Monday, 23 February 2009

सोना कितना सोना है

सोना खरीदना और पहनना है भारत के लोगों का प्रिय शगल है। सदियों से सोना खरीदने पहनने और उसे बुरे दिनों के लिए संभालकर रखने की भारत के लोगों की मानसिकता है। पर क्या आपको मालूम है कि आपके पास जो सोना है वास्तव में वह कितना खरा है। क्या आपके खानदानी सुनार ने आपको अगर कोई सोने का गहना 22 कैरेट का कहकर दिया है तो वास्तव में वह 22 कैरेट ही है। आप अपनी कमाई का बहुच बड़ा हिस्सा सोना खरीदने पर लगाते हैं तो आपको इसकी शुद्धता को लेकर जागरुक होना ही चाहिए।


नब्बे फीसदी तक अशुद्ध- आपको यह जानकर अचरज होगा कि सरकार की जांच में पाया गया है कि जो सोना आप खरीदते हैं वह 90 फीसदी तक अशुद्ध हो सकता है। भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा किए गए एक सर्वे में पाया गया है कि देश के अधिकांश हिस्सो में ज्वेलरों द्वारा बेचा जाने वाला सोना शुद्धता के पैमाने पर खरा नहीं उतरता है। कई शहरों में 20 से 30 फीसदी तो कई शहरों में 90 फीसदी तक सोना अशुद्ध पाया गया है। अगर आप किसी सुनार से कोई गहना बनवाते हैं तो वह आपको 22 कैरेट कहकर कोई स्वर्ण आभूषण देता है तो वह कुछ सालों बाद उतनी मात्रा में सोना वापस लेने की गारंटी देता है। यह गारंटी कोई वास्तविक गारंटी नहीं है। अगर एक सुनार का बेचा हुआ सोना किसी दूसरे शहर का भी सुनार उतनी ही शुद्धता बताकर खरीद ले तब उसे ईमानदार सौदा माना जा सकता है। पर अधिकांश सुनार बेइमान का कारोबार सदियों से करते आ रहे हैं।
कैसी हो सोने की शुद्धता - सोना 24 कैरेट में अपने शुद्ध फार्म में माना जाता है। पर बिल्कुल शुद्ध सोना में कोई गहना नहीं बनाया जा सकता है। इसलिए उसमें कुछ फीसदी चांदी, तांबा या जिंक मिलाया जाता है। इस मिलावट के स्तर को कैरेट में मापते हैं। इसको आम भाषा में यूं समझा जाए कि किसी चीज को 24 हिस्से में बांट दिया गया तो अगर इसमें एक हिस्सा मिलावट है तो वह 23 कैरेट का सोना होगा। अगर इसे फीसदी में देखें तो 95.80 फीसदी शुद्धता होनी चाहिए। इसी तरह 22 कैरेट की शुद्धता 91.60 फीसदी होनी चाहिए।
21 कैरेट मे 87.50 फीसदी शुद्धता होनी चाहिए। इसी तरह 18 कैरेट में 75.00 फीसदी शुद्धता यानी इतना हिस्सा सोना होना चाहिए। 14 कैरेट के आभूषण में सोना 58.50 फीसदी और 9 कैरेट मे 37.50 फीसदी सोने का हिस्सा होना चाहिए। इसलिए जब कभी आप सोना खरीदें तो उसकी शुद्धता के प्रति जरूर आश्वस्त हो लें। नहीं तो आप 22 कैरेट के नाम पर 16 से 17 कैरेट के आभूषण खरीदकर कर बेवकूफ बन सकते हैं।

कैसे मापी जाए शुद्धता- परंपरागत तौर पर सुनार कसौटी पर सोना को मापते हैं। यह तरीका पूरी तरह मानक नहीं है और इसमें ठगे जाने की भी संभावना ज्यादा है। अब सोने की जांच के लिए कई नए तरीके आ गए हैं। सबसे लोकप्रिय तरीका कैरेटोमीटर का है। पर अधिकांश सुनार कैरेटो मीटर नहीं लगाते हैं क्योंकि वे आपको शुद्ध सोना नहीं बेचना चाहते। अधिकांश सोना खरीदने वाले उपभोक्ताओं को कैरट के बारे में भी सही जानकारी नहीं होती।

सोने का कारोबार करने वाली टाटा समूह की कंपनी तानिष्क ने अपने देश भर के शो रूम में कैरेटो मीटर लगा रखा है। वहां आप कहीं और से भी खरीदे गए सोने की जांच करवा सकते हैं। वहीं आप तानिष्क से खरीदे जाने वाले सोने की शुद्धता की भी जांच कर सकते हैं। कैरेटो मीटर एक्सरे सिद्धांत पर काम करता है। यह सोने में मिलावट के स्तर को काफी शुद्धता से पकड़ लेता है।


