Tuesday, 16 March 2010

मसूरी में जूनियर तेंदुलकर


जूनियर तेंदुलकर यानी अर्जुन आजकल पहाड़ों की हसीन वादियों के बीच बल्ले पर जोर आजमाइश कर रहे हैं। सचिन तेंदुलकर इन दिनों आईपीएल का मैच खेलने में व्यस्त हैं लेकिन उनकी पत्नी अंजलि और उनके बेटे पहाड़ों की हसीन वादियों में छुट्टियां मनाने के लिए पहुंच गए है। हालांकि मसूरी सचिन तेंदुलकर की फेवरिट जगह है।
सचिन अक्सर छुट्टियां मनाने के लिए मसूरी का रूख करते हैं लेकिन इस बार सचिन मसूरी नहीं आ सके हैं, क्योंकि वे आईपीएल सीजन थ्री में व्यस्त हैं। तो क्या हुआ जूनियर सचिन अपनी स्कूलों की छुट्टियां खत्म होने के बाद पहुंच गए हैं मुंबई का कोलाहल छोड़कर मसूरी। पापा की तरह अर्जुन को भी मसूरी बहुत पसंद है। मसूरी के बच्चों को संग क्रिकेट खेलते हुए मसूरी उन सारे टिप्पस को शेयर कर रहे हैं जो उन्होंने अपने पापा से सीखा है। मसूरी के बच्चे भी जूनियर तेंदुलकर के संग गली क्रिकेट खेलकर खुद को धन्य मान रहे हैं।
दिन भर अर्जुन और उनकी मां अंजलि मसूरी की सड़कों पर घूमने और खाने पीने का जमकर लुत्फ उठा रहे हैं। हालांकि लगता है कि मन में इस बात की कसक जरूर है कि पापा सचिन भी साथ होते तो छुट्टियां मनाने का मजा कुछ और होता।

Monday, 8 March 2010

कृपालु बाबा की जय...

सचमुच जिंदगी और मौत को भगवान के हाथ में ही होती है। इसलिए यूपी के प्रतापगढ़ जिले में कृपालु महाराज के आश्रम में जिन लोगों की मौत हुई उसमें कृपालु महाराज का कोई दोष नहीं है। क्योंकि जो लोग अचानक मची भगदड़ में काल के गाल में समा गए उन्हें भगवान ने जल्दी अपने पास बुला लिया। भला इसमें कृपालु महाराज का दोष…वे तो वैसे भी इंसान को भगवान से मिलाने का काम जीवन भर करते आए हैं। 

लेकिन मैं कहता हूं कि भगवान किसी को इतनी गरीबी भी मत देना जितनी की कुंडा में कृपालु महाराज के आश्रम में जुटी भीड़ में जुटे लोगों को दे रखी थी। सुना है कि वे सभी लोग महज 20 रूपये, चार लड्डू और एक थाली ग्लास के लिए वहां जुट गए थे। हम क्या करें हिंदुस्तान के कई इलाकों में इतनी गरीबी है कि लोग दो मुट्ठी चावल के लिए दौड़ पड़ते हैं। खैर दुर्घटना के बाद कृपालु महाराज ने बहुत कृपा बरसाई है। उन्होने भंडारे का आयोजन और गरीबों को रूपये बांटने का सिलसिला जारी रखा है। लगता है महाराज के पास अनाज का भंडार और रूपये की कोई कमी नहीं है। मुझे तो लगता है कि देश भर के स्कूलों में चलाए जाने वाले मिड डे मील का ठेगा कृपालु महाराज को ही दे देना चाहिए।
- vidyutp@gmail.com 

Saturday, 6 February 2010

नहीं रहे भोजपुरी फिल्मों के सुपर स्टार सुजीत कुमार


भोजपुरी फिल्मों के लोकप्रिय स्टार सुजीत कुमार हमारे बीच नहीं रहे। कई महीने से बीमार चल रहे सुजीत कुमार ने मुंबई के एक अस्पताल में 5 फरवरी 2010 को दम तोड़ दिया। सुजीत कुमार ने कई हिट भोजपुरी फिल्मों के अलावा हिंदी फिल्मों में भी अभिनय किया था...

सुजीत कुमार को फिल्म इंडस्ट्री में पहला ब्रेक किशोर कुमार की फिल्म दूर गगन की छांव में  में मिला था। ...आपको अराधना का वह गीत तो याद है न ... मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू... इस गाने में सुजीत कुमार राजेश खन्ना की गाड़ी को ड्राईव करते हुए नजर आते हैं। गाना खूब हिट हुआ था। उन्होंने बाद में कई हिंदी फिल्मों में सहयोगी कलाकार की भूमिका निभाई। 


 पर सुजीत कुमार की आत्मा तो भोजपुरी में बसती थी....विदेशिया भोजपुरी की सुपर हिट फिल्म थी जिसके हीरो सुजीत कुमार थे। इस फिल्म में अपने अभिनय से सुजीत कुमार भोजपुरी जगत में काफी लोकप्रिय हो गए। उनका नाम भोजपुरी फिल्मों के अमिताभ बच्चन के तौर पर लिया जाने लगा।

