Thursday, 1 October 2020

लालकृष्ण आडवाणी की हाजीपुर शहर में वह आखिरी सभा

वह 22 अक्तूबर 1990 की रात थी। हाजीपुर शहर का कलेक्ट्रेयेट मैदान। हजारों लोग जमा थे। इंतजार था भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी का। वे सोमनाथ से अय़ोध्या की यात्रा लेकर चल रहे थे। उनके पहुंचने का समय रात के नौ बजे का था। एक घंटे देर से उनका रथ पहुंचा। साथ में उनके सारथि प्रमोद महाजन भी थे। लाल कुरता पहने हुए। भीड़ आडवाणी को सुनने के लिए बेताब थी। जैेसे ही आडवाणी जी मंच पर चढ़े भीड़ ने नारा लगाया - सौगंध राम की खाते हैं मंदिर वहीं बनाएंगे... आडवाणी जी ने बोलना शुरू किया - बिल्कुल सही नारा है ये। मुझे सुनकर अच्छा लगता है जब लोग ये नारा लगाते हैं। मुझे अच्छा नही लगता है जब कुछ नौजवान मोटर बाइक पर चलते हुए कंधे उचकाकर नारा लगाते हैं - एक धक्का और दो...बाबरी मसजिद तोड़ दो... 

आडवाणी जी बोले, भला तोड़ने की क्या जरूरत है। वहां तो कोई मस्जिद है ही नहीं। वहां कभी नमाज नहीं पढी जाती। वहां राम लला विराजमान हैं। हमें अयोध्या में मंदिर बनाना है। प्रभु श्रीराम का भव्य मंदिर बनाना है। पर यह हाजीपुर शहर में आडवाणी जी का रथयात्रा के दौरान आखिरी भाषण साबित हुआ। अगले दिन सुबह रेडियो पर हमने समाचार सुना। 23 अक्तूबर 1990 की सुबह आडवाणी जो समस्तीपुर शहर में गेस्ट हाउस में सुबह सुबह सोते हुए ही  गिरफ्तार कर लिया गया। तब बिहार में लालू प्रसाद यादव की सरकार थी। लालू प्रसाद ने आडवाणी की अयोध्या तक रथयात्रा पूरी नहीं होने दी। रथ रुक गया। यात्रा अधूरी रही। आडवाणी को गिरफ्तार करने वाले समस्तीपुर के कलेक्टर थे राज कुमार सिंह। जो बाद में भाजपा से सांसद और केंद्र सरकार में मंत्री बने। ईश्वर ने आडवाणी जो अच्छी सेहत लंबी जिंदगी दी है। नब्बे के पार में भी वे दमखम रखते हैं। पर आडवाणी अयोध्या के हीरो नहीं बन पाए। देश के प्रधानमंत्री भी नहीं बन पाए। राष्ट्रपति भी नहीं बन पाए। समस्तीपुर में आडवाणी जो गिरफ्तार करने के बाद दुमका ले जाकर सरकारी गेस्ट हाउस में रखा गया। तब झारखंड नहीं बना था। दुमका बिहार का हिस्सा था। 

राम मंदिर आंदोलन समय ये नारे देश भर में खूब लगते थे। एक धक्का और दो बाबरी मस्जिद तोड़ दो। छह दिसंबर 1992 को जो हुआ उसे पूरे देश ने देखा। 


30 सितंबर 2020 को लखनऊ में सीबीआई की विशेष अदालत के फैसले में लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, साध्वी ऋतंभरा, कल्याण सिंह, विनय कटियार जैसे तमाम नेता मस्जिद गिराए जाने के आरोप से बरी कर दिए गए। सीबीआई अदालत में इन नेताओं के खिलाफ मजबूत सबूत नहीं पेश कर पाई। 

पर आखिर बाबरी मसजिद गिराई किसने। देश भर से हजारों कारसेवक जमा थे। जो लोग मसजिद की छत पर चढ़ गए थे, जाहिर है कि वे लोग भी कारसेवक ही थे। दुनिया ने इबादत घर को गिरते हुए देखा। पर अदालत में किसी पर दोष साबित नहीं हो सका। 6 दिसंबर 1992 को मसजिद गिराए जाने के बाद संघ भाजपा के बड़े नेता गिरफ्तार किए गए। लालकृष्ण आडवाणी एक बार फिर गिरफ्तार हुए। इस बार उन्हें ललितपुर जिले के तालबेहट के पास माताटीला गेस्ट हाउस में नजरबंद करके रखा गया। यह संयोग ही रहा कि मुझे कई साल बाद उस शानदार गेस्ट हाउस में भी एक दिन रहने का मौका मिला। 

कहा जाता है कि राम मंदिर आंदोलन के सबसे बड़े नेता अशोक सिंघल भी मस्जिद की इमारत गिराने के पक्ष में नहीं थे। पर देश भर में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ, बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद के आम कार्यकर्ताओं में ये विचार प्रमुखता से भर दिया गया था  कि अयोध्या में बाबर के नाम पर कही जाने वाली किसी इमारत का अस्तित्व नहीं रहना चाहिए। इस इबादत घर के गिराए जाने के बाद देश भर में गर्व से नारे लगते थे - जय श्रीराम...हो गया काम...। पर क्या सचमुच काम हो गया। 

हम एक भव्य राम मंदिर अयोध्या में बना रहे हैं। यह देश का दूसरा सबसे विशाल मंदिर होगा। पर यह राम मंदिर हिंदू आस्था का एक प्रतीक मात्र ही होगा। जरूरत है तो है पूरे देश में राम राज्य लाने की। एक ऐसे न्यायप्रिय देश की जहां बाघ और बकरी एक घाट पर पानी पी सकें। एक ऐसे समाज के निर्माण की जहां कोई खुद को दलित, शोषित या पिछड़ा न समझ सके, तभी सच्चे अर्थों में राम राज्य आ सकेगा। 

रथयात्रा की कुछ और बातें यहां पढ़ें -  https://www.news18.com/news/politics/wont-spare-you-when-lalu-got-advani-arrested-in-1990-for-taking-out-rath-yatra-in-bihar-2092239.html

- विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com - ( 30 सितंबर 2020 ) 


 



Tuesday, 15 September 2020

कोरोना काल और मीडिया के कामकाज के तौर तरीके में बदलाव

CHANGES in WORIKING Of INDIAN MEDIA DURING COVID 19 PERIOD.

-         विद्युत प्रकाश मौर्य – Vidyut Prakash Maurya

 

मार्च 2020 का महीना भारतीय मीडिया के लिए नई चुनौतियां लेकर आया। कोरोना वायरस से आई महामारी के कारण देश दुनिया के तमाम शहरों में प्रशासनिक स्तर पर लॉकडाउन लगाना पड़ा। यानी ऐसी बंदी जिसने लोगों को घर में ही रहने को मजबूर कर दिया। ऐसे दौर में रोज अखबार निकालना बड़ी चुनौती थी। क्योंकि प्रशासन कह रहा था कि सिर्फ बहुत जरूरी सेवाओं वाले लोग ही घर से निकलें। हालांकि मीडिया जरूरी सेवाओं में आता है इसलिए सरकार की तरफ से कोई बंदिश नहीं थी कि आप दफ्तर न जाएं पर कई मीडिया हाउस ने इस दौरान वर्क फ्रॉम हो अपनाने की कोशिश की। इसमें काफी सफलता भी मिली।

देश के सबसे बड़े अखबारों में से एक हिन्दुस्तान टाइम्स समूह के हिन्दुस्तान हिंदी दैनिक ने 25 मार्च से वर्क फ्राम होम का फरमान जारी किया। रिपोर्टिंग से लेकर डेस्क के स्टाफ और फीचर टीम को घर से काम करने को कहा गया। मुख्य संपादक शशि शेखर ने आखिरी बैठक में सबको नई चुनौतियों के लिए तैयार रहने और घर से बेहतर काम करने का संदेश दिया।

