Sunday, 1 December 2013

अकेले हैं तो क्या गम है....

कोवलम समुद्र तट, तिरुवनंतपुरम, केरल। 
बदलते समाज में कई तरह की पुरानी मान्यताएं टूट रही हैं। किसी जमाने में औरत को हमेशा किसी पुरूष के साथ ही संरक्षण की जरूरत होती थी। अब वह जमाना नहीं रहा। इक्कसीवीं सदी में नारी की छवि मजबूत होकर उभरी है। रोजगार के कई नए क्षेत्रों में प्रवेश ने उसके आत्मसम्मान को बढ़ाया है। ऐसे में समाज में ऐसी महिलाओं की संख्या भी बढ़ी है जो सारा जीवन अकेले गुजार देना चाहती हैं। पुरूषों के मामले में हमेशा से इस तरह के उदाहरण सुनने में आते थे पर महिलाओं के बारे में ऐसा कम ही सुना जाता था। पुरातन भारतीय मानसिकता के अनुसार स्त्री को बचपन में पिता के संरक्षण में और जवानी में पति के संरक्षण में तो बुढ़ापे में बेटे के संरक्षण में रहना चाहिए। पर अब नारी वैसी अबला नहीं रही जिसे हर वक्त किसी के संरक्षण की जरूरत हो। आज के दौर में खुद धनोपार्जन करने वाली महिला हर तरह से अपना संरक्षण करने में सक्षम है। वह खुद अस्पताल भी जा सकती है, लंबी यात्राएं भी कर सकती है। वह न सिर्फ अपना बल्कि अपने परिवारा का भी पालन कर सकती है। सुरक्षित बुढ़ापे के लिए वह बीमा योजनाओं और मेडिक्लेम पालिसियों का सहारा ले सकती है। वह अच्छा खासा धन जमा करके अपना बुढ़ापा सुरक्षित कर सकती है। ऐसे में समाज में कई ऐसी महिलाएं भी देखने को मिल रही हैं जो विवाह जैसे बंधनों में बंधना नहीं चाहतीं। कई बार विद्वान महिलाओं को अपनी ही तरह का कोई साथी नहीं मिलता जिसके साथ वे सारा जीवन गुजार देने की बात सोच सकें। ऐसा कई विदुषी महिलाओं के साथ हुआ है कि शादी के बाद उनकी पति से नहीं पटी उसके बाद वे दोनों अलग हो गए और अपने कैरियर के साथ वे एकाकी जीवन बीताने को मजबूर हैं। दिल्ली और मुंबई सरीखे शहरों में कई कैरियर ओरिएंटेड महिलाएं ऐसी हैं जो एकाकी जीवन बीता रही हैं। 
कई महिलाएं इसको कोई मजबूरी नहीं मानतीं। कई बार हिपोक्रेट मानसिकता का पुरूष अपनी पार्टनर को कैरियर में अपने से ज्यादा सफल नहीं देखना चाहता तो कई बार वह अपनी पत्नी से यही अपेक्षा रखता है कि उसकी पत्नी घर और बच्चों को ज्यादा समय दे, जबकि कैरियर वूमेन के मामले में व्यवहार में इस तरह का संभावना नहीं हैं। ऐसे में महात्वाकांक्षी महिलाओं के लिए एकाकी जीवन कोई आश्चर्यजनक घटना के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। अगर हम प्रचीना भारतीय दर्शन का हवाला भी लें तो यह पता चलता है कि वेदों लिखा है कि पुत्र और पुत्री अगर अतिशय विद्वान हो जाते हैं तो उनके लिए विवाह जैसे बंधनों की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती है। ऐसे लोग सारा जीवन अकेले गुजार सकते हैं। जिस तरह राजनीति में अटल बिहारी वाजपेयी, मायावती और कांशीराम जैसे उदाहरण हैं वैसे ही उदाहरण किसी भी सफल पेशे में हो सकते हैं। दरअसल सारी मान्यताओं के ढोने का जिम्मा मध्यम वर्ग के पास ही होता है। विद्वान व्यक्ति के साथ ही दिक्कत होती है कि उसके विचार हर किसी से मेल नहीं खाते इसलिए वह किसी का साथ लंबे समय तक निभा नहीं पाता। उसके लिए समझौता करना मुश्किल होता है। ऐसे में कोई रिश्ता जोड़ने और उसके दुखद अंत होने से अच्छा अकेले जीवन गुजार देना ही है। हम भले ही ऐसी चीजों को समान्यीकृत नहीं कर सकते, यह नहीं कह सकते हैं कि समाज इसी ओर आगे बढ़ रहा है, पर हमे यह स्वीकारना पड़ेगा कि समाज में ऐसा हो रहा है। हमें इस तरह के उदाहरणों को नारी के उभरते स्वाभिमान और उसके मजबूत होते कद के रूप में ही देखना चाहिए किसी नकारात्मक रूप में नहीं।

माधवी रंजना



Tuesday, 5 November 2013

चलना जीवन की निशानी...

