Tuesday, 15 October 2019

गरीबी से निजात दिलाने का रास्ता बताने वाले को नोबेल

दुनिया में 70 करोड़ लोग ऐसे हैं जिन्हें दो वक्त की रोटी नहीं मिल पाती। साल 2019 का अर्थ शास्त्र का नोबेल पुरस्कार पाने वाले भारतवंशी अर्थशास्त्री अभिजीत बनर्जी पिछले 30 सालों से ऐसे लोगों के लिए ही काम कर रहे हैं।

दुनिया के विकासशील देशों के 568 कलस्टर में दस साल तक शोध करके उन्होंने गरीबी के असली कारण जानने की कोशिश की.  फिर कई उपाय सुझाएजिन्हें कई सरकारों लागू किया जिसके बेहतर परिणाम आए। उन्हें भारत के 50 लाख दिव्यांग बच्चों के जीवन में उजाला लाने का श्रेय जाता है।

अभिजीत बनर्जी मानते हैं कि बचपन को सेहतमंद बनाना सबसे जरूरी है। इसलिए उनका सारा जोर टीकाकरण अभियान और पौष्टिक भोजन दिए जाने पर है।

मुंबई में जन्मे कोलकाता में पले बढ़े अभिजीत ने खुद कभी गरीबी का दंश नहीं झेला पर उनका दिल हमेशा गरीबों के लिए धड़कता है। वे खुद शानदार रसोइया भी हैंपर वे चाहते हैं कि दुनिया का कोई बच्चा भूखा न सोए. उनकी अब तक प्रकशित छह में से तीन किताबे गरीबी पर ही केंद्रित हैं।
गरीबी पर केंद्रित तीन पुस्तकें
अभिजीत बनर्जी की 2006 में अंडरस्टैंडिंग पावर्टी नामक पुस्तक आई। 2011 में आई पुस्तक पूअर इकोनोमिक्स ए रेडिकल रिथिंकिंग ऑफ द वे टू फाइट ग्लोबल पावर्टी। साल 2019 में एक और पुस्तक ए शार्ट हिस्ट्री ऑफ पावर्टी मेजरमेंटस।

नवीनतम पुस्तक  2019 में उनकी पुस्तक ह्वाट द इकोनोमी निड्स नाउ आई है जिसमें अभिजीत के साथ गीता गोपीनाथ, रघुराम राजन और मिहिर एस शर्मा सह लेखक हैं।


568 स्थलों पर प्रयोग
अभिजीत बनर्जी की अध्यक्षता में अब्दुल जमील लतीफ पावर्टी एक्शन लैब ने 10 सालों में भारत समेत विकासशील देशों में 568 स्थलों पर प्रयोग किए, जिससे गरीबी के कारणों को समझने में मदद मिली।

गरीबी दूर करने के सूत्र दिए

अभिजीत बनर्जी के इन सुझावों पर अमल से लाभ हुआ
स्कूल में बच्चों को मुफ्त भोजन
कमजोर बच्चों को खास तौर पर मदद
गरीब बच्चों के लिए मोबाइल क्लिनिक
समय पर सारे टीकाकरण
बच्चों के लिए पौष्टिक भोजन का इंतजाम


vidyutp@gmail.com

(ABHIJIT BANARJEE,  NOBEL PRIZE 2019, ECONOMICS) 


Monday, 30 September 2019

गांधी पर महान हस्तियों के विचार

मैंने गांधी की राजनैतिक साफगोई और इस्पात जैसी दृढ़ इच्छा शक्ति के लिए हमेशा उनका सम्मान किया है और उनकी प्रशंसा की है।

-    चार्ली चैप्लिन 

( महान फिल्मकार चार्ली चैप्लिन ने 1931 में लंदन में बापू से मुलाकात की थी। उन्होंने सन 1936 में मार्डन टाइम्स नामक फिल्म बनाई जिसमें बापू के विचारों की झलक थी। ) 

आने वाली पीढ़ी आश्चर्य करेंगी। क्या ऐसा हाड़ मांस वाला व्यक्ति कभी किसी युग में इस धरती पर चलता फिरता भी था। वे मुश्किल से यह विश्वास करेंगी कि आदमी के शरीर में ऐसा संभव हुआ।
-    अलबर्ट आइंस्टीन