रिपोर्टिंग की चुनौतियां - अब अखबार ने वर्क फ्रॉम होम को सफलतापूर्वक अंजाम कैसे दिया। अखबार में काम करने वाले संवाददाताताओं के लिए पहले ही रोज दफ्तर आकर रिपोर्ट फाइल करना जरूरी नहीं है। वे हिंदी में भी यूनिकोड टाइपिंग की सुविधा आ जाने के बाद कोई भी रिपोर्ट अपनी रिपोर्ट अपने घर से अपने लैपटॉप से टाइप करके भेज सकता है। यहां तक कि छोटी मोटी रिपोर्ट तो मोबाइल पर वाह्ट्सएप संदेश में भी या जीमेल पर सीधे टाइप करके भेजी जा सकती है। तो रिपोर्टर पहले से ही घर से या किसी सार्वजनिक स्थल से रिपोर्ट भेजने के लिए अभ्यस्त थे। तो उन्हें कोई परेशानी नहीं आई। हां रिपोर्टर के लिए चुनौती थी खबरों को जुटाने के लिए अपने बीट से जुड़े हुए स्थलों तक जाना। कोरोना काल में इसमें रिस्क था। पर रिपोर्टरों ने रिस्क लिया। पर संस्थान की ओर से अब हर खबर के लिए फील्ड में जाने की बाध्यता नहीं थी। रिपोर्टरों को ज्यादातर खबरें फोन से फोटो और प्रेस विज्ञप्तियों को ईमेल से प्राप्त करने के लिए कहा गया। हिन्दुस्तान के संवाददाता के तौर पर कार्यरत संजय कुशवाहा और हेमवती नंदन राजौरा कहते हैं कि बहुत जरूरी हो तो रिपोर्ट लेने के लिए मौके पर पहुंचना ही पड़ता है।

वीपीएन का सहारा -  अखबार में सबसे बड़ी चुनौती थी डेस्क के काम को घर में शिफ्ट करना। इसके लिए अखबार ने जिन लोगो के पास निजी लैपटॉप थे उन्हे दफ्तर में इस्तेमाल होने वाले साफ्टवेयर उसमें डालने की सुविधा प्रदान की। जिनके पास अपना कंप्यूटर सिस्टम नहीं था उन्हें दफ्तर की ओर से कंप्यूटर सिस्टम उपलब्ध कराए गए। सभी लोगों को अपने घरों में ब्रॉडबैंड कनेक्शन लगवाने को कहा गया। अब सिस्टम घर में चालू हो गया। पर अखबार के दफ्तरों में सारे सिस्टम एलएएन यानी लोकल एरिया नेटवर्क से जुड़े रहते हैं। हर घर में मौजूद सिस्टम को दफ्तर के सिस्टम से जोड़ने के लिए वर्चुअल प्राईवेट नेटवर्क यानी वीपीएन का सहारा लिया गया। सीस्को और फोर्टीक्लाएंट जैसी वीपीएन सर्विस प्रोवाइडर कंपनियों की सेवाएं ली गईं। वीपीएन की सुविधा से अलग अलग घरों में बैठे संपादकीय विभाग के साथी अपनी फाइलों को एक दूसरे से साझा कर सकते हैं। इससे दफ्तर काम घर बैठे करना संभव हो सका।

घर से काम करने की अपनी चुनौतियां भी हैं। हिन्दुस्तान के संपादकीय विभाग में कार्यरत विवेक विश्वकर्मा कहते हैं कि पर कई बार अलग अलग इलाके में डाटा की स्पीड कम होने के कारण सिस्टम धीमा काम करने लगता है। इससे काम को समय पर पूरा करने में दिक्कत आती है। पर ये चुनौतियां भी स्वीकार की गई और कार्य को सफलतापूर्वक अंजाम दिया गया।

वाट्सएप ग्रूप का सहारा – अलग अलग घरों मे  बैठे लोगों को कंप्यूटर में साफ्टवेयर और हार्डवेयर संबंधी आने वाली दिक्कतों के समाधान के लिए कंपनी ने ऑनलाइन आईटी सपोर्ट टीम तैयार की। यह सपोर्ट टीम वाट्सएप समूह पर सभी कार्यरत सदस्यों की शिकायत सुनती है और समस्या का तुरंत समाधा करने की कोशिश करती है। कंप्यूटर में बड़ी दिक्कत आने पर एनीडेस्क साफ्टवेयर के सहारे आईटी टीम सिस्टम का नियंत्रण अपने पास ले लेती है और सिस्टम को ठीक कर देती है। इस तरह से हिन्दुस्तान हिंदी दैनिक में 25 मार्च से 31 मई तक वर्क फ्राम होम को सफलतापूर्वक संचालित किया गया। एक जून से आठ जून के बीच 20 फीसदी कर्मचारियों को दफ्तर बुलाया गया। फिर नौ जून से सात जुलाई तक सारे कर्मचारियों ने घर से ही काम को अंजाम दिया। हिन्दुस्तान ने सिर्फ अपने दिल्ली संस्करण बल्कि देश के अन्य सभी 20 संस्करणों में भी ज्यादातर स्टाफ के लिए वर्क फ्राम को का फार्मूला अपनाया जो काफी सफल रहा।

देश के सबसे बड़े अखबार के नेटवर्क दैनिक भास्कर ने भी सभी रिपोर्टरों को घर से ही रिपोर्ट फाइल करने के निर्देश दिए। वहीं संपादकीय के लोगों के लिए ऐसी व्यवस्था की गई कि दफ्तर में कम लोग आएं जिससे फिजिकिल डिस्टेंसिंग यानी भौतिक दूरी बनी रही। भागलपुर दैनिक भास्कर के स्थानीय संपादक राजेश रंजन और मुजफ्फरपुर में दैनिक भास्कर के स्थानीय संपादक कुमार भावानंद बताते हैं कि कोरोना के संक्रमण काल में दफ्तर आने वाले स्टाफ की संख्या कर दी गई है। लोगों को एक दिन के अंतराल पर दफ्तर बुलाया जा रहा है। इससे दफ्तर में कुल स्टाफ की संख्या 50 फीसदी से भी कम रहती है। इससे भौतिक दूरी के नियम का आसानी से पालन हो पाता है।

आज समाज - चंडीगढ़, अंबाला और दिल्ली से प्रकाशित समाचार पत्र आज समाज के समन्वय संपादक अजय शुक्ला कहते हैं कि हमने लॉकडाउन के ऐलान से पहले ही स्थिति को भांप कर वर्फ फ्राम होम कराने का फैसला ले लिया था। 18 मार्च 2020 को ही अखबार के सभी लोगों को वर्क फ्राम होम करने को कहा गया। इसके लिए कर्मचारियों को कंप्यूटर और ब्राडबैंड की सुविधा प्रदान की गई। हमने इस दौरान मोबाइल पत्रकारिता को प्रोमोट किया। रिपोर्टरों को खबर भेजने के लिए ज्यादा से ज्यादा मोबाइल फोन का इस्तेमाल करने को कहा गया। इसमें काफी सफलता भी मिली।


यह तय किया गया है कि सिर्फ बहुत जरूरी स्टाफ ही दफ्तर आए। दफ्तर आने से पहले सैनेटाइजेशन के पूरे इंतजाम किए गए। दफ्तर के प्रवेश द्वार पर ही सेनेटाइज गेट लगाए गए। दफ्तर में जगह जगह 70 फीसदी अल्कोहल वाले सेनेटाइजर बूथ लगाए गए। हमारे अखबार के समूह की कंपनी खुद सेनेटाइजर भी बनाती है, इसलिए हमने उच्च गुणवत्ता वाला सेनेटाइजर का इस्तेमाल किया।

अजय शुक्ला बताते हैं कि इस दौरान हमने दफ्तर की कैंटीन भी बंद नहीं की। पर कैंटीन में फिजिकल डिस्टेंसिंग का पूरा ख्याल रखा गया। हालांकि कई अखबारों ने लॉकडाउन के दौरान अपनी कैंटीन बंद कर दी। क्योंकि इस दौरान अंदेशा था कि लोग वहां एक दूसरे के ज्यादा करीब  आ सकते हैं। पर आज समाज के दफ्तर में कैंटीन में लोगों के बीच दूरी कायम रहे इसका पूरा ख्याल रखा गया।

लॉकडाउन के दौरान इस मीडिया समूह से जुड़े 11 लोगों में कोरोना पॉजिटिव होने के मामले आए पर इनमें से एक भी मामला दफ्तर के अंदर नहीं आया। सभी संक्रमण बाहरी क्षेत्रों में हुए।

नवोदय टाइम्स , दिल्ली - पंजाब केसरी समूह के अखबार नवोदय टाइम्स नई दिल्ली में कार्यरत सुधीर राघव बताते हैं कि उनके दफ्तर में सभी संवाददाताओं को वर्क फ्राम होम करने को निर्देश दिया गया। इससे दफ्तर में ज्यादा सिस्टम उपलब्ध हो गए और बाकी स्टाफ के लिए भौतिक दूरी के साथ काम करने की सुविधा मिल गई। कुछ संपादकीय विभाग के कर्मचारी इस दौरान वर्क फ्राम होम से भी अपने कार्यों को अंजाम देते रहे।

