Sunday, 9 December 2018

गुरु नानकदेव की पवित्र धरती पर उमड़ा लघु भारत


देश के 30 से ज्यादा राज्यों से 4000 से ज्यादा नौजवान जुटे पंजाब की पवित्र धरती सुल्तानपुर लोधी में 3 से 10 दिसंबर के बीच। सुल्तानपुर लोधी की वह पवित्र धरती जहां पहले गुरु गुरुनानक देव जी ने अपने जीवन के 15 साल गुजारे।

श्री गुरुनानक देव जी के 550 वें प्रकाश पर्व को समर्पित शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी अमृतसर द्वारा राष्ट्रीय युवा योजना के सहयोग से गुरु नानक स्टेडियम में सात दिवसीय अंतर राष्ट्रीय सद्भावना और प्रगतियोगिता शिविर तीन दिसंबर को उत्साह के साथ आरंभ हुआ। शिविर में नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, इंडोनेशिया सहित देश के 30 राज्यों से लगभग 4000 के करीब युवा शामिल हुए। वैसे तो शिविर की तारीख 3 से 10 दिसंबर है पर युवाओं के आने का सिलसिला तीन दिन पहले से ही जारी हो गया।

देश के कोने कोने से आए युवा गुरुद्वारा बेर साहिब, गुरुद्वारा बेबे नानकी के कमरे में तंबूओं में और बरामदे में डेरा डाले हैं। पंजाब में दिसंबर की कंपकपाती ठंड में उनमें एक अजब उत्साह नजर आ रहा है। पंजाब के कपूरथला जिले के छोटे से इस शहर में एक सप्ताह तक लघु भारत के दर्शन होते रहे।

गुरु साहिब की शिक्षाओं को आत्मसात करें
शिविर के उद्घाटन समारोह दौरान राष्ट्रीय युवा योजना के संस्थापक डॉक्टर एसएन सुब्बाराव ने संबोधित करते कहा कि पहले पातशाही श्री गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं से प्रेरित होकर यह शिविर लगाया जा रहा है ताकि देश ही नही दुनिया के अन्य लोग भी गुरु साहिब की शिक्षाओं से अवगत हो सकें। सुब्बाराव ने कहा बुनियाद में सभी धर्मों का संदेश एक है। हिंदू, मुसलमान, ईसाई सहित सभी धर्म मानवता का संदेश देते हैं। हमारे लिए जीवन में सच्चा इंसान बनाना महत्वपूर्ण है। गुरु नानक देव जी ने कहा था- एक नूर ते सब जग उपजया, कौन भले कौन मंदे। यानी दुनिया के सभी धर्मों के लोग एक समान हैं।

इस सात दिवसीय अंतराष्ट्रीय सदभावना शिविर में केंद्रीय सामाजिक न्याय मंत्री थावर चंद गहलोत भी पहुंचे। उन्होंने कहा कि दुनिया में सद्भावना, समरसता और समता की जरूरत है। सभी लोग विश्व शांति की परिकल्पना करते हैं लेकिन अपने विचारों को उस तरफ अग्रसर नहीं रहते। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि पूरी दुनिया एक परिवार है जिसके हम सदस्य हैं। सभी को अपने कर्तव्यों को लेकर सजग होना चाहिए तभी देश तरक्की कर बुलंदियों को छू सकेगा।

इस मौके पर केंद्रीय सामाजिक न्याय व अधिकारिता राज्य मंत्री विजय सांपला ने कहा कि युवा शक्ति देश में परिवर्तन ला सकती है और युवाओं को पहले अपना कर्तव्य समझना होगा और फिर उसे निभाना होगा। 
अंतरराष्ट्रीय सदभावना कैंप के छठे दिन वालंटियरों की ओर से चेतना रैली निकाली गई। इस रैली को विधायक नवतेज सिंह चीमा की ओर से रैली को हरी झंडी देकर रवाना किया गया। इस चेतना रैली की शुरुआत गुरु नानक स्टेडियम से की गई जो गुरुद्वारा बेर साहिब से होती हुई निर्मल कुटिया सुल्तानपुर लोधी में खत्म हुई।

काली बेई नदी को साफ करने वाले चर्चित संत बलबीर सिंह सीचेवाल ने वालंटियरों का स्वागत किया व उनको आशीर्वाद किया। संत सीचेवाल ने वालंटियरों को संबोधित करते कहा कि युवा पीढ़ी वातावरण संभालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। उन्होंने कहा कि युवाओं को अधिक से अधिक पौधे लगा कर उसकी संभाल करनी चाहिए।

प्लास्टिक फ्री सुल्तानपुर लोधी -  राष्ट्रीय युवा योजना के शिविरों में श्रमदान महत्वपूर्ण होता है। इस शिविर के दौरान युवाओं ने प्लास्टिक मुक्त सुल्तानपुर लोधी अभियान चलाया। पूरे शहर को प्लास्टिक कचरे से मुक्त करने के लिए हजारों हाथ उठ पड़े। इस दौरान स्वच्छ्ता अभियान, गुरुद्वारा साफ सफाई, रक्तदान शिविर, शासकीय अस्पताल की सफाई, रेलवे स्टेशन सफाई,  भाषा ज्ञान, सांस्कृतिक ज्ञान, जोड़ो भारत अभियान के बारे में भी सीखने का अवसर युवाओं को प्राप्त हुआ।

शिविर के आयोजन से जुड़े गुरुदेव सिंह सिद्धू कहते हैं कि पंजाब में इससे पहले 2500 युवाओं का शिविर आनंदपुर साहिब में लगा था। चार हजार से अधिक युवाओं का शिविर इस लिहाज से महत्वपूर्ण है कि देश भर से आए युवा जाति धर्म के नाम पर झगड़े खत्म करने का संदेश लेकर जा रहे हैं।
 - vidyutp@gmail.com  
( NYP, SULTANPUR LODHI ) 


Saturday, 24 November 2018

और अंडमान के लोगों ने उसे मार डाला...


