Friday, 31 May 2019

सत्रहवीं लोकसभा में सबसे ज्यादा 78 महिलाएं जीत कर पहुंची

यह नारी शक्ति की बढ़ती ताकत है और मजबूत होते लोकतंत्र का संकेत कि सत्रहवीं लोकसभा में सबसे ज्यादा 78 महिलाएं जीत कर पहुंची हैं। इस तरह से लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या कुल सदस्य संख्या का 17 प्रतिशत हो गई है। हालांकि अभी भी यह आंकड़ा 33 फीसदी से काफी नीचे है। 16वीं संसद में 62 महिलाओं को लोगों ने अपना जनप्रतिनिधि चुना था. भारत में धीरे-धीरे महिलाओं की राजनीति और संसद में भागीदारी बढ़ रही है, जो शुभ संकेत है।

लोकसभा चुनाव में कुल 8049 उम्मीदवार मैदान में थे। इनमें 724 महिला उम्मीदवार थीं। मौजूदा लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या 64 है। इनमें से 28 मौजूदा महिला सांसद चुनाव मैदान में थी।

इनमें सबसे अधिक 40 महिला उम्मीदवार बीजेपी के टिकट पर चुनाव जीतकर संसद पहुंचीं हैं। सन 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने सर्वाधिक, 54 और बीजेपी ने 53 महिला उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारा था। अन्य राष्ट्रीय पार्टियों में, बीएसपी ने 24, तृणमूल कांग्रेस ने 23, मार्क्सवादी कॉम्युनिस्ट पार्टी ने 10, भारतीय कॉम्युनिस्ट पार्टी ने चार और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने एक महिला उम्मीदवार को मैदान में उतारा था।

तृणमूल कांग्रेस में सबसे ज्यादा महिला सांसद - 
महुआ मोइत्रा, तृणमूल सांसद
अनुपातिक तौर पर महिलाओं को सबसे ज्यादा टिकट देने की बात करें तो सोलहवीं और सत्रहवीं लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस ने सबसे ज्यादा महिलाओं को टिकट दिए और इस पार्टी से सबसे ज्यादा महिलाएं चुनाव जीतकर भी पहुंची हैं। इस बार तृणमूल कांग्रेस की कुल 22 सांसदों में से 9 महिलाएं हैं। यानी इस पार्टी में महिला सांसदों की संख्या 33 फीसदी से ज्यादा है। पिछली लोकसभा में भी उनका अनुपात अच्छा था। पिछली बार तृणमूल कांग्रेस की 38 सांसदों में से 13 सांसद महिलाएं थी। यह करीब 30 फीसदी साझेदारी थी। पर बाकी दल महिलाओं को अब भी कम टिकट देते हैं। 