पूरी दुनिया के देशों को मार्गदर्शन, आध्यात्मिक अवलंबन और साहसपूर्ण कार्यों के मिसाल के लिए गांधी की ओर मुड़कर देखने की जरूरत है। उनका जीवन बहुत सी समस्याओं का हल पेश करता है।
-    लुई फिशर  ( अमेरिकी पत्रकार और बापू के जीवनी लेखक ) 

गांधी केवल भारतीय राष्ट्रीय इतिहास के नायक नहीं हैं बल्कि पश्चिमी दुनिया के लिए भी गांधी ने ईसा के उन संदेशों को पुनर्जीवित किया जो भूला दिए गए थे।
-    रोम्यां रोला ( दार्शनिक ) 

पहली मुलाकात में हमारे दिलों ने एक दूसरे को देखा और और वो कभी न टूटने वाले प्यार के मजबूत संबंधों में तब्दील हो गए।
-    सी एफ एंड्रयूज

गांधीजी, प्रेम एवं सहिष्णुता का प्रकाशपुंज थे भारत को इस बात का गर्व होना चाहिए कि उसने विश्व को एक ऐसा व्यक्ति दिया जिससे लोग हमेशा प्रेरणा पाते रहेंगे।
-    लार्ड माउंट बेटन

इस बात में संदेह नहीं कि गांधी में महान आध्यात्मिक गुण थे। उनका प्रभाव उनके व्यक्तित्व में विश्व को देने  के गुण के कारण है।
-    फ्रेंकलिन डी रुजवेल्ट

मैं कई महीनों से सामाजिक सुधार की जिस पद्धति की तलाश में था, वह मुझे प्रेम और अहिंसा पर गांधीवादी दर्शन में मिली।
-    मार्टिन लूथर किंग, समाज सुधारक 

कथनी और करनी का योग, उपदेश और आचरण का संगम। उसका नाम है, मोहनदास करमचंद गांधी।
-    एच जे होम्स, दार्शनिक 

भारतमाता और भारतीयों से इतना प्रेम किसी ने नहीं किया होगा जितना महात्मा गांधी ने किया।
-    -  चक्रवर्ती श्री राजगोपालाचारी

सदियों तक लोग जब इस पीढ़ी के बारे में विचार करेंगे, जब यह मसीहा धरती पर आया था, तो सोचेंगे और उनके बताए रास्ते पर चलेंगे। हम उनके ऋणी हैं और हमेशा रहेंगे।
-    पंडित जवाहर लाल नेहरु

उनकी शिक्षा हमारे साथ रहेगी। मुझे लगता है कि गांधीजी की अमर आत्मा अभी भी यहां मौजूद है और भविष्य में भी इस देश की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएगी।
-    सरदार वल्लभ भाई पटेल

वह आदमी कई सेनापतियों से अधिक बहादुर था। दिल्ली सदियों से महान क्रांति का केंद्र रही है पर गांधी ने अपने देश को विदेशी गुलामी से मुक्त कराया और आत्मसम्मान दिलाया।
-    सरोजिनी नायडू

महात्मा गांधी ने हिंदू समाज को उदार बनाया। वे निचले तबके के दबे-कुचले लोगों के मुक्तिदाता थे।
-    डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद

गांधी हमारे समय के निर्दोषतम, शिखरस्थ एवं अत्यंत प्रेरणादायी व्यक्ति थे। वे सुकरात जैसे थे जिसे जहर का प्याला पीना पड़ा और जीसस जैसे जिन्हें सूली पर चढ़ना पड़ा।
-    डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन

हमें महात्मा गांधी के बताए रास्ते पर अवश्य चलना चाहिए। वे एक विशेष मिशन के साथ आए थे। हमें उनके अधूरे काम को पूरा करना होगा
-    जय प्रकाश नारायण

मानवीय इतिहास में यह अनोखी बात है कि एक अकेला व्यक्ति एक ही समय योद्धा, मसीहा और संत तीनों था और उससे भी अधिक वह विनम्र और मानवीय था।
-    घनश्याम दास बिरला

महात्मा गांधी देश और दुनिया को अंधेरे से उबरने वाले रोशनी की इकलौती किरण थे।
-    खान अब्दुल गफ्फार खान

वे महान आदमी थे। वे जिन सिद्धांतों में विश्वास करते थे, उस पर अमल करते हुए शहीद हुए। वे एक श्रेष्ठ मृत्यु को प्राप्त हुए क्योंकि वे अपना कर्तव्य करते हुए मारे गए।
-    मोहम्मद अली जिन्ना

सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखने में उनकी पहल को कृतज्ञता के साथ सभी शांतिप्रिय लोगों द्वारा याद रखा जाएगा। हमें आशा करनी चाहिए कि उनकी पहल सफल होगी।
-    लियाकत अली खान

मेरे मन में गांधीजी के प्रति आदर है। गांधीजी को पिछड़ी जाति के लोग अपनी जान से भी ज़्यादा प्यारे थे।
-    डॉक्टर भीमराव आंबेडकर


महात्मा गांधी अपने साथ असहयोग का, सत्याग्रह का एक अभिनव, अनोखा तरीका लाए। ऐसा लगा मानो उन्हें विधाता ने ही स्वतंत्रता का मार्ग दिखाने के लिए भेजा था।
-    सुभाषचंद्र बोस  ( 2 अक्तूबर 1943 को बापू की जन्मदिन के मौके पर, रेडियो संदेश में कहा ) 




Saturday, 28 September 2019

गंगा नदी से परिचित कराती पुस्तक - गंगा तीरे

यात्राएं करना जितना आह्लादकारी होता है, यात्रा साहित्य पढ़ने का सुख भी उससे कुछ कम नहीं। जहां आप जा नहीं पाते वहां लेखक के साथ यात्रा कर रहे होते हैं। हाल में मैंने एक नई पुस्तक पढ़ी – गंगा तीरे। इसके लेखक हैं वरिष्ठ पत्रकार अमरेंद्र कुमार राय। पुस्तक की शुरुआत उत्तर प्रदेश के गाजीपुर से होती है, जहां लेखक का बचपन गुजरा है। गंगा के तट पर ग्रामीण परिवेश में बड़े होते हुए लेखक ने गंगा के बारे में उन तमाम पहलुओं से परिचित कराया है जिससे शहरी लोग तो बिल्कुल अनजान होंगे।


पर गंगा तीरे पुस्तक की खास बात यह है कि पुस्तक गंगा के उदगम स्थल गौमुख से लेकर गंगा के सागर में मिलने तक की 2525 किलोमीटर की यात्रा पर प्रकाश डालती है। वह गंगा के सिर्फ धार्मिक और आध्यात्मिक पक्ष ही नहीं बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरण के पक्ष को भी गंभीरता से छूती है।
पुस्तक में गाजीपुर में गंगा की धारा और उसके आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों पर प्रभाव पर गंभीरता से प्रकाश डालती है। पर पुस्तक का सबसे मजबूत पक्ष है इसका गंगोत्री पक्ष। लेखन गंगोत्री में अपने लंबे प्रवास के दौरान गंगा के उदगम स्थल से जुड़े कई पहलुओं पर प्रकाश डाला है।

स्वामी सुंदरानंद जी का आश्रम का परिवेश, गंगोत्री से गौमुख तक की यात्रा का प्रसंग काफी रोचक और जानकारी परक है। गंगोत्री में रहने वाले साधुओं के जीवन को लेखक ने काफी निकटता से देखा है। साधुओं से जुड़े तमाम ऐसे प्रसंग हैं जिनके बारे में हम बहुत कम जानते हैं।

हालांकि पुस्तक में गाजीपुर से आगे फरक्का, गंगासागर तक के गंगा के बारे में ज्यादा विस्तार नहीं है। पर गंगा पर केंद्रित यह एक अनमोल पुस्तक है। यात्रा वृतांत में रुचि रखने वाले, पर्यावरण अध्ययन करने वाले और पानी के की कहानी पर ज्यादा कुछ जानने की इच्छा रखने वालों को यह पुस्तक पढ़नी चाहिए।

पुस्तक – गंगा तीरे
लेखक अमरेंद्र कुमार राय
प्रकाशक –नेशनल बुक ट्रस्ट
मूल्य – 150 रुपये ( बुक क्लब का सदस्य होने पर 20 फीसदी छूट मिलेगी )