अंडमान निकोबार में कई ऐसे प्रतिबंधित द्वीप हैं जहां भारतीय या विदेशी नागरिकों को जाने से मनाही है। ऐसा उन आदिम जातियों के संरक्षण के ख्याल से किया गया है। उनकी कम होती संख्या चिंता का विषय बन चुकी है। पर साल 2018 के अक्तूबर नवंबर महीने में एक अमेरिकी नागरिक ने सेंटनिलीज लोगों के द्वीप पर जाने की कोशिश की और वह मारा गया।

अंडमान के सेंटिनल द्वीप में नवंबर 2018 में मारे गए 27 साल के अमेरिकी नागरिक जॉन ऐलन चाऊ का मकसद इन अनजान आदिवासियों के बीच ईसाई धर्म का प्रचार करना था। चाऊ ने दो बार इस द्वीप पर पहुंचने की कोशिश की थी। 14 नवंबर को उसकी पहली कोशिश नाकाम रही थी। इसके बाद 16 नवंबर को वह पूरी तैयारी के साथ पहुंचा था। पर गुस्साए आदिवासियों ने उस पर तीर से मार डाला। चाऊ इससे पहले पांच बार अंडमान आ चुका था।
जॉन ऐलन चाऊ सात मछुआरों के साथ बिना इजाजत एडवेंचर ट्रिप पर नॉर्थ सेंटिनल द्वीप गया था। वह सेंटिनेलीज जनजाति के लोगों के साथ मित्रता की कोशिश कर रहा था। पर कहा जा रहा है कि जनजातीय लोगों ने उसकी हत्या कर उसके शव को रेत में ही गाड़ दिया।

अंडमान में सेंटनिलीज के हमले में नवंबर 2018 में मारे गए अमेरिकी युवक पर पहले दिन जनजातीय लोगों ने तीर से हमला किया था। पर छाती पर रखे बाइबिल के कारण उसकी तब जान बच गई। नाव वापस लौटने के बाद उसने नोट्स में लिखा-  हे पिता उन्हें क्षमा कर देना।

दरअसल स्थानीय मछुआरों की सहायता से छोटी सी नाव में उत्तर सेंटनील द्वीप पर जाकर जॉनने 16 नवंबर जनजातीय लोगों के मिलने की कोशिश की थी। उसके हाथ में एक फुटबॉल औरबाइबिल था। उसने द्वीप पर जनजातीय लोगों से बात करने की कोशिश की। पर तब एक दससाल की आसपास के उम्र के सेंटनिलीज ने जॉन एलन पर तीर चलाकर हमला किया था। पर तबउसने अपने सीने पर बाइबिल रखा हुआ था। उसकी जान बच गई। इसके बाद जॉन अपनी नाव परलौट आया। रात को उसने अपने पहले दिन के संस्मरण के नोट्स लिखे थे। इसमें जॉन ने लिखा है- मैंने उनसे कहा, मेरा नाम जॉन है। मैं आपको प्यार करता हूं। जीसस भी आपको प्यार करते हैं।मैं आपके लिए फुटबॉल और मछलियां लाया हूं। पर उसका संवाद सफल नहीं हुआ। हमले सेबचकर वह पहले दिन अपनी नाव पर लौट आया। अगले दिन वह दोबारा द्वीप पर पहुंचा। पर इसबार वह वापस नहीं लौट सका।

अमेरिकी नागरिक जॉन एलन चाउ पिछले माह  16 अक्टूबर को अंडमान निकोबार पहुंचा था।अपने एक दोस्त के घर रुकने बाद उसने सेंटेनिलीज आदिवासियों से मिलने की इच्छा जाहिर कीथी। अंडमान के सीआईडी के अधिकारी ने बाया कि जॉन एलन चाऊ एक ईसाई मिशनरी से जुड़ाथा और वो इन आदिवासियों के बीच धर्म प्रचार करना चाहता था।
 चाउ के परिवार ने भी माफ किया
चाऊ के परिवार ने इंस्टाग्राम पर बयान जारी कर उसके निधन पर दुख जताया है। परिवार नेलिखा है कि वह एक प्यारा पुत्र, भाई, अंकल था। उसके दिल में सेंटनिलीज के प्रति प्यार था। हमउन लोगों को माफ करते हैं जो उसकी मौत के लिए जिम्मेवार हैं। साथ ही हम चाहते हैं कि उसकेउन दोस्तों रिहा कर दिया जाए जिन्होंने अंडमान में उसकी मदद की। परिवार ने अपने बयान में स्वीकार किया कि उसका बेटा ईसाई मिशनरी था। लेकिन वह एक फुटबॉल कोच और पर्वतारोहीभी था। वह दूसरों की मदद करने को तत्पर रहता था।
अंडमान के डीजीपी दीपेंद्र पाठक ने मीडिया को बताया चाऊ छठी बार पोर्ट ब्लेयर की यात्रा कर रहा था। उसने मछुआरों को उत्तरी सेंटिनल द्वीप जाने में मदद के लिए25 हजार रुपये दिए। मछुआरे 15 नवंबर की रात उन्हें आइलैंड के पश्चिमी सीमा तक एक छोटी नाव से ले गए। वहां से अगले दिन चाऊ एक नाव लेकर अकेले ही आइलैंड तक गए। पुलिस ने 13 पन्नों का नोट अपने कब्जे में ले लिया है जिसे चाऊ ने लिखा था और द्वीप पर जाने से पहले मछुआरों को सौंप दिया था।
60 हजार पुराना आदिवासियों का कबीला
पोर्ट ब्लेयर से 50  किमी दूर सेंटिनेल द्वीप पर दुनिया से कटे आदिवासियों की तादाद बेहद कम है। इस द्वीप पर आदिवासियों का यह बेहद विलुप्तप्राय समुदाय रहता है। अंडमान निकोबार के नॉर्थ सेंटिनल द्वीप में 60 हजार साल पुराना आदिवासियों का कबीला है। इस समूह से मिलने की इजाजत किसी को नहीं है। साल 2006 में रास्ता भटकर सेंटिनेल द्वीप पर पहुंचे दो नाविकों को भी सेंटिनेलीज ने मार डाला था।
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Friday, 16 November 2018

