Wednesday, 22 April 2009

गांव में बनाएं आशियाना

मुंबई के एक अखबार ने एक विज्ञापन छापा है। सिर्फ आठ लाख रुपए में गांव में खरीदें अपना घर। उसके साथ पाएं खेती करने के लिए थोड़ी सी जमीन भी। यानी अब कई बिल्डर आपको गांव में मकान बना कर दे रहे हैं। यह इस बात का सूचक है कि काफी लोग अपने सूकून भरे दिन अब गांव में गुजारना चाहते हैं। इनमे वैसे लोग भी शामिल हैं जिन्होंने कभी गांव नहीं देखा हो। ऐसे तमाम लोगों को मिलाकर एक नए गांव का निर्माण हो रहा है। यह आपके सपनों का गांव भी हो सकता है।
शहर के अपार्टमेंट में बालकोनी पर लटके हुए वक्त गुजारने के अच्छा है कि गांव में आपका घर हो और उसमें एक छोटी सी फुलवारी भी हो। अगर यह गांव शहर के पास ही हो तो क्या कहना। जब आपके पास अपनी कार हो तो जब चाहे आधे घंटे में शहर की ओर पहुंच जाइए। जब चाहे फिर गांव की ओर वापस। इसलिए कई लोगों के जेहन में अब यह ख्याल आ रहा है कि गांव में रहे तो अच्छा हो। अगर गांवों को योजनाबद्ध तरीके से बसाया गया हो तो बात ही क्या है।
फिलहाल गांवों में खुली हवा होती है घर भी होते हैं पर आम तौर घर बनाते वक्त शहरों जैसी प्लानिंग नहीं की जाती है। पंजाब के कई गांवों आर्किटेक्ट की मदद से योजना बनाकर घर बनाते देखा जा सकता है। आमतौर पर यह देखा गया है कि गांवों में लोगों के पास जमीन की कोई कमी नहीं होती इसलिए लोग अपनी जरुरत के हिसाब से घर में विस्तार करते जाते हैं। अगर यही घर योजनाबद्ध तरीके से बनाए जाएं तो इसके कई फायदे हो सकते हैं। इसलिए अब अगर आप आप अपने गांव के घर को भी नया रूप देने के मूड में हैं तो उसका नक्सा किसी वास्तुकार से बनवा लें तो अच्छा रहेगा। गांव के घर में रेनवाटर हार्वेस्ट सिस्टम लगवाया जा सकता है। इसके साथ ही सोलर लाइटिंग सिस्टम लगवाने पर भी विचार किया जा सकता है। मोटर गैराज और गोबर गैस प्लांट पर भी विचार कर सकते हैं।
बैंक लोन भी - अगर आप गांव में घर बनवाने के लिए कर्ज लेना चाहते हैं तो उसके लिए भी कई बैंक हाउसिंग लोन देने को तैयार बैठे हैं। इसमें आईसीआईसीआई बैंक से बात करते हैं वह गांवों के घर के निर्माण के लिए खास तौर पर कर्ज दे रहा है। इसके अलावा जिस बैंक के आप पुराने ग्राहक हैं वहां भी कर्ज लेने के लिए बातचीत कर सकते हैं।
रूरल हाउसिंग प्रोजेक्ट - कई राज्यो में गांवों में योजना बद्ध तरीके से सेक्टरों का विकास किया जा रहा है। हरियाणा में 10 हजार से अधिक आबादी वाले गांवों में हाउसिंग डेवलपमेंट आथरिटी सेक्टरों का निर्माण करने जा रही है। इसमें लोग अपने घर नियोजित तरीके से बना सकेंगे।
अब अगर को ई यह दंभ भरता है कि वह शहर में रहता है तो यह कहीं से भी कोई गौरव की बात नहीं है। लोगों को यह पता चल गया है कि शहरी जीवन के क्या क्या नुकसान है। सबसे बड़ा नुकसान तो यही है कि वहां शुद्ध हवा तक नहीं मिलती। ऐसे में गांव में रहने के अपने फायदे हैं। दिल्ली व मुंबई में हजारों ऐसे लोग हैं जो अपने ही शहर में रहते हुए रोज दफ्तर आने जाने में 2+2 चार घंटे गुजार देते हैं। आप दिल्ली मुंबई के कई कोने से आसपास के किसी गांव में भी एक या दो घंटे में जा सकते हैं। यहां गांव में रहकर आप जो सुकुन और आराम महसूस कर सकते हैं वह शहरों में नहीं मिल सकता है। आजकल कई ऐसी बीमारियां भी हैं जो शहरों को लोगों को ही ज्यादा होती हैं। इसलिए आप बेहतर जीवन के लिए किसी गांव में जाने के बारे में सोच सकते हैं।

Wednesday, 15 April 2009

अब आ रहा है वीडियो फोन का जमाना...

फोन बहुत ही लो प्रोफाइल चीज हो गई। अब इसका अगला विस्तार वीडियो फोन है। कई प्रमुख इलेक्ट्रानिक कंपनियां अब नए नए तरह के वीडियो फोन बनाने में जुटी हुई हैं। सभी प्रमुख दफ्तरों में अब मीटिंगे वीडियो कान्फ्रेंसिंग से हुआ करेंगी। कई जगह इसकी शुरूआत हो भी चुकी है। वहीं परंपरागत पीसीओ की जगह अब वीडियो कान्फ्रेंसिंग पीसीओ का जमाना आ रहा है। इसमें आप सामने वाले से आमने सामने बात कर सकेंगे। कई प्रयोगों के बाद अब इसके जगह जगह इंस्टालेशन प्रक्रिया चल रही है।

