Monday, 5 May 2008

कल हो ना हो

आज एक बार सबसे मुस्करा के बात करो 
बिताये हुये पलों को साथ साथ याद करो
क्या पता कल चेहरे को मुस्कुराना
और दिमाग को पुराने पल याद हो ना हो
आज एक बार फ़िर पुरानी बातो मे खो जाओ
आज एक बार फ़िर पुरानी यादो मे डूब जाओ
क्या पता कल ये बाते
और ये यादें हो ना हो
आज एक बार मन्दिर हो आओ
पुजा कर के प्रसाद भी चढाओ
क्या पता कल के कलयुग मे
भगवान पर लोगों की श्रद्धा हो ना हो
बारीश मे आज खुब भीगो
झुम झुम के बचपन की तरह नाचो
क्या पता बीते हुये बचपन की तरह
कल ये बारीश भी हो ना हो
आज हर काम खूब दिल लगा कर करो
उसे तय समय से पहले पुरा करो
क्या पता आज की तरह
कल बाजुओं मे ताकत हो ना हो
आज एक बार चैन की नीन्द सो जाओ
आज कोई अच्छा सा सपना भी देखो
क्या पता कल जिन्दगी मे चैन
और आखों मे कोई सपना हो ना हो
क्या पता कल हो ना हो
COLLECTED....
( This poem is sent by My friend allauddin Etv, reporter from LKO)

Saturday, 3 May 2008

शादी-शुदा मर्द से प्यार ( व्यंग्य )

अभी हाल में हेमा मालिनी की बेटी ईशा दयोल ने यह बयान जारी किया कि उन्हें किसी शादी शुदा मर्द से प्यार करने में कोई आपत्ति नहीं है। अगर उनके जीवन में कोई ऐसा संबंध बनता है तो वे इसका स्वागत करेंगी। यह बयान उन्होंने अपनी नई फिल्म के रेफरेंस में दिया जिसकी कहानी में वे किसी शादी शुदा मर्द के प्यार में पड़ जाती हैं। ईशा ने कहा कि उनकी मां (हेमा मालिनी ) ने भी तो एक शादी शुदा मर्द से ही प्यार किया था इसलिए वे इसमें कोई बुराई नहीं देखतीं। फिल्म इंडस्ट्री में शादी शुदा मर्द से ईश्क लड़ाने और फिर शादी रचाने का चलन पुराना रहा है।

कई हीरोइनों को दूसरी पत्नी बनने में कोई आपत्ति नहीं होती। पर ये महिलाएं ये नहीं देखतीं कि इसके साथ वे कितने घर फूंकने चली हैं। हालांकि प्यार हो जाने में किसी एक पक्ष को जिम्मेवार नहीं ठहराया जा सकता है। इसमें दो पक्ष होते हैं...और ताली दोनों हाथों से ही बजती है। अभी हाल में बालीवुड की खूबसूरत अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी चर्चा में हैं। शिल्पा के कारण निर्देशक अनुभव सिन्हा का घर तबाह होने को है। उनकी पत्नी अनुभव से तलाक लेना चाहती हैं। कारण अनुभव का शिल्पा से ज्यादा मेलजोल है। ठीक इसी तरह का वाकया रघुबीर यादव के साथ हुआ। मुंगेरी लाल के हसीने सपने वाले रघुबीर यादव से मुंबई फिल्म इंडस्ट्री को असीम संभावनाएं थीं। रघुबीर का मुंबई आने से पहले से ही भरा पूरा परिवार था। पर फिल्म इंडस्ट्री में आने के बाद वे सांवली सलोनी नंदिता दास के प्यार में फंस गए। प्यार का परवान कुछ इस तरह चढ़ा की रघुबीर की पहली पत्नी और बच्चे उन्हे छोड़कर गांव चले गए। उसके थोड़े दिनों बाद नंदिता दास ने भी उन्हें छोड़ दिया। उसके बाद रघुबीर की हालत बीमारों जैसी हो गई। उनका फिल्मी कैरियर और परिवार दोनों ही तबाह हो गए। अब वे फिल्मों में बहुत कम ही नजर आते हैं। ठीक इसी तरह का वाकया बोनी कपूर के साथ हुआ। बोनी ने जब श्रीदेवी को दूसरी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया तो उनकी पहली पत्नी मोना कपूर को गहरा धक्का लगा।


