Saturday, 13 October 2018

चले जाना आज के भागीरथ का..


भागीरथ बड़ी तपस्या और लंबी कोशिश के बाद गंगा को धरती पर उतार लाए थे। पर आज हम जीवनादायिनी गंगा को अविरल और निर्मल रखने में नाकाम साबित हो रहे हैं। 11 अक्तूबर 2018 को गंगा पुत्र और महान पर्यावरणविद स्वामी ज्ञानस्वरुप सानंद यानी जीडी अग्रवाल ने 112 दिन आमरण अनशन के बाद दम तोड़ दिया।


22 जून 2018 से जीडी अग्रवाल गंगा सफाई की मांग को लेकर 'आमरण अनशन' पर बैठे हुए थे। उनकी प्रमुख मांग थी कि गंगा और इसकी सह-नदियों के आस-पास बन रहे हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट के निर्माण को बंद किया जाए। पर्यावरणविद् जीडी अग्रवाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने छोटे भाई के रूप में संबोधित करते हुए गंगा सफाई के लिए तीन बार बड़ा ही भावुक पत्र लिखा था, लेकिन उन्हें एक भी पत्र का कोई जवाब नहीं मिला।


जीडी अग्रवाल का जन्म कांधला जिला मुजफ्फरनगर में 20 जुलाई 1932 को हुआ था। वे आईआईटी कानपुर में प्रोफेसर रह चुके थे। उन्होंने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य की ज़िम्मेदारी भी उन्होंने निभाई। यूनिवर्सिटी ऑफ बर्कले से पीएचडी करने वाले और आगे चलकर आईआईटी कानुपर में सिविल एंड एन्‍वायरनमेंटल इंजीनियरिंग के हेड बने।  बाद में उन्होने संन्यास लिया और अपना नाम स्वामी ज्ञान स्वरूप उर्फ सानंद रखा। प्रो. अग्रवाल ने 2008-2012 के बीच 4 बार गंगा नदी की रक्षा के लिए अनशन किया। 

इससे पहले 2011 में स्वामी निगमानंद की मौत
गंगा की खातिर 114 दिन तक अनशन करते हुए इससे पहले स्वामी निगमानंद की भी मौत हुई थी। गंगा में खनन पर रोक लगाने की मांग को लेकर अनशन पर गए निगमानंद सरस्वती का 13 जून 2011 को देहरादून स्थित जौलीग्रांट अस्पताल में निधन हो गया था। 


मदन मोहन मालवीय और गंगा सभा -  (1916 ) गंगा को अविरल बहने देने को कोशिशें काफी पुरानी है। आजादी से पहले मदन मोहन मालवीय ने 1916 में गंगा सभा के मंच से इसके लिए प्रयास किए थे। उन्होंने हरिद्वार के तीर्थ पुरोहितों के साथ मिलकर गंगा सभा की स्थापना की थी। तब मालवीय जी ने गंगा पर बांध बनाए जाने की ब्रिटिश सरकार की योजना का विरोध किया था। 

राम तेरी गंगा मैली – 1980 के गंगा जल के प्रदूषित होने का मामला पर्यावरणविदों द्वारा जोर शोर से उठाया जाना लगा था। साल 1985 में राजकपूर  की फिल्म राम तेरी गंगा मैली ने गंगा के प्रदूषण के मुद्दे को एक प्रेम कथा के माध्यम से उठाया था। इससे आम जन मानस तक गंगा के मैली होने का संदेश पहुंचा था।

स्वच्छ गंगा फाउंडेशन – प्रधान मंत्री राजीव गांधी ने 1984 के बाद गंगा की सफाई के लिए सरकारी स्तर पर प्रयास शुरू करवाए थे। उसके बाद गंगा की सफाई के लिए हजारों करोड़ खर्च किए जा चुके हैं। पर गंगा अभी मैली ही है।

गंगा सागर से गंगोत्री तक साइकिल यात्रा -  सुंदरलाल बहुगुणा – गंगा सागर से गंगोत्री साइकिल यात्रा – 1991 में पर्यावरणविद सुंदर लाल बहुगुणा ने गंगा पर देश व्यापी चेतना के लिए गंगा सागर से गंगोत्री तक साइकिल यात्रा निकाली थी। इस यात्रा में 40 से ज्यादा लोगों के दल ने कई महीने में देश के अलग अलग राज्यों में अलख जगाया था।
- विद्युत प्रकाश मौर्य

Wednesday, 10 October 2018

जल जंगल जमीन के लिए एक बार फिर जुटे 25 हजार लोग


गांधी जयंती के मौके पर 2 अक्तूबर 2018 को मध्यप्रदेश के ग्वालियर में कई राज्यो से आए 27 हजार किसानों ने एक बार फिर अपनी आवाज बुलंद की। ये भूमिहीन 2007 से लगातार आंदोलनरत हैं।
यहां जुटे हजारों भूमिहीनों ने केंद्र सरकार को चेतावनी दी कि अगर जमीन देने सहित उनकी अन्य मांगें नहीं मानी तो अगले लोकसभा चुनाव में सरकार गिरा देंगे। मेला मैदान में जमा हुए हजारों भूमिहीनों में केंद्र सरकार के रवैए को लेकर खासी नाराजगी है।

इस मौके पर एकता परिषद के संस्थापक पीवी राजगोपाल ने कहा, केंद्र सरकार ने अगर मांगें नहीं मानी तो 2019 के लोकसभा चुनाव में नतीजे भुगतने को तैयार रहे। राजगोपाल के आह्वान पर वहां मौजूद लोगों हजारों लोगों ने दोहराया कि अगर केंद्र सरकार ने अगर उनकी मांगें नहीं मानी तो आने वाले चुनाव में केंद्र में मोदी के नेतृत्व में सरकार नहीं बनेगी।


राजगोपाल का कहना है कि अपना हक पाने के लिए अपनी ताकत का अहसास कराना जरूरी हो गया है, केंद्र सरकार से गरीब व वंचित वर्गो को उनका हक दिलाने की बातचीत चल रही है, अगर इन मांगों को नहीं माना जाता है तो इस वर्ग को आगामी चुनाव में अपनी ताकत दिखानी होगी।


