Friday, 25 September 2009

आपकी भाषा में बात करेगा कंप्यूटर

जी हां अब आपका कंप्यूटर आपकी भाषा में ही आपसे बात करेगा। यानी आप चाहें तो उसमें आप हिंदी उर्दू किसी भी भाषा में काम कर सकते हैं।विंडो एक्सपी के नए संस्करणों आपको अपनी भाषा के चयन की आजादी मिलती है।

 अगर आपने एक्सपी का कोई भी नया संस्करण लगाया है तो आप उसमें आप अपने देश की भाषा को एक्टिवेट कर सकते हैं। इसमें रिजनल सेटिंग में जाकर आपको अपने देश का नाम अपनी भाषा और की बोर्ड को सक्रिय भर करना है। जैसे आप अपने कंप्यूटर में हिंदी भाषा को सक्रिय कर सकते हैं। ऐसा करने के दौरान आपका कंप्यूटर एक्सपी की सीडी को मांगेगा। सीडी से वह आपकी भाषा के फाइलों को कापी कर लेगा। अगर आपको ऐसा करने में किसी तरह की परेशानी आ रही हो तो अपने साफ्टवेयर या हार्डवेयर इंजीनियर की मदद लें। अपनी भाषा को सक्रिय करने के बाद आपके कंप्यूटर स्क्रीन पर आपकी भाषा के सिंबल कंप्यूटर के नीचे वाले स्टार्ट बार में आएंगे। आप आल्ट और शिफ्ट कमांड एक साथ दबाकर भाषा परिवर्तन कर सकते हैं। 
अगर आपने हिंदी भाषा को सक्रिय कर लिया है तो आप वर्ड पैड साफ्टवेयर खोलकर उसमें हिंदी में कोई भी पत्र या अपने काम की कोई भी चीज टाइप कर सकते है। विंडो एक्सपी में फोनेटिक की बोर्ड की सुविधा हिंदी में उपलब्ध है जिसे याद करना बहुत आसान भी है। आप अपने कंप्यूटर में हिंदी के ट्रू टाइप के सैकड़ो पसंदीदा फांट भी लोड कर सकते है। ज्यादा फांट्स प्राप्त करने के लिए आप भारत सरकार द्वारा विकसित की गई वेबसाइट डब्लूडब्लूडब्लू . आईएलडीसी. ईन पर जा सकते हैं। यहां भारती ओपन के वर्ड प्रोसेसर के अलावा जिस्ट के सैकड़ो फांट्स उपलब्ध है।

हिंदी भाषा को विंडो एक्सपी में एक्टिवेट करने के बाद न सिर्फ इससे वर्डपैड पर बल्कि आप एमएस आफिस जैसे साफ्टवेयर में भी हिंदी में काम कर सकते हैं। साथ ही इन फाइलों को किसी के पास भी ई मेल कर सकते हैं। ये फाइलें आरटीएफ (रिच टेक्स फाइल) फारमेट में जाती हैं इसलिए इनको किसी भी साफ्टवेयर में खोला जा सकता है। अगर आपकी तरह ही जहां फाइल जा रही है वहां भी हिंदी भाषा एक्टिवेट किया हुआ हो तब और भी अच्छा। अगर आप हिंदी का कंप्यूटर पर तेजी से विकास चाहते हैं तो यह जानकारी अपने मित्रों को बांटे। इतना ही नहीं अगर आपके कंप्यूटर पर हिंदी भाषा एक्टिवेट है आपका जीमेल का एकाउंट भी हिंदी में खुलेगा और उसपर आप सीधे हिंदी भाषा में पत्र लिख कर किसी को भी भेज सकते हैं।

-विद्युत प्रकाश मौर्य



Sunday, 20 September 2009

70 प्रतिशत महिलाएं घरेलू हिंसा की शिकार

कहते हैं औरत वो आटे का दीया है, जिसे घर के अन्दर रखो तो घर के चूहे खा जाते हैं। घर से बाहर रखो तो कौए नहीं छोड़ते। यानी कि औरत चाहे घरेलू हो या काम-काजी वह हर जगह शोषित होती है, प्रताड़ित की जाती है। हर स्थान पर उसकी इज्‍़ज़त और अस्तित्त्व पर ख़तरा ही मंडराता रहता है।

 एक सर्वेक्षण से पता चला है कि भारत में लगभग 70 प्रतिशत महिलाएं किसी न किसी ढंग से घरेलू हिंसा से पीड़ित हैं। यह हिंसा ग़रीब, मध्यम वर्ग से लेकर आर्थिक और सामाजिक स्तर पर सम्पन्न परिवारों की महिलाओं तक में देखने को मिली है।
लड़की को पराया धन समझना, न पिता के यहां न पति के घर सुरक्षा, आर्थिक विपन्नता, बढ़ते तलाक, दहेज़ की समस्या, मादाभ्रूण हत्या के लिए मजबूर करना, प्रतिभा को दबाना, मानसिक तौर पर छोटी-छोटी बात के लिए प्रताड़ित करना ऐसी स्थिति चारों ओर देखने को मिलती है। ऐसे माहौल के निरन्तर बढ़ रहे ग्राफ़ के कारण एक ऐसे कानून की आवश्यकता महसूस की जा रही थी, जो पीड़ित महिलाओं को सहायता प्रदान कर सके, उन्हें ऐसी विषम परिस्थतियों से निजात दिला सके।