मोना कपूर फिल्म इंडस्ट्री मजबूत महिला सत्ती सौरी की बेटी हैं। खैर सत्ती सौरी ने इस दुख की घड़ी में मोना कपूर को सहारा दिया और उन्हें टीवी धारावाहिकों के प्रोडक्शन में व्यस्त कर दिया। पर सत्ती सौरी को दूसरी पत्नी के रुप में किसी महिला को आकर किसी का घर तबाह करने पर बड़ा दुख हुआ। दुखी सत्ती सौरी ने एक फिल्म के सेट पर हेमा मालिनी को काफी भला बुरा कहा। बकौल सत्ती सौरी हेमा मालिनी ने ही फिल्म इंडस्ट्री में दूसरी महिला के ट्रेंड की शुरूआत की। हालांकि फिल्म इंडस्ट्री में दक्षिण भारतीय निर्माताओं में भी दूसरी पत्नी रखने का रिवाज बहुत पुराना है। 

गाहे बगाहे कई फिल्मकार इसलिए अपनी कहानी में भी दो पत्नियों के बीच झूलते पति का चित्रांकन करते हैं। गोविंदा की साजन चले ससुराल इसी तरह की फिल्म थी। जब पुरानी अभिनेत्रियों ने इस मामले में इतना साहस दिखाया तो अगली पीढ़ी के इशा दयोल और शिल्पा शेट्टी को भला क्या आपत्ति हो सकती है। 

आज के दौर में तो रिश्तों में स्थायीत्व का भाव और भी कम होता जा रहा है। पुरूष मानसिकता हमेशा से दूसरी स्त्रियों में रुचि रखने की रही है पर महिलाओं में इस तरह का बढ़ता ट्रेंड खतरनाक हो सकता है। हमारा समाज कभी भी ऐसे पुरूष या ऐसी स्त्रियों को अच्छी नजर से नहीं देखता है।
-माधवी रंजना madhavi.ranjana@gmail.com



Thursday, 1 May 2008

आखिर क्यों डरे हैं बुश भारत से

भारत एक वैश्विक शक्ति के रुप में स्थापित हो रहा है इसका बेहतर अंदाजा हम हाल की कि कुछ खबरों से लगा सकते हैं। पिछले दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने अमेरिका के स्कूली बच्चों को चेताया कि सावधान हो जाओ वरना सारी नौकरियां भारतीय ले जाएंगे। उन्होंने कहा कि अमेरिकी छात्रों से कहा कि खुद को भारतीय छात्रों से प्रतिस्पर्धा करने के लिए तैयार करें। बुश को ऐसा इसलिए कहना पड़ा क्योंकि अमेरिका में आज की तारीख में सबसे अधिक आमदनी वाला जातीय समूह भारतीय हैं। 


अमेरिका में प्रोफेशनल व अन्य सेवाओं की 60 फीसदी नौकिरयों में भारतीयों का दबदबा है। इसी तरह अमेरिकी लेबर फोर्स में 80 फीसदी तक भारतीय हैं। भारत के टेक्नोक्रेट दुनिया भर में देश की इमेज को बेहतर बनाने में लगे हैं। 90 के दशक के बाद आए सूचना क्रांति के बूम ने भारत को वैश्विक शक्ति के रुप में स्थापित करने में काफी मदद की है। आज दुनिया के सभी विकसित देशों की नजर भारत की ओर है। वे भारत की एक अरब आबादी जिसमें बड़ी संख्या में मध्यम वर्ग है जो खर्च करने की क्षमता रखता है उसे एक बड़े बाजार में के रुप में देखते हैं। 