एकता परिषद के अध्यक्ष रणसिंह परमार ने जनसंसद के प्रांरभ में सभी आगंतुक सत्याग्रहियों और अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि महात्मा गांधी के जयंती के अवसर पर किया जाने वाला यह आंदोलन गांधी को सड़क पर उतारने की कोशिश है जिससे कि देश में भूमि सुधार लागू किया जा सके।

जनांदोलन के पहले दिन आए जलपुरुष राजेंद्र सिंह ने कहा कि वर्तमान दौर में सरकारों का नजरिया बदल गया है। वह जनता नहीं, उद्योगपतियों के लिए काम करती हैं। यही कारण है कि देश में जल, जंगल और जमीन पर उद्योगपतियों का कब्जा होता जा रहा है।


जनांदोलन में हिस्सा लेने आए गांधीवादी सुब्बाराव ने आजादी के सात दशक बाद भी लोगों को छत न मिलने और जमीन न होने का जिक्र किया। सुब्बाराव ने कहा, बंदूक की दम पर कोई स्थायी परिवर्तन नहीं हो सकता अहिंसात्मक तरीके से ही समाज परिवर्तन की लड़ाई लडनी होगी। गांधी जी को स्मरण करने का सबसे बेहतर तरीका सत्याग्रह है जिसके दम पर उन्होने देश को आजादी दिलायी। उन्होंने कहा कि बिना हथियार के दम पर संघर्ष जारी रहेगा और सफलता भी मिलेगी।

भूमिहीनों के मार्च को असम के पूर्व मुख्यमंत्री प्रफुल्ल चंद्र महंथ,  बीजेपी के पूर्व नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा, चिंतक और विचारक गोविंदाचार्य का भी साथ मिला। 

कई राज्यों के लोग पहुंचे - इस यात्रा में मध्य प्रदेश , छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, असम समेत कई राज्यों के भूमिहीन और आदिवासी हिस्सा लेने पहुंचे।  दो अक्तूबर तक देश भर से 27060 सत्याग्रही आज सुबह तक मेला मैदान में पहुंच चुके थे। जिसमें असम-430, मणिपुर-650, तमिलनाडु-469, केरल-282, छत्तीसगढ-2890, मध्यप्रदेश-10428, उत्तरप्रदेश-3234, बिहार-3267, उड़ीसा-1485, राजस्थान-846, झारखण्ड 2090 सत्याग्रहियों के साथ हरियाणा, उत्तराखण्ड, गुजरात, हिमाचल प्रदेश और महाराष्ट्र के प्रतिनिधि भी शामिल थे।


और दिल्ली के लिए कूच -  ग्वालियर से तैयारी के बाद 25 हजार से अधिक लोग पदयात्रा करते हुए 4 अक्तूबर को दिल्ली के लिए कूच कर गए। पहले दिन 4 अक्तूबर को सत्याग्रही 19 किलोमीटर चले और मुरैना जिले की सीमा में पहुंच गए। 25 हजार लोगों का अनुशासन में सड़कों पर चलना। रात होने पर सड़ के किनारे ही दरी बिछाकर सो जाना। एक-एक हजार के समूह में भोजन बनाना और गीत गाते हुए संघर्ष की राह पर चलते जाना...ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गांव के।
न्याय का विधान हो , सबका हक समान हो
सबकी अपनी हो जमीन, सबका आसमान हो... 

यात्रा दो दिनों बाद 6 अक्तूबर को मुरैना पहुंची। मुरैना में दोपहर में यात्रा को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने संबोधित किया। इसी बीच आंदोलनकारियों को केंद्र सरकार से भी उनकी मांगे सुने जाने का भरोसा मिला। इसी दिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव का ऐलान हो गया। इसके बाद आचार संहिता लागू होने के कारण पीवी राजगोपाल ने सत्याग्रहियों से राय लेकर सत्ताग्रह को समाप्त करने का ऐलान कर दिया। पर यह कहा कि आप लोग अपने अपने गांव में जाकर आंदोलन जारी रखेंगे। इसके साथ ही केंद्र सरकार के कहा गया कि अगर आश्वासन पर अमल नहीं होता है तो फिर सड़कों पर उतरेंगे।

एकता परिषद के प्रवक्ता अनिल गुप्ता ने कहा, आंदोलन का पहला फेज खत्म हो गया है, क्योंकि बातचीत का सिलसिला शुरु हो गया है। बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव राम माधव जी से बात हुई है, उनके साथ राजगोपाल और हमारे कई साथियों की बैठक होगी, जिसके बाद सरकार से वार्ता होगी। एकता परिषद संवाद में विश्वास करता है।"

आंदोलन की समाप्ति पर परिषद के संस्थापक राजगोपाल पीवी ने जारी वीडियो में कहा - हर संघर्ष का निष्कर्ष संवाद से निकलता है। एक संवाद ग्वालियर में सत्ताधारी सरकार से हुआ और दूसरा संवाद विपक्ष से मुरैना में स्थापित हुआ। बीजेपी के कई मंत्रियों से साथ चलने की बात कही है। अगले छह महीने में चुनाव है। जनप्रतिनिधियों ने 25 हजार लोगों के सामने वादा किया है कि वो चुनाव जीनते पर क्या करेंगे। और हमारी पांच मांगों को कैसे देखते हैं।



क्या है प्रमुख मांगें –
भूमिहीनों आदिवासियों का यह आंदोलन मुख्य रूप से पांच मांगों को लेकर है-
1 आवासीय कृषि भूमि अधिकार कानून बने
2. महिला कृषक हकदारी कानून (वूमन फार्मर राइट एक्ट)
3. जमीन के लंबित प्रकरणों के निराकरण के लिए न्यायालयों का गठन किया जाए
4. राष्ट्रीय भूमि सुधार नीति की घोषणा और उसका क्रियान्वयन
5. वनाधिकार कानून-2005 व पंचायत अधिनियम 1996 के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर निगरानी समिति बनाई जाए।

पुराने समझौतों पर अमल नहीं
राजगोपाल कहते हैं कि इससे पहले वर्ष 2007 में जनादेश और 2012 में जन सत्याग्रह के दौरान केंद्र सरकार के साथ लिखित समझौते हुए, मगर उन पर अब तक न तो अमल हुआ और न ही कानून बन पाया है।


