Thursday, 10 March 2011

दौर आसमान में लड़ाई का -


नया वक्त आसमान में एक नए तरह की लड़ाई का है। यह लड़ाई आसमान में लड़ाकू विमानों से नहीं की जानी है। बल्कि इस लड़ाई में उपग्रह चैनलों का इस्तेमाल हो रहा है। जो अपने अपने चैनलों के माध्यम से ग्लोबल समाज में अपनी अपनी विचारधारा और खबरें पेश कर रहे हैं। न सिर्फ बीबीसी बल्कि सीएनएनएनबीसी भी अपने देशों की विचारधार पेश कर रहे हैं। अब अगर स्टार समूह के चैनलों की बात करें तो रुपर्ट मर्डोक जैसे लोगों ने अपने टीवी चैनल समूह के बल पर दुनिया के कई देशों की राजनीति को प्रभावित करना आरंभ कर दिया है। एशिया देशों में अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिए ही स्टार टीवी और उसके साथ विभिन्न पैकेज चैनलों की शुरूआत की गई है। यह उसी सूचना सम्राज्यवाद का हिस्सा है।
अरब के देशों की विचारधारा को पेश करने के लिए अंतरराष्ट्रीय मंच पर कोई चैनल नहीं थालिहाजा इस जरूरत को पूरी करने के लिए अलजजीरा जैसे चैनल को खोला गया। अब अल जजीरा पूरी दुनिया में अपनी बातों को ठीक ढंग से रखने के लिए एक अंगरेजी चैनल शुरू कर रहा है।
भारत में सबस बड़ा टीवी चैनल समूह जी न्यूज एक अंगरेजी में अंतरराष्ट्रीय चैनल शुरू करने की योजना बना रहा है। यह जी की ग्लोबल रीच की रणनीति का हिस्सा है। जब इतने लोग इस दौड़ में हैं तो भला भारत सरकार क्यों पीछे रहे है।
सरकारी मीडिया की जरूरत - दूरदर्शन भारत का एक सरकारी मीडिया है। एक दशक पूर्व दूरदर्शन को स्वायत्त संस्था बनाने की हवा बहुत तेजी से उठी थी। इसी को लेकर प्रसार भारती का गठन भी किया गया। पर जब निजी क्षेत्र जिस देश में एक दर्जन समाचार चैनल हों वहां एक स्वायत्त सरकारी चैनल की क्या जरूत है। दूरदर्शन को अब एक सरकारी मीडिया के तौर पर काम करना चाहिए। भला सरकार को अपना सरकारी पक्ष मजबूती से किसी विषय पर रखना हो तो वह किस मंच का इस्तेमाल करेगी। निजी चैनल की अपनी मर्जी है कि वे किसी विषय पर सरकारी पक्ष को कितना दिखाते हैं। इसलिए आज के दौर में मजबूत सरकारी मीडिया की भी जरूरत है। इसी के तहत दूरदर्शन का 24घंटे का समाचार चैनल शुरू किया गया है। अब इसी रणनीति के तहत ही एक अंतरराष्ट्रीय समाचार चैनल की बात की जा रही है। यह एक सही समय पर उठाया जाने वाला सही कदम है। इस तरह के किसी चैनल से पूरे विश्व पटल पर भारत का पक्ष बेहतर ढंग से प्रस्तुत किया जा सकेगा। अगर भारत आने वाले समय में विश्व शक्ति के रुप में उभरना चाहता है तो उसे पूरी दुनिया के बीच अपनी बातें रखने के लिए एक बेहतर मीडिया मिले यह समय की बहुत बड़ी जरूरत है।
यह सच्चाई है को निजी क्षेत्र का कोई भी चैनल हो चाहे वह भारतीय हो फिर विदेशी वहां अगर सरकार अपना पक्ष रखना चाहे तो वह सरकारी पक्ष को कितनी तवज्जो दे वह उस चैनल पर निर्भर करता है। वैसे भी सभी निजी चैनल खबरों में बिकाउ तत्व को प्राथमिकता दे रहे हैं। ऐसे में सरकारी पक्ष की अवहेलना होती ही रहती है। ऐसे में सरकार को राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय दोनों ही परिपेक्ष्य में अपना टीवी चैनल जरूर ही चलना चाहिए। सिर्फ सूचना प्रसारण मंत्रालय या राज्यों की जन संपर्क विभाग ही इन कार्यों को अंजाम देने के लिए पर्याप्त नहीं है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य