- vidyutp@gmail.com 


Tuesday, 28 May 2019

मायावती - चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं

( महिला सांसद - 75 )  बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती चार बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और कई बार लोकसभा और राज्यसभा की सदस्य भी रह चुकी हैं। लोग सम्मान में इन्हें बहन जी कह कर पुकारते हैं। माया पहली बार 1989 में बिजनौर से बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर लोकसभा का चुनाव जीतकर संसद में पहुंची। सन 1989 में उन्होंने बिजनौर में जनता दल के मंगलराम प्रेमी को हराया था। उन्होंने 2004 में अकबरपुर से लोकसभा का चुनाव जीता।
चार साल स्कूल में पढ़ाया
मायवती ने 1975 में कालिंदी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय से बीए किया। उन्होंने 1976 में बीएड की डिग्री ली। उन्होंने 1983 में दिल्ली विश्वविद्यालय से एलएलबी किया। प्रारम्भ मायावती ने दिल्ली के एक स्कूल में चार साल शिक्षण कार्य किया। किसी समय उन्होंने भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षाओं के लिए अध्ययन भी किया था।
कांशीराम राजनीति में लेकर आए
सन 1977 में कांशीराम के सम्पर्क में आने के बाद उन्होंने एक पूर्ण कालिक राजनीतिज्ञ बनने का निर्णय ले लिया। तब वे आईएएस की तैयारी कर रही थीं, पर कांशीराम की प्रेरणा से राजनीति में कदम रखा। पहले वे बामसेफ फिर डीएसफोर में सक्रिय हुईं। मायावती कांशीराम के संरक्षण के अन्तर्गत वे उस समय उनकी कोर टीम का हिस्सा रहींजब सन 1984 में बसपा की स्थापना हुई थी।
कैराना और हरिद्वार में हार मिली
वे 1984 में कैराना से लोकसभा का चुनाव स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर  लड़ी और 44 हजार मत पाकर तीसरे स्थान पर रहीं। वे 1985में बिजनौर लोकसभा से उपचुनाव में कूदींतो 63 हजार वोट मिले। इसके बाद वे 1987 में हरिद्वार से लोकसभा उपचुनाव लड़ीं पर यहां भी जीत नहीं मिली। यहां उन्हें 1.25 लाख मत मिले। यहां मायावती दूसरे स्थान पर रहीं। यहां तब रामविलास पासवान भी लड़ रहे थे, वे 34 हजार मतों के साथ चौथे स्थान पर रहे।
सन 1995 में यूपी की मुख्यमंत्री
मायावती कुल चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहीं। वे पहली बार 1995 में देश के सबसे बड़े राज्य की मुख्यमंत्री रहीं। वे 1997 और 2002 में थोड़े समय के लिए राज्य की मुख्यमंत्री बनीं। वे तीसरी बार 2007 में राज्य की मुख्यमंत्री बनीं। इस बार उनका कार्यकाल पूरे पांच साल का रहा। इस दौरान उन्होंने नोएडा से आगरा तक एक्सप्रेस वे का निर्माण कराया। उन्होने लखनऊ और आगरा में विशाल पार्कों का भी निर्माण कराया।
दलित परिवार में जन्म
मायावती का नाम देश के जाने माने दलित नेताओं में शुमार होता है। उनका जन्म एक हिंदू जाटव (दलितपरिवार में हुआ। उनका मूल नाम चंद्रावती है, इसी नाम से उनकी पढ़ाई लिखाई हुई। कांशीराम के संपर्क में आने पर उनका नाम मायावती रखा गया। उनके पिता प्रभु दास एक डाकघर कर्मचारी थे। वे डाक-तार विभाग के अनुभाग प्रधान के पद से सेवानिवृत्त हुए। मायावती के छह भाई और दो बहनें हैं। मायावती का परिवार ग्राम बादलपुर जिला गौतमबुद्ध नगर उत्तर प्रदेश के रहने वाला था। मायावती किसी समय अपने बूते पर दिल्ली में दूध की डेयरी चलाकर परिवार की मदद करती थीं।
उनके जीवन पर कई पुस्तकें आ चुकी हैं। साल 2009 में अजय बोस ने बहन जी द बायोग्राफी ऑफ मायावती नामक पुस्तक लिखी।
सफरनामा
1956 में 15 जनवरी को उनका जन्म यूपी के गौतमबुद्ध नगर जिले में हुआ।
1984 में शिक्षक की नौकरी छोड़कर बसपा में शामिल हो गईं।
1989 में बिजनौर लोकसभा (सु ) उत्तर प्रदेश से संसद सदस्य निर्वाचित।
1994 में राज्यसभा की सदस्य चुनीं गईं।
1995 में उत्तर प्रदेश की पहली दलित महिला मुख्यमंत्री बनीं।
1997 दूसरी बार यूपी की सीएम बनीं।
2002 में भाजपा के समर्थन से यूपी की मुख्यमंत्री बनीं।
2001 में वे बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष बनीं।
2004 में अकबरपुर से लोकसभा का चुनाव जीता।
2007 में बसपा के पूर्ण बहुमत से यूपी की सीएम बनीं।  


Monday, 27 May 2019

उमा भारती संन्यासी जिन्होंने छह बार लोकसभा का चुनाव जीता

(महिला सांसद :74) उमा भारती मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश से कुल छह बार लोकसभा का चुनाव जीत चुकी हैं। वे 2014 में मोदी सरकार में जल संसाधन मंत्री बनाई गईं। साल 2014 का लोकसभा चुनाव उन्होंने झांसी से जीता था। उन्होंने 2019 में लोकसभा का चुनाव नहीं लड़ा। उमा मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री रह चुकी है। उन्हें राजनीति में उभारने का श्रेय ग्वालियर की महारानी विजयराजे सिंधिया को जाता है। राम जन्मभूमि आन्दोलन में भी उन्होंने साध्वी ऋतंभरा के साथ प्रमुख भूमिका निभाई।