विदेशिया श्वेत श्याम दौर की फिल्म थी। जब भोजपुरी में रंगीन फिल्मों का दौर आया तो दंगल में सुजीत कुमार हीरो के रूप में नजर आए। फिल्म में हीरोइन थी प्रेमा नारायण। पद्मा खन्ना के साथ भैया दूज भी भोजपुरी की सुपर हिट फिल्म थी जिसमें सुजीत कुमार हीरो के रूप में दीखे। भैया दूज भोजपुरी पट्टी में सुपर हिट रही थी। 


सुजीत कुमार ने 1983 में पान खाए सैयां हमार नामक फिल्म बनाई जिसमें अमिताभ बच्चन और रेखा अतिथि भूमिका में नजर आए। बाद के दौर में सुजीत कुमार ने कई हिंदी फिल्मों का भी निर्माण भी किया जिसमें अनिल कपूर की खेल, सन्नी देयोल की चैंपियन और ऐतबार जैसी हिंदी फिल्मों के प्रोड्यूसर भी थे। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में उनकी दोस्ती सभी बड़े सितारों से थी। 


अभी हाल में सुजीत कुमार ने अपने खास दोस्तों के बीच अपना 75वां जन्म दिन मनाया था। आज सुजीत कुमार हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन भोजपुरी फिल्मों का इतिहास की जब भी बात की जाएगी सुजीत कुमार के बिना चर्चा अधूरी रहेगी।

सुजीत कुमार:
जन्म : 7 फरवरी 1934, वाराणसी
मृत्यु : 5 फरवरी 2010, मुंबई 
हिन्दी फिल्में: अराधना,  मेरे जीवन साथी , हाथी मेरे साथी .
भोजपुरी फिल्में - बिदेशिया, दंगल, भैया दूज, पान खाए सैंया हमार आदि। 

- vidyutp@gmail.com 

Wednesday, 27 January 2010

जानकी वल्लभ शास्त्री का दर्द


जीवन के 94 वसंत देख चुके जानकी वल्लभ शास्त्री इन दिनों खासे व्यथित हैं। उनकी व्यथा जायज भी है। इस साल के पद्म पुरस्कारों के ऐलान में उनका नाम पद्मश्री के लिए चयनित किया गया है। दुखी महाकवि ने अपना नाम सुनते ही कह दिया कि मुझे नहीं लेना ये सम्मान....परिवार के लोगों को लगता है भारत सरकार को उन्हें कम से कम पद्मभूषण या फिर पद्मविभूषण तो देना ही चाहिए था.... 

हालांकि महाकवि अब पद्म पुरस्कार ले लेने को राजी हो गए हैं लेकिन उनके शब्दों में दर्द साफ झलक रहा है। महाकवि जानकी वल्लभ शास्त्री हिंदी और संस्कृत के प्रकांड विद्वान हैं। साहित्यकारों की कई पीढ़ियां उनके आंगन की छांव में बड़ी हुई हैं....महाकवि से कनिष्ठ कई लोगों को पद्मश्री से बड़ा पुरस्कार मिल चुका है। ऐसे में शास्त्रीजी की दर्द जायज है। 

दुखी शास्त्री जी बोल पड़ते हैं सालों से मेरी सुध लेने कोई नहीं आया। सच्चे साहित्यकार को सम्मान की भूख भले ही न हो लेकिन उपेक्षा का दंश जरूर उसे सालता है...महाकवि जानकी वल्लभ शास्त्री का जो हिंदी साहित्य में योगदान है उसको सिर्फ पद्मश्री से नहीं तौला जा सकता है....लेकिन सचमुच जिस सम्मान के हकदार महाकवि हैं वह हम उन्हें नहीं दे पा रहे हैं ऐसे में साहित्यकार भावुक हो उठा है।

( 7 अप्रैल 2011 को महाकवि जानकी वल्लभ शास्त्री का निधन हो गया )  -vidyutp@gmail.com

Wednesday, 13 January 2010

रात में एटीएम लेकर चलने वालों होशियार

वैसे तो ये बड़ा दुखद है,,लेकिन कभी कभी दिन रात खबर बनाने वाला व्यक्ति खुद ही खबर बन जाता है। 13 साल से ज्यादा की पत्रकारिता के दौरान एक दिन भी ऐसा भी आया। 11 जनवरी की रात इवनिंग शिफ्ट की ड्यूटी खत्म करने के बाद रोज की तरह मैं अपनी बाइक से घर के लिए जा रहा था। दफ्तर से मेरा घर 16-17 किलोमीटर है। हालांकि दफ्तर नाइट ड्राप की सुविधा देता है लेकिन मैं थोडा समय बच जाए। इस लिहाज से अपनी बाइक से ही घर जाता हूं। हालांकि टीवी मीडिया के और भी कई ब़ड़े पत्रकार अभी भी कार की हैसियत होने के बाद भी बाइक से चलना सुगम समझते हैं। लेकिन दिल्ली के कई इलाके ऐसे हैं जहां अकेले चलने वाले के साथ लूटपाट की वारदात हो सकती है। कुछ ही महीने मे देखें तो मेरे साथ ही हुआ ये हादसा तीसरा वाक्या है।

