Sunday, 25 March 2012

सस्ते चीनी मोबाइल...

-आखिर मोबाइल फोन कितना सस्ता हो सकता है। कई साल पहले इंट्री लेवल के हैंडसेट तीन-चार हजार रुपये से कम के नहीं थे। पर अब लगभग सभी ब्रांडेड कंपनियों ने एक हजार रुपये में इंट्री लेवेल के मोबाइल हैंडसेट उतार दिए हैं। कई कंपनियां तो एक हजार रुपये में रंगीन स्क्रीन वाले हैंडसेट आफर कर रही हैं। वहीं ग्राहकों के लुभाने के लिए एक हजार से 1200 रुपये में लाइफ टाइम कनेक्सन के साथ मोबाइल हैंडसेट आफर किए जा रहे हैं। अब हम इंट्री लेवेल के मोबाइल फोन के इससे भी सस्ता होने की बात नहीं सोच सकते। हां अगर कोई सेकेंड हैंड मार्केट में जाए तो उसे 500 रुपये वाले मोबाइल फोन भी मिल सकते हैं बिल्कुल चालू हालत में।


वहीं बाजार दूसरी ओर सस्ते चीनी मोबाइल फोनों से भी पटा पड़ा है। भारतीय बाजार में आपको बड़े आराम से जगह जगह चीनी फोन बिकते हुए मिल जाएंगे। आमतौर पर ये चीनी मोबाइल फोन नान ब्रांडेड होते हैं। पर इनमें उपलब्ध सुविधाओं की बात करें तो ये बड़े बडे दावे के साथ आते हैं। जैसे आपको 1.3 मेगा पिक्सेल कैमरा वाले मोबाइल फोन महज ढाई हजार रुपये तक में मिल जाएंगे। इसमें सांग डाउनलोड मेमोरी जैसी सुविधा तो होगी ही। यही नहीं तीन हजार से 3500 रुपये के रेंज में दो मेगा पिक्सेल के कैमरे वाले मोबाइल फोन मिल जाते हैं। इतनी सुविधा वाला मोबाइल फोन अगर आप किसी ब्रांडेड कंपनी का खरीदने जाएं तो सात हजार रुपये तक देने पड़ सकते हैं। यही चीनी कंपनियों का कमाल है कि वे इतने सस्ते में टेक्नोलाजी उपलब्ध करा रही हैं।
अब आपके जेहन में सवाल उठ सकता है कि आखिर सस्ता है तो कितना टिकाऊ हो सकता है। जाहिर सी बात है सस्ता है तो कोई गांरटी-वारंटी नहीं है। लेकिन शौक पूरा करने वाली नई पीढी गांरटी वारंटी की बात भी नहीं करती। भले गारंटी नहीं है पर ऐसा भी नहीं है कि ये मोबाइल फोन यू एंड थ्रो वाले हैं। देश के सबसे बड़े मोबाइल फोन बाजार यानी दिल्ली के करोलबाग का गफ्फार मार्केट का एक दुकानदार कहता है कि जैसे ब्रांडेड मोबाइल फोन की मरम्मत हो जाती है उसी तरह इन सस्ते मोबाइल फोन की भी मरम्मत हो जाती है। यह अलग बात है कि बहुत जटिल सुविधाओं वाले मोबाइल फोन के मरम्मत करने वाले हर छोटे शहर में नहीं मिलते हैं।
अगर आप शौक पूरा करने के लिए कोई सस्ता और बहुत सारी सुविधाओं से लैस मोबाइल फोन खरीदते हैं तो अपने जोखिम पर खरीदें। ऐसे मोबाइल खरीदने के बाद आपको मरम्मत के लिए परेशान होना पड़ सकता है। कई बार ऐसा भी हो सकता है कि आपका मोबाइल फोन मरम्मत कराते कराते किसी ब्रांडेड कंपनी के मोबाइल फोन के बराबर ही जा बैठे। लेकिन आप मोबाइल फोन में तेजी से आ रही सुविधाओं के लिहाज से देखते हैं और सस्ते में ढेर सुविधाएं भी चाहते हैं तो बेशक कोई चाइनीज मोबाइल फोन आजमा सकते हैं। सिर्फ दिल्ली ही नहीं बल्कि लगभग सभी महानगरों में ऐसे चीनी मोबाइल फोन का बाजार पहुंच चुका है। पर नोकिया जैसे किसी ब्रांडेड कंपनी के मोबाइल की तरह ये फोन सालों साल साथ निभाने वाले नहीं हैं, ये बात आपको अपने दिमाग में पहले से बिठा लेना चाहिए।
विद्युत प्रकाश मौर्य



Saturday, 17 March 2012

खुले बोरवेल बच्चों के लिए खतरा....