-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com


Wednesday, 7 August 2019

फेनी के उस पार: यात्रा के साथ संस्कृति से रूबरु कराती पुस्तक

फेनी के उस पार महज एक यात्रा वृतांत नहीं है। पूर्वोत्तर के राज्य त्रिपुरा पर लिखी यह पुस्तक वहां के जनजातियों के जीवन पर बड़ी सूक्ष्म रूप से प्रकाश डालती है। मैं दो बार त्रिपुरा की यात्रा कर चुका हूं पर पुस्तक पढ़ते हुए यूं लगा कि तीसरी यात्रा पर निकल चुका हूं.  लेखक सांवरमल सांगनेरिया की यह पुस्तक 2016 में आई थी। पुस्तक का प्रकाशन बोधि प्रकाशन जयपुर ने किया है।
पुस्तक राज्य के सभी प्रमुख जनजाति से आपका परिचय कराती है। लेखक ने राज्य हर हिस्से की यात्रा की है। राज्य के काले दौर यानी उग्रवादी काल पर भी प्रकाश डालती है। पुस्तक में चित्र  नहीं हैं पर लेखक ने शब्दों से अनूठा संसार खींचा है। पुस्तक की भाषा में प्रवाह है जो पाठक को अपने साथ बांधे रखता है। फेनी उस नदी का नाम है जो भारत बांग्लादेश की सीमा पर बहती है। लेखक राज्य की दस नदियों बारे में बड़ी रोचकता से चर्चा करते हैं। पूर्वोत्तर में रूचि रखने वाले हर व्यक्ति के लिए यह पुस्तक पठनीय है।

इससे पहले पूर्वोत्तर पर रविशंकर रवि की पुस्तक लाल नदी नीले पहाड़ पढ़ने को मिली थी। हिंदी में पूर्वोत्तर पर बहुत कम यात्रा साहित्य लिखा गया है। इस कमी के बीच फेनी के उस पार एक अनमोल पुस्तक है। 

पुस्तक : फेनी के उस पार
प्रकाशक : बोधि प्रकाशनजयपुर
मूल्य : 200 रुपये
पुस्तक कैसे प्राप्त करें

लिखें - श्री माया मृगबोधि प्रकाशन, जयपुर-
फोन नं-9829018087 या 0141-2503989 
Email : bodhiprakashan@gmail.com
पता - बोधि प्रकाशन,  एफ/77, सेक्टर-9, रोड न.11, करतारपुरा 
इंडस्ट्रियल एरियाबाइस गोदामजयपुर – 302006 (राजस्थान) 



: विद्युत प्रकाश मौर्य Email- vidyutp@gmail.com

मेरी त्रिपुरा की यात्रा पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएं...

Tuesday, 30 July 2019

ओडिशा के रसगुल्ला को भी मिला जीआई का तमगा


ओडिशा के रसगुल्ला को सोमवार को जीआई (जियोग्राफिकल इंडीकेशन अर्थात भौगोलिक सांकेतिकटैग की मान्यता मिल गई है। भारत सरकार के जीआई रेजिस्ट्रेशन की तरफ से यह मान्यता दी गई है। जीआई मान्यता को लेकर चेन्नई जीआई  रजिस्ट्रार की तरफ से विज्ञप्ति जारी कर यह जानकारी दी गई है।
स्वाद और रंगरूप के आधार पर जीआई प्रमाणन नेओडिशा रसगुल्ला’ को वैश्विक पहचान प्रदान की है। एजेंसी ने अपनी वेबसाइट पर इसकी जानकारी पोस्ट की है। अपने रसगल्ले को वैश्विक पहचान मिलने से ओडिशा के लोगों में खुशी की लहर है। मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने प्रमाण पत्र की प्रति ट्विटर पर जारी किया है।

पश्चिम बंगाल के साथ थी लड़ाई
जीआई मान्यता के लिए 2018 में ओडिशा सरकार की तरफ से आवेदन किया गया था। तथ्य एवं प्रमाण के आधार पर  अब ‘ओडिशा रसगुल्ला’ को भी जीआई टैग मिल गया है।
ओडिशा दर्ज कराई थी आपत्ति
दो साल पहले 2017 में बंगाल के रसगुल्ला को जीआई टैग मिल भी गया था। इसके बाद 2018 फरवरी महीने में ओडिशा सूक्ष्म उद्योग निगम की तरफ से चेन्नई के जीआई कार्यालय में विभिन्न प्रमाण के साथ अपने रसगुल्ले का प्रमाणनन के लिए दावा किया था।


