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Saturday, 2 May 2020

नीक लागे टिकुलिया गोरखपुर के – बालेश्वर की याद


लॉकडाउन में यूट्यूब पर लोकसंगीत ढूंढते हुए बालेश्वर को सुनने पहुंच गया। भोजपुरी के जाने माने लोकगायक हुआ करते थे बालेश्वर यादव। कई दशक तक उनकी बिरहा शैली में गायकी के लोग दीवाने रहे। सत्तर अस्सी के दशक में बालेश्वर के एलपी रिकार्ड खूब बिकते थे। बालेश्वर खुद गीत लिखते खुद धुन बनाते और गाते। उनका बड़ा प्यारा गीत है - नीक लागे टिकुलिया गोरखपुर के . दरअसल इस गीत में अलग अलग शहरों की बानगी पेश की बालेश्वर ने।
नीक लागे टिकुलिया गोरखपुर के
हावड़ा के काजर बरेली के सुरमा
सलवरवा अलीगढ़ के
नीक लागे टिकुलिया गोरखपुर के
बलिया के सतुआ
देवरिया के मरीचा
मोटकी मुरइया जौनपुर के
नीक लागे टिकुलिया गोरखपुर के

हापुड़ के पापड़ हरियाणा के छोला
नाचेला लौंडा भागलपुर के
नीक लागे टिकुलिया गोरखपुर के

सीतापुर के कदुआ रे, फैजाबादी बंडा
गोंडा के घुइयां सरासर सरके
नीक लागे टिकुलिया गोरखपुर के

दुनिया में नामी लखनऊवा क रेवड़ी
अरे सुंदर मरदवा गाजीपुर के
नीक लागे टिकुलिया गोरखपुर के

झांसी के झूला बनारस के साड़ी
गावेला बलेसर आजमगढ के
नीक लागे टिकुलिया गोरखपुर के


उनका गोरखपुर से खास लगाव था... वे अपने गीतों में गोरखपुर को सबसे ऊपर रखते थे

आरा हिलवलु बलिया हिलवलु त का हिलवलु ,
तनी गोरखपुर हिलाव तक जानी ना...

उनके गीतों में लोगों मनोरंजन होता तो वे सामाजिक कुरीतियों पर भी चोट करते थे। उनका बीए पास घोड़ा गीत खूब चर्चित हुआ था जिसमें उन्होंने दहेज प्रथा पर जोरदार हमला किया था। शब्दों से भी और गायकी के अंदाज से भी।

आज के समाज मे दहेज बना रोडा
बिकाई के ए बाबू बीए पास घोडा
बीबी सोलह साल की तो मरदा पचासा
पइसे के आड़ में बिगड़ गइले जोडा
बिकाइ के ए बाबू बीए पास घोडा

बीबी बीए पास मरदा मिला घसकरा
सीलोन बोले बीबी मरदा जाने सील लोढा
बिकाइ के ए बाबू बीए पास घोडा

बिटिया के खेत बिका बेटहा के बारी
अरे दानो दहेज ने उजाड़ घर छोड़ा
बिकाइ के ए बाबू बीए पास घोडा
राधा जी के प्यार देख... सीताजी की शादी
अरे शिव के धनुषिया बलेसर जो तोड़ा
बिकाइ के ए बाबू बीए पास घोडा

बालेश्वर उत्तर प्रदेश में मउ नाथ भंजन के पास मधुबन के रहने वाले थे। उनके जमाने में उनका गांव आजमगढ़ जिले का हिस्सा था तो अपने को आजमगढ़ वाला कहते थे। अपने आखिरी समय तक वे गायकी में सक्रिय रहे। उनका जन्म एक जनवरी 1942 को हुआ था। नौ जनवरी 2011 को उन्होंने आखिरी सांस ली। साल 2008 से 2010 के बीच महुआ चैनल पर प्रसारित हुए शो बिरहा दंगल में बालेश्वर यादव आए थे। बालेश्वर के गाने की एक खास शैली थी। आ रै रै रै रै रै....की जब वे हेक लगाते तो लोग मुग्ध होकर सुनते।
-         ----विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
 ( BIRHA, BALESWAR YADAV, BHOJPURI ) 

Saturday, 25 April 2020

गुलमोहर एक बार फिर खिल उठे हैं ( कविता )


गुलमोहर एक बार फिर खिल उठे हैं
सड़क के दोनों तरफ
हरियाली अंगड़ाई ले रही है...

