Friday, 2 January 2009

लीज लाइन पर भी मिलती है अच्छी स्पीड

अब सभी बैंक व व्यापारिक संस्थान वी सेट के बजाय लीज्ड लाइन को ही प्राथमिकता दे रहे हैं। बैंक एटीएम और अखबारों के दफ्तरों में डाटा ट्रांसमिशन का काम लीज्ड लाइनों पर ही तेजी से चल रहा है। भारत में जब नेटवर्किंग की शुरूआत हुई तो अधिकतर डाटा ट्रांशमिशन का काम वीसेट के द्वारा हो रहा था। वीसेट के लिए मकान की छत पर एक बड़ा सा डिश लगाना पड़ता है। पर अब टेलीफोन लाइनों पर स्पीड में इजाफा होने के कारण वीसेट जैसी स्पीड लीज्ड लाइनों से ही प्राप्त होने लगी है। यह तकनीक वीसेट से सस्ती पड़ रही है।

आप जब रेल का टिकट बनवाते हैं तो यह किसी भी स्टेशन पर किसी भी स्टेशन का बन जाता है। एटीएम से रुपए आप किसी भी शहर में निकाल लेते हैं। एक साथ अखबार के कई संस्करण अलग अलग शहरों से प्रकाशित हो रहे हैं। इन सब प्रक्रिया में नेटवर्किंग का बहुत बड़ा योगदान है। यह नेटवर्किंग या तो वीसेट या लीज्ड लाइन के द्वारा हो रही है। प्रारंभ में रेलवे, बैंक और कुछ अन्य बडे़ दफ्तरों ने इस नेटवर्किंग के लिए वीसेट का सहारा लिया था। वीसेट में आमतौर पर 512 केबीपीएस (किलोबाइट प्रति सेकेंड) की गति से डाटा ट्रांसफर होता है। पर अब इतनी या इससे ज्यादा गति लीज्ड लाइनों से भी मिलने लगी है। भारत संचार निगम लि. की लीज्ड लाइन सेवा जिला हेडक्वार्टर और कई गांवों में भी उपलब्ध होने लगी है। रिलायंस, टाटा जैसी कंपनियां भी लीज्ड लाइन की सेवा उपलब्ध करा रही हैं।
सस्ता विकल्प है लीज्ड लाइन - किराया की दृष्टि से जहां वीसेट महंगा पड़ता था वहीं उसके रखरखाव में भी खर्च था। पर लीज्ड लाइन के लिए कोई डिश नहीं लगाना पड़ता है। वहीं खराब मौसम में वीसेट कई बार काम करना बंद कर देता है वहीं लीज्ड लाइनों में खराबी आने की संभवना कम रहती है। इसलिए अब कई बड़े बैंक भी वीसेट के बजाए लीज्ड लाइन नेटवर्क का सहारा ले रहे हैं। लीज्ड लाइन तभी फेल हो सकती है जब किसी कारण से उसकी तार कट जाए।
जिन शहरों में अथवा पहाड़ी इलाकों में जहां किसी भी कंपनी की लीज्ड लाइन सेवा उपलब्ध नहीं है वहां अभी भी वीसेट से नेटवर्क बनाना ही एक मात्र विकल्प है। पर कई बड़े बैंक और व्यापारिक संस्थान अपनी शाखाओं की नेटवर्किंग के लिए लीज्ड लाइन का ही सहारा ले रहे हैं। इसकी स्थापना में खर्च कम है तथा इसके रखरखाव में भी कोई परेशानी नहीं है। लीज्ड लाइन ने नेटवर्क के काम को आसान और सस्ता भी बनाया है। अभी कई बैंकों में बड़ी संख्या में नेटवर्क स्थापित करने का काम बाकी है। ऐसे में अब सभी दफ्तर लीज्ड लाइनों को ही प्राथमिकता दे रहे हैं।
आमतौर पर कंपनियां लीज्ड लाइनों का किराया मासिक तौर पर लेती हैं जिस पर 24 घंटे असीमित डाटा भेजा जा सकता है। अब 2 एमबी तक की लीज्ड लाइन सेवाएं उपलब्ध हैं। इन लाइनों पर अपने नेटवर्क में बातचीत भी की जा सकती है। इसके लिए कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं देना पड़ता है। इसके अलावा लोकल इंटरनेट पर चलने वाली सेवाएं चलाई जा सकती हैं। कई कंपनियों ने देश भर के प्रमुख शहरों को आप्टिकल फाइबर के जाल से जोड़ दिया है जिससे लीज्ड लाइन की सेवा देना आसान हो गया है।

-विद्युत प्रकाश vidyutp@gmail.com

Wednesday, 31 December 2008

गुजर गया एक साल और...