मेहनत के बल मुकाम हासिल कर रहीं महिलाएं

आज पत्रकारिता में महिलाएं अपनी मेहनत के बल पर मुकाम हासिल कर रही हैं। जिन महिलाओं ने सतत संघर्ष का रास्ता चुना है उन्हें पहचान मिली है। मीटू कंपेन और कार्य स्थल पर शोषण की चर्चाओं के बीच हालात इतने निराशाजनक नहीं है जितने कि सुनने में आ  रहे हैं। कुछ इस तरह के विचार छनकर आए 14 नवंबर को हिंदू कालेज के सेमिनार हाल में आयोजित हुए मीडिया में महिलाएं – चुनौतियां और भविष्यपर हुए सेमिनार में। कार्यक्रम का आयोजन हिंदी पत्रकारिता के पुरोधा शिक्षक डॉक्टर रामजी लाल जांगिड के सानिध्य में भारतीय जनसंचार संघ और हिंदू कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय के नारी विकास प्रकोष्ठ द्वारा किया गया ।

रामजी सुतार को भारत गौरव सम्मान
सेमिनार की शुरुआत में देश के जाने में मूर्तिकार राम वन जी सुतार को भारत गौरव सम्मान से नवाजा गया। 93 सालके रामवन जी सुतार जिन्होंने दुनिया की सबसे ऊंची 182 मीटर की सरदार पटेल की प्रतिमा स्टैच्यू ऑफ यूनिटी बनानेमें अपना योगदान किया है वे इस आयोजन के हीरो रहे। हर कोई उनसे मिलना बातें करना और उनके साथ एक सेल्फी खिंचवाने को आतुर था। सीधे, सरल और सौम्य रामजी ने भी सबको मौका दिया।
सम्मान समारोह के तहत आधात्म से युवाओं को जोड़कर सतत समाजसेवा करने वाली साध्वी प्रज्ञा भारती को भारत गौरव सम्मान से नवाजा गया। वहीं हरियाणा सरकार के पूर्व मुख्य सचिव और राम पर दो पुस्तकों के लेखक प्रोफेसर राम सहाय शर्मा,  कुष्ठ रोगियो के लिए लगातार काम करने वाले झारखंड के लक्ष्मी निधि, देश की राजनीति पर पैनी नजर रखने वाले सजग युवा पत्रकार संजय मिश्र, सम्मोहन चिकित्सा के विशेषज्ञ प्रोफेसर राम प्रकाश शर्मा, आयुर्वेद पर कई पुस्तकों के लेखक प्रोफेसर हीरा लाल शर्मा समेत कई लोगों को समाज में सार्थक बदलाव लाने के लिए उल्लेखनीय योगदान करने लिए सम्मानित किया गया।


चलो गांव की बात करें - इस मौके पर सिविल सेवा छोड़ समाज सेवा में आने वाले डाक्टर कमल टावरी ने कहा कि तमाम पेंशन पाने वाले और समाज सेवा मेंरुचि रखने वाले लोग अगर आएं तो बिना किसी सरकारी फंड के निजी प्रयासों से देश के गावों के सूरत बदल सकते हैं। देश के 8000 प्रखंडों की सूरत बदलने और युवाओं को रोजगार देने के लिए ऐसे लोगों को आगे आने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि अ-सरकारी काम ही असरकारी हो सकता है।  


वरिष्ठ पत्रकार शेष नारायण सिंह और प्रदीप माथुर ने मीडिया में कामकाज के व्यवहारिक पहलुओं पर प्रकाश डाला। उनका कहना था कि मीडिया की दुनिया वास्तव में वैसी नहीं है जैसी बाहर से लोगों को लगती है।


इस मौके पर दानापानी ब्लॉग के लेखक और मॉडरेटर विद्युत प्रकाश मौर्य को राष्ट्रीय एकता सम्मान प्रदान किया गया। ब्लॉगिंग के द्वारा देश के 35 राज्यों के समाज और संस्कृति से परिचित कराने और शाकाहार को बढावा देने के लिए उन्हे इस सम्मान के लिए चुना गया। 
मुश्किलों में रास्ता बनाएं - 

मीडिया में महिलाओं की स्थिति और उनके संघर्ष पर जीडी गोयनका यूनिवर्सिटी की एसोसिएट प्रोफेसर डाक्टर शिल्पी झा ने प्रकाश डाला। शिल्पी झा ने कहा, मुश्किलें तो आएंगी पर घबराने की कोई जरूरत नहीं है, अगर आपमें प्रतिभा है तो रास्ते खुलते रहेंगे। डाक्टर श्याम शर्मा ने रेडियो और दूरदर्शन में महिलाओं की स्थित पर चर्चा की। वहीं विद्युत प्रकाश ने ट्रेवल ब्लागिंग में महिलाओं की उपलब्धियों पर प्रकाश डाला।



कार्यक्रम में अतिथियों का स्वागत हिंदू कालेज के प्रोफेसर रामेश्वर राय और वीमेन डेवलपमेंट सेल की दीपिका शर्मा ने किया। कार्यक्रम के दूसरे सत्र की अध्यक्षता जानकीदेवी मेमोरियल कालेज की प्राचार्य डॉक्टर स्वाति पाल ने की।


निष्पक्षता बनाए रखना चुनौती - इस मौके पर वरिष्ठ पत्रकार और शिक्षक डाक्टर रामजीलाल जांगिड ने कहा कि मीडिया आज हर क्षेत्र को प्रभावित करता है। मीडिया से कोई भी अछूता नहीं रह सकता है। इसलिए हर सत्ता मीडिया पर अपना काबू रखना चाहती है। ऐसे दौर में मीडिया की निष्पक्षता बनाए रखना पत्रकारों के लिए चुनौती है। इस मौके पर दुनिया के 2000 से ज्यादा भाषायी पत्रकारों को प्रशिक्षित कर चुके डॉक्टर जांगिड को सभी लोगों ने उनके 80 साल पूरे करने पर बधाई भी दी। 

महिला पत्रकारों मे पैनी दृष्टि -  राजकीय महिला आवासीय पोलीटेक्निक  जोधपुर में डाक्टर अनुलता गहलोत ने मीडिया में स्त्रियों के संघर्ष और उनकी क्रमिक तौर पर बढ़ती पहचान पर शोध पत्र पेश किया। उनका विचार था कि महिला पत्रकारों में प्रतिभा के साथ पैनी दृष्टि भी है। वे संवेदनशीलता,दक्षता और आत्मविश्वास से भरी हैं। अभी हिंदी पत्रकारिता का स्वर्ण काल आना शेष है। पर इस काल में महिलाओं की विशेष भागीदारी होगी। 

कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार और रेलवे से अवकाश प्राप्त जगदीश चंद्र, प्रिंट और टीवी के वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया प्लानर रामहित नंदन, लेखिका पारुल जैन समेत मीडिया जगत की प्रमुख हस्तियां मौजूद थीं। शिक्षा जगत से डाक्टर शारदा जैन, डाक्टर अनीता गर्ग (दौलत राम कॉलेज) और दौलत राम कालेज की प्रिंसिपल डाक्टर सविता राय ने भी अपनी मौजूदगी से कार्यक्रम की शोभा बढाई। 

---vidyutp@gmail.com 
( SEMINAR, MEDIA, HINDU COLLEGE ) 

Sunday, 28 October 2018

भारतीय रेल में 200 किलोमीटर प्रतिघंटे रफ्तार का लोकोमोटिव


सेमी हाई स्पीड ट्रेन चलाने की दिशा में कदम आगे बढ़ते हुए रेलवे ने 200 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार पर दौड़ने वाला पहला एयरोडायनामिक लोकोमोटिव को बना लिया है। ऐसा पहला इंजन भोपाल शताब्दी एक्प्रेस में लगाया जाएगा।

 2014 में डब्ल्यूएपी-5 यात्री इंजन की रफ्तार 200 किलोमीटर प्रतिघंटा बढ़ाने काम चितरंजन लोकोमोटिव वकर्स ने शुरू किया था।
2000 से बन रहे इस लोकोमोटिव में तकनीकी सुधार कर इसकी गति बढ़ाई गई है।
05 लोकोमोटिव को 200 किलोमीटर तक स्पीड बढ़ाने पर सीएलडब्लू में काम चल रहा है।
131 इलेक्ट्रिकल इंजन बनाने की योजना है सेमी हाई स्पीड ट्रेन चलाने के लिए
160 किलोमीटर प्रतिघंटा अधिकतम स्पीड है वर्तमान में पुरानी तकनीक के डब्ल्यूएपी लोकोमोटिव की।

तेज गति और सुरक्षित सफर
-15 फीसदी तक बढ़ेगी ट्रेन की औसत रफ्तार इस बदलाव से।
- 7 फीसदी तक ऊर्जा की बजत होगी इस इंजन से रेल मंत्रालय के दावों के मुताबिक।
- तकनीकी में बदलाव से हाई स्पीड इंजन का पिकअप बढ़ेगा साथ ही ब्रेक सिस्टम तेज हो जाएगा।
- इंजन को एयरोडायनिमक बनाने के साथ ही ट्रैक्शन मोटर व्हील बदले गए हैं।
- इंजन में वॉयस और वीडियो रिकॉर्डर होगा। लोको पायलट संरक्षा नियमों की अनदेखी नहीं कर पाएंगे।
- इंजन अत्याधुनिक आईजीबीटी आधारित प्रोपल्सन सिस्टम से लैस। ड्राइवर केबिन में भी बदलाव।

23 साल बाद अपग्रेडेशन
- 1995 में जर्मनी से डब्ल्यूएपी-5 मॉडल के 10 इंजन खरीदे थे। इन इंजनों की अधिकतम रफ्तार 160 किलोमीटर प्रतिघंटा थी।
- 2000 में सीएलडब्लू में डब्लूएपी -5 मॉडल का निर्माण शुरू किया गया।
- 95 लोको डब्लूएपी -5 के अब तक बनाए जा चुके हैं।
- 75 प्रमुख यात्री गाड़ियां दौड़ती हैं डब्लूएपी -5 से, यह देश का सबसे तेज गति का इंजन है।
- 23 साल बाद अब इस मॉडल के लोको की गति बढ़ाने पर काम किया गया है।

सेमी हाईस्पीड के लिए ट्रैक अपग्रेडेशन
भारतीय रेल के नेटवर्क के वर्तमान ट्रैक सेमी हाईस्पीड के इंजन दौड़ाने के लिए तैयार नहीं हैं। पर अब प्रमुख ट्रैक को अपग्रेड करने पर काम चल रहा है।
- 20 हजार करोड़ खर्च किए जा रहे हैं दिल्ली-हावड़ा व दिल्ली-मुंबई रूट को सेमी हाई स्पीड बनाने के लिए।
- 2020 तक सेमी हाईस्पीड के लायक हो जाएंगे दो प्रमुख रेल मार्ग
- 09 प्रमुख रेल मार्ग को देश में सेमी हाईस्पीड किए जाने की योजना है।
- 6400 किलोमीटर का ट्रैक को सेमी हाईस्पीड में अपग्रेड किए जाने की योजना है।

भारतीय उप महाद्वीप में भारत पहला देश होगा जहां सेमी हाईस्पीड वाली ट्रेने रफ्तार भरेंगी। पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका के मुकाबले भारतीय रेल का नेटवर्क तकनीक के मामले में काफी आगे है। 

 सेमी हाईस्पीड बनाम हाईस्पीड ट्रेन
160 से 245 किलोमीटर प्रति घंटा गति मानी जाती है सेमी हाईस्पीड रेल की।
110 से 140 किमी स्पीड मानी जाती है एक्सप्रेस ट्रेन की।
250 किलोमीटर से ज्यादा होती है हाईस्पीड (बुलेट ) ट्रेन की गति।

भारत कितने पीछे
हाईस्पीड रेल नेटवर्क वाले देश
1964 में पहली हाईस्पीड ट्रेन जापान में चली थी।
( जापान, चीन, इटली, जर्मनी, फ्रांस, अमेरिका, सऊदी अरब, स्पेन, ग्रेट ब्रिटेन, तुर्की, रुस, उजबेकिस्तान, आस्ट्रिया, बेल्जियम, नीदरलैंड में है हाईस्पीड ट्रेन नेटवर्क )

एशियाई देशों में हाईस्पीड नेटवर्क
भारत के अलावा इंडोनेशिया, ताइवान, और दक्षिण कोरिया जैसे एशियाई देशों में भी हाईस्पीड रेल नेटवर्क पर काम चल रहा है।


Saturday, 13 October 2018

चले जाना आज के भागीरथ का..