Tuesday, 8 March 2011

सारनाथ में अस्सी फीट के गौतम बुद्ध

सारनाथ में गौतम बुद्ध की 80 फीट की प्रतिमा।
वाराणसी के पास स्थित सारनाथ में वैसे तो सैलानियों कई आकर्षण है। सारनाथ के इतिहास में अब एक नया अध्याय जुड गया है। अब जब आप सारनाथ जाएंगे तो वहां भगवान बुद्ध की चलायमान अभय मुद्रा में बनी देश की सबसे ऊंची लगभग 80 फीट प्रतिमा देखने को मिलेगी। हालांकि सारनाथ में पहले से ही बुद्ध की प्रतिमा है लेकिन बुद्ध की चलायमान प्रतिमा अनूठी है।


हैदराबाद के हुसैनसागर झील में भी गौतम बुद्ध की ग्रेनाइट से बनी प्रतिमा लगी है लेकिन ये प्रतिमा 60 फीट के आसपास की है। लेकिन सारनाथ में लगी गौतम बुद्ध की प्रतिमा देश में सबसे ऊंची मानी जा रही है। इसे वाराणसी के पास चुनार से लाए गए पत्थरों से बनाया गया है। बोधगया में ज्ञान प्राप्ति के बाद सारनाथ ही वह जगह जहां गौतम बुद्ध ने अपना पहला संदेश उन पांच शिष्यों को दिया था जो कभी गौतम बुद्ध का साथ छोड़कर चले गए थे। इस घटना को धर्म चक्र परिवर्तन की संज्ञा दी गई थी। गौतम बुद्ध के जीवन में और बौद्ध धर्म के इतिहास में सारनाथ का खास महत्व है। वाराणसी जंक्शन से छह मील दूर सारनाथ में धमेक स्तूप, मूलगंध कुटी मंदिर, संग्राहालय, खंडहर, सुरंग, चिड़ियाघर जैसी कई चीजें देखने लायक पहले से ही हैं। अब सारनाथ में बौद्ध प्रतिमा बड़ा आकर्षण बन गई है। इसलिए जब आप अगली बार वाराणसी जाएं तो सारनाथ में गौतम बुद्ध की प्रतिमा के दर्शन करना न भूलें।


- विद्युत प्रकाश

Saturday, 26 February 2011

संपतलाल पुरोहित - फिल्म पत्रकारिता के पितामह

दिल्ली के दरियागंज में सात नंबर मकान का एक कमरा। संपतलाल पुरोहित का आखिरी दिनों में यही  पता था। अकेले रहते थे। एक नेपाली नौकर उनकी सेवा में होता था। पत्नी और बेटे पहले ही दुनिया से कूच कर चुके थे। जीवन के आखिरी दिनों में कई अखबारों में कालम लिखते , उससे आने वाले पैसे से उनका जीवन चलता था। 