दुनिया की सबसे बड़ी इलेक्ट्रानिक उपकरणों की निर्माता जापान की कंपनी सोनी ने कई तरह के वीडियो कान्फ्रेंसिंग उपकरण पेश कर दिए हैं। आमतौर पर परंपरागत फोन कनेक्शन, कंप्यूटर और वेब कैमरा होने पर वीडियो कान्फ्रेंसिंग के तहत बात की जा सकती है। पर कंपनियों ने अब ऐसे उपकरण बनाने आरंभ कर दिए हैं। जिसमें फोन में ही एक एलसीडी स्क्रीन हो उसके साथ ही कैमरा लगा हो और आप डायल करने के साथ ही वार्ता शुरू कर दें। इसमें दूसरी पार्टी के पास भी अगर आपकी तरह ही फीचर फोन है तो आप उसकी बातें करते हुए उसे देख भी सकेंगे। ये मशीनें अपने घर में या पीसीओ में इस्तेमाल की जा सकती हैं। यहां तक ही टाटा इंडीकाम सीडीएमए टेक्नोलाजी पर ऐसी फोन सेवा आरंभ करने वाली है जिसमें फोन के साथ ही आप सामने वाले को देख भी सकेंगे। इसे तकनीकी तौर पर सफल बनाने के लिए मोबाइल सेवाओं के स्पेक्ट्रम में विस्तार करना होगा। इसलिए अब लगभग सभी मोबाइल सेवा कंपनियां अपनी सेवाओं को भविष्य की जरूरतों के अनुकूल बनाने के लिए स्पेक्ट्रम में विस्तार चाहती हैं।
फिलहाल सोनी ने चार से अधिक वीडियो कान्फ्रेंसिंग के माडल पेश किए हैं जिन्हें वर्तमान फोन से साथ जोड़कर इस सुविधा का लाभ उठाया जा सकता है। आमतौर पर इनमें 17 इंच का एलसीडी मानीटल लगा हुआ है। जिसमें सामने वाली तस्वीर बड़ी और सुस्पष्ट दिखाई देती है। इनकी कीमतें भी एक हाई परफारमेंस वाले लैपटाप के बराबर आ गई हैं। इसके साथ ही ऐसे उपकरणों के इस्तेमाल से दफ्तरों का समय भी बचता है। इसके उपयोक्ता कान्फ्रेंसिंग के दौरान पीसी के डाटा का इस्तेमाल भी कर सकते हैं। इसमें डाटा शेयरिंग माड्यूल का विकल्प मौजूद है। यहां तक की वीडियो कान्फ्रेंसिंग की मदद से कोई अधिकारी या नेता अपने लोगों को संबोधित कर सकता है। इसके लिए वीडियो आउटपुट को बड़े सफेद स्क्रीन पर प्रोजेक्ट करने की भी सुविधा मौजूद है। इसमें कार्यक्रम में बैठे लोग सवाल भी कर सकते हैं। यानी किसी व्यक्ति की आबासी पहुंच कहीं भी हो सकती है।
हालांकि अच्छी वीडियो कान्फ्रेंसिंग के लिए फोन की डाटा ट्रांसफर रेट अच्छी होनी चाहिए। कम से कम 256 केबीपीएस। यानी ब्राड बैंड कनेक्शन के साथ वीडियो कान्फ्रेंसिंग बेहतर ढंग से संभव है। सोनी के ये वीडियो कान्फ्रेंसिंग माडल उन कंपनियों के लिए आदर्श हैं जिनके दफ्तर देश के अलग अलग शहरों में फैले हुए हैं। इससे विभिन्न शहरों में बैठे अधिकारी एक साथ बैठकें कर सकते हैं। आपको कोई अचरज नहीं होना चाहिए जब आपको जगह जगह वीडियो कान्फ्रेंसिंग पार्लर भी खुलते हुए मिलें। अभी रिलायंस के वेब वर्ल्ड में वीडियो कान्फ्रेंसिंकी सुविधा उपलब्ध है। धीरे-धीरे ऐसी सुविधा जगह जगह उपलब्ध हो सकेगी।

माधवी रंजना madhavi.ranjana@gmail.com




Saturday, 11 April 2009

तेल नहीं तेल की धार देखो...

कहते हैं तेल देखा है अब तेल की धार भी देखो। फिलहाल सरकार तेल की धार दिखा रही है। इसमें जनता बेचारी उलझी हुई है वह किसको असली दोषी माने। किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को तेल बड़ी गहराई से प्रभावित करता है। तेल के भाव बढ़ने के साथ कमोबेश हर चीज पर प्रभाव पड़ता है। चूंकि सारी परिवहन व्यवस्था चाहे वह बस ट्रक हो या रेल तेल पर आधारित है इसलिए तेल के दाम बढ़ने के साथ ही माल भाड़ा और यात्री भाड़ा बढ़ने की पूरी संभावना रहती है। माल भाड़ा बढ़ने के साथ ही बाजार में बिकने वाले सभी उत्पाद भी महंगे होने लगते हैं। किसी वस्तु की कीमत में 10 से 15 फीसदी तक प्रभाव ट्रांसपोर्ट डालते हैं।