चलना जीवन की निशानी रुकना मौत की निशानी...। जीवन चलने का नाम, चलते रहो सुबह ओ शाम...। जैसे गीत हमेशा चलते रहने का संदेश देते हैं। वास्तवमें इतिहास वही लिखता है जो अनवरत चलता रहता है। कई लोग राज्य की सीमाएं लांघते हैं तो कई देश की। कई लोग एक सुंदर सा घर बनाते हैं और जीवन भर उसकी देखभाल में लगा देते हैं। वे घर के मोह को छोड़कर कहीं आगे नहीं बढ़ते। ऐसे लोगों की कहीं चर्चा नहीं होती। उन्हें कोई याद नहीं करता। इतिहास भी उन्हीं लोगों को याद करता है जिन्होंने दुनिया को नाप डाला। जब स्वामी विवेकानंद को सर्व धर्म सम्मेलन में भाग लेने का मौका मिला तो वे संकोच कर रहे थे। उनके गुरू रामकृष्ण परमहंस उनके प्रारब्ध में आए और उन्हें जाने का आदेश दिया। गांधी जी को दक्षिण अफ्रीका जाने का अवसर मिला तो कई मुश्किलें भी आईं। पर गांधी जी के व्यक्तित्व का विकास दक्षिण अफ्रीका जाकर ही हुआ। इसलिए प्रगति के आकांक्षी लोगों को स्थान परिवर्तन के लिए या कहीं भी सफर पर जाने के लिए तैयार रहना चाहिए।
लालबाग, बेंगलुरु।
शायर इस्माईल मेरठी ने लिखा है- सैर कर दुनिया की गाफिल जिन्दगानी फिर कहां, जिंदगी गर कुछ रही भी तो नौजवानी फिर कहां। 

एक और दार्शनिक ने लिखा है- वांडरिंग वन गेदर्स हनी ( जो घूमते हैं उन्ही को शहद प्राप्त होता है)
भ्रमणशील व्यक्ति को कूपमंडूपता से निजात मिलती है जिससे उसका व्यक्तित्व निखरता है। वह लोगों के बीच बेहतर ढंग से व्यक्त होता है। अलग अलग क्षेत्र के लोगों से विचारों के आदान प्रदान से व्यक्तित्व का विकास होता है। इतिहास में हम देखते हैं कि जब यातायात के साधन इतने विकसित नहीं थे तब भी लोग अंतहीन यात्राएं किया करते थे। कई यात्री तो लौटकर अपने घर नहीं आ पाते थे। आजकल तो संचार के साधन अत्यंत विकसित हो गए हैं। आप अपना मोबाइल साथ रखकर दुनिया भर में घूम सकते हैं। अपने ईमेल बाक्स से कहीं भी रहें लोगों के संपर्क में रह सकते हैं। जीवन का नाम ही तो चलना और हमेशा कुछ नया ढूंढना हैं। कई लोग अंतहीन गगन में हमेशा रास्ता नापते रहते हैं। 

जहां चलते-चलते कदम रुक जाएं समझ लो सितारों की मंजिल वहीं हैं। 

दुनिया में जितने भी बड़े महापुरूष हुए हैं उन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा भ्रमण को समर्पित किया। पुराने जमाने में गौतम बुद्ध। हाल के इतिहास में देखें तो गुरू नानक देव सरीखा दूसरा भ्रमणशील महापुरूष नहीं दिखता। वैसे भी विद्वानों का कोई देश नहीं होता। वे जहां चले जाते हैं वहीं उनकी पूजा होने लगती है। स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान सर्वत्र पूज्यते। अरे आप रुक क्यों गए हैं आप भी अपना सफर जारी रखिए। वास्तव में कोई मंजिल नहीं होती। रास्ते भी हमेशा चलते रहते हैं। रास्ता ही मंजिल है। जिसे आप मंजिल समझ कर रुक गए हैं, वास्तव में वह एक पड़ाव। अगर चलते चलते थक गए हैं तो थोड़ा सुस्ता लिजिए फिर एक नए मंजिल के लिए निकल पड़िए।
 -विद्युत प्रकाश