पांच दशक से  ज्यादा फिल्म पत्रकारिता करने वाले पुरोहित जी फिल्म पत्रकारिता की चलती फिरती लाइब्रेरी थे। महबूब,  कुंदनलाल सहगल, पृथ्वी राजकपूर, राजकपूर, गुरुदत्त, देवानंद से लेकर नई पीढ़ी के सितारों निर्माता निर्देशकों की कहानी उनसे सुनी जा सकती थी। एक बार उन्होंने बताया कि एक प्रेस कान्फ्रेंस में धर्मेंद्र अपने बेटे सन्नी दयोल के साथ आए। सन्नी की पहली फिल्म बेताब आने वाली थी। धर्मेंद्र ने कहा पुरोहित जी के पांव छूकर आशीर्वाद लो। और सन्नी उनके चरणों में झुक गए। कुछ ऐसा था फिल्मी सितारों का एक पत्रकार के प्रति सम्मान। 

लगभग चालीस सालों  तक उन्होने एक फिल्म पत्रिका युगछाया का सफल संपादन किया। पुरोहित जी पहले प्रसिद्ध फिल्म पत्रिका चित्रपट के संपादक थे। 1947 में उन्होने युग छाया शुरू की और 1978 तक सफलता पूर्वक निकालते रहे। पुरोहित जी मध्य प्रदेश के धार शहर के रहने वाले थे। बचपन से ही फिल्मों में रूचि थी। सो फिल्म पत्रकार बन गए। आओ बच्चों तुम्हे दिखाएं...और ए मेरे वतन के लोगों लिखने वाले कवि प्रदीप के शिष्य रह चुके थे। पुरोहित जी हमारे समाचार पत्र कुबेर टाइम्स में एक सिनेमा पर एक नियमित कालम लिखते थे। एक बार संदेशवाहक की जगह मुझे खुद उनका कालम लाने जान पड़ा। इसी दौरान पुरोहितजी से आत्मीय परिचय हुआ।उसके बाद हर हप्ते मैं ही उनसे कालम लेने के लिए जाने लगा। इसके पीछे मेरा लोभ था। मुझे उनसे घंटेभर बातचीत का मौका मिलता और मैं उनसे सिनेमा के बारे में ढेर सारी जानकारियां लेता।

 दिल्ली में उनके समकालीन ब्रदेश्वर मदान, बच्चन श्रीवास्तव जैसे फिल्म पत्रकार थे लेकिन पुरोहित जी में बाल सुलभ सहजता थी। अपने आखिरी दिनों तक सांध्य टाइम्स में उनका नियमित कालम फिल्मी सवालों के जवाब का आता था जो काफी लोकप्रिय था। जब तक जीए पुरोहित जी पूरी आशावादिता के साथ लिखते रहे। जिंदगी ने उनसे बहुत कुछ छिना लेकिन फिर भी जीवन से कोई शिकायत नहीं थी। बुरे लम्हों को याद नहीं करते थे। हसीन लम्हों को याद कर खुश होते....जीवन चलने का नाम.....और एक दिन वे हमें छो़ड़कर चले गए।
- विद्युत प्रकाश मौर्य   