खबर जो bhadas4media पर छपी....
रात की पारी में काम करने वाले मीडियाकर्मियों को सलाह- एटीएम कार्ड लेकर न चलना : महुआ न्यूज के प्रोड्यूसर विद्युत प्रकाश मौर्य कल रात एक बजे नोएडा स्थित आफिस से काम खत्म कर घर के लिए निकले. गाजियाबाद में डीएलएफ दिलशाद एक्सटेंशन में कुछ महीनों पहले अपने नए खरीदे मकान में रह रहे विद्युत ज्योंही कालोनी के मेन गेट पर पहुंचे, पिस्तौल-चाकू से लैस बदमाश प्रकट हुए. विद्युत बाइक पर थे. बदमाशों ने बाइक की चाभी ले ली. जेब-शरीर पर जो मिला, निकाल लिया. मोबाइल, पर्स, एटीएम कार्ड, सोने-चांदी की अंगूठियां... सब कुछ निकाल लिया. इसके बाद बदमाश विद्युत को बगल की गली की ओर गन प्वाइंट पर ले गए. बदमाशों ने कहा- एटीएम का सही पासवर्ड बताओ या गोली खाओ.
बदमाशों ने कहा- हमारे दो लोग एटीएम कार्ड लेकर बैंक जाएंगे. तुम यहीं हम लोगों के साथ रहोगे. अगर गलत पासवर्ड बताया तो हमारे साथी हमें फोन से सूचित करेंगे और तुम्हें यहीं गोली मारकर ढेर कर देंगे. इतनी बात सुनने के बाद विद्युत ने बिना आनाकानी किए अपने एटीएम का सही-सही पासवर्ड बता दिया. दो बदमाश एटीएम कार्ड लेकर बाइक से पैसे निकालने चले गए और दो बदमाश विद्युत को गन प्वाइंट पर लिए गली में खड़े रहे. इसी बीच संयोग देखिए की पुलिस की पीसीआर वैन आ गई. तीन लोगों को संदिग्ध अवस्था में खड़ा देख पुलिसवालों ने दौड़ाया तो बदमाश विद्युत को छोड़कर भाग निकले. पुलिस ने विद्युत से पूरी कहानी जानने के बाद बदमाशों का पीछा किया लेकिन इंडियन पुलिस के हत्थे बदमाश रंगेहाथ बहुत कम चढ़ते हैं. सो, बदमाश भाग निकले. पुलिस वाले विद्युत को गाड़ी पर बिठाकर एटीएम की ओर ले गए. एटीएम पर भी कोई बदमाश नहीं मिला.
इसी बीच, विद्युत ने अपने एटीएम कार्ड प्रोवाइडर बैंक को फोन करके कार्ड को ब्लाक करा दिया. लेकिन तब तक बदमाश अपना काम कर चुके थे. बदमाशों ने तीन-तीन अलग-अलग बैंकों के एटीएम से करीब चौबीस हजार रुपये निकाल चुके थे. विद्युत का सेलरी एकाउंड एचडीएफसी में है और उनके पास इसी एकाउंट का एटीएम कार्ड था. बदमाशों ने दो बैंकों से दस-दस हजार और एक बैंक से चार हजार रुपये निकाले थे. तो बंधु, जान लीजिए, एटीएम कार्ड लेकर चलना खतरे से खाली नहीं है. पहले कहा जाता था कि रुपये लेकर चलना खतरे से खाली नहीं है, उसकी जगह एटीएम कार्ड लेकर चलना चाहिए. पर अब तो एटीएम कार्ड का सही पासवर्ड न बताने पर गोली खाने का भी खतरा पैदा हो गया है. देखना है कि पत्रकार के साथ हुए इस भयानक लूटपाट का खुलासा गाजियाबाद पुलिस कब तक कर पाती है. साहिबाबाद पुलिस में विद्युत ने रिपोर्ट लिखा दी है. पुलिस वाले कई राउंड उनके घर आकर सब कुछ जान-पूछ कर जा चुके हैं.
यहां यह बता दें कि महुआ की तरफ से रात की पारी के कर्मियों के लिए ड्रापिंग फेसिलिटी है पर विद्युत अपनी बाइक से आना-जाना इसलिए पसंद करते हैं क्योंकि वे अपने साधन से 30 मिनट में ही पहुंच जाते हैं. आफिस ड्रापिंग कैब से जाने पर गाड़ी औरों को छोड़ते हुए उन्हें उनके घर पहुंचाती है जिसमें कई घंटे लग जाते हैं. विद्युत प्रतिभावान और मेहनती युवा पत्रकारों में शुमार किए जाते हैं. कई अखबारों में काम करने के बाद विद्युत ने महुआ की लाचिंग टीम के सदस्य बने और आज तक टिके हुए हैं. विद्युत का मोबाइल लुटेरे ले गए
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पूरी घटना पर काफी कुछ प्रकाशित हो चुका है, लेकिन जो लोग एटीएम कार्ड का इस्तेमाल करते हैं उन्हें मैं कुछ सलाह देना चाहता हूं।

1. अगर आपके खाते में ज्यादा रुपये रहते हैं, तो अलग अगल बैंकों में अपने कई बैंक एकाउंट रखें और पैसों को अलग अलग खातों में बांट कर रखें।

2. एक समय में किसी एक बैंक का ही एटीएम या क्रेडिट कार्ड लेकर चलें

3. एटीएम में डेबिट कार्ड का पावर भी होता है। कार्ड चोरी होने पर लोग कार्ड से शापिंग भी हो सकती है। इसके लिए पासवर्ड की भी जरूत नहीं पड़ती।

4. रात में सुनसान जगहों से एटीएम से पैसे की निकासी न करें....