सिर्फ इतना ही नहीं भारतीय दिमाग ने जापान, जर्मनी, इंग्लैंड व अमेरिका के सभी बड़ी कंपनियों में अपने मेधा, प्रतिभा और झमता का लोहा मनवाया है।
भारत की एनआरआई कम्युनिटी ने भी अपने उद्योगों से भारत का सम्मान विश्व पटल पर बढ़ाया है। इनमें स्टील किंग लक्ष्मी नारायण मित्तल का नाम प्रमुख है जिन्हें फोर्ब्स मैगजीन ने यूरोप का तीसरा सबसे बड़ा अमीर घोषित किया है। इसके अलावा ब्रिटेन के लार्ड स्वराज पाल, होटलियर विक्रम चटवाल, ब्रिटेन की सबसे बड़ी मोबाइल कंपनी वोडाफोन के मालिक भी भारतीय मूल के हैं। अब भारतीयों की बदलती छवि न सिर्फ कुशल मजदूर की है बल्कि वे सफल उद्यमी भी हैं।
भारतीय परिवेश में भी बदलाव आया है। उन्नत दूर संचार सेवाओं के कारण अब भारतीय शहर दुनिया के अच्छे शहरों में गिने जा रहे हैं। दिल्ली में मेट्रो रेल, मिलेनियम सिटी गुड़गांव जहां दुनिया की सभी प्रमुख कंपनियों के काल सेंटर काम कर रहे हैं, साइबर सिटी हैदराबाद, इन्फारमेशन टेक्नोलाजी का शहर बेंगलूर, इन्फो सिटी के रुप में विकसित होता मोहाली ने भारत की छवि और शक्ति दोनों को नया आयाम दिया है। भारत जो दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है वहां देश ने राष्ट्रपति के रुप में एपीजे कलाम को पाया है जिनकी गिनती दुनिया के जानेमाने वैज्ञानिकों में होती है। वहीं प्रधानमंत्री के रुप में मनमोहन सिंह मिले हैं जो कुशल अर्थशास्त्री हैं। इस संयोजन ने भी भारत को मजबूत देश बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। दुनिया में भारत को एक मजबूत होती अर्थव्यवस्था के रुप में देखा जा रहा है। विदेशी निवेशकों को विश्वास भारतीय शेयर बाजार में बढ़ा है। तभी तो मुंबई शेयर सूचकांक ने 12 हजार का आंकड़ा पार कर लिया है।

 देश की अर्थव्यवस्था 8 फीसदी की गति से बढ़ रही है। प्रधनमंत्री मनमोहन सिंह चाहते हैं कि हम 10 फीसदी का विकास लक्ष्य हासिल करें। अगर सब कुछ ठीक रहा तो हम इस विकास लक्ष्य को प्राप्त भी कर लेंगे। एक सर्वेक्षण तो यह भी बताता है कि आने वाले दस सालों में हम चीन को भी पीछे छोड़ देंगे। यानी की ड्रेगन (चीन) को उपर हाथी (भारत) बैठा हुआ होगा। जरूरत सिर्फ इस बात की है कि हम भारतीय उत्पादों को विश्व बाजार के लायक बनाएं और कानून व्यवस्था में सुधार लाकर भारत के इमेज को और चमकदार बनाएं।
-         विद्युत प्रकाश मौर्य


Tuesday, 29 April 2008

माइक्रो फाइनेंस के जनक -विक्रम आकुला

एक अनिवासी भारतीय का दिल भारत की गरीबी को देखकर द्रवित हो उठा। उसने भयंकर गरीबी को देखते हुए माइक्रो फाइनेंस की अवधारणा पर काम करना आरंभ किया। भारत में जन्मे विक्रम आकुला का उच्च अध्ययन विदेश में हुआ है। उन्होंने टफ्ट्स विश्वविद्यालय से बीए येल से एमए तथा शिकागो यूनीवर्सिटी से पीएचडी की है।