अधिकार पत्र नहीं मिला -  डिंडोरी जिला मध्यप्रदेश के लिम्हा दादर गांव के साथी पन्चू और मुन्ना बैगा जनजाति के हैं और ये अपने पूर्वजो के समय से जिस जमीन पर खेती कर रहे हैं वह वन भूमि है, जिसका दावा करने के बाद भी अधिकार पत्र नहीं मिल पाया है। जनांदोलन 2018 में वे अपने अधिकारों की मांग को लेकर साथ साथ चल रहे हैं।
- प्रस्तुति - विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com

Thursday, 20 September 2018

गांधी के विचारों से ही मिटेंगी पृथ्वी पर खींची इंसानी लकीरें- सुब्बराव

बापू की 150वीं जयंती वर्ष के अवसर पर राष्ट्रीय युवा योजना ग्वालियर इकाई के द्वारा युवा संवाद कार्यक्रम का आयोजन किया गया। नगर के सिटी सेंटर स्थित होटल जानकी इन के सभागार में आयोजित युवा संवाद कार्यक्रम में प्रख्यात गांधीवादी और सर्वोदयी नेता एसएन सुब्बाराव ( भाई जी ) ने व्याख्यान दिया और युवाओं को संबोधित किया।
व्याख्यान की षुरुआत करते हुए सुब्बाराव ने चंद्रमा पर कदम रखने वाले प्रथम मनुष्य नील आर्मस्ट्राग की पंक्तियों से की। प्रथम चंद्रयात्री ने चंद्रमा से पृथ्वी को देखते हुए कहा था कि चांद से देखने पर पृथ्वी बेहद खूबसूरत दिखती है क्योंकि वहां से पृथ्वी पर कोई लकीर नहीं दिखती। भाई जी ने कहा कि परमषक्ति ने पृथ्वी का निर्माण किया लेकिन इंसानों ने जगह-जगह खरोंच और लकीर खींच दिया। देश, धर्म, जाति और नस्लों की इन इंसानी लकीरों से पृथ्वी रक्तरंजित हो चुकी है और इसे सिर्फ महात्मा गांधी के सिद्धांतों पर चलकर ही बचाया जा सकता है। राष्ट्र् और विश्व को जोड़ने के प्रण के साथ भाई जी ने ओजस्वी स्वर में प्रेरणास्पद समूह गान का आह्वान किया। अपने न्यूयार्क प्रवास की एक घटना का उल्लेख करते हुए भाई जी ने बताया कि कैसे गांधी के सिद्धांतों और विचारों से वहां के नागरिक प्रेरणा लेते हैं लेकिन दुर्भाग्यवश हम बहुत से भारतीय उन्हें आज भी प्रासंगिक नहीं मानते।
भाई जी ने कहा कि हमें स्वयं में उस आत्मषक्ति को तलाषने की अत्यंत आवश्यकता है जिसने एक समय बचपन में भयभीत रहने वाले बालक मोहनदास को इतनी षक्ति दी जिसने उस ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दे दिया जिनके सामा्रज्य में कभी सूर्यास्त नहीं होता था। भारत की आजादी के बाद दुनिया में 117 से ज्यादा देषों को औपनिवेषिक गुलामी से आजादी मिली थी। प्रत्येक आजाद राष्ट्र के राष्ट्रनायक ने अपनी लिखी किताबों में एक बात का जिक्र्र अवष्य किया कि उन्हें इस संघर्ष की प्रेरणा महात्मा गांधी के संघर्षों और विचारों से मिली थी वरना वो सपने में भी आजाद होने की कल्पना नहीं करते थे। अफ्रीका में 1906 में एषियाटिक आर्डिनेंस और अष्वेतों के हक के लिए अंग्रजों के विरुद्ध महात्मा गांधी की षक्ति के संदर्भ में भाई जी ने बताया कि, सैकड़ों वर्ष पूर्व आदिगुरु शंकराचार्य ने कहा है कि समस्त शक्तियों के स्रोत आप स्वयं हैं। दुनिया में अब तक हुए समस्त धर्म प्रवर्तकों और धर्म संस्थापकों ने इसी स्व शक्ति को पहचानने और इस तक पहुंचने की बात कही है। आत्मशक्ति की यह पहचान सिर्फ सत्कर्मों के दीपक को जलाने से ही संभव है।

वर्तमान समय में संसार में व्याप्त हिंसा, मतभेद, बेरोजगारी, भूख और तनावपूर्ण वातावरण में सिर्फ गांधी के सिद्धांतों के द्वारा ही शांति तक पहुंचा जा सकता है। धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र की सीमा में उलझे में विश्व और भारत को जोड़ने की अत्यंत आवश्यकता है। देष की तरुणाई अपनी आत्मशक्ति से विश्व को जोड़ने का यह कल्याणकारी कार्य कुशलतापूर्वक कर सकती है। आज हमें एक-दूसरे के धर्म को समझने और उसका सम्मान करने की जरुरत है। हमें ऐसी नीतियों की जरुरत है जो ऐसा विकास करें जिससे प्रकृति और वृक्षों को क्षति न पहुंचे जिससे सभी निरोग और स्वस्थ रहें। हमें अपने भ्रष्टाचार से दूर रहकर व्यवहार में शिष्टता और जीवन में पारदर्शिता लाने की जरुरत है। हम यह सुगमतापूर्वक कर सकते हैं क्योंकि हम सबके अंदर ही राम और रावण होते हैं। हमें अपने भीतर के राम को बढ़ाना है और इसलिए हमें राम से मार्गदर्शन लेना होगा।

चंबल के आत्मसमर्पण कर चुके दस्युओं के प्रसंग को याद करते हुए भाई जी ने कहा कि जब प्रख्यात गांधीवादी समाज सेविका सरला बहन (कैथरीन मैरी हिलमैन) उन दस्युओं से पूछती थी कि तुम्हें राम के विचार आकर्षित करते हैं या रावण का अहंकार तो वो सभी स्वयं को राम के विचारों से प्रभावित बताते थे। आज भी हमें अपने अंदर उसी विचार को बढ़ाने की जरुरत है। व्याख्यान के अंत में भाई जी ने उपस्थित युवाओं से राष्ट्र निर्माण में योगदान देने और जिम्मेदार नागरिक बनने का आह्वान किया। उपस्थित युवाओं और श्रोताओं ने बा-बापू के विचारों को आत्मसात करने और अंदर के भय से भयमुक्त होकर गौरवान्वित भारतीय होने का संकल्प लिया।
( ग्वालियर में 18 सितंबर 2018 का व्याख्यान )