खजुराहो से पहली जीत
उमा कुल छह बार लोकसभा में पहुंची। उन्होंने 1984 में पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ापरन्तु जीत नहीं मिल सकी। वे 1989 के लोकसभा चुनाव में खजुराहो संसदीय क्षेत्र से सांसद चुनी गईं। इसके बाद वे 199119961998 में भी इसी सीट से भाजपा के टिकट पर चुनाव जीतकर संसद में पहुंची। साल 1999 में वह भोपाल सीट से सांसद चुनी गई, जबकि 2014 का चुनाव यूपी के झांसी से जीता।
केंद्र सरकार में मंत्री
उमा भारती ने 1999 में बनी वाजपेयी सरकार में मानव संसाधन विकासपर्यटनयुवा मामले एवं खेल मामले की मंत्री का काम संभाला। बाद में उन्होंने अटल सरकार में कोयला और खदान जैसे विभिन्न राज्य स्तरीय और कैबिनेट स्तर के मंत्री के तौर पर काम किया। साल 2014 में वे मोदी कैबिनेट में एक बार फिर केंद्र सरकार में मंत्री बनीं। गंगा संरक्षण से उनका खास लगाव है।
मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री
साल 2003 के चुनाव में उमा भारती के नेतृत्व में भाजपा ने मध्य प्रदेश में 166 सीटो पर शानदार जीत दर्ज की। वे 2003 में 8दिसंबर को राज्य की मुख्यमंत्री बनीं। पर 23 अगस्त 2004 उन्होंने राजनीति में उच्च मूल्यों का निर्वहन करते हुए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दियाजब उनके खिलाफ 1994 के हुबली दंगों के सम्बन्ध में उनके लिए गिरफ्तारी वारंट जारी हुआ। कुछ महीने बाद ही वे इस केस से बरी हो गईं पर उन्होंने पार्टी ने मुख्यमंत्री का पद वापस नहीं किया। इससे वे पार्टी से नाराज रहने लगीं।
भाजपा ने निष्कासन और वापसी
उमा भारती को नवंबर 2004 में सार्वजनिक तौर पर मीडिया के सामने लालकृष्ण आडवाणी की आलोचना करने के कारण पार्टी से बर्खास्त कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने अपनी अलग राजनीतिक पार्टी भारतीय जन शक्ति पार्टी बनाई। सात साल भाजपा से अलग रहने के बाद सात जून 2011 को उनकी पार्टी में दोबारा वापसी हो गई। उमा भारती साल 2012 में यूपी के चरखारी से भाजपा के टिकट पर विधायक चुनीं गईं।

टीकमगढ़ में जन्म और संन्यास
उमा भारती का जन्म मई 1959 मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके टीकमगढ़ में लोधी राजपूत परिवार में हुआ। उनकी औपचारिक शिक्षा छठी कक्षा तक ही हुई। पर वह बचपन से ही निडर और बेबाक थीं। कम उम्र में ही उन्होंने आध्यात्म की दीक्षा ली और संन्यासी जीवन अपना लिया। 
उन्होने 16 नवंबर 1992 को गुरू श्री विश्वेशतीर्थ स्वामी (श्रीकृष्ण मठउडुपीकर्नाटक) से संन्यास की दीक्षा ली। युवा अवस्था में भाजपा के संगठन में सक्रिय होने के बाद 1988 में मध्य प्रदेश भाजपा के उपाध्यक्ष पद पर पहुंचीं। साल 2018 में उन्होंने ऐलान किया कि अब चुनाव नहीं लडूंगी पर पार्टी के लिए काम करती रहूंगी।
सफरनामा
1959 में 3 मई को उमा का जन्म मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ में हुआ।
1989 में पहली बार खुजराहो से लोकसभा का चुनाव जीता।
2003 में मध्य प्रदेश की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं।
2004 में भाजपा से बाहर हुईं, 2011 में दुबारा वापसी हुई।
2014 में झांसी से लोकसभा का चुनाव जीता।