एक और साल गुजर गया...गुजरे हुए साल के टेलीविजन स्क्रीन पर नजर डालें तो समाचार चैनलों पर दो खबरें छाई रहीं, आरूषि मर्डर केस और मुंबई आतंकी हमले की लाइव कवरेज। भारत में 24 घंटे लाइव समाचार चैनलों का इतिहास अब एक दशक से ज्यादा का समय तय कर चुका है। इस एक दशक में परिपक्वता तो आई है लेकिन ये परिपक्वता किस तरह की है, इसके बारे में सोचना जरूरी है। क्या भारत के समाचार चैनल जिम्मेवार चौथे खंबे की भूमिका निभा रहे हैं।


अगर हम आरूषि मर्डर केस की बात करें तो तमाम टीवी चैनल जिनके दफ्तर नोएडा या दिल्ली में हैं उन्हें दिल पर हाथ रखकर पूछना चाहिए कि क्या आरूषि मर्डर केस जैसी घटना जबलपुर या रांची में हुई होती तो वे घटना को उतनी ही कवरेज देते। सच्चाई तो यही थी कि चैनल दफ्तर के पास एक क्राइम की खबर मिली थी, सबकों अपने अपने तरीके से कयास लगाने का पूरा मौका मिला। केस का इतना मीडिया ट्रायल हुआ जो इससे पहले बहुत कम केस में हुआ होगा। देश के नामचीन चैनलों ने मिलकर आरूषि और उसके परिवार को इतना बदनाम किया कि सदियों तक आत्मालोचना करने के बाद भी आरूषि की आत्मा उन्हें कभी माफ नहीं कर पाएगी।
सवाल यह है कि किसी भी टीवी चैनल को किसी परिवार की इज्जत को सरेबाजार उछालने का हक किसने दिया है। जाने माने संचारक ने कहा था कि मैसेज से ज्यादा जरूरी है मसाज। तो जनाब समाचार चैनल किसी एक खबर को इतनी बार इतने तरीके से मसाज करते हैं कि वह हर किसी के जेहन में किसी दु:स्पन की तरह अंकित हो जाता है। मैं अपने तीन साल के नन्हें पुत्र को उत्तर देने में खुद को असमर्थ पाता हूं जब वह समाचार चैनल देखकर कई तरह की जिज्ञासाएं ज्ञापित करता है। तब मेरा पत्रकारीय कौशल जवाब दे जाता है। सवाल एक नन्हीं सी जान का ही नहीं है। सवाल इस बात का है कि हम नई पीढ़ी को क्या उत्तर देंगे।


अब बात मुंबई धमाकों के लाइव कवरेज की। जिस चैनल के पास जितनी उन्नत तकनीक थी उस हिसाब से आंतकी के सफाया अभियान का जीवंत प्रसारण दिखाने की कोशिश की। लेकिन बाद में पता चला कि इसका हमें भारी घाटा उठाना पड़ा। आतंकी टीवी चैनलों की मदद से सब कुछ आनलाइन समझने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन हम देश को तीन दिन तक क्या दिखा रहे थे। टीवी के सुधी दर्शकों ने अपने अपने तरीके से खबर को देखा होगा, लेकिन एक बार फिर अपने तीन साल नन्हे बेटे के शब्दों की ओर आना चाहूंगा।


मेरा बेटा जो धीरे धीरे दुनिया को समझने की कोशिश कर रहा है, अक्सर कहा करता था कि पापा मैं बड़ा होकर पुलिस वाला बनना चाहता हूं। उसकी नजर में पुलिस वाले बहादुर होते हैं। पर 59 घंटे आतंकी सफाए की लाइव कवरेज देखने के बाद मेरे बेटे मानस पटल जो कुछ समझने की कोशिश की उसके मुताबकि अब वह पुलिस बनने का इरादा त्याग रहा है, उसने कहा कि पापा अब मैं पुलिस नहीं बनूंगा. अब तो मैं आतंकवादी बनना चाहता हूं। हां आतंकवादी इसलिए कि वे पुलिस वालों से भी ज्यादा बहादुर होते हैं। आतंकवादी पुलिस वालों को मार डालते हैं। ....ये था 59 घंटे टीवी चैनलों की लाइव कवरेज का असर। मैं अपने बेटे को एक बार फिर कुछ समझा पाने में खुद को असमर्थ पा रहा हूं।


जाहिर सी बात है कि टीवी चैनल खबरों को मांजने को लेकर अभी शैशवावस्था की में है। हम खबर को ढोल पीटकर दिखाना चाहते हैं। कोई अगर हमारे चैनल पर ठहरना नहीं चाहता है तो हम हर वो हथकंडे अपनाना चाहते हैं जिससे कि कोई रिमोट का बटन बदल कर किसी और चैनल की ओर स्वीच न करे। हालांकि सारे चैनलों के वरिष्ट पत्रकार दावा तो इसी बात का करते हैं कि वे जिम्मेवार पत्रकारिता ही कर रहे हैं लेकिन इस तथाकथित जिम्मेवार पत्रकारिता का लाखों करोड़ो लोगों पर कैसा असर हो रहा है....
तुम शौक से मनाओ जश्ने बहार यारों
इस रोशनी मे लेकिन कुछ घर जल रहे हैं...