आप खरा सोना ही खरीदें इसके लिए भारतीय मानक ब्यूरो ने शुद्ध सोने के ऊपर हालमार्क की व्यवस्था बनाई है। यह व्यवस्था सोने के खरीद फरोख्त में उपभोक्ता के साथ हो रही ठगी से निजात दिलाने के लिए की गई है। जैसे खाने पीने की वस्तुओं में एग मार्क की व्यवस्था है उसी तरह सोने की खरीद मे हालमार्क की व्यवस्था की जा रही है। सोने की हालमार्किंग के लिए देश भर मे लैब की स्थापना की गई है। वहीं आने वाले समय में तेजी से और भी लैब की स्थापना की जा रही है। सरकार चाहती है कि देश में 2008 के बाद सिर्फ हालमार्क किया हुआ सोना ही बेचा जाए। लगभग सभी प्रमुख शहरों में इस तरह की व्यवस्था आने वाले समय में लागू कर दी जाएगी। इसके लिए सरकार उपभोक्ताओं को बीच जागरुकता अभियान भी चला रही है। उपभोक्ताओं में जागरुकता को देखते हुए कई बड़े शहरों के ज्वेलरों ने हालमार्क किया हुआ सोना बेचना आरंभ भी कर दिया है। हालमार्क किया हुआ सोना थोड़ा महंगा हो सकता है पर सस्ते के चक्कर में अशुद्ध सोना खरीदना समझदारी नहीं है। अगर आप कम कीमत में ही गहने बनवाना चाहते हैं तो 18 कैरेट या 14 कैरेट में बने गहने खरीद सकते हैं। यहां तक की आप 9 कैरेट के गहने भी खऱीद सकते हैं। पर सोना जांच करवाकर ही खऱीदे हैं।
एमएमटीसी लि. - भारत सरकार की संस्था एमएमटीसी लि. सोने का कारोबार करती है। आमतौर पर विदेशी बाजार से सारा सोना एमएमटीसी के द्वारा ही भारत में आता है। एमएमटीसी खुद भी हालमार्क ज्वेलरी अपने शो रूम अथवा फ्रेंजाइजी के द्वारा बेचती है। एमएमटीसी ने सांची नाम से देश के प्रमुख शहरों में अपने शो रूम खोले हैं जहां सोने व चांदी के आभूषण खरीदे जा सकते हैं। एमएमटीसी के जिम्मे ही देश भर में सोने की शुद्धता के जांच के लिए हालमार्किंग लैब बनवाने की भी जिम्मेवारी है। इसलिए जब कभी आप सोना खरीदने की बात करें तो अपने ज्वेलर के हालमार्क की मांग जरूर करें। अगर वह कहता है कि हालमार्क किया हुआ आभूषण समान्य आभूषण से महंगा आ रहा है तो भी आप हां कहें। जिस गहने पर हालमार्क लगा हो उस पर हालमार्क का निशान उसकी शुद्धता का प्रतिशत और निर्माण का साल और निर्माता का कोड नंबर हैंड लेंस की सहायता से देखा जा सकता है। इसलिए इसको लेकर हमेशा जागरुक रहें।
कितने कैरेट का सोना खरीदें- कोई जरूरी नहीं है कि 23 या 24 कैरेट का सोना ही खरीदा जाए। आप कम मात्रा वाला भी ले सकते हैं। 23 कैरेट के आभूषण में लगभग 4 फीसदी मिलावट होती है। 24 कैरेट में डिजाइनर आभूषणों का निर्माण संभव नहीं है। भारत में लोगों में 22 कैरेट का सोना खरीदने की सर्वाधिक परंपरा है। 22 कैरेट यानी 91.60 फीसदी शुद्धता। पर कोई भी परंपरागत सुनार इतनी शुद्धता नहीं देता। आप 22 कैरेट के नाम पर 18 से 21 कैरेट का सोना खरीदें इससे तो अच्छा है कि आप सोचसमझकर 18 कैरेट ही खरीदें। इसकी कीमत 22 कैरेट से 15 फीसदी तक कम हो सकती है। वैसे दुनिया के कुछ प्रमुख सोना विशेषज्ञों का मानना है कि गहने हमेशा 18 कैरेट में ही बनवाना चाहिए। 18 कैरेट में गहने बनवाना सुविधाजनक है साथ ही 18 कैरेट का गहना 22 कैरेट की तुलना में मजबूत होता है। इससे टूटने की संभावना कम रहती है यानी यह लंबे समय तक चलेगा। अगर आप सिर्फ संभालकर रखने के लिए सोना खरीदना चाहते हैं 24 कैरेट का सोने का सिक्का खरीद सकते हैं। आजकल कई बैंक भी गारंटी के साथ ऐसा सोना बेच रहे हैं। यह 5 10 ग्राम में उपलब्ध है।
- vidyutp@gmail.com

Monday, 16 February 2009

फ्लाई ओवर का शहर दिल्ली

कुछ दिन में दिल्ली को फ्लाई ओवरों के शहर के रुप में याद किया जाएगा। अगर आपने दससाल पहले दिल्ली की यात्रा की हो, और अब जाएं तो दिल्ली आपको काफी बदली हुई नजर आएगी। दो दशक पहले की दिल्ली का मतलब यह होता था कि लाल बत्ती और हरी बत्ती का शहर। अगर लाल बत्ती हो तो जिंदगी ठहरी हुई है। अगर हरी बत्ती हो तो जिंदगी चल पड़ी। कितनी कहानियां और व्यंग्य रचनाएं इस लाल बत्ती और हरी बत्ती पर लिखी गई हैं। रफ्तार चाहने वाले लोगों के लिए लाल बत्ती बहुत बड़ा संकट थी। अगर आप दिल्ली में किसी से मिलने जाते हों तो न जाने कितने चौराहों पर आपको यह इंतजार करना पड़ता था कि कब हरी बत्ती होगी और आप चल पाएंगे।
दिन लदे गोल चक्कर के - इस लाल बत्ती खत्म करने के लिए बड़े चौराहों पर राउंड एबाउट की परिकल्पना को स्वरुप प्रदान किया गया। इसमें गर चौक पर एक गोल चक्कर होता है। इस गोल चक्कर में घूमते हुए आप अपने लेन का चयन कर लेते हैं। इसमें लाल बत्ती तो नहीं मिलती। पर इस राउंड एबाउट का लोगों को सही तरीक से इस्तेमाल करना नहीं आया। इसका परिणाम हुआ कि गोल चक्कर पर काफी एक्सीडेंट की घटनाएं सुनने को मिलने लगीं।
फ्लाईओवर या भूल भुलैय्या - अब बढ़ते ट्रैफिक के दबाव के कारण दिल्ली में फ्लाई ओवर बनाए जाने का सिलसिला जारी है। दिल्ली में 50 किलोमीटर के रिंग रोड पर लगभग हर चौराहे पर फ्लाई ओवर बनाए जा रहे हैं जिससे वहां कभी रेडलाइट की स्थिति न हो और ट्रैफिक निर्बाध गति से चलता रहे। अगर आप रिंग रोड पर चलें तो आजादपुर, वजीरपुर डिपो, पीतमपुरा, ब्रिटानिया, पंजाबी बाग, राजा गार्डन, राजौरी गार्डन, नारायणा, धौलाकुआं, मोतीबाग, सफदरजंग, मेडिकल, आश्रम आदि में सब जगह आपको फ्लाई ओवर मिलेंगे। दिल्ली में धौला कुआं और मेडिकल के फ्लाई ओवर तो काफी कलात्मक ढंग से बनाए गए हैं। ये इतने घुमावदार हैं कि किसी नए व्यक्ति के लिए यह समझना बहुत मुश्किल होगा कि उसे किधर जाने के लिए कौन सा लेन चयन करना चाहिए। यहां तक सालों से दिल्ली में ही रहने वालों के लिए ये फ्लाई ओवर भूलभूलैया जैसे साबित हो रहे हैं।

दिल्ली को 2010 में होने वाले राष्ट्र मंडल खेलों के लिए तैयार करने के लिए शहर के ट्रैफिक को बेहतर बनाने की कवायद की जा रही है। इसी के तहत फ्लाईओवर और अंडर पास बनाए जा रहे हैं। इससे पूर्व भारत में बेंगलूर शहर की सड़कों को बेहतर बनाया गया है। वहां पर चौक पर फ्लाईओवर और अंडरपास बनाए गए हैं। निश्चय ही फ्लाईओवर से समय की बचत होती है। साथ ही घंटो प्रदूषित वातावरण में रहने से छुट्टी मिल जाती है।
पदयात्रियों का भी रखे ख्याल - हां इन फ्लाईओवरों ने पैदल चलने वालों के लिए मुश्किल खड़ी जरूर की है। कई जगह सड़क पार करने के लिए आधे किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है। इससे सड़क पार करना मुश्किल हो गया है। रेडलाइट नहीं होने के कारण सड़कों पर अब हमेशा तेज गति से वाहन चलते रहते हैं। इसलिए जितनी बड़ी संख्या में फ्लाई ओवर बन रहे हैं उसी अनुपात में पैदल पार पथ भी बनाए जाने चाहिएं। इससे सड़क पार करने वालों को सुविधा हो सकेगी। साथ ही हर फ्लाईओवर के आसपास कौन सी लेन किसमें जाकर मिल रही है इसकी सूचना सही ढंग से लिखी होनी चाहिए। ऐसा नहीं होने से कई लोगों को भ्रमित होना पड़ता है।
- विद्युत प्रकाश मौर्य