भागीरथ बड़ी तपस्या और लंबी कोशिश के बाद गंगा को धरती पर उतार लाए थे। पर आज हम जीवनादायिनी गंगा को अविरल और निर्मल रखने में नाकाम साबित हो रहे हैं। 11 अक्तूबर 2018 को गंगा पुत्र और महान पर्यावरणविद स्वामी ज्ञानस्वरुप सानंद यानी जीडी अग्रवाल ने 112 दिन आमरण अनशन के बाद दम तोड़ दिया।


22 जून 2018 से जीडी अग्रवाल गंगा सफाई की मांग को लेकर 'आमरण अनशन' पर बैठे हुए थे। उनकी प्रमुख मांग थी कि गंगा और इसकी सह-नदियों के आस-पास बन रहे हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट के निर्माण को बंद किया जाए। पर्यावरणविद् जीडी अग्रवाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने छोटे भाई के रूप में संबोधित करते हुए गंगा सफाई के लिए तीन बार बड़ा ही भावुक पत्र लिखा था, लेकिन उन्हें एक भी पत्र का कोई जवाब नहीं मिला।


जीडी अग्रवाल का जन्म कांधला जिला मुजफ्फरनगर में 20 जुलाई 1932 को हुआ था। वे आईआईटी कानपुर में प्रोफेसर रह चुके थे। उन्होंने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य की ज़िम्मेदारी भी उन्होंने निभाई। यूनिवर्सिटी ऑफ बर्कले से पीएचडी करने वाले और आगे चलकर आईआईटी कानुपर में सिविल एंड एन्‍वायरनमेंटल इंजीनियरिंग के हेड बने।  बाद में उन्होने संन्यास लिया और अपना नाम स्वामी ज्ञान स्वरूप उर्फ सानंद रखा। प्रो. अग्रवाल ने 2008-2012 के बीच 4 बार गंगा नदी की रक्षा के लिए अनशन किया। 

इससे पहले 2011 में स्वामी निगमानंद की मौत
गंगा की खातिर 114 दिन तक अनशन करते हुए इससे पहले स्वामी निगमानंद की भी मौत हुई थी। गंगा में खनन पर रोक लगाने की मांग को लेकर अनशन पर गए निगमानंद सरस्वती का 13 जून 2011 को देहरादून स्थित जौलीग्रांट अस्पताल में निधन हो गया था। 


मदन मोहन मालवीय और गंगा सभा -  (1916 ) गंगा को अविरल बहने देने को कोशिशें काफी पुरानी है। आजादी से पहले मदन मोहन मालवीय ने 1916 में गंगा सभा के मंच से इसके लिए प्रयास किए थे। उन्होंने हरिद्वार के तीर्थ पुरोहितों के साथ मिलकर गंगा सभा की स्थापना की थी। तब मालवीय जी ने गंगा पर बांध बनाए जाने की ब्रिटिश सरकार की योजना का विरोध किया था। 

राम तेरी गंगा मैली – 1980 के गंगा जल के प्रदूषित होने का मामला पर्यावरणविदों द्वारा जोर शोर से उठाया जाना लगा था। साल 1985 में राजकपूर  की फिल्म राम तेरी गंगा मैली ने गंगा के प्रदूषण के मुद्दे को एक प्रेम कथा के माध्यम से उठाया था। इससे आम जन मानस तक गंगा के मैली होने का संदेश पहुंचा था।

स्वच्छ गंगा फाउंडेशन – प्रधान मंत्री राजीव गांधी ने 1984 के बाद गंगा की सफाई के लिए सरकारी स्तर पर प्रयास शुरू करवाए थे। उसके बाद गंगा की सफाई के लिए हजारों करोड़ खर्च किए जा चुके हैं। पर गंगा अभी मैली ही है।

गंगा सागर से गंगोत्री तक साइकिल यात्रा -  सुंदरलाल बहुगुणा – गंगा सागर से गंगोत्री साइकिल यात्रा – 1991 में पर्यावरणविद सुंदर लाल बहुगुणा ने गंगा पर देश व्यापी चेतना के लिए गंगा सागर से गंगोत्री तक साइकिल यात्रा निकाली थी। इस यात्रा में 40 से ज्यादा लोगों के दल ने कई महीने में देश के अलग अलग राज्यों में अलख जगाया था।
- विद्युत प्रकाश मौर्य

Wednesday, 10 October 2018

जल जंगल जमीन के लिए एक बार फिर जुटे 25 हजार लोग


गांधी जयंती के मौके पर 2 अक्तूबर 2018 को मध्यप्रदेश के ग्वालियर में कई राज्यो से आए 27 हजार किसानों ने एक बार फिर अपनी आवाज बुलंद की। ये भूमिहीन 2007 से लगातार आंदोलनरत हैं।
यहां जुटे हजारों भूमिहीनों ने केंद्र सरकार को चेतावनी दी कि अगर जमीन देने सहित उनकी अन्य मांगें नहीं मानी तो अगले लोकसभा चुनाव में सरकार गिरा देंगे। मेला मैदान में जमा हुए हजारों भूमिहीनों में केंद्र सरकार के रवैए को लेकर खासी नाराजगी है।

इस मौके पर एकता परिषद के संस्थापक पीवी राजगोपाल ने कहा, केंद्र सरकार ने अगर मांगें नहीं मानी तो 2019 के लोकसभा चुनाव में नतीजे भुगतने को तैयार रहे। राजगोपाल के आह्वान पर वहां मौजूद लोगों हजारों लोगों ने दोहराया कि अगर केंद्र सरकार ने अगर उनकी मांगें नहीं मानी तो आने वाले चुनाव में केंद्र में मोदी के नेतृत्व में सरकार नहीं बनेगी।


राजगोपाल का कहना है कि अपना हक पाने के लिए अपनी ताकत का अहसास कराना जरूरी हो गया है, केंद्र सरकार से गरीब व वंचित वर्गो को उनका हक दिलाने की बातचीत चल रही है, अगर इन मांगों को नहीं माना जाता है तो इस वर्ग को आगामी चुनाव में अपनी ताकत दिखानी होगी।


एकता परिषद के अध्यक्ष रणसिंह परमार ने जनसंसद के प्रांरभ में सभी आगंतुक सत्याग्रहियों और अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि महात्मा गांधी के जयंती के अवसर पर किया जाने वाला यह आंदोलन गांधी को सड़क पर उतारने की कोशिश है जिससे कि देश में भूमि सुधार लागू किया जा सके।