 पीएचडी के दौरान उनके शोध का विषय गरीबी उन्मूलन की विभिन्न रणनीतियां थी जिसे उन्होंने बाद में जीवन में उतारा भी। सन 1998 में उन्होंने एसकेएस माइक्रो फाइनेंस उद्यम की स्थापना की। आज आंध्र प्रदेश, उड़ीसा, महाराष्ट्र, कर्नाटक और मध्य प्रदेश में इसकी 85 शाखाएं हैं। विक्रम के कार्यों का मूल्यांकन करते हुए टाइम पत्रिका ने उन्हें 2006 के 100 सबसे प्रभावशाली लोगों में चयनित किया है। पर विक्रम इसे अपने लिए कोई बड़ा सम्मान नहीं मानते हैं। हां उन्हें इस बात की खुशी जरूर है कि उनके कार्यों को पहचान मिल रही है।

मेडक से हुई शुरूआत - एनआरआई विक्रम आंध्र प्रदेश के मेडक जिले में अपने एक रिश्तेदार के घर आए। वहां उन्होंने जो आसपास में गरीबी देखी उससे वे विचलित हो गए। उसके बाद उन्होंने ने मेडक से ही अपने इस ड्रीम प्रोजेक्ट की शुरूआत की। आज आकुला के प्रोजेक्ट की सफलता देखकर कई विदेशी संस्थान भी इसमें पैसा लगाने को तत्पर हैं।

बिना गिरवी के कर्ज - उनकी संस्था एसकेएस का उद्देश्य है साधनहीन लोगों को सस्ती ब्याज दर पर ऋण देकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाना। इस क्रम में अब तक एसकेएस दो लाख 21 हजार महिलाओं को 240 करोड़ रुपए ऋण के रुप में बांट चुकी है। ये महिलाएं भारत के उन क्षेत्रों से आती हैं जहां भयंकर गरीबी है। भारत में माइक्रो फाइनेंस अभी नया क्षेत्र है। इसका काम करने का तरीका समान्य बैंकिंग से अलग है। यह बिना कुछ गिरवी रखे ऋण प्रदान करता है। साथ ही इसकी ब्याज दरें भी बैंक से कम होती हैं।

विक्रम ने भारत में गरीबी के कारणों का गंभीरता से अध्ययन किया है। अपनी संस्था आरंभ करने से पहले वे फुलब्राइट स्कालरशिप के तहत भारत सरकार द्वारा संचालित जवाहर रोजगार योजना के अंतर्गत खाद्य सुरक्षा के अंतर्गत माइक्रो फाइनेंस उपलब्ध करवाने का काम किया। इसके बाद उन्होंने आंध्र प्रदेश में डेक्कन डेवलपमेंट सोसाइटी का गठन किया।

नए क्षितिज की ओर - आकुल अपनी संस्था का विस्तार आने वाले एक साल में पांच नए राज्यों में करना चाहते हैं और इससे लाभान्वितों की संख्या सात लाख तक पहुंचाना चाहते हैं। पिछले साल एसकेएस की विकास दर 300 फीसदी थी। तमाम बैंक जो सभी कर्ज कुछ गिरवी रख कर ही देते हैं भले ही वसूली के संकट से गुजर रहे हों पर एसकेएस की वापसी (रिकवरी) का दर 98 फीसदी है। जबकि बैंक 90 फीसदी रिकवरी रेट को बहुत शानदार मानते हैं। आकुला ने इस भ्रम को भी तोड़ा है कि गरीब आदमी कर्ज का रुपया नहीं वापस करता है। आकुल की कंपनी एसकेएस आधुनिक तकनीक पर काम करती है। वह अपने ग्राहकों को पैसा उपलब्ध करवाने के लिए स्मार्ट कार्ड का इस्तेमाल करते हैं। उनकी सफलता का एक बहुत बड़ा कारण पारदर्शिता पर जोर देना भी है।

-विद्युत प्रकाश



Sunday, 27 April 2008

बाबा रामदेव और बिहार.......