अगर डीजल के दाम बढ़ेंगे तो खेतों में ट्रैक्टर चलाना और पंपिंग सेट से सिंचाई भी मंहगी हो जाती है। जाहिर है इसका असर किसानों पर पड़ता है और खेती में उत्पादन लागात बढ़ जाती है। इसलिए तेल का दाम बढ़ते ही राजनैतिक पार्टियां और जनता के हर वर्ग में खलबली मच जाती है।
सरकार इस बात की दुहाई देकर तेल के दाम बढ़ाती कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के दाम बड़ रहे हैं इसलिए यहां भी दाम बढ़ाने के सिवा कोई विकल्प नहीं है। सभी सरकारी और निजी क्षेत्र की तेल कंपनियां सरकार पर लगातार दबाव बनाती हैं पेट्रोल डीजल के दाम बढ़ाए जाएं क्योंकि उन्हें घाटा उठाना पड़ रहा है। सरकार एलपीजी और किरासन तेल पर सब्सिडी देती है इसलिए वे हमें सस्ते में मिल रहे हैं। पर पेट्रोल और डीजल पर टैक्स लगाना सरकार की आमदनी का प्रमुख साधन है इसलिए देश में पेट्रोल और डीजल पर सर्वाधिक टैक्स है। अगर पेट्रोल 50 रुपए लीटर के करीब है तो उसकी वास्तविक कीमत 20 से 22 रुपए लीटर तक ही है बाकि सब उस पर विभिन्न चरणों में लगने वाला टैक्स है। सरकार हवाई जहाज के लिए दिए जाने वाले तेल जिए एटीएफ (एयर टरबाइन फ्यूल) कहते हैं कि कीमत को हमेशा पेट्रोल से काफी कम रखा जाता है। कारण इस पर टैक्स कम लगाया गया है। वहीं दुनिया के कई देशों में डीजल व पेट्रोल दोनों की कीमतें लगभग बराबर है।
इस बार जब तेल की बढ़ी कीमतों को लेकर विरोध हुआ तो केंद्र सरकार ने सुझाव दिया कि राज्य सरकारें अपने हिस्से से बिक्री कर में कमी करें। कई राज्यों ने बिक्री कर में थोड़ी कमी की भी जिससे लोगों ने कीमतों को लेकर थोड़ी राहत महसूस की।
तेल कंपनियों को मिलेगी आजादी - पर अब सरकार तेल के दाम को लेकर इंडियन आयल सहित सभी सरकारी व निजी कंपनियों को यह छूट देने पर विचार कर रही है कि वे अपनी इच्छा से तेल की कीमतें कम अधिक कर सकें। एक नियामक के तहत उन्हें आजादी दे दी जाएगी कि जैसे इंटरनेशनल मार्केट में रेट 70 डालर प्रति बैरल या उससे अधिक हो जाए उसके अनुसार ही वे कीमत को बढ़ा सकेंगे साथ ही रेट कम होने पर भारत में भी रेट कम कर सकेंगे। इससे विभिन्न तेल कंपनियों के रेट अलग अलग भी हो सकते हैं। निजी कंपनियों के रेट पर तो सरकार का अब भी नियंत्रण नहीं है सरकारी कंपनियों को भी कीमते बढ़ाने घटाने की छूट मिल जाएगी। जाहिर है इसका असर बाजार पर पड़ेगा। फिर कीमतें बढ़ने या घटने के लिए लोग सरकार को कोसते हुए नजर नहीं आएंगे। तब तेल कंपनियां ही बाजार के हालात को देखते हुए तेल की धार तय करेंगी।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com



Tuesday, 7 April 2009

सार्थक विपक्ष की जरूरत

यह सही है कि प्रजातंत्र में सार्थक विपक्ष होना चाहिए। पर विपक्ष बहुत कमजोर हो तो प्रजातंत्र में भी शासक निरंकुश होकर फैसले करने लगता है। जैसे 1984 के चुनावों में कांग्रेस ज्यादा सीटें जीत कर आई थीं और प्रधानमंत्री राजीव गांधी के सामने विपक्ष बड़ा कमजोर था। ऐसी स्थिति में सरकार के किसी निरंकुश कदम का विरोध नहीं हो पाता। जबसे केंद्र में मिली जुली सरकारों का दौरा शुरू हुआ है स्थितियां बदली हैं। अब सरकार को अपने कई फैसले विपक्ष के या अपनी ही सरकार के घटक दलों के विरोध के कारण बदलने पड़ते हैं। जैसे अभी केंद्र सरकार को आयकर रिटर्न का सरल फार्म की जगह चार पन्ने का फार्म लाने का निर्णय वापस लेना पड़ा है।


पर हम उससे भी आगे बढ़कर देखें तो अब कई बार एक ही पार्टी में रहकर भी नेता एक दूसरे का विरोध करते नजर आते हैं। हरियाणा में पिछले विधान सभा चुनाव के परिणाम आने पर यहां सत्तासीन पार्टी इनेलो का पूरी तरह सफाया हो गया। कांग्रेस पूर्ण बहुमत में आ गई। इनेलो के इतने कम उम्मीदवार जीते की कि विपक्ष के रुप में उनकी संख्या विधान सभा में नगण्य ही नजर आने वाली थी। इस दौरान किसी टीवी चैनल पर एक चुनाव विश्लेषक ने कहा कि आने वाली सरकार चैन की वंशी बजाएगी क्योंकि विरोध करने के लिए यहां मजबूत विपक्ष नहीं है। इस पर सामने वाले ने जवाब दिया था कि नहीं हरियाणा कांग्रेस में इतने गुट हैं कि चाहे कोई भी मुख्यमंत्री बने बाकी गुट पांच साल तक विपक्ष की भूमिका निभाएंगे। उसके बाद का परिदृश्य वाकई ऐसा ही है। जबसे हरियाणा में भूपेंद्र सिंह हुड्डा मुख्यमंत्री बने उन्हें भजनलाल गुट के विरोध का सामना करना पड़ रहा है। हालांकि भजनलाल के एक बेटे चंद्रमोहन इस सरकार में उपमुख्यमंत्री हैं। पर उनके दूसरे सांसद बेटे कुलदीप बिश्नोई ने आजकल अपनी ही सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। खासकर रिलायंस को स्पेशल इकोनोमिक जोन के लिए सस्ते में जमीन दिए जाने के मामले पर उन्होंने सरकार के से जवाब मांगा है साथ ही आंदोलन की भी धमकी दे डाली है। भजनलाल का कुनबा जहां मुखर रुप से विरोध करता है वहीं सरकार कई अन्य गुटों का विरोध भी झेलना पड़ता है। मुख्यमंत्री के दो दावेदार तो सरकार में साथ आ गए हैं इसलिए वे विरोध नहीं कर पाते। पर वह टिप्पणी बहुत ही सटीक होकर उभरी है कि अपनी पार्टी में विधायक विपक्ष की भूमिका निभाते नजर आएंगे। इसके अलावा भी कुछ विधायकों ने अपने हल्के में विकास नहीं होने पर सरकार के खिलाफ प्रेस कान्फ्रेंस करके आग उगली है।