जनांदोलन के पहले दिन आए जलपुरुष राजेंद्र सिंह ने कहा कि वर्तमान दौर में सरकारों का नजरिया बदल गया है। वह जनता नहीं, उद्योगपतियों के लिए काम करती हैं। यही कारण है कि देश में जल, जंगल और जमीन पर उद्योगपतियों का कब्जा होता जा रहा है।


जनांदोलन में हिस्सा लेने आए गांधीवादी सुब्बाराव ने आजादी के सात दशक बाद भी लोगों को छत न मिलने और जमीन न होने का जिक्र किया। सुब्बाराव ने कहा, बंदूक की दम पर कोई स्थायी परिवर्तन नहीं हो सकता अहिंसात्मक तरीके से ही समाज परिवर्तन की लड़ाई लडनी होगी। गांधी जी को स्मरण करने का सबसे बेहतर तरीका सत्याग्रह है जिसके दम पर उन्होने देश को आजादी दिलायी। उन्होंने कहा कि बिना हथियार के दम पर संघर्ष जारी रहेगा और सफलता भी मिलेगी।

भूमिहीनों के मार्च को असम के पूर्व मुख्यमंत्री प्रफुल्ल चंद्र महंथ,  बीजेपी के पूर्व नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा, चिंतक और विचारक गोविंदाचार्य का भी साथ मिला। 

कई राज्यों के लोग पहुंचे - इस यात्रा में मध्य प्रदेश , छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, असम समेत कई राज्यों के भूमिहीन और आदिवासी हिस्सा लेने पहुंचे।  दो अक्तूबर तक देश भर से 27060 सत्याग्रही आज सुबह तक मेला मैदान में पहुंच चुके थे। जिसमें असम-430, मणिपुर-650, तमिलनाडु-469, केरल-282, छत्तीसगढ-2890, मध्यप्रदेश-10428, उत्तरप्रदेश-3234, बिहार-3267, उड़ीसा-1485, राजस्थान-846, झारखण्ड 2090 सत्याग्रहियों के साथ हरियाणा, उत्तराखण्ड, गुजरात, हिमाचल प्रदेश और महाराष्ट्र के प्रतिनिधि भी शामिल थे।


और दिल्ली के लिए कूच -  ग्वालियर से तैयारी के बाद 25 हजार से अधिक लोग पदयात्रा करते हुए 4 अक्तूबर को दिल्ली के लिए कूच कर गए। पहले दिन 4 अक्तूबर को सत्याग्रही 19 किलोमीटर चले और मुरैना जिले की सीमा में पहुंच गए। 25 हजार लोगों का अनुशासन में सड़कों पर चलना। रात होने पर सड़ के किनारे ही दरी बिछाकर सो जाना। एक-एक हजार के समूह में भोजन बनाना और गीत गाते हुए संघर्ष की राह पर चलते जाना...ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गांव के।
न्याय का विधान हो , सबका हक समान हो
सबकी अपनी हो जमीन, सबका आसमान हो... 

यात्रा दो दिनों बाद 6 अक्तूबर को मुरैना पहुंची। मुरैना में दोपहर में यात्रा को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने संबोधित किया। इसी बीच आंदोलनकारियों को केंद्र सरकार से भी उनकी मांगे सुने जाने का भरोसा मिला। इसी दिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव का ऐलान हो गया। इसके बाद आचार संहिता लागू होने के कारण पीवी राजगोपाल ने सत्याग्रहियों से राय लेकर सत्ताग्रह को समाप्त करने का ऐलान कर दिया। पर यह कहा कि आप लोग अपने अपने गांव में जाकर आंदोलन जारी रखेंगे। इसके साथ ही केंद्र सरकार के कहा गया कि अगर आश्वासन पर अमल नहीं होता है तो फिर सड़कों पर उतरेंगे।

एकता परिषद के प्रवक्ता अनिल गुप्ता ने कहा, आंदोलन का पहला फेज खत्म हो गया है, क्योंकि बातचीत का सिलसिला शुरु हो गया है। बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव राम माधव जी से बात हुई है, उनके साथ राजगोपाल और हमारे कई साथियों की बैठक होगी, जिसके बाद सरकार से वार्ता होगी। एकता परिषद संवाद में विश्वास करता है।"

आंदोलन की समाप्ति पर परिषद के संस्थापक राजगोपाल पीवी ने जारी वीडियो में कहा - हर संघर्ष का निष्कर्ष संवाद से निकलता है। एक संवाद ग्वालियर में सत्ताधारी सरकार से हुआ और दूसरा संवाद विपक्ष से मुरैना में स्थापित हुआ। बीजेपी के कई मंत्रियों से साथ चलने की बात कही है। अगले छह महीने में चुनाव है। जनप्रतिनिधियों ने 25 हजार लोगों के सामने वादा किया है कि वो चुनाव जीनते पर क्या करेंगे। और हमारी पांच मांगों को कैसे देखते हैं।



क्या है प्रमुख मांगें –
भूमिहीनों आदिवासियों का यह आंदोलन मुख्य रूप से पांच मांगों को लेकर है-
1 आवासीय कृषि भूमि अधिकार कानून बने
2. महिला कृषक हकदारी कानून (वूमन फार्मर राइट एक्ट)
3. जमीन के लंबित प्रकरणों के निराकरण के लिए न्यायालयों का गठन किया जाए
4. राष्ट्रीय भूमि सुधार नीति की घोषणा और उसका क्रियान्वयन
5. वनाधिकार कानून-2005 व पंचायत अधिनियम 1996 के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर निगरानी समिति बनाई जाए।

पुराने समझौतों पर अमल नहीं
राजगोपाल कहते हैं कि इससे पहले वर्ष 2007 में जनादेश और 2012 में जन सत्याग्रह के दौरान केंद्र सरकार के साथ लिखित समझौते हुए, मगर उन पर अब तक न तो अमल हुआ और न ही कानून बन पाया है।


अधिकार पत्र नहीं मिला -  डिंडोरी जिला मध्यप्रदेश के लिम्हा दादर गांव के साथी पन्चू और मुन्ना बैगा जनजाति के हैं और ये अपने पूर्वजो के समय से जिस जमीन पर खेती कर रहे हैं वह वन भूमि है, जिसका दावा करने के बाद भी अधिकार पत्र नहीं मिल पाया है। जनांदोलन 2018 में वे अपने अधिकारों की मांग को लेकर साथ साथ चल रहे हैं।
- प्रस्तुति - विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com