5. लूटेरे पिस्तौल की नोंक पर धमकी देकर आपका एटीएम पासवर्ड पूछ सकते हैं या आपको अपने साथ एटीएम तक ले जाकर भी जबरी रूपये निकलवा सकते हैं। इस दौरान वे लोग एटीएम के आसपास रह सकते हैं। इसलिए बेहतर है कि एटीएम साथ लेकर चलें तो उस खाते में ज्यादा राशि नहीं रखें।


6. जिस बैंक का एटीएम हो उसका फोन बैंकिंग नंबर हमेशा याद रखें जिससे हालात खराब होने पर एटीएम को ब्लाक कराया जा सके।

7. कई बैंक, बीमा कंपनियां एटीएम, क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड पर बीमा की सुविधा भी देती हैं। इस विकल्प पर भी विचार किया जा सकता है।

- मैं आभारी हूं, अपने चैनल महुआ न्यूज, आजतक, जी न्यूज, स्टार न्यूज जैसे तमाम चैनलों का जिन्होंने इस खबर को महत्व दिया।
सभी राष्ट्रीय समाचार पत्रों को गाजियाबाद संस्करण के पन्नों पर भी मैं प्रमुखता से खबर बन गया. उन अखबारों में भी जहां कभी मैंने काम किया था....
लेकिन ये कैसी खबर है....जिसकी यादें सिहरन पैदा करती हैं।

Tuesday, 5 January 2010

आखिर कितने घंटे करें काम

हमने अपने पड़ोस में एक लड़के को देखा और उसकी कार्य कुशलता को देखकर मैं अत्याधिक प्रभावित हुआ। 18 साल का यह युवक सुबह चार बजे अपने काम में जुट जाता है। वह सुबह में छोले कुलचे का स्टाल लगाता है। फिर शाम को बर्गर और हाट डाग का स्टाल चलाता है। यानी एक दिन में दो बिजनेस। मैंने उक उत्सुकतावश उसका रूटीन जानना चाहा। उसने कहा कि वह 24 घंटे में सिर्फ चार घंटे ही सोता है। इसके बाद भी वह स्वस्थ और तंदुरुस्त है। उसके पिता का छोले कुलचे बेचने का खानदानी काम था। 

परिवार में ही यह काम सीखने के बाद उसने अपने बूढ़े पिता को इस काम से मुक्ति दे दी है। पर विरासत में मिले इस रोजगार हो उसने 18 साल की उम्र में ही दुगुना कर दिया। वह चाहता है कि वह एक दो घंटे का तीसरा कारोबार भी आरंभ करें। आमतौर पर 18 साल के लड़के कालेज जाते हैं। बाकी समय में लड़कियों से दोस्ती करते हैं। पर अपने काम की धुन में मगन है। उसने अपनी आमदनी को तो खुलासा नहीं किया पर हमारा अनुमान है कि वह इन दोनों का कारोबार से 20 हजार रुपए मासिक तक बडे़ आराम से कमाता है। यानी कि बिना किसी बड़े डिप्लोमा डिग्री के वह अच्छा खासा रुपया कमा रहा है। वह शायद पढ़ने लिखने में अपना वक्त लगाता तो भी इतना शायद नहीं कमा पाता।

अब अगर हम एक समान्य आदमी का रुटीन देंखे तो वह किसी नौकरी में आमतौर पर सात घंटे रोज देता है। बाकी के समय वह कोई काम नहीं करता। परिवार की समस्याओं में उलझा रहता है। पर जिन लोगों ने भी अपने जीवन में प्रगति की है उन्होंने 24 घंटे में सिर्फ सात घंटे ही नहीं काम किया है बल्कि उसके बाद के समय में भी अपने रोजगार को आगे बढ़ाया है। हमें मालूम है कि निरमा केमिकल्स के मालिक ने वाशिंग पाउडर बनाने के काम को पार्ट टाइम रोजगार के रुप में आरंभ किया था। 

कई लोग अपनी नौकरी के अलावा सुबह में अखबार बेचने का काम कर लेते हैं। कई लोग नौकरी के साथ ही बीमा कंपनी या म्युचुअल फंड के एजेंट के रुप में अपने कारोबार की शुरूआत करते हैं। इससे उनकी आमदनी में इजाफा होता ही है साथ ही वे अपने साथियों की तुलना में आर्थिक रुप से काफी आगे निकल जाते हैं। हमारे एक जानने वाले बैंक कलर्क ने देखा कि सिर्फ इस नौकरी से वह ज्यादा प्रगति नहीं कर सकता। उसने एक स्टेशनरी की दुकान खोली। जहां वह सुबह और शाम को मिलाकर तीन घंटे समय देता था। कुछ सालों में दुकान ने इतनी प्रगति की कि उसने एक होल सेल स्टेशनरी की दुकान भी खोल ली। नौकरी भी साथ चलती रही।

