिमंडल अंतिम रूप दे देगी। इस सिलसिले में दिल्ली में भूटान के विदेश मंत्री तांदी दोरजी ने 18 नवंबर 2019 को विदेश मंत्री एस जयशंकर से मुलाकात कर बातचीत की।

भूटान की पर्यटन परिषद (टीसीबी) के तैयार किए मसौदे के मुताबिक नई शुल्क का प्रस्ताव क्षेत्र से पर्यटनों की बढ़ती तादाद के मद्देनजर पेश की गई है। बाकि देशों की तुलना में भारतीय, बांगलादेशी और माल्दीव से आने वाले पर्यटकों को किसी तरह का भुगतान करना जरूरी नहीं था और वे बिना वीजा के भी भूटान घूमने जा सकते थे।  नई नीति के अनुसार अब इन पर्यटकों को सस्टेनेबल डेवलपमेंट फीस और परमिट प्रोसेसिंग फीस अदा करना होगा।
1.80 लाख भारतीय एक साल में भूटान गए - 
2018 में भूटान जाने वाले पर्यटकों की तादाद 2 लाक 74 हजार थी। इसमें से 2 लाख क्षेत्रीय पर्यटक थे जिसमें से 1 लाख 80 हजार पर्यटक केवल भारत से गए थे।

भूटानी सरकार क्षेत्रीय पर्यटकों को ऑनलाइन पेश किए जाने वाले कम किराए के ठहरने की जगह का उपयोग करने से रोकना चाहती है क्योंकि इससे गैर-पंजीकृत गेस्ट हाउस और होम स्टे की तादाद में बढ़ोतरी हो रही है।

स्मारकों का शुल्क भी महंगा होगा
भूटान पर्यटन परिषद (टीसीबी) ने देश के विभिन्न स्मारकों में प्रवेश शुल्क को जनवरी 2020 से बढ़ाने का फैसला लिया है। पारो जिले स्थित टाइगर नेस्ट के विजिटिंग फी को 7.14 डॉलर से बढ़ाकर 14.25 डॉलर किया जाएगा। जबकि ताशिचो-जोंग, मेमोरियल चोर्टेन और सहित अन्य स्मारकों में यह फी 4.28 डॉलर से 7.14 डॉलर तक बढ़ा दिया जाएगा। हालांकि छात्रों को इस शुल्क में 50 प्रतिशत की छूट दी जाएगी।
 - विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com 


Sunday, 20 October 2019

गोल्फ की विरासत और मोती लाल

मोती लाल गोल्फ गुरु - जन्म - 1946 निधन -19 अक्तूबर 2019
गोल्फ गुरु के नाम से विख्यात मोतीलाल 19 अक्तूबर 2019 को इस दुनिया को छोड़कर चले गए। उन्होंने अपने जीवन में तकरीबन 850 लोगों को गोल्फ खेलने का प्रशिक्षण दिया। इसमें बड़ी संख्या में नौकरशाह और राजनेता शामिल थे। 

गोल्फ के कोच के तौर पर उनकी अंतरराष्ट्रीय ख्याति थी। वे गोल्फ की कोचिंग के साथ ही गोल्फ से जुड़े तमाम उत्पादों का निर्माण भी करते थे। उनकी ज्योतिष में भी गहरी रूचि थी। 19 अक्तूबर को यशोदा अस्पताल में उनका निधन हो गया। 



मैं पिछले दो दशक से लगातार उनके संपर्क में रहा। साल 1997 के मार्च महीने में उनका एक लंबा साक्षात्कार मैंने अपने अखबार कुबेर टाइम्स के लिए किया था। वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे आखिरी दिनों में जब उनसे मुलाकात हुई तो वे पारंगत ज्योतिषी बन गए थे। उन्होंने मेरे बेटे की जन्म कुंडली तुरंत बना डाली।
वैसे तो गोल्फ को हमेशा से संभ्रांत लोगों को खेल माना जाता है। पर कई पीढ़ियों से गोल्फ से जुड़ा मोती लाल का परिवार बिहार के समान्य पृष्ठभूमि से आता था।

उनका परिवार बिहार के बक्सर जिले से आता था।  पिता हीरा लाल भी जाने माने गोल्फ के कोच थे। दादा किशन कोईरी भी गोल्फ को कोच थे। वे शिलांग के गोल्फ कोर्स में गोल्फ सिखाया करते थे। पिता हीरा लाल को लार्ड माउंट बेटन अपने साथ दिल्ली लेकर आए। पिता के साथ तकरीबन तीन साल की उम्र से ही मोतीलाल गोल्फ कोर्स में जाने लगे थे।