Thursday, 20 September 2018

गांधी के विचारों से ही मिटेंगी पृथ्वी पर खींची इंसानी लकीरें- सुब्बराव

बापू की 150वीं जयंती वर्ष के अवसर पर राष्ट्रीय युवा योजना ग्वालियर इकाई के द्वारा युवा संवाद कार्यक्रम का आयोजन किया गया। नगर के सिटी सेंटर स्थित होटल जानकी इन के सभागार में आयोजित युवा संवाद कार्यक्रम में प्रख्यात गांधीवादी और सर्वोदयी नेता एसएन सुब्बाराव ( भाई जी ) ने व्याख्यान दिया और युवाओं को संबोधित किया।
व्याख्यान की षुरुआत करते हुए सुब्बाराव ने चंद्रमा पर कदम रखने वाले प्रथम मनुष्य नील आर्मस्ट्राग की पंक्तियों से की। प्रथम चंद्रयात्री ने चंद्रमा से पृथ्वी को देखते हुए कहा था कि चांद से देखने पर पृथ्वी बेहद खूबसूरत दिखती है क्योंकि वहां से पृथ्वी पर कोई लकीर नहीं दिखती। भाई जी ने कहा कि परमषक्ति ने पृथ्वी का निर्माण किया लेकिन इंसानों ने जगह-जगह खरोंच और लकीर खींच दिया। देश, धर्म, जाति और नस्लों की इन इंसानी लकीरों से पृथ्वी रक्तरंजित हो चुकी है और इसे सिर्फ महात्मा गांधी के सिद्धांतों पर चलकर ही बचाया जा सकता है। राष्ट्र् और विश्व को जोड़ने के प्रण के साथ भाई जी ने ओजस्वी स्वर में प्रेरणास्पद समूह गान का आह्वान किया। अपने न्यूयार्क प्रवास की एक घटना का उल्लेख करते हुए भाई जी ने बताया कि कैसे गांधी के सिद्धांतों और विचारों से वहां के नागरिक प्रेरणा लेते हैं लेकिन दुर्भाग्यवश हम बहुत से भारतीय उन्हें आज भी प्रासंगिक नहीं मानते।
भाई जी ने कहा कि हमें स्वयं में उस आत्मषक्ति को तलाषने की अत्यंत आवश्यकता है जिसने एक समय बचपन में भयभीत रहने वाले बालक मोहनदास को इतनी षक्ति दी जिसने उस ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दे दिया जिनके सामा्रज्य में कभी सूर्यास्त नहीं होता था। भारत की आजादी के बाद दुनिया में 117 से ज्यादा देषों को औपनिवेषिक गुलामी से आजादी मिली थी। प्रत्येक आजाद राष्ट्र के राष्ट्रनायक ने अपनी लिखी किताबों में एक बात का जिक्र्र अवष्य किया कि उन्हें इस संघर्ष की प्रेरणा महात्मा गांधी के संघर्षों और विचारों से मिली थी वरना वो सपने में भी आजाद होने की कल्पना नहीं करते थे। अफ्रीका में 1906 में एषियाटिक आर्डिनेंस और अष्वेतों के हक के लिए अंग्रजों के विरुद्ध महात्मा गांधी की षक्ति के संदर्भ में भाई जी ने बताया कि, सैकड़ों वर्ष पूर्व आदिगुरु शंकराचार्य ने कहा है कि समस्त शक्तियों के स्रोत आप स्वयं हैं। दुनिया में अब तक हुए समस्त धर्म प्रवर्तकों और धर्म संस्थापकों ने इसी स्व शक्ति को पहचानने और इस तक पहुंचने की बात कही है। आत्मशक्ति की यह पहचान सिर्फ सत्कर्मों के दीपक को जलाने से ही संभव है।

वर्तमान समय में संसार में व्याप्त हिंसा, मतभेद, बेरोजगारी, भूख और तनावपूर्ण वातावरण में सिर्फ गांधी के सिद्धांतों के द्वारा ही शांति तक पहुंचा जा सकता है। धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र की सीमा में उलझे में विश्व और भारत को जोड़ने की अत्यंत आवश्यकता है। देष की तरुणाई अपनी आत्मशक्ति से विश्व को जोड़ने का यह कल्याणकारी कार्य कुशलतापूर्वक कर सकती है। आज हमें एक-दूसरे के धर्म को समझने और उसका सम्मान करने की जरुरत है। हमें ऐसी नीतियों की जरुरत है जो ऐसा विकास करें जिससे प्रकृति और वृक्षों को क्षति न पहुंचे जिससे सभी निरोग और स्वस्थ रहें। हमें अपने भ्रष्टाचार से दूर रहकर व्यवहार में शिष्टता और जीवन में पारदर्शिता लाने की जरुरत है। हम यह सुगमतापूर्वक कर सकते हैं क्योंकि हम सबके अंदर ही राम और रावण होते हैं। हमें अपने भीतर के राम को बढ़ाना है और इसलिए हमें राम से मार्गदर्शन लेना होगा।

चंबल के आत्मसमर्पण कर चुके दस्युओं के प्रसंग को याद करते हुए भाई जी ने कहा कि जब प्रख्यात गांधीवादी समाज सेविका सरला बहन (कैथरीन मैरी हिलमैन) उन दस्युओं से पूछती थी कि तुम्हें राम के विचार आकर्षित करते हैं या रावण का अहंकार तो वो सभी स्वयं को राम के विचारों से प्रभावित बताते थे। आज भी हमें अपने अंदर उसी विचार को बढ़ाने की जरुरत है। व्याख्यान के अंत में भाई जी ने उपस्थित युवाओं से राष्ट्र निर्माण में योगदान देने और जिम्मेदार नागरिक बनने का आह्वान किया। उपस्थित युवाओं और श्रोताओं ने बा-बापू के विचारों को आत्मसात करने और अंदर के भय से भयमुक्त होकर गौरवान्वित भारतीय होने का संकल्प लिया।
( ग्वालियर में 18 सितंबर 2018 का व्याख्यान )