Sunday, 26 May 2019

सुषमा स्वराज - 25 साल उम्र में मंत्री बनीं

( महिला सांसद -73 ) मोदी सरकार में विदेश मंत्री के तौर पर अति सक्रियता दिखाने के लिए सुषमा स्वराज की खूब प्रशंसा हुई। 24 घंटे ट्विटर पर सक्रिय सुषमा स्वराज ने विदेश में फंसे भारतीय लोगों की कई बार तुरंत कार्रवाई करते हुए मदद पहुंचाने की कोशिश की। सुषमा ने 1996 व 1998 में दक्षिण दिल्ली संसदीय क्षेत्र से लोकसभा का चुनाव जीता। उन्होने 2009 और 2014 में विदिशा से लोकसभा का चुनाव जीता। वे तीन बार राज्यसभा की भी सदस्य रहीं।
वकालत की पढ़ाई
अम्बाला छावनी में 1952 में जन्मी सुषमा स्वराज स्कूल में प्रतिभाशाली छात्रा थीं। उनके पिता हरदेव शर्मा और माता श्रीमती लक्ष्मी देवी थीं। उन्होंने एसडी कालेज अम्बाला छावनी से बीए की पढ़ाई की। बाद में पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ से कानून की डिग्री ली। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने चंडीगढ़ में वकालत शुरू किया।1975 में उनका विवाह स्वराज कौशल के साथ हुआ। उनके पति अधिवक्ता रहे और वे मिजोरम के राज्यपाल रह चुके हैं।
जेपी आंदोलन में
सुषमा स्वराज सत्तर के दशक में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़ गई थीं। उन्होंने इमरजेंसी के दौरान जयप्रकाश नारायण के आन्दोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। आपातकाल का पुरजोर विरोध करने के बाद वे सक्रिय राजनीति में आ गईं।
25 साल की उम्र में कैबिनेट मंत्री
सुषमा 1977 में उन्होंने अम्बाला छावनी विधानसभा क्षेत्र से हरियाणा विधानसभा के लिए विधायक का चुनाव जीता और चौधरी देवीलाल की सरकार में से 1977 से 1979 के बीच राज्य की श्रम मंत्री रह कर25 साल की उम्र में कैबिनेट मन्त्री बनने का रिकार्ड बनाया था। वे1979 में 27 वर्ष की उम्र में हरियाणा राज्य में जनता पार्टी की राज्य अध्यक्ष बनीं।
पहली महिला विदेश मंत्री
सुषमा 1996 और 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में सूचना प्रसारण मंत्री बनाई गई थीं।  इस दौरान उनका सबसे बड़ा काम फिल्म उद्योग को उद्योग का दर्जा दिलवाना रहाजिससे भारतीय फिल्म उद्योग को भी बैंक से कर्ज मिल सकता था। वर्ष 2014 में उनकी काबिलियत को स्वीकारते हुए मोदी सरकार में विदेश मंत्री बनाया गया। उन्हें भारत की पहली महिला विदेश मंत्री होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। वे दिल्ली की पहली महिला मुख्यमंत्री भी रहीं। देश में किसी राजनीतिक दल की पहली महिला प्रवक्ता बनने की उपलब्धि भी उन्हीं के नाम दर्ज है। वे 2009 में भारत की भारतीय जनता पार्टी द्वारा संसद में विपक्ष की नेता चुनी गई थीं।
सुषमा स्वराज को भारतीय संस्कृति से खासा लगाव है। वे करवा चौथ समेत सभी हिंदू पर्व त्योहार बडी श्रद्धा से मनाती हैं। साड़ियां पहनने का उन्हें खास शौक है। हर बुधवार को वे हरे रंग की साड़ी में नजर आती हैं। उनकी एक बेटी हैं बांसुरी जो लंदन में वकालत करती हैं।
सफरनामा
1952 में 14 फरवरी को अंबाला में जन्म हुआ।
1975 में स्वराज कौशल से विवाह हुआ।
1977 में पहली बार अंबाला से विधायक चुनीं गईं।
1987 से 1990 तक वह अम्बाला छावनी से विधायक रही।
1990 के बाद 2000 और 2006 में राज्यसभा की सदस्य निर्वाचित की गईं।
1996  1998 में दक्षिण दिल्ली संसदीय क्षेत्र से लोकसभा का चुनाव जीता। 
1998 में अक्तूबर में थोड़े समय के लिए दिल्ली की मुख्यमंत्री बनीं।
2009 और 2014 में विदिशा से लोकसभा का चुनाव जीता।
2019 में 06अगस्त को दिल्ली में निधन. 