मोती लाल ने जिन लोगों को गोल्फ का प्रशिक्षण दिया उनमें राजनेताओं और आईएएस की लंबी फेहरिस्त शामिल है। अपनी तमाम व्यस्तताओं के बीच वे कई मोर्चो पर सक्रिय रहते थे। गोल्फ कोचिंग, अपनी कंपनियों को देखना, समाजिक समारोहों में भागीदारी के बीच परिवार और दोस्तों के लिए समय निकाल लेना उनकी विशेषता थी। वे 24 घंटे में बमुश्किल पांच घंटे ही सोते थे। रात को 11 बजे सोने के बाद सुबह के चार बजे वे नोएडा गोल्फ क्लब में मौजूद मिलते थे। 
- vidyutp@gmail.com  
( MOTILAL, GOLF, HIRALAL, SANDEEP KASHYAP ) 



Tuesday, 15 October 2019

गरीबी से निजात दिलाने का रास्ता बताने वाले को नोबेल

दुनिया में 70 करोड़ लोग ऐसे हैं जिन्हें दो वक्त की रोटी नहीं मिल पाती। साल 2019 का अर्थ शास्त्र का नोबेल पुरस्कार पाने वाले भारतवंशी अर्थशास्त्री अभिजीत बनर्जी पिछले 30 सालों से ऐसे लोगों के लिए ही काम कर रहे हैं।

दुनिया के विकासशील देशों के 568 कलस्टर में दस साल तक शोध करके उन्होंने गरीबी के असली कारण जानने की कोशिश की.  फिर कई उपाय सुझाएजिन्हें कई सरकारों लागू किया जिसके बेहतर परिणाम आए। उन्हें भारत के 50 लाख दिव्यांग बच्चों के जीवन में उजाला लाने का श्रेय जाता है।

अभिजीत बनर्जी मानते हैं कि बचपन को सेहतमंद बनाना सबसे जरूरी है। इसलिए उनका सारा जोर टीकाकरण अभियान और पौष्टिक भोजन दिए जाने पर है।

मुंबई में जन्मे कोलकाता में पले बढ़े अभिजीत ने खुद कभी गरीबी का दंश नहीं झेला पर उनका दिल हमेशा गरीबों के लिए धड़कता है। वे खुद शानदार रसोइया भी हैंपर वे चाहते हैं कि दुनिया का कोई बच्चा भूखा न सोए. उनकी अब तक प्रकशित छह में से तीन किताबे गरीबी पर ही केंद्रित हैं।
गरीबी पर केंद्रित तीन पुस्तकें
अभिजीत बनर्जी की 2006 में अंडरस्टैंडिंग पावर्टी नामक पुस्तक आई। 2011 में आई पुस्तक पूअर इकोनोमिक्स ए रेडिकल रिथिंकिंग ऑफ द वे टू फाइट ग्लोबल पावर्टी। साल 2019 में एक और पुस्तक ए शार्ट हिस्ट्री ऑफ पावर्टी मेजरमेंटस।

नवीनतम पुस्तक  2019 में उनकी पुस्तक ह्वाट द इकोनोमी निड्स नाउ आई है जिसमें अभिजीत के साथ गीता गोपीनाथ, रघुराम राजन और मिहिर एस शर्मा सह लेखक हैं।


568 स्थलों पर प्रयोग
अभिजीत बनर्जी की अध्यक्षता में अब्दुल जमील लतीफ पावर्टी एक्शन लैब ने 10 सालों में भारत समेत विकासशील देशों में 568 स्थलों पर प्रयोग किए, जिससे गरीबी के कारणों को समझने में मदद मिली।

गरीबी दूर करने के सूत्र दिए

अभिजीत बनर्जी के इन सुझावों पर अमल से लाभ हुआ
स्कूल में बच्चों को मुफ्त भोजन
कमजोर बच्चों को खास तौर पर मदद
गरीब बच्चों के लिए मोबाइल क्लिनिक
समय पर सारे टीकाकरण
बच्चों के लिए पौष्टिक भोजन का इंतजाम


vidyutp@gmail.com

(ABHIJIT BANARJEE,  NOBEL PRIZE 2019, ECONOMICS)