Thursday, 17 February 2011

घनश्याम पंकज की याद

जनवरी 2011 में कई महान विभूतियां हमारे बीच नहीं रहीं। 26 जनवरी को कोच्चि में 68 साल की आयु में घनश्याम पंकज ने अंतिम सांस ली। वरिष्ठ पत्रकार घनश्याम पंकज को भी काल ने हमसे छीन लिया। पंकज जी के सानिध्य में मैंने पहली नौकरी में कुबेर टाइम्स में काम किया। मैं दिल्ली में फीचर पन्ने पर काम करता था। काम के दौरान ही उनसे परिचय हुआ। दो बार लखनउ में 20 राजभवन कालोनी में बड़ी आत्मीय मुलाकाते हुईं थीं। एक महीने पहले फोन पर बात हुई तो फिर से एक बार मिलने की चर्चा हुई। लेकिन इस बीच वे कूच कर गए हमेशा के लिए।
पंकज जी वैसे हिंदी के पत्रकारों में थे जिनके संपादकीय अग्रलेख बड़े ही परिपक्व और भविष्य की दृष्टि रखने वाले माने जाते थे। बिहार के एक शहर से निकले थे.। पत्रकारिता में ऊंचा मुकाम हासिल किया। लेकिन जब तक जीए शाही जीवन रहा। दिल्ली में सफदरजंग एन्क्लेव में उनकी कोठी थी। पत्नी विनिता पंकज पहले ही उन्हें छोड़ कर इस दुनिया से जा चुकी थीं। घनश्याम पंकज समाचार एजेंसियों के बाद लंबे समय तक नवभारत टाइम्स के साथ रहे। दिनमान के भी संपादक रहे। स्वतंत्र भारत, कुबेर टाइम्स जनसत्ता एक्सप्रेस जैसे अखबारों को अपने संपादकीय कौशल से लंबे समय तक चलाने की कोशिश की। वे वैसे संपादकों में से थे जो अपने तमाम मातहतों को लंबे समय तक याद रखते थे। टीम बनाकर चलते थे और टीम को बार बार जोड़ने की कोशिश करते थे। व्यक्तित्व किसी फिल्म स्टार की तरह था। खैर उनके बेटे कबीर कौशिक एक सफल फिल्मकार बन चुके हैं। उन्होने अब तक तीन फिल्में बनाई हैं सहर, चमकू और हम तुम और घोस्ट।
-विद्युत प्रकाश मौर्य
    

Sunday, 6 February 2011

गंडक घाटी वाले चौहान चाचा की याद

मई 2010 की एक मनहूस सुबह थी वो जब तेज प्रताप चौहान इस दुनिया में नहीं रहे। तेज प्रताप चौहान हाजीपुर के ऐसे पत्रकारों में थे जो पत्रकारिता के जीता जागता इतिहास थे। सिर्फ मैंने और मेरे छोटे भाई बहनों ने ही नहीं बल्कि हाजीपुर से जुड़े तमाम पत्रकारों ने चौहान जी से पत्रकारिता का ककहरा सीखा था। मैं भारतीय जन संचार संस्थान में जाने से पहले या फिर जब सक्रिय पत्रकारिता शुरू करने के बाद भी जब कभी हाजीपुर में होता चौहान जी से मार्गदर्शन लेता था। चौहान जी ने आजादी से पहले से पत्रकारिता शुरू की थी। देश आजाद होने के बाद 50 सालों का बनता बिगड़ता बिहार देखा था। कभी ललित नारायण मिश्र जैसे राजनेता के करीब थे तो रामविलास पासवान जैसे नेता उनका सम्मान करते थे. लेकिन चौहान जी वैसे पत्रकार थे जो जीवन में कभी पैसे के पीछे नहीं भागे। 

इतिहास में उनकी गहरी रूचि थी। वैशाली जिले के बलवा कोआरी गांव के रहने वाले थे। हर साल अप्रैल महीने में वीर कुअंर सिंह जयंती पर बड़ा आयोजन करते थे। जब मैं वाराणसी में बीएचयू में पढ रहा था तब उन्होंने मुझसे चंद्रशेखर मिश्र रचित वीर कुअंर सिंह महाकाव्य जो भोजपुरी में है उसकी एक प्रति मंगाई थी।

चौहान जी के बारे में कहा जाता है कि महापंडित राहुल सांकृत्यान के साथ भी उन्होंने थोड़े वक्त काम किया था। 80 साल से ज्यादा के उम्र में हाजीपुर शहर में अकेले रहते थे। तमाम नए पत्रकारों लेखकों और रंगकर्मियों का उत्साहवर्धन करते रहते। उनकी एकेडमिक शिक्षा भले ही ज्यादा न रही हो लेकिन इतिहास के प्रकांड विद्वान थे। वे गंडक घाटी सभ्यता शोध उन्नयन परियोजना नामक संस्था चलाते थे। सभी नए लोगों  को इतिहास को सहेजने और याद रखने की प्रेरणा देते थे। वैशाली जिले ने एक माटी बड़ा सपूत खो दिया है। मुझे दुख है कि नई पीढ़ी के मेरे जैसे पत्रकार उनसे उतना नहीं सीख गुन सके जीतना उनसे पाना चाहिए था।
- विद्युत प्रकाश मौर्य

