Wednesday, 30 March 2011

संगीत चैनल - कितना शोर कितना संगीत


अगर आपको नाचना नहीं आता तो कोई बात नहीं। एमटीवी की वीजे मारिया आपको डांस सीखा देगी। ऐसा डांस जिसे आप कहीं भी कभी भी उपयुक्त मौके पर कर सकें। ये डांस शम्मी कपूर से लेकर शाहरूख खान के स्टाइल का हो सकता है। वह आपको माधुरी दीक्षित के लटके झटके भी सीखाती है। ये नमूना उस संगीत चैनल का जो आपको 24 घंटे डांस म्यूजिक की दुनिया में ले जाकर युवाओं को सही राह पर ले जाने का दावा करता है।

सेटेलाइट चैनलों की फेहरिस्त में एमटीवी और चैनल वी की आगमन के साथ ही एक नई संस्कृति की शुरूआत हुई है। इन चैनलों का देश के युवाओं पर व्यापक असर पड़ा है। बालीवुड की फिल्मों पर भी इन म्यूजिक चैनलों का असर पडा है। भारत की सांस्कृतिक नगरी वाराणसी के गंगा तट पर बसी एक कालोनी के छोटे से कमरे में रहने वाले ब्रिटेन से आए एरिक कहते हैं कि वे यहां तबला सीखने आए हैं। वे अपने गुरू का सम्मान करते हैं और बड़ी तन्मयता से तबला सीख रहे हैं। वे एमटीवी द्वारा परोसी जा रही है संस्कृति से उब कर यहां आए हैं। उन्हें शास्त्रीय संगीत में शांति मिलती है। निश्चय ही चैनल वी और एमटीवी द्वारा परोसे जा रहे है संगीत में शोर ज्यादा है और वैज्ञानिकता कम। लेकिन फरवरी 1998 तक एमटीवी ने भारत के 83 लाख घरों में अपनी जगह बना ली थी।

ये संगीत चैनल बड़ी चुस्त दुरुस्त रणनीति के साथ आए हैं। म्यूजिक चैनलों ने अपने अपने चैनल पर खूबसूरत वीडियो जॉकी ( वीजे) रखे हैं, जो कम कपड़े पहनती हैं, खुद नाचती हैं साथ ही युवा दर्शकों को भी झूमने नाचने के लिए प्रेरित करती हैं। उनके साथ ही विश्व के जाने माने उपभोक्ता ब्रांड भी। इन ब्रांडों से प्राप्त होने वाले विज्ञापन पर ही ये चैनल चल रहे हैं। एमटीवी और चैनल वी जब भारत में आए तो पहले ही विदेशी म्यूजिक ही दिखा रहे थे। लेकिन भारतीय युवाओं के बीच ज्यादा लोकप्रिय होने के लिए इन्होंने तेजी से अपने कलेवर में बदलाव किया। इन चैनलों पर भारतीय वीजे दिखाई देने लगे। हालांकि सिर्फ नाम के भारतीय थे। कपड़ों और बोलचाल से अंग्रेजी। कभी कभी बीच में टूटी फूटी हिंदी बोल देते थे। रूबी भाटिया, कोमल सिद्धू, नताशा जैसे चेहरे युवाओं को लुभाने के लिए आ गए।

मजे की बात एमटीवी ने अपने सभी वीजे को सेक्सी कहकर किसी प्रोडक्ट के रुप में दर्शकों के सामने परोसा। कोमल सिद्धू को उन्होने सेक्सिएस्ट वीजे ऑफ द टाउन कहा। अपनी नई नवेली वीजे मारिया को उन्होंने सेक्सी के साथ फन लविंग और चहक भरी आवाज का स्वामी कहकर पेश किया। 

नए गायकों की फौज- वहीं इन म्यूजिक चैनलों ने भारत के पॉप और रीमिक्स गाने वालों को भी एक नया मंच दिया। सुनीता राव, इला अरूण, उषा उत्थुप, शेरॉन प्रभाकर, श्वेता शेट्टी, अनामिका, दलेर मेहंदी, अलीशा चिनाय, लकी अली, हरिहरन जैसे लोगों को अपनी प्रतिभा दिखाने का पूरा मौका इन टीवी चैनलें पर मिला। गायकों की अच्छी मार्केटिंग हुई, कई गायक अच्छा खासा रूपया कमाने लगे। परंतु इन पॉप गायकों की लोकप्रियता शार्ट कट में मिली। शास्त्रीय संगीत के साधकों की तरह इन्होंने कोई लंबी मेहनत नहीं की है। श्वेता शेट्टी का अलबम दीवाने  तो दीवाने हैं.. सिर्फ संगीत के कारण नहीं बल्कि उसके म्यूजिक वीडियो के उत्तेजक पिक्जराइजेशन के कारण लोकप्रिय हुआ।

इन संगीत चैनलों ने गायक बनने का रास्ता आसान कर दिया है। जाने माने हास्य कलाकार महमूद के बेटे लकी अली जल्द ही पॉप स्टार बन गए तो फिल्मों में बुरी तरह असफल विकास भल्ला गायक बन गए। संगीत चैनलों गायकों की मार्केटिंग कर रहे हैं। संगीत चैनलों को टारगेट ऑडिएंस ( लक्षित स्रोता समूह ) 15 से 35 साल के बीच के युवा हैं, जिन्हें दिग्भ्रमित करना आसान होता है। 

फिल्मों को लोकप्रिय संगीतकार आनंद राज आनंद स्वीकार करते हैं कि संगीत चैनलों के प्रभाव बालीवुड के फिल्मों के म्यूजिक पर भी पड़ा है। संगीत में पैरों की थिरकन का महत्व बढ़ा है। आधिकांश लोग ऐसा संगीत बना रहे हैं जो लोगों को झूमने नाचने पर मजबूर करे। म्यूजिक चैलनों के कारण हर नए अलबम का म्यूजिक वीडियो बनाया जाने लगा है। म्यूजिक वीडियो का पिक्जराइजेशन ग्लैमरस और सेक्सी करने की कोशिश की जाती है। याद किजिए अनामिका के म्यूजिक वीडियो कैटवाक की तो शेफाली जरीवाला के कांटा लगा की। ये सब खास तौर पर टीवी के म्यूजिक चैनलों को ध्यान में रखकर ही बनाए गए थे।

रीमिक्स का बाजार- संगीत चैनलों ने रीमिक्स म्यूजकि को नया बाजार दिया है। पुराने गानों क रीमिक्स करके नए गायक म्यूजिक वीडियो बनाकर कमाई करने लगे। अपने जमाने की लोकप्रिय गायिका आशा भोसलें ने जब देखा कि उनके गाने को रीमिक्स कर संगीत कंपनियां कमाई कर रहे हैं। आशा भोंसले को अचरज तब हुआ जब उनके गाए पुराने गानों को लोग उनके सामने की ही किसी नए गायक का बताने लगे। मजबूर होकर आशा जी भी रीमिक्स के बाजार में उतर आईं। संगीत के इस बुरे दौर से लता मंगेश्कर जैसी महान गायिका, मन्ना डे जैसे गायक तो खैय्याम और नौशाद जैसे संगीतकार दुख जताया। म्यूजिक चैनलों की जरूरत के हिसाब से नुसरत फतेह अली खां के सूफी संगीत का भी म्यूजिक वीडियो बनाया गया।

म्यूजिजक के साइड इफेक्ट्स-  म्यूजिक चैनलों ने युवाओं को आकर्षित करने के लिए क्लब एमटीवी जैसे कार्यक्रम शुरू किए जिसमें सैकड़ो युवा बिकनी, वन पीस और टू पीस में नाचते गाते नजर आते हैं। चैनल वी पर म्यूजिक वीडियो में आलिंगन और चुंबन के दृश्य आम हैं। म्यूजिक चैनलों का दावा है कि वे युवाओं को तथाकथित तौर पर समर्थ और बोल्ड बना रहे हैं। कई लोगों ने इन म्यूजिक चैनलों पर युवा पीढ़ी को दिग्भ्रमित और गुमराह करने का आरोप लगाया। 

लेकिन म्यूजिक चैनलें का दावा है कि वे युवा पीढ़ी को स्वस्थ मनोरंजन देकर उन्हें अपराध की दुनिया से दूर कर रहे हैं। बदलते वक्त के साथ एमटीवी और चैनल वी अपने कार्यक्रमों के कलेवर में बदलाव भी ला रहे हैं। एमटीवी बकरा तो चैनल वी कई तरह के रियलिटी शो और कामेडी वाले शो लाकर युवाओं को अपने साथ जोडकर रखने की कोशिश मे लगा है। भारत में कदम रखने के साथ ही एमटीवी और चैनल वी ने म्यूजिक वीडियो अवार्ड्स की शुरूआत की। इन अवार्डस में देशी- विदेशी संगीत का रीमिक्स पेश किया गया। एक ऐसी रात जिसमें कलाकारों के संगीत के साथ मस्ती और जाम का भी दौर था। संगीत चैनलों के साथ ही इसके वीजे बड़े बड़े शहरो को होटलों के डांस फ्लोर पर युवाओं को अपनी संगीत की धुन पर नचाने लगे। देश के महानगरों में लेटलाइट पार्टियों का दौर शुरू हो गया। इन पार्टियों की प्रायोजक शीतल पेय और बीयर बनाने वाली कंपनियां थीं। जाहिर है इससे महानगरों में एक ऐसी नई पीढ़ी आ गई है जो इन संगीत चैनलों के साथ कथित तौर पर मैच्योर हो रही है।
लेकिन चैनल वी और एमटीवी से प्रभावित होकर तमाम देशी कंपनियां भी म्यूजिक चैनल लेकर आईं। एटीएन म्यूजिक, म्यूजिक एशिया जी म्यूजिक ऐसी प्रारंभिक कंपनियां थी जो संगीत चैनल के रूप में आईं। इन चैनलों पर बालीवुड का संगीत और प्राइवेट म्यूजिक वीडियो अलबम दिखाए जाते थे।

सेटेलाइट चैनलों की फेहरिस्त में म्यूजिक चैनल खोलना अपेक्षाकृत सस्ती प्रक्रिया है। इन चैनलों पर प्रमोशनल म्यूजिक वीडियो या तो मुफ्त में दिखाए जाते हैं या फिर पैसे लेकर सिर्फ पुरानी फिल्में को गाने दिखाने के लिए पैसे देने पड़ते हैं। कई संगीत चैनल बिना किसी एंकर या वीडियो जॉकी के भी संचालित किए जाते हैं। बाद में आए संगीत चैनलों में नाइन एक्सएम और एमएच वन जैसे चैनल भी ठाक ठाक चले। वहीं क्षेत्रीय भाषाओं में संगीत चैनलों की शुरूआत हुई। जैसे पंजाबी में कई संगीत चैनल आए जिन्होंने उभरते पंजाबी गायकों को मंच प्रदान किया तो संगीत बांग्ला, संगीत भोजपुरी जैसे क्षेत्रीय म्यूजिक चैनल भी देखे जा रहे हैं। दक्षिण भारत में क्षेत्रीय भाषाओं में कई संगीत चैनल सफलतापूर्वक चल रहे हैं। 
 - विद्युत प्रकाश मौर्य