अमर उजाला , नोएडा - देश के बड़े हिंदी समाचार पत्रों के समूह में से एक अमर उजाला ने भी कोरोना काल में भौतिक दूरी बनाने के लिए कई कोशिशों को अंजाम दिया। कंपनी ने अपने इंटरनेट डिविजन के सारे स्टाफ को वर्क फ्राम होम करने को कहा। इंटरनेट डिविजिन के लिए यह काम कर पाना आसान हैं। इंटरनेट के साफ्टवेयर एचटीएमएल के आधार पर काम करते हैं। इसलिए वेबसाइट अपडेट करने के कार्य के लिए कोई अलग से साफ्टवेयर इंस्टाल करने की जरूरत आम तौर पर नहीं पड़ती है। इसलिए इंटरनेट डिविजन यानी वेबसाइट अपडेट करने वाले संपादकीय विभाग के साथियों के लिए घर से काम को अंजाम देना कोई मुश्किल कार्य नहीं था। हां ऐसे कर्मचारियों को अपने कार्य संबंधी निर्देश प्राप्त करने के लिए अपने विभागीय बॉस का निर्देश लेना पड़ता है। इसके लिए वे सुबह में अपने वरिष्ठ साथियों के से बात कर लेते हैं।

दैनिक जागरण, नोएडा - देश के सबसे बड़े बहुसंस्करण अखबारों में से एक दैनिक जागरण ने भी अपने दफ्तर में सुरक्षा को लेकर कई बदलाव किए। सभी संवाददाताओं को घर से काम करने की छूट दी गई। दफ्तर में जगह जगह कोरोना से बचाव के लिए हिदायतें क्या करें क्या न करें आदि लिखकर प्रकाशित की गई। सभी स्टाफ को सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए दफ्तर में काम करने को कहा गया। कुछ स्टाफ जो घर से काम कर सकता था उसके लिए ऐसी सुविधा प्रदान की गई। दैनिक जागरण में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार आनंद सिंह कहते हैं कि दफ्तर की कार्यप्रणाली कोरोना काल में ऐसी रखी गई जिससे सावधानी भी रहे और दफ्तर का कामकाज प्रभावित भी नहीं हो।

प्रभात खबर, रांची - हिंदी के एक और बड़े अखबार प्रभात खबर ने भी सुरक्षा के लिए कई बदलाव किए। अखबार ने अपने रोज दफ्तर आने वाले स्टाफ को आधा कर दिया। प्रभात खबर में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार संजय मिश्रा कहते हैं कि स्टाफ को दफ्तर एक दिन छोड़कर आने को कहा गया। इससे दफ्तर में लोगों को सुरक्षित दूरी के साथ बैठने का मौका मिल गया। यहां भी सभी संवाददादाताओं को दफ्तर के बजाय घर से ही अपनी खबरों को फाइल करने की छूट दी गई। कोरोना काल में स्टाफ की जिम्मेवारियां बढ़ गई पर इसे स्टाफ ने चुनौती के तौर पर लिया और दफ्तर का कामकाज सुचारू तौर पर चलता रहा।

अखबारों के इंटरनेट डिविजन में काम करने वाले लोगों ने वर्क फ्रॉम के दौरान किसी और शहर से भी काम को अंजाम दिया। दैनिक भास्कर के डॉट काम यानी इंटरनेट डिविजन में दिल्ली में कार्यरत करुणा बताती हैं कि वे लॉकडाउन का ऐलान होने के बाद अपने घर पटना चली गईं। वे वहीं से अपने घर से दफ्तर काम निपटाती रहीं। दरअसल जब आप ऑनलाइन काम कर रहे हैं तो जरूरी नहीं है कि आपकी टीम के सारे सदस्य एक ही शहर में हों। सभी लोग अलग अलग शहरों से भी काम को अंजाम दे सकते हैं। बस इसके लिए अच्छी स्पीड वाला इंटरनेट कनेक्शन उपलब्ध होना जरूरी है।

वर्चुअल मीटिंग का सहारा -  दफ्तर में काम करने के दौरान आजकल योजनाएं बनाने के लिए बैठकों की बहुत जरूरत होती है। पर लॉकडाउन के दौरान ज्यादातर अखबारों के संपादकीय विभाग में वर्चुअल मीटिंग का सहारा लिया जाने लगा। ऐसी मीटिंग के लिए वाट्सएप कालिंग, जूम एप, एमस टीम्स या फिर गूगल मीट का सहारा लिया जाने लगा। छोटे समूह के लोग वाट्सएस की आडियो कॉलिंग में समूह में एक साथ जुड़कर मीटिंग कर लेते हैं। इसके बाद मिले निर्देशों के बाद वे अपना कामकाज शुरू कर देते हैं। अगर बड़े समूह में मीटिंग करनी है तो वीडियों कान्फ्रेसिंग का सहारा लिया जाता है। हिंदी के सभी बहु संस्करण वाले अखबार अपने अलग अलग शहरों में बैठे संपादकों के संग बैठक करने के लिए पहले से ही वीडियो कान्फ्रेंसिंग का सहारा लेते आ रहे हैं। अब लॉकडाउन आने पर इस तरह की बैठकों का सिलसिला और बढ़ गया है।

संकट नए रास्ते दिखा देता है। आपदा अवसर प्रदान करती है। हिन्दुस्तान के पटना संस्करण में काम करने वाले उप संपादक अविनाश मिश्रा मार्च महीन के आखिरी हफ्ते से ही अपने घर वैशाली जिले के सुभई गांव में बैठकर अपने कार्यों को अंजाम दे रहे हैं। अविनाश बताते हैं कि रिलायंस जियो से रोज 1.5 जीबी डाटा मिलता है उससे दफ्तर का काम निपटा लेता हूं। मतलब आप गांव में रहकर भी दफ्तर के काम को अंजाम दे सकते हैं। ये बदलाव कोरोनाकाल में आया है।

राजस्थान पत्रिका – राजस्थान, मध्य प्रदेश,  छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल और कर्नाटक जैसे राज्यों से प्रकाशित बहु संस्करण के समाचारपप पत्र राजस्थान पत्रिका ने भी कोरोना की आहट को देखते हुए कार्य पद्धति में कई बदलाव किए। इस समाचार पत्र से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार निरजंन कंजोलिया बताते हैं कि हमारे अखबार में वर्क फ्राम होम की शुरुआत 21 मार्च से कर दी गई थी। जिन लोगों के घर में कंप्यूटर सिस्टम नहीं थे उन्हें कंप्यूटर दफ्तर की ओर से मुहैय्या कराए गए। चुनौतियां बड़ी थी, पर अखबार ने उसका सामना किया। काफी लोग लंबे समय तक घर से ही अपने कार्यों को अंजाम देते रहे। दफ्तर आने वाले लोगों की सुरक्षा के लिए सभी जरूरी ऊपाय अपनाए गए।

जयपुर अजमेर और कोटा से प्रकाशित राजस्थान के एक और प्रमुख हिंदी दैनिक दैनिक नवज्योति के सलाहकार संपादक योगेंद्र रावत बताते हैं कि कोविड 19 की चुनौतियों के लिए हमारे प्रबंधन ने भी पूरी तैयारी की। स्टाफ की सुरक्षा का पूरा ख्याल रखा गया। दफ्तर के प्रवेश द्वार पर और दफ्तर के अंदर सेनेटाइजेशन के पूरे इंतजाम किए गए। यह प्रबंधन के उठाए गए पहलकदमी रही कि मार्च से जुलाई के दौरान कोरोना का कोई केस दफ्तर के अंदर नहीं आया।