Monday, 9 February 2009

कैसा हो बॉस का व्यवहार

दफ्तर में बॉस का व्यवहार कैसा हो इस पर ही काफी हद तक दफ्तर के कर्मचारियों की कार्यक्षमा निर्भऱ करती है। इसलिए आजकल मानव संसाधन के तहत बास को भी प्रशिक्षण दिया जा रहा है कि वे दफ्तर में अपने मातहत काम करने वाले लोगों के साथ कैसा व्यवहार करें। अगर बास हर बात पर गुस्सा करता हो आंखे चढ़ाता हो तो इसका बुरा प्रभाव उसके अधीन काम करने वाले लोगों पर पड़ता है। इसलिए अब इस बात की जरूरत बड़ी शिद्दत से महसूस की जा रही है कि बास का व्यवहार थोड़ा सा विनोदी होना चाहिए। साथ ही उसे अपने जूनियर लोगों के साथ मित्रवत व्यवहार करना चाहिए।


विनोदी चरित्र - चाहे कितना गंभीर मामला हो उसे बड़े ही आत्मीय और हल्के-फुल्के वातावरण में कहा सुना जा सकता है। इसका सामने वाले पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। एक दार्शनिक ने कहा है कि मनुष्य के लिए विपत्ति का सामना करने के लिए मुस्कान से बढ़कर कोई अस्त्र नहीं है। ऐसे में गंभीर बातों के बीच भी थोड़ी विनोद की फुलझड़ी छोड़ना जरूरी होता है। इससे आपके साथ बैठे लोगों का तनाव कम होता है। लोग ऐसे में अपनी बातें खुलकर रख पाते हैं। इसलिए हमेशा कड़क व्यवहार छोड़कर बॉस को कभी कभी विनोद भी करना चाहिए।
बॉस को भी ट्रेनिंग- अब कई दफ्तरों में बास को भी ट्रेनिंग दी जा रही है। ट्रेनिंग इस बात की कि वे अपने मुलाजिमों से कैसा व्यवहार करें। आज प्रतिस्पर्धा का दौर है। ऐसे में हर काबिल कर्मचारी के पास कई विकल्प होते हैं। अगर बास का व्यवहार लगातार परेशान करने वाला हो तो कई कर्मचारी नौकरी छोड़कर दूसरी नौकरी ढूंढने में लगे रहते हैं। अगर कई लोग किसी दफ्तर से नौकरी छोड़कर चले जाएं तो इससे उस बास की बदनामी होती है। प्रबंधन की नजर में बास का रिपुटेशन खराब होता है। इसलिए अब हर बास को चिंता करनी चाहिए कि उसका व्यवहार अपने जूनियरों के प्रति अच्छा हो।
छुट्टी देने में आनाकानी- अक्सर बास अपने मुलाजिमों को छुट्टी देने में आनाकानी करते हैं। अगर कोई वाजिब कारण हो तो भी जल्दी छुट्टी पास नहीं करते। इससे कई घाटा होता है। कई बार कर्मचारी झूठ बोलकर छुट्टी लेना चाहता है। कई बार वाजिब काम के लिए छुट्टी नहीं मिलने पर कर्माचारियों में तनाव बढ़ता है। हमने सेना की कई ऐसी खबरें पढ़ी हैं जिसमें सैनिक छुट्टी नहीं मिलने पर अपने साथियों की या अधिकारी ही हत्या कर देता है। इसलिए बास को हमेशा वाजिब कारण होने पर अपने मुलाजिम को छुट्टी दे देनी चाहिए। हां बास को चाहिए कि वह अपने कर्माचारियों को इस बात के लिए जिम्मेवार बनाए कि उसके नहीं रहने पर दफ्तर में कैसे काम चलेगा इसके लिए अपने साथियों को प्रशिक्षित करें।
इंटरैक्टिव प्रोग्राम करें- कई दफ्तरों में सभी कर्मचारियों और बास के बीच अच्छा तालमेल बनाए रखने के लिए इंटरैक्टिव कार्यक्रम कराए जाते हैं। इसका अच्छा प्रभाव पड़ता है। इसके तहत पिकनिक पर ले जाना, अंत्याक्षरी जैसे प्रोग्राम आयोजित करना। बास की ओर से अपने कर्मचारियों के लिए लंच देना और लंच के दौरान ही दफ्तर की बैठक कर लेना। कर्मचारियों से उनके निजी और परिवार के बारे में जानकारी लेना आदि अच्छे बॉस के लक्षण हैं। कभी कभी हर बॉस को अपने आप से पूछना चाहिए कि क्या वह अपने कर्मचारियों से अच्छा व्यवहार करता है।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य



Monday, 2 February 2009

ओरकुट बनाम लोकप्रियता और प्रतिबंध

दिल्ली के प्रमुख विश्वविद्यालय जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय और दिल्ली विवि ने गूगल के लोकप्रिय साइट ओरकुट पर प्रतिबंध लगा दिया है। इन यूनिवर्सिटियों में ओरकुट की वेबसाइट चलाने से काफी परेशानी आ रही थी। इससे नेटवर्क से जुड़े सारे कंप्यूटर धीमी गति से चलने लगते थे। ओरकुट कंप्यूटर पर चलने के दौरान ज्यादा स्पेश लेता है। यानी वह कंप्यूटर के रैम में ज्यादा जगह एक्वाएर करता है।