हमें वाकयी दिल पर हाथ रखकर सोचना चाहिए कि हम जो कुछ करने जा रहे हैं उसका समाज पर क्या असर पडेगा। जब मीडिया के उपर कोर्ट की या सूचना प्रसारण मंत्रालय की चाबुक पड़ती है तब तब याद आता है कि हमें संभल जाना चाहिए। लेकिन हम अगर पहले से ही सब कुछ समझते रहें तो क्या बुराई है। सबसे पहले समाचार चैनलों ने प्राइम टाइम में अपराध दिखा दिखा कर टीआरपी गेन करने की कोशिश की थी। अब अपराध का बुखार उतर चुका है तो समाचार चैनल ज्यादातर समय अब मनोरंजन और मशाला परोस कर टीआरपी को अपने पक्ष में रोक कर रखना चाहते हैं। धर्म को बेचने का खेल भी अब फुस्स हो चुका है।
वैसे इतना तो तय है कि आने वाले सालों में फिर से खबरों की वापसी होगी। खबर के नाम पर आतंक, भय जैसा हाइप क्रिएट करने का दौर निश्चित तौर पर खत्म हो जाएगा। लेकिन वो सुबह भारतीय टीवी चैनल के इतिहास में शायद देर से आएगी, लेकिन आएगी जरूर....
- -विद्युत प्रकाश मौर्य

Friday, 19 December 2008

इनकी ईमानदारी का स्वागत करें

चांद मोहम्मद यानी चंद्रमोहन ने ऐसा कौन सा अपदाध कर दिया है कि उनके साथ अपराधी जैसा व्यवहार किया जा रहा है। उन्होने अनुराधा वालिया उर्फ फिजां से शादी रचाई है। हमें चंद्रमोहन के साहस और इमानदारी की तारीफ करनी चाहिए कि उन्होंने इस रिश्ते को एक नाम दिया है। एक पत्नी के साथ अठारह साल तक निभाने के बाद उन्होंने दूसरी शादी कर ली है। दूसरी शादी करने से पूर्व अपने पत्नी और बच्चों को उन्होंने भरोसे में लिया था।
उन्होंने शादी के लिए धर्म परिवर्तन किया ये अलग से चर्चा का मुद्दा हो सकता है। लेकिन कई साल तक राजनीतिक जीवन जीने वाले कालका से विधायक और हरियाणा के पूर्व उप मुख्यमंत्री रहे चंद्रमोहन ने सब कुछ सार्वजनिक करके रिश्तों में और सार्वजनिक जीवन में जो इमानदारी का परिचय दिया है उसका स्वागत किया जाना चाहिए। अगर हम पहले राजनीति की ही बात करें तो हर दशक में ऐसे दर्जनों नेता रहे हैं जिन्होंने दो दो शादियां की है।
दर्जनों लोगों ने हिंदू रहते हुए दो दो शादियां कर रखी हैं और इन शादियों पर पर्दा डालने की भी कोशिश की है।
भारतीय जनता पार्टी, लोकजनशक्ति पार्टी, राष्ठ्रीय जनता दल में कई ऐसे सीनियर लीडर हैं जिनकी दो शादियां है। भले ही हिंदू विवाह दो शादियों को गैरकानूनी मानता हो पर ये नेता एक से अधिक पत्नियों के साथ निभा रहे हैं।
अगर राजनीतिक की बात की जाए तो सभी जानते हैं कि राजनेताओं का महिला प्रेम कितना बदनाम रहा है। बड़े बड़े राजनेताओं पर रसिया होने के कैसे कैसे आरोप लगते रहे हैं। कहा जाता है कि किसी पिछड़े इलाके का बदसूरत दिखने वाला नेता जब सांसद बनकर दिल्ली आता है तो कई बार वह गोरी चमड़ी के ग्लैमर में आकर दूसरी शादी रचा लेता है। महिलाओं से रिश्ते को लेकर पंडित जवाहर लाल नेहरू एनडी तिवारी और न जाने और कितने नेताओं
के बारे में किस्से गढ़े जाते हैं। सिर्फ उत्तर भारत ही नहीं बल्कि दक्षिण भारत के राजनेता भी एक से अधिक शादी करने में पीछे नहीं रहे। अगर फिल्म इंडस्ट्री की बात की जाए तो वह ऐसे रिश्तों के लिए बदनाम है। हालीवुड की तरह भले ही एक ही जीवन में यहां कई शादियां और तलाक नहीं होते पर दो शादियों के वहां भी कई उदाहरण है। धर्मेंद्र से लेकर बोनी
कपूर तक लोगों ने दो शादियां कर रखी हैं। दक्षिण भारत के फिल्म निर्माताओं में तो दो शादियां आम बात है। चेन्नई में तो कहा जाता है कि निर्माताओं की दूसरी बीवीयों की अलग से कालोनी भी बनी हुई है। वैसे यह हमेशा से चर्चा का विषय रहा है कि एक आदमी जीवन में एक ही से निभाए या कई रिश्ते बनाए।
राजनेता, साहित्यकार, लेखक, कलाकार और फिल्मकार जैसे लोगों के जीवन में कई रिश्तों का आना आम बात होती है। कई लोग कई शादियां करते हैं तो कई लोग ऐसे रिश्तों को कोई नाम नहीं देते। साहित्य जगत में राहुल सांकृत्यायन के बार में कहा जाता है कि उनकी कुल 108 प्रेमिकाएं थीं जिनमें से सात या आठ से तो उन्होंने विधिवत विवाह भी किया था। सचिदानंद हीरानंद वात्स्यान अज्ञेय जैसे कई और नाम भी साहित्य जगत में हैं।
पत्नी के प्रति ईमानदारी न दिखाने पर रिश्तों में आए बिखराव की तो हजारों कहानियां हो सकती हैं। ऐसे में अगर कोई राजनेता अपने परिवार को विश्वास में लेने के बाद दूसरी शादी रचाता हो तो इसको किस तरह से गलत ठहराया जा सकता है। चंद्रमोहन और अनुराधा वालिया के बारे में बात की जाए तो दोनों ही विद्वान हैं और समाज में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन करते आ रहे हैं। अगर ये लोग चाहते तो इस रिश्ते कोई ना दिए बगैर
भी लंबे समय तक रिश्ता रख सकते थे। पर इन लोगों ने ऐसा नहीं किया वे जनता के सामने आए। उन्होंने मुहब्बत में तख्तोताज को ठुकरा दिया है। अपने अपने पद के साथ जुड़े हुए ग्लैमर की कोई परवाह नहीं की है। वे वैसे लोगों से हजार गुना अच्छे हैं जो किसी को धोखा देते हैं, चोरी करते हैं, जेब काटते हैं, चुपके चुपके गला रेत देते हैं। उन्होंने तो बस प्यार किया है। प्यार यानी ना उम्र की सीमा हो ना जन्म का हो बंधन....अगर प्यार होना
ही है तो यह किसी भी उम्र में हो सकता है।ऐसे जोड़े की इमानदारी से यह उम्मीद की जाती है कि वह राजनीतिक जीवन में सूचिता का निर्वहन करेगा, इसलिए ऐसे लोगों से पद नहीं छिनना चाहिए। अगर दूसरी शादी करने पर किसी को पद से हटाने की बात की
जाती हो तो बहुत से केंद्रीय मंत्री, राज्यों के मंत्री और सांसद विधायकों को भी अपना पद छोड़ना चाहिए....( राम विलास पासवान, लालमुनि चौबे और रमई राम जैसे लोगों से क्षमा मांगते हुए ) इसलिए मेरा ख्याल है कि चांद मोहम्मद को हरियाणा का उप मुख्यमंत्री पद सम्मान के साथ वापस मिलना चाहिए। कालका की जनता तो उम्मीद है कि उन्हें माफ कर देगी। क्योंकि वे कालका के अच्छे विधायक रहे हैं।