एक विरोधाभासी परिदृश्य में भारतीय संसद ने अक्‍तूबर 2006 में महिला घरेलू हिंसा निवारण कानून पारित किया है। इस कानून के पारित होते ही सामाजिक क्षेत्रों में नए सिरे से एक बहस छिड़ गई। इस के पक्ष एवं विपक्ष में आवाज़ें उठनी शुरू हो गई।

क्या है महिला घरेलू हिंसा निवारण कानून 2006:- इस कानून के अंतर्गत पत्‍नियां, मां, सास, बहनें, बेटियां यहां तक कि गोद ली हुई महिला भी अपने साथ हो रही हिंसा के खिलाफ़ कानूनी गुहार लगा सकती हैं। यह कानून उन्हें शारीरिक, बोल-चाल और यौन उत्पीड़न से तो बचाएगा ही साथ ही उन्हें निवास और आर्थिक स्वतन्त्रता का अधिकार दिलाने में भी सहायक सिद्घ हो सकता है। यह कानून उन 70 प्रतिशत महिलाओं की पहचान करने और उनकी मदद करने में सहायक सिद्घ हो सकता है। यह कानून कितना प्रभावशाली होगा, आने वाला समय ही बताएगा।

14 वर्ष लगे इस कानून को पारित होने में:- सर्वप्रथम 1992 को भारत के चुनिंदा अधिवक्‍ताओं ने घरेलू हिंसा निवारण का एक मसौदा तैयार करके महिला संगठनों तक पहुंचाया था। फिर महिला आयोग ने 1994 में इसे सदन में पेश कराने की पहल की। सदन में इस बिल के खिलाफ़ तीखी अलोचना हुई, परिणाम वश इसके पक्ष में राष्‍ट्र के सभी महिला संगठनों ने एक मंच पर एकत्रित हो कर, इसके हक़ में आवाज़ बुलन्द की। यह भी चर्चा हुई कि यह कानून अापराधिक (क्राईम) न होकर दीवानी में शामिल किया जाना चाहिए। 

इसके उपरान्त 1999 में इस निवारण कानून को नए ढंग से तैयार करके पुन: सदन में लाया गया। फिर इस पर राष्‍ट्र स्तरीय बहस हुई। इसे तैयार करने में संयुक्‍त राष्‍ट्र के घरेलू हिंसा कानून से भी प्रेरणा ली गई। 2001 में जब केन्द्र सरकार ने इस घरेलू हिंसा निवारण बिल को सदन पटल पर रखा तो इसके खिलाफ़ ज़ोरदार आंदोलन हुआ। इस पर टिप्पणियां की गईं कि इस बिल में यह स्पष्‍ट नहीं था कि घरेलू हिंसा किसे माना जाए और भारतीय दण्ड सहिता के अनुसार किसी कानून के अन्तर्गत कौन-सी सज़ा निर्धारित की जाए। पुरुष प्रधान समाज में भारी विरोध के बावजूद 14 वर्ष के लम्बे संघर्ष के बाद आख़िर इस महिला घरेलू हिंसा निवारण कानून को अक्‍तूबर 2006 को पारित कराने में सफलता प्राप्‍त हुई है।

क्या लाभ हो सकता है इस कानून से:- यह कानून जहां घरेलू हिंसा की परिभाषा स्पष्‍ट करता है वहीं शोषित महिला को बराबरी की नज़र से देखता है। यह कानून निवास, मेंटिनेंस और सुरक्षा के अधिकार भी प्रदान करता है। दोषियों के लिए सज़ा का स्पष्‍ट प्रावधान भी करता है। महिलाओं द्वारा इस कानून के दुरूपयोग का नकारात्मक पहलू भी इसमें छिपा हुआ है।

सबसे पहले महत्वपूर्ण बात यह है कि इस कानून के बारे में ग़रीब से ग़रीब महिला तक को समझाना होगा। भारतीय समाज में प्रचलित सामुदायिक रीति-रिवाज़ों पर आधारित संस्थाएं तथा पंचायतें, धार्मिक संस्थाएं, इस कानून को सरलता और सहजता से लागू होने देने में रुकावट बन सकती हैं। सदियों से महिलाएं इन पर आश्रित रही हैं और इन पुरुषों द्वारा स्थापित पुरुष प्रधान सोच से ग्रस्ति संस्थाओं द्वारा हमेशा महिला को निम्न दर्जे का नागरिक मान कर उसके ख़िलाफ़ ही फैसले दिए हैं। प्रताड़ित महिला को ही दोषी करार देने में कसर नहीं छोड़ी है। संवैधानिक कानूनों और धार्मिक कानूनों के बीच टकराव जारी है। संवैधानिक कानून महिला के पक्ष की बात करता है, तो धार्मिक उसके विपरीत। ऐसे में घरेलू हिंसा कानून को कारगर ढंग से लागू कर पाना भी एक चुनौती से कम नहीं है। इमरानाबलात्कार कांड का हश्र सभी के सामने है। चाहे मीडिया ने इसमें कुछ सकारात्मक भूमिका निभाते हुए इमराना के हक़ में आवाज़ उठाई थी।