Tuesday, 18 September 2018

मूक फिल्मों के दौर में तीन दिन

देश की पहली कामर्सियल फिल्म राजा हरिश्चंद्र 1913 में बनी। ये बात सभी जानते हैं। पर दादा साहब फाल्के की यह मूक फिल्म कितने लोगों ने देखी। राजा हरिश्चंद्र समेत दादा साहेब फाल्के की कई और मूक फिल्मों को देखने का सौभाग्य मिला दिल्ली के इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फार आर्ट्स में 14 से 16 सितंबर 2018 के बीच हुए मूक फिल्म समारोह में।
पत्रकार इकबाल रिजवी की पुस्तक पोस्टर बोलते हैं का विमोचन भी हुआ। ( 14  सितंबर 2018 ) 


यह अतीत में खो जाने का एक सुनहरा मौका था। समारोह के दौरान विषय परावर्तन करते हुए आईजीएनसीए के डाक्टर सचिदानंद जोशी ने मूक फिल्मों के महत्व को काफी सुगम ढंग से रेखांकित किया। इसे सफल बनाने में वरिष्ठ पत्रकार सुरेश शर्मा की बड़ी भूमिका रही। पहले दिन मूक फिल्म समरोह के उदघाटन के मौके पर प्रसिद्ध फिल्मकार श्याम बेनेगल और पटकथा लेखक अतुल तिवारी मौजूद थे।

दादा साहेब फाल्के की राजा हरिश्चंद्र – 1913
सिनेमा के अतीत के दौर पर सार्थक चर्चा के बाद दादा साहेब फाल्के की उस फिल्म का प्रदर्शन हुआ जिसने भारतीय सिनेमा जगत के इतिहास की नींव रखी। ये फिल्म सिर्फ 14 मिनट की बची है। फिल्म में कहानी को आगे बढ़ाने के लिए बीच बीच में अंग्रेजी-हिंदी में शीर्षकों का सहारा लिया गया था। पुणे फिल्म आर्काईव ने इसका डिजिटल वर्जन बनाने के साथ बैक स्कोर म्युजिक लगा दिया है। दादा साहेब फाल्के ने राजा हरिश्चंद्र की कहानी के लिए मार्कडेय पुराण की कथा को आधार बनाया था। फिल्म की कहानी में महर्षि विश्वामित्र विलेन की भूमिका में हैं,  हालांकि फिल्म का अंत सुखांत है। बाद में राजा हरिश्चंद्र पर कई और फिल्में भी बनीं। खुद दादा साहेब फाल्के 1943 के बाद इस फिल्म को सवाल बनाना चाहते थे। पर उनके गरम दल से जुड़ाव के कारण ब्रिटिश सरकार ने उन्हें अनुमति नहीं दी। देश आजाद होने से पहले दादा साहब का निधन हो चुका था। 


1400 मूक फिल्में बनी 1913 से 1931 के बीच।

09 फिल्में ही उपलब्ध है मूक दौर की बाकी सारी फिल्में नष्ट हो गईं।

1944 में 16 फरवरी को दादा साहेब फाल्के का निधन हो गया। 


1870 में 30 अप्रैल को फाल्के साहब का जन्म नासिक जिले में तीर्थ स्थल त्रयंबकेश्वर में हुआ था। 


पहले दिन समारोह में दादा साहेब फाल्के की 1918 में बनी श्रीकृष्ण जन्म और 1919 में बनी कालिया मर्दन का प्रदर्शित की गईं। श्रीकृष्ण जन्म का 12 मिनट का और कालिया मर्दन का 48 मिनट का फुटेज उपलब्ध है।

मूक फिल्म समारोह के तीसरे और आखिरी दिन 1903 में बनी फिल्म लाइफ एंड पैसन ऑफ जीसस क्राइस्ट देखने का मौका मिला। यह विश्व की शुरुआती फीचर फिल्मों में शामिल की जाती है। दादा साहेब फाल्के फ्रांस में बनी इस फिल्म से बहुत प्रेरित थे। उन्होंने लंदन में इस फिल्म के कई शो देखे थे। उन्हें इस फिल्म को देखकर ही भारत में फिल्में बनाने की प्रेरणा मिली थी।

इस शो में हमें दादा साहेब की अगली फिल्म लंका दहन देखने का मौका मिला । यह फिल्म 1917 में बनी थी। पर इस फिल्म की अब महज 5 मिनट की फुटेज ही उपलब्ध है। इसमें अशोक वाटिका का दृश्य है। अन्ना सालुंके ने इसमें दोहरी भूमिकाएं की थी। फिल्म में दादा साहेब फाल्के के कैमरामैन गणपत शिंदे हनुमान बने हैं। ये भारतीय फिल्मों के इतिहास में पहला डबल रोल था।

क्या आपको पता है कि 1928 में बनी शिराज ताजमहल पर बनी पहली फिल्म थी। एक घंटे 24 मिनट की इस मूक फिल्म में ताजमहल की कहानी बिल्कुल अलग अंदाज में है। इसकी कहानी निरंजनपाल ने लिखी थी। वे गरम दल के नेता बिपिन चंद्रपाल के बेटे थे। 

फिल्म शिराज का दृश्य ( 1928 ) 
शिराज की कहानी शाहजहां और उसकी रानी मुमताज की प्रेम कहानी तो है। पर शिराज इसमें वह चरित्र है जिसके घर बचपन में नूरजहां पली थी। शिराज भी नूरजहां से प्रेम करता था। इस फिल्म की कहानी के मुताबिक शिराज ही ताजमहल का वास्तुकार है। हालांकि निरंजन पाल को शिराज की कहानी कहां से मिली ये नहीं पता चलता। ये फिल्म ब्रिटेन और जर्मनी के फिल्म कपंनियों के सहयोग से बनी थी। इसमें हिमांशु राय शिराज की भूमिका में हैं।