पहले कुरुक्षेत्र का प्रिंस और और आगरा की नन्हीं सी जान वंदना कुशवाहा। भले ही इन दोनों को बड़ी कोशिश करके बचा लिया गया। पर बोरवेल में बच्चों का गिर जाना कोई पहला हादसा नहीं है। ऐसे हादसे आए दिन देश के किसी न किसी कोने में हो रहे हैं। इसमें कुछ खुशकिस्मत बच्चे हैं जो समय पर सहायता मिल जाने के कारण बच जा रहे हैं। पर कई ऐसे हादसे में नन्हें मुन्नों को अपनी जान से हाथ धोना भी पड़ा है। ऐसे में जरूरत इस बात की है, हम ऐसे खुले बोरवेल से सावधान रहे हैं। साथ ही जरूरत खत्म होने के बाद ऐसे बोरवेल को तुरंत बंद किया जा जिससे की बोरवेल और नौनिहालों की जान नहीं ले सकें। प्रिंस और वंदना के मामले में सेना का धन्यवाद करना पड़ेगा कि जवानो ने मुस्तैदी दिखाकर इन बच्चों को बचा लिया। पर हमें यह भी देखना पड़ेगा कि ऐसे आपरेशन में कितनी बड़ी राशि खर्च हो जाती है। सेना और प्रशासन के लोगों को कई दिनों तक बाकी के काम छोड़कर इसी में लगे रहना पड़ता है।

अगर हम प्रिंस या वंदना की बात करें तो उनकी जान बच गई इसमें उनकी जीजिविषा और जैसे हालात में वे जीवन गुजारते हैं वह भी खूब जिम्मेवार है। वर्ना बिना कुछ खाए पीए एक दिन से ज्यादा संकरे से बोरवेल में पड़े रहना कितना मुश्किल हो सकता है। कई लोगों की जान तो ऐसी जगह पर पड़े पड़े ही जा सकती है। प्रिंस के बारे में कहा गया कि वह गरीब का बच्चा था इसलिए बच गया। गरीब के बच्चे को कई कई घंटे तक खाना नहीं मिलता तो भी जीते रहते हैं। ऐसी हालात में उनकी भूखे रहने की क्षमता में इजाफा हो जाता है। अगर वे किसी मिड्ल क्लास या अमीर के बच्चे हों तो उनका ऐसे में बच पाना ज्यादा मुश्किल हो जाता है। ऐसे में हमें खुले बोरवेल को लेकर ज्यादा सावधान रहने की जरूरत है। जो लोग कच्चे बोरवेल की खुदाई करते हों उन्हें चाहिए वे काम खत्म होने के बाद इस बोरवेल को अच्छी तरह ढक दें।
अगर हम इस मामले में मीडिया की बात करते हैं तो उन्हें ऐसी किसी खबर के समय लाइव शो करने का अच्छा मौका मिल जाता है। ऐसे लाइव शो दिखाकर अच्छी खासी टीआरपी गेन करने की संभावना बढ़ जाती हैं। जब कुरूक्षेत्र में प्रिंस गड्ढे के नीचे गिरा था तब सभी चैनलों ने अपने ओबी वैन घटनास्थल पर लगा दिए और लाइव शो दिखाना शुरू कर दिया। सारे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। ऐसी किसी खबर के समय लोग अन्य चैनल भी देखना छोड़कर समाचार चैनलों की ओर ही स्विच कर लेते हैं। हालांकि प्रिंस या वंदना को गड्ढे से निकाल पाने में इन समाचार चैनलों की कोई भूमिका नहीं होती। पर ऐसा लाइव ड्रामा दिखाने का मौका कोई चूकना नहीं चाहता।
 प्रिंस के समय में भी और आगरा की वंदना कुशवाहा के समय भी सभी चैनलों ने पल पल की लाइव खबर दिखाकर खूब टीआरपी बटोरी। प्रिंस को तो कुछ चैनलों ने बड़ा बहादुर लड़का घोषित किया और उसे मुंबई लेकर गए और बड़े बड़े सितारों से ले जाकर मिलवाया। यह सब कुछ प्रिंस के परिवार वालों के लिए किसी सपने जैसा था। अब प्रिंस की पढ़ाई लिखाई भी अच्छे स्कूल में हो रही है। पर देश में लाखों करोड़ो गरीब परिवारों के बच्चों के साथ ऐसा नहीं होता, जो विपरीत परिस्थितियों में धीरे-धीरे बड़े होते जाते हैं। लोगों की रूचि किसी लाइव ड्रामा में तो जरूर है, पर गरीब के बच्चों से असली संवेदना किसे है....किसी शायर ने लिखा है...
बहुत बेशकिमती है आपके बदन का लिबास, किसी गरीब के बच्चे को प्यार मत करना....

-विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com

Wednesday, 14 March 2012

टैक्स बचत की अप्रैल से ही करें प्लानिंग

आमतौर पर फरवरी और मार्च में नौकरी पेशा लोग काफी परेशान दिखाई देते हैं। उन्हें यह परेशानी होती है कि आखिर रुपया कहां लगाएं जिससे की कर बचत की जा सके। कई लोगों की हालत होती है कि मार्च का पूरा वेतन कर देने से बचने के लिए सेविंग में चला जाता है। कई लोगों का तो दो महीने का वेतन भी टैक्स में चला जाता है। अगर नहीं भी जाए तो फरवरी मार्च में उनके परिवार का बजट जरूर खराब हो जाता है। अगर आपने किसी तरह लोन ले रखा है तो उसकी किस्त देने में और भी हालत बुरी हो जाती है। इन सबसे बचा जा सकता है अगर आप थोड़ी अक्लमंदी से काम लें। आप नया वित्तीय वर्ष आरंभ होने के समय ही यह जांच कर लें कि आपका इस साल का सालाना वेतन या कुल आमदनी कितनी बनेगी इस पर टैक्स कितना देना पड़ेगा। इसके साथ ही यह गणना करवाएं कितना रुपया आप अमूमन साल भर में बचत कर सकते हैं। उसके बाद कितना राशि बचती है जिस पर आप सरकार को कर अदा करना चाहते हैं।
कर बचाएं या अदा करें-
कर बचाने के लिए बचत का सीधे अर्थों में यह फंडा है कि आप जितना टैक्स बचाना चाहते हैं उसका पांच गुना रुपया आपको टैक्स सेविंग स्कीम में बचत करनी पड़ती है। यह राशि विभिन्न सरकारी योजनाओं में जाती है। इसमें आमतौर पर आठ से नौ फीसदी तक ब्याज होता है साथ ही इस राशि का लाक इन पीरियड भी होता है। इसलिए आप यह भी देखें की कर के लिए रुपया बचाना अच्छा है यह उस राशि पर कर अदा कर देना ही अच्छा है। आमतौर पर हर व्यक्ति को साल में कुछ राशि कर के रुप में भी अदा करनी चाहिए। कर के लिए आप जो रुपया बचाते हैं वह राशि आपको आठ साल बाद दुगुनी होकर मिलती है। पर महंगाई की दर से देखें तो उस राशि की क्रय शक्ति उस समय कम हो जाती है।
हर महीने करें बचत

टैक्स बचत के लिए आप जो रुपया विभिन्न सेविंग स्कीम में लगाना चाहते हैं उसे आप फरवरी मार्च के महीने में भी न लगाकर हर महीने बचत की योजना पर काम करें। आप अप्रैल से अगले मार्च महीने तक 12 महीने तक कर बचाने के लिए बचत करें। इससे आपके बजट पर बोझ नहीं पड़ेगा। जैसे आपको वेतन के साथ करने वाले ईपीएफ या जीपीएफ से मिलने वाली कर रियायत, मकान किराया, बच्चों की फीस आदि के बाद आपको 40 हजार रुपए साल में टैक्स सेविंग स्कीम में लगाने की जरूरत पड़ती है। इसमें पहला तरीका यह हो सकता है कि फरवरी या मार्च में आप 40 हजार रुपए किसी एक योजना में लगाएं। दूसरा तरीका यह हो सकता है कि आप हर महीने साढ़े तीन हजार रुपए किसी एक योजना में लगाएं।
अगर आपने जीवन बीमा करा रखा है तो उसमें की जाने वाली बचत से मिलने वाले कर लाभ का भी लाभ उठाएं। मकान खऱीदने के लिए मिलने वाले लोन पर भी कर रियायत मिलती है। इस बारे में भी अपने कर सलाहकार से राय लें।
अब महत्वपूर्ण तथ्य की कर बचाने के लिए किन योजनाओं में पैसा लगाएं। अब राष्ट्रीय बचत पत्र (एनएससी) खरीदना अच्छे विकल्पों में नहीं है। आप हर महीने आवर्ती जमा की तरह पीपीएफ में पैसा जमा कर सकते हैं या फिर इक्विटी लिंक्ड सेविंग स्कीम( इएलएसएस) यानी म्युचुअल फंड में भी पैसा लगा सकते हैं।
- विद्युत प्रकाश मौर्य 


Monday, 12 March 2012

मैनेजमेंट गुरू से राजनीति का सफर

अभिषेक मिश्रा यूपी में समाजवादी पार्टी के बदलते हुए चेहरे के प्रतीक हैं। लखनऊ उत्तर से चुनाव जीत कर विधान सभा में कदम रखने वाले अभिषेक मिश्रा आईआईएम अहमदाबाद में प्रोफेसर की नौकरी छोड़कर आए हैं। 

भले ही कुछ लोग समाजवादी पार्टी को गुंडों और जेल से चुनाव लड़ने वाले नेताओं की पार्टी मानते हैं लेकिन अब समाजवादी पार्टी तेजी से बदल रही है। मुलायम सिंह यादव के बेटे अखिलेश खुद भी विदेशी विश्वविद्यालयों से ऊंची पढ़ाई पढ़कर राजनीति में आए हैं। 


बताया जा रहा है कि आईआईएम में पढ़ा रहे अभिषेक को अखिलेश यादव ने दो साल पहले समाजवादी पार्टी से जोड़ा। पार्टी की नीतियां बनाने में इस मैनेजमेंट गुरू की बड़ी भूमिका रही है।