-विद्युत प्रकाश मौर्य

Saturday, 15 November 2008

बिहार में भोजपुरी फिल्म सिटी

कुछ फिल्मी सितारे और बिहार की सरकार इन दिनों बिहार में एक फिल्म सिटी बनाने को लेकर उद्यत हैं। वाकई यह बहुत अच्छी बात होगी अगर बिहार में कोई फिल्म इंडस्ट्री बन जाती है तो। फिल्में देखने का क्रेज बिहार में भी खूब है। खास तौर पर भोजपुरी फिल्में। लेकिन भोजपुरी फिल्में बनती मुंबई में हैं। आजकल भोजपुरी फिल्मों का सालाना टर्न ओवर 200 करोड़ को पार कर गया है। ऐसे में भोजपुरी फिल्मों से हजारों लोगों को रोजगार मिल रहा है। 

मजे की बात यह है कि भोजपुरी फिल्मों को आउटडोर लोकशन में शूटिंग बड़े पैमाने पर बिहार और यूपी में होती है। पर पोस्ट प्रोडक्शन का सारा काम मुंबई में जाकर होता है। जाहिर सी बात है कि इसमें हमारे मराठी भाइयों को भी भोजपुरी फिल्मों के कारण रोजगार मिलता है। लेकिन इन सबसे अलग हटकर बिहार में एक भोजपुरी फिल्म सिटी बननी ही चाहिए। क्यों .....क्योंकि तेलगू फिल्में हैदराबाद में बनती हैं। वहां कई स्टेट आफ द आर्ट स्टूडियो हैं। तमिल फिल्में चेन्नई में बनती हैं। बांग्ला फिल्में कोलकाता में बनती हैं। तो भला भोजपुरी फिल्में पटना में क्यों नहीं बननी चाहिए। इससे फिल्म से जुड़े लोगों को अपनी सेवाएं देने में आसानी होगी।