निरंकुश न हो मुख्यमंत्री-  वास्तव में इसे लोकतंत्र में सकरात्मक रुप में देखा जाना चाहिए। यह लोकतंत्र अंदर चल रहे अधिनायकवाद के खात्मे का प्रतीक है। यह इस बात को संकेत करता है कि प्रजातंत्र में कोई मुख्यमंत्री निरंकुश होकर शासन नहीं कर सकता है। उसे अपनी सरकार के विभिन्न गुटों को साथ लेकर चलना ही पड़ेगा। उनकी बातें सुननी पड़ेगी। उनकी समस्याओं का निदान करना पड़ेगा। सरकार की योजनाओं और कारगुजारी पर सबको विश्वास में लेकर चलना पड़ेगा। लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह अच्छी बात है। हालांकि इसके कुछ दुष्परिणाम भी हैं। कई मामले में निर्णय लेने में देरी होती है। पर अच्छी बात है कि सरकारी काम में पारदर्शिता बनी रहती है। सरकार में अलग अलग गुट मीडिया कोई भी कुछ जानकारियां देते रहते हैं जिससे जनता भी आगाह रहती है।

- विद्युत प्रकाश मौर्य  (  मई 2006) 



Wednesday, 1 April 2009

मेरी पसंद की कुछ शायरी...

कुछ मेरी पसंद के पंक्तियां हैं आप भी पढ़िए... 

पुण्य हूं न पाप हूं
जो भी हूं
अपने आप हूं
अंतर देता दाह
जलने लगता हूं
अंतर देता राह
चलने लगता हूं
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ये माना की गुलशन लूटा
और नशेमन जला
फिर भी कुछ तो बाकी
निशां रह गया
तिनके तिनके चुनकर
फिर बना लेंगे आशियां
हौशला गर जो हमारा जवां रह गया
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काम कुछ अच्छे कर लो अच्छी जिंदगानी आपकी
लोग भी कुछ कहें , लोग भी कुछ सुनें कहानी आपकी

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मैं रोया परदेस में भीगा माँ का प्यार
दुख ने दुख से बात की
बिन चिठ्ठी बिन तार
छोटा करके देखिये जीवन का विस्तार
आँखों भर आकाश है बाहों भर संसार

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ए मेरे दोस्त जब घर जाना अपने याद दिलाना मेरी करना एक निवेदन
उनके कल के लिए हमने अपना आज किया समर्पण।
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गति प्रबल पैरों में भरी
फिर क्यों रहूं दर दर खडा
जब आज मेरे सामने है रास्ता इतना पडा
जब तक न मंजिल पा सकूँ,
तब तक मुझे न विराम है, चलना हमारा काम है ।

(( - डा. शिवमंगल सिंह सुमन))
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हुआ सवेरा ज़मीन पर फिर अदब से आकाश अपने सर को झुका रहा है
कि बच्चे स्कूल जा रहे हैं
नदी में स्नान करने सूरजसुनारी मलमल की पगड़ी बाँधे
सड़क किनारे खड़ा हुआ मुस्कुरा रहा है
कि बच्चे स्कूल जा रहे हैं
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कालरात्रि के महापर्व पर अँधकार के दीप जल रहे
भग्न हृदय के दु:खित नयन मेंआँसू बनकर स्वप्न ढल रहे
मानवता के शांति दूत तुम
प्रीति निभाना छोड़ न देना
दीप जलाना छोड़ न देना
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आसमां आस लिए है कि ये जादू टूटे
चुप की जंजीर कटे वक्त का दामन छूटे
दे कोई शंख दुहाई कोई पायल बोले
कोई बुत जागे कोई सांवली घूंघट खोले ( फैज अहमद फैज )

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सातों दिन भगवान के क्या मंगल क्या पीर
जिस दिन सोए देर तक भूखा रहे फ़कीर
अच्छी संगत बैठकर संगी बदले रूप
जैसे मिलकर आम से मीठी हो गई धूप
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यूं तो हर दिल किसी दिल पर फिदा होता है
प्यार करने का मगर तौर जुदा होता है
आदमी लाख संभले गिरता है मगर
झुककर जो उसे उठा ले खुदा होता है...
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जब अंधेरा घना छाने लगा
तब प्रकाश की चिंता सताने लगी
तब एक छोटा सा नन्हा सा दीपक आगे आया
और बोला मैं लडूंगा प्रकाश से...
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महफिल में हंसना मेरा मिजाज़ बन गया
तन्हाई में रोना राज़ बन गया
दर्द को चेहरे से ज़ाहिर ना होने दिया
यही मेरे जीने का अंदाज़ बन गया ...
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यह न सोचो कल क्या हो
कौन कहे इस पल क्या हो
रोओ मत न रोने दो
ऐसा भी जल थल क्या हो
बहती नदी की बांधे बांधे
चुल्लू में हलचल क्या हो
रात ही गर चुपचाप मिले
फिर सुबह चंचल क्या हो
आज ही आज की कहें सुने
क्यों सोचें कल क्या हो। ( मीना कुमारी )
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मुस्कुराके जिनको गम का जहर पीना आ गया
ये हकीकत है जहां में उनको जीना आ गया
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आहों के नगमें अश्कों के तारे
कितने हसीं हैं ये गम हमारे
एक छोटा सा दिल
और उल्फत की ये दौलत
क्या कोई जीते
क्या कोई हारे..
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जिंदगी है बहार फूलों की
दासंता बेशुमार फूलों की
तुम क्या आए तसव्वुर में
आई खुशबू हजार फूलों की