 निष्कर्ष – कोरोना काल में समाचार पत्रों के पत्रकारों के लिए अपनी ड्यूटी को अंजाम देना चुनौतिपूर्ण कार्य रहा है। खास तौर पर संवाददाताओं के लिए जो खबरों संकलन के लिए अलग अलग स्थानों पर भ्रमण भी करते हैं। यह दुखद रहा है कि इस दौरान कई पत्रकारों की कोरोना से संक्रमित होकर मौत भी हो गई। 8 मई 2020 को आगरा में दैनिक जागरण के पत्रकार पंकज कुलश्रेष्ठ की मौत हो गई। 6 जुलाई 2020 को दैनिक भास्कर से जुड़े पत्रकार तरुण सिसौदिया की दुखद मौत दिल्ली एम्स में हो गई। कोरोना संक्रमित होने के बाद उनका उपचार चल रहा था। पर उन्होने निराश होकर आत्महत्या कर ली। वहीं 6 अगस्त 2020 को दैनिक जागरण वाराणसी के वरिष्ठ पत्रकार राकेश चक्रवर्ती को कोरोना ने लील लिया।  मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में शासन द्वारा निर्धारित किए गए कोविड सेंटर चिरायु अस्पताल में नई दुनिया के कोरोना पॉजिटिव पत्रकार श्री सिराज हाशमी की संदिग्ध मौत हो गई। (भोपाल समाचार)  ओडिशा में 12 जुलाई को समाज  दैनिक के पत्रकार प्रियदर्शी पटनायक का कोरोना से निधन हो गया। तमाम सुरक्षा उपायों के बीच देश भर के कई समाचार पत्रों के न्यूज रूम तक कोरोना वायरस ने दस्तक भी दे दी।

17 मार्च 2020 को कोरोना वायरस के खतरे से निपटने में डाक्टरों और नर्सो सहित चिकित्सा कर्मियों की भूमिका तथा जागरुकता फैलाने के लिए मीडिया की सराहना करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी सभी से सतर्क रहने को कहा।

पर इन सब के बीच उन समाचार पत्रों के प्रबंधन का व्यवहार अनुकरणीय है जिन्होंने इस बीमारी के संक्रमण से अपने मानव संसाधन को बचाने के लिए तमाम तरह के जरूरी ऊपाय किए, सावधानियां बरतीं।

संदर्भ –

1 नवभारत टाइम्स https://navbharattimes.indiatimes.com/india/prime-minister-appreciated-the-contribution-of-medical-personnel-media-in-dealing-with-corona-virus/articleshow/74668167.cms

2. हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, अमर उजाला, प्रभात खबर, दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका, दैनिक नवज्योति के विभिन्न पत्रकारों से बातचीत।

3. आज समाज के समन्वय संपादक- श्री अजय शुक्ला से बातचीत।

4. https://www.jagran.com/uttar-pradesh/varanasi-city-senior-journalist-rakesh-chaturvedi-working-in-dainik-jagran-varanasi-dies-from-corona-20599836.html

5. https://www.bbc.com/hindi/india-53318400

6 https://www.bhopalsamachar.com/2020/08/bhopal-news_3.html

7. https://insightonlinenews.in/

8. https://www.bbc.com/hindi/india-52054618

-         विद्युत प्रकाश मौर्य – Vidyut Prakash Maurya

-         (MA (hist) BHU, PG Diploma in Journalism from IIMC, Delhi, MMC from GJU, HISAR. UGC NET Quilified.

-         Email- vidyutp@gmail.com

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Sunday, 13 September 2020

बहुमुखी प्रतिभा के धनी संपादक थे श्री माधवकांत मिश्र


श्री माधव कांत मिश्र। एक पत्रकार, एक संपादक, एक ओजस्वी वक्ता, एक आध्यात्मिक संत, एक अभिनेता। उनके व्यक्तित्व के कई पहलू थे। भला अपने कैरियर पहली नौकरी देने वाले को आप कैसे भूल सकते हैं। तो मुझे उन्होंने पहली नौकरी दी थी, 1996 में कुबेर टाइम्स में। पर मैं ही नहीं देश में ऐसे कई सौ पत्रकार होंगे जिन्हे उन्होंने पहला मौका दिया। भरोसा किया। उनमें से कई लोग आज संपादक हैं, बड़े पदों पर हैं। अपनी क्षेत्र के माहिर पत्रकार बने हैं।
माधव कांत मिश्र इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य से एमए करके निकले थे। वे महान साहित्ययकार प्रोफेसर जगदीश गुप्त के दामाद थे। वैसे रहने वाले वे बिहार के भोजपुरी इलाके के थे। पढ़ाई के बाद पत्रकारिता की शुरुआत इलाहाबाद की धरती से की। पर उनके वाणी में जो साहित्यिक अंदाज था उससे लोग उन्हे इलाहाबादी ही समझते थे। उन्हें श्रेय जाता है कई नए अखबारों को संपादक के तौर पर शुरू करने का। पटना से पाटलिपुत्र टाइम्स, बरेली से विश्वमानव, सूर्या इंडिया, कुबेर टाइम्स आदि। वे आज हिंदी दैनिक के दिल्ली ब्यूरो प्रमुख रहे। राष्ट्रीय सहारा में बड़े पदों पर रहे। स्वतंत्र भारत लखनऊ में संपादक बने।

बाद के दिनों में कई धार्मिक चैनलों के भी संपादक बने। आस्था, संस्कार, प्रज्ञा, दिशा जैसे धार्मिक चैनलों से गुजरते हुए एक दिन वे महामंडलेश्वर बन बैठे। गेरुआ बाना धारण कर लिया। उनका नाम हो गया श्री श्री 108 मार्तंड पुरी जी महाराज। इस दौरान वे देश दुनिया का दौरा करते हुए रुद्राक्ष अभियान चला रहे थे। देश भर में रुद्राक्ष के पौधे लगाने के लिए लोगों को प्रेरित करते।

उनके व्यक्तित्व का एक और पक्ष था। वे अच्छे अभिनेता भी थे। कुछ भोजपुरी फिल्मों में अभिनय किया था। दूरदर्शन के कुछ धारावाहिकों और टेली फिल्मों में भी अभिनय किया था।

उनका जन्म 10 जुलाई 1947 को हुआ था। जाने के लिए 73 वर्ष की उम्र वैसे तो ज्यादा नहीं होती, पर 12 सितंबर 2020 को अचानक वे अनंत यात्रा पर प्रस्थान कर गए। महामंडलेश्वर बनने के बाद भी उनसे कई बार मिलना हुआ था। डॉक्टर रामजीलाल जांगिड द्वारा दिल्ली विश्वविद्यालय के हंसराज कॉलेज में और कालिंदी कालेज में आयोजित सेमिनार में वे मिले थे।

सन 1995 के अगस्त महीने में आईआईएमसी हिंदी पत्रकारिता की कक्षा में आने वाले पहले अतिथि व्याख्याता पत्रकार थे। जहां मेरा उनसे पहली बार मिलना हुआ था। उसके बार फरवरी 1996 में कुबेर टाइम्स में मेरी पहली नौकरी में वे मेरे पहले संपादक रहे।

अपने सैकड़ों शिष्यों को वे बड़े स्नेह से याद रखते थे। जब जहां वे संपादक रहे। अपनी टीम के लोगों के साथ न कभी बदतमीजी से बात की, न कभी किसी को नौकरी से बर्खास्त किया। हां, अपने ज्ञान और अनुभव से लोगों का मार्गदर्शन करते रहते थे। ऐसे संपादक विरल होते हैं। उनको याद करते हुए, उनके श्रीमुख से सुनी पंक्तियां जो हमेशा याद रहती हैं...
पुण्य हूं न पाप हूं
जो भी अपने आप हूं
अंतर देता दाह
जलने लगता हूं।
अंतर देता राह
चलने लगता हूं।

-         -  विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
    ( MADHAV KANT MISHRA, MAHAMANDLESHWAR SWAMI MARTAND PURI JI MAHARAJ ) 

हंसराज कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में 15 अक्तूबर 2013 को भाषा पत्रकारिता पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्टी में। 



Thursday, 3 September 2020

परंपरागत गुरु की जगह ले ली ई-गुरु ने


कोरोना काल में गुरु शिष्य के रिश्तों में बड़ा बदलाव आ गया। कई महीने से चल रही ऑनलाइन कक्षाओं ने पठन पाठन का तरीका बदल दिया है। बड़ी संख्या में ऑनलाइन शिक्षा प्रदान करने वाले वेब पोर्टल को प्रचार प्रसार का बड़ा मौका मिला है।