 समाजवादी पार्टी के घोषणा पत्र में छात्रों को मुफ्त में लैपटॉप और टैबलेट देने की बात हो या फिर बेरोजगारी भत्ता और शिक्षा को लेकर नई योजनाएं इन सबके पीछे थींक टैंक के रूप में अभिषेक मिश्रा काम कर रहे थे। ये अभिषेक और अखिलेश द्वारा बनाई गई चुनावी रणनीति का एक भाग है, जिसे पार्टी पूरा करने के हर संभव प्रयास करेगी। इतना ही नहीं प्रचार प्रसार के लिए अखिलेश यादव ने वही तरीके अपनाए, जो अभिषेक मिश्रा ने उन्हें  सुझाया। हालांकि अभिषेक पार्टी के थींक टैंक ही बने रहना चाहते थे लेकिन बताया जा रहा है कि अखिलेश यादव ने अभिषेक को चुनाव लड़ने के लिए तैयार किया।

अभिषेक मिश्रा आईआईएम में मैनेजमेंट के छात्रों को बिजनेस पॉलिसी पढ़ाते थे। वे पूर्व आईएएस जेएस मिश्र के बेटे हैं लेकिन अब मैनजमेंट की क्लास छोड़कर राजनीति की रपटीली राहों पर चल पड़े हैं। अभिषेक जैसे चेहरे से उम्मीद की जा सकती है कि यूपी की राजनीति का चेहरा जरूर बदलेगा। साथ ही वे समाजवादी पार्टी की छवि को भी बदलने में सहायक होंगे जिसे आमतौर पर यूपी में लाठी भांजने वालों की पार्टी माना जाता है। उम्मीद है अखिलेश यादव उनका बेहतर उपयोग करेंगे और दोनों युवा मिलकर यूपी में नई इबारत लिखेंगे।

- विद्युत प्रकाश मौर्य

Friday, 9 March 2012

छोटे परदे पर ये कैसे कैसे गुरू....

भारतीय संस्कृति में गुरू की तुलना ऐसे कुम्हार से की गई है जो घड़े के अंदर हाथ डालता और बाहर धीरे धीरे चोट मारता है जिससे घड़ा सुंदर आकार ले पाता है। ठीक उसी तरह गुरु भी शिष्य के अंदर की तमाम अच्छाईयों को बाहर लाता है और उसे सुंदर बनाता है, ठीक उसी कुम्हार की तरह जो घड़े को सुंदर बनाता है। पर समय के अनुसार गुरूओं की नई पीढ़ी आ रही है।


आजकल टीवी पर संगीत प्रतियोगिताओं में गुरूओं का नया रुप देखने को मिल रहा है। ये गुरु अपने शिष्यों की अच्छाई और बुराई का मंच पर ही छिद्रान्वेषण करते हैं। इस दौरान अगर तारीफ की जा रही है तो शिष्य बड़े खुश होता हैं उनका सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है, पर अगर गुरू उनकी निंदा करने लगे तो वे आंखों में आंसू ले आते हैं। मजे की बात एक गुरू तारीफ करता है तो दूसरा टांग खींचता है..यह सब कुछ चलता रहता है और देश दुनिया के करोडो लोग इस शो को देख रहे होते हैं। लोगों को यह सब कुछ बड़ा नेचुरल सा लगता है। यह ठीक उसी तरह होता है जैसे किसी बडे मामले पर फैसला करने के लिए अदालत में जूरी बैठती है। ये गुरू भी कुछ कुछ जूरी के मेंबरों की तरह ही तो होते हैं। पर अदालत में जो जूरी बैठती वह बंद कमरे में होती है। पर यहां पर गुरू करोड़ों लोगों को अपने अपने अंतर्विरोध दिखाते हैं। अगर आप संगीत प्रतियोगिताओं में होने वाली वास्तविक मानते हैं तो आप किसी गलतफहमी में जी रहे हैं। दरअसल यह सब कुछ एक हाई प्रोफाइल नाटक की तरह होता है। ऐसा लगता है मंच पर दो संगीत के जानकार किसी बात को लेकर लड़ रहे हैं। पर यह लड़ाई एक दम नाटकीय होती है। लोगों को तो लगता है कि एक शिष्य को लेकर दो गुरू लड़ रहे हैं पर यह लड़ाई महज धारावाहिक को सेलेबल बनाने के लिए होता है। दर्शकों का ध्यान खींचने के लिए होता है। कोई संगीतकार किसी टैलेंट को लेकर कहता है कि तुमने इतना खराब गाया कि उम्मीद ही नहीं थी। तुम बिल्कुल चल नहीं पाओगे....जैसे बिल्कुल हतोत्साहित करने वाले शब्दों का इस्तेमाल ये गुरु करते हैं। यह सब कुछ मंच पर किसी को अपमानित करने के जैसा ही होता है। अगर किसी की गायकी में कमी है तो उसके बारे में सरेआम मंच पर बताने की क्या जरूरत है।