पंद्रहवीं सदी के उड़िया ग्रंथ में रसगुल्ला
बंगाल के लोगों का तर्क है कि रसगुल्ले का आविष्कार1845 में नबीन चंद्रदास ने किया था। वे कोलकाता के बागबाजार में हलवाई की दुकान चलाते थे। उनकी दुकान आज भी केसी दास के नाम से संचालित है।
पर ओडिशा का तर्क है उनके राज्य में 12वीं सदी से रसगुल्ला बनता आ रहा है। उड़िया संस्कृति के विद्वान असित मोहंती ने शोध में साबित किया कि 15वीं सदी में बलरामदास रचित उड़िया ग्रंथ दांडी रामायण में रसगुल्ला की चर्चा है। वे तुलसी कृत मानस से पहले उड़िया में रामायण लिख चुके थे।


ओडिशा और बंगाली रसगुल्ला में अंतर
बंगाली रसगुल्ला बिल्कुल सफेद रंग और स्पंजी होता है,जबकि ओडिशा रसगुल्ला हल्के भूरे रंग का और बंगाली रसगुल्ला की तुलना में मुलायम होता है। यह मुंह में जाकर आसानी से घुल जाता है। ओडिशा रसगुल्ला के बारे में दावा है कि यह 12वीं सदी से भी भगवान जगन्नाथ को भोग चढ़ाया जा रहा है। इसे खीर मोहन और ‘पहाला रसगुल्लाभी करते हैं।

पटनायक ने जताई खुशी 
मुझे यह साझा करते हुए खुशी हो रही है कि ओडिशा रसगुल्ला ने जीआई प्रमाणन प्राप्त कर लिया है। छेने से बना हुआ इस सुस्वादु मिष्टान को दुनिया भर के उड़िया लोगों द्वारा पसंद किया जाता है। यह भगवान जगन्नाथ को भोग के तौर पर अर्पित किया जाता है।
नवीन पटनायकमुख्यमंत्रीओडिशा ( ट्विटर पर ) 


Saturday, 27 July 2019

देश के सबसे बुजुर्ग अरबपति थे संप्रदा सिंह


 साल 2017 में संप्रदा सिंह के नाम ने देश भर के लोगों को अचानक चौंकाया जब उनका नाम देश के सबसे बुजुर्ग अरबपति के तौर पर खबरों में आया।
नब्बे साल से ज्यादा की उम्र में संप्रदा सिंह 2018 में सौ अमीर भारतीयों की फोर्ब्स-2018 की सूची में 46वें स्थान पर थे। उनकी कुल संपत्ति 179 अरब रुपये आंकी गई थी। संप्रदा 2017 की फोर्ब्स की सूची में 43वें स्थान पर थे। वे 2018 में फोर्ब्स की द वर्ल्ड बिलियनेयर्स लिस्ट में 1,867वें पायदान पर थे।

सादगी भरा जीवन
चार दशक में अपनी दवा कंपनी को शीर्ष पर ले जाकर अंतरराष्ट्रीय जगत में ख्याति प्राप्त करने वाले संप्रदा सिंह मुंबई में सादगी भरा जीवन जीते थे। उन्होंने कभी अपने वैभव का प्रदर्शन नहीं किया। वे कभी राजनीति के गलियारे में भी सक्रिय नहीं देख गए।  

बिहार के जहानाबाद में जन्म
1925 में बिहार के जहानाबाद में मोदनगंज प्रखंड के ओकरी गांव के एक किसान परिवार में संप्रदा सिंह का जन्म हुआ। उन्‍होंने पटना यूनिवर्सिटी से बीकॉम की पढ़ाई की थी।

दवा कंपनी की स्थापना
1973 में 8 अगस्‍त को उन्होंने अल्‍केम लेबोरेटरीज लिमिटेड की स्थापना की, जो देश की पांचवीं सबसे बड़ी दवा कंपनी है। संप्रदा बिहार से महज एक लाख रुपये पूंजी लेकर मुंबई गए थे और दवा कंपनी शुरू की। उनकी कंपनी इस वक्त भारत समेत यूरोप, एशिया और अमेरिका में संचालित होती है। ल्केम फार्मास्युटिकल्स को फार्मा लीडर अवार्ड मिल चुका है। 2009 में फार्मा के क्षेत्र में उल्लेखनीय काम के लिए संप्रदा सिंह को सत्या ब्रह्मा की फार्मास्युटिकल लीडरशिप समिट द्वारा लाइफटाइम एचीवमेंट अवार्ड दिया गया था।