हमने आखिरी फिल्म देखी नोटिर पूजा। 1932 में बनी इस फिल्म मेंकवि गुरु रविंद्रनाथ टैगोर ने भी छोटी सी भूमिका की थी। फिल्म 21 मिनट की है। टैगोर इस फिल्म के निर्देशक भी हैं। वास्तव मेंयह फिल्म टैगोर के 1926 के एक ड्रामा की रिकार्डिंग है।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com

( RAJA HARISHCHANDRA, NOTIR PUJA, SHIRAJ, LANKA DAHAN, KALIA MARDAN, SRI KRISHNA JANAM ) 


Sunday, 16 September 2018

सबके प्यारे...भाई जी

90 साल के नौजवान 

07 फरवरी 2018 को महान गांधीवादी सुब्बाराव अपना 90वां जन्मदिन मनाया। भले ही उम्र के 90वें साल में वे प्रवेश कर रहे हों पर वे तो हैं 90 साल के नौजवान....

देश-विदेश में फैले लाखों युवा उन्हें प्यार से भाई जी कहते हैं। उनका असली नाम है एस एन सुब्बराव। उनका जन्म फरवरी 1929 को कर्नाटक के बेंगलूर शहर में हुआ। उनके पुरखे तमिलनाडु में सेलम से आए थे। इसलिए उनका पूरा नाम सेलम नानजुदैया सुब्बराव है। सुब्बराव एक ऐसे गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता हैं जिन्होंने गांधीवाद को अपने जीवन में पूर्णता से अपनाया है। पर उनका सारा जीवन खास तौर पर नौजवानों को राष्ट्रीयताभारतीय संस्कृतिसर्वधर्म समभाव और सामाजिक उत्तरदायित्वों की ओर जोड़ने में बीता है। वे सही मायने में एक मोटिवेटर हैं। उनकी आवाज में जादू है। शास्त्रीय संगीत में सिद्ध हैं। कई भाषाओं में प्रेरक गीत गाते हैं। उनकी चेहरे में एक आभा मंडल है। जो एक बार मिलता है उनका हो जाता है। उन्हें कभी भूल नहीं पाता। कई पीढ़ियों के लाखों लोगों ने उनसे प्रेरणा ली है।

सारा भारत अपना घर
सुब्बराव जी का कोई स्थायी निवास नहीं है। सालों भर वे घूमते रहते हैं। देश के कोने कोने में राष्ट्रीय एकता व सांप्रदायिक सद्भावना के शिविर। शिवर नहीं तो किसी न किसी कार्यक्रम में मुख्य अतिथि। देश के हर बड़े छोटे शहर में युवा उन्हें जानते हैं। जहां से गुजरना हो पहले पोस्टकार्ड लिख देते हैं। लोग उनका स्वागत करते हैं। वे अपने युवा साथियों के घर में ठहरते हैं। कभी होटल या गेस्ट हाउस में नहीं। दिल्ली बंगलोर नहीं उनके लिए देश के लाखों युवाओं का घर अपने घर जैसा है।
हाफ पैंट व बुशर्ट 

लंबे समय से खादी का हाफ पैंट और बुशर्ट ही उनका पहनावा है। हमनेउनको उत्तरकाशी में दिसबंर की ठंड में भी देखा है जब एक पूरी बाजी की ऊनी शर्ट पहनीपर उतनी ठंड में भी हाफ पैंट में रहे। यह उनकी आत्मशक्ति है। सालों भर दुनिया के कई देशों में यात्रा करते हुए भी उनका यही पहनावा होता है। कई लोग उनके व्यक्तित्व व सादगी से उनके पास खींचे चले आते हैं उनका परिचय पूछते हैं।




चंबल का संत
सुब्बराव जी की भूमिका चंबल घाटी में डाकूओं के आत्मसमर्पण कराने में रही है। उन्होंने डाकुओं से कई बार जंगल में जाकर मुलाकात की। अपने प्रिय भजन आया हूं दरबार में तेरे... गायक डाकुओं का दिल जीता। उनके द्वारा स्थापित महात्मा गांधी सेवा आश्रम जौरामुरैना (मप्र) में ही जय प्रकाश नारायण के समक्ष माधो सिंहमोहर सिंह सहित कई सौ डाकुओं ने आत्मसमर्पण किया था। सुब्बराव जी का आश्रम इन डाकुओं के परिजनों को रोजगार देने के लिए कई दशक से खादी और ग्रामोद्योग से जुड़ी परियोजनाएं चला रहा है। चबंल घाटी के कई गांवों में सुब्बराव जी की ओर दर्जनों शिविर लगाए गए जिसमें देश भर युवाओं ने आकर काम किया और समाज सेवा की प्रेरणा ली।

पूरे देश में युवा शिविर- 
सुब्बराव जी द्वारा संचालित संस्था राष्ट्रीय युवा योजना अब तक देश के कोने कोने में 200 से अधिक राष्ट्रीय एकता शिविर लगा चुकी है। कश्मीर से कन्याकुमारी तकलक्षद्वीपपोर्ट ब्लेयरशिलांगसिलचर से लेकर मुंबई तक। आतंकवाद के दौर में पंजाब में और नक्सलवाद से ग्रसित बिहार के इलाकों में भी। कैंप से युवा संदेश लेकर जाते हैं । देश के विभिन्न राज्यों के लोगों के साथ सद्भावनापूर्ण व्यवहार करने कादोस्ती का और सेवा का। हजारों युवाओं की जीवनचर्या इन कैंपों ने बदल दी है। कई पूर्णकालिक समाजसेवक बन जाते हैं जो कई जीवन किसी भी क्षेत्र में रहकर सेवा का संकल्प लेते हैं।