मजे की बात है इन संगीत प्रतियोगिताओं में जज हैं सभी भारतीय शास्त्रीय संगीत की महान परंपराओं से अवगत है। जहां पर गुरू शिष्य़ का इतना सम्मान करता है कि उनका जितनी बार नाम लेता है उतनी बार कान को उंगली लगता है। वहीं पर शिष्य भी अपने गुरू का काफी सम्मान करता है। दोनों कभी किसी की सार्वजनिक रूप से निंदा नहीं करते हैं। रिश्तों को नाटकीय नहीं बनाते हैं। पर यहां चीजों को नेचुरल टच देने के नाम पर एक अजीब सा नाटक किया जा रहा है। मजे की बात है कि ऐसे संगीत प्रतियोगिताओं में जावेद अख्तर, इला अरूण, उदित नारायण, अनु मलिक जैसे लोग जज हैं। पर सभी इन धारावाहिकों को कामर्सियल रुप से सफल बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं।

यह जान पाना मुश्किल है कि वे संगीत प्रतियोगिताओं में जज की कुरसी पर बैठ कर जो कुछ एक्सपर्ट कमेंट देते हैं उनमें कितनी असलियत होती है। पर कई बड़े मनोरंजन चैनलों पर नाटक का यह सिलसिला जारी है। चूंकि इन संगीत सितारों की खोज के साथ चल रहा एसएमएस और अन्य तरीके से लोगों को जोड़कर रखने का सिल। इसलिए इन गुरुओं को भी नाटक करने को कहा जाता है...और ये गुरू व्यावसायिकता की होड़ में गुरू जैसी पवित्र संस्था को कलंकित कर रहे हैं।


Wednesday, 7 March 2012

छोटे निवेशक बाजार पर रखें नजर....

आप छोटे निवेशक हैं तो भी आपको बाजार पर नजर रखना चाहिए। शेयर बाजार में पैसा लगाना और धन कमाना अच्छी चीज है पर आपके आंख और कान खुले होने चाहिए। आम तौर पर बाजार में दो तरह के निवेशक हैं एक वे जो पैसा लंबे समय के लिए लगाते हैं और एक वे जो पैसा लगाकर तुरंत लाभ कमाना चाहते हैं। जो लोग पैसा लगाकर तुरंत लाभ कमाना चाहते हैं उन्हें और भी सावधान रहना चाहिए। बाजार से तुरंत लाभ कमाना जोखिम भरा है। यह एक तरह का जुआ भी है।


रोज लाभ कमाना जुआ- कुछ लोग शेयर में निवेश करते हैं और रोज लाभ कमाते हैं। सुबह एक लाख रूपया किसी शेयर में निवेश किया और चार घंटे बाद अगर दो रूपये प्रति शेयर का लाभ होता दिखाई दिया तो बेच दिया। इसमें कई बार लाभ होता है तो कई बार घाटा भी हो जाता है। जो लोग पहली बार निवेश करते हैं और उन्हें घाटा हो जाता है तो वे बाजार से बहुत निराश हो जाते हैं। साथ बहुत बड़ी राशि निवेश करने वालों को भी बाजार कई बार बड़ा घाटा देता है। पर ऐसे लोग ये भूल जाते हैं कि इसी बाजार ने उन्हे कई बार बहुत बड़ा फायदा भी कराया है। 

निवेश में संयम बरतें - बाजार के नियमित निवेशकों को बाजार के ऐसे उतार-चढ़ाव के समय संयम बरतना चाहिए। जो लोग बाजार में यह सोच कर आते हैं कि उन्हें अपने धन से तुरंत कोई बड़ा लाभ हो जाएगा तो कई बार उन्हें लाभ हो जाता है पर कई बार उन्हें इसमें बड़ा घाटा भी हो जाता है।

दीर्घकालिक निवेश में फायदा - अगर हम बाजार के लंबे ट्रैक रिकार्ड को देखें तो यह पाएंगे कि जिन लोगों ने अपना धन लंबे समय के लिए निवेश किया है उन्हें बाजार से कोई घाटा नहीं हुआ है। अगर आपका पैसा म्चुअल फंडों में तीन साल या उससे ज्यादा समय के लिए जमा रहा है तो आमतौर पर यह बहुत फायदा देकर गया है। अगर कोई 15 साल से शेयर बाजार में नियमित निवेश करता आ रहा है तो उसे भी बाजार से कोई घाटा नहीं हुआ है। 

अगर हम बाजार में हर्षद मेहता और केतन पारिख जैसे बड़े घोटालों पर भी नजर डालें तो भी बाजार इन सबसे उबर कर फिर से उठ खड़ा हुआ है और लंबे समय से धन का निवेश करने वालों को कोई घाटा नहीं हुआ है। जनवरी 2008 में एक बार फिर बाजार में तेज गिरावट आई है। दुनिया की कई बड़ी कंपनियों के घाटे के कारण भारत के शेयर बाजार अचानक 25 से 30 फीसदी तक नीचे गिरा है। पर इसके आधार पर ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि हमें भारतीय शेयर बाजार से निराश होने की जरूर है। दरअसल बांबे स्टाक एक्सचेंज के सेंसेक्स ने एक साल में 13 हजार से 21 हजार तक का सफर तय कर लिया तो लोगों को लगने के लगा कि बाजार में बढ़त इसी गति से हमेशा जारी रहेगी। पर हमेशा ऐसा नहीं होता। अगर बैंक के फिक्स डिपाजिट या अन्य जमा योजनाओं में आपका रूपया आठ फीसदी की गति से बढ़ता है तो शेयर बाजार में आपका रुपया 20 से 25 फीसदी की गति से भी बढ़े तो इसको बहुत अच्छा रिटर्न मानना चाहिए। पर शेयर और म्यूचुअल फंड कई बार साल में 50 से 100 फीसदी तक रिटर्न दे जाते हैं। पर इसमें जब तेजी से गिरावट आती है तो निवेशकों के दिल की धड़कन तेज होने लगती है।

