Friday, 12 May 2017

खतरनाक होगा चारधाम को रेल नेटवर्क से जोड़ना

उत्तराखंड में बद्रीनाथ, गंगोत्री तक रेल मार्ग बनाने की योजना निहायत बेवकूफी भरी है। 327 किलोमीटर के इस रेल परियोजना पर 40 हजार करोड़ खर्च होंगे। सर्वे में 21 नए स्टेशन, 61 सुरंगे और 59 पुल बनाने की सिफारिश की गई है। 

हकीकत यह है कि अभी उत्तराखंड के चार धाम के लिए ऑल वेदर रोड भी नहीं है। लैंड स्लाइडिंग के कारण कभी भी सड़क मार्ग तक बंद हो जाता है। ऐसे क्षेत्र में रेल लाइन बनाना अक्लमंदी नहीं होगी। 40 हजार करोड के खर्च के बाद इस मार्ग पर कितने लोग सफर करेंगे। वहां रेल पहुंचना पहाड़ों की प्राकृतिक संपदा के साथ भारी छेड़छाड़ को बढ़ावा देगा। साथ ही हिमालय के पर्यावरण को भी भारी नुकसान पहुंचाएगा। 

अगर हम पहाड़ों पर रेल की बात करें तो ब्रिटिश काल में कालका शिमला नैरो गेज और पठानकोट-जोगिंदरनगर नैरोगेज और सिलिगुड़ी दार्जिलिंग जैसी रेलवे लाइनें बिछाई गईं। ये सभी लाइनें नैरोगेज थीं। इनके लिए ज्यादा जमीन की जरूरत नहीं है। नैरोगेज रेल से पहाड़ों के पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचता। नैरोगेज रेल तीखे मोड़ पर मुड़ भी जाती है। सौ साल से ज्यादा समय से सफलतापूर्वक दौड़ रहीं कालका शिमला और दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे विश्व विरासत का हिस्सा भी हैं। पर खेद की बात है कि आजादी के बाद किसी भी पहाड़ को नैरोगेज रेल से नहीं जोड़ा गया। 

हिमालय की उत्तराखंड की पर्वतमाला की चट्टाने कोमल हैं। यहां अक्सर लैंडस्लाइडिंग का खतरा रहता है। वहीं भूकंप के लिहाज से भी संवेदनशील है। ऐसे क्षेत्र में ब्राडगेज रेलवे का निर्माण एक खतरनाक कदम होगा। हिमालय के पारिस्थिक तंत्र से भारी छेड़छाड़ होगा। सरकार को ये मूर्खतापूर्ण परियोजना जितनी जल्दी हो बंद कर देनी चाहिए। इसकी जगह चाहे तो नैरो गेज रेलवे के संचालन के बारे में विचार किया जा सकता है। हालांकि साल के छह महीने की कनेक्टिविटी के लिए उसकी भी जरूरत नहीं है। इसकी जगह रेलवे को मैदानी इलाके में विस्तार पर ध्यान देने की ज्यादा जरूरत है। खासकर उन जिला मुख्यालय और लाखों की आबादी वाले शहरों को तक रेल पहुंचाने की जरूरत हैं जहां अभी तक रेल की सिटी नहीं बजी है।

शंकराचार्य भी पक्ष में नहीं - शंकराचार्य वासुदेवानन्द सरस्वती ने कहा कि चार धामों को रेल लाइन से जोड़ा जाना ठीक नहीं है। कहा कि प्रथम राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद जब श्रीनगर गढ़वाल आए थे तो लोगों ने उनसे बदरीनाथ तक रेल लाइन की मांग की थी, लेकिन राजेन्द्र प्रसाद ने इसे धार्मिक मान्यता एवं परंपरा के विपरीत बताते हुए अस्वीकार किया था। कहा कि सरकार को प्रदेश की आर्थिकी बढ़ाने के लिए पर्यटन स्थलों का विकास करना होगा। लेकिन धार्मिक एवं तीर्थ स्थलों को पर्यटन स्थल की तरह विकसित करना धर्म संगत नहीं है। 

रेल लाइन बिछने से जहां पहाड़ कमजोर होंगे वहीं भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदा का भी भय रहेगा। रेल लाइन बिछाने के लिए कई सुरंगें बनानी होंगी जिससे पहाड़ खोखले होंगे। कहा कि रेल लाइन से बेहतर है कि सरकार चारों धामों तक फोर लेन सड़क विकसित करें।
- vidyutp@gmail.com