Monday, 17 June 2013

रसोई गैस का विकल्प

रसोई गैस की कीमतें आसमान छू रही हैं। फिलहाल ये 400 रूपये प्रति सिलेंडर से ज्यादा हो गई हैं। वहीं सरकार और सब्सिडी घटाने की योजना रखती है। माना जा रहा है कि एक गैस सिलेंडर की कीमत 800 रूपये पहुंच सकती है। वहीं सरकार आम लोगों को साल में कुछ निश्चित सिलेंडर ही रियायती मूल्य पर देने की योजना लाने वाली है। अगर ये योजना लागू हो जाती है तो एक घरेलू उपभोक्ता को सिर्फ चार सिलेंडर ही रियायती दरों पर मिला करेंगे। उसके बाद बाद के सिलेंडर के लिए बाजार दर यानी 800 रूपये तक देना पड़ सकता है। ऐसे में ये जरूरी हो गया है कि रसोई गैस के दूसरे विकल्पों के बारे में गंभीरता से सोचा जाए। अब कई गांवों तक गैस कनेक्शन पहुंचा दिया गया है। लेकिन गैस पर खत्म होने वाली सब्सिडी का असर सभी जगहों पर पड़ेगा।

 रसोई गैस की किल्लत से निपटने के लिए गुजरात के कच्छ जिले के गंगापर गांव के लोगों ने अनूठा इंतजाम किया है। इस गांव में गोबर गैस प्लांट की स्थापना की गई है। ये प्लांट गांव के 60 घरों के लोगों को महज 20 रूपये मासिक मासिक पर चार घंटे गैस की सप्लाई दे रही है। गैस की सप्लाई का समय सुबह 10 से 12 बजे और शाम 7 से नौ बजे तक रखा गया है। गोबर गैस प्लांट की स्थापना में 25 लाख रूपये खर्च आया है जिसमें मिनिस्ट्री और नेचुरल रिसोर्सेज ने 90 फीसदी सब्सिडी दी है। ये गैस प्लांट शहर के पीएनजी से मिलता जुलता है। गांव के हर घर को पाइप से गैस की सप्लाई की जा रही है। गांव में बने इस गैस प्लांट से गांव के कई लोगों को रोजगार भी मिल सका है। अमूमन हर गांव में इतने पशु होते हैं जिससे कि गोबर गैस प्लांट की स्थापना की जा सकती है। गुजरात के भुज जिले के इस गांव के माडल को अब दूसरे गांव भी अपना सकते हैं।

वैसे तो गोबर गैस प्लांट लगाने का प्रोजेट बहुत पुराना है। लेकिन गांव में वही लोग अपना स्वतंत्र गोबर गैस प्लांट लगा पाते हैं जिनके पास जानवरों की संख्या 4-6 से ज्यादा हो। लेकिन गांव में कम्यूनिटी गोबर गैस प्लांट लगाने के इस प्रोजेक्ट से पूरे गांव लोगों को फायदा होगा। गुजरात के इस प्रोजेक्ट को देश के उन तमाम गांवों में लागू किया जा सकता है जहां भी लोगों के पास पशु संपदा है। वैसे गांव जहां 50 से अधिक घर हैं ऐसे प्लांट बड़े आराम से लगाए जा सकते हैं। ऐसे प्लांट लगाए जाने से गांव के लोगों लकड़ी और गोबर के उपलों से चलने वाले चूल्हे से छुटकारा मिल सकता है। साथ ही धुआं रहित रसोई घर में गृहणियां अपनी मनमाफिक खाना बना सकती हैं। गांव में बड़ी संख्या में महिलाएं लकड़ी और उपले पर खाना बनाने के कारण सांस की बीमारियों का शिकार होती हैं उन्हें भी गोबर गैस के चुल्हे के कारण ऐसी बीमारियों से निजात मिल सकती है। साथ ही गांव के लोगों को शहर के गैस सप्लाई की तरह खाना बनाने का एक सस्ता विकल्प मिल सकेगा। जरूरत है तो बस इस प्रोजेक्ट का प्रचार प्रसार करने की।

-   -------- विद्युत प्रकाश मौर्य


हमारी बुद्धि को कमजोर कर रहे हैं सर्च इंजन

क्या गूगल हमें लाचार बना रहा है। क्या गूगल जैसे सर्च इंजनों के कारण लोगों की स्मरण शक्ति कमजोर पड़ती जा रही है। ये एक बड़ा सवाल आजकल हमारे सामने है। कुछ शोध में परिणाम सामने आया है कि गूगल जैसे सर्च इंजनों पर लगातार बढ़ती निर्भरता के कारण लोगों की स्मरण शक्ति कमजोर पड़ती जा रही है। पहले जहां कोई भी नई जानकारी लेनी हो तो हम सबसे पहले अपने दिमाग पर जोर डालते थे, लेकिन अब जब किसी के बारे में जानकारी लेने की बात सामने आती है तो लोग सर्च इंजन का सहारा लेने लगते हैं। इंटरनेट पर गूगल के अलावा बिंग, खोज, याहू सर्च जैसे कई सर्च इंजन हैं।  लेकिन गूगल पर बढ़ती आत्मनिर्भरता घातक भी हो सकती है। हो सकता है आप एक दिन वैचारिक रूप से विकलांग बन जाएं। 