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Saturday, 25 May 2019

मीनाक्षी नटराजन - लगातार संघर्ष और सादगी की मिसाल


( महिला सांसद - 72 ) मीनाक्षी नटराजन 15वीं लोकसभा में मंदसौर से कांग्रेस पार्टी के टिकट पर चुनाव जीतकर पहुंची। एक सांसद के तौर पर उनका जीवन इतना सादगी भरा था कि उन्होंने अपने लिए अलग से बंगला लेने से इनकार कर दिया। वे पांच साल कांग्रेस दफ्तर में एक कमरे में ही रहीं। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस की उत्तर प्रदेश प्रभारी प्रियंका गांधी की ख़ास मीनाक्षी नटराजन का शुमार कांग्रेस की बड़े नेता के तौर पर होता है और वे कांग्रेस की राष्ट्रीय नेता मानी जाती हैं।
उज्जैन में जन्म हुआ
दक्षिण भारतीय परिवार से आने वाली मीनाक्षी का जन्म 23 जुलाई 1973 को हुआ। मीनाक्षी नटराजन का जन्म बिड़ला ग्राम नागदा,उज्जैन में हुआ था। उनके पिता का नाम ए.आरनटराजन और माता का नाम श्रीमती उमा नटराजन है। उनकी स्कूली पढ़ाई यहीं हुई। उन्होंने  जैव रसायन में स्नातक किया एवं कानून में स्नातक की डिग्री देवी अहिल्या विश्वविद्यालय इंदौर से प्राप्त की। मीनाक्षी ने विवाह नहीं किया है।
छात्र राजनीति से शुरुआत
छात्र जीवन मे कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई में शामिल होने के पश्चात उन्होंने राजनीति में हिस्सा लेना प्रारम्भ किया। वे 1999 से 2002 तक नेशनल स्टूडेंट यूनियन ऑफ इंडिया की अध्यक्ष रहीं। उन्होंने मध्य प्रदेश यूथ कांग्रेस में  2002-2005 के दौरान अध्यक्ष पद संभाला। बाद  में 2008 में राहुल गांधी द्वारा अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सचिव में चयनित किया गया।
2009 में मंदसौर से जीत
मीनाक्षी ने मंदसौर सीट से 2009 के आम चुनाव  पहली बार में ही अपने प्रतिद्वंद्वी भाजपा के लक्ष्मीनारायण पांडे 30,000 से अधिक वोटों से हरा दिया। लक्ष्मी नारायण पांडे भाजपा के बड़े नेता थे और 1971 से यहां से लगातार चुनाव जीतते हुए आ रहे थे। सांसद के तौर पर मीनाक्षी कार्मिकलोक शिकायतकानून और न्यायमहिलाओं के सशक्तिकरण समितिओं की सदस्य रहीं हैं।
चुनाव हारने के बाद भी जन संघर्ष
हालंकि 2014 में  मंदसौर संसदीय क्षेत्र में भाजपा के सुधीर गुप्ता ने सुश्री मीनाक्षी को 3,00,000 से अधिक मतों के अंतर से हरा दिया।2014 लोकसभा चुनाव हारने के बाद मीनाक्षी मंदसौर में अधिक सक्रिय हो गईं। उन्होंने मंदसौर में किसान आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लियाजिसमें उनके उत्पादन और ऋण के छूट के लिए बेहतर कीमतों की मांग की गई। मीनाक्षी 2019 में एक बार फिर मंदसौर से कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ीं। 
सफरनामा
1973 मे 23 जुलाई को नागदा में जन्म हुआ।
2002 में वह मध्य प्रदेश युवा कांग्रेस की अध्यक्ष बन गईं।
2008 में राहुल गांधी ने एआईसीसी सचिव के रूप में उनका चयन किया था।
2009 में मंदसौर से सांसद चुनीं गईं।
2014 में मंदसौर से लोकसभा का चुनाव हार गईं।
2019 में मंदसौर से फिर चुनाव मैदान में। 