दुनिया में तमाम उद्योगपति तथा वैसे लोग जिन्होंने काफी प्रगति की है उनका अगर कैरियर का ग्राफ देखा जाए तो पाएंगे कि उन्होंने 17-18 घंटे तक रोज काम किया है। हालांकि शरीर की भी अपनी क्षमता होती है वह ज्यादा काम करने से थकता है। पर उससे सात घंटे के अलावा भी कुछ काम तो अवश्य ही लिया जा सकता है। अगर सरकारी नौकरी में काम की हकीकत पर बात करें तो अधिकांश कर्मचारी सात घंटे दफ्तर में ईमानदारी से काम नहीं करते। कई दफ्तरों के कर्मचारी तो दिन भर में जितना काम निपटाते हैं वह महज दो घंटे का ही काम होता है। आप खुद से ईमानदारी से पूछ कर देखें कि क्या आप अपनी कार्य क्षमता का पूरा इस्तेमाल कर रहे हैं। अगर नहीं तो थोड़ी मेहनत और करके आप अपने जीवन की रफ्तार को बढ़ा सकते हैं।
-         माधवी रंजना 




Wednesday, 30 December 2009

बच्चों के बदलते खिलौने

मैं तो चांद खिलौना लूंगा। अब यह कहावत पुरानी पड़ चुकी है। बच्चे बदलते जमाने के साथ नए ढंग के खिलौने के संग खेलना चाहते हैं। अब उन्हें मिट्टी की गाड़ी देकर बहलाया नहीं जा सकता। आजकल छोटे बच्चों में मोबाइल फोन खिलौने के रूप में काफी लोकप्रिय हो रहा है। गांवों में और खासतौर पर पुराने समय में बच्चों के बीच मिट्टी का खिलौना काफी लोकप्रिय होता था। बच्चों को मिट्टी की बनी हाथी मिट्टी के बने घोड़े आदि खेलने के लिए दिए जाते थे। खिलौने बनाने वाला कुम्हार इन्हें आकर्षक रंगों से रंग भी देता था। ये मिट्टी के खिलौन पटकने पर टूट जाते थे। खिलौने के टूटने पर बच्चा रुठ जाता है। किसी शायर ने लिखा है-
और ले आएंगे बाजार से जो टूट गया, चांदी के खिलौने से मेरा मिट्टी का खिलौना अच्छा।

मिट्टी और लकड़ी का गया दौर - पर अब मिट्टी की जगह प्लास्टिक के बने खिलौनों ने ले ली है। ये खिलौने जल्दी टूटते भी नहीं हैं। बीच में लकड़ी के बने खिलौनों का भी दौर रहा। अभी भी भारत के कुछ शहरों में बच्चों के लिए लकड़ी के बने खिलौने मिलते हैं। खिलौने के इस बदलते स्वरुप के साथ बच्चों की मांग भी बदलती जा रही है। पहले बच्चे मिट्टी के हाथी मांगने की जिद करते थे। हाथी मिल जाए तो मिट्टी का गुल्लक मांगते थे। आसमान में चंदा मामा को देखर बच्चे चांद को खिलौने के रुप में मांगने की जिद पर भी आ जाते थे। मैं चांद खिलौने लेहों यह कहावत बहुत मशहूर हुआ। पर अब यह कहावत नए रुप में कही जानी चाहिए- मैं मोबाइल खिलौना लेहों....अब बड़ों के पास हर जगह हाथों में मोबाइल देखकर बच्चे मोबाइल फोन को ही खिलौने के रुप में मांगते हैं। बाजार चीन के बने हुए मोबाइल खिलौने से पटा पड़ा है। बीस रुपए में मिलने वाले मोबाइल खिलौने में बैटरी भी लगी होती है। इसमें कई तरह के रिंग टोन भी होते हैं। बिल्कुल असली मोबाइल के तरह ही। इसे देखकर बच्चे को अपने पास असली मोबाइल होने का भ्रम होता है। जो बजते बजते बैटरी खत्म हो गई तो बैटरी बजल डालिए। पर छोटा सा बच्चा अपने गले मोबाइल फोन देखकर गर्वान्वित महसूस करता है।

उम्र के अनुरूप दें खिलौने - वैसे बाजार में बच्चों की उम्र के हिसाब से कई तरह के खिलौने मौजूद हैं। कई खिलौना कंपनियां बच्चों की उम्र और उसके द्वारा उपयोग किए जाने वाले दिमाग को ध्यान में रखकर खिलौने बनाती हैं। जैसे नन्हें बच्चों को रंग पहचानने वाले खिलौने दिए जाते हैं। बच्चा थोड़ा बड़ा हो जाए तो उसे गिनती गिनने वाले खिलौने दिए जाते हैं। बच्चों को जानवरों और फलों की पहचान कराने के लिए उनकी प्रतिकृति खिलौने के रुप में दी जाती है। जब आप बाजार में अपने बच्चे के लिए खिलौने खरीदने जाएं तो उनकी उम्र का ख्याल रखें और उसके अनुरूप ही खिलौने लाकर उन्हें दें। इसके साथ ही बच्चों के साथ बैठकर उन्हें खिलौने के संग खेलना भी सीखाएं।