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हरेएक खुशी हजार गम के बाद मिलती है
दीए की रोशनी जलाने के बाद मिलती है
मुश्किलों में घबराके सिसकने वालों
चांदनी रात अंधेरे के बाद मिलती है।
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सृष्टि बीज का नाश न हो
हर मौसम की तैयारी है
कल का गीत लिए होठों पर
आज लड़ाई जारी है
(( महेश्वर ))

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अजनबी शहर के अजनबी रास्ते
मेरी तन्हाई पर मुस्कुराते रहे
मैं बहुत दूर यूं ही चलता रहा
तुम बहुत दूर यूं ही याद आते रहे...
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राहों पे नजर रखना
होठों पर दुआ रखना
आ जाए शायग कोई
दरवाजा खुला रखना

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समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याघ।
जो तटस्थ है, समय लिखेगा उनका भी अपराध।।
( रामधारी सिंह दिनकर )

Wednesday, 25 March 2009

बंद करो ये सरकस

आईपीएल का सर्कस अब दक्षिण अफ्रीका मे होगा, यह अच्छा ही हुआ..वैसे आईपीएल –सीजन 2 टल जाता तो और भी अच्छा होता। सबसे बड़ा सवाल यह है कि देश में चुनाव ज्यादा जरूरी है या फिर आईपीएल के मैच। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के सबसे बड़े चुनाव के लिए देश की सेना मुस्तैद रहेगी ऐसे में जाहिर है कि आईपीएल में दुनिया भर से आने वाले क्रिकेटरों के लिए सुरक्षा देना मुश्किल होता। ऐसे में कई राज्यों का मैच कराने से इनकार करना सही कदम था।
सिर्फ सुरक्षा का मुद्दा नहीं
लेकिन सवाल सिर्फ सुरक्षा का नहीं है कि चुनाव के समय में आईपीएल जैसे मैच कहीं भी नहीं होना चाहिए। सब जानते हैं कि भारत में क्रिकेट में लोगों की रूचि ज्यादा रहती है। चुनाव के समय में मैच होने पर जाहिर सी बात है लोग वोट डालने में कोताही कर सकते हैं। मैच को लेकर लोग टीवी से ज्यादा चिपके रहे तो लोकतंत्र के इस महायज्ञ में हवन में लोग आहुति नहीं डाल पाएंगे।

प्राथमिकता तय करें
अब हमें ये सोचना होगा कि हमारे लिए प्राथमिकता क्या होनी चाहिए। अच्छे नेता चुनकर संसद में भेजना, केंद्र में अच्छी सरकार बनवाना या फिर बैठकर टीवी पर मैच देखना....वोटरों को जादरूक करने के लिए देश भर में अभियान चलाए जा रहे हैं और पप्पू नहीं बनने की सलाह दी जा रही है। ऐसे में अगर चुनाव के दौरान आईपीएल के मैच होते रहे तो वोट न डालने वाले पप्पूओं की संख्या में इजाफा हो सकता है। मैच के कारण वोट डालने कि लिए जागरूक करने वाले अभियान पर बुरा असर पड़ना स्वभाविक है।

देश पहले क्रिकेट बाद में
साल भर सरकार की निंदा करने वाली युवा पीढी अगर क्रिकेट से चिपकी रही तो जाहिर है कि देश की आर्थिक नीति बनाने, आम आदमी के जीवन को समुन्नत बनाने के सरकारी प्रयासों पर बुरा असर पड़ सकता है। ऐसे में हमें चुनाव के दौरान आईपीएल जैसी नाटकबाजी का पूरी तरह बहिष्कार करना चाहिए। नाटकबाजी इसलिए मैं कह रहा हूं कि 20-20 मैच कोई खेल है ही नहीं....यह सिर्फ नाटक हैं जहां चीयर लीडर्स को नचाया जाता है...अगर मेले में चलने वाले कैबरे डांस को बंद करने की बात कर रहे हैं तो चीयर लीडर्स को नचाने वाले खेल को खेल कैसे कहा जा सकता है।