Monday, 28 March 2011

छोटे परदे पर यूपी की लड़ाई

यूपी में साल 2012 में विधान सभा के चुनाव होने वाले हैं। आबादी के लिहाज से यूपी देश का सबसे बड़ा राज्य है लिहाजा न्यूज चैनलों में भी यूपी को लेकर मारा मारी है। फिलहाल यूपी के दर्शकों के लिए चार 24 घंटे के न्यूज चैनल उपलब्ध हैं। सबसे पुराने खिलाड़ी ईटीवी उत्तर प्रदेश, सहारा यूपी और बाद में आए जी यूपी और जनसंदेश। लेकिन अब कई और खिलाड़ी चुनाव से पहले मैदान में आने को तैयार हैं। इनमें महुआ न्यूज का उत्तर प्रदेश चैनल, पंजाब टूडे समूह का यूपी न्यूज रिलांच की तैयारी में है तो साधना भी यूपी उत्तराखंड चुनाव मैदान के लिए ताल ठोकने को तैयार है। 


साधना को ताजा नीलामी में डीडी डाइरेक्ट प्लस पर जगह मिल गई है। लिहाजा ये चैनल यूपी के गांव गिरांव में भी फ्री में उपलब्ध होगा। वहीं राष्ट्रीय चैनल यूपी पर विशेष तैयारी तो करेंगे ही। अब हम थोडा पीछे चलते हैं। 2007 के विधान सभा चुनाव को याद करें तो तब बीएसपी पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई थी। लेकिन अपनी चुनावी तैयारी में तब मीडिया प्लानिंग बीएसपी के चुनावी तैयारी का हिस्सा नहीं था। बीएसपी ने बूथ लेवल पर कार्यकर्ताओं को तैयार कर ये चुनाव जीता था। यहां तक की पूरे चुनाव कंपेन के दौरान बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने एक भी प्रेस कान्फ्रेंस तक को संबोधित नहीं किया था। मीडिया को मनुवादी कहने वाली मायावती लगातार चुनाव प्रचार में मीडिया से दूर रहीं। चुनाव जीतने के बाद मुख्यमंत्री बनने के दौरान उन्होने पहली बार मीडिया को संबोधित किया। इस दौरान भी उन्होने मीडिया की भूमिका पर चुटकी ली थी। साथ ही उन्होने मीडिया की औकात बताते हुए इस ओर इशारा कर दिया था कि वे अपने वोटरों और कार्यकर्ताओं के बल पर सत्ता में आई हैं उन्हें मीडिया की कोई जरूत नहीं है। लेकिन पांच साल बाद हालात बदले नजर आ रहे हैं। मीडिया से दूर रहने वाली मायावती के लोगों ने जनसंदेश नामक यूपी आधारित न्यूज चैनल शुरू किया। इस चैनल के बारे में कहा जाता है कि इस पर माया सरकार के खिलाफ कोई खबर नहीं चलती। चैनल का लोगो भी पार्टी के झंडे के रंग का है। यानी दक्षिण भारतीय नेताओं की तरह माया मेमसाब ने भी एक चैनल खोलवा लिया। हालांकि इस चैनल पर मालिकाना हक उनका नहीं है लेकिन कहा जा रहा है कि इसको बीएसपी के एक नेता ही चलाते हैं। इतना ही नहीं लखनऊ से जनसंदेश टाइम्स नामक एक अखबार का भी प्रकाशन शुरू हो गया है। ये अखबार भी घोषित तौर पर पार्टी का नहीं है लेकिन कहा जाता है कि अखबार को पार्टी हितों का ध्यान रखते हुए ही शुरू करवाया गया है। यानी की साथ है इस बार के चुनाव में माया मेमसाब भी मीडिया का सहारा लेंगी। ऐसे में कई नए टीवी चैनलों के सामने भी राजनीतिक खबरों के साथ खेलने का अच्छा मौका है। अगर राजनीतिक विज्ञापनों की बात करें तो कांग्रेस जैसी पार्टी टीवी चैनलों के चुनाव के दौरान विज्ञापनों का अच्छा खासा पैकेज जारी करती है। बिहार और झारखंड के विधान सभा चुनावों के दौरान ऐसा खूब देखा गया। ये अलग बात है कि इन राज्यों में कांग्रेस सत्ता में नहीं आई। लेकिन चुनाव से पहले कुकरमुत्ते की तरह उगने वाले ये चैनल राजनैतिक पार्टियों के विज्ञापनों की ओर मुंह बाए हुए रहेंगे। इसके साथ ही अलग पार्टी के नेताओं के कंपेन को भी अपने ढंग से पेश करेंगे। हालांकि चुनाव की घोषणा हो जाने के बाद आचार संहिता का पालन करना पड़ता है। ये चुनावी आचार संहित चैनलों पर भी लागू होती है। लेकिन नेताओं के इंटरव्यू, नेता जी के साथ दिन भऱ दौरा, चुनाव के दौरान अलग अलग शहरों में लाइव पंचायत लगाकर ये चैनल वोटरों के बीच नेताजी की छवि को चमकाने की पूरी कोशिश करेंगे। वहीं जिन चैनलों के मालिकों के हित जिन पार्टियों से सधते हों उनके लिए अघोषित तौर पर काम करते नजर आएंगे। हालांकि यूपी में चुनाव से पहले इस बार सरकार के खिलाफ मुद्दे तो खूब हैं लेकिन देखना ये होगा कि ये चैनल असली मुद्दों को कितना जनता के बीच पेश करते हैं कि फिर राजनैतिक पार्टियों के प्रोपगांडा का हिस्सा बनकर रह जाते हैं।
-    ---  विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com

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Saturday, 26 March 2011

शैक्षिक चैनल - ब्लैक बोर्ड की जगह टीवी स्क्रीन ने ली


याद किजिए बचपन के गांव का स्कूल। स्कूल एक पेड़ के नीचे लगता है। क्योंकि स्कूल की अपनी कोई बिल्डिंग नहीं है। बरसात होने पर स्कूल में छुट्टी कर दी जाती है। स्कूल में लकड़ी का एक ब्लैकबोर्ड भी हुआ करता है जिस पर मास्टरजी कुछ लिखते हैं हालांकि वह बच्चों को ठीक से समझ में नहीं आता है। पर वे डर के मारे कुछ पूछ नहीं पाते। अब ब्लैकबोर्ड की वे सारी बातें टीवी पर कई शैक्षिक चैनल बच्चों को बेहतर ढंग से बता रहे हैं। यह नए दौर के छात्रों के लिए वरदान जैसा है। हांलाकि भारत का राष्ट्रीय प्रसारक दूरदर्शन इस मामले में कुछ पीछे जरूरत रहा लेकिन उसने में इंदिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय के साथ मिलकर ज्ञान दर्शन जैसा चैनल आरंभ कर दिया है।

हालांकि दूरदर्शन पर विश्वविद्यालय अनुदार आयोग यानी यूजीसी की ओर से शैक्षिक कार्यक्रमों का प्रसारण पहले से ही किया जा रहा था। लेकिन सही मायने में शैक्षिक चैनल की परिकल्पना तब साकार हुई जब डिस्कवरी चैनल का भारत में पदार्पण हुआ ।

 1985 में अमेरिका में प्रारंभ हुआ ये चैनल दुनिया भर में न सिर्फ स्कूली बच्चों का चहेता चैनल है बल्कि इसे भारी संख्या में बड़े बूढ़े लोग भी चाव से देखते हैं। भारत में अपनी मांग को देखते हुए डिस्कवरी ने हिंदी आडियो फीड और दूसरे क्षेत्रीय भाषाओं में भी अपनी सेवा आरंभ कर दी है।
1982 में जॉन हेनाड्रिक्स को ये ख्याल आया कि जिसमें कथा कहानी न दिखाकर वास्तविक घटनाओं पर खोजपूर्ण और ज्ञानवर्धक फीचर दिखाया जाए। उनकी ये कल्पना 1985 में मूर्त रूप ले सकी। डिस्कवरी अंतराष्ट्रीय स्तर पर तब चर्चा में आया जब 1989 में यूनाइटेड आर्टिस्ट प्रोग्रामिंग के तहत इंग्लैंड और स्केंडनेविया के दो लाख घरों में इसका प्रवेश हुआ। 1996 में इस चैनल का प्रसार दुनिया के 92 देशों में 8.90 करोड़ घरों तक हो गया था। अगस्त 1995 से ये चैनल भारत में भी देखा जा रहा है। डिस्कवरी चैनल ने तब एक और इतिहास रचा जब अमेरिकी दर्शकों के लिए उसने 66 घंटे का सीधा प्रसारण दिखाया।

आज डिस्कवरी वास्तविक घटनाओं पर फीचर प्रोग्राम दिखाने वाला दुनिया का प्रमुख चैनल है। इस चैनल पर प्रोग्राम बनाने के लिए दुनिया के श्रेष्ठ निर्माताओं और फिल्मकारों की सेवाएं ली जाती हैं। वाल्टर फ्रोंकाइटर,जेम्स वर्क, डेसमंड मोरिस, जॉन रोमर, ह्यूगो वान लेविक जैसे वैज्ञानिक, फिल्मकार और पत्रकारों ने डिस्कवरी को अपनी सेवाएं दी हैं। भारत की बात करें तो गौतम घोष और श्याम बेनेगल जैसे निर्माताओं ने डिस्कवरी के लिए कार्यक्रमों का निर्माण किया है। डिस्कवरी पर जेम्स वर्क का धारावाहिक ए जर्नी बियांड प्लेनेट अर्थ का निर्माण एक चुनौतीपूर्ण कार्य था जिसे काफी लोकप्रियता मिली। इतना ही नहीं डिस्कवरी तकनीकी तौर पर टीवी में कई नए प्रयोग किए हैं। अमेरिका मे देखे जा रहे 500 से ज्यादा चैनलों के बीच डिस्कवरी ने मॉनीटर योर च्वाएस टीवी की परिकल्पना विकसित की है। इसके तहत आप अपनी पसंद के कार्यक्रम को अपनी पसंद के समय के मुताबिक देख सकते हैं। यानी अब टीवी सेट खोलना एक किताब की दुकान पर जाने जैसा है जहां अपनी सुविधा के अनुसार आप अपनी पसंद की किताबें पढ़ सकते हैं।

सैकड़ों चैनलों के बीच डिस्कवरी ने एक मिसाल कायम की है। ये कोई अश्लील कार्यक्रम प्रसारित नहीं करता। यहां फिल्में या संगीत भी नहीं है। फिर भी इस चैनल के पास पर्याप्त विज्ञापन भी हैं और दर्शक भी हैं। डिस्कवरी की पेरेंट कंपनी डीसीआई का मुख्यालय बेथेस्डा संयुक्त राज्य अमेरिका में है। डिस्कवरी ने अपने कार्यक्रमों को पांच खंडों बांट रखा है। विज्ञान एवं तकनीक, प्रकृति ( पर्यावरण एवं वन्य जीवन), इतिहास, विश्व संस्कृति और मानवीय साहसिक कार्य। इन खंडों में हर उम्र और हर हर क्षेत्र से जुडे लोगों को लिए कार्यक्रम समाहित हो जाते हैं। यही कारण है कि स्कूल, कॉलेज के छात्रों, शोधकर्ताओं और वैज्ञानिकों के बीच ये चैनल लोकप्रिय है। भारत पर विशेष तौर पर केंद्रित डिस्कवरी ने इंडिया वीक का प्रसारण किया। बियोंड हिमालयाज के आगे कई और कार्यक्रम डिस्कवरी पर भारतीय परिपेक्ष्य में प्रसारित हुए हैं। ज्ञानवर्धक खबरें और रोचक फीचर प्रसारित करने के लिए डिस्कवरी को ढेर सारे अंतराष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं। चौबीस घंटे हिंदी में एक से बढ़कर एक फीचर देखकर लोग चकित हो जाते हैं ये डिस्कवरी की विशेषता है। डिस्कवरी ने अपने कार्यक्रमों की हिंदी में डबिंग शुरू की जो अच्छी हिंदी के भी मिसाल बन गए।