शेयर बाजार में निवेश करने वालों को यह बात अच्छी तरह याद रखनी चाहिए कि बाजार में निवेश में जोखिम है। जनवरी फरवरी में बाजार में बड़ी गिरावट आने के बाद भी जिन लोगों ने आठ दस महीने पहले बाजार में पैसा लगाया है उन्हें कोई नुकसान नहीं हुआ है।
- vidyutp@gmail.com 



Sunday, 4 March 2012

डीटीएच कंपनी का फर्जीवाड़ा

मैं कभी अपने डीटीएच पर मूवी बुक करके फिल्में नहीं देखता। लेकिन एक दिन मेरे मोबाइल पर अचानक मैसेज आता है कि आपके डीटीएच पर चैनल नंबर 155 और 156 पर दो मूवी बुक कर दी गई हैं। आपके खाते से सौ रूपये भी काट लिए गए हैं। यही संदेश अगले दिन भी आता है। यानी मेरे खाते में दौ सौ रूपये का डाका। जबकि मैंने फोन या एसएमएस किसी भी तरीके से कोई मूवी बुक ही नहीं कराई थी। मैंने अपने डीटीएच काल सेंटर को फोन लगाकर शिकायत दर्ज कराई। डीटीएच सेवा की काल एडेंट करने वाली बाला का व्यवहार बड़ा ही बदतमीजी भरा था। उसने कहा कि ऐसा हो ही नहीं सकता। आपने जरूर मूवी बुक कराई होगी। मैंने जवाब दिया न तो आनलाइन या फिर मोबाइल या एसएमएस से मैंने कोई मूवी बुक ही नहीं कराई। लेकिन काल सेंटर की एक्जक्यूटिव मेरा तर्क मानने को तैयार नहीं। मैंने कहा मेरे खाते से जो रूपये कटे हैं उसे रिवर्ट कराओ। लेकिन वे इसका रास्ता भी बताने को तैयार नहीं। खैर काफी बकझक के बाद भी मेरी समस्या का समाधान नहीं हुआ। तब मैंने कंपनी के नोडल आफिसर का नंबर मांगा। नोडल आफिसर को काल किया सारी परेशानी फिर से बताई। नोडल आफिसर ने मेरी समस्या को समझा और कंपनी की गलती मानी। मेरे खाते से कटे 200 रूपये अगले 24 घंटे में वापस आ गए। मुझे परेशानी हुई ये एक मुद्दा है। 

लेकिन सबसे बड़ा मुद्दा है कि कई डीटीएच कंपनियां अपनी कमाई बढ़ाने के लिए इस तरह का फर्जीवाड़ा बड़े पैमाने पर कर रही हैं। अगर आपने गंभीरता से अपना एसएमएस नहीं देखा तो आपके खाते से रूपये कटे। इस तरह लाखों कस्टमर के साथ धोखाध़ड़ी करके कंपनी ने करोड़ो कमा लिए। ये है उपभोक्ताओं को लूटने का एक तरीका। ये सब कुछ करने वाली कंपनी है एयरटेल डिजिटल। अगर आपके खाते में भी इस तरह का फर्जीवाड़ा हुआ है तो चुप मत बैठिए आवाज उठाइए...