-विद्युत प्रकाश मौर्य

Friday, 20 March 2009

अब गरीब भी बन गया है ब्रांड

भले ही लोग महंगाई का रोना रो रहे हैं हो पर बाजार अभी भी उत्पादकों को चीजों को सस्ते में बेचनेकी होड़ लगी है। अभी हाल में नेसकैफे ने अपनी काफी का एक रुपए का पाउच जारी किया है। अगर आपको एक कप काफी पीनी हो तो एक रुपए खर्च कीजिए पाउच लाइए और काफी पीजिए।
कमाल एक रुपए का- ठीक इसी तरह बाजार में एक रुपए के शैंपू और एक रुपए वाशिंग पाउडर के कई ब्रांड मौजूद हैं। अगर हम कई साल के पुराने परिदृश्य को याद करें तो तब अगर कोई शैंपू करना चाहे तो उसे डिब्बा ही खरीदना पड़ता था यानी गरीब या मजदूर वर्ग के व्यक्ति के लिए शैंपू का इस्तेमाल करना एक लक्जरी वाली बात हो सकती थी। पर अब अब कोई भी एक रुपए का पाउच खरीद कर बालों में इस्तेमाल कर लेता है। इसी तरह पाराशुट नारियल तेल और कई अन्य प्रोडक्ट भी एक रुपए में मौजूद है। इस कारोबार से जहां कंपनियों की बिक्री में इजाफा हो रहा है वहीं उनके प्रोडक्ट के उपयोक्ता निचले तबके के लोग भी हो रहे हैं। बहुत सी बड़ी कंपनियों की नजर गरीब लोगों पर है जो उनके उपभोक्ता हो सकते हैं। चाय पत्ती के पाउच भी एक, दो और पांच रुपए के उपलब्ध हैं। और तो और ब्रिटानिया और पारले जी अपने बिस्कुटों के भी एक रुपए के पैक निकाले हैं। इसलिए आप यह नहीं कह सकते हैं कि भला आज के जमाने में एक रुपए में क्या मिलता है। आज भी एक रुपए में बहुत बड़ी ताकत है। आप एक रुपए में नहा सकते हैं बालों को ठंडक का एहसास करा सकते हैं चाय काफी की चुस्की ले सकते हैं तो थोड़ी सी पेटपूजा भी कर सकते हैं। कई नामचीन वाशिंग पाउडर कंपनियां अभी भी एक रुपये का पाउच निकाल रही हैं।
कमाल पांच रुपए का - पांच रुपए में तो कई कंपनियों में कई उत्पादों को बेचने की होड़ लगी है। कई एफएमसीजी कंपनियां अपने उत्पादों का पांच रुपए का पैक निकाल रही हैं। कई प्रोडक्ट जो मंहगे हो गए थे उन कंपनियों ने दुबारा से कम वजन का पांच रुपए का पैक निकाला है। पांच रुपए का टूथपेस्ट, पांच रुपए का वाशिंग पाउडर, पांच रुपए का को ल्ड ड्रिंक तो पांच रुपए का साबुन बाजार में उपलब्ध है। सर्दियों में इस्तेमाल किए जाने वालेा कोल्डक्रीम व वैसलीन जैसे उत्पाद अभी भी पांच रुपए का पैक निकाल रहे हैं जो धुआंधार बिकते हैं। वहीं बोरो प्लस ने भी पांच रुपए का पैक अपने उपभोक्ताओं के लिए निकाला है। टीवी पर एक रुपए दो रुपए और पांच रुपए में मिलने वाले प्रोडक्ट के विज्ञापनों की भरमार है। यह सब कुछ निम्न मध्यम वर्ग के उपभोक्ताओं को ध्यान में रखकर किया जाता है जो एक समय में ज्यादा रुपए का उत्पाद नहीं खऱीद सकता है। एक,दो और पांच रुपए की यूनिट वाले उत्पाद वे लोग भी खरीद सकते हैं जो रोज 70 से
100 रुपए दैनिक कमा पाते हैं। वहीं ज्यादा आय के लोग भी जो किसी प्रोडक्ट को एक बार या दो बार उपयोग करने के लिए लेना चाहते हैं उनके लिए पाउच पैकिंग वरदान के रुप में मिली है।
यानी जिन्हें हम गरीब समझते हैं वह भी कई तरह के उत्पादों का बड़ा उपभोक्ता है। कंपनियां अब इस गरीब आदमी को ब्रांड मानकर उसके लिए कई तरह के उत्पाद पेश करने में लगी हुई हैं। जिन कंपनियों ने इस मूल मंत्र को नहीं समझा है वे मार्केटिंग के इस दौर में पिछड़ रही हैं। वहीं जागरूक कंपनियां दरिद्रनारायण को भी उपभोक्तावाद में उलझाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही हैं।



Tuesday, 17 March 2009

समलैंगिकता की वकालत

कुछ बुद्धिजीवियों ने भारत में भी समलैंगिकता को कानूनी जामा पहनाने की वकालत की है। इसके लिए हस्ताक्षरित पत्र राष्ट्रपति को भी लिखा गया है। इतना ही नहीं एड्स जैसी बीमारी के लिए काम करने वाली संस्था नाको ने भी इसके समर्थन में अभियान छेड़ दिया है।

 नाको के एक आंकड़े के अनुसार देश में 24 लाख से ज्यादा ऐसे लोग हैं जो समलैंगिक हैं। नाको के अनुसार वह सिर्फ छह लाख लोगों को ही कवर कर पाया है बाकि लोगों तक पहुंचने के लिए उसे काफी समय चाहिए। नाको भी चाहता है कि भारत में समलैंगिकता को कानूनी मान्यता दे दी जाए। पर अहम सवाल यह उठता है कि क्या भारत जैसे देश में समलैंगिकता को मान्यता देना कितना उचित होगा। देश में बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग इसके पक्ष में है। दुनिया के कई देशों में समलैंगिकता के पक्ष में बयार बह रही है। कई देशों में तो गे परेड और उनके अलग से फैशन शो भी आयोजित किए जाते हैं। अमेरिका में ऐसे लोग भी कानूनी मान्यता की लड़ाई लड़ रहे हैं।
पर भारत जैसे देश में यह बड़े बहस का विषय है। हालांकि यह भारत की परंपरा नहीं रही है। कुछ राज्यों में कुछ लोगों के बीच इस तरह के किस्से जरूर सुने जाते हैं।


 कुछ साल पहले वरिष्ठ पत्रकार तवलीन सिंह ने बिहार के बक्सर जिले के आसपास के ऐसे कुछ मामलों पर अध्ययन किया था। उन्होंने यह स्थापित करने की कोशिश की थी समाज में इस तरह के रिश्ते चल रहे हैं। इतिहास में यह देखने में आया है कि मुगल आक्रमण कारियों की फौज में ऐसे लोग रहते थे जिनसे सरदार समलैंगिक रिश्ते बनाता है। पर किसी भी समाज में जब ऐसे रिश्तों को मान्यता देने का कानून बनाएं तो उससे पहले हमें इस विषय पर सूक्ष्मता से विचार करना होगा। इसका समाज पर कितना बुरा प्रभाव पड़ेगा। भारत में अगर इस तरह के रिश्ते कहीं बनते हैं तो भी लोग उसको सार्वजनिक तौर पर प्रकट नहीं करना चाहते। मनोवैज्ञानिक समलैंगिक संबंधों को एक मानसिक विकृति ही मानते हैं। जबकि समलैंगिक संबंधों के पैरोकार इसे एक समान्य तौर पर लेना चाहते हैं।
इधर मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री में इस विषय पर कई फिल्में भी बनने लगी हैं। पिछले साल की हिट फिल्म पेज 3 में इस तरह के संबंधों को दिखाया गया है। इसमें फिल्मी हीरो तथा समाज के रईस लोगों को इस तरह के संबंध में लिप्त दिखाया गया है। वहीं अमोल पालेकर ने इस पर एक फिल्म बनाई है क्वेस्ट। इस फिल्म में भी हीरो के अपनी पत्नी के अलावा अपने एक दोस्त से समलैंगिक संबंध दिखाए गए हैं। एक ऐसा विषय जिस पर लोग बात नहीं करना चाहते उस पर अब कहानियां भी लिखी जाने लगी है और फिल्में भी बनने लगी हैं। हिंदी के प्रख्यात साहित्यकार दूधनाथ सिंह की लंबी कहानी नमो अंधकारम में समलैंगकता के तत्व थे तो उससे काफी पहले पांडेय बेचन शर्मा उग्र के उपन्यास चाकलेट में भी इस विषय को उठाया गया था।

