Friday, 17 August 2018

नव दधिचि हड्डियां गलाएं – अटल बिहारी वाजपेयी

अटल बिहारी वाजपेयी ( 25 दिसंबर 1924- 16 अगस्त 2018 )

अटल बिहारी वाजपेयी ने जब अपनी कविता में लिखा नव दधिचि हड्डियां  गलाएं तो इस पर उस दौर में खूब चर्चा हुई। इन पंक्तियों में उनका इशारा सत्तालोलुप राजनेताओं की ओर था। वे उन्हें त्याग करने की प्रेरणा दे रहे थे। पर उनके इस आशय को कम लोगों ने समझा। अटल बिहारी वाजपेयी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार के पहले प्रधानमंत्री थे जिन्होंने गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री पद के पांच साल बिना किसी समस्या के पूरा किए। उन्होंने 24 दलों के गठबंधन से सरकार बनाई थी जिसमें 81 मंत्री थे। इससे उनकी नेतृत्व क्षमता का पता चलता है।

शिंदे की छावनी में जन्म
25 दिसंबर 1924 – शिंदे की छावनीग्वालियर (मध्य प्रदेश) 
पिता – कृष्ण बिहारी वाजपेयीमाता – कृष्णा वाजपेयीमूल निवासी – बटेश्वरआगराउत्तर प्रदेश।
एमए (राजनीतिशास्त्र) – डीएवी कॉलेजडीएवी कालेज,
शिक्षा
बीए - विक्टोरिया कॉलेज,विक्टोरिया कालेजग्वालियर ( अब लक्ष्मीबाई कॉलेज )
एमए (राजनीति शास्त्र ) - डीएवी कालेजकानपुर।

जीवन यात्रा
1951 - भारतीय जन संघ के संस्थापक सदस्य।
1954 – पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ासफलता नहीं मिली।
1957 – बलरामपुर (गोंडा) से पहली बार चुनाव जीतकर लोकसभा में पहुंचे। 
1984 - ग्वालियर में कांग्रेस के माधवराव सिंधिया के हाथों पराजित हो गए।
1968  - भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष बने1973 तक इस पद पर रहे।
1977 - जनता पार्टी सरकार में अटल बिहारी वाजपेयी विदेश मंत्री बने
1980 -  6 अप्रैल को भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष बने।
1962  और 1986  में वह राज्यसभा के सदस्य भी रहे।

तीन बार प्रधानमंत्री बने
16  मई 1996 से 1 जून 1996 –  प्रधानमंत्री
19 मार्च 1998 – दूसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।
13 अक्तूबर 1999 से 22 मई 2004 – प्रधानमंत्री

1998 में 11 और 13 मई को पोखरण में पांच भूमिगत परमाणु परीक्षण विस्फोट करके भारत को परमाणु शक्ति संपन्न देश घोषित कर दिया।

बड़े सम्मान
1992 - पद्मविभूषण से सम्मानित
1994 – श्रेष्ठ सांसद पुरस्कार
2014 - भारत रत्न से सम्मानित किए गए।


दस बार लोकसभा के सदस्य 
वे दस बार चुनाव जीतकर लोकसभा के सदस्य बने और चार राज्यों का प्रतिनिधित्व किया। पहला चुनाव 1957 में जीता बलरामपुर (गोंडा, उप्र) से। हालांकि इस साल वे लखनऊ और मथुरा से भी लड़े थे पर दोनों जगह हार गए थे। इसके बाद  1967, 1971, 1977, 1980, 1991, 1996, 1998, 1999 और 2004 में चुनाव जीते। वे 1984 में ग्वालियर से लोकसभा का चुनाव हार भी गए थे। उन्हें तब कांग्रेस उम्मीदवार माधव राव सिंधिया ने पराजित किया था।

प्रमुख रचनाएं -
मृत्यु या हत्या
अमर बलिदान (लोकसभा में वक्तव्यों का संग्रह)
कैदी कविराय की कुण्डलियां
संसद में तीन दशक
अमर आग है
कुछ लेख: कुछ भाषण
सेक्युलर वाद
राजनीति की रपटीली राहें
बिन्दु बिन्दु विचारइत्यादि।
मेरी इक्यावन कविताएं


पत्रकारिता से शुरुआत
अटल बिहारी वाजपेयी ने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत पत्रकारिता से की। बाद में पत्रकारिता ही उनके राजनैतिक जीवन की आधारशिला बनी। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखपत्र पांचजन्यराष्ट्रधर्म और वीर अर्जुन जैसे अखबारों का संपादन किया।

जय जवान, जय किसानजय विज्ञान
लालबहादुर शास्त्री जी की तरफ से दिए गए नारे जय जवान जय किसान में अलग से जय विज्ञान जोड़ा। अटल हमेशा से समाज में समानता के पोषक रहे। विदेश नीति पर उनका नजरिया साफ था। वह आर्थिक उदारीकरण एवं विदेशी मदद के विरोधी नहीं रहे हैं लेकिन वह इमदाद देशहित के खिलाफ हो,ऐसी नीति को बढ़ावा देने के वह हिमायती नहीं रहे। उन्हें विदेश नीति पर देश की अस्मिता से कोई समझौता स्वीकार नहीं था।