-    विद्युत प्रकाश मौर्य

Friday, 24 February 2012

शाबास ललितपुर...बना डाला रिकार्ड

यूपी का ललितपुर जिला। नक्शे में देखें तो तीन तरफ से मध्य प्रदेश से घिरा हुआ। लेकिन विधान सभा चुनाव 2012 के पांचवें चरण में यहां मतदाताओं ने दिखाया है सबसे ज्यादा जोश। ललितपुर में 71 फीसदी लोगों ने वोट डाले। तो कानपुर जैसे यूपी से सबसे बडे शहर में महज 55 फीसदी मतदान हुआ है।  ललितपुर विधान सभा में रिकार्ड 72.16 फीसदी वोट पडे हैं जबकि मेहरोनी में थोड़ा कम। लेकिन ललितपुर के मतदाताओं ने इतिहास रच दिया है। आजादी के बाद कभी इतनी बड़ी संख्या में किसी जिले में वोटर बाहर नहीं निकले। ये चुनाव आयोग के कंपेन का असर है या लोकतंत्र को लेकर गांव  गिरांव के वोटरों की जागरूकता। ये चुनाव का परिणाम आने पर बेहतर समझा जा सकेगा। लेकिन इतना तय है कि इस बार शहरी मतदाता की तुलना में गांव के मतदाता लोकतंत्र के प्रति ज्यादा जागरूकता दिखा रहे हैं। इससे पहले के मतदान मे भी देखें तो गोरखपुर शहर से ज्यादा मतदान उसके आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में हुआ है। वाराणसी से ज्यादा मतदान नक्सल प्रभावित सोनभद्र, चंदौली और मिर्जापुर जिलों में हुआ। लखनऊ शहर से ज्यादा मतदान उसके आसपास के जिलों में हुआ।
चुनाव आयोग कहता है कि यूपी में वर्ष 2007 में हुए पिछले विधानसभा चुनाव के पांचवें चरण में कुल 47.57 प्रतिशत मतदान हुआ था। इस बार पांचवें चरण में 13 जिलों का मतदान प्रतिशत 59.2 फीसदी है। हिसाब लगाएं तो इस बार अपेक्षाकृत 24.44 प्रतिशत अधिक मतदान हुआ है। यूपी का मतदाता हर चरण में 2007 की तुलना में ज्यादा मतदान कर रहा है। पहले चरण में 8 फरवरी को 62 फीसदी मतदान हुआ था। आजादी के बाद पहली बार मतदान फीसदी में इतना इजाफा देखा गया। दूसरे चरण में भी 59 फीसदी वोट पड़े। तीसरे चरण में 57 फीसदी वोट पड़े तो चौथे चरण में भी 57 फीसदी मतदान हुआ।
बात एक बार फिर ललितपुर की करें तो बुंदेलखण्ड के इस अति पिछड़े जनपद में इस चुनाव में किसी दल विशेष की बयार नहीं दिखाई दे रही थी। जिले में दो विधानसभा क्षेत्र ललितपुर सदर व महरौनी हैं। नए परिसीमन में महरौनी को अनुसूचित वर्ग के लिए आरक्षित किया गया। सदर में 3,84607 कुल मतदाता हैं, जिनमें 1,80163 महिला मतदाता हैं। इसी प्रकार महरौनी में कुल मतदाताओं की संख्या 3,59612 है, यहां महिलाओं की संख्या 1,70069 है। अगर ललितपुर जिले में 72 फीसदी तक मतदान हुआ है तो वह किसके पक्ष में ये आकलन अभी मुश्किल हो सकता है। हांलाकि पिछले चुनाव में जिले की दोनो ही सीटें बीएसपी के पास थीं। पिछले चुनाव में दोनों सीटों पर बीएसपी के उम्मीदवार जीते थे। सदर में बसपा के नाथूराम कुशवाहा ने वीरेन्द्र सिंह बुंदेला को हराया तो महरौनी में उनके चचेरे भाई पूरन सिंह बुंदेला बसपा के ही रामकुमार तिवारी से चुनाव हार गए थे।

--- विद्युत प्रकाश   

Monday, 13 February 2012

कैब सेवा – महानगर के लिए सुविधाजनक


अगर आप को कभी कभी कार से चलने की जरूरत पड़ती हो तो कोई जरूरी नहीं कि आप खरीदें। इसके लिए आप कैब सर्विस की सेवाएं ले सकते हैं। जैसे कि आपको स्टेशन या एयरपोर्ट जाना है तो आप समय से पहले की कैब बुक कर लें। इससे आपकी एन वक्त पर गाड़ी ढूंढने की समस्या भी खत्म हो सकती है। अब महानगरों में 24 घंटे कैब बुक करने की सुविधा उपलब्ध है। जब आप किसी कैब कंपनी को कैब के लिए फोन करते हैं तो ये काल रेडियो फ्रिक्वेंसी से आपके आसपास मौजूद कंपनी के सभी कैब वालों तक जाती है। थोड़ी देर में ही आपके मोबाइल पर संदेश आ जाता है कि आपको कौन सी कैब, उसका नंबर क्या है, ड्राइवर का नंबर क्या है कितनी देर में आपके पास पहुंच जाएगी।
कैब सेवाएं कभी कभी कार का सफर करने वालों से सुरक्षित और सस्ती हैं। आपको अगर हफ्ते में एक दिन ही कार की जरूरत पड़ती है तो आप कार खरीदने के बजाए कैब की सेवा लें तो ये आपके लिए बेहतर विकल्प हो सकता है। आप अगर नई कार खरीदते हैं तो उसके रख रखाव में अच्छा खासा खर्च करना पड़ता है। साथ ही कार की सुरक्षा की चिंता भी रहती है। अगर आपने तीन लाख रूपये एक कार में निवेश किया है तो उसकी कीमत भी घटती रहती है। भले ही कार कम ही क्यों न चलती हो। मान लिजिए किसी काम से आपको कुछ दिनों के लिए दूसरे शहर में जाना हो तो चाह कर भी आप अपनी कार से स्टेशन नहीं जा सकते। क्योंकि आपकी कार को स्टेशन से वापस कौन लाएगा। ऐसी हालत में आप टैक्सी सेवा का ही सहारा लेते हैं। महानगरों में शुरू हुई कैब सर्विस ने परंपरागत टैक्सी स्टैंड की टैक्सी सेवा से बेहतर सेवा देनी शुरू कर दी है। यहां प्रति किलोमीटर रेट फिक्स है। ड्राइवर आपको बिल देता है। बिलिंग में पूरी तरह पारदर्शिता है। कैब सेवाओं के पास छोटी बड़ी हर तरह की टैक्सियां उपलब्ध हैं। अमूमन दिन हो या रात कभी भी कैब बुक कर सकते हैं। दिल्ली जैसे महानगर में कुछ टैक्सी सेवाएं 10 रूपये प्रति किलोमीटर तो कुछ 15 तो कुछ 20 रूपये प्रति किलोमीटर के रेट में सेवाएं उपलब्ध करा रही हैं। रात्रि सेवा और इंतजार के लिए अलग शुल्क है।   
हम आपको दिल्ली की कुछप्रमुख कैब सेवाएं को नंबर बता रहे हैं।  
टैक्सी सिंडिकेट – 011- 6767-6767
मेगा कैब       011-4141-4141
आइरिश        011-44334433
एयर कैब       011-48484848
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Tuesday, 7 February 2012