Thursday, 20 April 2017

लाल बत्ती सुरक्षा कम ठसक ज्यादा

चार दशक से ज्यादा समय से चले आ रहे लाल बत्ती के वीआईपी कल्चर से देश को निजात मिलने वाली है। 1970 से पहले वीआईपी सुरक्षा को लेकर देश में ज्यादा तामझाम नहीं दिखाई देता था। पर बाद में नेताओं और अफसरों के वाहनों में लाल, नीली और पीली बत्ती लगाने का रिवाज बढ़ा। यह धीरे धीरे वीवीआईपी होने की पहचान बन गया। तमाम वैसे नेता और अधिकारी भी ठसक में लालबत्ती लगे वाहन में घूमने लगे जो इसके लिए अधिकृत नहीं थे।

 1939 में पहली बार देश में बने मोटर ह्वीकल्स एक्ट के नियम 70 के तहत राज्यों को वाहन से संबंधित कानून बनाने की इजाजत दी गई।

1980 के सेंट्रल मोटर ह्वीकल्स रूल्स के नियम 108(3) के अंतर्गत प्रावधान किया गया कि वाहनों में कौन लगा सकता है लाल और नीली बत्ती।

लाल बत्ती (फ्लैशर के साथ) 

राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, पूर्व राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, उप प्रधानमंत्री, भारत के मुख्य न्यायाधीश, लोकसभा स्पीकर, कैबिनेट मंत्री, हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, पूर्व प्रधानमंत्री, नेता विपक्ष, राज्यों के मुख्यमंत्री, राज्यपाल, नीति आयोग के उपाध्यक्ष, राष्ट्रमंडल देशों के हाई कमिश्नर।

लाल बत्ती (बिना फ्लैशर के)

मुख्य चुनाव आयुक्त,  कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल ऑफ इंडिया, राज्यसभा के उपसभापति, लोकसभा के डिप्टी स्पीकर, केन्द्र सरकार के राज्यमंत्री, योजना आयोग के सदस्य,  अल्पसंख्यक,  अनुसूचित जाति व जनजाति आयोग के अध्यक्ष,  अटार्नी जनरल,  कैबिनेट सचिव,  तीनों सेनाओ के प्रमुख,  सेंन्ट्रल ऐडमिनिस्ट्रेटिव के अध्यक्ष,  यूपीएससी के अध्यक्ष,  हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस,  साँलिसिटर जनरल, राज्यों के उपमुख्यमंत्री,  दूसरे देशों के राजदूत।

पीली बत्ती 

कमिश्नर इनकम टैक्स, रिवेन्यू कमिश्नर, डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक।

नीली बत्ती 

एम्बुलेंस और पुलिस की गाड़ियां

सिर्फ सरकारी दौरे में इस्तेमाल 

लाल बत्ती का इस्तेमाल सिर्फ सरकारी दौरा के दौरान ही किया जा सकता है। वाहन में अधिकारी के परिवार के सदस्य हों फिर दौरा गैर सरकारी हो तो लालबत्ती का इस्तेमाल वर्जित है। तब लालबत्ती को काले कवर से ढकना जरूरी है।

सायरन

दिल्ली मोटर वीकल्स के रुल्स 1993 के अनुसार सिर्फ इमरजेंसी वाहन जैसे फायर ब्रिगेड़, एंबुलेंस, पुलिस कंट्रोल रुम की वैन में चमकने वाली या घूमने वाली लाल बत्ती के साथ सायरन लगा सकते है। वीआईपी की पायलट गाडी पर भी सायरन लगाया जा सकता है।

चमकने वाली नीली वीआईपी लाइट

चमकने वाली नीली वीआईपी लाइट को पुलिस पैट्रोलिंग वाहन, पायलट वाहन लगा सकते है

2013 में में 11 दिसंबर को उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि वाहनों पर लालबत्ती की इजाजत केवल संवैधानिक पद पर आसीन लोगों और उच्च पदस्थ हस्तियों को ही दी जानी चाहिए।


यहां पहले ही लग चुकी है रोक

2014 में दिल्ली सरकार ने मंत्रियों की गाड़ियों से लाल बत्ती हटवाई। सिर्फ उप राज्यपाल, हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस और जज ही फ्लैशर के साथ लाल बत्ती का इस्तेमाल कर सकते हैं।

2017 मे 18 मार्च को पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने लालबत्ती के इस्तेमाल पर रोक लगाने का फैसला किया। इसके तहत मुख्यमंत्री, विधायक और शीर्ष अधिकारी अपनी सरकारी गाड़ियों में लालबत्ती का इस्तेमाल नहीं करेंगे। लालबत्ती सिर्फ पंजाब के गवर्नर, चीफ जस्टिस और हाईकोर्ट के जज कर सकेंगे।
(19 अप्रैल 2017 )