कैंप ही जीवन है जीवन ही कैंप-
भाई जी के लिए पूरा जीवन ही एक कैंप की तरह है। तभी उन्होंने विवाह नहीं किया। कोई स्थायी घर नहीं बनाया। बहुत कम संशाधनों में उनका गुजारा चलता है। दो खादी के झोले और एक टाइपराइटर। यही उनका घर है। 78 वर्ष की उम्र में भी अक्सर देश के कोने-कोने में अकेले रेलगाड़ी में सफर करते हैं। रेलगाड़ी में बैठकर भी चिट्टियां लिखते रहते हैं। अगले दो महीने में हर दिन का कार्यक्रम तय होता है। एक कैंप खत्म होने के बाद दूसरे कैंप की तैयारी। सुब्बराव जी को केवड़िया गुजरात में 25 हजार नौजवानों का तो बंगलोर में 1200 नौजवानों का शिविर लगाने का अनुभव है।
पोस्टकार्ड की ताकत-
सालों से पोस्टकार्ड लिखना उनकी आदत है। टेलीफोन ई-मेल के दौर में भी उनका अधिकांश संचार पोस्टकार्ड पर चलता है। पूर्व रेल मंत्री सीके जाफरशरीफ कहते हैं कि सुब्बराव जी एक पोस्टकार्ड लिख देंगे तो नौजवान बोरिया बिस्तर लेकर कैंप में पहुंच जाते हैं। यह सच भी है। उनके आह्वान पर उत्तरकाशी भूकंप राहत शिविरसाक्षरता शिविर और दंगों के बाद लगने वाले सद्भावना शिविर में देश भर से युवा पहुंचे हैं।

विदेशों में गांधीवाद का प्रसार - हर साल के कुछ महीने सुब्बराव जी विदेश में होते हैं। वहां भी कैंप लगाते हैंखासकर अप्रवासी भारतीय परिवारों के युवाओं के बीच। इस क्रम में वे हर साल अमेरिकाजर्मनीजापानस्वीटजरलैंड जैसे देशों की यात्राएं करते हैं।









पुरस्कार सम्मान से दूर-
सुब्बराव जी पुरस्कार सम्मान से दूर रहने वाले व्यक्ति हैं। उन्होंने पद्म पुरस्कारों के लिए बड़ी सदाशयता से ना कर दी। उन्हें जिंदाबाद किए जाने से सख्त विरोध है। वे कहते हैं जो जिंदा है उसका क्या जिंदाबाद। हालांकि समय समय पर उन्हें कई पुरस्कारों से नावाजा गया है। सांप्रदायिक सौहार्द के लिए उन्हें राजीव गांधी सद्भावना अवार्ड, जमनालाल बजाज पुरस्कार, कबीर सम्मान से नवाजा जा चुका है।


साल 2010 में पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम से अणुव्रत पुरस्कार प्राप्त करते सुब्बराव।
राष्ट्रीय एकता पुरस्कार  1992

- नेशनल यूथ अवार्ड ( एनवाईपी को) 1995
 काशी विद्यापीठ वाराणसी की ओर से डी. लिट की मानद उपाधि -1997
विश्व मानवाधिकार प्रोत्साहन पुरस्कार-2002

राजीव गांधी राष्ट्रीय सद्भावना पुरस्कार -2003
- राष्ट्रीय सांप्रदायिक सदभाव पुरस्कार - 2003
रचनात्मक कार्यों के लिए जमनालाल बजाज पुरस्कार-2006

महात्मा गांधी मेमोरियल नेशनल अवार्ड -2008

अंतरराष्ट्रीय शांति के लिए अणुव्रत अहिंसा पुरस्कार -2010

जीवनकाल उपलब्धि पुरस्कार-2014 (भारतीय साथी संगठन द्वारा) 


- जीवनकाल उपलब्धि पुरस्कार-2015 ( 14 मई 2015 को स्पंदन आर्ट फाउंडेशन द्वारा)




( A Write up on SN Subbarao ) 


-विद्युत प्रकाश मौर्य,   ईमेल -vidyutp@gmail.com

संपर्क - एसएन सुब्बराव, निदेशक, राष्ट्रीय युवा योजना, कमरा नंबर 11, गांधी शांति प्रतिष्ठान, 221 दीन दयाल उपाध्याय मार्ग, नई दिल्ली -110002 
फोन - 9810350404, 01123222329  ई मेल - nypindia@gmail.com

Saturday, 15 September 2018

ये शख्‍स 654 खूंखार डाकुओं से करवा चुके हैं सरेंडर

डकैती से बदनाम हो चुकी चंबल घाटी के 654 खूंखार डाकुओं को सरकार के समक्ष आत्मसमर्पण कराने वाले इस शख्स से मिलिए। ये हैं बेंगलूरू के प्रसिद्ध गांधीवादी डॉ. एसएन सुब्बाराव।

बकौलसुब्बाराव पचास-साठ के दशक में चंबल घाटी के खूंखार डाकूओं के आतंक से जहां सरकार परेशान थीवहीं तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल पुलिस के जरिए इन पर शिकंजा कसने में लगे थे। लगभग रोज होने वाली मुठभेड़ में कभी डाकू मर रहे थे तो कभी पुलिसकर्मी शहीद हो रहे थे।

उस वक्त मुझे लगा कि शायद सरकार का तरीका गलत है। हर रोज हो रही हिंसा जब देखी न गई तो प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के मिलकर मैंने गांधीवादी तरीके से डाकुओं को समझाने का एक मौका मांगा।’ अमर उजाला से बातचीत करते हुए डॉ. एसएन सुब्बाराव ने बताया कि एक दुबले-पतले व्यकित पर प्रधानमंत्री ने भरोसा जताया।

लोकनायक जयप्रकाश नारायण व आचार्य विनोबा भावे जैसी हस्तियों ने मुझे प्रोत्साहन दिया। इसके बाद उन्होंने अपने जीवन के चार साल चंबल घाटी के डाकुओं के बीच ही बिताकर उन्हें महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित किया। डॉ. सुब्बाराव के प्रयास ही थे कि डकैती से बदनाम हो चुकी चंबल घाटी के 654 खूंखार डाकुओं ने सरकार के समक्ष आत्मसमर्पण कर समाज की मुख्य धारा में शामिल होने का फैसला किया।

उनके प्रयासों को जवाहर लाल नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी तक ने सराहा। अपने इन्हीं गांधीवादी प्रयासों के लिए प्रसिद्ध 90 वर्षीय डॉ. एसएन सुब्बाराव मंगलवार को हिसार जिले के गांव किरतान पहुंचे हुए थे। यहां उन्होंने शहीद चंद्रशेखर आजाद की प्रतिमा का अनावरण किया।