Friday, 24 May 2019

बिभा रानी गोस्वामी - चार बार लगातार लोकसभा में पहुंची


( महिला सांसद - 71 ) बिभा रानी गोस्वामी पश्चिम बंगाल में वामपंथ से जुडे महिला नेत्रियों में प्रमुख नाम रहा। दलित समाज से आने वाली बिभा रानी नबाद्वीप लोक सभा से चुनाव जीत कर चार बार संसद में पहुंचीं। उन्होंने पहली बार 1971 में पांचवी लोकसभा का चुनाव मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट पर जीता।
कई समितियों की सदस्य
बिभा रानी 1971 के बाद वे 1977 में छठी लोकभा में भी जीत कर पहुंची। सातंवी लोकभा में 1980 में भी उन्होने जीत दर्ज की। इसके बाद उन्होंने 1984 में आठवीं लोकसभा का चुनाव भी यहीं से जीता। सांसद के तौर पर वे शिक्षा मंत्रालय की सलाहकार समिति की सदस्य रहीं। वे 1981 में बनी हिंदू मैरिज एक्ट की संयुक्त समिति की भी सदस्य रहीं।
बांग्लादेश के जेसोर में जन्म
बिभा रानी गोस्वामी का जन्म 12 जनवरी 1934 को पश्चिम बंगाल के जेसोर के हिदिया ग्राम में हुआ था। उनके पिता का नाम  बनमाली गोस्वामी और माता का नाम सौदामिनी था। उनकी शुरुआती शिक्षा एमएसटीपी गर्ल्स हाई स्कूल जेसोर में हुई। इसके बाद ब्रह्म बालिका शिक्षालय कोलकाता और लेडी बार्बन कालेज कोलकाता में उनकी शिक्षा हुई। उन्होंने कृष्णानगर गवर्नमेंट कॉलेज और यूनीवर्सिटी कालेज और टीचर एजुकेशन में शिक्षण प्रशिक्षण की ट्रेनिंग पाई थी। उन्होंने बीए आनर्स तक की शिक्षा ग्रहण की थी। इसके बाद उन्होने शिक्षक प्रशिक्षण के लिए बीटी भी किया था।
महिला संगठनों से राजनीति शुरू की
पढ़ाई के बाद उन्होंने शिक्षक के तौर पर अपना कैरियर शुरू किया। अपनी राजनीतिक पारी उन्होंने नादिया जिले की वेस्ट बेंगाल डेमोक्रेटिक वूमेन एसोसिएशन के साथ शुरू की। वे ऑल बंगाल टीचर्स एसोसिएशन में भी शिक्षकों के मुद्दों को लेकर सक्रिय रहीं। वे 1974 से 1979 तक वेस्ट बेंगाल डेमोक्रेटिक वूमेन एसोसिएशन की वाइस प्रेसिडेंट रहीं। वे 1981 में अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति की कार्यकारी समिति की सदस्य चुनीं गईं। बिभा रानी पश्चिम बंगाल स्टेट एडवाइजरी कमेटी की  सदस्य रहीं। 
रविंद्र संगीत में गहरी रुचि
सन 1950 में संतोष कुमार घोष के साथ विवाह करने के बाद उनके नाम में घोष जुड़ गया। उनके तीन बेटे और तीन बेटियां हुईं। उन्हें राजनीति से इतर संगीत से काफी लगाव रहा। खास तौर पर उन्हें रविंद्र संगीत काफी पसंद रहा। शिक्षा और इतिहास उनकी रूचि के विषय रहे। संसदीय पारी के बाद वे नादिया जिले के बदकुला के सुरभिस्तान ग्राम में रहने लगीं।
सफरनामा
1934 में 12 जनवरी को जैसोर (बांगलादेश) में जन्म हुआ। 
1950 में संतोष कुमार घोष के साथ विवाह हुआ।
1962 में शिक्षक संघ की राजनीति में सक्रिय हुईं।
1971 में पहली बार नबादीप से लोकसभा की सदस्य चुनीं गईं।
1977, 1980 और 1984 में भी लोकसभा का चुनाव जीता।


Thursday, 23 May 2019

सुखबंस कौर भिंडर - गुरदासपुर से लगातार पांच बार जीत दर्ज की


( महिला सांसद - 70 ) सुखबंस कौर भिंडर पंजाब की लोकप्रिय महिला सांसदों में शुमार है। भिंडर ने 1980 में पहली बार कांग्रेस की तरफ से गुरदासपुर लोकसभा सीट से जीत हासिल की। इसके बाद वे लगातार पांच बार इस सीट से जीत दर्ज कराती रहीं। इसके बाद वे एक बार राज्यसभा के लिए भी चुनीं गईं। अपने समय तक उनके पास लगातार पांच बार जीत दर्ज करने का रिकार्ड था।