इस कानून के पारित होते ही घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं के कई मामले मीडिया द्वारा सुर्खियों में लाए गए हैं जो हमारे समाज में 70 प्रतिशत पीड़ित महिलाओं की दुर्दशा को ब्यान करते हैं। लेकिन यह भी सत्य है कि जो काम स्वस्थ सामाजिक माहौल और मानवीय गुण पैदा कर सकते हैं। स्त्री और पुरुष को बराबर समझने की सोच हमारी मानव मूल्य आधारित शिक्षा पैदा कर सकती है। यह वातावरण कोई कानून पैदा नहीं कर सकता। कानून का डर कितना और कितने लोग महसूस करते हैं यह किसी से छिपा नहीं हैं। कानून के निर्माता, संरक्षक खुद ही इन कानूनों की परवाह नहीं करेंगे तो आम लोगों से क्या उम्मीद की जा सकती है। महिलाओं के हक़ में कानून तो पहले भी कई बनाए गए हैं, उनका कितना लाभ वे प्राप्‍त कर सकी हैं या इन कानूनों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जो होलरह गए, उनका लाभ शोषण करने वालों ने उठाया है। इस नए घरेलू हिंसा निवारण कानून का हश्र भी वैसा ही न हो, इस के बारे में भी महिला संगठनों और भारतीय अधिवक्‍ताओं को चिंतन करना होगा।

यदि समाज में सभी वर्ग मिल कर ऐसे वातावरण का सृजन कर दें जिस में कोई न अपना, न पराया हो, समानता का भाव हो। दयालुता, परोपकार, सहृदयता हो तो ऐसे कानूनों को बनाने की ज़रूरत ही नहीं होगी।

 - vidyutp@gmail.com

Sunday, 13 September 2009

हिंदी अब विश्व भाषा बनेगी

संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति जार्ज बुश ने अपने देश के लोगों से अपील की है कि वे हिंदी जैसी भाषा सीखें। यूएसए के सैनिक, गुप्तचर अधिकारी और राजनेता भी अब हिंदी के जानकार मिलेंगे। यानी अमेरिका ने हिंदी को एक मजबूत भाषा के रुप में स्वीकार कर लिया है। पहले माइक्रोसाफ्ट और अब अमेरिका जैसा देश। यानी हमारी भाषा विश्व पटल पर मजबूत हो रही है। यह दूसरा पहलू हो सकता है कि अमेरिका में हिंदी सीखने का जो अभियान चलाया जा रहा है उसके मूल कारण रणनीतिक है। पर इतना तय है कि उन्हें इस भाषा के पीछे एक ताकत नजर आती है। पहली ताकत जो एनआरआई लाखों की संख्या में अमेरिका में रहते हैं और अमेरिका की सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण दखल देने लगे हैं। भारतीय टीवी चैनल और और भारतीय में बनने वाले हिंदी सिनेमा की ग्लोबल मार्केट में उपस्थिति। हिंदी के साथ एक बहुत बड़ा बाजार है। हमें अगर कुछ पुरी दुनिया में बेचना है, पूरी दुनियाको समझाना है तो हिंदी में उतरना ही पड़ेगा। 


अमेरिका ने इस सच को समझ लिया है कि दुनिया की जो मजबूत भाषाएं हैं उनका सम्मान करना ही पड़ेगा। इसके लिए इस भाषा को लिखना पढ़ना आना ही चाहिए।
अगर हिंदी के लोगों ने कंप्यूटर को और पहले अपना लिया होता तो हिंदी का विकास और भी तेज हो सकता था। हिंदी ऐसी भाषा है जो कुछ सौ वर्षों में ही करोड़ों लोगों की जुबान बनी है। खड़ी बोली का जो स्वरूप हम आज अपनाए हुए हैं वह अंग्रेजों के भारत में आगमन के बाद ही विकसित हुआ है। भारतेंदु हरिश्चंद्र के बाद से पल्लवित होने वाली हिंदी अब देश की सीमाएं लांघ चुकी है। माक्रोसाफ्ट के एक्सपी संस्करणों में रीजनल भाषा विकल्प में हिंदी को किसी भी कंप्यूटर में सक्रिय किया जा सकता है। दुनिया के किसी भी कंप्यूटर में कुछ मिनटों के प्रयास के बाद आप हिंदी में टाइपिंग शुरू कर सकते हैं। हो सकता है आने वाले दिनों में आप अमेरिका जाएं तो आपको होटलों में हिंदी समझने वाले लोग मिल जाएं। पर्यटक स्थानों पर हिंदी में बातें करने वाले गाइड मिल जाएं। हिंदी के विकास में इसका लचीलापन और इसकी सारग्राहिणी प्रवृति का बहुत बड़ा योगदान है। हालांकि कि तत्सम हिंदी के पुरोधा इन चीजों से विरोध रखते हैं। पर हमें हिंदी को और उदार बनाना होगा। दूसरी भाषा के शब्दों के प्रयोग में उदारता बरतनी होगी। जो लोग खिचड़ी भाषा को हिंग्लिश कहकर धिक्कारते हैं उन्हें यह समझना होगा इसी तरह के लोग हिंदी की वैश्विक पहचान बना रहे हैं। टीवी के समाचार चैनल, मनोरंजन चैनल और हिंदी फिल्में हिंदी को ग्लोबल बना रही हैं। आज अमेरिका ने स्वीकारा कल दुनिया के कुछ और देश स्वीकारेंगे। इस परिपेक्ष्य में अब भारत के कुछ राज्यों में हिंदी विरोध की बात बेमानी लगती है। हमें अब इस तरह की बातों से उपर उठना होगा। आने वाले सौ सालों हिंदी और ऊपर जाएगी। बहुत ऊपर।

-विद्युत प्रकाश,   मेल vidyutp@gmail.com


Thursday, 10 September 2009

बादल आया ( नन्ही कविता )


बादल आया
------------
बादल आया
बादल आया
बारिश हुई
बारिश हुई
कपड़ा भी गिला हुआ
घर भी गिला हुआ
घड़ी भी गिली हुई
और गिला हुआ पेड़....।