अटल इरादों की मिसाल था परमाणु परीक्षण
वाजपेयी सरकार के समय 11 और 13 मई 1998 को पोखरण में किए गए जो उनके अटल इरादों की मिसाल था। परमाणु परीक्षणों ने भारत की परमाणु शक्ति को रेखांकित करने के साथ ही दुनिया को चौंकाया भी था।
भारत ने 11 मई के बाद 13 मई को भी परीक्षण किया। परीक्षण के लिए पहले सुबह नौ बजे का समय तय थापरंतु हवा का रुख पूर्व से पश्चिम की ओर होने के कारण परीक्षण को रोका गया। इस बीच अचानक हवा का रुख पश्चिम से पूर्व की तरफ हुआ और तीन बजकर 45 मिनट पर सफलतापूर्वक परीक्षण संपन्न होने के साथ ही भारत परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्रों की सूची में शामिल हो गया। ये देश के लिए गर्व का पल था। ऐसे में अगर पूछा जाए कि भारत को परमाणु राष्ट्र बनाने वाला प्रधानमंत्री कौनजवाब मिलेगा अटल बिहारी वाजपेयी। वाजपेयी ने अपने कई भाषणों में इस परमाणु टेस्टं का श्रेय परमाणु ऊर्जा विभाग के अध्यक्ष आर चिदंबरम और दूसरे रक्षा अनुसंधान और विकास संस्थान के प्रमुख एपीजे अब्दुल कलाम को भी दिया। पश्चिमी राष्ट्र 1998 में भारत की परमाणु परीक्षण योजना को भांपने में पूरी तरह नाकाम रहे।

पोखरण परीक्षण के बाद दुनिया के शक्तिशाली देशों ने गुस्से में भारत की आर्थिक नाकेबंदी भी की। वे इसलिए और नाराज थेक्योंकि भारत ने उनके विकसित सूचना तंत्र को नाकाम कर अपना सफल परीक्षण कर लिया था। उस समय अमेरिका के चार जासूसी उपग्रह 24 घंटे पूरी दूनिया की निगरानी करते थे जिन पर उस समय अमेरिका 27 अरब डॉलर प्रति वर्ष खर्च करता था।

संयुक्त राष्ट्र में हिंदी में पहला भाषण दिया
1977 में जनता सरकार में विदेश मंत्री के तौर पर काम कर रहे अटल बिहारी वाजपेयी ने संयुक्त राष्ट्रसंघ में अपना पहला भाषण हिंदी में देकर सभी के दिल में गहरा प्रभाव छोड़ा था। संयुक्त राष्ट्र में अटल बिहारी वाजपेयी का हिंदी में दिया भाषण उस वक्त काफी लोकप्रिय हुआ। यह पहला मौका था जब यूएन जैसे बड़े अतंराष्ट्रीय मंच पर भारत की गूंज सुनने को मिली थी। वाजपेयी का यह भाषण यूएन में आए सभी प्रतिनिधियों को इतना पसंद आया कि उन्होंने खड़े होकर तालियां बजाई। 'वसुधैव कुटुंबकमका संदेश देते अपने भाषण में उन्होंने मूलभूत मानव अधिकारों के साथ- साथ रंगभेद जैसे गंभीर मुद्दों को उठाया था।
यूएन के मंच से दुनिया के ताकतवर देशों को एक तरह से नसीहत और भारत की नीति को साफगोई के साथ तराशे हुए शब्दों में ढालकर दुनिया के सामने रखा। इस दौरान उन्होंने कहा था, 'मैं भारत की ओर से इस महासभा को आश्वासन देना चाहता हूं कि हम एक विश्व के आदर्शों की प्राप्ति और मानव कल्याण तथा उसके गौरव के लिए त्याग और बलिदान की बेला में कभी पीछे नहीं रहेंगे। अटल जी ने जो भाषण दिया था उससे यह साफ पता लगाया जा सकता है कि उन्होंने हिंदी भाषा को अपने दिल के कितने करीब रखा हुआ है।

 15 अगस्त 1998 को लालकिला से पहला भाषण -
पूरी दुनिया में पोखरण परीक्षण की गूंज सुनाई दे रही थीदेश में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जय जयकार हो रही थी। इस बीच स्वतंत्रता दिवस आया और पहली बार 15 अगस्त 1998 को लालकिला के प्राचीर से प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भाषण दिया। तत्कालीन प्रधानमंत्री को सुनने के लिए इतनी भीड़ जुटीऐसा पहले सिर्फ नेहरू के दौरान ही ऐसा हुआ था। 
देशवासी बहनो भाईयो और प्यारे बच्चोंअपने स्वतंत्रता की  51वीं वर्षगांठ पर आप सबको शुभकामनाएं। हम सब ये जानते हैं कि आजादी हमें सस्ते में नहीं मिली है। एक तरफ महात्मा गांधी जी के नेतृत्व में लाखों नर नारियों ने आजीवन कारावास की यातनाएं सहन की तो दूसरी ओर हजारों क्रांतिकारियों ने हंसते हंसते फांसी का फंदा चूम कर अपने प्राणों का बलिदान दिया। हमारी ये आजादी ये इन सब ज्ञात  अज्ञात शहीदों की देन है। आइए हम सब मिलकर प्रतीज्ञा करें कि हम इस आजादी की रक्षा करेंगे चाहे हमें इसके लिए सर्वस्व क्यों न न्योक्षावर करना पड़े।  मेरे पास भारत के लिए एक दृष्टिकोण है- एक भारत जो भूख और भय से मुक्त होएक भारत जो असाक्षरता और अभाव से मुक्त हो।

अटल जी का लालकिला से 2002 का भाषण - 
स्वाधीनता के इस पावन पर्व पर सबको मेरी शुभकामनाएं। हर साल हम तिरंगा फहराते हैं। तिरंगा प्रतीक है आजादी कास्वाभिमाना का त्याग और बलिदान का। आज हम स्वतंत्ता संग्राम के सभी सेनापतियों को शहीदों को सादर नमन करते हैं। आज भारत की अर्थव्यवस्था विश्व की सबसे बड़ी अर्थ व्यवस्था बन गई है। शुभकामनाएं सभी वैज्ञानिकों को शिक्षकों को कलाकारों को सभी बच्चों। स्वतंत्रता के संघर्ष में इस महान भारत का सपना हमने देखा था वह सपना आज भी हमारी आंखों मे हैं कुछ हद तक सपना साकार हुआ है बाकी होना बाकी है। राष्ट्र की सुरक्षा हमारे लिए सर्वोपरि है। भारत अपनी सुरक्षा के लिए परावलंबी नहीं हो सकता।