देश की सारी भाषाओं की समझ
डॉ. एसएन सुब्बाराव का कहना है कि उन्हें देश की लगभग सभी भाषाओं की समझ है। इन भाषाओं में बोलने-समझने के साथ-साथ वह इन भाषाओं में गीत भी गा लेते हैं। इस पर वे तर्क देते हैं कि गांधीवादी विचारों से लोगों को अवगत करवाने के लिए उन्हें देश के कोने-कोने में जाना होता हैइसलिए अलग-अलग प्रांत में अलग-अलग भाषा होने के कारण वहां के लोगों से बेहतर संवाद के लिए भाषा सीखनी जरूरी होती है।

जब लगा कि आज तो मर जाऊंगा:
 एक किस्सा सुनाते हुए डॉ. सुब्बाराव ने बताया कि मध्य प्रदेश की चंबल घाटी में डाकुओं के बीच उन्हें समझाने गए थे। वहां डाकू आपस में ही लड़ पड़े। चारों ओर से गोलियां चल रहीं थीं। तभी एकबारगी लगा कि आज तो मर जाऊंगा। इसी बीच एक गोली किसी अन्य आदमी को आकर लगी और वो गिर पड़ा।

इस दिल दहला देने वाली घटना के बाद भी उन्होंने हौसला नहीं खोयाडाकुओं को सज्जन बनाने के लिए पूरे प्रयास किए। आखिरकार 1972 में महात्मा गांधी सेवा आश्रम में लोकनायक जयप्रकाश नारायण की मौजूदगी में डाकुओं ने आत्मसमर्पण भी किया।
डॉ. एसएन सुब्बाराव बताते हैं कि अलग-अलग भागों में डाकुओं में युवा चेतना शिविर लगाकर बदलाव कर उन्हें आत्मसमर्पण के लिए राजी किया। कभी 50 तो कभी 20 लोगों का मन बदलता तो उनका सरकार के सामने आत्मसमर्पण करवा देते। आखिरी बार जब डाकुओं ने आत्मसमर्पण किया तो तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी उन्हें देखने के लिए पहुंची।अन्ना हजारे ने भी माना गुरु
देश के प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे भी डॉ. सुब्बाराव को अपना गुरु मानते हैं। एक किस्सा सुनाते हुए डॉ. सुब्बाराव ने कहा कि अन्ना हजारे आर्मी से रिटायर होने के बाद अपने गांव रालेगण सिद्धी में शराब पीने वालों को पीटकर उनकी बुरी आदतें छुड़वाते थे। उन्होंने अन्ना को ऐसे लोगों को गांधीवादी तरीके से समझाने के लिए प्रेरित किया।

इसके बाद अन्ना ने कभी हाथ नहीं उठाया। कुछ दिन पहले ही अन्ना ने अपने गांव में कार्यक्रम आयोजित कर डॉ. सुब्बाराव से ग्रामीणों को मुखातिब करवाया था। अन्ना हजारे की इच्छा है डॉ. सुब्बाराव का 100 वां जन्म दिन उनके गांव रालेगण सिद्धी में मनाया जाए।

डॉ. एसएन सुब्बारावप्रसिद्ध गांधीवादी ने कहा कि भारतीयों को दुनिया भर में खूब सम्मान मिलता है। सिर्फ गंदगी और भ्रष्टाचार के कारण नीचा झुकना पड़ता है। देश की असली दौलत नौजवान हैं। यही युवा पीढ़ी देश को भ्रष्टाचारभुखमरीगंदगी व नशे के जाल से बाहर निकाल भारत मां का गौरव बढ़ा सकती है।

निरंतर करते हैं यात्राएंडॉ. एसएन सुब्बाराव ब्रह्मचार्य जीवन जीते हैं। गर्मी हो या सर्दी खादी की कमीज और निकर ही सुब्बाराव की वेशभूषा है। अपने कपड़े स्वयं धोते हैं। फिर निरंतर यात्राएं करने के लिए निकल पड़ते हैं। एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने के लिए रेलगाड़ी में सफर करते हैं।

10 वर्ष की उम्र में ही गीता और उपनिषद् के भक्ति गीतों का गायन करने लगे। अगस्त 1942 को ब्रिटिश विरोधी नारे लगाने पर गिरफ्तार हुए। उनकी संगठन कुशलता के तो प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू भी कायल थे। अब तक अमेरिकाइंग्लैंडजर्मनीकनाडासिंगापुरइंडोनेशियाश्रीलंका सहित अनेक देशों की यात्रा कर चुके हैं।



 - कपिल भारतीय अमर उजालाहिसार(हरियाणा)

National Youth project
National Youth Project is a NGO founded by noted Gandhian Dr. S.N. Subbarao in 1970.

Contact add:
Dr. S.N Subbarao, Director, NYP
221, Dindyal upadhayay Marg, New Delhi-110002 (INDIA)
Tel. 011-23222329
Email : nypindia@hotmail.com

Thursday, 13 September 2018

राष्ट्रीय युवा योजना के शिविरों की झलकियां...

साल 2010 में मुजफ्फरपुर (बिहार)  में आयोजित राष्ट्रीय एकता शिविर में भारत की संतान गीत में हिस्सा अलग अलग राज्यों के प्रतिनिधि। ( फोटो सौजन्य मुकेश झा) 
20 से 25 मई 2015 में करीमनगर आंध्र प्रदेश में आयोजित शिविर में जुटे अलग अलग राज्यों के प्रतिनिधि युवा।



युवाओं के नारे 

देश की ताकत नौजवान
देश की दौलत नौजवान
देश की किस्मत नौजवान
नौजवान जिंदाबाद

दिल्ली हो या गौहाटी, अपना देश अपनी माटी।

कश्मीर से कन्याकुमारी, भारत माता एक हमारी।

हाथ लगे निर्माण में, नहीं मांगने नहीं मारने।

नव तरुणाई आई है...सदभावना लाई है

युवा शक्ति की कामना...सदभावना सदभावना

काशी हो या अमृतसर. सारा भारत अपना घर.