वास्तव में इंटरनेट पर सोशल नेटवर्किंग एक बड़े लोकप्रिय समाधान के रुप में उभर कर आया है। यह एक आभासी दुनिया का सृजन करता है जहां जाकर आप अपने लिए दोस्तों की तलाश कर सकते हैं। किसी जमाने में ऐसे दोस्त ढूंढना दुस्कर कार्य था। लोग पत्रमित्रता किया करते थे। अब दोस्ती करने का इंस्टेट तरीका बनकर उभरा है इंटरनेट। यहां आकर आप अपने विचारों से मिलते जुलते या जाति समाज से जुड़े हुए लोगों का समूह बना सकते हैं। यह पत्रमित्रता की तुलना में ज्यादा फास्ट तरीका है। इसमें आपका दोस्त दुनिया के किसी भी कोने में बैठा हुआ हो सकता है। इंटरनेट पर इस दोस्ती से काफी फायदे हो रहे हैं। कई लोग दोस्ती और बाद में शादी कर रहे हैं तो कई लोग अपने प्रोफेशन के लोगों से दोस्ती करके अपने कैरियर को भी संवार रहे हैं।
इंटरनेट पर ऐसे समूह के रुप में याहू ग्रूप काफी लोकप्रिय है। याहू के इमेल यूजर अपने विचारों से जु़ड़े हुए समूह का निर्माण कर सकते हैं। जैसे लाइब्रेरी साइंस पढ़ने वालों का समूह, पत्रकारों का समूह, किसी खास जाति बिरादरी के लोगों को समूह या फिर किसी खास विचार धारा के लोगों का समूह बनाया जा सकता है। हो सकता है आपकी विचार धारा के लोग दुनिया भर में कुछ सौ ही हों तो भी ऐसे लोग एक खास मंच पर एकत्र हो सकते हैं। आप अपने विचारों से जुड़े हुए समूह को इंटरनेट पर जाकर ढूंढ भी सकते हैं। याहू के ग्रुप के बाद गूगल ने इसी तरह के समूह ओरकुट को कुछ साल पहले ही लांच किया है। यह समूह दुनिया भर में तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। छात्र और शिक्षक भी बड़ी संख्या में इस समूह के सदस्य हैं।
डीयू और जेएनयू में इस समूह के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगने से वहां के छात्रों और शिक्षकों को परेशानी भी है। उनकी सोशल नेटवर्किंग को लगाम लग गई है। कोई भी संस्थान जब अपने सदस्यों को इंटरनेट के उपयोग करने की छूट देता है तो वह टर्मिनल पर कुछ भी करने की इजाजत नहीं दे सकता है। अगर सारे लोगों को ओरकुट खोलने से सिस्टम बाधित होता है तो ऐसे में संस्थान को कोई न कोई एहितयाती कदम तो उठाने ही पड़ेंगें। आजकल कई ऐसी वेबसाइट आ रही हैं जो उपयोग करने के दौरान ज्यादा जगह लेती हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के कंप्यूटर सेंटर ने कई और वेबसाइटों को भी ब्लाक किया है। इसमें लोकप्रिय साइट यूट्यूब भी शामिल है। यू ट्यूब पर लोग अपने वीडियो जारी कर देते हैं। इन वीडियो को देखने में भी इंटरनेट कनेक्शन के ज्यादा बैंडविड्थ का इस्तेमाल होता है।
जेएनयू प्रशासन के अनुसार ओरकुट के इस्तेमाल से उन लोगों को परेशानी हो रही थी जो अपने शोध प्रबंधों पर काम कर रहे हैं। उनकी स्पीड कम हो जाती थी। हालांकि ओरकुट के इस्तेमाल करने वालों का दावा है कि यह साइट उनके अध्ययन में भी उपयोगी है क्योंकि इससे वे लोग अपने समान विचारधारा और पढ़ाई करने वालों के साथ विचारों का आदान प्रदान करते हैं।
-vidyutp@gmail.com 




Sunday, 25 January 2009

मोबाइल रखिए, सब कुछ जाइए भूल

अगर आपके पास मोबाइल फोन है तो कई चीजें साथ रखने की जरूरत अब नहीं होनी चाहिए। घड़ी, अलार्म घड़ी, फोन डायरी, आर्गनाइजर, कैलकुलेटर जैसी कई चीजें एक ही जगह अब समाहित हो चुकी हैं। ये सुविधाएं हर सस्ते मोबाइल हैंडसेट में भी उपलब्ध है।
घड़ी- जैसे हर मोबाइल में घड़ी होती है तो फिर अलग से कलाई घड़ी बांधने की क्या जरूरत है। साठ फीसदी मोबाइल रखने वाले लोगों ने घड़ी बांधना छोड़ दिया है। समय देखना है तो मोबाइल की स्क्रीन को देख लिजिए। यहां तक की घड़ियों के बाजार में घड़ी की बिक्री पर भी असर पड़ा है। अब कई समझदार लोग घड़ी नहीं खरीदना चाहते उनका मोबाइल स्क्रीन समय और तारीख भी बताता है।
अलार्म घड़ी- अभी तक अगर आपको जगना हो तो अलार्म लगाने के लिए अलग से एक अलार्म घड़ी रखनी पड़ती थी क्योंकि कलाई घड़ी में आमतौर पर अलार्म नहीं होता पर अब मोबाइल फोन में ही आप जब चाहें अलार्म लगा सकते हैं। कई फोन में एक बार के लिए व रिपीट अलार्म लगाने की सुविधा भी मौजूद है।
फोन डायरी - इसी तरह जेब में अलग से फोन डायरी रखने की भी जरूरत नहीं है। आपके मोबाइल में अब आमतौर पर 300 से लेकर 2000 लोगों तक के नाम पते सुरक्षित किए जा सकते हैं। फिर अलग से डायरी रखने की क्या जरूरत है। हां अपने मोबाइल में सेव किए गए नाम पते को सुरक्षा के लिए आप घर में किसी डायरी में भी लिख कर रखें तो बहुत अच्छी बात होगी।
कैलकुलेटर- पहले जहां आपको इलेक्ट्रानिक कालकुलेटर के लिए अलग से एक बड़ा डिब्बा लेकर चलना पड़ता होगा। पर आजकल लगभग हर मोबाइल में कालकुलेटर का विकल्प होता ही है। आप इसमें समान्य कालकुलेटर वाले सारे काम ले सकते हैं। हां साइंटफिक या विशेष कालकुलेटर इसमें नहीं होते। पर गाहे बगाहे जरूरत पड़ने वाले कालकुलेशन इसमें किए जा सकते हैं।
आरगनाइजर- आपको कब कहां जाना यह याद दिलाने के लिए आपका मोबाइल एक सचिव की भूमिका भी निभाता है। मोबाइल फोन ने डिजिटल आरगनाइजर का बाजार भी लगभग खत्म कर दिया है। पहले लोग खास तौर पर फोन बुक के लिए और अपने एपवाइंटमेंट याद रखने के लिए जेब में एक डिजिटल आरगाइजर लेकर चला करते थे पर अब यह सब कुछ मोबाइल में ही संभव है। विपिन बजाज एक एंश्योरेंस एडवाइजर हैं जो अपने सारे एप्वाइंटमेंट और किस दिन कौन सा काम करना यह याद करने के लिए फटाफट उसे मोबाइल में ही फीड कर लेते हैं। उनका फोन उस समय काम की याद दिला देता है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि अगर एक समान्य सा मोबाइल लिया जाए जिसमें कैमरा, एफएम रेडियो आदि न भी हो तो भी वह आपके कई तरह के काम आता है। अब लोग अपने शौक पूरे करने के लिए कैमरा, रेडियो, जीपीआरएस, इन्फ्रारेड अथवा गाने सुनने की सुविधा वाले सेट ढूंढते हैं। पर अगर इतना सब कुछ न हो तो भी दो से तीन हजार रुपए के हैंडसेट में भी कई तरह की सुविधाएं मौजूद है। अब रंगीन हैंडसेट भी तीन हजार से कम में आरंभ होने लगे हैं। आप जब मोबाइल खरीदने की योजना बना रहे हों तो यह देख लें की बातें करने के अलावा आपकी जरूरतें और क्या क्या हैं। इसके बाद ही कोई हैंडसेट खरीदें। हालांकि अब विदेशों में लोगों में ढेर सारी सुविधाओं वाले हैंडसेट का खुमार उतर रहा है। लोग अब साधारण हैंडसेट की ओर आकर्षित हो रहे हैं।
 माधवी रंजना madhavi.ranjana@gmail.com