बाइजोस, वेदांतू, लीड स्कूल, अनएकेडमी जैसे पोर्टल से छात्र और कोचिंग करने वाले ऑनलाइन पढ़ाई कर रहे हैं। इन पोर्टलो का कारोबार सैकड़ो करोड़ का हो गया। ये पोर्टल ऑनलाइन कक्षा, कोचिंग, ट्यूशन सब कुछ प्रदान कर रहे हैं। इससे लगता है कि आने वाले दिनों में स्कूलों के बड़े बड़े भवन बेमानी हो जाएंगे। छात्र एकलव्य की तरह कहीं भी रहकर नामी गिरामी गुरूओं से शिक्षा ग्रहण करेंगे। या तमाम पोर्टल पर पहले से मौजूद ट्यूटोरियल के मदद से पढाई करते नजर आएंगे। कोरोना परंपरागत स्कूलों को बदल कर रख देगा।

कई ऑनलाइन लर्निंग एप कोरोना काल के पहले से काम करने लगे थे। पर महामारी और लॉकडाउऩ ने उनके कामकाज में अचानक उछाल ला दिया। इसके साथ ही हमें यह सोचने को मजबूर कर दिया कि ये ऑनलाइन पढ़ाई क्या परंपरागत स्कूलों के लिए खतरा है।  
बाइजूस (BYJUS) नामक एप  कक्षा 4 से 12 तक के छात्रों के अलावा इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा ( जेईई) और मेडिकल प्रवेश परीक्षा (नीट) की भी तैयारी करवाता है। यह आजकल 5 करोड़ से ज्यादा यूजर होने का दावा करता है। इतना ही नहीं अपने विज्ञापनों में यह डेडिकेटेड ऑनलाइन टीचर मुहैय्या कराने का भी दावा करता है।
इसी तरह का एक और एप है वेदांतू ( VEDANTU ) वेदांतू भी ऑनलाइन स्कूल लर्निंग एप है। यह खास तौर पर 6 से 14 साल के बच्चों के लिए स्कूल लर्निंग एप है। इसके पास अपना शिक्षकों का नेटवर्क है। मतलब वेदांतू पर पढ़िए स्कूल जाना कोई जरूरी नहीं होगा। वेदांतू कक्षा एक से लेकर 12 तक की पढ़ाई के अलावा जेईई और नीट की भी तैयारी करवाता है।  

लीड स्कूल डॉट इन ( www.leadschool.in ) तो सौ फीसदी स्कूल सेवा का दावा करता है। इस स्कूलों के साथ समन्यवय करके लाइव रिकॉर्डेट क्लास, होम वर्क, किसी तरह के शंका निवारण, रिविजन, ऑनलाइन एसेसमेंट जैसी सुविधाएं मुहैय्या कराता है। अगर कोई छात्र स्कूल न जाए तो वह इसके एप और वेबसाइट की सहायता से अपनी पढ़ाई जारी रख सकता है। मुंबई आधारित यह वेबसाइट स्कूलों के साथ बेहतर इंटेग्रेशन का दावा करती है।

अनएकेडमी ( Unacademy) देश के सबसे बड़े लर्निंग प्लेटफार्म होने का दावा करती है।  इसका कारोबार तो इतना बढ़ा है कि वह नामी गिरामी क्रिकेट मैच की स्पांसरशिप लेने को तैयार थी। वह अगले चार साल के लिए आईपीएल की आफिशियल पार्टरन बन चुकी है। इस एजुकेशन स्टार्टअप कंपनी में साफ्टबैंक बड़ी राशि निवेश कर चुका है। आज की तारीख में लाखों युवा इस ऑनलाइन एजुकेशन प्लेटफार्म पर अपना करियर संवारने में लगे हैं। यह यूपीएससी, एसएससी, बैंकिंग, रेलवे, एनडीए, सीडीएस, आईआईटी जेईई, नीट आदि के लिए कोचिंग उपलब्ध कराती है। इतना ही नहीं अलग अलग राज्यों की नौकरियों की प्रवेश परीक्षा, यूजीसी नेट आदि की तैयारी भी कराती है।
इन ऑनलाइन लर्निंग एप का एक लाभ यह भी हुआ है कि छोटे कस्बों और गांवों के छात्रों को अब कोटा, दिल्ली या पटना जाने की कोई जरूरत नहीं। अपने स्मार्टफोन के जरिए वे गांव में रहकर भी किसी बड़ी परीक्षा में सफलता हासिल कर सकते हैं।

कुछ प्रमुख अंतरराष्ट्रीय ऑनलाइन लर्निंग प्लेटफार्म –
1 स्किलशेयर
2 लिंक्डइन लर्निंग
3 मास्टर क्लास
4 यूडेमी
5 इडीएक्स डाट ओआरजी
6 कोर्सएरा डॉट ओआरजी
7 फ्यूचर लर्न डॉट काम 
-      विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com

Monday, 31 August 2020

भारतीय संस्कृति में लॉकडाउन की पुरानी परंपरा

आज हम भले ही कोराना महामारी के भय से लॉकडाउन में जीने को मजबूर हुए हैं पर भारतीय संस्कृति में लॉकडाउन की पुरानी परंपरा रही है। पर ये लॉकडाउन किसी डर के कारण नहीं थी। बल्कि सेहत और सामाजिकता को ध्यान में रखकर बनाई गई है।

साल में दो बार नवरात्र आते हैं। इस दौरान फलहार पर रहने की परंपरा है। यानी पके हुए अनाज नहीं खाना। सुना है कि अपने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तो इस दौरान सिर्फ नींबू पानी पर रहते हैं। ये अलग बात  कि शहरों में पैसे वाले घरों की महिलाएं इस दौरान कुट्टू का आटा, सेंधा नमक और फल फूल इतना ज्यादा उदरस्थ कर लेती हैं कि नौ दिन में उनका वजन बढ़ जाता है। पर नवरात्र में उपवास शरीर के इम्युन सिस्टम को बढ़ाने और शरीर से जहरीले तत्व को बाहर निकालने के लिए हैं।

पितृ पक्ष – हर साल आश्विन मास में 15 दिनों का पितृ पक्ष आता है। इस दौरान लोग अपने पुरखों को याद करते हैं। कोई भी नया और शुभ कार्य करने से बचते हैं। ये एक तरह का लॉकडाउन ही है। इसमें घर में रहना, आराम करना प्रमुख अभ्यास है।

सावन के चार माह चातुर्मास – सावन शुरू होते ही चार माह देवता सो जाते हैं। बारिश के दिनों में वैसे भी लंबी यात्राएं या कई तरह के नए कार्यों में दिक्कत आती है। इसलिए ये भी एक तरह का ब्रेक है। तमाम जैन मुनि चातुर्मास के समय एक जगह टिक कर रहते हैं।

एकदशी का व्रत – हर माह में दो बार एकादशी का व्रत करने की परंपरा है। इस दौरान लोग उपवास करते हैं। यह भी शरीर को आराम देने की ही एक प्रक्रिया है।

थारू समाज का बरना उत्सव -  बिहार के चंपारण जिले में एक जनजाति है थारू। थारू समाज के लोग हर साल बरना का उत्सव मनाते हैं। यह तीन दिनों का पूर्ण लॉकडाउन होता है। इस दौरान कोई अपने गांव घर से बाहर नहीं जाता। न तो कोई दूसरे गांव से आता है। थारू समाज मानता है कि ऐसा करने से पेड़ पौधों और प्रकृति को नुकसान होगा। सदियों से थारू समाज यह उत्सव मनाता आ रहा है।
रमजान का महीना – इस्लाम में हर साल रमजान का महीना आता है। इसमें हर रोज उपवास किया जाता है। यह इबादत और संयम का महीना है। हमें इन सारी परंपराओं से सीखने की जरूरत है। और बहुत तेज भागने के बजाय थोड़ा हौले-हौले चलने की जरूत है। प्रकृति के साथ समन्वय बनाकर।
-         -  विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com