बाबा बिहार क्या गए बिहार के होकर रह गए। वे बिहारियों के मुरीद हे गए। वे बिहार पर इतने खुश हुए कि खुद को बिहार का ब्रांड एंबेस्डर बनना स्वीकार कर लिया। अब बाबा बिहार के बाहर बिहार का प्रचार करेंगे। हालांकि हमारी जानकारी के अनुसार वे बिहार के रहने वाले नहीं है। उनका पालन पोषण भी बिहार में नहीं हुआ है। पर ठीक उसी तरह जैसे कोई फिल्मी हीरोइन किसी साबुन का प्रचार करती है, बाबा शायद बिहार का प्रचार करेंगे। बिहार की सरकार ने बाबा को अपना ब्रांड एंबेस्डर बना दिया और बाबा ने उसे स्वीकार कर भी लिया। पर सवाल यह उठता है कि बाबा बिहार की किन चीजों का बिहार से बार प्रतिनिधित्व करेंगे। बिहार का सबसे लोकप्रिय खानपान है लिट्टी चोखा। वह गरीब गुरबों की खास पसंद है। क्या बाबा उसका प्रचार करेंगे। या फिर वे क्या सत्तु का प्रचार करेंगे। पर ठहरिए सत्तु का प्रचार तो लालू प्रसाद यादव जी करते हैं। वे प्रेस कान्फ्रेंस में पत्रकारों को सत्तु दिखाते रहते हैं। इसलिए बाबा लालू प्रसाद जी के फेवरिट सत्तू को उनसे छीन नहीं सकते। वैसे बाबा योग के प्रचारक हैं। योगासन करने वालों के लिए सत्तु बडे़ काम की चीज है। क्योंकि यह सात्विक है प्रोटीन भी ताकत भी बढ़ाती है। इसमें कोई मिलावट भी नहीं है।


अब बचते हैं बिहार के रिक्सेवाले। पर उनको शायद किसी ब्रांड एंबेस्डर की जरूरत ही नहीं है। वे जहां भी जाते हैं अपनी मेहनत के बल पर रिक्सा खींच कर लोगों को उनकी छोटी-छोटी मंजिलों तक पहुंचाते हैं। बाबा ने इतना जरूर कहा कि वे बिहारियों के मेहनतकश दमखम को सलाम करते हैं। पर वे उनका प्रतिनिधित्व किस तरह करेंगे इसका उन्होंने ठीक से खुलासा नहीं किया। अब बचते हैं। बिहार के बेरोजगार। पर उनकी अगुवाई को बेरोजगार ही कर सकता है। पर बाबा के पास तो पहले से ही तरह के रोजगार हैं। ब्रांड एंबेस्डर के सामने बहुत बड़ी जिम्मेवारी होती है इमेज बिल्डिंग की। सो अब बाबा तो गए बिहार के। पर क्या बाहर के लोग उन्हें बिहारी मान लेंगे। क्या बाबा बिहार से बाहर भोजपुरी बोलकर दिखाएंगे। क्या वे बिहार से बाहर बार बार बिहार का नाम लेकर लोगों को बिहार में पूंजी निवेश के लिए कहेंगे। वैसे बाबा जब से बिहार से निकल कर बाहर आए हैं उन्होंने एक बार भी बिहार का नाम नहीं लिया है।
बाबा जब एक दो साल बाद बिहार में फिर योगासन के शिविर लगाने जाएंगे तो लोग उनसे पूछेंगे कि बाबा आपने बिहार के ब्रांड एंबेस्डर के रुप में क्या किया। बाबा का मुकाबला महेंद्र सिंह धोनी से है जो पड़ोसी राज्य झारखंड के ब्रांड एंबेस्डर हैं। धोनी का तो बचपन ही रांची में गुजरा है। वे लंबे समय से वहीं रह भी रहे हैं। जब वे क्रिकेट नहीं खेलते तब वे रांची में ही रहते हैं। पर बाबा ने अभी तक पटना में कोई घर नहीं बनाया। हम बाबा को यह सलाह देंगे कि वे बिहार में एक घर जरूर बना लें जिससे उनके बिहारी होने के एहसास हो। साथ ही वे घर बिहार के ऐसे गांव में बनाएं जहां सड़क नहीं है। बिहार के 50 फीसदी गांवों में अभी भी बैलगाड़ी से जाना पड़ता है। उन गांवों में बिजली नहीं है। लालटेन जलता रहता है। लालटेन पर भी फिलहाल लालू प्रसाद जी का कब्जा है। बाबा अगर गांव में घर बना रहने जाते भी हैं तो उन्हें यह समस्या आएगी कि वे अपने घर में रोशनी कैसे करें। खैर मोमबत्ती या दीए से काम चलाया जा सकता है। पर बाबा से हम गुजारिश करेंगे कि वे एक बार बिहार के गांवों का दौरा जरूर करें। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य 