जोड़ो जोड़ो – भारत जोड़ो

राज्यों के नारे
आए हम बिहार से..नफरत मिटाने प्यार से
बुद्ध हो या गांधी. लाए प्यार की आंधी.

सोणा फूल गुलाब दा. सारा देश पंजाब दा.


Wednesday, 12 September 2018

सज्जनों की सक्रियता से रुकेगा अपराध – सुब्बाराव

भोपाल। गांधीवादी विचारक डॉ. एस.एन. सुब्बाराव ने कहा है कि सज्जनों की निष्क्रियता और दुर्जनों की सक्रियता जैसी दो बुराईयां समाज में विद्यमान हैंइसी वजह से अपराधवृत्ति समाप्त नहीं हो रही है। अच्छे लोग यदि सक्रिय हो जायें तो किसी हद तक अपराधों पर अंकुश लग सकता है। डॉ. सुब्बाराव ने यह बात आज यहां ''अपराध-विवेचना एवं सामाजिक जागरूकता'' विषय पर अपने व्याख्यान में कही। म.प्र. राष्ट्रभाषा प्रचार समिति द्वारा बसंत व्याख्यानमाला के तहत ''मंथन'' कार्यक्रम में इस व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में म.प्र. मानव अधिकार आयोग के अध्यक्ष श्री जस्टिस डी.एम. धर्माधिकारी मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे। डॉ. सुब्बाराव ने कहा कि अपराधमुक्त समाज के लिये पुलिस और अच्छे लोगों के बीच समन्वय आवश्यक है। समाज जितना अधिक जिम्मेदार होगा सरकार और पुलिस पर काम का बोझ उतना ही कम होगा। 

श्री सुब्बाराव ने कहा कि बापू ने सर्वप्रथम देश की एकता को कायम रखने का संदेश दिया थाइसलिये हमें क्षेत्रीयता और भाषायी संकीर्णताओं से ऊपर उठकर अपने वैविध्यपूर्ण सांस्कृतिक स्वरूप को बनाये रखने के लिये सामूहिक प्रयास करने होंगे। उन्होंने कहा कि भाषाओं के आधार पर देश को कमजोर करना घातक होगा। इसलिये हिन्दी के प्रसार के साथ ही क्षेत्रीय भाषाओं को भी समान रूप से बढ़ने के अवसर मिलने चाहिये। श्री सुब्बाराव ने कहा कि अच्छा शहर वही होता है जहां पुलिस की कम से कम जरूरत पड़े। लेकिन विडंबना है कि चौराहों पर लाल बत्ती जलते रहने के बावजूद भी यातायात पर नियंत्रण के लिये 4-5 पुलिस कर्मियों का एक समूह खड़ा रहता है। जिस दिन लोग स्वेच्छा से नियमों का पालन करेंगेउस दिन अपराधवृत्ति कम हो जायेगी। श्री सुब्बाराव ने कहा कि पाप से घृणा होनी चाहियेपापी से नहीं। (February 14, 2010)

अपनी शक्ति पहचानें युवा: डा. एसएन सुब्बाराव
गोरखपुर: गांधी विचारक व चिंतक डा. एसएन सुब्बाराव (भाई जी) ने यहां युवाओं का आह्वान किया कि वे देश को विश्वगुरु बनाने के लिए जाति-धर्म एवं भेदभाव की संकीर्ण सोच से मुक्त होकर कार्य करें। कोई भी कार्य करते समय युवा शक्ति को भटकाव से बचना होगा। उन्हें अपनी शक्ति का सही आकलन और उपयोग करना होगा। अगर युवा सही दिशा में दिल और दिमाग से कार्य करेंगे तो वे निश्चित रूप से आगे बढ़ेंगे। साथ ही पूरा समाज व देश भी प्रगति पथ पर अग्रसर होगा।
सुब्बाराव बापू स्नातकोत्तर महाविद्यालय पीपीगंज के खेल मैदान में 22वें प्रादेशिक रोवर/रेंजर समागम समारोह को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि विश्व में सभी देश ताकत व हथियार की होड़ में अरबों रुपये पानी की तरह बहा रहे हैं। अगर किसी भी देश का युवा आगे बढ़कर देश व समाज हित में कार्य करें तो वे देश वैसे ही पूरे विश्व में आगे बढ़ जाएगा। देश के युवाओं को गांधी जीबादशाह खान एवं मदर टेरेसा के विचारों और उनके आदर्शो को अपने जीवन में उतारते हुए समाज में कार्य करना होगा।  (Mon, 23 Feb 2015, JAGRAN)


ललितपुर। गांधीवादी विचारक डॉ. एस.एन. सुब्बाराव ने कहा कि हमें नशे की गंदी लत से अपने देश को बचाना होगा। हमें मिलकर इस बुरी आदत को युवाओं से दूर करते हुए जागरूक होने की आवश्यकता है। उन्होंने युवाओं से सुबह जल्दी उठकर एक घंटा योग व एक घंटा देश सेवा करने की बात पर जोर देते हुए कहा कि बाकी 22 घंटे दिनचर्या के अन्य कार्यों को करेंतभी हमारा देश नशा मुक्त हो सकता है।  राष्ट्रीय युवा योजना और जनचेतना मंच के तत्वावधान में नेहरू महाविद्यालय के प्रांगण में चल रहे नशा मुक्ति एकता शिविर में डॉ. एस.एन. सुब्बाराव व इंडोनेशिया से आए इन्द्रय उडयन शामिल हुए और संयुक्त रूप से शिविर का नेतृत्व किया। ( 22 JAN 2015)

समय की पाबंदी नहीं
आगरा: सर्वोदय चरखा मंडल और सर्वोदय सत्संग मंडल द्वारा लता कुंज बालूगंज में कार्यक्रम आयोजित किया गया। मुख्य अतिथि गांधीवादी नेता एसएन सुब्बाराव ने कहा कि भारतवर्ष में लोगों के पास घड़ियां बहुत हैं लेकिन समय की पाबंदी नहीं है। आध्यात्म को सामाजिकता से जोड़ा जाए। गांधीजी ने इसी राष्ट्रवाद को समझाया था। जिसमें आध्यात्म और सामाजिकता मिली-जुली हुई थी। ( जागरण, 13 अप्रैल 2015)