Tuesday, 25 August 2020

कोलाज में ढला प्रेम और दर्शन का तानाबाना

अमर उजाला जालंधर में रिपोर्टिग के दौरान प्रकाशित एक रिपोर्ट साझा कर रहा हूं। तब कलाकार पंकज सचदेवा ने अपने कोलाज की प्रदर्शनी केआरएम डीएवी कॉलेज नकोदर ( जालंधर) में लगाई थी। तब पंकज सचदेवा पंजाब के तरनतारन शहर में रहते थे। बाद में वे अमृतसर में रहने लगे। आजकल उनकी पेंटिंग अंतरराष्ट्रीय बाजारों में ऊंचे दामों पर बिकती है।
अमर उजाला में 16 नवंबर 2000 को प्रकाशित। ( जालंधर संस्करण ) 
जब मैंने ये रिपोर्ट फाइल की तो तब हमारे उप समाचार संपादक शिव कुमार विवेक जी ने रिपोर्ट पढ़ी और मुझे फोन करके कहा कि इसकी भाषा थोड़ी क्लिष्ट है। अखबार के हिसाब से आसान नहीं है। मैंने आग्रह किया इसकी भाषा को ऐसे ही रहने दिया जाए, क्योंकि कलाकार के सृजन को अभिव्यक्त करने के लिए मैंने बेहतर शब्दों का इस्तेमाल करने की कोशिश की है। फिर रिपोर्ट बिल्कुल वैसी ही छपी जैसा मैंने लिखा था। एक माह महीने बाद पंकज सचदेव से जालंधर के हरिवल्लभ संगीत सम्मेलन में मुलाकात हुई। वे रिपोर्ट की प्रति संभाल कर रखे हुए थे। मेरी लेखनी की उन्होंने तारीफ की। मेरे लिए यह बड़ी खुशी की बात थी। कुछ महीने बाद तरनतारन जाने पर उनसे मिलना हुआ। वे तरनतारन के एक सम्ममानित परिवार से आते थे। 
कोलाज बनाने में उनकी रुचि बचपन के दिनों से ही थी। स्कूली जीवन में उनका मन उच्च आध्यात्मिक विचारों की ओर भागता था। इसको उन्होंने कागज पर उकेरा। पंकज पहले कोलाज बनाते थे बाद में आगे बढ़कर पेंटिंग बनाने लगे। तरनतारन छोड़कर अमृतसर में रहने लगे। कई साल बाद 2020 में उनसे दुबारा संपर्क हुआ, तो पता चला कि वे दिल्ली में शिफ्ट हो गए हैं। आजकल उनकी पेंटिंग कई ऑनलाइन वेबसाइट पर बिक्री के लिए उपलब्ध हैं। 
vidyutp@gmail.com 

Thursday, 20 August 2020

फिल्म पत्रकारिता को अधिक महत्व नहीं दिया जा रहा - संपत लाल पुरोहित

( 1947 में प्रकाशित उपन्यास धरती के देवता में प्रकाशित तस्वीर)
हिंदी फिल्मों के मशहूर पत्रकार संपत लाल पुरोहित से ये साक्षात्कार 1996 में लिया गया था। ये साक्षात्कार भारतीय जन संचार संस्थान की पत्रिका संचार माध्यम के जनवरी मार्च 1997 अंक में प्रकाशित हुआ। बुजुर्ग होने पर पुरोहित जी का स्वास्थ्य ज्यादा ठीक नहीं रहता था। वे ज्यादा देर तक बोल नहीं पाते थे। इसलिए यह साक्षात्कार उनके दरियागंज स्थित आवास में दो बैठकों में पूरा हुआ। अपने आखिरी दिनों में वे 7 बटा 21 दरियागंज में एक विशाल भवन के आंगन वाले कमरे में किराये पर रहते थे। पुरोहित जी सन 1998 में चल बसे, पर उनकी यादें शेष हैं। 


पत्रकारिता की विभिन्न विधाओं में फिल्म पत्रकारिता का महत्वपूर्ण स्थान है। फिल्म पत्रकारिता को पत्रकारिता के क्षेत्र में कभी उतनी गंभीरता से नहीं लिया गया जितना लिया जाना चाहिए था, जबकि फिल्मों का समाज पर व्यापक प्रभाव होता है। ऐसा मानना है कई दशकों तक फिल्म पत्रकारिता कर चुके विख्यात हिंदी पत्रकार संपत लाल पुरोहित का। संपत लाल पुरोहित फिल्म पत्रकारिता के क्षेत्र में एक सम्मानित नाम है। आजादी से चार पहले 1943 में फिल्म पत्रकारिता से जुड़े श्री पुरोहित लगभग चार दशक तक अपनी फिल्म पत्रिका युग छाया का संपादन करते रहे।
( फोटो सौजन्य - दीपक दुआ ) 
इसके बाद वे लंबे समय तक देश के प्रमुख हिंदी समाचार पत्रों में फिल्म पर कॉलम लिखते रहे। इनमें नवभारत टाइम्स, सांध्य टाइम्स, जनसत्ता, हिन्दुस्तान, अमर उजाला, कुबेर टाइम्स जैसे अखबार प्रमुख हैं। वे फिल्मी दुनिया पत्रिका के लिए लेखन करते रहे। वे मिस्टर संपत और फिल्म ज्ञानी नाम से कुछ पत्रिकाओं मे पाठकों के फिल्मी सवालों जवाब भी देते रहे।
जीवन के 75 वसंत देख चुकने के बाद भी संपत लाल पुरोहित फिल्म पर लेखन में सतत सक्रिय रहे। प्रस्तुत है संपत लाल पुरोहित से उनकी फिल्म पत्रकारिता पर एक बातचीत।

आपका बचपन कैसा था, कहां किन परिस्थितियों में गुजरा...
मैं मध्य प्रदेश धार एस्टेट के एक गांव में पैदा हुआ था। धार अब जिला बन चुका है। मेरा बचपन अमोदिया ग्राम ( रतलाम के पास ) में गुजरा। मेरा जन्म 1 जून 1922 को हुआ था। मुझे याद आता है कि प्राथमिक विद्यालय जाने के लिए मुझे प्रतिदिन तीन मिल पैदल चलना पड़ता था। जब मैं बहुत छोटा सा था तभी पिताजी का देहांत हो गया। माता जी का भी देहांत हो गया जब मैं तीसरी कक्षा में पढ़ रहा था। भाई बहनों में मैं अकेला था। तो मेरी पैत्रिक जमीन की देखभाल मेरे मामाजी करने लगे। उन्होंने ही मेरा पालन पोषण भी किया। चौथी कक्षा की परीक्षा में मैं 11-12 विद्यालयों की संयुक्त परीक्षा में पहले नंबर पर आया।
उसके बाद आगे की पढ़ाई के लिए मैं बदनावर चला गया। यह धार जिले का छोटा सा कस्बा है। वहीं से मैंने मिड्ल पास किया। मेरी नियमित पढ़ाई इंटरमिडिएट यानी 12वीं तक ही हुई। उसके बाद मैंने प्रभाकर की परीक्षा स्वंतत्र रूप से उत्तीर्ण की।

बचपन में क्या बनने की सोचते थे...
मुझे बचपन में गाने और बजाने का खूब शौक था। गांव में छोटी जाति के लोगों की गाने बजाने की मंडली होती थी, उसमें जाकर मैं शामिल हो जाता था। नौटंकी देखने में मैं सबसे आगे बैठता था। एक बार हमारे यहां अमर सिंह राठौर की नौटंकी आई। इसमें मैंने हाड़ी रानी का रोल किया। मेरी माता जी को यह बहुत पुरा लगा।  इसके बाद गाने बजाने का साथ छूट गया।

फिल्मों से लगाव कब हुआ...
मैट्रिक का इम्तहान देने के बाद जब मैं इंदौर गया तब पहली बार बोलती फिल्म कंगन देखी। इसमें अशोक कुमार और लीला चिटनिस थे। उससे पहले पहली बार बदनावर में ही चंद्रहास नामक मूक फिल्म देखी थी।

वह कौन सी घटना थी जिससे आपका जीवन बदल गया...
बदनाव में मैं एक डॉक्टर साहब के पास रहता था। एक दिन उनके पास एक सज्जन बैठे थे। उनका नाम था रामचंद्र द्विवेदी उर्फ कवि प्रदीप। उसी समय नित्यानंद जी महाराज हरिद्वार में प्रणव मंदिर बनवा रहे थे। इस मंदिर के उद्यापन समारोह में हमलोग भाग लेने कवि प्रदीप के साथ चले गए। दरअसल वहां समारोह में बड़ी संख्या में पंडितों की आवश्यकता थी। मैं भी पंडित के रूप में इस समारोह में शामिल हुआ। इस समारोह में शामिल होन के लिए हम जिस ट्रेन से हरिद्वार जा रहे थे, उसमें कवि प्रदीप मथुरा में हमारे साथ चढ़े। हरिद्वार में कवि प्रदीप रोज रात में नित्यानंद जी महाराज के दरबार में कविता पढ़ते थे। कवि प्रदीप के साथ एक माह हरिद्वार में रहने का मेरा अनुभव काफी प्रेरक रहा। उसके बाद मैं बदनावर लौट आया।