पटना से शुरुआत

26 हजार करोड़ रुपये से ज्‍यादा की टर्नओवर वाली कंपनी खड़ी करने वाले संप्रदा सिंह कभी पटना के अशोक राजपथ पर केमिस्‍ट की दुकान में नौकरी किया करते थे।
केमिस्ट की दुकान की थी 
1953 में संप्रदा सिंह ने पटना में रिटेल केमिस्‍ट के तौर पर एक छोटी शुरुआत की। उसके बाद उन्होंने लक्ष्मी शर्मा के साथ पटना में दवा की दुकान शुरू की। इसी दौरान वे अस्पतालों में दवा की सप्लाई भी करने लगे। 1960 में पटना में मगध फार्मा के बैनर तले उन्होंने फार्मा डिस्‍ट्रीब्‍यूशन का कारोबार शुरू किया। सत्तर के दशक में उन्होंने मुंबई का रुख किया उसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा।

 ( जन्म - 1925 ,  निधन - 27 जुलाई 2019 ) 

Friday, 31 May 2019

सत्रहवीं लोकसभा में सबसे ज्यादा 78 महिलाएं जीत कर पहुंची

यह नारी शक्ति की बढ़ती ताकत है और मजबूत होते लोकतंत्र का संकेत कि सत्रहवीं लोकसभा में सबसे ज्यादा 78 महिलाएं जीत कर पहुंची हैं। इस तरह से लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या कुल सदस्य संख्या का 17 प्रतिशत हो गई है। हालांकि अभी भी यह आंकड़ा 33 फीसदी से काफी नीचे है। 16वीं संसद में 62 महिलाओं को लोगों ने अपना जनप्रतिनिधि चुना था. भारत में धीरे-धीरे महिलाओं की राजनीति और संसद में भागीदारी बढ़ रही है, जो शुभ संकेत है।

लोकसभा चुनाव में कुल 8049 उम्मीदवार मैदान में थे। इनमें 724 महिला उम्मीदवार थीं। मौजूदा लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या 64 है। इनमें से 28 मौजूदा महिला सांसद चुनाव मैदान में थी।

इनमें सबसे अधिक 40 महिला उम्मीदवार बीजेपी के टिकट पर चुनाव जीतकर संसद पहुंचीं हैं। सन 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने सर्वाधिक, 54 और बीजेपी ने 53 महिला उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारा था। अन्य राष्ट्रीय पार्टियों में, बीएसपी ने 24, तृणमूल कांग्रेस ने 23, मार्क्सवादी कॉम्युनिस्ट पार्टी ने 10, भारतीय कॉम्युनिस्ट पार्टी ने चार और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने एक महिला उम्मीदवार को मैदान में उतारा था।

तृणमूल कांग्रेस में सबसे ज्यादा महिला सांसद - 
महुआ मोइत्रा, तृणमूल सांसद
अनुपातिक तौर पर महिलाओं को सबसे ज्यादा टिकट देने की बात करें तो सोलहवीं और सत्रहवीं लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस ने सबसे ज्यादा महिलाओं को टिकट दिए और इस पार्टी से सबसे ज्यादा महिलाएं चुनाव जीतकर भी पहुंची हैं। इस बार तृणमूल कांग्रेस की कुल 22 सांसदों में से 9 महिलाएं हैं। यानी इस पार्टी में महिला सांसदों की संख्या 33 फीसदी से ज्यादा है। पिछली लोकसभा में भी उनका अनुपात अच्छा था। पिछली बार तृणमूल कांग्रेस की 38 सांसदों में से 13 सांसद महिलाएं थी। यह करीब 30 फीसदी साझेदारी थी। पर बाकी दल महिलाओं को अब भी कम टिकट देते हैं। 

