Friday, 19 May 2006

फ्लाई ओवर का शहर दिल्ली

कुछ दिन में दिल्ली को फ्लाई ओवरों के शहर के रुप में याद किया जाएगा। अगर आपने दससाल पहले दिल्ली की यात्रा की हो, और अब जाएं तो दिल्ली आपको काफी बदली हुई नजर आएगी। दो दशक पहले की दिल्ली का मतलब यह होता था कि लाल बत्ती और हरी बत्ती का शहर। अगर लाल बत्ती हो तो जिंदगी ठहरी हुई है। अगर हरी बत्ती हो तो जिंदगी चल पड़ी। कितनी कहानियां और व्यंग्य रचनाएं इस लाल बत्ती और हरी बत्ती पर लिखी गई हैं। रफ्तार चाहने वाले लोगों के लिए लाल बत्ती बहुत बड़ा संकट थी। अगर आप दिल्ली में किसी से मिलने जाते हों तो न जाने कितने चौराहों पर आपको यह इंतजार करना पड़ता था कि कब हरी बत्ती होगी और आप चल पाएंगे।
दिन लदे गोल चक्कर के - इस लाल बत्ती खत्म करने के लिए बड़े चौराहों पर राउंड एबाउट की परिकल्पना को स्वरुप प्रदान किया गया। इसमें गर चौक पर एक गोल चक्कर होता है। इस गोल चक्कर में घूमते हुए आप अपने लेन का चयन कर लेते हैं। इसमें लाल बत्ती तो नहीं मिलती। पर इस राउंड एबाउट का लोगों को सही तरीक से इस्तेमाल करना नहीं आया। इसका परिणाम हुआ कि गोल चक्कर पर काफी एक्सीडेंट की घटनाएं सुनने को मिलने लगीं।
फ्लाईओवर या भूल भुलैय्या - अब बढ़ते ट्रैफिक के दबाव के कारण दिल्ली में फ्लाई ओवर बनाए जाने का सिलसिला जारी है। दिल्ली में 50 किलोमीटर के रिंग रोड पर लगभग हर चौराहे पर फ्लाई ओवर बनाए जा रहे हैं जिससे वहां कभी रेडलाइट की स्थिति न हो और ट्रैफिक निर्बाध गति से चलता रहे। अगर आप रिंग रोड पर चलें तो आजादपुर, वजीरपुर डिपो, पीतमपुरा, ब्रिटानिया, पंजाबी बाग, राजा गार्डन, राजौरी गार्डन, नारायणा, धौलाकुआं, मोतीबाग, सफदरजंग, मेडिकल, आश्रम आदि में सब जगह आपको फ्लाई ओवर मिलेंगे। दिल्ली में धौला कुआं और मेडिकल के फ्लाई ओवर तो काफी कलात्मक ढंग से बनाए गए हैं। ये इतने घुमावदार हैं कि किसी नए व्यक्ति के लिए यह समझना बहुत मुश्किल होगा कि उसे किधर जाने के लिए कौन सा लेन चयन करना चाहिए। यहां तक सालों से दिल्ली में ही रहने वालों के लिए ये फ्लाई ओवर भूलभूलैया जैसे साबित हो रहे हैं।

दिल्ली को 2010 में होने वाले राष्ट्र मंडल खेलों के लिए तैयार करने के लिए शहर के ट्रैफिक को बेहतर बनाने की कवायद की जा रही है। इसी के तहत फ्लाईओवर और अंडर पास बनाए जा रहे हैं। इससे पूर्व भारत में बेंगलूर शहर की सड़कों को बेहतर बनाया गया है। वहां पर चौक पर फ्लाईओवर और अंडरपास बनाए गए हैं। निश्चय ही फ्लाईओवर से समय की बचत होती है। साथ ही घंटो प्रदूषित वातावरण में रहने से छुट्टी मिल जाती है।
पदयात्रियों का भी रखे ख्याल - हां इन फ्लाईओवरों ने पैदल चलने वालों के लिए मुश्किल खड़ी जरूर की है। कई जगह सड़क पार करने के लिए आधे किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है। इससे सड़क पार करना मुश्किल हो गया है। रेडलाइट नहीं होने के कारण सड़कों पर अब हमेशा तेज गति से वाहन चलते रहते हैं। इसलिए जितनी बड़ी संख्या में फ्लाई ओवर बन रहे हैं उसी अनुपात में पैदल पार पथ भी बनाए जाने चाहिएं। इससे सड़क पार करने वालों को सुविधा हो सकेगी। साथ ही हर फ्लाईओवर के आसपास कौन सी लेन किसमें जाकर मिल रही है इसकी सूचना सही ढंग से लिखी होनी चाहिए। ऐसा नहीं होने से कई लोगों को भ्रमित होना पड़ता है।




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