लेखन के प्रति कैसे झुकाव हुआ...
जो मैंने पहली बोलती फिल्म कंगन देखी थी उसमें कवि प्रदीप ने ही गीत लिखे थे। उसके बाद फिल्मों से मेरा झुकाव बढ़ता गया। इसी दौरान मैंने कविताएं और कहानियां भी लिखनी शुरू कर दीं। उन दिनो मुंबई से दो फिल्म पत्रिकाएं आती थीं। एक गुजराती की मौजमजा हुआ करती थी। मैं इनका नियमित पाठक बन गया। इंदौर हिंदी साहित्य सम्मेलन की पत्रिका निकलती थी। इसके संपादक कालिका प्रसाद कुसुमाकर दीक्षित थे। साल 1938 में वीणा पत्रिका में मेरी पहली कविता प्रकाशित हुई।

फिल्म पत्रकारिता की तरफ झुकाव कैसे हुआ...
बदनावर में रहते हुए दिल्ली से प्रकाशित प्रथम फिल्म पत्रिका चित्रपट का नियमित पाठक बन गया। इस दौरान मेरे ऊपर फिल्मों का काफी प्रभाव बढ़ गया था। मैं रंग बिरंगे कपड़े पहनकर फिल्म सितारों की नकल किया करता था। फिल्म स्टार मजहर खान धार के रहने वाले थे। उन्होंने पड़ोसी फिल्म में काफी अच्छी भूमिका निभाई थी। एक बार उनके धार आने पर मैं उनसे जाकर मिला। मैंने बताया कि मैं चित्रपट में नियमित लिखता हूं और आपका साक्षात्कार लेना चाहता हूं। वे इंटरव्यू देने को तैयार हो गए। इस प्रकार मेरा पहला फिल्मी साक्षात्कार सन 1938 में चित्रपट में प्रकाशित हुआ। तब मेरी सिर्फ 16 साल की थी। इस प्रकार मेरी फिल्म पत्रकारिता की शुरुआत हुई। इससे पहले मैंने प्रेमचंद का सारा साहित्य पढ़ डाला था। कवि गोष्ठियों में हिस्सा लेने लगा था।

उन किन लोगों का नाम लेना चाहेंगे जो आपके लेखक पत्रकार निर्माण में सहायक रहे...
इसमें मैं कवि प्रदीप पहला नाम लेना चाहूंगा। उनके सानिध्य में रहकर काफी कुछ सीखने को मिला। प्रेमचंद साहित्य का मैंने काफी अध्ययन किया था, इसलिए उनकी लेखनी से प्रभावित रहा। धार में रहते हुए मैं कांग्रेस सेवा दल का सक्रिय सदस्य बन गया था। सेवा दल में काम करते हुए उसकी समाजसेवा से जुड़ी गतिविधियों से भी प्रेरणा मिली।

आपका धार से दिल्ली कैसे आना हुआ ...
लंबे समय से मैं दिल्ली से प्रकाशित चित्रपट पत्रिका के लिए लिख रहा था। एक दिन चित्रपट पत्रिका की ओर से एक तार मिला की आप दिल्ली आ जाएं। लिखा था, आपको हम संपादकीय विभाग में बहाल करना चाहते हैं। 1933 से प्रकाशित हो रही इस पत्रिका को ऋषभ चरण जैन ने निकाला था। यह देश की सम्मानित फिल्म पत्रिका थी। बस मैंने दिल्ली का टिकट खरीदा और ट्रेन में सवार होकर पहुंच गया देश की राजधानी में। दिल्ली में लंबे समय तक मैं 1092 सतघरा, धर्मपुरा मुहल्ले में रहा।

आज मीडिया जगत फिल्म पत्रकारिता को जितना महत्व दिया जा रहा है वह पर्याप्त है या फिर और स्थान मिलना चाहिए...
इस समय भी या इससे पहले भी फिल्म पत्रकारिता को कभी ज्यादा महत्व नहीं मिला। फिल्म पत्रकारिता में बहुत से लोग ऐसे हैं जो अपने विषय का गहरा ज्ञान नहीं रखते। परंतु लिखते जा रहे हैं। ऐसे लोगों ने फिल्म पत्रकारिता को बड़ा अहित पहुंचाया है।
अगर आप फिल्म समीक्षक हैं तो आपको कैमरा मूवमेंट, लाइट, लोकेशन जैसी तकनीकी समझ भी होनी चाहिए। कहानी पक्ष का ज्ञान होना चाहिए। फिल्म देखते समय उन बातों को उजागर करना जरूरी है जो निर्देशक और कलाकार के दिमाग में नहीं आई हो।

फिल्मों की अच्छी समीक्षा कैसी होनी चाहिए...
अच्छी समीक्षा के लिए निष्पक्ष दृष्टिकोण का होना आवश्यक है। निर्माता निर्देशक कलाकार सबके प्रति आपकी दृष्टि साफ होनी चाहिए। कथाकार, संवाद लेखक, गीतकार आदि के विषय में भी निष्पक्ष भाव होना चाहिए। ऐसा नहीं होना चाहिए कि फलां प्रोड्यूसर या आर्टिस्ट मेरा दोस्त है तो उसके लिए अच्छा नहीं लिखा तो वह नाराज हो जाएगा।
रामानंद सागर से मेरी अच्छी दोस्ती रही. पर मैंने कभी उनके लिए आशक्त होकर समीक्षा नहीं लिखी। सबसे महत्वपूर्ण है कि फिल्म की कहानी का देश और समाज पर क्या प्रभाव पड़ता है, यह बताना जरूरी है।

फिल्म पत्रकारिता आजकल जन संपर्क (पीआर) बनकर रह गई है। इस पर आपके क्या विचार हैं...
मैं इस विचार से काफी हद तक सहमत हूं। आज जन संपर्क अधिकार प्रकार के लोग फिल्मी पत्रकारों पर हावी होने की स्थिति में हैं। पत्रकारों के पास अपने स्रोत नहीं है। वे इस मामले में पीआरओ पर आश्रित हैं। जब आप पीआरओ से सुविधाएं प्राप्त करेंगे तो वह आपसे अपेक्षा रखेगा कि आप वैसा ही लिखो जैसा कि वह चाहता है।

फिल्म पत्रकारिता में गॉसिप का क्या महत्व है...
बिना आग के धुआं नही होता। और बिना धुआं के भी आग का आभास हो जाता है। चीजें होती हैं, और अखबारों में आती हैं। उसका प्रोफेशन से संबंध नहीं होता। जैसे उसका उससे रोमांस चल रहा है। दोनों साथ देखे गए हैं। कुछ बातें होती हैं। कुछ बातें पत्रकारों द्वारा गढ़ ली जाती हैं। अतः फिल्मी पत्रिकाओं में काफी कुछ गॉसिप प्रकाशित होता रहता है। चूंकि आम आदमी को अपने हीरो के व्यक्तिगत जीवन के बारे में भी जानने की इच्छा रहती है। इसलिए यह सब कुछ मजे लेकर पढ़ा जाता है।
कई बार कलाकार खुद दूसरे कलाकार पर इस तरह के आरोप लगाते हैं। इन सब चीजों को सरासर गप नहीं कहा जा सकता। जब दुर्गा खोटे और मुबारक साथ-साथ रहते और घूमते थे तो उनके बारे में लोगों ने खूब लिखा। परंतु तील का ताड़ बना लिया जाना भी उचित नहीं कहा जा सकता।

अब तक के जीवन में जो कार्य किए  हैं उनमें से कौन सा ऐसा कार्य है जिसे करके आपको सर्वाधिक संतोष हुआ है..
चित्रपट के संपादकीय टीम से अलग होकर मैंने अपनी फिल्म पत्रिका युग छाया निकाली। वह 1947 का साल था, जब देश आजाद हुआ था। यह पत्रिका 1980 तक प्रकाशित होती रही। इसमें बड़े-बड़े फिल्मी कलाकारों के इंटरव्यू प्रकाशित होते थे। वे फिल्मी सितारे दिल्ली आते थे तो मुझसे मिलने आते थे। फिल्म स्टार धर्मेंद्र ने तो मेरे लिए दिल्ली में पार्टी का आयोजन कर मुझे सम्मानित भी किया था। मैंने पूरे जीवन में जो कार्य किए हैं उसे पाठक भी और फिल्म पत्रकार भी महत्व प्रदान करते हैं। यही सबसे बड़ा सुख है।