- vidyutp@gmail.com 


Tuesday, 28 May 2019

मायावती - चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं

( महिला सांसद - 75 )  बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती चार बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और कई बार लोकसभा और राज्यसभा की सदस्य भी रह चुकी हैं। लोग सम्मान में इन्हें बहन जी कह कर पुकारते हैं। माया पहली बार 1989 में बिजनौर से बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर लोकसभा का चुनाव जीतकर संसद में पहुंची। सन 1989 में उन्होंने बिजनौर में जनता दल के मंगलराम प्रेमी को हराया था। उन्होंने 2004 में अकबरपुर से लोकसभा का चुनाव जीता।
चार साल स्कूल में पढ़ाया
मायवती ने 1975 में कालिंदी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय से बीए किया। उन्होंने 1976 में बीएड की डिग्री ली। उन्होंने 1983 में दिल्ली विश्वविद्यालय से एलएलबी किया। प्रारम्भ मायावती ने दिल्ली के एक स्कूल में चार साल शिक्षण कार्य किया। किसी समय उन्होंने भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षाओं के लिए अध्ययन भी किया था।
कांशीराम राजनीति में लेकर आए
सन 1977 में कांशीराम के सम्पर्क में आने के बाद उन्होंने एक पूर्ण कालिक राजनीतिज्ञ बनने का निर्णय ले लिया। तब वे आईएएस की तैयारी कर रही थीं, पर कांशीराम की प्रेरणा से राजनीति में कदम रखा। पहले वे बामसेफ फिर डीएसफोर में सक्रिय हुईं। मायावती कांशीराम के संरक्षण के अन्तर्गत वे उस समय उनकी कोर टीम का हिस्सा रहींजब सन 1984 में बसपा की स्थापना हुई थी।
कैराना और हरिद्वार में हार मिली
वे 1984 में कैराना से लोकसभा का चुनाव स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर  लड़ी और 44 हजार मत पाकर तीसरे स्थान पर रहीं। वे 1985में बिजनौर लोकसभा से उपचुनाव में कूदींतो 63 हजार वोट मिले। इसके बाद वे 1987 में हरिद्वार से लोकसभा उपचुनाव लड़ीं पर यहां भी जीत नहीं मिली। यहां उन्हें 1.25 लाख मत मिले। यहां मायावती दूसरे स्थान पर रहीं। यहां तब रामविलास पासवान भी लड़ रहे थे, वे 34 हजार मतों के साथ चौथे स्थान पर रहे।
सन 1995 में यूपी की मुख्यमंत्री
मायावती कुल चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहीं। वे पहली बार 1995 में देश के सबसे बड़े राज्य की मुख्यमंत्री रहीं। वे 1997 और 2002 में थोड़े समय के लिए राज्य की मुख्यमंत्री बनीं। वे तीसरी बार 2007 में राज्य की मुख्यमंत्री बनीं। इस बार उनका कार्यकाल पूरे पांच साल का रहा। इस दौरान उन्होंने नोएडा से आगरा तक एक्सप्रेस वे का निर्माण कराया। उन्होने लखनऊ और आगरा में विशाल पार्कों का भी निर्माण कराया।
दलित परिवार में जन्म
मायावती का नाम देश के जाने माने दलित नेताओं में शुमार होता है। उनका जन्म एक हिंदू जाटव (दलितपरिवार में हुआ। उनका मूल नाम चंद्रावती है, इसी नाम से उनकी पढ़ाई लिखाई हुई। कांशीराम के संपर्क में आने पर उनका नाम मायावती रखा गया। उनके पिता प्रभु दास एक डाकघर कर्मचारी थे। वे डाक-तार विभाग के अनुभाग प्रधान के पद से सेवानिवृत्त हुए। मायावती के छह भाई और दो बहनें हैं। मायावती का परिवार ग्राम बादलपुर जिला गौतमबुद्ध नगर उत्तर प्रदेश के रहने वाला था। मायावती किसी समय अपने बूते पर दिल्ली में दूध की डेयरी चलाकर परिवार की मदद करती थीं।
उनके जीवन पर कई पुस्तकें आ चुकी हैं। साल 2009 में अजय बोस ने बहन जी द बायोग्राफी ऑफ मायावती नामक पुस्तक लिखी।
सफरनामा
1956 में 15 जनवरी को उनका जन्म यूपी के गौतमबुद्ध नगर जिले में हुआ।
1984 में शिक्षक की नौकरी छोड़कर बसपा में शामिल हो गईं।
1989 में बिजनौर लोकसभा (सु ) उत्तर प्रदेश से संसद सदस्य निर्वाचित।
1994 में राज्यसभा की सदस्य चुनीं गईं।
1995 में उत्तर प्रदेश की पहली दलित महिला मुख्यमंत्री बनीं।
1997 दूसरी बार यूपी की सीएम बनीं।
2002 में भाजपा के समर्थन से यूपी की मुख्यमंत्री बनीं।
2001 में वे बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष बनीं।
2004 में अकबरपुर से लोकसभा का चुनाव जीता।
2007 में बसपा के पूर्ण बहुमत से यूपी की सीएम बनीं।