याद किजिए जिस जमाने में सर्च इंजन नहीं थे आखिर कैसे काम होता था। हमें किसी भी तरह की जानकारी के लिए अपनी स्मरण शक्ति पर भरोसा करना पड़ता था, या फिर आसपास के किसी काबिल आदमी से पूछना पड़ता था। जब किसी को नहीं पता होता था तब इयर बुक रेफरेंस बुक का सहारा लिया जाता था। लोग अपनी जानकारी के लिए डायरी तैयार करते थे। अब रेफरेंस बुक, इयर बुक और लाइब्रेरी का इस्तेमाल कम हो गया है। लोग कोई भी जानकारी लेने के लिए फटाफट सर्च इंजनों का सहारा लेने लगते हैं। लेकिन सर्च इंजनों के लगातार इस्तेमाल ने जाहिर है हमें लापरवाह बना दिया है। लोगों में डायरी बनाने की प्रवृति कम हो गई है। हमलोग सब कुछ आनलाइन ढूंढना चाहते हैं। जाहिर सर्च इंजन ने कई मुश्किलें आसान तो की हैं। एक माउस के क्लिक भर से दर्जनों रिजल्ट आपकी आंखों के सामने होते हैं लेकिन इससे दिमाग का इस्तेमाल करने की प्रवृति भी कम हुई है।

वैसे भी हमें सर्च इंजनों के इस्तेमाल से मिले रिजल्ट को लेकर सावधान रहना चाहिए क्योंकि कई बार सर्च इंजन के रिजल्ट भी गलत हो सकते हैं। क्योंकि सर्च इंजन या विकिपिडिया जैसी साईटों पर जानकारी भी हमारे आपके जैसे लोग ही अपडेट करते हैं। एक ही सर्च की गई जानकारी के रिजल्ट कई बार अलग अलग भी निकल आते हैं। ऐसे में सही क्या है इसको तय करने में विवेक का इस्तेमाल भी जरूरी है। दुनिया भर में बड़ी संख्या में ब्लागर भी बन चुके हैं। ब्लाग पर भी डाली गई जानकारियां सर्च इंजन में दिखाई गई हैं। लेकिन कई बार ब्लाग पर दी गई जानकारियां गलत और भ्रामक भी हो सकती हैं।

भले ही आज इंटरनेट यूजर सर्च इंजनों का इस्तेमाल करते हैं लेकिन सूचनाओं को सहेजने के लिए आज भी डायरी लिखना अच्छी प्रवृति हो सकती है। आप जिस क्षेत्र में जानकारी बढ़ाना चाहते हों उसकी फाइलिंग करें। हर साल इयर बुक खरीदें। इससे पढ़ने और याद रखने की प्रवृति बची रहेगी। यानी सिर्फ सर्च इंजनों पर आत्मनिर्भरता सही प्रवृति नहीं है। हमेशा नई नई किताबें पढ़ते रहना और मेमोरी टिप्स को आजमाना भी अच्छा रहेगा।


-          विद्युत प्रकाश मौर्य 

Friday, 17 May 2013

कैसे खत्म होगी झुग्गियां ....