Saturday, 17 January 2009

फ्री में भी उपलब्ध हैं साफ्टवेयर

अगर माइक्रोसाफ्टर और एडोब जैसी कंपनियां लोगों को अपने साफ्टवेयर खरीदकर उपयोग करने के लिए प्रेरित कर रही हैं तो आपके पास दूसरी और फ्री में साफ्टवेयर लेकर इस्तेमाल करने का विकल्प खुला हुआ है। अगर आप साफ्टवेयर खरीदने पर रुपया नहीं खर्च करना चाहते हैं तो कोई बात नहीं आप इसके विकल्प ढूंढ सकते हैं। निश्चय की कंप्यूटर पर पूरी दुनिया में काम किए जाने वाले माध्यम के रुप में माइक्रोसाफ्ट का विंडोज लोकप्रिय है। पर अब विंडो का पूरा जोर लोगों असली साफ्टवेयर खरीद कर उपयोग करवाने पर है। ऐसे में आपके पास फ्री माध्यम के रुप में लाइनेक्स का विकल्प मौजूद है। दुनिया में ऐसे लोगों की एक बड़ी फौज मौजूद है जो लगातार शोध कर हर तरह के साफ्टवेयर फ्री में उपलब्ध कराने पर लगे है। उनका काम लोगों द्वारा दिए जाने वाले चंदे से चलता है।

विंडो का जवाब है लाइनेक्स - आपको यह जानकर अचरज होगा कि कंप्यूटर सर्वर के लिए लाइनेक्स साफ्टवेयर मुफीद है। दुनिया के 25फीसदी सर्वर लाइनेक्स पर ही चल रहे हैं। वहीं डेस्कटाप पीसी में यह आंकड़ा महज 2.8 फीसदी का है। यह कम इसलिए है कि मुफ्त में उपलब्ध होने के कारण इसका प्रचार तंत्र कमजोर है। पर आईबीएम, डेल और एचपी जैसे कंप्यूटर निर्माताओं को लाइनेक्स के साथ करार है। वे अपने कंप्यूटर के साथ लाइनेक्स उपभोक्ताओं को लोड करके देते हैं। जैसे जैसे विंडो अपनी पाइरेसी पर रोक लगाकर लोगों को साफ्टवेयर खरीदने को मजबूर करेगा लोग दुनिया भर में लाइनेक्स की ओर शिफ्ट करेंगे।
शौक बन गया नजीर- लाइनेक्स़ की खोज फिनलैंड के शहर हेलंसिकी के एक छात्र ने शौकिया तौर पर की थी, पर यह बाद में नजीर बन गया। 25 अगस्त 1991 को कंप्यूटर छात्र लाइनेक्स ट्रावोल्ड ने इस साफ्टवेयर की नींव रखी। बाद में इस अभियान से काफी लोग जुड़ते चले गए।

वर्ड प्रोसेसर भी फ्री में - सिर्फ काम करने का माध्यम ही नहीं कई वर्ड प्रोसेसर साफ्टवेयर भी फ्री में उपलब्ध हैं। अब बाजार में माइक्रोसाफ्ट आफिस का विकल्प ओपन आफिस के रुप में उपलब्ध है। इसे दुनिया की सभी प्रमुख भाषाओं में डाउनलोड किया जा सकता है। खासतौर पर यह विंडो एक्सपी और उपर के माध्यम में बेहतर ढंग से काम भी करता है। अगर आप इंटरनेट इस्तेमाल के लिए भी किसी विकल्प की तलाश में है तो वहां भी निराशा नहीं मिलेगी। इंटरनेट एक्सप्लोरर का विकल्प फायरफाक्स के रुप में उपलब्ध है। फायरफाक्स ने तो इंटरनेट एक्सप्लोरर के लेटेस्ट वर्जन का जवाब भी पेश कर दिया है। अगर आप मुफ्त में इन्साइक्लोपाडिया देखना चाहते हैं तो आपके पास वीकिपीडिया की वेबसाइट उपलब्ध है। यानी हर खरीदी जाने वाली चीज का कोई न कोई मुफ्त विकल्प भी मौजूद है।

कैसे चलता है कारोबार - फ्री साफ्टवेयर उपलब्ध कराने का बीड़ा कुछ उत्साही कंप्यूटर के जानकारों ने उठाया है। इन सभी साफ्टवेयरों को इंटरनेट से डाउनलोड किया जा सकता है। या फिर आप वेबसाइट पर जाकर सीडी अनुरोध कर सकते हैं। आप इनके फ्री वितरण के नेटवर्क में शामिल भी हो सकते हैं। इन साफ्टवेयरों का विकास दुनिया भर के लोगों सो प्राप्त होने वाले चंदे से होता है। अगर आप समर्थ हैं तो उन्हें चंदा दे सकते हैं। अगर नहीं दे सकते हैं तो भी आप फ्री में उनके द्वारा विकसित साफ्टवेयर का इस्तेमाल तो कर ही सकते हैं।
विद्युत प्रकाश vidyutp@gmail.com


Friday, 9 January 2009

एंकरिंग के साथ अभिनय भी..

टीवी पर एक नई परंपरा चल पड़ी है अभिनय के साथ एंकरिंग करने की। खासकर समाचार चैनलों पर अपराध पर आधारित कार्यक्रमों में आप इसे बखूबी देख सकते हैं। अभी हाल में चैनल-7 ने अपने सभी कार्यक्रमों को रीलांच किया है। 
इसी क्रम में उसका अपराध पर आधारित कार्यक्रम क्रिमिनल में एंकर पुराने जमाने की अभिनेत्री नादिरा को कापी करते हुए अपराध की खबरें परोसती हुई नजर आ रही है। इसमें वह लाल रंग की स्लीवलेस ब्लाउज में नजर आती है। खबरें परोसने के साथ ही वह खास अंदाज में अपनी जुल्फों को झटकती है। कई बार वह एंकर कम विष कन्या अधिक नजर आती है। यह सब कुछ अपराध पर आधारित कार्यक्रमों को बेचने के लिए किया रहा है। समाचार चैनलों में क्राइम को बेचने के लिए बड़ी रोचक प्रतिस्पर्धा चल पड़ी है। इसकी शुरुआत हालांकि जी न्यूज और स्टार न्यूज जैसे चैनलों ने की। जी न्यूज ने चैन से जीना है तो जाग जाइए पंच लाइन के साथ अपना अपराध कार्यक्रम आरंभ किया। यह कार्यक्रम अपराध की खबरें परोसने के साथ आपको डराता भी था। इसके बाद स्टार न्यूज का कार्यक्रम सनसनी आया। इसके एंकर श्रीवर्धन त्रिवेदी अभिनय करते हुए खबरें पेश करते हैं। यानी अपराध की खबरें अपराधी के अंदाज में ही। वे स्क्रीन पर न्यूज एंकर कम अभिनेता ज्यादा नजर आते हैं। हालांकि उनका अभिनय सिर्फ बोलने के अंदाज में होता है। वे चेहरे पर कोई मेकअप नहीं करते या परिवेश में कोई बदलाव नहीं किया जाता है।
यहां तक तो ठीक था पर अब इंडिया टीवी और चैनल-7 ने नए किस्म के बदलाव किए हैं। इसके तहत अब क्राइम प्रोग्राम के लिए खासतरह का सेट डिजाइन किया गया है। इंडिया टीवी का प्रोग्राम है एसीपी अर्जुन। इसमें एंकर एक पुलिस अधिकारी की वेशभूषा में आता है। उसके हाथ में रुल भी होता है सिर पर टोपी भी। वह सभी अपराध की खबरों को पुलिसिया अंदाज में पेश करता है। वह एफआईआर की भाषा में देश भर में हो रहे अपराध की खबर लेता है। उसके संवाददाता भी कुछ इसी अंदाज में उसे रिपोर्ट करते हैं। यह खबरों की प्रस्तुति का नाटकीयकरण है। एक बारगी किसी नए आदमी के लिए यह समझना मुश्किल हो जाए कि वह कोई समाचार चैनल देख रहा है या कोई मनोरंजन चैनल पर क्राइम धारावाहिक।