जब नेहरू ने कहा था आप प्रधानमंत्री बनेंगे
अटल बिहारी वाजपेयी 1957 में दूसरी लोकसभा में चुनाव जीतकर पहुंचे थे तो संसद में कश्मीर मुद्दे को उन्होंने अपने ओजस्वी भाषण में गंभीरता से उठाया। वाजपेयी का इस तरह से भाषण देना तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू को काफी पसंद आया था। प्रभावित होकर संसद में ही पंडित नेहरू ने कहा कि एक दिन वाजपेयी जरूर प्रधानमंत्री बनेंगे। साल 1996 में यह सच साबित हुई।

इंदिरा गांधी की तारीफ की
वर्ष 1971 में अटल बिहारी वाजपेयी विपक्ष के नेता थे और इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थीं। 1971 के युद्ध में पाक के 90,368 सैनिकों और नागरिकों ने सरेंडर किया था। अटल बिहारी वाजपेयी ने सदन में कहा था कि जिस तरह से इंदिरा ने इस लड़ाई में अपनी भूमिका अदा की हैवह वाकई काबिल-ए-तारीफ है। सदन में युद्ध पर बहस चल रही थी और वाजपेयी ने  कहा कि हमें बहस को छोड़कर इंदिरा की भूमिका पर बात करनी चाहिए जो किसी दुर्गा से कम नहीं थी।
कैदी कविराय की कुंडलियां
जब 1975 में देश में इमरजेंसी लगी। देश में गिरफ्तारी का रेला चला। अटल जी भी गिरफ्तार हुए और उन्हें लाल कृष्ण आडवाणी के साथ बैंगलोर की सेंट्रल जेल में रखा गया। लेकिन अटल जी की साहित्यिक आजादी और मौलिकता जेल की दीवारों में कैद न हो सकीं। उन्होंने ‘कैदी कविराय की कुंडलियां’ नाम की रचनाओं को रूप दिया।

सदा-ए-सरहद लेकर लाहौर पहुंचे
पाकिस्तान के साथ रिश्ते सुधारने की पहल करते हुए 19 फरवरी 1999 को अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में दिल्ली से लाहौर तक बस सर्विस (सदा-ए-सरहद) शुरू की गई। इस बस सेवा की शुरुआत करते हुए पहले यात्री के तौर बस से वाजपेयी पाकिस्तान की यात्रा पर पहुंचे थे। यहां उन्होंने पाकिस्तान के तत्कालीन पीएम नवाजशरीफ से मुलाकात कर आपसी संबंधों की नई शुरुआत की थी। उनका विचार था कि कोई अपना दोस्त बदल सकता है लेकिन पड़ोसी नहीं।
प्रधानमंत्री के तौर पर बड़ी उपलब्धियां
-     पोखरण परीक्षण के साथ भारत परमाणु शक्ति संपन्न देश बना
-     नेशनल हाईवे डेवलपमेंट प्रोजेक्ट के तहत स्वर्णिम चतुर्भुज योजना बनी और देश के प्रमुख शहरों को शानदार सड़कों से जोड़ा गया।
 -    गांव गांव से पक्की सड़क से जोड़ने के लिए प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना बनी।
- आर्थिक सुधार की कई योजनाएं शुरू हुई जिससे देश की विकास दर में अच्छी बढ़ोत्तरी हुई।
-     कारगिल युद्ध के दौरान सरकार ने उनके नेतृत्व में कूटनीति से काम लिया और अंजाम तक पहुंचे।


लखनऊ से वाजपेयी का बहुत पुराना नाता था
पत्रकारिता की शुरुआत
अटल बिहारी वाजपेयी का लखनऊ से पुराना नाता रहा। हालांकि लखनऊ उनकी जन्मभूमि नहीं थी पर उन्होंने लखनऊ को अपनी कर्मभूमि बनाया। अटल जी संघ के प्रचारक के रूप में पहली बार 1942 में लखनऊ आए थे। 1947 में वे एक बार फिर लखनऊ आए तब उनकी पीएचडी करने की योजना थी। हालांकि वे पीएचडी नहीं कर सके पर उनके पत्रकार के तौर पर जीवन की शुरुआत हो गई। भाउराव देवरस के कहने पर वे पीएचडी छोड़कर पत्र का संपादन करने लगे। तब उन्हें लखनऊ से प्रकाशित होने वाले पत्र राष्ट्रधर्म के संपादन की जिम्मेवारी मिली। उनके संपादन में 31 दिसंबर 1947 को राष्ट्रधर्म का पहला अंक आया। उनके संपादन में राष्ट्रधर्म की प्रसार संख्या 12 हजार तक पहुंच गई।
लखनऊ से पांच बार सांसद
वाजपेयी लखनऊ से साल 1991, 1996, 1998, 1999, 2004 में सांसद चुने गए। कुल दस बार अटल जी ने लोकसभा का चुनाव जीता इसमें वे पांच बार लखनऊ से सांसद रहे। हालांकि वे लखनऊ से 1991 में पहली बार चुनाव जीते पर 1954 में भी एक उप चुनाव में वे लखनऊ से भारतीय जन संघ के उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतरे थे। हालांकि इस चुनाव में उन्हें सफलता नहीं मिली थी। लखनऊ के सभी चुनाव में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का भाषण भाजपा के लिए जीत की हवा बहाने का काम करता था।
शहर के कई हिस्सों में रहे
अपने लखनऊ प्रवास के दौरान शुरुआती दिनों में वे अपने सहयोगी बजरंग शरण तिवारी के घर में रहे। इसके बाद वे कुछ समय तक किसान संघ के भवन में भी रहे। इसके बाद वे अपने मित्र कृष्ण गोपाल कलंत्री के गन्ने वाली गली के घर में भी रहे। लखनऊ से सांसद बनने के बाद उनका ठिकाना लंबे वक्त तक मीराबाई मार्ग के गेस्ट हाउस में रहा। बाद में उन्हे ला प्लास कालोनी में आवास आवंटित हो गया।
 अटल कथन -
मेरे पास भारत के लिए एक दृष्टिकोण है- एक भारत जो भूख और भय से मुक्त होएक भारत जो असाक्षरता और अभाव से मुक्त हो। हमें तेजी से विकास करना होगा। हमारे पास दूसरा कोई विकल्प नहीं है- विशेषत: गांव के गरीब लोगों के आर्थिक सशक्तिकरण के लिए।