दिल्ली- पुराना किला के सानिध्य में बोटिंग का लुत्फ। 
दिल्ली सरकार झुग्गियों को लेकर अब चेत गई है। वह झुग्गी वाली जमीनों पर मल्टी स्टोरी वन रूम फ्लैबनाने की योजना पर काम कर रही है। एक आंकड़े मुताबिक दिल्ली की 20 फीसदी आबादी झुग्गी झोपड़ी में बसती है।
भले ही दिल्ली को दुनिया की सबसे खूबसूरत राजधानियों में शुमार किया जाता हो पर दिल्ली की झुग्गियां शहर की बड़ी हकीकत है। दिल्ली का असली चेहरा है। वास्तव में दिल्ली में झुग्गी झोपड़ियां दिल्ली के खूबसूरत चेहरे पर एक बदनुमा धब्बा है जिसे हटाने के लिए कभी इमानदारी से कोशिश नहीं की गई। भला कोशिश भी कैसे की जाए। दिल्ली की झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले लोग दिल्ली शहर की बड़ी जरूरत हैं। ग्रेटर कैलाश जैस पॉश कालोनियों में चौकीदार, माली, रसोइया, सफाईवाले सभी लोग इन्ही झुग्गी झोपड़ियों में तो रहते हैं। रेहड़ी पटरी पर सामान बेचने वाले और वे सारे लोग जिन्होंने दिल्ली में आलीशान अट्टालिकाएं खड़ी करने में अपना जीवन होम कर दिया सभी इन्ही झुग्गियों में रहते हैं। हमने कभी ऐसे लोगों के लिए इमानदारी से सोचा ही नहीं। दिल्ली में झुग्गियां बढ़ती गईं। हां कभी कभी उन्हें एक जगह से डंडे के बल पर भगाने की कोशिश की गई। तो झुग्गी वाले एक जगह से दूसरी जगह शिफ्ट कर गए। भला झुग्गी में रहने वाले सभी लोगों को दिल्ली से भगा दोगे तो दिल्ली कैसे चलेगी। झुग्गी वालों के बिना दिल्ली का जीवन ठहर जाएगा। अब दिल्ली सरकार ने झुग्गी वालों के बारे में सोचा है। जिन स्थलों पर कब्जा करके झुग्गियां बनी हैं वहां अब एक कमरे के मल्टी स्टोरी अपार्टमेंट बनाने की बात की जा रही है। इन अपार्टमेंट में इन्ही झुग्गी वालों को घर दिए जाएंगे। ये योजना अगर मूर्त रूप लेती है तो सचमुच झुग्गी वालों का कुछ कल्याण हो पाएगा। इससे पहले भी झुग्गी वालों के लिए कुछ कालोनियां बनी हैं, पर वहां का जीवन स्तर सुधर नहीं पाया है। त्रिलोकपुरी कल्याणपुरी जैसे पुनर्वास कालोनियों की हालत झुग्गी झोपड़ी जैसी ही है। अब बहुमंजिले आवास की परिकल्पना साकार होने वाली है। पर सरकार ऐसी चिन्हित जमीन प्राइवेट बिल्डरों को देकर उसका व्यवसायिक इस्तेमाल भी करना चाहती है।
फिलहाल अगर आप किसी झुग्गी झोपडी कालोनी का दौरा करें तो पाएंगे कि वहां लोग ऐसे रहते हैं जो गांव में जानवरों के रहने की जगह से भी बदतर है। हवा धूप की बात तो दूर लोगों के लिए शौचालय भी नहीं है। तभी अगर आप दिल्ली आते हैं तो सब जगह रेल की पटरियों के किनारे सुबह सुबह लोग रेल की पटरी के किनारे नित्य क्रिया से निवृत होते देखे जाते हैं। यह भी दिल्ली का एक बदरंग चेहरा है। रेल मंत्री ऐसे लोगों को चेतावनी देते हैं पर ऐसे लोग जाएं कहां। जब भी दिल्ली के विस्तार की योजना बनाई गई तो दिल्ली को सुचारू रूप से चलाते रहने वाले इन झुग्गी में रहने वाले लोगों के आवास के लिए योजना नहीं बनाई गई। अगर हर चरण में ऐसे लोगों के लिए आवास विकल्प के बारे में सोचा गया होता तो दिल्ली में इतनी बड़ी संख्या में झुग्गियां नहीं बनी होतीं। अब अगर झुग्गी झोपड़ी वालों के बारे में सोचा जा रहा है तो हमें साथ साथ यह भी देखना होगा कि हम इस तरह से योजना बनाएं कि 40 साल बाद की दिल्ली में ऐसी झुग्गी झोपड़ियों का नामोनिशान नहीं रहे।


Wednesday, 17 April 2013

अब हाईडेफनिशन मेकअप

लाख छुपाओ छुप न सकेगा असली चेहरा...जी हां हाईडेफनिशन टीवी स्क्रीन पर असली चेहरे को छुपाना बहुत मुश्किल है। टेलीविजन में आई नई तकनीक यानी एचडी टीवी डिजिडटल टीवी की तुलना में 10 गुनी ज्यादा साफ तस्वीरें दिखाता है। लेकिन साफ तस्वीरों के साथ दूसरी दिक्कते भी हैं। हाईडेफनिशन कैमरा चेहरे के छोटे छोटे दाग धब्बों को भी साफ-साफ गहराई के साथ स्क्रीन पर दिखा देता है। यानी एचडी में क्लोजअप शॉट लिया तो सारी सच्चाई सामने आ जाती है।