Saturday, 22 January 2011

एके हंगल साहब का दर्द

फिल्मों के लोकप्रिय अभिनेता एके हंगल बीमार हैं। वे 95साल के हैं। उनका दर्द है कि वे तंगहाल हैं। उनको मदद की जरुरत है लेकिन फिल्म इंडस्ट्री के लोग उनकी मदद नहीं कर रहे हैं। हंगल ने 200 फिल्मों में चरित्र अभिनेता के तौर पर काम किया। अमिताभ बच्चन, अशोक कुमार से लेकर सभी बड़े सितारों के साथ काम किया।

वे इप्टा से जुडे थियेटर आर्टिस्ट रहे। जाहिर 95 साल की उम्र में उन्होंने कई पीढ़ियों को देखा है। लेकिन ये फिल्म इंडस्ट्री का पुराना दस्तूर है, पुराने लोगों को नई पीढ़ी तो दूर उनके साथ के लोग भी भूल जाते हैं। इसलिए हर स्टार कलाकार को अपना बुढापा संरक्षित रखने के लिए धन संचय करना चाहिए। विपत्ती काल के लिए धन संचय करना चाहिए। हंगल साहब ने 200 फिल्मों में काम किया, भले ही लोग लोग उन्हें याद रखते हों लेकिन उन्होंने अपना बुढापा सुरक्षित रखने के लिए धन नहीं जमा किय़ा। 

एके हंगल तो चरित्र अभिनेता रहे। कई नामचीन अभिनेता अभिनेत्री भी बुढापे में एकाकी जीवन जीने को मजबूर हैं। किसी जमाने के सुपर स्टार रहे राजेश खन्ना के साथ आज उनका परिवार नहीं है। पुराने जमाने के सितारे विश्वजीत एक बार मुंबई की सड़कों पर निकले तो किसी ने उन्हें पहचाना नहीं। कई बड़े कलाकार जीवित हैं लेकिन वे सक्रिय नहीं है, फिल्मी पार्टियों में नकली चेहरा लगाकर नहीं घूमते तो कोई उन्हें नहीं जानता। अच्छा तो यही हो कि फिल्मी सितारों को बुढ़ापे में खैरात मांगने की नौबत नहीं आए। आम तौर पर सितारे अपने हिट फिल्मों के दौर में ग्लैमर ओढ़ कर जीते हैं लेकिन जब कई सालतक फिल्में नहीं मिलती तब जीवन मुश्किल हो जाता है। शाहखर्ची जारी रहती है लेकिन आमदनी का स्रोत नहीं होता। इसलिए सितारों को भी कालकुलेटेड जिंदगी जीनी चाहिए। किसी जमाने की लोकप्रिय कलाकार जोहरा सहगल 98 साल की हो गई हैं।

 दिल्ली में अपनी ओडिसी डांसर बेटी किरण सहगल के साथ रहती हैं। कभी कभी अपने विश्व बैंक काम करने वाले बेटे के पास भी उड़ कर चली जाती हैं। पिछले 13 सालों से मैं उनके परिवार के संपर्क में रहकर जानता हूं, कि वे बिंदास जिंदगी जीती हैं। अब हंगल साहब से साहनुभूति दिखाने फिल्मी कलाकार और संस्थाएं आईं हैं लेकिन ये दौर किसी के जीवन में न ही आए तो कितना अच्छा हो...  ( 26 अगस्त 2012 को एके हंगल का निधन हो गया ) 
- विद्युत प्रकाश मौर्य