Tuesday, 18 September 2018

मूक फिल्मों के दौर में तीन दिन

देश की पहली कामर्सियल फिल्म राजा हरिश्चंद्र 1913 में बनी। ये बात सभी जानते हैं। पर दादा साहब फाल्के की यह मूक फिल्म कितने लोगों ने देखी। राजा हरिश्चंद्र समेत दादा साहेब फाल्के की कई और मूक फिल्मों को देखने का सौभाग्य मिला दिल्ली के इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फार आर्ट्स में 14 से 16 सितंबर 2018 के बीच हुए मूक फिल्म समारोह में।
पत्रकार इकबाल रिजवी की पुस्तक पोस्टर बोलते हैं का विमोचन भी हुआ। ( 14  सितंबर 2018 ) 


यह अतीत में खो जाने का एक सुनहरा मौका था। समारोह के दौरान विषय परावर्तन करते हुए आईजीएनसीए के डाक्टर सचिदानंद जोशी ने मूक फिल्मों के महत्व को काफी सुगम ढंग से रेखांकित किया। इसे सफल बनाने में वरिष्ठ पत्रकार सुरेश शर्मा की बड़ी भूमिका रही। पहले दिन मूक फिल्म समरोह के उदघाटन के मौके पर प्रसिद्ध फिल्मकार श्याम बेनेगल और पटकथा लेखक अतुल तिवारी मौजूद थे।

दादा साहेब फाल्के की राजा हरिश्चंद्र – 1913
सिनेमा के अतीत के दौर पर सार्थक चर्चा के बाद दादा साहेब फाल्के की उस फिल्म का प्रदर्शन हुआ जिसने भारतीय सिनेमा जगत के इतिहास की नींव रखी। ये फिल्म सिर्फ 14 मिनट की बची है। फिल्म में कहानी को आगे बढ़ाने के लिए बीच बीच में अंग्रेजी-हिंदी में शीर्षकों का सहारा लिया गया था। पुणे फिल्म आर्काईव ने इसका डिजिटल वर्जन बनाने के साथ बैक स्कोर म्युजिक लगा दिया है। दादा साहेब फाल्के ने राजा हरिश्चंद्र की कहानी के लिए मार्कडेय पुराण की कथा को आधार बनाया था। फिल्म की कहानी में महर्षि विश्वामित्र विलेन की भूमिका में हैं,  हालांकि फिल्म का अंत सुखांत है। बाद में राजा हरिश्चंद्र पर कई और फिल्में भी बनीं। खुद दादा साहेब फाल्के 1943 के बाद इस फिल्म को सवाल बनाना चाहते थे। पर उनके गरम दल से जुड़ाव के कारण ब्रिटिश सरकार ने उन्हें अनुमति नहीं दी। देश आजाद होने से पहले दादा साहब का निधन हो चुका था। 


1400 मूक फिल्में बनी 1913 से 1931 के बीच।

09 फिल्में ही उपलब्ध है मूक दौर की बाकी सारी फिल्में नष्ट हो गईं।

1944 में 16 फरवरी को दादा साहेब फाल्के का निधन हो गया। 


1870 में 30 अप्रैल को फाल्के साहब का जन्म नासिक जिले में तीर्थ स्थल त्रयंबकेश्वर में हुआ था। 


पहले दिन समारोह में दादा साहेब फाल्के की 1918 में बनी श्रीकृष्ण जन्म और 1919 में बनी कालिया मर्दन का प्रदर्शित की गईं। श्रीकृष्ण जन्म का 12 मिनट का और कालिया मर्दन का 48 मिनट का फुटेज उपलब्ध है।

मूक फिल्म समारोह के तीसरे और आखिरी दिन 1903 में बनी फिल्म लाइफ एंड पैसन ऑफ जीसस क्राइस्ट देखने का मौका मिला। यह विश्व की शुरुआती फीचर फिल्मों में शामिल की जाती है। दादा साहेब फाल्के फ्रांस में बनी इस फिल्म से बहुत प्रेरित थे। उन्होंने लंदन में इस फिल्म के कई शो देखे थे। उन्हें इस फिल्म को देखकर ही भारत में फिल्में बनाने की प्रेरणा मिली थी।

इस शो में हमें दादा साहेब की अगली फिल्म लंका दहन देखने का मौका मिला । यह फिल्म 1917 में बनी थी। पर इस फिल्म की अब महज 5 मिनट की फुटेज ही उपलब्ध है। इसमें अशोक वाटिका का दृश्य है। अन्ना सालुंके ने इसमें दोहरी भूमिकाएं की थी। फिल्म में दादा साहेब फाल्के के कैमरामैन गणपत शिंदे हनुमान बने हैं। ये भारतीय फिल्मों के इतिहास में पहला डबल रोल था।

क्या आपको पता है कि 1928 में बनी शिराज ताजमहल पर बनी पहली फिल्म थी। एक घंटे 24 मिनट की इस मूक फिल्म में ताजमहल की कहानी बिल्कुल अलग अंदाज में है। इसकी कहानी निरंजनपाल ने लिखी थी। वे गरम दल के नेता बिपिन चंद्रपाल के बेटे थे। 

फिल्म शिराज का दृश्य ( 1928 ) 
शिराज की कहानी शाहजहां और उसकी रानी मुमताज की प्रेम कहानी तो है। पर शिराज इसमें वह चरित्र है जिसके घर बचपन में नूरजहां पली थी। शिराज भी नूरजहां से प्रेम करता था। इस फिल्म की कहानी के मुताबिक शिराज ही ताजमहल का वास्तुकार है। हालांकि निरंजन पाल को शिराज की कहानी कहां से मिली ये नहीं पता चलता। ये फिल्म ब्रिटेन और जर्मनी के फिल्म कपंनियों के सहयोग से बनी थी। इसमें हिमांशु राय शिराज की भूमिका में हैं।

हमने आखिरी फिल्म देखी नोटिर पूजा। 1932 में बनी इस फिल्म मेंकवि गुरु रविंद्रनाथ टैगोर ने भी छोटी सी भूमिका की थी। फिल्म 21 मिनट की है। टैगोर इस फिल्म के निर्देशक भी हैं। वास्तव मेंयह फिल्म टैगोर के 1926 के एक ड्रामा की रिकार्डिंग है।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com

( RAJA HARISHCHANDRA, NOTIR PUJA, SHIRAJ, LANKA DAHAN, KALIA MARDAN, SRI KRISHNA JANAM )