आमतौर पर टीवी सीरियल हो या फिर टीवी के न्यूज रूम में एंकर और प्रेजेंटर सभी को मेकअप करके स्क्रीन पर आना पड़ता है। लेकिन अब लगभग सभी मनोरंजन चैनल हाई डेफनिशन पर शिफ्ट हो रहे हैं वहीं कई न्यूज चैनल भी एचडी तकनीक पर जाने की राह पर हैं, मेकअप की तकनीक में भी बदलाव लाना पड़ रहा है। जब आप बाथरूम में बड़े से आईने के सामने खड़े होते हो तो चेहरे के दाग धब्बे, झाइंया और मुहांसे सब कुछ दिखाई देते हैं। आमतौर पर फोटोग्राफी या टीवी पर शूटिंग के दौरान इन दाग धब्बों को पूरी तरह छुपा दिया जाता है। लेकिन हाईडेफनिशन स्क्रीन पर इन्हे आसानी से छुपाना मुश्किल है। अब इस नई हाईडेफनिशन तकनीक ने कई पुराने एक्टरों और और टीवी की महिला एंकरों को डरा दिया है। क्योंकि हाईडेफनिशन स्क्रीन उनके चेहरे की असलियत को बयां कर देती है।
क्या हैं उपाय - ऐसे में पहला उपाय है कि बिना कुशलता से मेकअप किए चेहरों को टाइट क्लोजअप शाट्स में स्क्रीन पर न लिया जाए। एबीसी चैनल के शो गुड मार्निंग अमेरिका की एंकर डायना कहती हैं कि जबसे उनका प्रोग्राम हाईडेफनिशन मोड में गया दर्शक उनकी आंखों के नीचे की पफिंग को स्क्रीन पर देख पाते हैं।  एचडी फारमेट ने खास तौर पर महिला एंकरों के लिए ज्यादा मुसीबत खड़ी कर दी है। क्योंकि उनकी त्वचा देखकर उनकी उम्र का एहसास आसानी से हो जाता है। मेकअप आर्टिस्टों के साथ एचडी फारमेट में ज्यादा बड़ी चुनौती है।
टीवी पर मेकअप आमतौर पर सांवली त्वचा को गोरी दिखाने और चेहरे के दाग धब्बों को छुपाने में काम आता है। लेकिन अब एचडी फारमेट में खास तरह के फिल्टर का इस्तेमाल का साथ ही स्टूडियो लाइटिंग में भी बदलाव लाया जा रहा है जिससे चेहरे की रंगत को काफी हद तक छुपाया जा सके।
मेकअप आर्टिस्टों को चुनौती- लेकिन इन सबसे बढ़कर चुनौती मेकअप आर्टिस्टों के सामने है। एचडीटीवी के आने के साथ ही अब हाईडेफनिशन मेकअप का दौर आ चुका है। मेकअप आर्टिस्ट एंकरों के लिए खास तरह के फाउंडेशन का इस्तेमाल करने लगे हैं जिससे चेहरे को दाग धब्बों को छुपाया जा सके। इस मामले में बाजार में उपलब्ध नई एडवांस टेक्नोलाजी के मेकअप उत्पादों ने काफी मदद की है। मेकअप एयरब्रश का इस्तेमाल हाईडेफनिशन कैमरे के सामने जाने से पहले किया जा रहा है, जिससे असली चेहरे को छुपाया जा सके। ये सब नए प्रयोग तो स्टूडियो के लिए ठीक हैं लेकिन ये उस समय नाकाफी हो जाते हैं जब आप आउट डोर शूटिंग कर रहे हों। जैसे कोई रिपोर्टर किसी घटना स्थल से पीटीसी कर रहा हो तब वह पूरे मेकअप में नहीं आ सकता।  
-    विद्युत प्रकाश मौर्य
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Wednesday, 20 March 2013