Friday, 14 January 2011

मल्टीप्लेक्स में छाई वीरानगी

कई सालों बाद एक बार फिर दिल्ली के किसी मॉल में जाकर फिल्म देखने की सोची । अपने नन्हे बेटे को हॉलीवुड की लोकप्रिय फिल्म गुलिवर ट्रेवेल्स दिखाना चाहता था। सो मैं पहुंच गया पीवीआर के थ्री स्क्रीन मल्टीप्लेक्स में। जैसे ही मैंने फिल्म के लिए दो टिकटों की मांग की, काउंटर पर बैठी बाला ने आग्रह किया है कि आप थोड़ी देर इंतजार करें...हो सकता है शो नहीं चल पाए। मैंने पूछा क्यों....दरअसल अभी तक इस शो के लिए एक भी टिकट नहीं बिका है। 

काउंटर गर्ल ने बताया कि कमसे कम छह टिकटें बिकने पर ही हम शो शुरू कर पाएंगे। खैर मैंने शापिंग मॉल की तीसरी मंजिल पर बने मल्टीप्लेक्स के आसपास के रेस्टोरेंट में चहलकदमी शुरू कर दी। फिल्म शुरू होने से पांच मिनट पहले फिर काउंटर पर पहुंचा। अब मुझे खुशी हुई फिल्म शुरू होगी। टिकट लेकर अंदर जाने पर पता चला कि फिल्म देखने वाले हम कुल चार लोग थे। फिल्म शुरू होने पर दो लोग और पहुंचे। यानी कुल छह लोगों ने मिलकर फिल्म देखी।

दिल्ली के कई बड़े मॉल में खुले सिनेमाघरों का यही हाल है। यहां दर्शक नहीं जुटते। टिकट दरें बहुत ऊंची हैं। सौ से दौ सौ रूपये तक...सिनेमाघर ज्यादा बन गए हैं। दर्शक कम हैं...जो फिल्म ज्यादा नहीं चलती है। कुछ हफ्ते बाद ही उसका असली डीवीडी आ जाता है बाजार में..वह भी बिल्कुल सस्ते में...ऐसे में आखिर महंगी फिल्में लोग देखें भी कैसे...छोटे शहरों के सिंगल स्क्रीन सिनेमाघर में भी कभी शो कैंसिल होने की बात नहीं सुनी। अगर कैंसिल हो तो दर्शक हंगामा कर दें। लेकिन मल्टीप्लेक्स में अक्सर शो कैंसिल हो रहे हैं।

आप घर तैयार होकर फिल्म देखने जाएं और हो सकता है कि आपकी पसंद की फिल्म का शो ही नहीं हो। ऐसे हालत तब हैं जबकि आज टिकट बुक करने के लिए टेली बुकिंग और 24 घंटे ऑनलाइन बुकिंग का भी विकल्प मौजूद है।
 

- विद्युत प्रकाश मौर्य  


Monday, 3 January 2011

यादें अतुल माहेश्वरी जी की...

मैं अपने जालंधर के दिन याद करता हूं तो अतुल माहेश्वरी याद आते हैं। नवंबर 1999 में हमने अमर उजाला में योगदान किया था। अमर उजाला के पंजाब संस्करण की लांचिंग के दौरान अतुल माहेश्वरी जी संपादकीय विभाग के लोगों के साथ कई बैठकें लीं। इस दौरान उनकी दूर दृष्टि पत्रकारीय कौशल और एक सह्रजय मालिक का रूप देखने को मिला। ये सहज भरोसा करना मुश्किल है कि 55 साल की उम्र में एक बड़ा संपादक और बड़े समाचार पत्र समूह का मालिक इस दुनिया को अलविदा कह गया। 

कहा जाता है कि हिंदी पट्टी के पत्रकारों को अच्छा वेतन, कार्य स्थल पर सम्मान देने की परंपरा अतुल माहेश्वरी ने शुरू की, जिसके लिए हजारों पत्रकार जिन्होंने अमर उजाला के अलग अलग संस्करणों में कार्य किया, हमेशा ऋणी रहेंगे। न सिर्फ एक अखबार के मालिक बल्कि अतुल माहेश्वरी की खबरों की समझ भी काफी अच्छी थी। वे अपने अखबार के सभी पन्नों की हर छोटी बड़ी खबर देख लिया करते थे।