सिर्फ इतना ही नहीं डिस्कवरी ने अपने पहले चैनल की सफलता से उत्साहित होकर पूरी तरह वन्य जीवों पर केंद्रित दूसरे चैनल एनीमल प्लैनेट शुरू किया। पांच जनवरी 1999 से भारत में शुरू हुए इस चैनल में बीबीसी की भी 20 फीसदी हिस्सेदारी है। डीसीआई ने ये चैनल अमेरिका में 1996 में आरंभ किया था। इस चैनल पर मानवीय कौतूहल शांत करने के अलावा मानव जीवन और वन्य जीवों के बीच सुंदर तारतम्य बनाने की कोशिश की गई है। दुनिया के सभी बड़े चिडियाघरों और जंगलों की सैर ये चैनल घर बैठे ही कराता है। बाद में डिस्कवरी ने विज्ञान पर केंद्रित डिस्कवरी साइंस नामक एक और चैनल आरंभ किया है। वहीं ट्रैवल एंड लिविंग डिस्कवरी समूह का एक और चैनल है जिसमें आप दुनिया भर की सैर कर सकते हैं तथा दुनिया के अलग अलग हिस्सों के लोगों की जीवन शैली से वाकिफ हो सकते हैं। यानी डिस्कवरी का कुनबा बढ़ता ही जा रहा है। आज की तारीख में कोक और पेप्सी की तरह डिस्कवरी दुनिया भर में लोकप्रिय ब्रांड बन चुका है। अपने कार्यक्रमों को लोकप्रिय बनाने के लिए डिस्कवरी ने देश भर के स्कूलों में जाकर क्वीज प्रतियोगिताओं का आयोजन भी शुरू कर दिया है।

अब बात डिस्कवरी के प्रतिद्वंद्वी की। नेशनल ज्योग्राफिक डिस्कवरी का प्रमुख प्रतिस्पर्धी चैनल है। इस चैनल के पृष्ठभूमि में दुनिया भर में एक शताब्दी से डाक्यूमेंटेशन के मामले में जानी मानी नेशनल ज्योग्राफिक सोसाइटी है। नेशनल ज्योग्राफिक ने भी भारत में हिंदी आडियो फीड के साथ अपना प्रसारण शुरू किया है। डिस्कवरी की तुलना में इसे एक गंभीर चैनल माना जाता है। नेशनल ज्योग्राफिक ने भारतीय बच्चों के बीच अपने पांव जमाने के लिए लोकप्रिय स्कूलों में जाकर क्वीज प्रतियोगिताओँ का भी आयोजन किया है। वहीं दुनिया के कई देशों प्रसारित होने वाला हिस्ट्री चैनल भी मूल रूप से ज्ञानवर्धक चैनल है। स्टार समूह का ये चैनल आपको इतिहास के झरोखे में ले जाता है।
भारत में दूरदर्शन ने अपने मुख्य चैनल पर यूजीसी द्वारा बनाए शैक्षिक कार्यक्रमों के प्रसारण का सिलसिला आरंभ किया था। हालांकि ये प्रसारण अपने लक्षित श्रोता समूह के बीच ज्यादा लोकप्रिय नहीं हो सके। पर शैक्षिक टेलीविजन के रूप में दूरदर्शन का ये प्रयास मील का पत्थर साबित हुआ। अब दूरदर्शन ने इंदिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय के साथ मिलकर ज्ञान दर्शन नामक सेटेलाइट चैनल शुरू किया है। ये चैनल इग्नू के विभिन्न पाठ्यक्रमों में उत्तर अध्ययन कर रहे छात्रों के लिए काफी उपयोगी है। हालांकि इसको लोकप्रिय बनाने के लिए विशेष प्रयास की जरूरत है।
वहीं जी टीवी ने अपने शैक्षिक विंग जी एजुकेशन और जेड कैरियर एकेडमी को विस्तार देते हुए इसे एक स्वतंत्र चैनल का रूप दे दिया। जेड टीवी ने नाम से शुरू इस चैनल पर कंप्यूटर एजुकेशन प्रमुख हाईलाइट था। इसी तरह महर्षि महेश योगी द्वारा स्थापित महर्षि वैदिक विश्वविद्यालय ने एक सेटेलाइट चैनल आरंभ किया है। वैदिक विश्वविद्यालय के अध्ययन करने वाले तमाम लोग इस चैनल का लाभ उठा रहे हैं।
दुनिया भर में आनलाइन एजुकेशन की परिपाटी तो शुरू हो गई है लेकिन आने वाले दिनों में इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि दुनिया के कई बड़े विश्वविद्यालय भी अपना स्वतंत्र टीवी चैनल आरंभ करें।   
   


Thursday, 24 March 2011

पे चैनल - मतलब पैसा फेंको तमाशा देखो


गांव में आपना बाइस्कोप देखा होगा। बाइस्कोप वाले का एक गीत प्रसिद्ध है.- आई रे मैं आई बाइस्कोप वाली पैसा फेंको तमाशा देखो...पैसा नहीं है तो उधार देखो। टीवी पर तमाम सेटेलाइट चैलनों के आने के साथ ही पे चैलनों की परिकल्पना विकसित हो गई है। पे चैनल का मतलब है वैसा चैनल जिसे देखने के लिए उपभोक्ता को चैनल आपरेटर को प्रसारण शुल्क देना पड़ता है। पे चैनल प्रति उपभोक्ता चैनल के लिए पांच रूपये से 30 रूपये तक वसूलते हैं।

भारत में जब सिर्फ दूरदर्शन था तब टीवी देखने के लिए दर्शकों को कोई शुल्क नहीं देना पड़ता था। यानी टीवी चैनलों के सिग्लन फ्री में उपलब्ध थे। सेटेलाइट चैनलों ने भी आरंभ दर्शकों को फ्री में चैनल परोसे लेकिन जल्द ही देश में पे चैनल की परिकल्पना आ गई। यानी कोई टीवी चैनल अपनी कमाई के लिए सिर्फ चैनल पर दिखाई देने वाले विज्ञापनों पर ही नहीं बल्कि दर्शकों से वसूली जाने वाली फीस पर आश्रित है। हालांकि जब भारतीय बाजार में एक एक कर सेटेलाइट चैनलों का आगमन शुरू हुआ तब लोगों को पता नहीं था कि उनके टीवी स्क्रीन पर दिखाई देने वाले चैनल धीरे धीरे उनसे हर चैनल का शुल्क वसूलेंगे। लेकिन सेटेलाइट चैनलों का दर्शक वर्ग बढ़ने के साथ पे चैनलों की फेहरिस्त में भी इजाफा होने लगा।

केबल टीवी पर आने वाले चैनलों में स्टार मूवीज और जी सिनेमा प्रारंभ से ही पे चैनल हैं। दर्शकों में फिल्मों के डिमांड के कारण ये चैनल शुरू से ही पे चैलन थे। केबल टीवी उपभोक्ता को हर महीने अपने केबल आपरेटर को मासिक शुल्क देना पड़ता है। पे चैनलों के आने के बाद केबल आपरेटरों ने केबल की मासिक फीस में भी इजाफा करना शुरू कर दिया। शुरूआती दौर में केबल आपरेटर उपभोक्ताओँ से 50 से 100 रुपये प्रतिमाह की दर से केबल का शुल्क वसूलते थे लेकिन जैसे जैसे पे चैलनों की संख्या बढने लगी केबल आपरेटरों ने मासिक शुल्क में भी इजाफा शुरू कर दिया। भारत में जब इएसपीएन जैसा खेल चैनल आया तो शुरूआत में उसकी फीस तीन रूपये महीने थी लेकिन एक साल बाद ही उसने अपना शुल्क बढाकर 5.70 रूपये प्रतिमाह कर दिया। दर्शकों में खेल चैनलों कि मांग ज्यादा है इसलिए धीरे धीरे बाजार में कई खेल चैनल आए और बाजार की मांग के अनुसार उन्होंने मनमाना प्रसारण शुल्क तय किया। आजकल स्टार स्पोर्ट्स, नियो क्रिकेट, नियो स्पोर्ट्स, स्टार क्रिकेट, टेन स्पोर्ट्स जैसे सभी चैनल पे चैनल हैं। 

पे चैनलों के बढ़ने शुल्क के कारण केबल आपरेटरों और ब्राडकास्टरों में अक्सर लड़ाई और विवाद देखने में आता है। अपनी मांग बढ़ने के बाद ब्राडकास्टर न सिर्फ पे चैनलों की कीमतों में मनमाने ढंग से इजाफा कर देते हैं बल्कि वे केबल आपरेटरों से उपभोक्ताओं की मिनिमम संख्या की गारंटी भी मांगते हैं। जैसे कोई पे चैनल केबल आपरेटर को अपना पे चैनल तभी देता है जब वह उसे कमसे 1800 ऊपभोक्ताओँ का मासिक शुल्क जमा कराए।

पे चैनल बनना मजबूरी बाजार में आने वाला हर चैनल सिर्फ विज्ञापनों के भरोसे ही बाजार में टीके नहीं रहना चाहता है। वह कालांतर में उपभोक्ताओँ से वसूली करना चाहता है। कहते हैं भारत में जब पहली बार चाय की खेती शुरू की गई तो अंग्रेज हाथी पर गली गली में घूम कर लोगों को मुफ्त में चाय पीलाते थे जब लोगों को चाय का स्वाद अच्छी तरह लग गया तो लोग चाय खरीदकर पीने लगे। टीवी चैनलों के साथ भी कुछ इसी तरह का मामला है पहले तो आपको एडीक्ट बनाया जा रहा है। जब आपको किसी चैनल को देखने की आदत पड़ जाएगी तो आप उसके लिए शुल्क देने को भी मजबूर हो जाएगें।

इएसपीएन ने भारतीय क्षेत्र के प्रबंध निदेशक रहे आरके सिंह बताते हैं कि खेलों का लाइव प्रसारण इतना महंगा है कि सिर्फ विज्ञापनें के भरोसे खेल चैनल दर्शकों को मुफ्त में नहीं परोसे जा सकते हैं। इसके लिए उपभोक्ताओं को भी अपनी जेब ढीली करनी पड़ेगी। इसलिए दर्शकों को साझीदार बनाना हमारी मजबूरी है और समय की मांग भी। पे चैनलों की परिकल्पना भारत के लिए नई जरूर है लेकिन विदेशों में इसका चलन पहले से चला आ रहा है। वहीं पे चैलनों के पक्ष में तर्क देने वालों का ये भी कहना है कि अगर दर्शक सिनेमाघर में जाकर एक फिल्म के लिए 50 से 150 रूपये के टिकट खरीद सकता है तो टीवी पर फिल्में देखने के लिए पैसे क्यों नहीं दे सकता।

केबल पर फिलहाल दर्शकों को चैनल तीन तरह के मोड में उपलब्ध हैं। पहला फ्री टू एयर चैनल। फ्री टू एयर चैनल की डाउनलिंक फ्रीक्वेंसी मालूम होने पर आप अपने डिश एंटेना को उस एंगिल पर सेट कर उसका सिग्नल प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन दूसरा स्टेज है फ्री टू एयर बट इंक्प्टेड सिग्नल। इंक्रप्टेड सिग्नल वाले चैनलों को सिग्नल को डिजिटल मोड में लाकर इन्क्रप्ट कर दिया गया है। यानी ऐसे चैलनों को देखने के लिए केबल आपरटेर को कंपनी की ओर से एक सेट टॉप बाक्स प्राप्त करना पड़ता है जिसके बाद उसके सिग्लन को उपभोक्ताओं तक पहुंचाया जा सकता है। इनक्रप्टेड सिग्लन वाले चैनल पे चैलन की पहली सीढ़ी है। पे चैनलों के डिकोडर को जहां ब्राडकास्टरों से शुल्क देकर खरीदना पड़ता है वहीं तय मासिक शुल्क का भी भुगतान करना पड़ता है। जब भारत में डिस्कवरी चैनल आया तो वह फ्री टू एयर मोड में था लेकिन एक साल बाद ही उसने अपने चैनलों को इन्क्प्ट कर डिजिटल मोड पर कर दिया। उसके कुछ समय बाद डिस्कवरी भी पे चैनल हो गया। आज की तारीख में अधिकांश चैनल डिजिटल मोड पर ही उपलब्ध हैं। क्योंकि सारे चैनल कभी न कभी दर्शकों के बीच जरूरत बनकर पे चैनल के प्लेटफार्म पर जाने की तमन्ना रखते हैं।