आईआईएमसी का साक्षात्कार और बेरी जी का संदर्भ

मैं एमए की पढ़ाई पूरी कर चुका था। मेरा चयन भारतीय जन संचार संस्थान में हिंदी पत्रकारिता पाठ्यक्रम में हो गया। जब मैं आईआईएमसी के साक्षात्कार कक्ष में जुलाई 1995 में पहुंचा तो बोर्ड के लोगों ने मेरे पत्रकारिता में किसी तरह के कार्य के अनुभव के बारे में पूछा।
 मैंने बताया कि इन दिनों मैं हिंदी प्रचारक संस्थान के निदेशक कृष्णचंद्र बेरी की आत्मकथा लिख रहा हूं। बोर्ड के लोग थोड़े चकित हुए। सभी लोग बेरी जो को सम्मान से जानते थे। एक सदस्य ने सवाल किया- बेरी जी ने किसी महानपुरूष की आत्मकथा पर काम किया था आपको पता है...मैंने बताया- हां 18 साल की आयु में ही उन्होंने हिटलर की आत्मकथा मेनकेंफ का पहला हिंदी अनुवाद पेश किया था। ये पुस्तक एक बार फिर नए रूप में प्रकाशित हो रही है।
बोर्ड के सदस्यों ने मुझसे और भी सवाल पूछे थे- मसलन इतिहास के छात्र होते आपने किन इतिहासकारों की पुस्तकें पढ़ी उनकी क्या खासियत है...मैंने ताराचंद, सुमित सरकार के नाम लिए। मेरे गृह नगर सासाराम के ऐतिहासिक नाम शेरशाह की इतिहास में प्रमुख देन- मैंने बताया डाक व्यवस्था, न्याय व्यवस्था और बाद में जीटी रोड। एक सदस्य ने पूछा पत्रकारिता बीएचयू में भी पढ़ाई जाती है फिर यहां क्यों आना चाहते हो। मैंने कहा आईआईएमसी की अच्छी फैकल्टी और आधारभूत संरचना के बारे में सुन रखा है। मेरा 20 मिनट का इंटरव्यू एक भी जवाब नकारात्मक नहीं रहा। पर बेरी जी पर शुरू हुए प्रसंग ने मेरे साक्षात्कार को लंबा खींचा और सुखद संवादों के साथ समापन हुआ। मैं बाहर आकर आश्वस्त हो चुका था कि मेरा चयन पक्का है। मैंने बनारस पहुंच कर बेरी जो ये बात बताई। साक्षात्कार बोर्ड में सबने उनका नाम सम्मान से लिया ये जानकर मैं व बेरी जी दोनों ही प्रसन्नचित थे। सचमुच उस दौर में कोई भी हिंदी का लेखक या पत्रकार नहीं होगा जो बेरी जो को न जानता हो। उन्होंने कमलेश्वर, राजेंद्र अवस्थी, शानी, विश्वनाथ प्रसाद ( आलोचक) जैसे कई नामचीन लेखकों की पहली किताब छापी वह भी  बिना किसी सिफारिश के। जब सक्रिय पत्रकारिता शुरू करने के बाद दिल्ली ली मीरिडयन होटल में टीवी धारावाहिक युग की प्रेस कान्फ्रेंस में मेरी कथाकार कमलेश्वर से मुलाकात हुई तब उन्होंने मुझसे बेरी जी का नाम अति सम्मान से लिया और उनकी प्रशंसा में न जाने कितने वाक्य कह डाले।
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   - विद्युत प्रकाश मौर्य 

Tuesday, 19 March 2013

हिंदी प्रकाशन के शलाका पुरूष कृष्णचंद्र बेरी और मैं

अपने कक्ष में कृष्ण चंद्र बेरी - 1996 ( फोटो-विद्युत) 
किसी के जीवन में उसका पहला काम पहला अनुबंध (एसाइनमेंट) बहुत महत्व रखता है। मेरा परिचय हिंदी प्रकाशन जगत के शलाका पुरुष कृष्ण चंद्र बेरी से होना एक संयोग था। तब मैं काशी हिंदू विश्वविद्यालय में एमए की पढ़ाई के साथ पत्रकारिता में फ्रीलांसिंग कर रह रहा था। दीप जगत के फीचर प्रभारी जीतेंद्र मुग्ध ने एक विषय दिया महंगी होती पुस्तकों के लिए जिम्मेवार कौन...इस पर प्रमुख प्रकाशकों से बातें करके फीचर तैयार करो। मैं विश्वविद्लाय प्रकाशन के पुरूषोत्तम दास मोदी, चौखंबा विद्या भवन के स्वामी और हिंदी प्रचारक संस्थान के निदेशक श्री कृष्णचंद्र बेरी से इसी क्रम में जून 1994 में मिला। 
बेरी जी की आदत थी हर नए व्यक्ति को भी उत्साहित करने की। सो उन्होंने विषय पर अपने विचार देने के साथ मुझे उत्साहित भी किया था। 