अटल जी की कुछ कविताएं -

गीत नया गाता हूं
टूटे हुए तारों से फूटे बासंती स्वर
पत्थर की छाती मे उग आया नव अंकुर
झरे सब पीले पात कोयल की कुहुक रात
प्राची में अरुणिम की रेख देख पता हूं
गीत नया गाता हूं
टूटे हुए सपनों की कौन सुने सिसकी
अन्तर की चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी
हार नहीं मानूंगारार नहीं ठानूंगा,
काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूं
गीत नया गाता हूं।

ऊंचाई
जो जितना ऊंचा,
उतना एकाकी होता है,
हर भार को स्वयं ढोता है,
चेहरे पर मुस्कानें चिपका,
मन ही मन रोता है।
मेरे प्रभु!
मुझे इतनी ऊंचाई कभी मत देना,
गैरों को गले न लगा सकूं,
इतनी रुखाई कभी मत देना।

 आओ फिर से दिया जलाएं
आओ फिर से दिया जलाएं
भरी दुपहरी में अंधियारा
सूरज परछाई से हारा
अंतरतम का नेह निचोड़ें-
बुझी हुई बाती सुलगाएं।
आओ फिर से दिया जलाएं

हम पड़ाव को समझे मंज़िल
लक्ष्य हुआ आंखों से ओझल
वतर्मान के मोहजाल में-
आने वाला कल न भुलाएं।
आओ फिर से दिया जलाएं।

आहुति बाकी यज्ञ अधूरा
अपनों के विघ्नों ने घेरा
अंतिम जय का वज़्र बनाने-
नव दधीचि हड्डियां गलाएं।
आओ फिर से दिया जलाएं।
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Tuesday, 14 August 2018

सोमनाथ चटर्जी - निष्पक्षता के कारण हर दल में था सम्मान

( जन्म -  25 जुलाई, 1929 , निधन - 13 अगस्त 2018 )
अपनी निष्पक्षता के लिए मशहूर सोमनाथ दादा  दलगत राजनीति से ऊपर थे इसलिए हर पार्टी के नेता उनका बहुत सम्मान करते थे। एक हिंदूवादी नेता के पुत्र सोमनाथ चटर्जी जीवन भर वामपंथी रहे। उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों की व्यापक जानकारी थी और वे अपने तर्क कौशल के लिए मशहूर थे। सोमनाथ दादा लोकसभा के उत्कृष्ट वक्ताओं के रूप में हमेशा याद किए जाएंगे।  

10 बार लोकसभा के सांसद
सोमनाथ माकपा के टिकट पर लोकसभा के लिए 10 बार चुने गए। उनके संसदीय सफर की शुरुआत 1971 में हुई जब उन्होंने पश्चिम बंगाल के वर्दवान सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जीत हासिल की। वह सीट उनके पिता के निधन के बाद खाली हुई थी। अपने जीवन में सिर्फ एक बार 1984 में ममता बनर्जी ने उन्हें हराया। 11 बार चुनाव जीतने का रिकॉर्ड इंद्रजीत गुप्त के नाम है। सोमनाथ दादा के अलावा अटल बिहारी वाजपेयी और पीएम सईद 10 बार लोकसभा में पहुंच चुके हैं।

असम के तेजपुर में जन्म
सोमनाथ चटर्जी का जन्म 25 जुलाई, 1929 को असम के तेजपुर में हुआ था। उनके पिता निर्मल चंद्र चटर्जी अखिल भारतीय हिंदू महासभा के अध्यक्ष रहे थे और उनकी मां का नाम वीणापाणी देवी था। उनकी शिक्षा-दीक्षा कोलकाता और ब्रिटेन में हुई। उन्होंने ब्रिटेन के मिडल टेंपल से वकालत की पढ़ाई की।

जब माकपा से निष्कासित किया गया
माकपा के यूपीए-एक सरकार से समर्थन वापस ले लेने के बावजूद चटर्जी ने लोकसभा के अध्यक्ष के पद से इस्तीफा देने से इनकार कर दिया था। इस वजह से वरिष्ठ नेता को वर्ष 2008 में माकपा से निष्कासित कर दिया गया था। चटर्जी ने 23 जुलाई 2008 को अपनी जिंदगी का सबसे दुखद दिन बताया था।
सरकार के खिलाफ वोट नहीं दिया
जब मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया तब  सोमनाथ चटर्जी ने पार्टी लाइन से अलग हटकर सरकार के खिलाफ वोट नहीं दिया।
पहले कम्युनिस्ट नेता जो स्पीकर बने
भारतीय राजनीति के एक दिग्गज नेता एवं सांसद सोमनाथ चटर्जी देश के पहले ऐसे कम्युनिस्ट नेता थे जो लोकसभा का अध्यक्ष बने। चटर्जी यूपीए-1 सरकार के दौरान 2004 में सर्वसम्मति से लोकसभा अध्यक्ष चुने गए थे।