इतनी लंबी साधना में कभी आपका जी उबा है...
जी तो कभी नहीं उबा। कुछ दुख की घड़ियां आईं पर जिंदगी अपनी रफ्तार से चलती रही। हां, कभी-कभी वित्तीय संकट जरूर आया, जिससे थोड़ी घबराहट हुई, लेकिन फिर सब ठीक होता गया। 

फिल्म पत्रकारिता से जुड़े कुछ यादगार संस्मरण साझा करना चाहेंगे...
राजेंद्र कुमार और रामानंद सागर से मेरी बड़ी अच्छी दोस्ती थी। जब राजेंद्र कुमार ने लव स्टोरी फिल्म बनानी शुरू की तो अपनी पूरी टीम के साथ बेटे कुमार गौरव को लेकर हमारे पास आए। राजेंद्र कुमार ने बेटे का परिचय कराते हुए कहा, ये संपत लाल पुरोहित जी हैं, मेरे स्टार होने में इनका बड़ा योगदान है। तुम इनके पांव छुओ। परंतु आजकल के लड़के पांव कहां छू पाते हैं।

एक और वाकया। जब राज कपूर की बॉबी रीलिज हुई तो कई दिल्ली के पत्रकारों ने बॉबी की अच्छी समीक्षा नहीं लिखी। इससे बॉबी के सह निर्माता रहे शशि कपूर गुस्सा था। दिल्ली की एक प्रेस कान्फ्रेंस में शशि कपूर साहब बाहें चढाते हुए बोले, किस किस ने हमारी बॉबी के खिलाफ लिखा है... हमलोग अवाक थे। अचानक हम बोल पड़े हमने भी कोई चूड़ियां नहीं पहन रखी है... इस बीच राजकपूर साहब आ गए और मामला शांत हुआ।

कभी फिल्मों के लिए लिखा...
फिल्मों के लिए तो कभी नहीं लिखा। परंतु मैंने कई उपन्यास जरूर लिखे थे। जो कई दशक पूर्व प्रकाशित हुए थे। वे थे – धरती के देवता, मजहब और ईमान, ऊपर नीचे, मालवा की माटी, भ्रष्टाचार और दो कदम आगे। इन सब उपन्यासों को मैंने अपने प्रकाशन से ही छापा था। अंधी उपासना नामक उपन्यास एक अन्य प्रकाशन ने छापी थी।

हिंदी फिल्मों के इतिहास  में आप सबसे अच्छा शो मैन किसे मानते हैं...
अभिनेता मोतीलाल राजवंश 
शो मैन के तौर पर निर्विवाद रूप से मैं राज कपूर का ही नाम लूंगा। हां अच्छे निर्देशकों की बात करें तो महबूब और शांताराम के नाम लूंगा। महबूब खान की 1942 में आई फिल्म रोटी को मैं बेहतरीन फिल्मों में गिनता हूं। फिल्म कहानी पूंजीवाद पर गहरी चोट करती है। इस फिल्म में चंद्रमोहन, शेख मुख्तार और सितारा, अख्तरीबाई फैजाबादी की प्रमुख भूमिकाएं थीं। 

आपकी नजर में सबसे अच्छे अभिनेता कौन हैं...
आप अच्छे एक्टर की बात करें तो मोतीलाल का नाम लूंगा। मेरी नजर में तो मोतीलाल अकेले ऐसे एक्टर हुए जिन्होंने भारत में स्वतंत्र और स्वाभाविक अभिनय किया। ( अभिनेता मोतीलाल  राजवंश का जन्म 1910 में शिमला में हुआ था , उनका निधन 1965 में हुआ )  दिलीप कुमार ने भी मोतीलाल की नकल की। आगे दिलीप कुमार की नकल अमिताभ बच्चन ने की। अभिनेत्रियों में सरदार अख्तर जबरदस्त थीं। अभिनेत्री सरदार अख्तर का जन्म 1915 में लाहौर में हुआ था। उन्होंने निर्माता महबूब खान से विवाह किया था। उनका निधन 1984 में अमेरिका में हुआ। )  वहीं धार्मिक पिक्चरों की बात करें तो इनमें शोभना समर्थ अच्छी थीं।

सरदार अख्तर अभिनेत्री 
फिल्मों और फिल्म पत्रकारिता का भविष्य कैसा लगता है...
देखिए फिल्मोंका भविष्य फिल्मकारों के हाथ में है। और फिल्म पत्रकारिता का भविष्य फिल्म पत्रकारों के हाथ में है। वही उसको बना सकते हैं। वही बिगाड़ सकते हैं। फिल्म पत्रकार ही इसके लिए जिम्मेवार हैं कि वे ऐसा लिखें जो समाज के लिए अभिप्रेरक हो। 

अब जब इलेक्ट्रानिक मीडिया का प्रसार हुआ है फिल्म पत्रकार के सामने चुनौतियां बढ़ी हैं। फिल्म पत्रकारिता में ईमानदारी की बहुत जरूरत है। नए पत्रकारों को चाहिए कि वे खूब अध्ययन करें और काफी सोच समझकर लिखें। फिल्म निर्माता और पत्रकार दोनों को अंतररात्मा की आवाज सुननी चाहिए।

-----           ( संचार माध्यम के जनवरी मार्च 1997 अंक में प्रकाशित, भारतीय जन संचार संस्थान, नई दिल्ली का प्रकाशन 

पोस्ट स्क्रिट - कुछ लोग दावा करते हैं कि संपत लाल पुरोहित के उपन्यास - दो कदम आगे की कहानी पर हिंदी फिल्म एक फूल दो माली (1969) बनी थी। यह फिल्म सुपर हिट हुई थी। हालांकि इस फिल्म की कास्टिंग में कहानी में मुस्ताक जलाली का नाम दिया गया है। पर पुरोहित जी ने मुझसे बातचीत में एक फूल दो माली को लेकर कोई दावा नहीं किया था। 

जब मैंने 1996 में कुबेर टाइम्स हिंदी दैनिक में फिल्म, टीवी मनोरंजन के पन्नों  पर नौकरी शुरू की तब दिल्ली में तीन वयोवृद्ध फिल्म पत्रकार थे जो कभी भी मिलते थे। वे थे - बच्चन श्रीवास्तव, ब्रजेश्वर मदान और संपतलाल पुरोहित। पुरोहित जी का कालम हमारे अखबार में हर हफ्ते छपता था। यह कालम लेने हमारे दफ्तर का एक चपरासी हर हफ्ते जाया करता था। एक बार वह चपरासी छुट्टी पर था। दफ्तर में पुरोहित जी का फोन आया कॉलम ले जाने के लिए। मैंने फोन उठाया, मैंने कहा, कोई बात नहीं संदेशवाहक नहीं है मैं खुद आ रहा हूं। मैं पहुंच गया दरियागंज के उनके आवास में। लेख प्राप्त करने के बाद पुरोहित जी से थोड़ी बातचीत हुई। उसके बाद चपरासी की ड्यूटी खत्म। हर हफ्ते पुरोहित जी के पास कॉलम लेने मैं खुद जाने लगा। इसके कई फायदे हुए। हर हफ्ते में पुरोहित जी के पास आधे घंटे बैठता। बहुत सारी फिल्म जगत की जानकारियां उनसे मिलतीं। उनके अलबम में फिल्मी पार्टियों की पुरानी तस्वीरें देखता। उनका नेपाली सहायक मुझे चाय के साथ सैंडविच पेश किया करता। 

वैसे पुरोहित जी के जीवन में और कई गम थे। बुढ़ापे में अकेले रहते थे। उनके दो बेटों का निधन हो चुका था। बेटी और दामाद थे जो उनसे कभी कभी मिलने आते थे। आखिरी दिनों में प्रेस कान्फ्रेंस में जाना उन्होंने छोड़ दिया था। पर प्रेस शो में फिल्में देखने जाया करते थे। हमने होटल ब्राडवे में फिल्म अभिनय का प्रशिक्षण देने वाली आशा चंद्रा की प्रेस कान्फ्रेंस आयोजित की थी। उसमें मेरे विशेष आग्रह पर पुरोहित जी पहुंचे थे। सात बटा 21 का वह कमरा किराये का था। उस पर भी मकान मालिक से मुकदमा चल रहा था। पर जब तक जीेये पूरी जिंदादिली से रहे। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
 ( SAMPAT LAL PUROHIT, FILM JOURNALIST, DARIYAGANJ, YUGCHAYA MAGZINE, CHITRAPAT MAGZINE )