किसी संघर्ष करने वाले गायक संगीतकार या गीतकार को भागकर मुंबई जाना और वहां स्ट्रगल नहीं करना पडेगा। उसको बक्सर से पटना ही तो जाना होगा। निश्चय ही यह अच्छी बात होगी।

फिल्म स्टार मनोज तिवारी ने इस मामले में पहल की है। उनकी पहल पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आगे आए हैं। पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप पर एक फिल्मसिटी बनाने की बात हो रही है। बिहार सरकार इसके लिए 200 एकड़ जमीन देने की बात कर रही है। यह बड़ा सुखद संकेत है। अगर पटना राजगीर रोड पर फिल्म सिटी बनती है तो बड़ी अच्छी बात होगी । शूटिंग के आउटडोर लोकेशन के लिए राजगीर बड़ी मुफीद जगह हो सकती है। राजगीर में जानी मेरा नाम जैसी लोकप्रिय फिल्मों की शूटिंग हो चुकी है।

अगर बिहार में पोस्ट प्रोडक्शन का स्टूडियो होगा तो और फिल्म बनाने वालों को मौका मिलेगा। म्यूजिक वीडियो टीवी सीरियल की शूटिंग करने वालों को भी दिल्ली मुंबई का रूख नहीं करना पड़ेगा। मुझे तो लगता है कि भविष्य में बिहार में एक नहीं बल्कि कई स्टूडियो बनने चाहिए, और इतने स्तरीय स्टूडियो की मुंबई वाले भी अपना पोस्ट प्रोडक्सन का काम कराने के लिए बिहार का रूख करें। बिहार में फिल्मों के लिए तकनीकी टैलेंट की कमी नहीं है। बस उन्हें एक मौका देने की जरूरत है। अब मनोज तिवारी और भोजपुरी फिल्मों में अभय सिन्हा जैसे बड़े निर्माता इस क्षेत्र में आगे आ रहे हैं तो आगाज तो हो ही चुका है कुछ शुभ कार्यों के लिए....तो अंजाम भी अच्छा ही होना चाहिए.....
- विद्युत प्रकाश मौर्य

Wednesday, 5 November 2008

बेटे ने सुनाई कहानी - राजा और रानी

मैं रात को सोते समय रोज अपने तीन साल के बेटे को एक कहानी सुनाता हूं....कल रात मेरे बेटे ने कहा कि पापा कहानी सुनाओ..मैंने कहा- बेटे आज मूड नहीं है सोने दो..बेटा बोला ठीक है पापा आज मैं आपको कहानी सुनाता हूं.... अब मेरे तीन साल के बेटे ने जो कहानी सुनाई वो आप भी सुनें...

एक राजा था...उसके घर में अचानक बिजली चली गई...राजा को डर लगने लगा....तभी बिजली आ गई....तो राजा ने देखा उसके सामने रानी थी...

अच्छी कहानी थी न पापा...................
( अनादि अनत ) 

Friday, 31 October 2008

हम क्षमाशील बनें..

कुछ महीने मजदूरी करने के बाद वह अपने घर के लिए चला था। अपने परिवार के साथ दीवाली मनाने की इच्छा थी उसकी। मुंबई की लोकल ट्रेन में वह खिड़की वाली सीट पर बैठा था। मराठी भाइयों के कहने पर उसने खिड़की वाली सीट छोड़ भी दी थी। पर फिर भी उससे लोगों ने पूछा कहीं तुम मराठी मानुष तो नहीं हो। उसका दोष सिर्फ इतना ही था कि वह मराठी मानुष नहीं था। लोगों ने उसे पीटना शुरू कर दिया। उसकी जान चली गई। वह अपने बच्चों के संग दिवाली की लड़ियां नहीं सजा सका। उसकी पत्नी दीपमाला थी। वह दीपमाला सजा कर उसका इंतजार करती रही। पर न तो दिवाली पर वह आया न उसकी लाश आई। उसके पेट में एक और शिशु पल रहा है। वह अपने पापा से कभी नहीं मिल पाएगा।

महाराष्ट्र सरकार के गृह मंत्री कहते हैं कि गोली का जवाब गोली होना चाहिए। तो कुछ मित्रों ने तर्क किया है कि हमले का जवाब भी हमला होना चाहिए। मैं मानता हूं ऐसा नहीं होना चाहिए। हमें क्षमाशील बनना चाहिए। हम देश के किसी गृह युद्ध की ओर नहीं ले जाना चाहते। पर हमारे मराठी भाइयों को भी थोड़ा सहिष्णु बनना चाहिए।

Sunday, 26 October 2008

एक पाती राज भैय्या के नाम

वाह राज करो राज....वाह राज भइया...करो राज...आखिर यही तो राजनीति है...अंग्रेज कह गए थे..फूट डालो और राज करो..भले अंग्रेज नहीं रहे...लेकिन तुमने उसका सही मतलब समझ लिया है। पहले हम हिंदुस्तानी हुआ करते थे पर तुम मराठी मानुष की बात करते हो। बड़ी अच्छी बात है। महाराष्ट्र तुम्हारा है। मराठी लोग भी तुम्हारे हैं। पर देश के कोने कोने में रहने वाले बाकी मराठी भाई बहन भी तो तुम्हारे ही होने चाहिए। 