Friday, 25 April 2008

अगर तुम ..... अपना दिमाग ठीक रख सकते हो...


अगर तुम अपना दिमाग ठीक रख सकते हो 
जबकि तुम्हारे चारों ओर सब बेठीक हो रहा हो
और लोग दोषी तुम्हे इसके लिए ठहरा रहे हों...
अगर तुम अपने उपर विश्वास रख सकते हो
जबकि सब लोग तुम पर शक कर रहे हों..
पर साथ ही उनके संदेह की अवज्ञा तुम नहीं कर रहे हो..
अगर तुम अच्छे दिनों की प्रतीक्षा कर सकते हो
और प्रतीक्षा करते हुए उबते न हो..
या जब सब लोग तुम्हें धोखा दे रहे हों
पर तुम किसी को धोखा नहीं दे रहे हो...
या जब सब लोग तुमसे घृणा कर रहे हों पर
तुम किसी से घृणा नहीं कर रहे हो...साथ ही न तुम्हें भले होने का अभिमान हो न बुद्धिमान होने का....अगर तुम सपने देख सकते हो
पर सपने को अपने उपर हावी न होने दो,
अगर तुम विचार कर सकते हो पर
विचारों में डुबे होने को अपना लक्ष्य न बना बैठो...
अगर तुम विजय और पराजय दोनों का स्वागत कर सकते हो पर दोनों में से कोई तुम्हारा संतुलन नहीं बिगाड़ सकता हो...
अगर तुम अपने शब्दों को सुनना मूर्खों द्वारा तोड़े मरोड़े जाने पर भी बर्दाश्त कर सकते हो और उनके कपट जाल में नहीं फंसते हो...
या उन चीजों को ध्वस्त होते देखते हो जिनको बनाने में तुमने अपना सारा जीवन लगा दिया और अपने थके हाथों से उन्हें फिर से बनाने के लिए उद्यत होते हो..
अगर तुम अपनी सारी उपलब्धियों का अंबार खड़ा कर उसे एक दांव लगाने का खतरा उठा सकते हो, हार होय की जीत...
और सब कुछ गंवा देने पर अपनी हानि के विषय में एक भी शब्द मुंह से न निकालते हुए उसे कण-कण प्राप्त करने के लिए पुनः सनद्ध हो जाते हो...
अगर तुम अपने दिल अपने दिमाग अपने पुट्ठों को फिर भी कर्म नियोजित होने को बाध्य हो सकते हो जबकि वे पूरी तरह थक टूट चुके हों...
जबकि तुम्हारे अंदर कुछ भी साबित न बचा हो...सिवाए तुम्हारे इच्छा बल के जो उनसे कह सके कि तुम्हें पीछे नहीं हटना है....
अगर तुम भीड़ में घूम सको मगर अपने गुणों को भीड़ में न खो जाने दो और सम्राटों के साथ उठो बैठो मगर जन साधारण का संपर्क न छोड़ो...
अगर तुम्हें प्रेम करने वाले मित्र और घृणा करने वाले शत्रु दोनों ही तुम्हे चोट नहीं पहुंचा सकते हों...
अगर तुम सब लोगों को लिहाज कर सको लेकिन एक सीमा के बाहर किसी का भी नहीं, अगर तुम क्षमाहीन काल के एक एक पल का हिसाब दे सको.....
.तो यह सारी पृथ्वी तुम्हारी है...
और हरेक वस्तु तो इस पृथ्वी पर है उस पर तुम्हारा हक है....
वत्स तुम सच्चे अर्थों में इंसान कहे जाओगे....
- रुडयार्ड किपलिंग ( यह कविता किपलिंग ने अंग्रेजी में लिखी है जिसका कवि हरिवंश राय बच्चन ने हिंदी में अनुवाद अपनी आत्मकथा में किया है....कविता मुझे अलग अलग समय में काफी प्रेरणा देती है...जीने का साहस देती है....)