शून्यकाल का सीधा प्रसारण
सोमनाथ दादा की पहल पर 5 जुलाई 2006 से शून्यकाल की कार्यवाही का सीधा प्रसारण शुरू किया गया। चटर्जी के कार्यकाल के दौरान ही जुलाई, 2006 में पूर्ण रूप से 24 घंटे चलने वाला लोकसभा टेलीविजन चैनल शुरू किया गया।
सरकारी खर्च पर चाय-पानी बंद कराई
जब सोमनाथ दादा 14वीं लोकसभा के स्पीकर चुने गए तो सबसे पहले  उन्होनेसरकारी खर्चे पर सांसदों के चाय-पानी पर पाबंदी लगाई। हालांकि उनके इस फैसले का विरोध भी हुआलेकिन इसकी परवाह नहीं की।  

उत्कृष्ट सांसद  -
1950 में रेणु चटर्जी से विवाह हुआ।
1968 में माकपा (सीपीएम) के सदस्य बने।
1971 में सोमनाथ चटर्जी पहली बार सांसद चुने गए।
1984 में जादवपुर सीट से ममता बनर्जी से चुनाव हारे, यह उनकी एकमात्र हार थी।
1989 से 2004 तक लोकसभा में सीपीएम संसदीय दल के नेता रहे।
1996 में सोमनाथ चटर्जी को उत्कृष्ट सांसद पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
2009 में स्पीकर का कार्यकाल खत्म होने के साथ ही उन्होंने सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया था।
2010 में उनकी आत्मकथा ''कीपिंग द फेथमेम्वायर्स ऑफ ए पार्लियामेंटेरियन का प्रकाशन हुआ।



Sunday, 12 August 2018

विद्याधर सूरज प्रसाद नायपाल नहीं रहे


वीएस नॉयपाल -  (17 अगस्त 1932 , 11 अगस्त 2018 ) 
अगस्त महीने में तीसरा महान व्यक्ति भी इस दुनिया को अलविदा कह गया। विद्याधर सूरज प्रसाद नैपाल यानी वीएस नायपाल भारतीय मूल के लेखक थे जिन्हें साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला था। पर भारत के बारे में उनके विचार थोड़े कटु थे। 11 अगस्त 2018 को लंदन में 85 साल की अवस्था में वे इस दुनिया को छोड़ गए।
खुद को यथार्थवादी बताने वाले पॉल औपनिवेशवाद की घोर आलोचना करते थे, हालांकि वह खुद किसी सामाजिक आंदोलन में कभी शामिल नहीं हुए।
17 अगस्त सन 1932 को ट्रिनिडाड के चगवानस (Chaguanas) में हुआ। 1950 में वो अध्ययन के लिए छात्रवृत्ति पर इंग्लैंड चले गए। यूनीवर्सिटी कॉलेज, ऑक्सफ़ोर्ड में चार साल बिताने के बाद नायपॉल ने लिखना शुरू किया और फिर दूसरा कोई व्यवसाय नहीं अपनाया। 
रवींद्रनाथ टैगोर के बाद नायपाल को समकालीन दौर में विश्व के महानतम उपन्यासकारों में गिना जाता था। उनहे नूतन अंग्रेज़ी छंद का प्रमुख रचयिता भी गिना जाता है।
उन्होंने अपने जीवनकाल में 30 से ज्यादा विश्व प्रसिद्ध पुस्तकें लिखीं।  साल 1957 में उनका पहला उपन्यास 'द मिस्टिक मैसूर' प्रकाशित हुआ था। साल 1961 में प्रकाशित उनका उपन्यास 'अ हाउस ऑफ मिस्टर बिस्वास' को लिखने में उन्हें तीन साल से ज्यादा का समय लगा।

नायपॉल की द मिमिक मैन को साल 1967 में डब्ल्यू एच स्मिथ अवार्ड मिला। साल 1971 में इन ए फ्री स्टेट  को बुकर प्राइज मिला था, तब वे महज 39 साल के थे। उन्हें 2001 में साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। भारतीय मूल के ब्रिटिश लेखक वीएस नायपॉल को 1990 में 'नाइटहुड' का सम्मान मिला था।

साल 1955 में उन्होंने पेट्रिसिया हेल से शादी की थी। 1996 में उनकी पत्नी हेल का ब्रेस्ट कैंसर के चलते देहांत हो गया। पहली पत्नी के निधन के दो महीने बाद उन्होंने अखबारों में समीक्षा लिखने वाली पाकिस्तान मूल की नादिरा खानुम अल्वी से दूसरी शादी की।
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Wednesday, 8 August 2018