मीटिंग, सभा समारोह में स्टाफ के साथ ऐसे घुले मिले होते थे जिसमें मालिक नौकर जैसा कोई भेदभाव नहीं दिखाई देता था। जूनियर स्टाफ भी अपनी समस्याओं को लेकर उनसे बड़ी आसानी से मिल सकता था। वे लोगों की समस्याएं सुनते थे और हर संभव मदद और निदान भी करते थे। सैकड़ों पत्रकारों के पास उनकी सह्रदयता के हजारों किस्से हो सकते हैं। मुझे अमर उजाला की दो बैठकें याद आती हैं जब उन्होंने अखबार की बेहतरी के लिए सबको खुलकर सुझाव देने को कहा। सबके सुझावों को उन्होंने गंभीरता से सुना। अमर उजाला में एक जूनियर पत्रकार भी पूरा सम्मान पाता है। समाचार पत्र समूह ये सुंदर परंपरा अतुल माहेश्वरी जैसे मालिकों की बदौलत ही आ सकी है। 
( फोटो- सौजन्य- हिमाचल आनलाइन- ब्लॉग )

Wednesday, 29 December 2010

बीएचयू के पुराने दोस्तो से एक मुलाकात

कई साल पुराने कई दोस्त एक साथ मिल जाएं तो अनुभव कितना सुखद हो सकता है, इसे सिर्फ महसूस ही किया जा सकता है। दिल्ली की एक सर्द भरी शाम में ऐसे ही कुछ पुराने दोस्तों से मुलाकात हो गई। मौका था 25 दिसंबर को मालवीय जयंती का। वैसे तो मालवीय जयंती हर साल मनाई जाती है। लेकिन दीन दयाल उपाध्याय मार्ग पर नव निर्मित मालवीय स्मृति भवन में इस बार मेरे बैच के कई दोस्तों ने तय किया कि हमलोग आयोजन में पहुंचने की कोशिश करेंगे।

 तो 1993 बैच के स्नातक और 1995 बैच के एमए के कई साथ मिल गए इस मौके पर। संजीव गुप्ता, राजेश गुप्ता बंधु तो कई सालों से दिल्ली में हैं।  अमिताभ चतुर्वेदी, गाजियाबाद, शक्तिशरण सिंह, उत्तम कुमार, ज्ञान प्रकाश, अमित कौशिक का एक साथ मिल जाना महज संयोग ही था। बीएचयू एलुमिनी एशोसिएशन में सक्रिय रोहित सिन्हा जो दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट में वकालत करते हैं हमारे समकालीन ही हैं। आदर्श सिंह, ( जनसत्ता में कार्यरत ) और हरिकेश बहादुर (दूरदर्शन ) और चंदन कुमार पहुंच नहीं सके। लेकिन सबसे सुखद रहा अलख निरंजन से मिलना।

