Monday, 12 December 2011

सौ साल का दर्द


भले ही दिल्ली ने राजधानी के रूप में सौ साल पूरे कर लिए हों लेकिन दिल्ली सौ साल के इस सफर में कई तरह के खतरों में जी रही है। दिल्ली देश की राजधानी है कुछ लोग इसे दुनिया की चंद खूबसूरत राजधानियों में शुमार करते हैं लेकिन दिल्ली के तस्वीर का दूसरा पहलू भी है जो कम लोगों को दिखाई देता है। इस पहलू में कई तरह के दर्द समेटे है दिल्ली। सबसे पहला दर्द है दिल्ली की बढ़ती आबादी का। आज दिल्ली की आबादी एक करोड़ 60 लाख के पार कर चुकी है। दिल्ली आबादी में दुनिया के पांच बड़े शहरों में है। लेकिन इस बढ़ती आबादी के लिए दिल्ली में हवा, पानी, धूप, अनाज और सड़कें नहीं हैं। पानी और दाना तो दिल्ली के लोग दूसरे राज्यों से मंगा कर पेट भरते हैं। लेकिन दिल्ली की सड़कें भी बढ़ती आबादी का बोझ सह पाने में सक्षम नहीं है।
जहां दिल्ली में चाणक्यापुरी जैसे खूबसूरत मुहल्ले हैं तो उसी साउथ दिल्ली में संगम विहार जैसा स्लम इलाका भी है। सिर्फ संगम विहार ही क्यों दिल्ली की असली तस्वीर देखनी हो तो लोगों को नांगलोई, बुराड़ी, सादतपुर, भजनपुरा, सीलमपुर, मौजपुर, करावलनगर के मुहल्ले भी देखने चाहिए। साल 2011 की जनगणना में उत्तर पूर्वी दिल्ली को देश का सबसे घनी आबादी वाला इलाका माना गया है। इसमें प्रति वर्ग किलोमीटर सबसे ज्यादा लोग रहते हैं। मतलब साफ है कि दिल्ली की 40 फीसदी आबादी को हवा, धूप, पानी और इंसानों लायक का खाना भी उपलब्ध नहीं है। जाहिर है आधी दिल्ली जानवरों का सा जिंदगी जीने को मजबूर है। ये सब उस दौर में हो रहा है जब दिल्ली में मेट्रो दौड़ रही है और सिविक सेंटर जैसी ऊंची इमारते बन रही हैं। लेकिन तस्वीर के दूसरे रूख में बहुत अंधेरा है। ये अंधेरा दिल्ली के पुराने गांव में भी है। दक्षिण दिल्ली में पिलंजी, कोटला मुबारकपुर, सनलाइट कालोनी, मस्जिद मोठ, मुनिरका, शाहपुर जट जैसे गांव है जहां कई घरों में हवा धूप भी नहीं आती।
आज दिल्ली का जो विस्तार है वह सिर्फ लुटियन दिल्ली तक नहीं है जो सुंदर दिखती है। लेकिन दिल्ली के इस बेतरतीब विकास के लिए जिम्मेवार कौन हैं। जाहिर है सौ साल की दिल्ली के विकास के लिए कभी ठीक से टाउन प्लानिंग नहीं की गई जिसका नतीजा है आबादी की ये विस्फोट। दिल्ली में आरके पुरम, आनंद विहार, विवेक विहार जैसी प्लांड कालोनियां बनी। रोहिणी, द्वारका जैसे उपनगर बने, लेकिन साथ ही साथ बड़ी संख्या में अवैध कालोनियां भी बनती गईं। क्योंकि हमने गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों के आवास के लिए तो कभी इमानदारी से सोचा भी नहीं। भला दिल्ली के चाय वाले पान वाले खोमचे वाले, माली, चौकीदार, सफाईवाले कहां रहेंगे। हमने उनके लिए पर्याप्त घर कभी बनाए ही नहीं। लिहाजा ऐसी कालोनियां बनती गईं शहर के लिए समस्या बन गईं।
सौ साल की दिल्ली में आज हमारे पास गर्व करने लायक कुछ चीजें हैं तो उससे ज्यादा ऐसी समस्याएं हैं जो दिल्ली के लिए कभी भी मुश्किल खड़ा कर सकती हैं। अगर भूकंप आया तो तबाह हो जाएगी दिल्ली। आग लगने पर कई इलाकों में फायर ब्रिगेड की गाड़ी नहीं पहुंच सकती। पर्याप्त हवा, पानी नहीं मिलने और गंदगी के कारण दिल्ली में डेंगू जैसी बीमारियां फैलती हैं। आज आप एक लखनऊ, चंडीगढ़, भोपाल, जयपुर जैसे मध्यमवर्गीय शहर में रहने वाले से बात करें तो वह खुद को दिल्ली से ज्यादा बेहतर सुविधाओं में खुद को पाता है।
अगर दिल्ली सिर्फ राजधानी के रूप में विस्तार पाती तो हमारे पास इतनी समस्याएं नहीं होतीं। दिल्ली के साथ सबसे बड़ी दिक्कत है दिल्ली भारी संख्या में ऐसे उद्योग हैं जो दिल्ली के बजाए किसी दूसरे शहर में होते तो राष्ट्रीय राजधानी पर आबादी का इतना बड़ा बोझ नहीं होता। कभी दिल्ली के सियासतदां ये आरोप लगाते हैं कि बाहर से आए लोग दिल्ली पर बोझ बने हैं लेकिन बाहर के लोगों के बिना दिल्ली काम भी नहीं चल सकता। आज दिल्ली सौ साल की हो गई है। अब एक मौका है कि हम दिल्ली के पुराने गौरव कैसे बनाए और बचाए रख सकें इसके लिए गंभीरता से सोचा जाए। राजधानी के सौंदर्य को बचाए रखने के लिए कुछ जरूरी कदम उठाए जाएं। ट्रैफिक जाम बड़ी समस्या है लेकिन सिर्फ पार्किंग शुल्क महंगा कर देने भर से ट्रैफिक की समस्या खत्म नहीं हो सकेगी। इसका सबसे अच्छा तरीका हो सकता है कि दिल्ली से आबादी को दूसरे शहरों की ओर मोड़ने का। चरणबद्ध तरीके से दिल्ली के उद्योगों को दिल्ली से हटाकर दूसरे शहरों में भेजा जाए। इससे शहर में बढ़ती आबादी पर रोक लग सकेगी। राजधानी के अलावा बहुत सारे केंद्रीय दफ्तरों को भी दूसरे शहरों में शिफ्ट किया जा सकता है। अगर समय रहते शहर को बचाने के लिए जरूरी उपाय नहीं किए गए तो हो सकता है कि हम दिल्ली के डेढ सौ साल या दो सौ साल नहीं मना सकें। वैसे भी दिल्ली का इतिहास कई बार उजड़ने और बसने का रहा है।

- विद्युत प्रकाश मौर्य
  

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