छोटे बच्चों को बहुत बड़े आकार के खिलौने न दें। कई बार बच्चे इस तरह के खिलौने से डर जाते हैं। बच्चों को ऐसे खिलौने ही दें जिन्हें वे अपना दोस्त समझें न कि उनके मन में किसी तरह का डर बैठ जाए। बच्चे म्यूजिकल खिलौने भी पसंद करते हैं। आप उनकी रुचि को समझकर ऐसा कोई चयन कर सकते हैं। आप अपने बच्चे की पसंद नापसंद का सूक्ष्मता से अध्ययन करें। उसके अनुरूप ही उसके लिए खिलौनों का चयन करें तो बेहतर होगा।
-माधवी रंजना madhavi.ranjana@gmail.com




Friday, 25 December 2009

ई मेल पर बढ़ती जगह

जब आप अपना ई मेल आईडी बनाते हैं इस बात की परेशानी आती है कि आपके मेल बाक्स पर ज्यादा स्पेश नहीं है। इससे आप जरूरी फाइलें आनलाइन नहीं रख पाते हैं। पर अब कई वेबसाइटों पर आपको प्रचूर मात्रा में स्पेश मिलता है। इससे आप अपनी जरूरी फाइलें साथ ही फोटोग्राफ आनलाइन रख सकते हैं। वह भी बिना कोई शुल्क दिए। आरंभ के दिनों में आमतौर पर कोई भी ईमेल सर्विस प्रोवाइडर अपने उपभोक्ताओं को 5 एमबी तक स्पेश मुफ्त में उपलब्ध कराता था। पर अब हालात बदल गए हैं। अब कई ईमेल सेवा प्रदाता कम से कम एक जीबी स्पेश मुफ्त में उपलब्ध करा रहे हैं वहीं कहीं कहीं तो तीन जीबी तक स्पेश भी उपलब्ध है वह भी मुफ्त में।
कुछ साल पहले जब ईमेल सेवा की शुरूआत हुई तब इसके सेवा प्रदाताओं को उम्मीद थी कि वे इसे जल्द ही पेड सेवा में बदल देंगे। यानी की सेवा के बदले में ग्राहकों से शुल्क वसूल करेंगे। इस क्रम में यूएसए डाट नेट ने प्रयास भी किए। वहीं रेडिफ मेल ने अपने ज्यादा स्पेश वाली सेवाओं के लिए शुल्क तय किए। पर शुल्क वाली सेवाएं लोगों में लोकप्रिय नहीं हुईं। जब लोगों को कहीं न कहीं मुफ्त में स्पेश उपलब्ध हो ही रहा था भला इसके लिए वे शुल्क क्यों दें। लिहाजा पेड सेवा प्रदान करने वालों के मंसूबों पर पानी फिर गया। फिलहाल इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालों के लिए ईमेल पर बहुतायत स्पेश फ्री में ही उपलब्ध है। इसी क्रम में कुछ ईमेल सेवा प्रदाताओं ने अपनी सेवा को लोकप्रिय बनाने के लिए मेल बाक्स में स्पेश में अभिवृद्धि करनी आरंभ की। इस क्रम में गूगल ने अपने उपयोक्ताओं को अनलिमिटेड स्पेश देना आरंभ कर दिया। आमतौर पर हर जीमेल एकाउंट में उपयोक्ताओं को 3 जीबी तक जगह मिलती है। यह जगह आपके उपयोग के अनुसार बढ़ती जाती है। जीमेल की खास बात है कि फिलहाल यहां कोई विज्ञापन नहीं आता है। साथ ही विज्ञापन वाले ईमेल भी नहीं आते। इसलिए जीमेल लोगों में तेजी से लोकप्रिय हो रहा है।
जीमेल की लोकप्रियता को देखते हुए याहू, रेडिफ और हाटमेल ने भी अपने उपयोक्ताओं के लिए 1 जीबी तक स्पेश देना आरंभ कर दिया है। आने वाले दिनों मे वही ईमेल सेवाएं लोकप्रिय हो सकेंगी जो अपने उपयोक्ताओं को ज्यादा से ज्यादा स्पेश उपलब्ध कराएंगी। क्योंकि अब ईमेल उपयोग करने वालों की जरूरतें बढ़ी हैं। वे अपनी बहुत सी फाइलें आनलाइन रखना चाहते हैं जिससे वे कभी भी कहीं उसे एक्सेस कर सकें। साथ ही अब लोग इमेल पर अपनी फोटोग्राफ भी रखना चाहते हैं। 