मनोविज्ञान के साथी अलख इन दिनों अरूणाचल प्रदेश में एक आवासीय विद्यालय चला रहे हैं। वे अपनी पत्नी और नन्ही सी बिटिया के साथ आए थे। दक्षिण भारत दौरे से लौटे अलख अपने दोस्तों से मुलाकात के लिए ही दिल्ली में रूक गए थे। इस बार के हुए कार्यक्रम में लोक गायिका मालिनी अवस्थी ने सुरों की धार बहाई।
अब थोड़ी सी बात मालिनी के गीतों की कर लें तो मालिनी जी की स्टेज परफारमेंस बड़ा ही रोचक, मनभावन और नाट्य प्रस्तुति लिए होता है। उन्हें टीवी पर सुनना और लाइव सुनना दोनो ही अलग अलग अनुभूति है। गिराजा देवी की शिष्या मालिनी अपने ट्रूप के साथ आई थीं। ईश वंदना के बाद उन्होने सोहर पेश किया। इस मौके पर सोहर का इतिहास और उसकी बारिकियां भी बताती गईं। उनकी दूसरी प्रस्तुति मां शारदे का गीत था। और फूट पड़ी बनारस की कजरी...मिर्जापुर कइल गुलजार कचौड़ी गली सुन कईल बलमू....इस कजरी की रचयिता गौहर जान की कहानी भी मालिनी जी ने साथ साथ सुनाई....
और पुराना लोकगीत...बन्ना बुलाए बन्नी नहीं आए...अटरिया सुनी पड़ी...( दूर कोई गाए धुन ये सुनाए....तेरे बिन छलिया रे...ये फिल्मी गीत इसी धुन पर है)  इसके बाद रेलिया बैरन पिया को लिए जाए रे.....तो सुरों की गंगा बहती रही घंटो...इसके साथ ही मालवीय स्मृति भवन में सभी पूर्व छात्रों के लिए भोजन का भी उम्दा प्रबंध था। सबसे पुराने एलुमनी डा. पीएल जायसवाल, एल एंड टी में कार्यरत आईटी बीएचयू के एलुमनी शक्तिधर सुमन की मेहनत आयोजन मे साथ झलक रही थी.... ( 25 दिसंबर 2010 )
विद्युत प्रकाश मौर्य ( MA BHU, 1995)

Saturday, 18 December 2010

होम्योपैथी में है डेंगू से बचाव की दवा

डेंगू का खौफ लोगों की नींद हराम कर देता है। डेंगू से घबराएं, नहीं सचेत रहें और योग्य चिकित्सक से उपचार कराएं। होम्योपैथी के जरिये भी बिना किसी साइड इफेक्ट के डेंगू का कारगर इलाज संभव है। किसी भी बुखार से प्लेटलेट्स गिरने को लोग डेंगू मान बैठते हैं। समय से उपचार कराया जाए तो होम्योपैथी में डेंगू से बचाव की औषधि उपलब्ध है।

यह दवा लें -  होम्योपैथी में यूपेटोरियम परफोलिएटम 200 की दो खुराक 15 दिन में लेनी चाहिए। जिन लोगों को डेंगू बुखार न हुआ हो वे बचाव के लिए भी दवा ले सकते हैं।
होम्योपैथी में डेंगू का निश्चित उपचार है। उपचार किसी योग्य चिकित्सक की देखरेख में करना चाहिए। इतना ही नहीं, रोगी की प्लेटलेटस गिरने पर ¨चिंता नहीं करनी चाहिए। इस पद्धति में रोगी खून में प्लेटलेट्स बढ़ाने की भी औषधि उपलब्ध है, जो मरीज की स्थिति के अनुसार चिकित्सक निर्धारित कर दे सकते हैं। दवा लेने के बाद प्लेटलेट्स 48 से 72 घंटे में बढ़नी शुरू हो जाती है।

ऐसे करें बचाव - 

- किसी भी खुले बर्तन व गडढ़े में पानी इक्ट्ठा नहीं होने दें।

- अगर आप बाल्टी या किसी बर्तन में पानी इक्टठा करके रखते हैं तो इसे ढ़कना नहीं भूलें।

- मच्छरों से बचने के लिए मच्छरदानी का प्रयोग करें। रात को मच्छरदानी लगाकर ही सोएं।

- कूलर के पानी में डेंगू के मच्छरों के पैदा होने की संभावना ज्यादा होती है।

- नगर निगम द्वारा मच्छर मारने की दवा का छिड़काव करवाएं।

- खिड़की व दरवाजों में जाली लगाकर रखना चाहिए। जिससे मच्छर घर में नहीं आ सकें।