क्या है कैस- कैस यानी केबल एड्रेसब्लिटी सिस्टम। पे चैनलें की बढ़ती संख्या के कारण भारतीय बाजार में केबल एड्रेसब्लिटी सिस्टम लाने पर विचार हुआ। कैस एक ऐसा उपकरण था जिसके तहत उपभोक्ता अपनी पसंद के चैनलों को चुनने का विकल्प मिलता है। यानी पे चैनलों में जो चैनल आपको पसंद है सिर्फ उन्ही चैनलों आप टीवी पर देखने के लिए चुन सकते हैं। इससे आपको उन चैनलें के लिए केबल आपरेटर को हर महीने शुल्क नहीं देना पड़ेगा जिन्हें आप देखना नहीं चाहते हैं। कई सालों की कवायद के बाद दिल्ली मुंबई के कुछ इलाको में कैस लागू कर दिया गया। लेकिन इसके लिए सेट टाप बाक्स उपभोक्ता को अपनी राशि खर्च कर लगानी पड़ती थी। उतने ही खर्च पर बाजार में डीटीएच की उपलब्धता ने कैस की लोकप्रियता को खत्म कर दिया। लिहाजा कैस बुलबुला जल्द ही फूट गया।

भारतीय बाजार में एक एक कर आए सभी विदेशी चैनल धीरे धीरे पे चैनल में बदल गए। कभी फ्री टू एयर रहा सोनी समूह के सभी चैनल पे चैनल हैं तो स्टार समूह के सारे चैनल भी पे चैनल में बदल चुके हैं। लेकिन भारतीय बाजार में उपलब्ध 500 से ज्यादा चैनलों में बड़ी संख्या में ऐसे भी चैनल हैं जो अभी भी दर्शकों को फ्री में उपलब्ध हैं। चैनलों की बढ़ती संख्या के बीच नए नए चैनलों के सामने दर्शकों की बीच पहचान बनाने का संकट है इसलिए हर नया चैनल अक्सर फ्री टू एयर मोड में ही आता है।

टीवी के दर्शकों के बीच खेल और मूवी चैनल ज्यादा लोकप्रिय हैं इसलिए वे पे चैनल के रूप में गाढ़ी कमाई कर रहे हैं तो बच्चों के कार्टून चैनल और महिलाओं के लिए लंबे धारावाहिक लेकर आने वाले मनोरंजन चैनल भी पे चैनल के रूप में दर्शकों से वसूली कर अपनी झोली भर रहे हैं। बच्चों के सभी कार्टून चैनल पे चैनल मोड पर हैं क्योंकि उनकी डिमांड ज्यादा है। कुछ ऐसा ही हाल खेल चैनलों के साथ भी है। जाहिर सी बात है पे चैनलों के कारण ही केबल टीवी की मासिक शुल्क बढ़कर 300 से 400 रूपये प्रतिमाह तक पहुंच गया है। लेकिन पे चैलनों के इस खेल में कई चैनलों को मुंह की भी खानी पड़ी है दर्शकों में ज्यादा मांग नहीं होने पर कई पे चैनलों को फिर से फ्री टू एयर मोड पर वापस आना पड़ा है। जाहिर की चैलनों की इतनी बड़ी भीड़ में बहुत कम ही चैनल ऐसे हो सकते हैं जो दर्शकों की डिमांड में बने रहें। देश के केबल आपरेटरों को प्रमुख संगठन आल इंडिया आविष्कार डिश एंटेना संघ के अध्यक्ष डाक्टर एके रस्तोगी कहते हैं कि तमाम बड़े ब्राडकास्टर पे चैनल बनना चाहते हैं कि लेकिन दर्शकों में चैनल की डिमांड नहीं बन पाने पर मजबूरन उन्हे फ्री टू एयर चैनल के रूप में वापस आना होगा। अगर किसी चैनल के चलाने के अर्थशास्त्र की बात करें तो म्यूजिक चैनल या धार्मिक चैनल चलाना सबसे सस्ता सौदा है। धार्मिक चैनल में धर्मगुरूओं का प्रवचन फ्री में मिलता है साथ उनके अनुयायी दर्शक के रूप में मिलते हैं। इसलिए ज्यादातर धार्मिक चैनल फ्री टू एयर हैं। वहीं म्यूजिक चैनल पर दिखाए जाने वाले बहुत सारे नई फिल्मों के गाने प्रमोशनल होते हैं इसलिए उसका भी खर्च कम आता है लेकिन एक समाचार चैनल, मूवी चैनल की लागात बढ़ जाती है। खबरें जुटाना और बनाना खर्चीली प्रक्रिया है तो मूवी चैनलों को फिल्मों के सेटेलाइट अधिकार खरीदने पड़ते हैं। ऐसे में बाजार में बने रहने के लिए ब्राडकास्टर कई तरीके से कमाई चाहते हैं।  
 - विद्युत प्रकाश मौर्य

Tuesday, 22 March 2011

टीवी पर क्राइम शो - जुर्म की इंतिहा


एक समय आया था जब समाचार चैनलों पर प्राइम टाइम में सिर्फ अपराध पर आधारित शो ही दिखाई देते थे। हालांकि अब जुर्म का ज्वार कम हो चुका है। लेकिन खबरिया चैनल अब भी क्राइम की खबरों को बिकाउ माल मानते हैं बिना इसका ख्याल रखे हुए कि इसका समाज पर कैसा प्रभाव पड़ेगा। आजतक पर जुर्म, स्टार न्यूज पर सनसनी, रेड अलर्ट, इंसाफ का तराजू, एनडीटीवी पर डायल 100, जी न्यूज पर क्राइम रिपोर्टर, आईबीएन 7 पर क्रिमिनल, ईटीवी पर दास्ताने जुर्म। एक वक्त ऐसा आया था कि अगर आप रात 10 से 11 बजे तक जिस किसी समाचार चैनल को पर जाएं आपको क्राइम बुलेटिन ही देखने को मिलता था।
अब एक नजर डालते हैं भारतीय टेलीविजन में अपराध पर आधारित शो के शुरूआत पर। इसका श्रेय निश्चय ही सुहैब अहमद इलियासी को जाता है जो जीटीवी पर सबसे पहले इंडियाज मोस्ट वांटेड जैसा शो लेकर आए। जामिया मीलिया इस्लामिया के स्नातक सुहैब अहमद इलियासी को भारतीय टीपी पर क्राइम शो बनाने की प्रेरणा लंदन के चैनल फोर पर दिखाए जाने वाले एक शो से मिली थी। तब भारत में 24 घंटे का कोई समाचार चैनल नहीं आया था लेकिन 1997 में ये शो टेलीविजन पर काफी लोकप्रिय हुआ। इंडियाज मोस्ट वांटेड के हर एपीसोड में किसी एक मोस्ट वांटेड अपराधी पर केंद्रित स्टोरी की जाती थी। इसके पीछे व्यापक रिसर्च होता था। अपराधी की असली तस्वीर के साथ उसकी अपराध की कहानी को महिमामंडित करके दिखाया जाता था। जीटीवी का ये शो काफी लोकप्रिय हुआ। इसकी लोकप्रियता और बढ़ गई जब इंडियाज मोस्ट वांटेड के कारण कई बड़े अपराधी पकड़ लिए गए। बाद में यही धारावाहिक फ्यूजिटिव मोस्ट वांटेड के नाम से दूरदर्शन पर भी प्रसारित हुआ। इलिसासी इसी शो को कुछ सालों बाद इंडिया टीवी पर भी लेकर गए।
जब भारतीय बाजार में कई समाचार चैनल आ गए तो लगभग हर चैनल अपने शाम के टाइम बैंड में कोई न कोई क्राइम शो लेकर आने लगा। जी न्यूज का क्राइम रिपोर्टर बहुत लोकप्रिय हुआ लेकिन उसकी टैगलाइन लोगों को खबरदार करती थी- चैन से सोना है तो जाग जाइए...ये शो काफी हद तक बच्चों के लिए डरावना था। क्राइम की हर कहानी को बाजार के चालू मुहावरे, बिल्कुल नाटकीय और फिल्मी स्क्रिप्टिंग, मामूली से अपराध कथा को भी चासनी लगाकर कहने की कला से ये सब कुछ टीवी पर पेश किया जाने लगा। अगर क्राइम से जुड़ी घटना के पर्याप्त विजुअल नहीं हों तो हर कहानी का नाट्य रूपांतरण होने लगा। स्टार न्यूज पर आने वाले शो सनसनी का टैगलाइन था- सन्नाटे को चिरती हुई सन्न कर देगी सनसनी। यानी हर ओर ऐसे शो थे जो आपके रातों की नींद को हराम कर दें। आप इतना जाग जाएं कि आपको रातों को ठीक से नींद न आए। इन कार्यक्रमों को देखकर कई बार बच्चों के मन में डर भर जाता है तो बड़ों के मन में भी घृणा और जुगुप्सा का भाव आता है। इन अपराध शो बनाने वालों के लिए हर घटना एक मसाला की तरह होती है जिसपर त्वरित गति से ये छोटी सी मर्डर मिस्ट्री वाली फिल्म बनाने की कोशिश करते हैं। ऐसे शो में हॉरर म्यूजिक, अपराध कथा वाली फिल्मों के फुटेज आदि का सहारा लेकर भी कहानी को पूरा सनसनीखेज बनाने की कोशिश की जाती है।
हिंदी फिल्मो में हॉरर मूवी जैसा कथानक लेकर आते हैं ये क्राइम शो। कई बार ये किसी जमाने की लोकप्रिय पत्रिकाएं मनोहर कहानियां और सत्यकथा की कमी को भरते भी नजर आते हैं। समाचार चैनल आईबीएन 7 ने तो अपने क्राइम शो क्रिमिनल में एक बार बड़ा भोड़ा प्रयोग किया। इस शो की एंकरिंग एक महिला से कराया जाने लगा। ये महिला पुराने फिल्मों की वैंप को कॉपी करती हुई अपराध कथा को सुनाती थी। हालांकि इस शो की इतनी आलोचना हुई कि महिला एंकर को क्राइम शो से हटाना पड़ा। कुछ समय बाद आईबीएन 7 ने अपने क्राइम शो क्रिमिनल को भी बंद करने की फैसला लिया। ये चैनल का समाज के हित में एक बुद्धिमतापूर्ण फैसला कहा जा सकता है। एक समय में तमाम समाचार चैनलों के बीच अपराध कथा को महिमामंडित करके दिखाने की होड़ सी लग गई थी। जी न्यूज के क्राइम से शो एंकर राघवेंद्र मुदगिल तो अभिनय की पृष्ठभूमि से आते थे। वे अपनी एंकरिंग में अपने अभिनेता होने की छाप छोड़ने की पूरी कोशिश करते थे।
वहीं इंडिया टीवी ने अपने क्राइम शो नया कलेवर दिया। एसीपी अर्जुन। इस शो में एंकर एक एसीपी की वर्दी में आता है और अपराध की सारी घटनाओं को एक एक कर सुनाता है। न्यूज चैनलों के सभी क्राइम शो ये बताने की कोशिश करते हैं कि उनका मकसद अपराध को समाज से खत्म करना है। लेकिन कई बार ऐसा लगता है कि इन शो में विस्तार से बताए गए अपराध के तौर तरीकों से नए अपराधी और प्रेरणा लेते हैं और बजाए अपराध घटने की बढ़ता जाता है। जैसे आपको याद होगा कि शोले फिल्म देखने के बाद बड़ी संख्या में कई अपराधियों ने ये स्वीकार किया था कि उन्हें अपराध करने की प्रेरणा शोले फिल्म को देखकर मिली। जाहिर सी बात की न्यूज चैनलों पर कोई ऐसा शो बाद में नहीं आया जो इंडियाज मोस्ट वांटेड की तरह अपराधियों को पकड़वाने में पुलिस की मदद कर सके। लेकिन एक वक्त ऐसा जरूर आया जब अपराध पर आधारित शो की टीआरपी गिरने लगी। इसके बाद एक एक करके प्राइम टाइम से अपराध के ये शो गायब होने लगे। हालांकि अभी भी तमाम चैनल क्राइम शो बना रहे हैं लेकिन अपराध पहले जैसा बिकाउ माल नहीं रह गया है।
सोनी टीवी पर लंबे समय से अपराध पर आधारित एक शो सीआईडी का प्रसारण हो रहा है। इस शो में भी किसी सच्ची घटना को आधार बनाया जाता है। लेकिन सीआईडी की टीम हर वारदात की छानबीन करती है। कई सालों से चलने वाले इस शो ने भारतीय टेलीविजन के इतिहास में लोकप्रियता के झंडे गाड़े हैं। 