ठीक इसी तरह चैनल-7 ने शुरू किया है क्रिमिनल। आपके ड्राइंग रुम, घर, बाथरुम या दफ्तर कहीं भी हो सकता है क्रिमिनल। इस तरह की पंचलाइन आपको आतंकित करने के लिए काफी है। उसके बाद की दास्तान को बड़े ही रोमांटिक अंदाज में एकंर पेश करने की कोशिश करती है। भला अपराध की खबरों को रोमानी अंदाज में कैसे सुना जा सकता है। सो यह सब कुछ बड़ा ही नाटकीय लगता है। यहां खबरों को मूल भावना खत्म हो गई लगती है। एक होड़ सी लगी है, अपराध को नाटकीय अंदाज में पेश करने की। इस होड़ में अपराध को कितना बिकाऊ बनाया जा सकता है इसकी पूरी कोशिश जारी है।

मामूली खबरें नाटकीय अंदाज में- इस होड़ में कई बार अपराध की मामूली सी खबरों को भी नाटकीय अंदाज में पेश किया जाता है। कई घटनाओं को तो किसी टीवी धारावाहिक की तरह दुबारा शूट किया जाता है। यह काम सभी चैनल कर रहे हैं। यहां तक की क्षेत्रीय चैनल भी इस तरह के प्रोग्राम लेकर आ गए है। ईटीवी बिहार और ईटीवी उत्तर प्रदेश भी इस तरह का कार्यक्रम दिखा रहे हैं। पुलिस फाइल में जो अपराधी मोस्ट वांडेट हैं उन्हें इस तरह के प्रोग्राम में शूट करके दिखाने की शुरूआत इंडियाज मोस्ट वांटेड जैसे प्रोग्राम में की गई थी। पर अब मामूली अपराधी भी इन कार्यक्रमों में बहुत ज्यादा जगह पा लेते हैं।

- विद्युत प्रकाश मौर्य



Friday, 2 January 2009

लीज लाइन पर भी मिलती है अच्छी स्पीड

अब सभी बैंक व व्यापारिक संस्थान वी सेट के बजाय लीज्ड लाइन को ही प्राथमिकता दे रहे हैं। बैंक एटीएम और अखबारों के दफ्तरों में डाटा ट्रांसमिशन का काम लीज्ड लाइनों पर ही तेजी से चल रहा है। भारत में जब नेटवर्किंग की शुरूआत हुई तो अधिकतर डाटा ट्रांशमिशन का काम वीसेट के द्वारा हो रहा था। वीसेट के लिए मकान की छत पर एक बड़ा सा डिश लगाना पड़ता है। पर अब टेलीफोन लाइनों पर स्पीड में इजाफा होने के कारण वीसेट जैसी स्पीड लीज्ड लाइनों से ही प्राप्त होने लगी है। यह तकनीक वीसेट से सस्ती पड़ रही है।

आप जब रेल का टिकट बनवाते हैं तो यह किसी भी स्टेशन पर किसी भी स्टेशन का बन जाता है। एटीएम से रुपए आप किसी भी शहर में निकाल लेते हैं। एक साथ अखबार के कई संस्करण अलग अलग शहरों से प्रकाशित हो रहे हैं। इन सब प्रक्रिया में नेटवर्किंग का बहुत बड़ा योगदान है। यह नेटवर्किंग या तो वीसेट या लीज्ड लाइन के द्वारा हो रही है। प्रारंभ में रेलवे, बैंक और कुछ अन्य बडे़ दफ्तरों ने इस नेटवर्किंग के लिए वीसेट का सहारा लिया था। वीसेट में आमतौर पर 512 केबीपीएस (किलोबाइट प्रति सेकेंड) की गति से डाटा ट्रांसफर होता है। पर अब इतनी या इससे ज्यादा गति लीज्ड लाइनों से भी मिलने लगी है। भारत संचार निगम लि. की लीज्ड लाइन सेवा जिला हेडक्वार्टर और कई गांवों में भी उपलब्ध होने लगी है। रिलायंस, टाटा जैसी कंपनियां भी लीज्ड लाइन की सेवा उपलब्ध करा रही हैं।
सस्ता विकल्प है लीज्ड लाइन - किराया की दृष्टि से जहां वीसेट महंगा पड़ता था वहीं उसके रखरखाव में भी खर्च था। पर लीज्ड लाइन के लिए कोई डिश नहीं लगाना पड़ता है। वहीं खराब मौसम में वीसेट कई बार काम करना बंद कर देता है वहीं लीज्ड लाइनों में खराबी आने की संभवना कम रहती है। इसलिए अब कई बड़े बैंक भी वीसेट के बजाए लीज्ड लाइन नेटवर्क का सहारा ले रहे हैं। लीज्ड लाइन तभी फेल हो सकती है जब किसी कारण से उसकी तार कट जाए।
जिन शहरों में अथवा पहाड़ी इलाकों में जहां किसी भी कंपनी की लीज्ड लाइन सेवा उपलब्ध नहीं है वहां अभी भी वीसेट से नेटवर्क बनाना ही एक मात्र विकल्प है। पर कई बड़े बैंक और व्यापारिक संस्थान अपनी शाखाओं की नेटवर्किंग के लिए लीज्ड लाइन का ही सहारा ले रहे हैं। इसकी स्थापना में खर्च कम है तथा इसके रखरखाव में भी कोई परेशानी नहीं है। लीज्ड लाइन ने नेटवर्क के काम को आसान और सस्ता भी बनाया है। अभी कई बैंकों में बड़ी संख्या में नेटवर्क स्थापित करने का काम बाकी है। ऐसे में अब सभी दफ्तर लीज्ड लाइनों को ही प्राथमिकता दे रहे हैं।
आमतौर पर कंपनियां लीज्ड लाइनों का किराया मासिक तौर पर लेती हैं जिस पर 24 घंटे असीमित डाटा भेजा जा सकता है। अब 2 एमबी तक की लीज्ड लाइन सेवाएं उपलब्ध हैं। इन लाइनों पर अपने नेटवर्क में बातचीत भी की जा सकती है। इसके लिए कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं देना पड़ता है। इसके अलावा लोकल इंटरनेट पर चलने वाली सेवाएं चलाई जा सकती हैं। कई कंपनियों ने देश भर के प्रमुख शहरों को आप्टिकल फाइबर के जाल से जोड़ दिया है जिससे लीज्ड लाइन की सेवा देना आसान हो गया है।

-विद्युत प्रकाश vidyutp@gmail.com

Wednesday, 31 December 2008

गुजर गया एक साल और...