मुत्तुवेल करुणानिधि - तमिल राजनीति का जादूगर

पांच दशक तक तमिल राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा रहे
करुणानिधि का 7 अगस्त 2018 को 94 साल की आयु में निधन हो गया। एक कुशल राजनेता के साथ सफल लेखककविविचारक और वक्ता मुत्तुवेल करुणानिधि का नाम देशके उन वरिष्ठतम नेताओं में शुमार है जो पांच दशक तक तमिल राजनीति के केंद्र में रहे। तमिल फिल्मों की पटकथा लिखते-लिखते करुणा ने तमिल राजनीति की ऐसी पटकथा बुनी कि वहां से कांग्रेस पार्टी सत्ता से बाहर हो गई और उसके बाद की तमिल राजनीति करुणानिधि के आसपास घूमती रही।
कलैनार मतलब कला का विद्वान
करुणानिधि की पार्टी के तकरीबन एक करोड़ समर्थक उन्हें कलैनार कहकर बुलाते हैं। इसका मतलब होता है कला का विद्वान या कला का जादूगर । कई कलाओं में परांगत करुणा के व्यक्तित्व पर यह नाम काफी सही बैठता था। सचमुच वे तमिल राजनीति के जादूगर ही थे।  
50 साल से पार्टी अध्यक्ष
1968 में 26 जुलाई को उन्होंने द्रमुक पार्टी की कमान अपने हाथ में लेने वाले करुणा ने तीन जून 2018 को अपना 94वां जन्मदिन मनाया था। वे 50 साल तक अपनी पार्टी के प्रमुख पद पर विराजमान रहे। राजनीतिक विश्लेषक उन्हें असाधारण संगठनकर्ता मानते हैं।
पेरियार की परंपरा पर चले  
करुणानिधि दक्षिण भारत में ब्राह्मण विरोधी राजनीति का प्रतीक रहे हैं। डीएमके संस्थापक सीएन अन्नादुर्रै और उनके आदर्श पेरियार की तरह करुणानिधि ने भी ब्राह्मणवाद के खिलाफ बिगुल फूंका। उन्होंने एक कार्यक्रम में कहा था कि वह रामायण के आलोचक रहे हैं और आगे भी इसका विरोध करते रहेंगे। सेतुसमुद्रम विवाद के जवाब में करूणानिधि ने हिंदू भगवान राम के वजूद पर सवाल उठाया।करुणा अपनी फिल्मी पटकथाओं में भी विधवा पुनर्विवाहअस्पृश्यता का उन्मूलनआत्मसम्मान विवाहज़मींदारी का उन्मूलन और धार्मिक पाखंड के मुद्दे उठाते रहे और लोकप्रिय होते गए।

14 साल की उम्र में राजनीति में
जस्टिस पार्टी के अलगिरिस्वामी के एक भाषण से प्रेरित होकर मात्र 1साल की उम्र में करुणानिधि दसवीं की पढ़ाई छोड़ सियासत के सफर पर निकल पड़े। दक्षिण भारत में हिंदी विरोध पर मुखर होते हुए करुणानिधि 'हिंदी-हटाओ आंदोलनमें हिस्सा लिया। 1938 में स्कूलों में हिन्दी को अनिवार्य करने पर बड़ी संख्या में युवाओं ने विरोध में हिस्सा लियाकरुणानिधि भी उसमें शामिल थे। 3 जून 1938 को चेन्नई के सैदापेट इलाके से शुरू हुए विरोध प्रदर्शन में उन्होंने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया। तब करुणा दसवीं कक्षा के छात्र थे। राजनीति में प्रवेश के साथ ही उनकी पढ़ाई छूट गई।
तमिलनाडु के औद्योगिक नगर कल्लाकुडी में विरोध प्रदर्शन के दौरान करुणानिधि और उनके साथियों ने रेलवे स्टेशन पर लिखा उसका हिंदी नाम मिटा दिया था और पटरियों पर लेटकर रेलगाड़ियां रोक दीथी। इस विरोध प्रदर्शन में दो लोगों की मौत हो गई थी और करुणानिधि को गिरफ्तार कर लिया गया था। इस विरोध प्रदर्शन से उन्हें काफी प्रसिद्धि हासिल हुई।
'कुदियारासुके संपादक बने
करुणा बेहतरीन भाषण और लेखन शैली को देखकर पेरियार और अन्नादुराई ने करुणा को युवावस्था में ही पत्र 'कुदियारासुका संपादक बना दिया। हालांकि बाद में पेरियार और अन्नादुराई के बीच मतभेद पैदा होने दोनों के अलग होने पर वो अन्नादुराई के साथ चले गए।
 पांच बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री
करुणा 1957 में पहली बार तिरुचिरापल्ली जिले के कुलिथालाई  विधानसभा से चुनाव जीतकर विधायक बने। इसके बाद वे कुल 12 बार विधायक चुने गए। करुणानिधि कुल पांच बार (1969–71, 1971–76, 1989–91, 1996–2001 और 2006–2011) तमिलनाडु के मुख्यमंत्री रहे। सन 1969 में अन्नादुरई का निधन होने पर करुणानिधि को पहली बार मुख्यमंत्री चुना गया। तब उनके नाम के प्रस्तावक एमजी रामचंद्रन थे।

कभी कोई चुनाव नहीं हारे
करुणानिधि ने अपने 60 साल के राजनीतिक करियर में अपनी भागीदारी वाले हर चुनाव में अपनी सीट जीतने का रिकॉर्ड बनाया है। जब उनकी पार्टी हारी तब भी वे अपने क्षेत्र से जीतकर ही आए। 2004 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने तमिलनाडु और पुडुचेरी में डीएमके के नेतृत्व वाली डीपीए (यूपीए और वामपंथी दल) का नेतृत्व किया और लोकसभा की सभी 40 सीटों को जीता।

तमिल सिनेमा के महान पटकथा लेखक
करुणा तमिल सिनेमा जगत के नाटककार और सफल पटकथा लेखक भी रहे। 20 वर्ष की आयु में करुणानिधि ने ज्यूपिटर पिक्चर्स के लिए पटकथा लेखक के रूप में काम शुरू किया। उनकी पहली फिल्म राजकुमारी  काफी लोकप्रियता हुई। पटकथा लेखक के रूप में उनके हुनर में यहीं से निखार आना शुरु हुआ। द्रविड़ आंदोलन से जुड़े करुणा फिल्में में समाजवादी और बुद्धिवादी आदर्शों को बढ़ावा देने वाली ऐतिहासिक और सामाजिक (सुधारवादी) कहानियां लिखने के लिए मशहूर थे। उन्होंने तमिल सिनेमा जगत का इस्तेमाल करके पराशक्ति नामक फिल्म के माध्यम से अपने राजनीतिक विचारों का प्रचार करना शुरू किया। 1952 में आई यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर एक बहुत बड़ी हिट फिल्म साबित हुई। फिल्म का रूढ़िवादी हिंदूओं ने विरोध किया क्योंकि इसमें कुछ ऐसे तत्व शामिल थे जिसने ब्राह्मणवाद की आलोचना की थी। बाद में करुणानिधि ने कई सफल तमिल फिल्मों की पटकथा लिखी जिन फिल्में में एमजी रामचंद्रन ने अभिनय किया। करुणा ने 75 से ज्यादा तमिल फिल्में की पटकथा लिखी जिसमें ज्यादातर फिल्में हिट रहीं।