गुलमोहर के अनगिनत फूल
अप्रैल की दोपहरी को भी
बना रहे हैं मनभावन

पर इन सड़कों पर आज
तुम भी नहीं हो
और मैं भी नहीं

तुम और मैं ही क्या
कोई भी तो नहीं है
इन गुलमोहर  की छांव तले
चलने के लिए

एक अनजान भय
बनारस की सड़कें हुईं है सुनसान

पता है न तुम्हें
मौलश्री के पेड़ के नीचे की
शाम भी हो गई है सुनसान

मौसम तो आएगा
गुलमोहर भी यूं ही
हर साल खिलेंगे

पर क्या हम तुम
फिर कभी यूं ही
बेतकल्लुफ
होकर मिलेंगे....

-         - विद्युत प्रकाश मौर्य
 ( 25 अप्रैल 2020 ) 

Sunday, 12 April 2020

कोरोना के बाद दुनिया (( कविता ))

कैसी होगी कोरोना के बाद दुनिया
क्या फिर हरिद्वार की हर की पौड़ी
पर संध्या आरती में जुटेगी
हजारों श्रद्धालुओं की भीड़
क्या वाराणसी के दसाश्वमेध घाट पर
फिर मां गंगा आरती में गूंजेंगे
घंटे और घड़ियाल

क्या फिर अजमेरशरीफ की दरगाह पर
गुलाबों की खुशबू के बीच
हजारों जायरीनों के जमावड़े में
मनाया जाएगा उर्स
क्या महाकुंभ में एक बार फिर
दिखाई देगा
लाखों मानवों के महासमुद्र सा नजारा

क्या पंढरपुर की वारी में
फिर अंतहीन पंक्ति में चलते हुए
लाखों श्रद्धालु  बिठोबा की नगरी की ओर
प्रस्थान करते हुए नजर आएंगे
शिरडी में साईं के दरबार में
गुरुवार की दोपहर को पहुंचेगे फिर
श्रद्धा सबूरी की आस लिए
लाखों आस्थावान

क्या तिरुपति बालाजी के दर्शन के लिए
विशाल हॉल में नजर आएगा
हजारों लोगों का रेला

कोरोना की इन दहशत भरे दिन के बाद
आखिर कितनी बदल जाएगी दुनिया
अदृश्य भय के बीच
बंद दरवाजों के पीछे दुबका है इंसान
सड़के सूनी
गलियां नहीं गुलजार अब
क्या एक बार फिर उसी तरह
लगेंगे जिंदगी मेले...

जैसे बेतकल्लुफ होकर बाबा अमरनाथ
केदारनाथ और माता वैष्णोदेवी की यात्राओं में
चलता था श्रद्धालुओं का रेला

क्या एक बार फिर रसूखदार राजनेता की
शहजादी की शादी में
दावत उड़ाने आएगा पूरा शहर।

क्या एक बार फिर
ढेर सारी उम्मीद पाल कर
बड़े राजनेता की रैली में
भाषण सुनने पहुंच जाएगी
गांव से चलकर पहुंच जाएगी लाखों जनता।

----विद्युत प्रकाश मौर्य - (13 अप्रैल 2020 )

Monday, 30 March 2020

अंतहीन सड़क पर पैदल (कविता)

छह साल की मुनिया पकड़े हाथ
अंतहीन सड़क पर चला जा रहा
है बृजमोहन
न जाने की कितने दिन में
पहुंचेगा अपने गांव
उस शहर को वह पीछे
छोड़ आया है जहां
दिन भर पसीना बहाकर
जुटाता था अपने घर वालों के लिए
निवाला।

लोगों ने बताया था किसी
अदृश्य बीमारी से दुनिया डरी हुई है
तब बहुत याद आई 
अपने गांव की मिट्टी की
तो निकल पड़ा खुली सड़क पर

नन्ही मुनिया बोल रही
बापू मुझसे और चला नहीं जा रहा
न जाने कितनी दूर है 
अभी हमारा गांव

अपनी पोटली से थोड़ा
चबेना निकालकर मुनिया को देता है
चलते रहो बिटिया
एक दिन जरूर पहुंच जाएंगे
अपने गांव....

-         ------- विद्युत प्रकाश मौर्य


Sunday, 29 March 2020

रोक लो उन्हें... ( कविता)



उन्होंने ही तो
तुम्हारे घर की दीवार जोड़ी थी
जिस आलीशान अपार्टमेट में तुम
आज रहते हो
उसका रंग रोगन
उन्होंने ही तो किया था
तुम्हारे घर की बिजली जब जब
खराब है जाती है
तुम्हारे नालियां जब जब 
जाम हो जाती हैं
वे ही तो ठीक करने आते हैं।

इस महानगर में कदम कदम पर
तुम्हारी सहायता के लिए
वे खड़े मिल जाते थे।
आज उनके लिए ये शहर
बेगाना क्यों हो गया है।

अपनी छह साल की बिटिया
की उंगली पकड़े वे
एक हजार मील की पैदल यात्रा कर
अपने गांव को जाने के लिए
मजबूर क्यों हुए