Sunday, 20 March 2011

छोटे परदे पर मध्यम वर्ग


क्योंकि सास भी कभी बहु थीजैसे तमाम धारावाहिकों में उच्चवर्गीय परिवारों का ग्लैमर और उनके अहंकारों की टकराहट दिखाकर टीवी ने बड़ी संख्या में भले ही दर्शक बटोर लिए हों पर उसमें भारत का मध्यम वर्ग कहीं भी अपनी छवि नहीं देख पा रहा था। पर टीवी पर एक बार फिर से उस मध्यम वर्ग की वापसी होने लगी है। स्टार वन के दो धारावाहिक इंडिया कालिंग और ये दिल चाहे मोर जैसे धारावाहिक एक बार फिर लेकर आए हैं मध्यम वर्ग को। इंडिया कालिंग की चांदनी उसी मध्यम वर्ग की प्रतिनिधि है। चांदनी परिस्थितिवश जालंधर से मुंबई जाती है। वहां वह काल सेंटर में काम करती है। वह भले ही आधुनिक वातावरण में काम करती हैफराटे के साथ अंग्रेजी बोलना जानती हैपर वह अपने परंपरागत संस्कारों को भी नहीं भूली है। वह आगे बढ़ने के अपनी पुरानी रिवायतों को नहीं भूलना चाहती है। उसे हर रोज अपना जालंधर याद आता है। वह मुंबई में अपने बी जी बनाई सरसों की साग अपने साथिनों को भेंट करती है। वह काल सेंटर में भी पटियालवी सलवार सूट पहनती है। पर साथ ही अपनी सहकर्मी से कोंकणी सीखने की भी कोशिश करती है। दरअसल बहुत दिनों बाद टीवी पर एक अच्छा धारावाहिक देखने को मिला है जिसमें परंपरागत भारतीय मूल्यों की खुशबू है। कई साल पहले हम जाएं तो दूरदर्शन पर बुनियाद और हमलोग जैसे धारावाहिकों ने धूम मचाई थी। इन धारावाहिकों में भारतीय मूल्यों की बात रिफ्लेक्ट होती थी। बुनियाद का मास्टर हवेलीराम ऐसा चरित्र था जो अपने नैतिक मूल्यों की रक्षा की कोशिश में लगा हुआ था। उस चरित्र ने टीवी के तत्कालीन दर्शकों में अच्छी छाप छोड़ी। उसके बाद टीवी धारावाहिको में मुंबई के फिल्मों के अनुकरण की होड़ सी लग गई। कई धारावाहिकों ने कास्ट्यूमसेटों की भव्यता में तो फिल्मों को भी पीछे छोड़ दिया। एकता कपूर ने जिस तरह के धारावाहिकों का ट्रेंड शुरू किया उनमें से अधिकांश में मध्यम वर्ग गायब था। अगर कोई मध्यम वर्ग का चरित्र आ भी गया तो वह उच्च वर्ग के लोगों के बीच जाकर उनके साथ संवाद स्थापित करने में ही व्यस्त हो जाता था। सोनी के धारावाहिक कुसुम को आम लड़की की कहानी कह कर प्रचारित किया गया था पर कुसुम की कहानी भी बाद में भटक कर रह गई। अब स्टार वन ने दो ऐसे धारावाहिक आरंभ किए हैं जिसके चरित्र भी हालांकि मुंबई भागते हैं। पर वहां मध्यम वर्ग मौजूद रहता है।
इंडिया कालिंग के बहाने जहां पंजाबी सभ्यता और संस्कृति को बड़ी मजबूती से इंट्रोड्यूस किया गया वहीं इसमें काल सेंटर का भी कल्चर है। किसी काल सेंटर के वातावरण पर बना यह पहला धारावाहिक है। इसमे काल सेंटर के अंदर के वातावरण को गंभीर लहजे में पेश किया जा रहा है। कहा नहीं जा सकता कि आने वाले दिनों में यह धारावाहिक क्या रुप लेगा पर फिलहाल टीवी पर ऐसे धारावाहिक की जरूरत महसूस की जा रही थी। वहीं स्टार वन के दूसरे धारावाहिक में एक लड़का और एक लड़की मुंबई भागते हैं दोनों की संयोगवश मुलाकात हो जाती है। उसके बाद कहानी में नाटकीय सिचुएशन बनते हैं। भारत में सपने लेकर मुंबई भागने का सिलसिला बहुत ही पुराना है। यही ट्रेंड इस धारावाहिक में नाटकीय ढंग से आरंभ हुए हैं। टीवी दर्शकों में सबसे बड़ा वर्ग मध्यम वर्ग ही है। पर टीवी के तमाम चैनलों के बीच इस तरह के धारावाहिकों का अभाव सा है जिसमें आम आदमी अपना शहर और अपना चेहरा कहीं देख सके। इसी कमी को ये धारावाहिक कहीं न कहीं पूरा करते हुए नजर आ रहे हैं।