- अनादि अनत ( चार साल )


दि्ल्ली की बारिश देखकर हमारे नन्हें बेटे ने ये कविता रच डाली। वे अभी लिखना सीख रहे हैं। इसलिए हमने इसे लिपिबद्ध कर लिया। ये एक नन्हें बच्चे का पहला सृजन है। 

Saturday, 5 September 2009

दुनिया का सबसे छोटा वेब डिजाइनर

कई कहते हैं पूत के पांव पालने में ही दिखाई दे जाते हैं। सो नन्हें अजय पुरी ने नौ महीने की उम्र से ही कंप्यूटर के की बोर्ड से खेलना शुरू कर दिया था। दो साल की उम्र में प्रेजेंटेशन देने लगे। तीन साल की उम्र में उन्होंने अपनी वेबसाइट www.microsftkid.com बना डाली। उन्हें विश्व के सबसे कम उम्र के वेब डिजाइनर होने का गौरव प्राप्त है। नौ साल के मास्टर अजय पुरी को जनवरी 2006 में हैदराबाद में मनाए गए प्रवासी भारतीय दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह द्वारा सम्मानित किया गया। वे अपने पिता के साथ थाइलैंड में रहते हैं। वर्ष 2001 में अजय पुरी जब चार साल के थे तब एडमिंस्ट्रेटिव स्टाफ कालेज हैदराबाद खुद का डिजाइन किया हुआ प्रेजेंटेशन पेश किया था तो देखने वालों ने दांतों तले उंगलियां दबा ली थीं। अजय की प्रस्तुति तीन पन्ने की वेबसाइट थी जो उन्होंने फ्रंट पेज 2000 की मदद से बनाई थी। इसमें उन्होंने तस्वीरों, ग्राफ, डाटा लिस्ट, मेल मर्ज व एनीमेडेट साउंड आदि का इस्तेमाल किया था।


बिल गेट्स ने दी बधाई
अजय पुरी को अपनी वेबसाइट बनाने के लिए माइक्रोसाफ्ट के चेयरमैन बिल गेट्स ने बधाई दी। वे 14 नवंबर 2002 को बिल गेट्स से मिले तब गेट्स ने उन्हें कहा कि तुम भारत के बिल गेट्स बनोगे। तब अजय ने गेट्स को याद दिलाया-आपके दादा एक बैंक के वाइस प्रेसिडेंट थे तो मेरे दादा एक कंपनी के वाइस प्रेसिडेंट। आपके परदादा राजनीति में थे तो मेरे परदादा भी राजनेता थे। यहां यह बताते चलें कि अजय भारतीय राजनीति के देदीप्यमान नक्षत्र आचार्य नरेंद्र देव के परपोते हैं। उनके दादा जी विष्णु नारायण पुरी ने उन्हें होश संभालने के साथ कंप्यूटर सीखाना आरंभ कर दिया था। अजय के पिता रवि पुरी बैंकांक की एक कंपनी सेंचुरियन टेक्सटाइल्स में मार्केटिंग मैनेजर हैं।
अजय बताते हैं कि उनकी वेबसाइट पूरी तरह के उनके बारे में वे क्या सोचते हैं। मैं क्या जानता हूं। मैं किन लोगो से मिल चुका हूं। उनकी वेबसाइट पर आप उनकी बिल गेट्स, अटल बिहारी बाजपेयी, के आर नारायणन, एनआर नारायण मूर्ति, कई फिल्म स्टार सहित दुनिया की प्रमुख हस्तियों के साथ उनकी तस्वीर भी देख सकते हैं। अजय पुरी अपनी वेबसाइट पर हर किसी को अपने साथ संवाद स्थापित करने का भी मौका भी देते हैं। आप उन्हें ई मेल कर सकते हैं। वे उसका जवाब भी दे सकते हैं। नौ साल की उम्र में उनका कंप्यूटर ज्ञान काफी बढ़ चुका है। वे कंप्यूटर पर वीडियो कान्फ्रेंसिंग करना जानते हैं। अब वे डिजिटल मूवी बनाने की तैयारी में हैं। अब उनका लक्ष्य गिनिज बुक आफ वर्ल्ड रिकार्डस में अपना नाम दर्ज कराने का है। वे सबसे कम उम्र के एनीमेटर के रुप में वहां अपना नाम देखना चाहते हैं। खैर अजय को हमारी शुभकामनाएं।
-माधवी रंजना



Friday, 28 August 2009

कई मल्टीप्लेक्स पर लग सकता है ताला

मेरे मुहल्ले में कई महीने से चल रहा स्पेंसर्स का रिटेल स्टोर बंद हो गया। मंदी के कारण स्टोर में बिक्री कम हो रही थी , लिहाजा एक दिन शटर गिर गया। अगले साप्ताहिक अवकाश में मैं फिल्म देखने गया। दिल्ली से सटे हुए भीड़भाड़ वाला मुहल्ला है शालीमार गार्डन। यहां एक शापिंग कांप्लेक्स है एसएम वर्ल्ड। इस एसएम वर्ल्ड में तीन 3 स्क्रीन मल्टीप्लेक्स है। मेरी इच्छा फिल्म देखने की हुई। तीनो आडिटोरियम में अलग अलग फिल्में चल रही थीं। मैंने लव आजकल देखने का निर्णय लिया। 