सुना है कि देश की राजधानी दिल्ली में भी तीन लाख मराठी भाई रहते हैं। वे भी तो मराठी मानुष हैं। वे सभी हमें अच्छे लगते हैं। उनसे हमें कोई वैर भाव नहीं है। देश के सभी राज्यों तक मराठी भाई बहन कारोबार करने और नौकरी करने पहुंचते हैं। वे सभी मराठी मानुष हैं। राज भैय्या आपको उन सबके सेहत की चिंता करनी चाहिए। वे भी आपके भाई बहन हैं। अगर आप राजा हैं तो आपकी प्रजा हैं। आपको उनके सुरक्षा की चिंता होनी चाहिए। भला बिहारियों का क्या है। उन्हें बिहार में नौकरी नहीं मिलती तो गुजरात चले जाते हैं, मुंबई चले जाते हैं, पंजाब चले जाते हैं। सभी जगह जाकर पसीना बहाते हैं चंद रूपये कमाते हैं। लौट कर तो चाहतें अपने देश आना पर क्या करें आ नहीं पाते हैं। कैसे आएं भला। बिना बिहारियों के पंजाब की खेती बंजर पड़ जाएगी। गुजरात की कपड़ा मिले बंद हो जाएंगी। मुंबई में चलने वाले उद्योग धंधे बंद हो जाएंगे। टैक्सियां खड़ी हो जाएंगी। शहर की सफाई नहीं हो सकेगी। मुंबई में बास आने लगेगी। बिहारी चाहते तो हैं बिहार में ही रहना। साग रोटी खाना पर परदेश नहीं जाना। पर क्या करें उन्हें मुंबई के फुटपाथ पंजाब के खेत और गुजरात के मिल बार बार बुलाते हैं। 
मजबूर लाचार बिहारी पूरे देश को अपना घर समझकर चले जाते हैं। भावनाओं में बह कर चले जाते हैं। वे मराठी मानुष को अपना बड़ा भाई समझ कर चले जाते हैं। तुम कहते हो तो अब नहीं जाएंगे। बुलाओगे तो भी नहीं जाएंगे, लेकिन तुम कैसे रहोगे...आखिर तुम्हारे केस मुकदमे कौन लड़ेगा। तुम्हारे बिल्डिंगें बनाने के लिए ईंट कौन उठाएगा। तुम्हारी गय्या की दूध कौन निकालेगा। राज भैय्या कौनो परेशानी शिकवा शिकायत हो तो खुल के कहो। अगर महाराष्ट्र में चुनाव लड़े के मुद्दा नाही मिलत हौ तो बिहार में आके लड़ जा। बिहार वाले आपको संसद में भेज देंगे। जार्ज फर्नांडिश को कई बार भेजा है, आपको भी भेज देंगे। ये बिहार दिल के बहुत बड़े हैं। अपमान जल्दी भूल भी जाते हैं और जल्दी माफ भी कर देते हैं....
- vidyutp@gmail.com 

Thursday, 23 October 2008

जो बिहार में हुआ वह भी ठीक नहीं ...

जो मुंबई में हुआ वह ठीक नहीं था लेकिन 22 अक्टूबर को जो बिहार में हुआ क्या वह ठीक था। राज ठाकरे के लोगों ने बेस्ट की बसों को नुकसान पहुंचाया। कल्याण की सड़कों पर जमकर आगजनी की। सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया। वह सब ठीक नहीं था। महाराष्ट्र सरकार ऐसे लोगों से जुर्माना वसूलने का कानून बनाने जा रही है। निश्चय ही यह अच्छा कानून होगा। पर बिहार में गुस्साई भीड़ ने बाढ़ रेलवे स्टेशन पर जिस तरह एक्सप्रेस ट्रेन की एसी कोच को आग के हवाले कर दिया, उसकी भरपाई कौन करेगा। ट्रेन की एक बोगी कितने की आती है...इसका अंदाजा सबको है।

 आजकल एक बस ही 20  से 25 लाख में आती है। ट्रेन की एक वातानुकूलित बोगी को आग के हवाले करने का मतलब है करोड़ों का नुकसान। कई नौकरियां जिंदगी भर की बचत में भी एक ट्रेन की बोगी नहीं खरीद सकती हैं। फिर ऐसी आगजनी क्यों। विरोध करने के लिए गांधीवादी तरीका ठीक है। 

अगर विरोध ही करना हो तो धरना प्रदर्शन और नारेबाजी से भी बात कही जा सकती है। जिस रेलवे में नौकरी करना चाहते हो, उसी की प्रोपर्टी को आग के हवाले करते हो। शर्म आनी चाहिए। जो राज ठाकरे के लोग मुंबई में कर रहे हैं वहीं हम पूरे देश में करना शुरू कर दें, फिर देश का क्या होगा।
- vidyutp@gmail.com 