Friday, 18 March 2011

भारतीय बाजार में विदेशी चैनल


जीटीवी के आने के पहले तक भारतीय बाजार में दूरदर्शन का एकाधिकार था। जीटीवी के आने के साथ ही सेटेलाइट चैनलों का दौर शुरू हुआ, और इसके साथ ही शुरू हुआ केबल टीवी का युग क्योंकि शुरूआती दौर में लोगों के घरों तक पहुंच का माध्यम सिर्फ केबल नेटवर्क ही था। भारत में केबल टीवी के युग की शुरूआत के साथ ही धीरे धीरे भारतीय बाजार में विदेशी चैनलों पहुंचने लगे। यानी भारत में शुरू हुआ सूचना सम्राज्यवाद का नया दौर। विदेशी चैनलों की नजर भारत की बड़ी आबादी पर है जो न सिर्फ उनके लिए बड़ा दर्शकों का बाजार है बल्कि विज्ञापनों का भी बड़ा बाजार है। शुरूआती दौर में देश में सबसे ज्यादा दर्शकों तक पहुंच सिर्फ दूरदर्शन की ही थी इसलिए विदेशी चैनल का विज्ञापन बाजार भी सीमित था, लेकिन जैसे जैसे इन विदेशी चैनलों की ज्यादा घरों में पहुंच बढ़ती जा रही है ये भारत के कुल विज्ञापन बाजार में अपनी हिस्सेदारी भी बढ़ाते जा रहे हैं।
भारतीय बाजार में घुसपैठ बनाने वाला सबसे पहला विदेशी चैनल स्टार समूह है। रूपर्ट मर्डोक ने स्टार बैनर तले नए चैलनों की शुरूआत ही खास तौर पर एशियाई देशों के लिए की थी। स्टार यानी सेटेलाइट टेलीविजन फॉर एशियन रीजन (STAR)। रूपर्ट मर्डोक विश्व के मीडिया बाजार में सबसे अग्रणी लोगों में गिने जाते हैं। वे विश्व के कई बड़े अखबारों और टीवी चैनलों के मालिक हैं। उनके बेटे जेम्स मर्डोक ने उनकी बिजनेश को और नया आयाम प्रदान किया है। ट्वेंटिएथ सेंटुर फॉक्स जैसी फिल्म निर्माण कंपनी और फॉक्स टीवी जैसे कई कंपनियों के मालिक रूपर्ट मर्डोक का मुकाबला दुनिया की दूसरी बड़ी मीडिया कंपनी सीएनएन समूह के मालिक ट्रेड टर्नर के टर्नर नेटवर्क से है। भारत में स्टार टीवी का आगमन जीटीवी समूह में हिस्सेदारी के साथ हुआ। लेकिन कुछ ही सालों में स्टार समूह को भारत में दर्शकों का बड़ा बाजार नजर आया। ऐसे में स्टार की पहली कोशिश जीटीवी की पूरी हिस्सेदारी खरीदने की रही। जैसा कि वे दुनिया के कई देशों में करते आए थे। स्टार समूह के विस्तार करने का तरीका ही कुछ ऐसा रहा है। जैसे बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है ठीक उसी तर्ज पर ये तमाम चलते हुए टीवी चैनल और समाचार पत्रों में हिस्सेदारी खरीदते हैं बाद में उस पर मालिकाना हक कायम करने पर हिस्सेदारी खरीदते हैं। लेकिन भारत में जीटी मालिकाना हक जमाने की कोशिश असफल हो जाने के बाद स्टार समूह ने भारतीय बाजार में आने का फैसला लिया। सबसे पहले भारत में आया स्टार प्लस चैनल। स्टार प्लस मनोरंजन चैनल था। जिस पर शुरूआती दौर में बोल्ड एंड द ब्यूटी फुल और सांताबारबरा जैसे धारावाहिक दिखाए जाते थे। इसके बाद आए स्टार मूवीज, स्टार वर्ल्ड, स्टार स्पोर्ट्स। बीबीसी वर्ल्ड और ईएसपीएन चैनल का भारत में वितरण अधिकार स्टार समूह के पास था।
लेकिन स्टार प्लस चैलन पर विदेशी धारावाहिकों को डब करके हिंदी में दिखाने या फिर उनके मूल रूप से अंग्रेजी में प्रसारित किए जाने पर देश के बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंचना संभव नहीं था। इसलिए स्टार प्लस ने अपने चैनल पर लोकल प्रोग्रामिंग को बढावा दिया। यानी स्टार प्लस पर शुरू हुआ भारत में बने हिंदी धारावाहिकों का दौर। इसके साथ ही स्टार समूह ने अपने चैनल पर सुबह में गुड मार्निंग इंडिया तो शाम को खबरों का शो आरंभ किया। स्टार प्लस को खबरें और न्यूज बेस्ड शो बनाने काम भारत में एनडीटीवी जैसी कंपनी करती थी। लेकिन बाद में स्टार समूह ने भारत में हिंदी में अलग से समाचार चैनल स्टार न्यूज आरंभ किया। लेकिन भारत सरकार के कानून के तहत समाचार चैनल या समाचार पत्र में कोई विदेशी कंपनी 26 फीसदी से ज्यादा निवेश नहीं कर सकती। इसलिए स्टार समूह को अपने स्टार न्यूज चैनल के अलग से कंपनी बनानी पड़ी और इस कंपनी में उसकी भारतीय हिस्सेदार आनंद बाजार पत्रिका समूह बनी। आनंद बाजार पत्रिका समूह इसी नाम से बांग्ला अखबार और अंग्रेजी के प्रतिष्ठित दैनिक टेलीग्राफ की मालिक है।
अब नजर डालते हैं स्टार समूह के दूसरे चैनलों पर मनोरंजन चैनलें की लोकप्रियता को देखते हुए स्टार ने स्टार वन नाम से एक और चैनल लांच किया। पुरानी फिल्मों के लिए स्टार का चैनल स्टार गोल्ड दर्शकों के सामने आया। स्टार समूह का दूसरा ब्रांड नाम स्काई भी है। स्काई नाम से स्टार की डीटीएच सेवा है। भारत में स्टार की डीटीएच सेवा टाटा समूह के साथ संयुक्त उपक्रम में टाटा स्काई नाम से है। अब स्टार समूह भारतीय दर्शकों के रीजनल बाजार में भी पहुंच गया है। मराठी में स्टार माझा, स्टार प्रवाह, तो बांग्ला में स्टार आनंद, दक्षिण भारत में स्टार विजय जैसे चैनल इसकी छतरी के नीचे हैं। भारत में फॉक्स टीवी और हिस्ट्री चैनल भी स्टार समूह के अंतर्गत है। इसके अलावा स्टार समूह दर्जनों दूसरे चैनलों का भारतीय बाजार में वितरण का भी काम देखती है। वितरण की दृष्टि से कई बार चैनल एक प्लेटफार्म से शिफ्ट कर दूसरे प्लेटफार्म भी चले जाते हैं।
अगर संगीत चैनलों की बात करें तो भारतीय बाजार में आने वाले दो प्रमुख चैनल एमटीवी और चैनल वी रहे। इन चैनलों ने भारतीय दर्शकों पर काफी गहराई से प्रभाव डाला। एमटीवी यानी म्यूजिक टेलीविजन का लक्षित दर्शक समूह 15 से 24 साल का युवा वर्ग है। चौबीस घंटे चलने वाले इस चैनल ने अपने एंकर और वीजे ( वीडियो जॉकी ) को सेक्सी और हॉटेस्ट इन द सिटी कह कर दर्शकों के सामने परोसा। जनवरी 1996 में भारतीय बाजार में आए एमटीवी पर देश की युवा पीढ़ी को गुमराह करने का आरोप भी बुद्धिजिवियों ने लगाया। लेकिन इसके साथ ही एमटीवी कल्चर की शुरूआत देश में हुई जिसका प्रभाव बॉलीवुड की फिल्मों पर भी देखने को मिलने लगा। हालांकि एमटीवी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी टॉम फ्रोस्टर का दावा है कि एमटीवी पर संगीतमय कार्यक्रम दिखाकर हम युवाओं को सेक्स और हिंसा से दूर ले जा रहे हैं। बाद में एमटीवी ने धीरे धीरे भारतीय बाजार के लिए भारतीय एंकरें और वीजे का चयन करना शुरू कर दिया। एमटीवी के प्रमुख प्रतिस्पर्धी चैनल म्यूजिक एशिया और चैनल वी हैं।
सोनी एंटरटेनमेंट ने पूरी तैयारी के साथ अगस्त 1995 में भारतीय बाजार में कदम रखा। आने वाले दो सालों में सोनी ने भारतीय बाजार में दर्शकों के बीच अच्छी जगह बना ली। सोनी के जर्मनी, आस्ट्रेलिया और दुनिया के अलग अलग देशों  में अलग नामों से चैनल चल रहे हैं। लेकिन भारत में सोनी समूह का आगमन विशुद्ध भारतीय तानेबाने में हुआ। इसके सारे कार्यक्रम हिंदी में थे। अगर कोई विदेशी धारावाहिक था तो वह हिंदी में डब था। नया लुक नया बुक मुहावरे के साथ सोनी ने आई ड्रिम आफ जिमी नामक लोकप्रिय कामेडी शो को हिंदी में डब करके पेश किया। इसके साथ ही बुगी वुगी, बिंदास बोल, ताक धिनाधिन जैसे शुरूआती कार्यक्रम सोनी पर खासे लोकप्रिय हुए। सोनी ने अपने हर कार्यक्रम को प्रोडक्ट की तरह लांच करने की नीति अपनाई। इसके साथ ही भारत में दिखाई जाने वाली मनोरंजक घटनाओं की भी मार्केटिंग सोनी ने की। जल्द ही सोनी जीटीवी के बाद देश का दूसरा लोकप्रिय मनोरंजक चैलन बन गया। एक समय आया जब सोनी अपने कार्य़क्रमों की बदलौत नंबर वन मनोरंजन चैलन बन गया जिसे कई सालों बाद स्टार प्लस ने नंबर वन की कुरसी से हटाया। सोनी समूह सोनी के अलावा सेटमैक्स मूवी चैनल, एएक्सएन अंग्रेजी मूवी चैनल का प्रसारण भारत में करता है। वहीं उसने श्री अधिकारी ब्रदर्स के लोकप्रिय चैनल सब टीवी को 2004 में खरीद लिया।
भारत में दिखाई देने वाला दूसरा प्रमुख समूह टर्नर नेटवर्क है। इसका न्यूज चैनल सीएनएन यानी केबल न्यूज नेटवर्क की शुरूआत खाड़ी युद्ध के दौरान हुई थी। सीएनएन की ख्याति पूरी दुनिया में दिन रात न्यूज दिखाने के कारण हुई थी। ये शुरूआती दौर से ही पे चैलन है। भारत में बाद में इसने आईबीएन समूह से समझौता कर सीएनएन आईबीएन नामक न्यूज चैनल शुरू किया। टर्नर समूह के दूसरे चैनल बच्चों के लिए कार्टून नेटवर्क है। शुरूआत में टीएनटी मूवीज और कार्टून नेटवर्क एक ही चैनल पर भारत में आए थे। यानी 12 घंटे मूवीज और 12 घंटे कार्टून बाद में ये दोनों स्वतंत्र चैनल बन गए। टीएनटी मूवीज पर हॉलीवुड की क्लासिक मूवीज का प्रसारण होता है।
एनबीसी एशिया और सीएनबीसी भारत में शुरूआत से ही पे चैनल के रूप में आए। एनबीसी को भारत में खासी लोकप्रियता नहीं मिल सकी, लेकिन सीएनबीसी ने बिजनेस चैनल के रूप में अच्छी लोकप्रियता हासिल की। अब सीएनबीसी का सीएनबीसी आवाज नामक हिंदी चैनल भी है। वहीं एनबीसी विश्व में बहुत लोकप्रिय चैनल है। इस चैनल पर प्रसारित होने वाला कार्यक्रम टू नाइट शो विद जॉय लिनो दुनिया भर में लोकप्रिय शो है। डेटलाइन एनबीसी, ओ लाला जैसे कार्यक्रम भी एनबीसी पर लोकप्रिय हैं। एनबीसी यानी नेशनल ब्राडकास्टिंग कंपनी दुनिया की जानी मानी कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक की पेशकश है।
डिस्कवरी उन विदेशी चैनलों में है जो भारतीय दर्शकों में तेजी से लोकप्रिय हुआ। डिस्कवरी समूह के भारत में डिस्कवरी, एनीमल प्लेनेट, ट्रेवेल एंड लिविंग, डिस्कवरी साइंस जैसे चैनल प्रसारित हो रहे हैं। डिस्कवरी भी भारतीय बाजार में पहले दिन से इनक्रप्टेड सिग्नल वाला चैनल था जो जल्द ही पे चैनल में बदल गया। ( डिस्कवरी के बारे में ज्यादा जानकारी शैक्षिक चैनल वाले अध्याय में)
भारत में हिंदुस्तान टाइम्स समूह और लंदन के पियरन समूह, कार्लटन समूह ने मिलकर होम टीवी की शुरूआत की। होम टीवी में मनोरंजन धारावाहिकों के अलावा समाचार और न्यूज बेस्ड प्रोग्रामिंग के लिए भी जगह थी। होम टीवी पर अम्मा एंड फेमिली जैसे धारावाहिक काफी लोकप्रिय भी हुए लेकिन कुछ ही सालों में ये चैनल बंद हो गया।
समाचारों और सामयिक कार्यक्रमों पर केंद्रित चैनल बीबीसी वर्ल्ड भारतीय दर्शकों के लिए शुरू से उपलब्ध है। अगर बच्चों के चैनलों की बात करें तो कार्टून नेटवर्क के बाद निकोलोडियन, डिज्नी चैनल, पोगो, एनीमैक्स जैसे चैनल भारतीय बच्चों के बीच जगह बना चुके हैं। जैसे जैसे भारत में केबल नेटवर्क का विस्तार होता गया डीटीटीएच प्लेटफार्म पर जगह बढने लगी भारतीय बाजार में विदेशी चैलनों की घुसपैठ तेजी बढ़ने लगी। आज भारतीय बाजार में विदेशी चैनलें की गिनती मुश्किल है। कुछ पूरी तरह विदेशी चैनलों तो कई भारतीय चैनलों में विदेशी पूंजी की बढ़ती हिस्सेदारी। ऐसे में ये कहना भी मुश्किल है कौन कितना स्वदेशी है। वायकाम समूह भारत टीवी 18 समूह के साथ समझौता कर कई चैनल ला चुका है जिसमें कलर्स जैसे मनोरंजन चैलन प्रमुख हैं। एचबीओ, ब्लूमबर्ग जैसे कई और चैनल भारतीय बाजार में अगल अलग डिस्ट्रिब्यूशन प्लेटफार्म पर पहुंच चुके हैं तो अब हाई डेफनिशन प्लेटफार्म पर कई विदेशी चैनल आने को तैयार है। देश की आबादी 1 अरब 20 करोड को पार कर चुकी है। इतनी बड़ी आबादी में दो करोड़ लोग तो डाइरेक्ट टू होम यानी डीटीएच के ग्राहक हैं, तो जाहिर है विदेशी चैनलों को बहुत बड़ा बाजार मिल रहा है।


Wednesday, 16 March 2011

गर्म है धर्म का बाजार -


याद किजिए रविवार को सुबह 10 बजे समय का जब दूरदर्शन पर रामायण धारावाहिक का प्रसारण होता था। मानो पूरा देश रूक जाता था एक घंटे के लिए। रामानंद सागर के रामायण ने टीवी को घर घर में लोकप्रिय बनाया इसके साथ ही टीवी पर धार्मिक कथानक वाले धारावाहिकों की शुरूआत हुई. लेकिन अब हालात बदल चुके हैं आज की तारीख में सेटेलाइट चैनलों की फेहरिश्त में दर्जनों धार्मिक टीवी चैनल हैं। सेटेलाइट चैनलों के आने के साथ ही धर्म और धर्मगुरूओं को काफी जगह मिली है। टीवी पर धार्मिक कार्यक्रमों की बात करें तो इसकी शुरूआत का श्रेय रामायण जैसे धारावाहिक को जाता है। रामायण के बाद बीआर चोपड़ा के महाभारत ने भी लोकप्रियता के झंडे गाड़े। जहां रामायण और महाभारत के पात्र घर घर में लोकप्रिय हुए वहीं इन धारावाहिकों ने रामायण और महाभारत जैसे धारावाहिकों की कहानी को आमलोगों के बीच काफी लोकप्रिय बनाया। बीआर चोपड़ा के धारावाहिक महाभारत का संवाद डाक्टर राही मासूम रजा जैसे साहित्यकार ने लिखा तो हरीश भिमानी की आवाज में मैं समय हूं...लोगों की मानस पटल पर आज भी गूंजता है। हालांकि रामायण और महाभारत के बाद रामानंद सागर का ही कृष्णा धीरज कुमार का ओम नमशिवाय जैसे दर्जनों धार्मिक धारावाहिक आए। हालांकि ये सभी धार्मिक धारावाहिक रामायण और महाभारत की तरह की लोकप्रिय नहीं हो सके लेकिन इन धारावाहिकों ने सेटेलाइट चैलनों की दौर में धर्म के लिए बाजार की नींव जरूर रखी। आज 400 से ज्यादा सेटेलाइट चैनलों की फेहरिस्त में दर्जन से ज्यादा धार्मिक चैनल हैं।