गुरदासपुर के लिए काफी काम किया
सुखवंश कौर के पति आईपीएस अधिकारी थे। वे संजय गांधी के मित्रों में शामिल थे। गांधी परिवार से इन्ही निकट रिश्तों की वजह से राजनीति में शामिल हुईं। वे कुल छह बार संसद की सदस्य बनीं। पंजाब के अति पिछड़े क्षेत्र गुरदासपुर के विकास में उनकी बड़ी भूमिका रही। अपने लंबे संसदीय कार्यकाल में गुरदासपुर के लिए उन्होंने काफी काम किया। उनके कार्यो को लोग क्षेत्र में आज भी याद करते हैं। उनके प्रयासों से पंजाब में बेअंत सिंह कालेज ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी की स्थापना हुई। उन्होंने पठानकोट औद्योगिक केंद्रों की स्थापना करवाई। क्षेत्र में मिल्क प्लांट, चीनी मिल की स्थापना में भी उनकी प्रमुख भूमिका रही।
केंद्र सरकार में मंत्री
सुखबंश कौर ने पंजाब के सीमांत क्षेत्र गुरदासपुर के इसी नाम के लोकसभा क्षेत्र से 1980 के बाद 1985, 1989, 1992, 1996  तक लगातार अपनी जीत का परचम फहराया। सुखबंस कौर भिंडर 1993में नरसिम्हा राव की सरकार में केंद्रीय राज्यमंत्री भी रहीं। वे पंजाब कांग्रेस की सम्मानित और कद्दावर नेता थीं। साल 2005 में उन्हें कांग्रेस ने उच्च सदन राज्य सभा के लिए मनोनीत किया गया।
विनोद खन्ना से चुनाव हारीं
सुखवंश कौर भिंडर 1998 के लोकसभा चुनाव में भाजपा फिल्म स्टार उम्मीदवार विनोद खन्ना से चुनाव हार गईं। हालांकि वे इस सीट से 2004 तक चुनाव लड़ती रहीं, पर उन्हें दुबारा जीत नहीं मिल सकी।
लायलपुर पाकिस्तान में जन्म
भिंडर का 1943 में 14 सितंबर को लायलपुर (पाकिस्तान ) में जन्म हुआ। उनके पिता का नाम अर्जुन सिंह था। वे एक समृद्ध किसान परिवार से आती थीं। उनकी शिक्षा मसूरी के स्कूली शिक्षा हुई। उनकी उच्च शिक्षा पंजाब यूनीवर्सिटी चंडीगढ़ में हुई। यहां से उन्होंने स्नातक की डिग्री ली।
आईपीएस प्रीतम सिंह से विवाह
उनका 1961 में 12 अक्तूबर को आईपीएस प्रीतम सिंह भिंडर के संग विवाह हुआ। उनकी दो बेटियां हैं। उनके पति प्रीतम सिंह पुलिस में कई प्रमुख पदों पर रहे, अंत में वे सीआईएसएफ के डीजी के पद से रिटायर हुए। साल 2006 में 63 साल की उम्र में सुखवंश कौर का दिल्ली के गंगा राम अस्पताल में उनका निधन हो गया।
सफरनामा
1943 में 14 सितंबर को लायलपुर (पाकिस्तान ) में जन्म हुआ।
1961 में 12 अक्तूबर को आईपीएस प्रीतम सिंह भिंडर के संग विवाह हुआ।
1980 में पहली बार गुरदासपुर से चुनाव जीता।
1993 में नरसिम्हा राव सरकार में मंत्री बनाई गईं।
1998 में विनोद खन्ना से चुनाव हार गईं।
2006 में 15 दिसंबर को उनका निधन हो गया।
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Wednesday, 22 May 2019