Thursday, 16 October 2008

बाजारवाद के बीच अर्थ खोते त्योहार

-राष्ट्रपति कलाम का का मानना है कि उपहार जहर के समान होते हैं। इनके लेनदेन के पीछे कोई न कोई उद्देश्य छिपा होता है।

तमाम उपभोक्ता कंपनियों की नजर सभी त्योहारों को अपने तरीके से कैश कराने पर है। ऐसे में बाजारवाद के बीच त्योहार अपना अर्थ खोते जा रहे हैं। तमाम हिंदू त्योहारों के बीच बाजार ने अपनी पैठ गहराई से बना ली है। जैसे रक्षा बंधन पर भाई बहन को क्या गिफ्ट दे इस बारे में आपको सलाह देने के लिए तमाम कंपनियों के पैकेज उपलब्ध हैं। रिश्तों में इस बाजार के घुस आने से रिश्ते अपना वास्तिवक अर्थ खोते जा रहे हैं। जिससे कई जगह रिश्तों की गरमाहट को उपहारों की कीमतों से मापा जाने लगा है। सुधीर की बहन सुमन ने इस बार अपने भाई से कहा कि तुम इस रक्षा बंधन में मुझे अमुक ब्रांड का मोबाइल फोन ही गिफ्ट करना। अब भाई का बजट उसके अनुकूल नहीं था पर उसे कहीं न कहीं से इंतजाम करके वह सब कुछ देना ही पड़ा। इसी तरह डिंपी के भांजों ने अपने अपने मामा से कहा कि इस दिवाली पर आप हमें वाशिंग मशीन और वीडियो गेम गिफ्ट कर ही दो।

उपहार का भले ही मतलब होता है कि जो अपनी मरजी और श्रद्धा से दिया जाए पर कई रिश्तों में लोग खुलकर उपहार मांगने लगे हैं। कई लोग दिल खोलकर उपहार देते हैं तो कई लोगों को मजबूरी में ही सही देना पड़ता है। इस उपहार संस्कृति का प्रभाव रिश्तों पर भी पड़ता है। दिपावली को तो अब उपहार देने लेने का ही त्योहार बना दिया गया है। सभी बिजनेस क्लाएंट अपने ग्राहकों को खुश करने के लिए उपहार देते हैं। यह कारपोरेट गिफ्ट का कारोबार तो करोड़ों में चलता है। पर रिश्तेदारी नातेदारी में भी ड्राइफ्रूट के डिब्बों से लेकर मिठाइयां और महंगे उपहारों का कारोबार खूब चलता है। मध्यम वर्गीय परिवारों को भी ढेरों उपहार खरीदने पड़ते हैं। कुछ लोग इस दौरान अक्लमंदी से उपहारों को एक दूसरे के यहां शिफ्ट करते हैं। जैसे ही दिवाली नजदीक आती है उपहारों के लेनदेन की तैयारी शुरू हो जाती है। लोग योजना बनाने लगते हैं। फलां ने मुझे पिछले साल क्या उपहार दिया था। इस बार उसको उसकी कीमत से बड़ा उपहार जवाब में देना है। कई बार यह उपहार नहीं बल्कि आपके गाल पर एक जवाबी तमाचा होता है।
उपहारों को लेकर हाल में राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम का संस्मरण याद करने योग्य है। उन्होंने बताया कि एक बार उन्हें किसी ने उपहार दिया तो कलाम के पिता ने उसे उपहार वापस कर आने को कहा। उनके पिता ने समझाया कि ये उपहार जहर के समान है। यह रिश्वत से भी बुरा है। वास्तव में जब आपको कोई उपहार देता है तो उसके पीछे उसका कोई न कोई स्वार्थ छिपा होता है। इसलिए हमें उपहारों को जहां तक हो सके नकारना ही चाहिए। अगर हम वर्तमान संदर्भ में भी राष्ट्रपति कलाम के इस संस्मरण से कोई प्रेरणा ले सकें तो बड़ी अच्छी बात होगी। अगर हम इस उपहार संस्कृति से उपर उठ कर सोचें और व्यवहार करें तभी हम भारतीय संस्कृति के इन त्योहारों का सही अर्थ को समझ पाएंगे और उसके अनुरूप आचरण करके त्योहार के महत्व को बचाए रख सकेंगे। साथ ही हर त्योहार के पीछे छूपे मर्म को समझ सकेंगे। वर्ना आने वाले पीढ़ी तो इन त्योहारों को लेनदेन के व्यापार के रुप में ही समझा करेगी।
- विद्युत प्रकाश मौर्य

Friday, 3 October 2008

तो ये महादेव कुशवाहा का सज्जनपुर है....