एक और साल गुजर गया...गुजरे हुए साल के टेलीविजन स्क्रीन पर नजर डालें तो समाचार चैनलों पर दो खबरें छाई रहीं, आरूषि मर्डर केस और मुंबई आतंकी हमले की लाइव कवरेज। भारत में 24 घंटे लाइव समाचार चैनलों का इतिहास अब एक दशक से ज्यादा का समय तय कर चुका है। इस एक दशक में परिपक्वता तो आई है लेकिन ये परिपक्वता किस तरह की है, इसके बारे में सोचना जरूरी है। क्या भारत के समाचार चैनल जिम्मेवार चौथे खंबे की भूमिका निभा रहे हैं।


अगर हम आरूषि मर्डर केस की बात करें तो तमाम टीवी चैनल जिनके दफ्तर नोएडा या दिल्ली में हैं उन्हें दिल पर हाथ रखकर पूछना चाहिए कि क्या आरूषि मर्डर केस जैसी घटना जबलपुर या रांची में हुई होती तो वे घटना को उतनी ही कवरेज देते। सच्चाई तो यही थी कि चैनल दफ्तर के पास एक क्राइम की खबर मिली थी, सबकों अपने अपने तरीके से कयास लगाने का पूरा मौका मिला। केस का इतना मीडिया ट्रायल हुआ जो इससे पहले बहुत कम केस में हुआ होगा। देश के नामचीन चैनलों ने मिलकर आरूषि और उसके परिवार को इतना बदनाम किया कि सदियों तक आत्मालोचना करने के बाद भी आरूषि की आत्मा उन्हें कभी माफ नहीं कर पाएगी।
सवाल यह है कि किसी भी टीवी चैनल को किसी परिवार की इज्जत को सरेबाजार उछालने का हक किसने दिया है। जाने माने संचारक ने कहा था कि मैसेज से ज्यादा जरूरी है मसाज। तो जनाब समाचार चैनल किसी एक खबर को इतनी बार इतने तरीके से मसाज करते हैं कि वह हर किसी के जेहन में किसी दु:स्पन की तरह अंकित हो जाता है। मैं अपने तीन साल के नन्हें पुत्र को उत्तर देने में खुद को असमर्थ पाता हूं जब वह समाचार चैनल देखकर कई तरह की जिज्ञासाएं ज्ञापित करता है। तब मेरा पत्रकारीय कौशल जवाब दे जाता है। सवाल एक नन्हीं सी जान का ही नहीं है। सवाल इस बात का है कि हम नई पीढ़ी को क्या उत्तर देंगे।


अब बात मुंबई धमाकों के लाइव कवरेज की। जिस चैनल के पास जितनी उन्नत तकनीक थी उस हिसाब से आंतकी के सफाया अभियान का जीवंत प्रसारण दिखाने की कोशिश की। लेकिन बाद में पता चला कि इसका हमें भारी घाटा उठाना पड़ा। आतंकी टीवी चैनलों की मदद से सब कुछ आनलाइन समझने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन हम देश को तीन दिन तक क्या दिखा रहे थे। टीवी के सुधी दर्शकों ने अपने अपने तरीके से खबर को देखा होगा, लेकिन एक बार फिर अपने तीन साल नन्हे बेटे के शब्दों की ओर आना चाहूंगा।


मेरा बेटा जो धीरे धीरे दुनिया को समझने की कोशिश कर रहा है, अक्सर कहा करता था कि पापा मैं बड़ा होकर पुलिस वाला बनना चाहता हूं। उसकी नजर में पुलिस वाले बहादुर होते हैं। पर 59 घंटे आतंकी सफाए की लाइव कवरेज देखने के बाद मेरे बेटे मानस पटल जो कुछ समझने की कोशिश की उसके मुताबकि अब वह पुलिस बनने का इरादा त्याग रहा है, उसने कहा कि पापा अब मैं पुलिस नहीं बनूंगा. अब तो मैं आतंकवादी बनना चाहता हूं। हां आतंकवादी इसलिए कि वे पुलिस वालों से भी ज्यादा बहादुर होते हैं। आतंकवादी पुलिस वालों को मार डालते हैं। ....ये था 59 घंटे टीवी चैनलों की लाइव कवरेज का असर। मैं अपने बेटे को एक बार फिर कुछ समझा पाने में खुद को असमर्थ पा रहा हूं।


जाहिर सी बात है कि टीवी चैनल खबरों को मांजने को लेकर अभी शैशवावस्था की में है। हम खबर को ढोल पीटकर दिखाना चाहते हैं। कोई अगर हमारे चैनल पर ठहरना नहीं चाहता है तो हम हर वो हथकंडे अपनाना चाहते हैं जिससे कि कोई रिमोट का बटन बदल कर किसी और चैनल की ओर स्वीच न करे। हालांकि सारे चैनलों के वरिष्ट पत्रकार दावा तो इसी बात का करते हैं कि वे जिम्मेवार पत्रकारिता ही कर रहे हैं लेकिन इस तथाकथित जिम्मेवार पत्रकारिता का लाखों करोड़ो लोगों पर कैसा असर हो रहा है....
तुम शौक से मनाओ जश्ने बहार यारों
इस रोशनी मे लेकिन कुछ घर जल रहे हैं...