समलैंगिकता के पैरोकार इंडियन पीनल कोड की धारा 377 को हटाने की बात कर रहे हैं जिसके तहत समलैंगिक संबंधों को अपराध माना गया है। पर इसी धारा के तहत अगर कोई व्यक्ति किसी बच्चे के साथ कुकर्म करता है तो उसे सजा देने का प्रावधान है। अब अगर दो व्यक्ति अपनी मर्जी से इस तरह का संबंध बनाते हैं तो उन्हें सजा मिलनी चाहिए या नहीं यह चर्चा का विषय हो सकता है। पर इस तरह के रिश्तों को अगर कोई सार्वजनिक करता है तो उसका समाज पर कतई अच्छा प्रभाव नहीं पड़ता है। इसलिए ऐसे संबंधों पर परदा रखना ही उचित है।
-विद्युत प्रकाश vidyutp@gmail.com




Monday, 9 March 2009

हाई प्रोफाइल नशा - कोकीन

कोकीन एक हाई प्रोफाइल नशा है। इसकी एक डोज ही 4000 रुपए में आती है। जाहिर है कि कोई निम्न या मध्यम वर्ग का आदमी इस नशे को नहीं ले सकता। पहले फिल्म स्टार फिरोज खान के बेटे फरदीन खान के बाद प्रमोज महाजन के बेटे राहुल महाजन इसकी गिरफ्त में हैं। वहीं हेरोइन भी इसी तरह का महंगा नशा है। जाहिर की मध्यम वर्ग के लोग इस तरह का नशा नहीं कर सकते। यह उच्च आय वर्ग के लोगों के ही वश की बात है। गरीब लोगों का तो नशा स्मैक है। अक्सर दिल्ली के फुटपाथ पर रिक्से वाले और खोमचे वाले तथा इसी प्रोफाइल के दूसरे लोग स्मैक लेते हुए दिखाई दे जाते हैं। स्मैक उन्हें गरीबी से थोड़ी देर सपनीली दुनिया में ले जाता है शायद...


पर हम बात कर रहे हैं इन हाई प्रोफाइल नशेड़ियों की। ये लोग फाइव स्टार होटलों में बड़ी बड़ी पार्टियां करते हैं। बड़े घरों के इन बिगड़ैल युवाओं का मासिक खर्च लाखों में होता है। ये लोग पार्टियों के बाद हाई प्रोफाइल स्मग्लरों से अपने लिए नशे का इंतजाम करवाते हैं। प्रमोद महाजन के बेटे राहुल महाजन को नशे की डोज सप्लाई करने वाला कश्मीरी युवक साहिल भी बड़े घर का बेटा है। उसके पिता का मुंबई में पांच सितारा होटल व कश्मीर इम्पोरियम है। अब इस तरह के लोगों से क्या उम्मीद की जा सकती है। मुंबई के सबसे बड़े कोकीन के तस्कर का दावा है कि मशहूर अभिनेत्री मनीषा कोईराला भी उनकी ग्राहक है। वह उनसे कोकीन की डोज लेकर जाती है। फरदीन खान इस मामले में पहले ही फंस चुके हैं। ये तो काली स्याह रात के कुछ ऐसे नाम हैं जो पकड़े जाने पर लोगों के सामने आ गए हैं। अभी इसके अलावा बहुत से ऐसे नाम हो सकते हैं जिनपर से पर्दा नहीं हट पाया है। ऐसे हाई प्रोफाइल नशेड़ी अपने रसूख के बल पर मुकदमों से छूट भी जाते हैं। अगर मीडिया उनकी खबर नहीं ले तो मामला कई बार ले देकर रफादफा हो जाता है। वैसे भी उच्च वर्ग में यह कारोबार बड़ी सफाई से चलता है। क्योंकि बेचने वाले खरीदने वाले और दलाल सभी हाई प्रोफाइल के हैं । कोई इनके मूवमेंट पर जल्दी शक नहीं करता। अगर राहुल महाजन का मामला कुछ महीने बाद प्रकाश में आया होता तो शायद भारतीय जनता पार्टी पर बड़ा कलंक लगता क्योंकि भाजपा उन्हें जल्द ही अपने पिता प्रमोद महाजन की विरासत का वारिस घोषित करने वाली थी। वे पार्टी कार्यकारिणी की बैठक में शामिल भी हुए थे। अब पार्टी के सभी बड़े नेताओं ने उनसे कन्नी काट ली है। हालांकि इस मामले मे अटल बिहारी वाजपेयी के बयान की जवानी में गलती हो जाती है पर उमा भारती की आपत्ति जायज है। क्या एक 31 साल के आदमी के गंभीर अपराध को जवानी गलती समझ कर खारिज किया जा सकता है। नहीं.. उन्हें तो ऐसी सजा मिलनी चाहिए जो दूसरों के लिए नजीर बने। उस देश में 40 फीसदी लोगों को आदमी जैसा भोजन नहीं मिलता वहां एक करोड़ रुपए किलो बिकने वाला नशा करने की इजाजत कैसे दी जा सकती है। वैसे लोग अगर किसी तरह जन प्रतिनिधि बन जाएं तो यह और भी खतरनाक है। यह बहुत अच्छा हुआ कि कोई ऐसा आदमी संसद की सीढ़ियों पर कदम रखने से पहले ही नंगा हो गया। पर राहुल महाजन, साहिल या फरदीन खान तो स्याह रात रंगीन बनाने वाले अमीर घरों के बिगड़ेल शोहदों में चंद नाम ही हैं जो लोगों को पचा चल सके हैं। अभी यह फेहरिस्त बहुत लंबी हो सकती है उन्हें बेनकाब किए जाने की जरूरत है खुद को संभ्रांत घोषित करने में लगे हैं और हर समस्या का इलाज खानदानी पैसे से ढूंढ लेना चाहते हैं। हालांकि इस पैसे को कमाने में उन्होंने खुद मेहनत नहीं की होती है।