बहुत दिनों बाद एक ऐसी अच्छी फिल्म देखने में आई है जिसमें कामेडी भी है और गांव की समस्याओं को बड़ी खबूसुरती से उभारा गया है। जी हां हम बात कर रहे हैं श्याम बेनेगल की फिल्म वेलकम टू सज्जनपुर की।
बालीवुड में बनने वाली अमूमन हर फिल्म की कहानी में महानगर का परिवेश होता है, अगर गांव होता है तो सिर्फ नाममात्र का। अब गंगा जमुना और नया दौर जैसी फिल्में कहां बनती हैं। पर श्याम बेनेगल ने एक अनोखी कोशिश की है जिसमें उन्हें शानदार सफलता मिली है। सज्जनपुर एक ऐसा गांव है जहां साक्षरता की रोशनी अभी तक नहीं पहुंची है। ऐसे में फिल्म का हीरो महादेव कुशवाहा ( श्रेयश तलपड़े) जो गांव का पढ़ा लिखा इन्सान है, जिसे बीए पास करने के बाद भी नौकरी नहीं मिल पाई है, गांव के लोगों की चिट्ठियां लिखकर अपनी रोजी रोटी चलाता है। पर महादेव कुशवाहा के साथ इस फिल्म में गांव की जो राजनीति और भावनात्मक रिश्तों का ताना-बाना बुनने की कोशिश की गई है, वह हकीकत के काफी करीब है। पर फिल्म की पटकथा इतनी दमदार है जो कहीं भी दर्शकों को बोर नहीं करती है। कहानी अपनी गति से भागती है, और ढेर सारे अच्छे संदेश छोड़ जाती है। भले ही फिल्म हकीकत का आइना दिखाती है, पर फिल्म का अंत निराशाजनक नहीं है। फिल्म की पटकथा अशोक मिश्रा ने लिखी है।
कहानी का परिवेश मध्य प्रदेश के सतना जिले का एक काल्पनिक गांव है। सज्जनपुर के पात्र भोजपुरी ओर बघेली जबान बोलते हैं जो वास्तविकता के काफी करीब है। कहानी के गुण्डा पात्र हकीकत के करीब हैं, तो अमृता राव कुम्हार कन्या की भूमिका में खूब जंचती है। फिल्म में संपेरा और हिजड़ा चरित्र समाज के उन वर्गों का प्रतिनिधित्व करते हैं जिन्हें हम गाहे-बगाहे भूलाने की कोशिश करते हैं। भोजपुरी फिल्मों के स्टार रवि किशन भी फिल्म में हंसोड़ भूमिका में हैं, लेकिन उनका अंत दुखद होता है। फिल्म की पूरी शूटिंग रामोजी फिल्म सिटी, हैदराबाद में रिकार्ड तीस दिनों में की गई है। लिहाजा वेलकम टू सज्जनपुर एक कम बजट की फिल्म है, जिसने सफलता का स्वाद चखा है। फिल्म ने ये सिद्ध कर दिखाया है कि अगर पटकथा दमदार हो तो लो बजट की फिल्में भी सफल हो सकती हैं। साथ ही फिल्म को हिट करने के लिए मुंबईया लटके-झटके होना जरूरी नहीं है।
भारत की 70 फीसदी आत्मा आज भी गांवों में बसती है, हम उन गांवों की सही तस्वीर को सही ढंग से परदे पर दिखाकर भी अच्छी कहानी का तानाबाना बुन सकते हैं, और इस तरह के मशाला को भी कामर्शियल तौर पर हिट बनाकर दिखा सकते हैं। अशोक मिश्रा जो इस फिल्म के पटकथा लेखक हैं उनका प्रयास साधुवाद देने लायक है। साथ ही फिल्म के निर्देशक श्याम बेनेगल जो भारतीय सिनेमा जगत का एक बडा नाम है, उनसे उम्मीद की जा सकती है, वे गंभीर समस्याओं पर भी ऐसी फिल्म बना सकते हैं जो सिनेमा घरों में भीड़ को खींच पाने में सक्षम हो। अभी तक श्याम बेनेगल को समांतर सिनेमा का बादशाह समझा जाता था। वे अंकुर, मंथन, सरदारी बेगम और जुबैदा जैसी गंभीर फिल्मों के लिए जाने जाते थे। फिल्म का नाम पहले महादेव का सज्जनपुर रखा गया था, पर बाद में फिल्म के नायक श्रेयश तलपड़े के सलाह पर ही इसका नाम वेलकम टू सज्जनपुर रखा गया है। फिल्म की कहानी एक उपन्यास की तरह है। इसमें प्रख्यात उपन्यासकार और कथाकार मुंशी प्रेमचंद की कहानियों और उपन्यासों जैसी गहराई है। पर वेलकम टू सज्जनपुर ऐसी शानदार फिल्म बन गई है जो गांव की कहानी दिखाकर भी महानगरों के मल्टीप्लेक्स में दर्शकों को खींच पाने में कामयाब रही है।
-विद्युत प्रकाश मौर्य