हमें वाकयी दिल पर हाथ रखकर सोचना चाहिए कि हम जो कुछ करने जा रहे हैं उसका समाज पर क्या असर पडेगा। जब मीडिया के उपर कोर्ट की या सूचना प्रसारण मंत्रालय की चाबुक पड़ती है तब तब याद आता है कि हमें संभल जाना चाहिए। लेकिन हम अगर पहले से ही सब कुछ समझते रहें तो क्या बुराई है। सबसे पहले समाचार चैनलों ने प्राइम टाइम में अपराध दिखा दिखा कर टीआरपी गेन करने की कोशिश की थी। अब अपराध का बुखार उतर चुका है तो समाचार चैनल ज्यादातर समय अब मनोरंजन और मशाला परोस कर टीआरपी को अपने पक्ष में रोक कर रखना चाहते हैं। धर्म को बेचने का खेल भी अब फुस्स हो चुका है।
वैसे इतना तो तय है कि आने वाले सालों में फिर से खबरों की वापसी होगी। खबर के नाम पर आतंक, भय जैसा हाइप क्रिएट करने का दौर निश्चित तौर पर खत्म हो जाएगा। लेकिन वो सुबह भारतीय टीवी चैनल के इतिहास में शायद देर से आएगी, लेकिन आएगी जरूर....
- -विद्युत प्रकाश मौर्य

Friday, 19 December 2008

इनकी ईमानदारी का स्वागत करें

चांद मोहम्मद यानी चंद्रमोहन ने ऐसा कौन सा अपदाध कर दिया है कि उनके साथ अपराधी जैसा व्यवहार किया जा रहा है। उन्होने अनुराधा वालिया उर्फ फिजां से शादी रचाई है। हमें चंद्रमोहन के साहस और इमानदारी की तारीफ करनी चाहिए कि उन्होंने इस रिश्ते को एक नाम दिया है। एक पत्नी के साथ अठारह साल तक निभाने के बाद उन्होंने दूसरी शादी कर ली है। दूसरी शादी करने से पूर्व अपने पत्नी और बच्चों को उन्होंने भरोसे में लिया था।
उन्होंने शादी के लिए धर्म परिवर्तन किया ये अलग से चर्चा का मुद्दा हो सकता है। लेकिन कई साल तक राजनीतिक जीवन जीने वाले कालका से विधायक और हरियाणा के पूर्व उप मुख्यमंत्री रहे चंद्रमोहन ने सब कुछ सार्वजनिक करके रिश्तों में और सार्वजनिक जीवन में जो इमानदारी का परिचय दिया है उसका स्वागत किया जाना चाहिए। अगर हम पहले राजनीति की ही बात करें तो हर दशक में ऐसे दर्जनों नेता रहे हैं जिन्होंने दो दो शादियां की है।
दर्जनों लोगों ने हिंदू रहते हुए दो दो शादियां कर रखी हैं और इन शादियों पर पर्दा डालने की भी कोशिश की है।
भारतीय जनता पार्टी, लोकजनशक्ति पार्टी, राष्ठ्रीय जनता दल में कई ऐसे सीनियर लीडर हैं जिनकी दो शादियां है। भले ही हिंदू विवाह दो शादियों को गैरकानूनी मानता हो पर ये नेता एक से अधिक पत्नियों के साथ निभा रहे हैं।
अगर राजनीतिक की बात की जाए तो सभी जानते हैं कि राजनेताओं का महिला प्रेम कितना बदनाम रहा है। बड़े बड़े राजनेताओं पर रसिया होने के कैसे कैसे आरोप लगते रहे हैं। कहा जाता है कि किसी पिछड़े इलाके का बदसूरत दिखने वाला नेता जब सांसद बनकर दिल्ली आता है तो कई बार वह गोरी चमड़ी के ग्लैमर में आकर दूसरी शादी रचा लेता है। महिलाओं से रिश्ते को लेकर पंडित जवाहर लाल नेहरू एनडी तिवारी और न जाने और कितने नेताओं
के बारे में किस्से गढ़े जाते हैं। सिर्फ उत्तर भारत ही नहीं बल्कि दक्षिण भारत के राजनेता भी एक से अधिक शादी करने में पीछे नहीं रहे। अगर फिल्म इंडस्ट्री की बात की जाए तो वह ऐसे रिश्तों के लिए बदनाम है। हालीवुड की तरह भले ही एक ही जीवन में यहां कई शादियां और तलाक नहीं होते पर दो शादियों के वहां भी कई उदाहरण है। धर्मेंद्र से लेकर बोनी
कपूर तक लोगों ने दो शादियां कर रखी हैं। दक्षिण भारत के फिल्म निर्माताओं में तो दो शादियां आम बात है। चेन्नई में तो कहा जाता है कि निर्माताओं की दूसरी बीवीयों की अलग से कालोनी भी बनी हुई है। वैसे यह हमेशा से चर्चा का विषय रहा है कि एक आदमी जीवन में एक ही से निभाए या कई रिश्ते बनाए।
राजनेता, साहित्यकार, लेखक, कलाकार और फिल्मकार जैसे लोगों के जीवन में कई रिश्तों का आना आम बात होती है। कई लोग कई शादियां करते हैं तो कई लोग ऐसे रिश्तों को कोई नाम नहीं देते। साहित्य जगत में राहुल सांकृत्यायन के बार में कहा जाता है कि उनकी कुल 108 प्रेमिकाएं थीं जिनमें से सात या आठ से तो उन्होंने विधिवत विवाह भी किया था। सचिदानंद हीरानंद वात्स्यान अज्ञेय जैसे कई और नाम भी साहित्य जगत में हैं।
पत्नी के प्रति ईमानदारी न दिखाने पर रिश्तों में आए बिखराव की तो हजारों कहानियां हो सकती हैं। ऐसे में अगर कोई राजनेता अपने परिवार को विश्वास में लेने के बाद दूसरी शादी रचाता हो तो इसको किस तरह से गलत ठहराया जा सकता है। चंद्रमोहन और अनुराधा वालिया के बारे में बात की जाए तो दोनों ही विद्वान हैं और समाज में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन करते आ रहे हैं। अगर ये लोग चाहते तो इस रिश्ते कोई ना दिए बगैर
भी लंबे समय तक रिश्ता रख सकते थे। पर इन लोगों ने ऐसा नहीं किया वे जनता के सामने आए। उन्होंने मुहब्बत में तख्तोताज को ठुकरा दिया है। अपने अपने पद के साथ जुड़े हुए ग्लैमर की कोई परवाह नहीं की है। वे वैसे लोगों से हजार गुना अच्छे हैं जो किसी को धोखा देते हैं, चोरी करते हैं, जेब काटते हैं, चुपके चुपके गला रेत देते हैं। उन्होंने तो बस प्यार किया है। प्यार यानी ना उम्र की सीमा हो ना जन्म का हो बंधन....अगर प्यार होना
ही है तो यह किसी भी उम्र में हो सकता है।ऐसे जोड़े की इमानदारी से यह उम्मीद की जाती है कि वह राजनीतिक जीवन में सूचिता का निर्वहन करेगा, इसलिए ऐसे लोगों से पद नहीं छिनना चाहिए। अगर दूसरी शादी करने पर किसी को पद से हटाने की बात की
जाती हो तो बहुत से केंद्रीय मंत्री, राज्यों के मंत्री और सांसद विधायकों को भी अपना पद छोड़ना चाहिए....( राम विलास पासवान, लालमुनि चौबे और रमई राम जैसे लोगों से क्षमा मांगते हुए ) इसलिए मेरा ख्याल है कि चांद मोहम्मद को हरियाणा का उप मुख्यमंत्री पद सम्मान के साथ वापस मिलना चाहिए। कालका की जनता तो उम्मीद है कि उन्हें माफ कर देगी। क्योंकि वे कालका के अच्छे विधायक रहे हैं।

-विद्युत प्रकाश मौर्य