Wednesday, 23 April 2008

ई आईपीएल सर्कस ह......( व्यंग्य)

.... के कहता कि सर्कस खत्म हो गईल बा.....अबो सर्कस देखे के मिल रहल बा...सरकस के जीवन दान दान देवे के काम कइले बा आईपीएल। अब ट्वेंटी ट्वेंटी क्रिकेट मैच देखे के बहाने सरकस देखल जा सकेला...इ सरकस मैदान में हो रहल बा...ए में क्रिकेट सिनेमा अउर राजनीति के सुमेल बा....सरकस के मैदान में शाहरुख खान सिटी बजावत लउक जालन...दुगो मैच जीतला के बाद उ कहेलें बा केहु हमरा से बड़ जादुगर...त उनका के चुनौती बड़ दिल वाली प्रीटि जिटा दे रहल बाड़ी...सरकस के उत्साह बढ़ावे खातिर राजनीति के मैदान से फुर्सत निकाल के कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी भी आपन बहिन अउर दामाद के लेके पहुंच जा रहल बाड़न...

आईपीएल सरकस में सबसे बड़ बात बा एके टिकट लेके मैदान में देखल जा सकेला...अगर टिकट नइखी ले सकत ता सोनी के सेटमैक्स चैनल पर भी देख सकत बानी....जब पुरान जमाना में सरकस देखे जात रही जां त ओमे कम कपड़ा पेन्ह के लइकी लोग बड़ा सुनर सुनर करतब देखावत रही जा...आईपीएल सरकस में भी लइकी लोग बड़ा मस्त मस्त अदा देखावत बाड़ी जा...जइसे जइसे चउका अउर छक्का लागेला ओइसे ओइसे मस्त अदा लोग देखा रहल बा...इस सब देख के बुढ़ पुरनिया आदमी के भी जीव जुड़ा जात बा....शाहरुख खान एतना नीक नीक लइकी एक आईपीएल सरकस में लेके आइल बाड़े की का बताई जां..दिल खुश हो जा रहल बा मैच देख के....केहु कहता कि एह से क्रिकेट के साथ अन्याय हो रहल बा...


लेकिन हम कहतानी की एह से सरकस के नया जीवन मिल रहल बा...हमार आईपीएल के आयोजक से गुजारिश बा कि आईपीएल के मैच( सरकस पढ़ी) के दौरान पिंजड़ा में शेर, बाघ, भालू भी लेके आईं जा....एह से लोग के दिल अउर खुश हो जाई मैच देख के....अब सेट मैक्स चैनल के भी देखीं उ आईपीएल मैच ( सरकस समझी) के परचार कइसे कर रहल बिया....टीवी पर बार बार एड आ रहल बा कि देखीं मनोरंजन के बाप.....सचमुच सिनेमा आ सरकस देख के पहिले लोग मनोरंजन करत रहे....पर अब मनोरंजन के साधन बदल गोइल बा....ई आईपीएल सरकस सचमुच मनोरंजन के बापे हउए....हम सेटमैक्स चैनल के भी बहुते शुक्रगुजार बानी...कि उ मनोरंजन के बाप ले के आइल बाड़न...