मारग्रेट अल्वा - महिला सशक्तिकरण संबंधी नीतियां बनाने में बड़ी भूमिका रही


( महिला सांसद - 69 ) मारग्रेट अल्वा केन्द्र सरकार में चार बार महत्वपूर्ण महकमों की राज्य मंत्री रहीं। वे 1999 में तेरहवीं लोकसभा का चुनाव कर्नाटक के उत्तर कन्नडा जीत कर संसद में पहुंची। इससे काफी पहले वे 1974 में उच्च सदन राज्यसभा के लिए चुनीं गई थीं। वे 1980, 1986 और 1992 में भी राज्यसभा के लिए चुनीं गईं। वे राजस्थान और उत्तराखंड, गुजरात और गोवा की राज्यपाल भी रहीं। वे मर्सी रवि अवॉर्ड से सम्मानित महिला नेता हैं।
पांच बार संसद में पहुंची
चार बार राज्यसभा और एक बार लोकसभा की सांसद के रूप में उन्होंने महिला-कल्याण के कई कानून पास कराने में अपनी प्रभावी भूमिका अदा की। महिला सशक्तिकरण संबंधी नीतियों का ब्लू प्रिन्ट बनाने और उसे केन्द्र एवं राज्य सरकारों द्वारा स्वीकार कराए जाने की प्रक्रिया में उनका बहुमूल्य योगदान रहा। वे संसद की अनेक समितियों में रहने के साथ-साथ राज्य सभा के सभापति के पैनल में भी रहीं।
विदेशों में भी सम्मान
केवल देश में में ही नहींविदेश में भी उन्होंने मानव-स्वतन्त्रता और महिला-हितों में काम करके अपने नाम का लोहा मनवाय। दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति ने तो उन्हें वहां के स्वाधीनता संग्राम में रंगभेद के खिलाफ लड़ाई लड़ने में अपना समर्थन देने के लिए राष्ट्रीय सम्मान प्रदान किया।
वकालत से शुरुआत
मारग्रेट अल्वा का जन्म 14 अप्रैल 1942 को कर्नाटक में मेंगलुरू में एक ईसाई परिवार में हुआ। उनके पिता पास्कल एम्ब्रोस नजारेथ और माता एलिजाबेथ नजारेथ थीं। अल्वा की पढ़ाई बंगलुरू में माउंट कार्मेल कॉलेज और राजकीय लॉ कॉलेज में हुई। अल्वा ने शुरुआती दिनों में ही एक एडवोकेट के रूप में अच्छी पहचान बना ली थी। वकालत के पेशे से वे कांग्रेस पार्टी की राजनीति में आईँ।  
ललिता कला और पेंटिंग बनाने का शौक
मारग्रेट अल्वा कानूनी पेशे में रहते हुए उन्होंने तैल चित्र बनाने जैसी ललितकला में और गृह-सज्जा के क्षेत्र में भी पारंगत हैं। वे अपनी सुरूचि पूर्ण जीवन शैली और सौन्दर्य बोध के लिए भी लोगों के बीच जानी जाती हैं। साल 2016 में उनकी आत्मकथा ‘करेज एंड कमिटमेंट‘ प्रकाशित हुई।

निरंजन अल्वा से विवाह
मारग्रेट की शादी 24 मई 1964 में निरंजन अल्वा से हुई। निरंजन अल्वा स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी और भारतीय संसद की पहली जोड़ी जोकिम अल्वा और वायलेट अल्वा के पुत्र हैं। मारग्रेट अल्वा की एक बेटी और तीन बेटे हैं। दोनों बेटे निरेत अल्वा और निखिल अल्वा ने मिलकर 1992 में मेडिटेक नमक कंपनी की स्थापना कीजो कि एक टेलीविजन सॉफ्टवेयर कंपनी है।
पार्टी की दबंग महासचिव
2008 में कर्नाटक विधानसभा चुनाव के वक्त ही मार्गरेट अल्वा की विवाद के कारण सक्रिय राजनीति से विदाई हो गई थी। उस वक्त मार्गरेट अल्वा को पार्टी की दबंग महासचिव माना जाता थाजो पहले विलासराव देशमुख सरीखे मजबूत मुख्यमंत्री के रहते महाराष्ट्र की प्रभारी महासचिव रहीं। भूपिंदर सिंह हुड्डा के सीएम रहते हरियाणा की प्रभारी रहीं। उस वक्त कहा जाता था कि अल्वा किसी के दबाव में नहीं आतीं। अल्वा पर किसी तरह के भ्रष्टाचार का कभी आरोप नहीं लगा।

सफरनामा
1942 में 14 अगस्त को मंगलुरु में जन्म हुआ
1964 में निरंजन अल्वा से विवाह हुआ।
1974, 1980, 1986 और 1992 में राज्यसभा के लिए चुनीं गईं।
1999 में लोकसभा का चुनाव उत्तर कन्नडा से जीता।
2009 में उत्तराखण्ड की पहली महिला राज्यपाल रहीं।
2012 के मई में राजस्थान की राज्यपाल बनाई गईं।
2012 में उन्हें मर्सी रवि अवॉर्ड प्रदान किया गया 
2016 में उनकी आत्मकथा ‘करेज एंड कमिटमेंट‘ प्रकाशित हुई।