-माधवी रंजना madhavi.ranjana@gmail.com




Monday, 2 March 2009

कंप्यूटर की जगह ले लेंगे बड़े लैपटाप

कुछ सालों में कंप्यूटर बीते जमाने की चीच हो जाएगी। जब कंप्यूटर की कीमत पर लैपटाप उपलब्ध होगा तो भला क्यों कोई कंप्यूटर खरीदेगा। इतना ही नहीं लैपटाप में भी अब 15 इंच या 17 इंच के मोनीटर का नहीं बल्कि 19 या 20 इंच के विशाल एलसीडी मानीटर वाले लैपटाप का जमाना आ रहा है। सभी लैपटाप बनाने वाली कंपनियां इस तरह के लैपटाप को विकसित करने में लगी हैं।


आमतौर पर जब आप कंप्यूटर खरीदते हैं तो उसके कई अलग अलग हिस्से होते हैं। उसका सबसे भारी हिस्सा उसका मानीटर होता है। उसके बाद सीपीयू, की बोर्ड, माउस और स्पीकर यानी पांच हिस्से। अब लैपटाप में ये पांचों हिस्से एक ही जगह इंटीग्रेट हो जाते हैं। यानी जगह की बचत। कंप्यूटर को जब आप घर में या दफ्टर में किसी एक जगह स्थापित कर देते हैं तो उसे आसानी से एक जगह से दूसरी जगह नहीं ले जाया जा सकता है। अब हम उन कारणों पर नजर डालते हैं जिनके कारण लैपटाप लोकप्रिय हो रहे हैं।
पोर्टेबलिटी- लैपटाप को आसानी से कहीं भी उठा कर ले जाया जा सकता है। एक कमरे से दूसरे कमरे में। लान में. दफ्तर में कहीं भी। आप अपनी कार में भी इस पर काम कर सकते हैं। हवाई और रेल यात्रा के दौरान भी इसे लेकर चल सकते हैं।
जगह की बचत- कंप्यूटर जहां आपके टेबल पर काफी जगह ले लेता है वहीं लैपटाप को बस थोड़ी सी जगह चाहिए। इसे कहीं भी रखा जा सकता है। इसके लिए अलग से कोई कंप्यूटर टेबल बनाने की कोई जरूरत नहीं है।
बैटरी बैकअप- कंप्यूटर के साथ कोई बैटरी बैकअप नहीं होता, जबकि लैपटाप को आप उसके बैटरी बैकअप से आराम से चार से छह घंटे चला सकते हैं। और अधिक देर तक चलाने के लिए आप चाहें तो बैटरी का दूसरा सेट भी लेकर रख सकते हैं।
आमतौर पर बाजार में अभी जो लैपटाप उपलब्ध हैं उनके स्क्रीन 15 इंच या 17 इंच के हैं। पर अब लैपटाप कंपनियां 19 इंच और 20 इंच के स्क्रीन वाले लैपटाप का निर्माण करने मे लगी हुई हैं। ये सुपरसाइज के लैपटाप नोटबुक के बजाए ब्रीफकेश ती तरह दिखाई देंगे। इसलिए इन्हें नोटबुक पीसी कहना जायज नहीं होगा। अब बाजार में 19 20 इंच के एलसीडी स्क्रीन प्रवेश कर रहे हैं उसके बाद उसी साइज के लैपटाप बनाने की भी कंपनियां प्रवृत हुई हैं। हालांकि उस युग में जहां मोबलिटी की बात की जाती है वहां छोटा बेहतर है का सिद्धांत चलता है ऐसे में अभी यह तय होना बाकी है कि लोग इन लैपटाप का कितना स्वागत करेंगे। उम्मीद की जाती है कि ऐसे लैपटाप उन लोगों में ज्यादा लोकप्रिय होंगे जो कंप्यूटर पर गेम खेलते हैं तथा जिन्हें सीमित मोबलिटी की जरूरत होती है। जैसे दफ्तर में ही अपने सिस्टम को कहीं ले जाना हो या घर में ही एक कोने से दूसरे कोने में ले जाना हो तो ऐसे में इस तरह के सुपर साइज लैपटाप लोकप्रिय हो सकते हैं। लैपटाप बनाने वाली कंपनी डेल और एसर 19 इंच के लैपटाप का निर्माण करने में जुटी हुई हैं। वहीं कोरियाई कंपनी सैमसंग ने भी मेगा लैपटाप बनाने की घोषणा कर दी है। एसर ने को ताइपेई में हाल में लगे कंप्यूटर शो में 20 इंच स्क्रीन वाला लैपटाप पेश कर दिया है। एसर के इस सिस्टम पर गेम और फिल्मों का बखूबी आनंद उठाया जा सकता है। इसकी खुदरा कीमत 2700 डालर (तकरीबन 1.30 लाख रुपए) रखी गई है। जबकि डेल 3500 डालर में व सैमसंग 5000 डालर में ऐसे ही माडल पेश कर रही है। देखते जाइए कीमतें तो गिर सकती हैं।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य