जमाने के साथ बदलती घड़ियां...

अब भला घड़ियां कौन पहनता है। मोबाइल फोन ने घड़ियों की जरूरत को खत्म कर दिया है। अगर सिर्फ समय देखना है तो अलग से घड़ी पहन कर चलने की क्या जरूरत है। मोबाइल फोन ने घड़ी और एड्रेस बुक साथ लेकर चलने की जरूरत को खत्म कर दिया है। ऐसे दौर में लोग आम तौर मोबाइल फोन साथ होने पर घड़ी पहनकर चलना जरूरी नहीं समझते। पर नहीं जनाब अभी भी घड़ियां आउटडेटेड नहीं हुई हैं। घड़ी बनाने वाली कंपनियां अब घड़ियों को भी नया रूप देकर उसे बहुउपयोगी बनाने में लगी हैं। अगर घड़ी में समय देखने के अलावा आपको कुछ और सुविधाएं भी मिलें तो निश्चय ही आप घड़ी पहनना पसंद करेंगे। अगर हम घड़ियों की पिछली पीढ़ी की बात करें तो मेकेनिकल घड़ियों में तारीख और महीना देखने की सुविधा उपलब्ध होती थी। क्वार्टज घड़ियों में भी इस तरह की सुविधा उपलब्ध थी। पर इनमें एक मुश्किल थी की महीना बदलने पर तारीख एडजस्ट करना पड़ता था। उसके बाद डिजिटल घड़ियों का दौर आया। ऐसी घड़ियों में तारीखेंकैलेंडर आदि अपने आप एडजस्ट हो जाता था। पर डिजिटल घड़ियां अपनी ड्यूरेब्लिटी और वाटर रेजिस्टेंस नहीं होने के कारण लोगों की पसंद नहीं बन सकीं।

पर दुनिया की कई जानी मानी कंपनियां घड़ियों में नित नए रिसर्च कर घड़ियों के बाजार को नया आयाम देने की कोशिश में लगी हुई हैं। जिस तरह कार के बाजार में महंगी कारों का सिगमेंट है। उसी तरह महंगी घड़ियों के सिगमेंट में कई तरह की सुविधाओं से सज्जित घड़ियां बाजार में आई हैं। फिनलैंड की जानी-मानी घड़ियों की कंपनी सुनोटो ने एबीसी सीरिज की घड़ियां लांच की है। एबीसी यानी इस घड़ी में समय देखने के अलावा एलमीटर, बैरोमीटर और कंपास जैसी सुविधाएं हैं। यह घड़ी सूर्योदय और सूर्यास्त का समय भी बताती है। घड़ी का मेनू चार भाषाओं में उपलब्ध है।
घड़ी में ड्यूल टाइम, काउंट डाउन टाइमर जैसी सुविधाएं मौजूद हैं। सुनोटो की घड़ियां अक्सर हवाई जहाज की यात्रा करने वालों, पर्वतारोहियों और पूरी दुनिया का भ्रमण करने वाले लोगों को लिए उपयोगी हो सकती हैं। सुनोटो की घड़ी अपने आप में एक वेदर स्टेशन की तरह है। घड़ी में बैरोमीटर है जो हवा दबाव, मौसम का ग्राफिक्स बताता है। मौसम खराब होने के समय आपको चेतावनी भी देता है। जब आप हवाई यात्रा कर रहे होते हैं तो 10 हजार मीटर की ऊंचाई तक घड़ी में मौजूद एलटीमीटर वहां के एलीवेशन की आपको जानकारी देता है।
गोताखोरी से जुड़े लोग, पहाड़ों पर चढ़ाई करने वाले, स्कीईंग और नौका चलाने वाले लोगों गोल्फ के खिलाड़ियों के लिए इस तरह की घड़ी बहुत उपयोगी है जो एक साथ कई तरह के समाधान प्रदान करती है। यानी अगर आप भविष्य में अधिक सुविधायुक्त घड़ी खरीदने की बात सोच रहे हैं तो सुनोटो के छह माडलों के बारे में भी सोच सकते हैं। हम यह भी कह सकते हैं लैपटाप और मोबाइल के जमाने में घड़ियां पूरी तरह आउटडेटेड नहीं हुई हैं।

-विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com