Tuesday, 28 February 2017

जरूर पढ़ने वाली किताब - लाल नदी नीले पहाड़

अगर आप भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को जानना चाहते हैं तो आपके लिए बेहतरीन किताब हो सकती है लाल नदी नीले पहाड़। वैसे हिंदी में पूर्वोत्तर पर बहुत कम किताबें लिखी गई हैं। इन सबके बीच एक ऐसी समग्र किताब जो आपको पूर्वोत्तर के आठ राज्यों से परिचित कराए, इसकी तलाश इस किताब के साथ आकर खत्म होती है। रविशंकर रवि की इस पुस्तक में कुल 53 आलेख हैं। इनमें से ज्यादातर आलेख संस्मरण या फिर रिपोर्ताज की शैली में हैं। इसलिए हर पन्ने को पढ़ने हुए आगे बढ़ना रोचकता लिए हुए है। अरुणाचल प्रदेश, असम, मेघालय, मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा और सिक्किम,  हर राज्य पर आपको कुछ आलेख यहां पढ़ने को मिल जाएंगे। पर सबसे अच्छी बात है कहने की शैली, जो अत्यंत सरल और सधे हुए शब्दों में है। लेखक रविशंकर रवि 1989 में पूर्वोत्तर गए तो फिर वहीं के होकर रह गए। पुस्तक में उनकी तीन दशक की पूर्वोत्तर की पत्रकारिता के अनुभव को बखूबी महसूस किया जा सकता है। पुस्तक के शुरुआती लेखों में असम के महान संगीतकार, गायक भूपेन हजारिका से उनकी मुलाकात का प्रसंग आता है। आगे के कुछ अध्याय में भूपेन दादा की मृत्यु और उनकी संपत्ति को लेकर विवाद का भी प्रसंग है।
पुस्तक उन लोगों के लिए एक दोस्त की और गाइड की तरह भी काम करती है जो पूर्वोत्तर के राज्यों में घूमने की तमन्ना रखते हैं। दरअसल पूर्वोत्तर के कई राज्य खासकर अरुणाचल, सिक्किम और मेघालय बेइंतहा खूबसूरती समेटे हैं, पर वहां सैलानियों की आमद अपेक्षाकृत कम है। अपने कई लेखों में लेखक ये बताते हैं कि अरुणाचल घूमना कितना भयमुक्त है। साथ ही पूर्वोत्तर के अधिकांश क्षेत्रों में एक पर्यटक के तौर पर जाने पर आपको भयभीत होने की कोई जरूरत नहीं है। पुस्तक में लेखक की अरुणाचल प्रदेश की कई यात्राओं का विवरण है। लाल नदी नीले पहाड़ ब्रह्मपुत्र नदी और इससे जुड़े कई मिथ और हकीकत का भी खुलासा करती है। आपको दुनिया के सबसे बड़े नदी द्वीप माजुली में भी ले जाती है, तो कभी असम के चाय बगानों में भी सैर कराती है। इसमें कई आलेख ऐसे हैं जो आपको पूर्वोत्तर के राज्यों की पर्व त्योहार और सांस्कृतिक विशेषताओं से रुबरू कराते हैं। एक आम हिंदुस्तानी के लिए कई जानकारियां चमत्कृत करने जैसी हैं। उनके पढ़ते हुए ऐसा लग सकता है कि क्या हमारे देश में ऐसा भी होता है।
पुस्तक के कई लेख पहले विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं पर उनका लेखक ने बाद में संस्मरण शैली में परिमार्जन किया है, जो पढ़ने को और भी रोचक बना देता है। हालांकि कई लेखों में रचना काल का जिक्र किया जाता तो बेहतर होता। वे सभी अध्येता जो देश की सांस्कृति विभिन्नता के बारे में जानने को उत्सुक रहते हैं, लाल नदी नीले पहाड़ एक बहुमूल्य पुस्तक है, जिसे पढ़ने का मौका आपको गंवाना नहीं चाहिए।
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  पुस्तक – लाल नदी नीले पहाड़
-     लेखक - रवि शंकर रवि
-      मूल्य –   250 रुपये पृष्ठ – 264 ( पेपरबैक)
-      प्रकाशक -  बोधि प्रकाशन, जयपुर

पुस्तक कैसे प्राप्त करें
लिखें - श्री माया मृग, बोधि प्रकाशन, जयुपर-
फोन नं-9829018087 या 0141-2503989 
पता - बोधि प्रकाशन,  एफ/77, सेक्टर-9, रोड न.11, करतारपुरा इनडस्ट्रीयल एरियाबाइस गोदाम, जयपुर – 302006 (राजस्थान) 


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 - विद्युत प्रकाश मौर्य ( vidyutp@gmail.com )