टिकट काउंटर पर जाने पर मालूम हुआ है कि लव आजकल की एक भी टिकट नहीं बिक पाई है, लिहाजा इसमें संदेह है कि शो चलेगा भी की नहीं। बुकिंग करने वाली लड़की ने सलाह दी कि आप कमीने देख लें। मैं घर से फिल्म देखने का तय करके चला था लिहाजा मैंने कमीने ही देखने को सोची। जब मैं सिनेमाघर अंदर दाखिल हुआ तो कमीने देखने वाले भी सिर्फ पांच लोग थे। पांच सौ लोगों की क्षमता वाला आडिटोरियम पूरा खाली था। यानी सिनेमाघर के एसी चलाने का भी खर्चा निकालाना मुश्किल है। 

दिल्ली के आसपास के कई मल्टीप्लेक्स का ऐसा ही हाल है। मल्टीप्लेक्स वाले सिनेमाघर तो बड़ी संख्या में बन गए हैं लेकिन फिल्में देखने आने वाले लोग कम दीख रहे हैं। क्या ये मल्टीप्लेक्स की महंगी टिकटों के कारण है या फिर आने वाली मंदी का असर।

बचपन में कस्बे के सिनेमाघर में फिल्म देखने जाता था तो कभी ऐसा नहीं सुना की पूरे सिनेमाघर में सिर्फ पांच लोग हों, या फिर लोगों की कमी से सिनेमा का शो ही नहीं चला हो। लेकिन शहरों में ऐसा हो रहा है। मल्टीप्लेक्स में टिकट की दरें कुछ ज्यादा जरूर है लेकिन मल्टीप्लेक्स वाले लोगो को अपनी ओर खींचने के लिए टिकट की दरें तो घटाने मे लग गए हैं। दिल्ली एनसीआर के कई सिनेमाघरो में मार्निंग शो की टिकट दरें कम करनी शुरू कर दी है। सौ से 125 रूपये की जगह 30 से 50 रूपये की टिकटें कर दी गई हैं। फिर भी मल्टीप्लेक्स में वीरानगी छाई दिखाई दे रही है। मल्टीप्लेक्स वाले इसके लिए सस्ती सीडी और डीवीडी को दोषी ठहरा सकते हैं। पाइरेसी में सस्ती फिल्में मिल जाती हैं, लेकिन मल्टीप्लेक्स वाले पॉपकार्न के नाम पर जो लूटपाट मचाते हैं भला उसके लिए कौन जिम्मेवार है। अब शायद ऐसा दौर आने वाला है कि कुछ मल्टीप्लेक्स में ताला लग सकता है।


बात रिटेल स्टोर से शुरू की थी, सो फिर वहीं आता हूं। मल्टीप्लेक्स में आदित्यविक्रम बिड़ला समूह का मोर रिटेल शॉप है, जहां शाम के समय भी ग्राहकों का टोटा दिखाई देता है। कई तरह के आफर हैं लेकिन खऱीददार नजर नहीं आते हैं। उपरी मंजिल पर एक और रिटेल स्टोर है। उसके मैनेजर का कहना है कि स्पेंसर रिटेल की तरह मोर पर भी ताला लग सकता है। जाहिर सी बात है, स्टाफ का वेतन, बिजली का बिल और किराया निकालना भी मुश्किल हो जाए तो कोई बड़ा उद्योगपति भी ज्यादा दिन तक रिटेल स्टोर खोल कर कैसे रह सकता है। घर फूंक कर तमाशा देखने को तैयार कोई भी नहीं हैं। तो क्या मल्टीप्लेक्स की चका चौंध अब धीमी पड़ने वाली है। पूर्वी दिल्ली का एक और शापिंग मॉल है इडीएम। इडीएम की उपरी मंजिल पर फूड कोर्टस हैं। लेकिन एक शाम को जब फूड कोर्ट सेक्सन में गया तो आठ दस बड़े बड़े रेस्टोरेंट्स में ग्राहक बहुत कम दिखाई दे रहे थे।
-विद्युत प्रकाश मौर्य

Thursday, 20 August 2009

सभी रेलगाड़ियां वातानूकुलित होंगी

 गरीब रथ के साथ एक प्रयोग की शुरुआत हुई है। आने वाले दौर में सभी लंबी दूरी की ट्रेनों को पूरी तरह वातानूकुलित करने का प्रयास किया जाएगा।

कई साल पहले भारतीय रेल ने जब एसी में थ्री टीयर कोच का प्रावधान किया तो यह काफी लोकप्रिय हुआ। एसी 2 टीयर में जहां 46 लोग ही यात्रा कर पाते थे वहीं उतने ही बड़े डिब्बे में अब 64 लोग यात्रा करते हैं। एसी थ्री से जहां लोगों को 25 फीसदी तक कम किराए में ही वातानूकुलित क्लास में सफर करने का फायदा मिला वहीं रेलवे का भी राजस्व बढ़ने लगा है। अब वातानूकुलित वर्ग मे एसी थर्ड यात्रियों को बीच सर्वाधिक लोकप्रिय है। आजकल रेल कोच फैक्ट्रियों में ज्यादा डिब्बे एसी 3 के ही बनाए जा रहे हैं। कई रेलगाड़ियों में एसी-3 के डिब्बे तुरंत भर जाते हैं पर एसी-2 खाली ही रहता है।