सफल लेखक और प्रकाशक
करुणानिधि तमिल साहित्य में अपने योगदान के लिए मशहूर हैं। उनके योगदान में कविताएंचिट्ठियांपटकथाएंउपन्यासजीवनी,  ऐतिहासिक उपन्यास,  मंच नाटक,  संवादगाने आदि शामिल हैं। उन्होंने तिरुक्कुरलथोल्काप्पिया पूंगापूम्बुकर के लिए कुरालोवियम के साथ-साथ कई कविताएंनिबंध और किताबें लिखी। उनकी लिखी पुस्तकों की कुल संख्या 100 से अधिक है। सामाजिक सरोकारों पर केंद्रित उनके नाटक भी काफी मशहूर हुए। यही कारण था कि उन्हें जब-तब सेंसरशिप का सामना करना पड़ा। पचास के दशक में उनके दो नाटकों पर प्रतिबंध लगाया गया था। उन्होंने 10 अगस्त 1942 को अखबार मुरासोली का आरम्भ किया। अपने बचपन में वे मुरासोली नामक एक मासिक अखबार के संस्थापक संपादक और प्रकाशक थे जो बाद में साप्ताहिक और फिर दैनिक अखबार बन गया।

पार्टी के लिए जीवन
करुणानिधि अपनी पार्टी डीएमके के प्रति अपनी वफादारी के लिए जाने जाते थे। एक वाकया है जो उनकी पार्टी के प्रति वफादारी को दिखाता है। करुणानिधि के जीवन में एक समय ऐसा भी आयाजब उनकी पहली पत्नी पद्मावती मृत्युशैया पर थींलेकिन वो इनके पास ठहरने के बजाय पार्टी की बैठक के लिए चले गए थे। उनके इस कदम ने पार्टी कार्यकर्ताओं में उन्हें काफी लोकप्रिय बना दिया था और पार्टी में उनका कद काफी बढ़ गया था।

पुश्तैनी घर बना संग्रहालय
करुणानिधि के बचपन का नाम दक्षिणमूर्ति था। 1924 में थिरुक्कुवालाई गांव में जन्में करुणानिधि के घर को अब संग्रहालय में बदल दिया गया है। यहां पोप से लेकर इंदिरा गांधी तक के साथ उनकी तस्वीरें लगी हैं।

तीन शादियां, 4 बेटे और दो बेटियां
करुणानिधि ने तीन शादियां की। उनकी पहली पत्नी पद्मावतीदूसरी पत्नी दयालु अम्माल और तीसरी पत्नी रजति अम्माल हैं। पद्‍मावती का निधन हो चुका हैजबकि दयालु और रजती जीवित हैं। उनके 4बेटे और 2 बेटियां हैं। एमके मुथू पद्मावती के बेटे हैं। जबकि एमके अलागिरीएमके स्टालिनएमके तमिलरासू और बेटी सेल्वी दयालु अम्मल की संतानें हैं। करुणानिधि की तीसरी पत्नी रजति अम्माल की बेटी कनिमोझी हैं।
जयललिता से विरोध
 फिल्मों की पटकथा लिखने के दौरान करुणानिधि की और एमजी रामचंद्रन की जोड़ी खूब जमी। परबाद में इस जोड़ी में दराद पड़ गई और एमजीआर ने द्रमुक से अलग होकर अन्नाद्रमुक पार्टी बनाई। एमजीआर के जीवित रहने तक करुणा उन्हें सत्ता से बाहर नहीं कर पाए पर एमजीआर की विरासत को आगे संभालने वाली जे जयललिता को पराजित करने में उन्हें सफलता मिली। करुणा और जयललिता के बीच राजनीतिक प्रतिद्वंद्धिता कई बार काफी चरम पर देखने को मिली। साल 1996 में करुणानिधि ने जयललिता के घरों में छापा मरवाया था। इस छापे में करोड़ों रुपये बरामद हुए थे। इसके बाद जया को जेल जाना पड़ा था।  इसका बदला जया ने भी लिया। 2001 में जयललिता के निर्देश पर करुणानिधि, उनके पूर्व मुख्य सचिव केए नाम्बिआर और अन्य कई लोगों के एक समूह को चेन्नई में फ्लाईओवर बनाने में भष्टाचार के आरोप में गिरफ्तार भी किया गया।

विरासत के लिए लड़ाई
करुणानिधि की राजनीतिक विरासत को लेकर उनके दो बेटे एमके अलागिरी और एमके स्टालिन में संघर्ष काफी समय तक चला। पर इस संघर्ष में छोटे बेटे स्टालिन हमेशा भारी पड़े। उनके प्रशंसकों की फेहरिस्त भी बड़ी है वहीं वे अलागिरी की तुलना में ज्यादा पढ़े लिखे और कूटनीति में माहिर भी हैं। हालांकि करुणानिधि ने कई मौकों पर सार्वजनिक मंचों से संकेत दे दिया था कि उनके बाद उनकी विरासत को एमके स्टालिन ही संभालेंगे। स्टालिन का चेन्नई क्षेत्र में ज्यादा प्रभाव है तो अलागिरी का मदुरै क्षेत्र में। पर दोनों भाइयों लड़ाई साल 2014 में चरम पर पहुंच गई उसके बाद अलागिरी को द्रमुकप्रमुख ने जनवरी, 2014  पार्टी से बाहर निकाल दिया गया था।  करुणानिधि के पहले बेटे मुथु राजनीति में ज्यादा रूचि नहीं रखते। वहीं उनके चौथे बेटे एमके तमिलारासू बहुत लो प्रोफाइल व्यक्ति हैं।