फोटो के लिए ज्यादा जगह चाहिए तो ईमेल पर ज्यादा स्पेश भी चाहिए। ऐसे में ज्यादा स्पेश देने वाली ईमेल सेवाएं ही लोकप्रिय हो सकेंगी। इंटरनेट पर ईमेल सेवा प्रदान करने वाली सैकड़ों साइटें हैं पर उनमें से कुछ साइटें ही लोकप्रिय हैं। जाहिर है वहीं साइटें लोकप्रिय हो सकती हैं जिनमें स्पेश भी ज्यादा हो साथ ही उनपर विज्ञापन भी कम आते हों।
फिलहाल मुफ्त में- यह उम्मीद की जानी चाहिए कि लोगों को ईमेल सेवा आने वाले कुछ सालों तक मुफ्त में ही प्राप्त होती रहेगी। कई सेवा प्रदाताओं को कंप्टिशन के दौर में यह आशंका कम नजर आती है कि सेवा प्रदाता इन सेवाओं को पेड करने की कोशिश करेंगे। इसलिए फिलहाल ईमेल यूजरों को निश्चिंत रहना चाहिए।

-विद्युत प्रकाश vidyutp@gmail.com



Sunday, 20 December 2009

गांव की ओर पहुंचे कालोनाइजर

अब तक आप मकान बनाने वाले प्राइवेट बिल्डर या कालोनाइजरों के बड़े महानगरों में होने की बात सुनते आए होंगे पर अब कालोनाइजरों ने गांव की ओर भी रुख करना शुरू कर दिया है। यानी निजी बिल्डर गांव में भी घर बनाकर लोगों को देंगे। जब आप शहरों में लगातार बढ़ रहे प्रदूषण और भीड़-भाड़ से दूर रहने की योजना बनाते हैं तो आपकी इच्छा गांव में रहने की होती है। शहरी माहौल में होने वाली कई तरह की बीमरियों से बचने के लिए लोग प्राकृतिक निवास की ओर रुख कर रहे हैं इसमें ख्याल आता है गांव में रहने का। अब आपको गांव में भी शहरों की तरह ही बनी बनाई कालोनी रहने के लि मिले तो फिर क्या बात है।

हम चलते हैं दिल्ली के लगभग 125 किलोमीटर दूर करनाल शहर को।
दिल्ली से यहां आने में डेढ़ घंटे का समय लगता है अगर आपके पास अपनी कार हो। करनाल सेक्टरों में विकसित शहर है। पर यहां लोगों की मांग को देखते हुए एक निजी बिल्डर द्वारा ऐसी कालोनी विकसित की जा रही है जो पूरी तरह गांव की तरह होगी। यहां अच्छी सड़कें और हरियाली तो होगी ही साथ ही गांव की चौपाल भी होगी। पर यह गांव होगा हाईटेक। यानी यहां बिजली, कंप्यूटर इंटरनेट, स्कूल, क्लब, स्विमिंग पूल, अस्पताल आदि सब कुछ होगा।
अब अगर गांव में शहर जैसी सारी सुविधाएं हो तो भला गांव से शहर जाने की क्या जरूरत होगी। यह गांव शहर से 10 किलोमीटर की दूरी पर बसाया जा रहा है। यानी जब आपको जरूरत हो दस मिनट में शहर आ जाएं। कई बड़े महानगरों के आसपास के गांव इतने समृद्ध और सुविधा संपन्न हैं कि वहां के लोगों को शहर जाकर रहने की जरूरत नहीं पड़ती। अब गांवों में ऐसी कालोनियां विकसित की जा रही हैं जहां आप घर खरीदकर रह सकें। खासकर बड़ी नौकरियों से अवकाश प्राप्त करने वाले लोगों की नजर ऐसी कालोनियों पर है। वे अपना बाकी समय चैन से ऐसे गांवों में गुजारना चाहते हैं जहां उन्हें सारी मूलभूत सुविधाएं प्राप्त हो सकें। साथ ही ऐसे गांव देश में विलेज टूरिज्म को भी बढ़ावा दे सकेंगे। विदेशों से आने वाले पर्यटकों को ऐसे गांव में ठहराया जा सकेगा। यह विदेशी मुद्रा अर्जित करने का बेहतर स्रोत सिद्ध होने वाला है। इतना ही नहीं वैसे अनिवासी भारतीय जो भारत में आकर रहना चाहते हैं उनके लिए भी ऐसे गांव पसंद बनते जा रहे हैं। हरिद्वार और देहरादून की बीच भी कुछ बिल्डर लोगों को प्राकृतिक आवास उपलब्ध कराने का दावा कर रहे हैं। हालांकि ये आवास गांव के घरों की तरह नहीं हैं बल्कि फ्लैट की शक्ल में हैं।
हरियाणा सरकार की आवासीय सेक्टर विकसित करने वाली एजेंसी हुडा भी गांवों सेक्टर विकसित करने लगी है। वह गांवों के लोगों की जरूरतों के हिसाब से उनके लिए घर बना रही है। इसके लिए उसने कई गांवों की पहचान की है। यानी कि गांव के लोगों को भी प्लानिंग के हिसाब से बने हुए घर मिलेंगे। इसके कई फायदे हैं। आमतौर पर गांवों कोई घर अच्छा बनावा ले तो वहां की गलियां व सड़कें योजना के हिसाब से नहीं बनती हैं। अब अगर गांव भी योजना के अनुसार बनवाए जाएं तो वे देखने में ज्यादा सुंदर लग सकते हैं। यह योजना पंजाब, हरियाणा, गुजरात जैसे कुछ समृद्ध राज्यों में लागू हो सकती है। पर इससे अन्य राज्यों के रहने वाले लोग प्रेरणा ले सकते हैं। इस योजना के तहत जहां नए गांव विकसित किए जा सकते हैं वही पुराने गांवों की योजना में सुधार भी लाया जा सकता है। इससे किसी भी गांव की सुंदरता में चार चांद लग सकते हैं।
------  विद्युत प्रकाश मौर्य