अब गरीब रथ के साथ एक नई शुरूआत हुई है। अगर वर्तमान रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव का यह प्रोजेक्ट लोकप्रिय हो जाता है तो आने वाले दिनों में अधिकांश रेलगाडि़यों के सभी डिब्बों को एसी करने का प्रयास किया जाएगा। यानी आम जनता के लिए चलने वाली सभी ट्रेनें भी राजधानी और शताब्दी की तरह पूरी तरह से वातानूकुलित हुआ करेंगी। यह सब कुछ स्पेश मैनेजमेंट की नई नीति के तहत संभव हो सका है। यानी की उतनी ही जगह में ज्यादा सीटें देने की कोशिश करना। अगर यह सब कुछ सफल रहा तो मध्यम वर्ग क्या फैक्टरी में काम करने वाले मजदूर वर्ग के लोग भी वातानूकुलित क्लास में चलने का सुख उठा सकेंगे। अभी तक रेलगाड़ियों में वातानूकुलित क्लास में सफर सिर्फ उच्च वर्ग के लोग कर पाते हैं। आमतौर पर मध्यम वर्ग के लोग भी स्लीपर क्लास में ही सफर करते हैं। भारत जैसे देश में जहां पूरे देश का मौसम एक सा नहीं रहता है वहां सभी लंबी दूरी की गाड़ियों को वातानूकुलित बनाने की कोशिश स्वागत योग्य है।

लालू का अर्थशास्त्र-
अब यह देंखें की गरीब रथ के मामले में लालू का अर्थ शास्त्र कैसे काम करता है। अगर 17 डिब्बों वाली को वातानूकुलित रेलगाड़ी है तो एसी कोच में प्रति यात्री प्रति किलोमीटर 47 पैसे परिचालन दर आती है। वहीं अगर गरीब रथ हो तो यह परिचालन दर 39 पैसे आ जाती है। क्योंकि इतनी जगह में गरीब रथ में ज्यादा यात्री सफर करते हैं। रेलवे को अनुमान है कि इस तरह की व्यवस्था से रेलवे के राजस्व में 63 फीसदी तक की बढ़ोतरी हो सकती है वहीं लोग रेलगाड़ी में सस्ती यात्रा का भी सुख उठा सकते हैं।
स्पेश मैनेजमेंट
एसी 3 में जहां एक कोच में कुल 64 यात्रियों के लिए सोने की जगह होती है वहीं गरीब रथ के कोच नए डिजाइन से तैयार किए गए हैं। इनमें 74 यात्रियों के लिए सोने की जगह है। कपूरथला स्थित रेल कोच फैक्टरी ने इन डिब्बों को डिजाइन किया है। अब इसमें कुछ और बदलाव कर इसे 84 सीटों वाला करने की योजना पर काम चल रहा है। इसी तरह गरीब रथ में लंबी दूरी की यात्रा करने वालों के लिए भी चेयरकार की व्यवस्था की गई है। परंपरागत एसी चेयरकार में 70 सीटें होती हैं पर इसमें 102 सीटों का प्रावधान किया गया है। इसका किराया लगभग स्लिपर क्लास के बराबर ही रखा गया है। यह अग बात है कि लंबी दूरी की यात्रा कोई बैठकर नहीं करना चाहता है। पर लंबी दूरी की अधिकांश ट्रेनों में मजदूर वर्ग के लोग बैठकर क्या आलू प्याज की तरह ठूंसकर सफर करते भी देखे जाते हैं। उनके लिए एसी सिटिंग बहुत अच्छी रहेगी। इससे गरीब व मध्यमवर्गीय जनता को एक सुखद विकल्प भी मिल सकेगा।
-माधवी रंजना madhavi.ranjana@gmail.com