अगर के देश के पहले धार्मिक चैनल की बात करें तो इसका श्रेय आस्था को जाता है। आस्था ने धर्मगुरूओं के प्रवचन, धार्मिक स्थानों की यात्राएं और प्रमुख धार्मिक कार्यक्रमों को लाइव दिखाना आरंभ किया। गुजराती पृष्ठभूमि के व्यवसायी किरिट भाई मेहता ने आस्था चैनल को प्रयोग के तौर पर आरंभ किया। यह चैनल शुरूआत में इसी समूह के सहयोगी चैनल सीएमएम म्यूजिक के साथ 24 घंटे में 12 घंटे प्रसारित हुआ करता था। पर शीघ्र ही चैनल को मिली लोकप्रियता ने इसे 24 घंटे का डिजिटल धार्मिक चैनल बना दिया। चैलन की देशभर के दर्शकों में मांग थी लिहाजा इसे केबल आपरेटर प्रमुखता से दिखाते रहे।
इसके बाद इंदौर के समूह ने संस्कार नामक धार्मिक चैनल आरंभ किया। इस चैनल पर भी धर्म गुरूओं के प्रवचन के अलावा भजन और धार्मिक गीत संगीत के कार्यक्रम देखे जाते हैं। इसी दौर में भारतीय मूल के महान संत महर्षि महेश योगी ने महर्षि वैदिक विजन नामक फ्री टू एयर चैनल शुरू किया। हालांकि इस चैनल पर सिर्फ महर्षि महेश योगी से जुड़े हुए प्रवचन ही उपलब्ध थे लेकिन ये चैनल महर्षि महेश योगी के भक्तों के बीच काफी लोकप्रिय हुआ। लेकिन धार्मिक चैनल आस्था नई परिकल्पना लेकर आया। इसका किसी एक धर्म या धर्म गुरू से कोई संबंध नहीं है। बल्कि यह हिंदू धर्म के विभिन्न मतों संतों के प्रवचन नियमित सुनने को मिलते हैं। चाहें वह आसाराम बापू हों, मुरारी बापू हों, निरंकारी मिशन के स्वामी हों या फिर जैन मुनि हों। आस्था की कोशिश हर मत के लोगों को चैनल पर जगह देना रहा है। चैनल कई बार भगवती जागरण के लोकप्रिय गायकों को भी अच्छा मंच प्रदान कर रहा है।  
वैसे सभी प्रमुख मनोरंजन चैनल अपने मार्निंग बैंड में धर्म को प्रमुख स्थान देते हैं। सुबह के कुछ घंटे धर्मगुरूओं के प्रवचन के लिए निश्चित रहते हैं। सोनी चैनल पर लंबे समय तक सुबह सुबह आसाराम बापू का प्रवचन आता रहा। अब आसाराम बापू के शिष्यों ने भी एक चैनल एटूजेड शुरू कर दिया है। ये चैनल खास तौर पर आसाराम बापू के तमाम प्रवचनों को प्रमुखता से दिखाता है। इसी तरह आस्था चैनल को देश के बड़े योग गुरू बाबा राम देव के शिष्यों ने टेकओवर कर लिया है। पहले आस्था चैनल का संचालन सीएमएम लिमिडेट के पास था तो अब वैदिक ब्राडकास्टिंग लिमिटेड नामक संस्था इसका संचालन करती है। अब आस्था समूह के पास पांच धार्मिक चैनलों के लाइसेंस हैं। वहीं संस्कार टीवी समूह संस्कार के अलावा सत्संग टीवी की चैलन का भी प्रसारण करता है। यानी हर बड़ा धर्म गुरू या धार्मिक संगठन अपने भक्तों के बीच खुद को पहुंचाने के लिए किसी न किसी टीवी चैनल का सहारा लेना चाहता है। आजतक जैसे समाचार चैनल पर सुबह सुबह कृपालु महाराज का प्रवचन देखने को मिलता है। तो संत मोरारी बापू के हर प्रवचन को कोई न कोई धार्मिक चैनल लाइव दिखाता है। धर्मगुरूओं के सेटेलाइट चैनलों पर स्पेस मिलने के साथ ही वे ग्लोबल हो जाते हैं। क्योंकि दुनिया भर में फैले हुए भक्त उनके प्रवचन को लाइव देख सकते हैं। इससे न सिर्फ उनके भक्तों की संख्या में इजाफा होता है बल्कि धर्मगुरूओं का सम्राज्य भी बड़ा होता जा रहा है।
कई धार्मिक संगठनों ने तो महर्षि वैदिक विजन की तर्ज पर ही अपना स्वतंत्र सेटेलाइट चैनल भी शुरू कर दिया है। तो कई धार्मिक संगठनों ने किसी चैनल में अपने लिए टाइम स्लाट तय करा लिया है। जैसे अखिल विश्व गायत्री परिवार यानी शांतिकुंज हरिद्वार से जुड़े धार्मिक कार्यक्रम प्रज्ञा चैनल पर छह घंटे प्रसारित होते हैं। कई चैनलों ने भक्तों की मांग को देखते हुए एक्टिव दर्शन की शुरूआत की है। यानी घर बैठे माता वैष्णो देवी, काशी विश्वनाथ मंदिर या फिर तिरुपति तिरूमाला देवस्थानम आदि के दर्शन करने का लाभ टीवी  पर उठाएं। जिन धार्मिक संगठनों का बजट बहुत बड़ा है ऐसे सगंठन अपना स्वतंत्र टीवी लाने की भी योजना बना रहे हैं। आज प्रजापिता ब्रह्मकुमारी, साईं बाबा के भक्त, नारायण सेवा संस्थान जैसे तमाम धार्मिक संगठन अपना धार्मिक चैनल लाने की योजना पर काम कर रहे हैं। जैन धर्म के अनुयायियों ने पारस चैनल शुरू किया तो जैन धर्म गुरूओं के प्रवचन को लेकर जिनवाणी और णमोकार जैसा चैनल भी शुरू हो चुका है। इतना ही नहीं दुनिया के दूसरे देशों में धार्मिक चैनलों का बाजार है। ईसाई धर्म के प्रचार के लिए गॉड टीवी जैसे कई चैनल आरंभ हो चुके हैं तो इस्लाम धर्म के प्रचार के लिए भी टीवी चैनल अवतार ले चुके हैं।
धर्म के बाजार के अंदरुनी अर्थशास्त्र की बात करें तो ज्यादातर धार्मिक चैनल फायदे में हैं। सबसे पहली बात की धार्मिक चैनलों को दर्शक आसानी से मिल जाते हैं। जिस धर्म गुरू का प्रवचन जब चलता है तब उनके भक्त इन चैनलों को देखते हैं। साथ ही धार्मिक चैनलों के लिए साफ्टवेयर बनाने मे ज्यादा खर्च नहीं आता। ऐसे चैनलों पर या तो धर्म गुरूओं के प्रवचन या फिर किसी बड़े धार्मिक आयोजन का लाइव शो होता है। लेकिन इन सबके अलावा भी धार्मिक चैनलों की कमाई है। किसी नामचीन धर्म गुरू जिनके भक्तों की बड़ी संख्या का उनका प्रवचन को धार्मिक चैनल मुफ्त में दिखाते हैं वहीं ऐसे धर्म गुरू जिनके भक्तों की फेहरिस्त बड़ी नहीं है उन्हें किसी धार्मिक चैनल पर जगह पाने के लिए पैकेज डील करनी पड़ती है। यानी चैनल पर इच्छित टाइम स्लॉट पाने के लिए चैनल वाले बड़ी राशि वसूलते हैं। यानी टीवी पर धर्म का बाजार काफी गर्म है। आज तमाम धार्मिक चैनलों के पास अपने ओबी वैन हैं जिससे वे धार्मिक आयोजन का लाइव प्रसारण करते हैं। आज सेटेलाइट चैलनों के बाजार में 20 से ज्यादा धार्मिक चैनल हैं तो दर्जनों चैनल अभी बाजार में आने की तैयारी में लगे हुए हैं।       

प्रमुख धार्मिक चैनल

1.      आस्था
2.      आस्था भजन
3.      संस्कार
4.      सत्संग
5.      एमएच वन श्रद्धा
6.      जी जागरण
7.      प्रज्ञा
8.      साधना
9.      दिशा
10.  जीएनएन भक्ति
11.  कात्यायनी
12.  महर्षि वैदिक विजन
13.  गॉड टीवी
14.  जिनवाणी
15.  णमोकार
16.  पारस चैनल
17.  प्रार्थना टीवी
18.  भक्ति टीवी
19.  डे स्टार


Monday, 14 March 2011

टीवी पर हिंदी की बढ़ती ताकत


छोटे पर्दे पर हिंदी की बढ़ती ताकत साफ दिखाई देती है। देश भर के लोगों को तक पहुंचने के लिए हिंदी से बढ़िया कोई माध्यम नहीं हो सकता है, ये बात टेलीविजन ने बड़ी शिद्दत से समझा है। तभी तो जब भारत में विदेशी चैलनों ने पांव रखे तो उन्हें जल्द ही महसूस हो गया कि विदेशी धारावाहिकों को अंग्रेजी में दिखाकर लोकप्रिय नहीं हुआ जा सकता है। लिहाजा सोनी और स्टार प्लस ने धीरे धीरे अपने धारावाहिकों को हिंदी में डब करके दिखाना शुरू कर दिया।
भारत में जब विदेशी चैनलों का पदार्पण हुआ तो उन्होंने पहले हिंदी की ताकत को नहीं समझा था। परंतु कुछ ही सालों में लगभग सभी विदेशी चैनलों ने अपनी रणनीति में बदलाव लाना शुरू कर दिया। उनकी समझ में आ गया कि अंग्रेजी में कार्यक्रम पेश करके सिर्फ कुछ लाख इलीट क्लास तक ही पहुंचा जा सकता है। सोनी एंटरटेनमेंट ने सबसे पहले हिंदी के महत्व को समझा। जो भी विदेशी धारावाहिक सोनी पर आए उन्हें हिंदी में डब करके ही दर्शकों को समाने पेश किया गया। हालांकि कई डब धारावाहिक भी खासे लोकप्रिय नहीं हो सके। स्टार प्लस प्रारंभिक दौर में मूल रूप से अंग्रेजी का ही चैनल था लेकिन धीरे धीरे स्टार ने हिंदी में कार्यक्रमों का प्रसारण आरंभ कर दिया। न सिर्फ धारावाहिक और खबरें बल्कि चैनल पर फिल्में का प्रसारण शुरू कर दिया। आज स्टार पर हिंदी के कई चैनल हैं। स्टार मूवीज पर दिखाई जाने वाली फिल्मों को भी हिंदी में डब करके दिखाया जा रहा है।