Tuesday, 15 December 2009

अब दिल्ली से मुंबई लोकल

एक जून करोड़ों लोगो के लिए सौगात लेकर आया। अब आप दिल्ली से मुंबई लोकल दरों पर बातें कर सकते हैं। ठीक उसी तरह जैसे पड़ोस में बातें करते हैं। यानी 1.20 रुपए में तीन मिनट की काल। ऐसा एमटीएनएल की नई काल दर के कारण संभव हो पाया है। हालांकि दिल्ली से मुंबई की दूरी दो हजार किलोमीटर है। फिर भी दोनों शहरों के बीच अब लोकल काल करने की सुविधा बहाल हो गई है। यह दूर संचार के इतिहास में एक क्रांतिकारी कदम है। एसटीडी में सस्ती काल दरें एनएलडी ( नेशनल लांग डिस्टेंस) में भी कई खिलाड़ियों के आने के बाद संभव हो सका है। पहले इस क्षेत्र में सिर्फ भारत संचार निगम लि. का एकाधिकार था। इस बार एमटीएनएल ने दिल्ली से मुंबई काल भेजने के लिए विदेश संचार निगम लि. (वीएसएनएल) को कैरियर के रुप में चुना है जो टाटा के स्वामित्व वाली कंपनी है। अब हर टेलकाम आपरेटर को अधिकार है कि वह एसटीडी या आईएसडी कालों के लिए किसी भी कंपनी को कैरियर के रुप में चुने। इसका लाभ ग्राहकों को मिलने वाला है। सिर्फ मुंबई ही नहीं दिल्ली व मुंबई में काम कर रही महानगर टेलीफोन निगम लि. बाकी बचे देश के लिए भी एसटीडी काल की दरें कम करने वाली है। इसके लिए भी उसने कई कंपनियों से आफर मांगे हैं। उम्मीद की जाती है इसके बाद लोगों को 40 पैसे से 70 पैसे प्रति मिनट तक मात्र एसटीडी दर के रुप में चुकाना होगा। वास्तव में दरों में रेशनेलाइजेशन भी होना चाहिए। अभी दिल्ली से मुंबई 40 पैसे मिनट की दर लागू हो चुकी है। जबकि दिल्ली से मुंबई की दूरी 2000 किलोमीटर है। ऐसी स्थिति में बिहार और बंगाल के लोगों ने कौन सा अपराध किया है कि उन्हें कम दूरी के बावजूद 2.40 रुपए प्रति मिनट की दर चुकाना पड़े। अब अगर एमटीएनएल अपनी एसटीडी काल दरें गिराता है तो दूसरी कंपनियों के लिए चुनौती होगी। क्योंकि दिल्ली मुंबई से जाने वाली काल तो सस्ती हो जाएगी जबकि उधर से आने वाली काल महंगी ही रहेगी। ऐसी स्थिति में एक अराजकता का महौल बन जाएगा। जाहिर है बीएसएनएल सहित बाकी कंपनियों को भी अपनी एसटीडी काल दरें कम करनी ही पड़ेंगी।
बीएसएनएल ने जो इंडिया वन का पैकेज पेश किया है उसमें एक राष्ट्रीय काल एक रुपये में एक मिनट की अवश्य पड़ती है पर उसके लिए भारी भरकम मासिक किराया भी चुकाना पड़ता है। हालांकि इसी तरह का पैकेज हर कंपनी ने पेश किया है। पर अब दौर वास्तव में एसटीडी में काल दरें गिरने का आ रहा है। अभी मोबाइल पर देश व्यापी काल की दरें 2 रुपए मिनट के पास है। पर अब हम ऐसे दौर की कल्पना कर सकते हैं जो जब एसटीडी और लोकल काल की दरों मे कोई खास अंतर नहीं रह जाएगा यानी जैसा दिल्ली व मुंबई के बीच हुआ है वैसा कुछ सारे देश में हो सकेगा। ऐसी हालात में वास्तव में कश्मीर से कन्याकुमारी तक के लोग एक दर पर बातें कर सकेंगे।
फिलहाल सभी कंपनियां अपने नेटवर्क पर ग्राहकों को कम दर पर काल करने की सुविधा दे रही हैं। अभी तुलनात्मक रुप से टेलकाम सेक्टर में सबसे देर से प्रवेश करने वाली कंपनी टाटा सबसे कम दर पर काल करने की सुविधा दे रही है। आने वाले कुछ महीनों में टाटा एसटीडी काल दरों में कुछ और धमाका करने वाली है। बस देखते रहिए आगे आगे होता है क्या क्या।

-माधवी रंजना madhavi.ranjana@gmail.com