Saturday, 15 August 2009

सारा देश होता लोकल

हाल में टाटा इंडीकाम ने अपने सभी लैंडलाइन उपभोक्ताओं को देश भर में अपने नेटवर्क पर लोकल काल दरों पर बात करने की सुविधा दी है। यानी टाटा इंडीकाम का लैंडलाइन फोनधारी अब अपने पड़ोसी को फोन करे या फिर बेंगलूर मुंबई या अमृतसर कहीं भी वह 1.20 रुपए में तीन मिनट बातें कर सकेगा। इससे पहले महानगर टेलीफोन निगम लि. (एमटीएनएल) ने भी दिल्ली व मुंबई के बीच अपने नेटवर्क पर लोकल काल करने की सुविधा प्रदान कर दी है। अब उससे भी आगे बढ़कर एमटीएनल ने दिल्ली मुंबई के बीच अपने उपभोक्ताओं को लोकल काल की दर पर वीडियो कान्फ्रेंसिंग की सुविधा भी प्रदान कर दी है। इतना ही नहीं एमटीएनएल ने घोषणा की है कि वह अपने उपभोक्ताओं को और भी कई सुविधाएं लोकल काल दरों पर देने की ठानी है। यानी उपभोक्ताओं की चांदी है।
वर्तमान में अगर आप कोई एसटीडी काल करते हैं तो आपको 2.40 रुपए प्रति मिनट की दर से भुगतान करना पड़ता है। जबकि लोकल काल के लिए दर महज 40 पैसे मिनट है। यानी लोकल काल की तुलना में एसटीडी छह गुना महंगी है। पर एमटीएनएल या टाटा इंडीकाम के नेटवर्क में एसटीडी काल अब उपभोक्ताओं को छह गुनी सस्ती पड़ रही है। वैसे एसटीडी करने वाले लोगों के इंडिया वन प्लान का विकल्प मौजूद है। इसमें 200 रुपए मासिक किराया के प्लान में महज 1 रुपए मिनट एसटीडी काल की जा सकती है। पर अब अधिकांश टेलीफोन आपरेटर अपने नेटवर्क पर पूरे देश को लोकल काल में परिवर्तित करने की ओर आगे बढ़ रहे हैं। यानी आने वाले समय में ऐसा भी हो सकता है जब एसटीडी काल का कोई मतलब ही नहीं रह जाएगा। हो सकता है टाटा और एमटीएनएल से प्रभावित होकर रिलायंस और अन्य कंपनियां भी इस तरह के प्लान आफर करें। अभी देश में सबसे बड़ा लैंडलाइन नेटवर्क भारत संचार निगम लि. का ही है। इसलिए उपभोक्ताओं को सही लाभ तभी हो सकेगा जब बीएसएनएल इस तरह की कोई घोषणा करता है।
पूरे देश में लोकल काल होने का फायदा उन कंपनियों को ज्यादा हो सकता है जिनका दफ्तरों का नेटवर्क देश भर में फैला हुआ हो। जैसे मान लिजिए किसी कंपनी का एक दप्तर अमृतसर में है दूसरा बेंगलूर में। अगर कंपनी के पास दोनों जगह टाटा का ही फोन है तो दफ्तर के लोग रोज लोकल काल दरों पर आपस में जम कर बातें कर सकते हैं वहीं फैक्स आदि का आदान प्रदान भी लोकल दरों पर ही कर सकते हैं।
कई कंपनियां धीरे धीरे ही सही पूरे देश को लोकल काल दर पर लाने की ओर बढ़ रही हैं।
आने वाले समय में मोबाइल फोन पर भी कंपनियां काल दरों में और भी गिरावट करने वाली हैं। अभी मोबाइल पर प्रति मिनट एसटीडी की दर आमतौर पर दो रुपए प्रति मिनट की है। वहीं लोकल काल की दरें 49 पैसे से लेकर एक रुपए प्रति मिनट तक अलग अलग रेंज में है। पर लैंडलाइन फोन पर घटती काल दरों का असर जल्द ही मोबइल सेक्टर में भी दिखाई देगा।
भारत संचार निगम लि. सहित सभी कंपनियां एसटीडी दरों में और गिरावट करने वाली हैं। ऐसी उम्मीद की जा रही है एसटीडी की अधिकतम दरें 60 से 70 पैसे प्रति मिनट पर सिमट कर रह जाएंगी। जाहिर है कि इसका फायदा आम लोगों को और गरीब लोगों को ज्यादा मिल सकेगा।
 -विद्युत प्रकाश vidyutp@gmail.com





Monday, 10 August 2009

आखिर कहां जाएं प्यार भरे दिल

चलों चलें दूर कहीं प्यारके लिए ये जगह ठीक नहीं। 
जी हां आखिर कहां जाएं प्रेमी। पार्क में अगर प्रेमी प्रेमिका बैठकर प्यार के दो मीठे बोल बोलते हैं तो पुलिस डंडे बरसाती है। लाइब्रेरी के किताबों के बीच छुप-छुप कर प्यार की बातें करो को लाइब्रेरियन बाहर जाने के कहता है। अब भला सड़क पर बैठकर प्यार की बातें तो की नहीं जा सकती। या कि अपने मम्मी डैडी के पास खुलेआम अपनी प्रेमिका को लेकर भी नहीं जाया जा सकता है। बेचारे मेरठ के प्रेमियों के पास लेदेकर वही एक अच्छा पार्क पर था पर वहां भी पुलिस आ गई रंग में भंग डालने। आपरेशन भी उसने ऐसा चलाया कि बेचारे मजनू की आत्मा भी सुबकती होगी। मजनू तो भले ही असफल प्रेमी रहा हो पर था तो वह बड़ा शरीफ व मजबूर। पुलिस वालों ने तो उसका नाम भी बदनाम करके रख दिया। मेरठ की इस घटना से दुनिया भर के प्यार करने वालों का दिल भर आया है। पाकिस्तान की एक हसीन शायरा ने लिखा है-
जब कोई दर्दे मुहब्बत की सजा पाता चोट उसे लगती है, दिल मेरा भर आता है।
सो मेरठ के प्यार करने वालों निराश न होना। जो पुलिस के डंडे के निशान तुम्हारे पीठ पर पड़े हैं उसका दर्द कश्मीर से कन्याकुमारी तक के प्यार करने वाले दिल महसूस कर रहे हैं। क्या करें प्यार करने वालों का कोई संगठन नहीं है नहीं देश भर में पुलिस के खिलाफ धरना प्रदर्शन जरूर करवाते। अब यश चोपड़ा करन जौहर या महेश भट्ट को इस प्रकरण से प्रेरणा लेकर कोई फिल्म जरूर बनानी चाहिए।