- विद्युत प्रकाश मौर्य

Monday, 21 April 2008

बढ़ रही है ब्लॉग पर हिंदी

हिंदी का प्रसार कंप्यूटर पर ब्लॉग में खूब हो रहा है। बड़ी संख्या में कंप्यूटर हिंदी का इस्तेमाल करने वाले लोग ब्लाग्स का इस्तेमाल करने लगे हैं। ब्लाग्स के कारण वर्ल्ड वाइड वेब पर हिंदी का प्रसार तेजी से हो रहा है। पूरी दुनिया में हिंदी जानने वाले लोग अब अपनों से संवाद स्थापित करने के लिए हिंदी में बने ब्लाग का सहारा ले रहे हैं।

 अगर आप अपने कंप्यूटर पर विंडो एक्सपी संस्करण का इस्तेमाल कर रहे हैं तो इसमें आप अपनी भाषा हिंदी को एक्टिवेट कर सकते हैं। इसके बाद गूगल सहित कई और साइटों पर जाकर अपने ब्लाग बना सकते हैं। इन ब्लाग पर आप अपनी मन की बात खुल कर कह सकते हैं। हिंदी के साहित्य प्रेमियों ने बड़ी संख्या में कंप्यूटर पर ऐसे ब्लाग का निर्माण कर रखा है जिस पर कविताएं कहानियां और संस्मरण आदि उपलब्ध हैं। इन्हें न सिर्फ आप खोल कर पढ़ सकते हैं बल्कि इनमें अपनी बातें जोड़ भी सकते हैं।
कंप्यूटर पर हिंदी को लोकप्रिय बनाने में ब्लाग की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। 

ब्लाग का मतलब है कि बिना किसी खर्च के आप इंटरनेट पर अपनी साइट बना सकते हैं। ब्लाग शब्द वेब लाग से मिल कर बना है। गूगल डाट की ब्लाग साइट का पता है www.blogger.comआप इस साइट पर जाकर अपने लिए नए ब्लाग का निर्माण कर सकते हैं। या फिर मौजूदा ब्लाग में जाकर कुछ भी खोज सकते हैं। गूगल की ब्लाग साइट आपको हिंदी में अपनी बात लिखने का मौका देती है। आप www.wordpress.com पर भी ब्लाग बना सकते हैं।

आप अपने विचार, लेख, कविता कहानी कुछ भी अपने ब्लाग पर जारी कर सकते हैं। इस तरह के ब्लाग को आप कुछ लोगों के साथ मिलकर शेयर भी कर सकते हैं। इसमें सभी सदस्य अपनी अपनी इंट्री को समय समय पर इंटरनेट पर जारी कर सकते हैं। कुछ लोगों ने तो अपना पारिवारिक ब्लाग बना रखा है। जैसे आप कहीं घूमने गए तो उसके संस्मरण और उससे संबंधित फोटोग्राफ को अपने ब्लाग पर जारी कर दें। अपने मित्रों और रिश्तेदारों को अपना ब्लाग पता बताएं वे जाकर सबकुछ देख सकते हैं। कोई चाहे तो तस्वीरों को डाऊनलोड भी कर सकता है।

कई लेखक अपने विचारों और लेखों को भी अपने ब्लाग पर जारी करने लगे हैं। एक तरह के विचार के लोगों को आपसी चर्चा करने के लिए ब्लाग बहुत अच्छा माध्यम बन गए हैं। आपके विचार चाहे कितने भी लंबे क्यों न हों आप उन्हें ब्लाग पर जारी कर सकते हैं। यहां तक कि इंटरनेट पर हास्य व्यंग्य और अश्लील विचारों वाले ब्लाग भी लोगों ने बनाने आरंभ कर दिए हैं। पर किसी भी तरह के विचार रखने वाले छोटे समूहों के लिए ब्लाग आशा की किरण हैं। आपका लेख कोई अखबार नहीं छापता हो, कोई संपादक आपकी चिट्ठी नहीं छापता है तो आप उसे ब्लाग पर जो जारी कर ही सकते हैं।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य