आखिर उनका देश कहां है...
तुम जो रोटी खाते हो उसमें
उनका भी तो हिस्सा
रोक लो उन्हें
कि उनके बिना तुम्हारा
ये सिस्टम नहीं चल पाएगा।

एक दिन तुम्हें जब फिर
उनकी जरूरत पड़ेगी तो
वे तब बहुत दूर जा चुके होंगे।
हां रोक लो उन्हें

--- विद्युत प्रकाश मौर्य
( 29 मार्च 2020 )

Friday, 27 March 2020

तालाबंदी के बीच गांव की याद (कविता )


देश भर में तालाबंदी के बीच
दिल्ली के बहुमंजिले इमारत के छोटे से
फ्लैट में कैद होना...
ये किसी कारावास की तरह ही तो है...
आप खिड़की से झांक सकते हैं
पर बाहर कदम नहीं रख सकते।

इस अकेलेपन के बीच
बचपन का गांव खूब याद आया
नहर के किनारे का पीपल का पेड़
जेठ की दुपहरी में जिसकी छांव
भली लगती थी
कुएं के किनारे वो नीम का पेड़ भी
अब भी वहीं खड़ा है...

पर हम चाह कर भी
अभी वहां नहीं जा सकते।  

गांव में चाचा से बात हुई फोन पर
उन्होंने कहा, सब ठीक है बबुआ
यहां कोई परेशानी नहीं है
आंगन की धूप में बैठो या फिर खेत खलिहान में
घूम के आ जाओ
अपना हाल सुनाओ
कैसे हाल सुनाऊं
मेरे पास आज शब्दों की दरिद्रता है...
भाव शून्य हैं...
मैं ही बड़ा गरीब हूं
चाचा तुम ही अमीर हो...

-         --- विद्युत प्रकाश मौर्य

Tuesday, 13 February 2018

पुराने दोस्तों के संग बातें... ( कविता )


आज मैंने अपनी पुरानी डायरी
के कुछ पन्ने पलटे..
इनमें कुछ पुराने दोस्तो के नाम थे..
वे नाम जो वाट्सएप फेसबुक के जमाने से पहले
मेरे साथ हुआ करते थे...

इनमें से कुछ अब भी साथ हैं
तो कुछ वहीं पड़े हैं पुरानी डायरी के पन्नों में ही...

सोचा चलो चलकर मिलते हैं उनसे
फुरसत में
करेंगे ढेर सारी बातें

वे बातें
जिनका सिलसिला कभी नहीं रुकता

पुराने दोस्त कुछ ऐसे थे
जो फोन करके पूछते थे
नौकरी कैसी चल रही है...

और बेरोजगारी के दिनों में पूछा करते थे
पैसे खत्म हो गए क्या
कहो तो कुछ रुपये भिजवा दूं
जो मैंने अपनी पत्नी से छिपाकर 
अलग से जमा कर रखा है...
जब बन पड़े लौटा देना।

पुराने दोस्त मुझे सीखाते थे
महानगर में रहने का सलीका...

ये सीखाते थे कैसे बचाए जाए
बुरे वक्त के लिए दो पैसा। 
कहते थे बासमती का टुकड़ा चावल 
खरीदा करो... कुछ रुपये बचेंगे..

वे पुराने दोस्त कुछ ऐसे थे
जिनके कंधे पर सिर रखकर
देर तक रोने की इच्छा होती थी

आभासी दुनिया के
इन फेसबुकिया दोस्तों के बीच
पुराने दोस्त कहीं खो गए हैं...

चलो एक बार फिर ढूंढते हैं
पुरानी डायरी से
उनका नाम और पता..

तय करते हैं एक मुलाकात...
और फुटपाथ पर बैठकर
पीएंगे कटिंग चाय...
देर तक लड़ाएंगे गप्प..

और पूछेंगे एक दूसरे से
ये कहां आ गए हम....
यूं दूर- दूर चलते हुए....

-    विद्युत प्रकाश मौर्य  ( मार्च 2017 ) 

Sunday, 11 February 2018

मेरी मां ( कविता )


बातें उसकी माखन मिश्री
स्पर्श उसका चंदन है
जिंदगी तुझपे वार दूं
चरणों में तेरे वंदन है
मेरी पूजा मेरी मां.....

शाम का संगीत है
रात की वो लोरी है
नेह की नदिया है
दूध की कटोरी है
शहद सी मीठी मेरी मां.....

गरमी की शीतल छांव है
अमराई की वो गांव है
सरदी की सुनहरी धूप है
अनगिनत उसके रूप हैं।
अनूठी अलबेली मेरी मां।


-         ----  विद्युत प्रकाश मौर्य
-         08 मई 2013