बात यहीं खत्म नहीं होती। सुना है कि दिल्ली के चिड़ियाघर में प्यार भरी मीठी बात करने वालों पर भी प्रशासन की टेढी नजर हैं। उन्हें तंग करन के लिए उनके पीछे हिजड़े छोड़ दिए जाते हैं। जहां आपने प्यार भरी बातें शुरू नहीं कि हिजड़े आ गए रंग में भंग डालने। दिल्ली में छोटे-छोटे अपार्टमेंट में रहने वाले लोगों तो घर में भी प्यार भरी बात करने का मौका नहीं मिलता। यहां तो प्रेमी प्रेमिका क्या पति पत्नी भी प्यार का व्यापार करने के लिए पार्क या चिड़िया घर में आते हैं। अब सार्वजनिक स्थानों पर वेलेंटाइन डे मनाना भी खतरनाक है। हो न हो इसक पीछे कोई विदेशी साजिश नजर आती है। हो सकते है महंगे रेस्टोरेंट की चेन चलाने वालों ने पुलिस प्रशासन को उकसाया हो कि वे प्रेमियों के परेशान करें ताकि प्यार भरे दिल उनके रेस्टोंरेंट में आएं और दिल की बात कहने के साथ बिल भी भरें और जेब भी ढीली करें। इसकी गहराई से जांच कराई जानी चाहिए। बड़े शहरों में खुलने वाले शानदार रेस्टोरेंट प्रेमियों को पूरा एकांत उपलब्ध कराते हैं। पर यहां बैठना बड़ा महंगा पड़ता है। अब भला वे प्रेमी कहां जाएंगे जिनकी जेब तो खाली होगी पर दिल तो प्यार से भरा होगा। किसी शायर ने कहा था - तेरे जितने भी चाहने वाले होंगे। होठों पे हंसी पर पावों में छाले होंगे।
-विद्युत प्रकाश



Wednesday, 5 August 2009

क्या नाम से जाति सूचक शब्द हटाए जाएं

भला नाम में क्या रखा है। नहीं नाम मे बहुत कुछ रखा है। पिछले दिनों एक सुझाव आया कि नाम से जातिसूचक शब्द हटाए जाने चाहिएं इससे देश में जातपात के भेदभाव को मिटाने मे मदद मिल सकती है। इसको लेकर कानून बनाने का भी सुझाव आया है। पर क्या ऐसा कोई कानून बनाया जा सकता है। क्या लोगों को इस बात के लिए कानून मजबूर किया जा सकता है कि आप अपने नाम में कोई भी जातिसूचक शब्द न लगाएं। शायद इसको लेकर कई तरह की मुश्किलें आ सकती हैं। 

पहले यह तय करना मुश्किल हो सकता है कि कौन शब्द जाति सूचक हैं कौन से शब्द नहीं। जैसे उत्तर भारत में शर्मा और सिंह जैसे टाइटल हैं जो कई जातियों के लोग लगते हैं। कानून बनाकर इन शब्दों के प्रयोग पर पाबंदी लगाना कठिन होगा। पंजाब में काफी लोग अपने नाम के साथ अपने गांव का नाम लगाते हैं। वहीं गुजरात में अपने नाम के साथ अपने नाम के साथ पिता का नाम लगाते हैं। उन्हें ऐसा करने से रोकना कानून बनाने से संभव नहीं हो सकेगा।
वहीं कोई भी नाम रखना और नाम के आगे कोई भी टाइटल लगाना हर किसी का मौलिक अधिकार है। इस पर कानून बनाकर रोक नहीं लगाया जा सकता है। ऐसा करने पर बड़ी संख्या में लोग विद्रोह कर सकते हैं। नाम से जाति सूचक शब्द हटाने को लेकर आपत्ति देश भर की जातीय संगठनों को भी हो सकती है। ये जाति संगठन अपने अपने समाज में लोगों को इस बात के लिए अभिप्रेरित करते हैं आप अपने नाम के साथ खुलकर जाति सूचक शब्द लगाएं जिससे की सामने वाले को आपकी जाति का पता चल जाए। दलित व पिछड़ी जातियों में पहले अपनी जाति छुपाने का प्रचलन था इसलिए इन समुदाय से आने वाले लोग बड़ी संख्या में टाइटल नहीं लगाया करते थे। पर अब पिछले एक दशक में दलित जातियों में स्वाभिमान जगा है। वे खुल कर अपनी जाति सूचक टाइटल लगाने लगे हैं।
बहुत कम लोग ऐसे हैं जो नाम से जातिसूचक शब्दों को हटाए जाने के पक्ष में हैं। दुनिया के हर देश में नाम के साथ किसी न किसी तरह का शीर्षक लगाए जाने का प्रचलन है। देश में कुछ ऐसे लोग हुए हैं जिन्होंने अपने नाम से जाति सूचक शब्द हटाए हैं। जैसे राजनीति में चंद्रशेखर। पर ऐसे लोग जो नाम के साथ जाति नहीं लगाते उनकी भी जाति लोग बखूबी जानते हैं। जो नहीं जानते वे उनकी जाति पता कर ही डालते हैं। बिहार के करिश्माई नेता का असली नाम लालू प्रसाद है पर उन्हें ज्यादा लोग लालू प्रसाद यादव या लालू यादव के नाम से बुलाते हैं। अगर लोग अपनी प्रेरणा से ही अपने नाम इस तरह के रखने लग जाएं जिससे उनकी जाति के बारे में पता न चले तो यह बड़ी अच्छी बात हो सकती है। पर इसको लेकर किसी तरह के कानून थोपने की कोई जरूरत नहीं है।
अगर कानून बनता है तो काफी लोग इस कानून के खिलाफ अपील करेंगे। सबसे बड़ी बात है किसीको कोई भी नाम रखने से रोका नहीं जा सकता है। अगर कोई दलित समाज से आने वाला व्यक्ति किसी सवर्ण जाति की कोई टाइटल को लिखना चाहता है तो उसे भी ऐसा करने से लोग अथवा कानून नहीं रोक सकते हैं। कुछ लोग को अजीबोगरीब किस्म के उपनाम रख लेते हैं। जैसे मप्र के भाजपा नेता बाबू लाल गौर। कहते हैं वे स्कूल में अपने शिक्षक की बात गौर से सुनते थे इसलिए उनका नाम शिक्षक ने ही बाबूलाल गौर रख दिया।

-विद्युत प्रकाश मौर्य