परिवारवाद को लेकर आलोचनाएं
करुणानिधि कई मौकों पर आलोचना के भी शिकार हुए। खासतौर पर उनके ऊपर परिवारवाद को बढ़ावा देने के आरोप लगे। सबसे पहले अपने बेटे मुत्थु को फिल्मों में हीरो के तौर पर उतारा हालांकि उनकी फिल्मों को ज्यादा सफलता नहीं मिली। पर उनके इस कदम से एमजी रामचंद्रन के साथ उनके रिश्तों में दरार बढ़ी। कहा जाता है कि यहीं से एमजीआर और करुणा की राहें अलग अलग हुईं और एमजीआर ने एआईडीएमके नामक नई पार्टी का गठन किया। इसी तरह बेटों को राजनीति में बढ़ावा देने के कारण वाइको जैसे तेजतर्रार नेता को भी राजनीति में किनारे लगाने का आरोप उनके ऊपर लगा। बाद में उपेक्षा के कारण वाइको डीएमके छोड़कर चले गए। यहां तक की करुणा पर अपने बेटे के लिए मारन बंधुओ की उपेक्षा के भी आरोप लगे।

हमेशा काला चश्मा और पीले शॉल में  
हमेशा आंखों पर मोटा काला चश्मा लगाए रहने वाले करुणा तर्कशील और अंधविश्वास विरोधी होने का दावा करने के बावजदू अपने कंधे पर हमेशा एक पीला शॉल धारण किए दिखाई देते थे। हालांकि वे जीवन भर परंपरागत धार्मिक मान्यताओं का बहिष्कार करते रहे, पर कहा जाता है कि वे वृहस्पति की शांति के लिए ऐसा करते थे। करुणा पहले मांसाहारी थे पर बाद में शाकाहारी हो गए। बुजुर्ग होने पर भी राजनीति में काफी सक्रिय रहने के पीछे बताया जाता है कि वे नियमित योगाभ्यास किया करते थे। हालांकि आखिरी दिनों में वे चलने फिरने में लाचार हो गए थे। तब उनके लिए एक विशेष ह्वील चेयर का निर्माण कराया गया था, जिसके सहारे वे चलते फिरते दिखाई देते थे।
कार्यकर्ताओं को हर रोज पाती
करुणानिधि ने अपनी राजनीतिक विचारधाराओं और मुद्दों के प्रसार के लिए एक पत्रकार और कार्टूनिस्ट के रूप में भी अपनी प्रतिभा का खूब उपयोग किया। वे अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को रोज चिट्ठी लिखा करते थे। यह सिलसिला उनके बुजुर्गु होने तक तकरीबन 50 साल तक चलता रहा।

अपना मकान दान किया
करुणानिधि अपने जीवन काल में ही अपना विशाल मकान दान करने का एलान कर चुके हैं। उनकी इच्छा के मुताबिक उनकी मौत के बाद उनके घर को गरीबों के लिए अस्पताल में तब्दील कर दिया जाएगा।
करुणा के जीवन पर किताब
करुणानिधि के जीवन पर हाल में एक पुस्तक आई है करुणानिधि ए लाइफ इन पॉलिटिक्स। चेन्नई की पत्र संध्या रविशंकर की यह पुस्तक हार्पर कॉलिन्स ने प्रकाशित की है। पुस्तक उनके बचपन और राजनीतिक संघर्ष पर प्रकाश डालती है। पुस्तक में तमिल आंदोलन, करुणानिधि का लिट्टे जैसे संगठन के प्रति झुकाव आदि मुद्दों पर भी प्रकाश डाला गया है।

तमिल राजनीति में योगदान
-    मुख्यमंत्री रहते हुए सामाजिक न्याय के लिए तमाम योजनाएं चलाई।
-    गरीब तबके के कल्याण के लिए कई योजनाएं चलाई।
-    द्रविड़ पहचान और तमिल भाषा के विकास के लिए काम किया।  
-    पांच बार मुख्यमंत्री रहने के दौरान तमिलनाडु के औद्योगिक विकास के लिए काफी काम किया।
-    कन्याकुमारी में तमिल कवि संत तिरुवल्लुर की विशाल प्रतिमा लगवाई।  

जीवन सफर करुणानिधि
1924 -  3 जून को नागापटट्नम के थिरुक्कुवालाई में जन्म हुआ, 7 अगस्त 2018 को चेन्नई में निधन। 

1938 हिंदी विरोधी आंदोलन में हिस्सा लिया
1942 मुरासोली पत्र का प्रकाशन आरंभ किया
1957 पहली बार विधायक बने
1961 - डीएमके कोषाध्यक्ष बने
1962 - राज्य विधानसभा में विपक्ष के उपनेता बने 
1967 पहले गैर कांग्रेसी सरकार में कैबिनेट मंत्री बने
1968 द्रमुक पार्टी के अध्यक्ष बने
1969 पहली बार मुख्यमंत्री बने
1970 - पेरिस में आयोजित तीसरे विश्व तमिल सम्मलेन में भाषण दिया
1971 अन्नामलाई विश्वविद्यालय  ने मानद डॉक्टरेट की उपाधि दी।
1987 - कुआलालम्पुर में छठे विश्व तमिल सम्मेलन में भाषण दिया
1999  - एनडीए गठबंधन का हिस्सा बने
2004 यूपीए गठबंधन का हिस्सा बने
2006 आखिरी बार मुख्यमंत्री बने