डिस्कवरी चैनल में भी शुरूआत में कुछ कार्यक्रमों में हिंदी आडियो फीड देना आरंभ किया लेकिन अच्छा रेसपांस मिलने पर डिस्कवरी के सभी कार्यक्रम 24 घंटे हिंदी में उपलब्ध होने लगे। सबसे बडी बात है कि डिस्कवरी ने अपने चैनल पर बहुत ही शिष्ट और शालीन हिंदी को चुना है। बेहतर किस्म के अनुवाद के साथ डिस्कवरी के कार्यक्रम हिंदी में उपलब्ध हैं। अब डिस्कवरी के प्रतिस्पर्धी चैनल नेशनल ज्योग्राफिक भी हिंदी में उपलब्ध है। तो हिस्ट्री चैनल के कार्यक्रम भी हिंदी में देखे जा सकते हैं। डिस्कवरी ने हिंदी को ज्यादा मुश्किल न बनाते हुए तकनीकी शब्दावली को को आमजन तक पहुंचाने के लिए विद्वानों के टीम की मदद ली है। अपने चैनल के लिए डिस्कवरी ने तकनीकी शब्दावली की अपनी डिक्सनरी विकसित की है। आप महसूस कर सकते हैं कि डिस्कवरी के डब कार्यक्रमें की हिंदी सरकारी विभागों को बोझिल अनुवाद से कहीं बेहतर है। इसके लिए डिस्कवरी ने विद्वान पत्रकारों और साहित्यकारों के टीम की मदद ली है।

डबिंग का कारोबार

हिंदी के इस बढ़ते बाजार से लोगो को रोजगार को नए मौके मिले हैं। तमाम चैनलों पर दिखाए जाने वाले कार्यक्रमों के हिंदी अनुवाद के लिए जहां अनुवादकों की टीम को रोजगार मिला है तो डबिंग आर्टिस्टों को भी रोजगार मिला है। मूवी चैनल और दूसरे तमाम चैनलों को कार्यक्रमों को अनुवाद करने के बाद डबिंग आर्टिस्टों से डब कराया जाता है। इससे दूसरी तीसरी श्रेणी के फिल्म टीवी कलाकारों को रोजगार का नया मौका मिला है तो संघर्षशील कलाकारों को भी एक और प्लेटफार्म मिला है। डबिंग का ये कारोबार अब भारतीय बाजार में सिर्फ हिंदी तक ही सीमित नहीं है बल्कि अब डबिंग बांग्ला, तमिल, तेलगु जैसी प्रमुख भारतीय भाषाओं में भी हो रही है।

कार्टून कैरेक्टर हिंदी में

टर्नर समूह ने 1992 में 24 घंटे का कार्टून चैनल शुरू किया था। भारतीय बच्चों के बीच 1996 में कार्टून नेटवर्क आया। लेकिन जल्दी ही कार्टून नेटवर्क ने भारत के लिए सभी कार्टून धारावाहिकों की हिंदी में डबिंग आरंभ कर दी। अब दुनिया के जाने माने कार्टून कैरेक्टर हिंदी में संवाद करते नजर आने लगे। शुरूआत में कार्टून नेटवर्क ने टून तमाशा नाम से दो घंटे का सिगमेंट शुरू किया था लेकिन धीरे धीरे सभी कार्टून चैनल भारतीय बच्चों को लिए 24 घंटे हिंदी आडियो फीड प्रदान करने लगे। अब सिर्फ कार्टून नेटवर्क ही नहीं बल्कि डिज्नी, निकोलोडियन, हंगामा टीवी, पोगो जैसे सभी चैनलों पर हिंदी देखी जा सकती है।

टीवी को देखकर कहा जा सकता है कि आने वाले दिनों में हिंदी का भविष्य उज्ज्वल है। इतना ही नहीं अब हालीवुड के फिल्में के भी हिंदी में बड़ी तेजी से डबिंग होने लगी है। आजकल हर साल रिलीज होने वाले दर्जनों हालीवुड की फिल्में अंग्रेजी के साथ ही हिंदी में भी डब होकर रिलीज होती हैं। हिंदी में होने कारण ये छोटे छोटे शहरें के सिनेमाघरों तक भी जाकर अच्छा कारोबार करती हैं। जाहिर हम कह सकते हैं कि बाजार ने हिंदी की ताकत को समझा है। हिंदुस्तान मे 60 करोड़ से ज्यादा लोग हिंदी बोलते समझते, लिखते पढ़ते हैं। इसी भाषा में खाते पीते और हंसते मुस्कुराते हैं। इसकी ताकत तो विदेशी चैनलों ने भी खूब समझा है।

टीवी चूंकि दृश्य श्रव्य माध्यम है। टीवी देखने के लिए साक्षर होना जरूरी नहीं है। इसलिए टीवी की पहुंच अखबारों की तुलना में ज्यादा बड़े आडिएंश तक है। इसलिए सभी चैनल हिंदी की इस ताकत को समझ रहे हैं। वहीं लंबे कथानक वाले लोकप्रिय धारावाहिकों के कारण अहिंदी भाषी लोग भी हिंदी समझने सीखने की कोशिश कर रहे हैं। इसलिए हम कह सकते हैं हिंदी के प्रचार प्रसार में हिंदी फिल्में के बाद हिंदी में कार्यक्रम दिखाने वाले टीवी चैनलों की भी बड़ी भूमिका है। टीएमजी नामक चैनल ने टेक्नोलॉजी की खबरों को हिंदी में दिखाना शुरू किया तो सीएनबीसी चैनल ने बाजार की नब्ज पकड़ने के लिए हिंदी की मदद ली। बड़ी संख्या में शेयर बाजार में निवेश करने वाले हिंदीभाषियों के लिए सीएनबीसी आवाज नामक हिंदी चैनल आया। बिजनेस चैनलों की फेहरिस्त में ये हिंदी चैनल काफी लोकप्रिय हुआ। टीवी पर हिंदी धारावाहिकों के बदलौत हिंदी का प्रचार प्रसार विदेशों में भी हो रहा है। पड़ोसी देशों के लोग हिंदी समझ रहे हैं तो विदेशों में एनआरआई परिवारों के बच्चे भी हिंदी के कारण अपनी जड़ों से जुड़े हुए प्रतीत हो रहे हैं। यानी सूचना सम्राज्यवाद के इस दौर में हिंदी मजबूत हो रही है।

जाहिर है इससे हिंदी जानने समझने वाले और अनुवाद करने वाले प्रोफेशनलों की मांग बढ़ी है। यानी हिंदी का बाजार बढ़ता जा रहा है। कई यूनीवर्सिटियों में फंक्शनल हिंदी और फंक्शनल इंग्लिश की पढ़ाई भी शुरू हो चुकी है। अगर आप बढ़िया अनुवाद कर सकते हैं तो बाजार को आपकी जरूरत है। 




Saturday, 12 March 2011

क्या भविष्य होगा इन चैनलों का


-विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com
 जिस तरह कुछ लोग व्यसायिक हित साधने मात्र के लिए अखबार निकालते हैं उसी तरह देश में आजकल टीवी चैनलों की हालत हो गई है। कई समाचार चैनलों के छोटे छोटे प्रोजेक्ट आ रहे हैं जो कहीं दर्शकों में जगह बना पाने में सफल नहीं हो पा रहे हैं। कुछ प्रमुख समाचार चैनल जिन्हें देश भर में लोग देख रहे हैं उसके अलावा कई छोटे-छोटे समाचार चैनलों के प्रोजेक्ट आ रहे हैं जो भले ही अपनी बड़ी बड़ी योजनाओं का दावा करते हों पर उनकी दर्शकों में पैठ को देखकर कहा जा सकता है कि उनकी हालात भी कुछ वैसी ही है जैसे देश में छोटे-छोटे अखबार निकाले जाते हैं जो महज विज्ञापन के हित साधने के लिए होते हैं।

देश का पहला 24 घंटे के न्यूज चैनल होने का गौरव जी न्यूज को प्राप्त है। उसके बाद आज तकएनडीटीवीस्टार न्यूजआईबीएन-7, डीडी न्यूजसहारा समयन्यूज 24 जैसे चैनलों की बात करें तो उन्होंने अपनी राष्ट्रीय पहचान बना ली है। पर इसके बाद कुछ और नाम पर गौर फरमाएंजैन टीवीआजाद चैनलएमएचवन न्यूजटीवी-100, यूपी न्यूजहरियाणा न्यूजहरियाली न्यूजपीबीसी जैसे नाम लोगों की जेहन में अभी कहां हैं। होंगे भी कैसे इन चैनलों का नाम अभी मीडिया जगत के लोगों भी ठीक से नहीं पता। इनमें से कई चैनलों का रीजनल बेस है,पर ये जिस रीजन में हैं वहां भी उनकी कोई पहचान नहीं बन पाई है। दरअसल कई समूहों के लिए टीवी चैनल खोलना ऐसा धंधा हो गया है जिससे वे अपने कारोबार के हितों को मीडिया में आकर बचाए रहना चाहते हैं। अभी दर्जनों ऐसे समूह हैं तो समाचार चैनल खोलने को तैयार बैठे हैं। कई बड़ी परियोजनाओं पर काम भी चल रहा है।
कई भाषायी चैनलों को बहुत अच्छा बाजार मिला है। आज देश में जिस भाषा के बोलने वाले तीन चार करोड़ से ज्यादा लोग हैं उनमें कई कई चैनल सफलतापूर्वक चल रहे हैं। पर हिंदी में एक राष्ट्रीय चैनल खोलने और चलाने के लिए राष्ट्रीय नेटवर्क के अलावा काफी रूपया चाहिए। इसके साथ ही स्थापित चैनलों की प्रतिस्पर्धा कर पाने के लिए कई सालों तक घाटा उठाकर बाजार में बने रहने के लिए का साहस भी चाहिए। क्योंकि समाचार चैनल खोलना तुरंत फायदा कमाने वाला कारोबार नही हैं। वहीं राष्ट्रीय चैनलों में आजकल वही चैनल सफल हैं जिनके पास कई चैनलों का समूह हैइससे वे एक नेटवर्क से मिलने वाली खबर का इस्तेमाल अलग अलग चैनलों के लिए भी कर लेते हैं। आज आजतक के पास चार चैनलएनडीटीवी के पास पांच चैनल हैं तो आईबीएनसहाराजी और स्टार के पास भी कई चैनलों का समूह है। दरअसल इलेक्ट्रानिक मीडिया के लिए खबरों का संकलन एक महंगी प्रक्रिया है। इसके साथ ही काबिल पत्रकारों का पारिश्रमिक भी बढ़ता जा रहा है। ऐसे में जिस तेजी से नये समाचार चैनल आ रहे हैं उनकी सफलता पर सवालिया निशान लगना स्वभाविक है। आखिर वे कब तक प्रतिस्पर्धा में खड़े रहने का साहस लेकर मैदान में उतर रहे हैं। समाचार के मैदान में उतरने वाले नये खिलाड़ियों में नाइन एक्सविनोद शर्मा का इंडिया न्यूजत्रिवेणी समूह का वाइस आफ इंडियामराठी दैनिक साकाल का साकाल टीवीएटीएन समूह एनई टीवी का फोकस टीवी जैसे नाम हैं। अगर रिलायंस समूह 20 टीवी चैनलों का समूह लेकर आता है तो वह कई साल तक घाटा उठाकर भी मैदान में रह सकता है। पर तमाम नए प्रोजेक्टों का क्या होगा।  
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