जब यह लेख प्रकाशित हो गया तब उसे दिखाने के बहाने मैं एक बार फिर बीएचयू से 9 किलोमीटर अपनी साइकिल चलाता हुआ पिशाचमोचन में हिंदी प्रचारक संस्थान के दफ्तर पहुंचा। मुझे देखते ही बेरी जी आह्लादित स्वर में बोले मैं इंटरव्यू पढ़ लिया है। तुमने जैसा मैंने कहा था वैसा ही हूबहू उतार दिया है। बात आगे बढ़ी, वे बातों बातों में अतीत में चले गए। वे कुछ भावुक हुए और कहा, मैं अपने कुछ पुराने संस्मरण लिपिबद्ध कराना चाहता हूं। तुम कुछ दिन बाद मुझे मिलो। बात आई गई हो गई। लेकिन उन्होंने थोड़े दिन बाद संदेश देकर मुझे बुलवाया। उनका प्रस्ताव था कि मैं अपनी आत्मकथा लिखवाना चाहता हूं। तुम इस काम को लिप्यांतरकार के तौर करो। उन्होंने जुबानी वादा किया पुस्तक में तुम्हारा नाम रूपांतरकार के तौर पर जाएगा। मेरे लिए पत्रकार बनने से पहले ये किसी काम का सुंदर प्रस्ताव लगा। अस्वीकार करने का कोई कारण नहीं था।
 एक दिन उनकी जीवनी प्रकाशकनामा पर काम शुरू हो गया। बेरी जी की उम्र 80 साल हो चुकी थी। बोलने में मुश्किल होती थी। लिख नहीं पाते थे। लिहाजा रोज मैं उनके घर और लाइब्रेरी में पुरानी फाइलों पुस्तकों से उनके जीवन के बारे में शोध करता। हर सुबह सात से आठ बजे एक घंटा वे अपने पुराने अनुभव सुनाते। मैं प्रश्नावली के साथ भी तैयार रहता। ये सब कुछ मैं अपने डिक्टाफोन में रिकार्ड करता। हर रोज एक कैसेट। फिर दोपहर में उसकी स्क्रीप्ट तैयार करता। इसके बाद अगले दिन के लिए फिर शोध और तैयारी। रहना खाना पीना सब बेरी जी के आवास में उनके परिवार के सदस्यों के साथ ही। उनके रसोई घर से बनकर आने वाली हिंग की खूशबु वाली थी का स्वाद नहीं भूलता। बेरी जी कभी कभी काम से खुश होने पर रसगुल्ले जरूर मंगाकर खिलाते थे। कभी लगातार कभी कुछ दिनों के ब्रेक के साथ काम जारी रहा। लगभग एक साल में 450 पृष्ठों की पुस्तक प्रकाशकनामा का मसौदा तैयार हो गया।

पुस्तक के संपादन का काम मैंने आईआईएमसी की छुट्टियों के दौरान और उसके बाद कुबेर टाइम्स में नौकरी मिल जाने के बाद भी छुट्टियों के दौरान वाराणसी जाकर पूरा किया। इस दौरान मैं बेरी जी के आवास में उनके सानिध्य में ही रहता था। पुस्तक प्रकाशकनामा 2001 में प्रकाशित हुई। इसे 2002 में भारत सरकार की ओर से भारतेंदु हरिश्चंद्र पुरस्कार भी मिला। 

-    - विद्युत प्रकाश मौर्य

Friday, 1 March 2013

ये दरिद्रनारायण का बजट है...

खाद्य सुरक्षा के लिए 10 हजार करोड़ का इंतजाम है 2013-14 के बजट में 

हर साल बजट पेश होता है। केंद्र सरकार से इस बजट से हर वर्ग को उम्मीद होती है। अमीर चाहता है उसे रियायत मिले, गरीब भी चाहता है उसे रियायत मिले। मध्यम वर्ग को लगता है महंगाई दूर करने की कोई जुगत वित्तमंत्री पेश कर दें। जिसे बजट सुनकर निराशा होती है वह इसमें ढेर सारी कमियां निकालना शुरू करता है। कई साल से बजट सुन रहा हूं। शायद ही किसी साल यह सुनने में आया हो कि हर वर्ग ने बजट को सराहा हो।
आखिर हम उम्मीद क्यों रखते हैं। क्या बजट सरकार लोगों को राहत देने के लिए पेश करती है। या फिर अपना एक साल का हिसाब किताब आगे बढ़ाने के लिए। 28 फरवरी की रात आजतक चैनल पर एक बजट लांज बना था। वहां अलग-अलग वर्गों के खास तौर अमीर लोग जमा थे जो काफी पीकर चिदंबरम के खिलाफ अपनी उबकाइयां निकाल रहे थे। किसी को बजट पसंद नहीं आया था। प्रसिद्ध पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी भी अमीरों के सरमाएदार की तरह बातें कर रहे थे।

 इस बार के बजट में चिदंबरम ने अमीरों से लिया और गरीबों को ज्यादा देने की कोशिश की है। ये बात अमीरों को हजम नहीं हो रही थी। भला एसयूवी महंगा हो गया, सुपरबाइक, एसी रेस्टोरेंट में खाना पीना महंगा हुआ, 50 लाख से ज्यादा वाले घर महंगे हुए तो अमीरों को थोड़ा दर्द तो होना ही था। लेकिन दरिद्रनारायण के लिए फूड सिक्योरिटी का इंतजाम किया, बेरोजगारों की सुध ली, युवाओं महिलाओं की सुध ली तो भला क्या गलत किया। भले ही इसे चुनावी बजट कहा जा रहा हो लेकिन इसमें पसमांदा लोगों खबर लेने की कोशिश की गई तो खाते पीते लोगों के पेट में दर्द तो होना ही था। लेकिन हम क्या करें हमारी फितरत है हम थोड़े में खुश होना नहीं जानते, हमें हमेशा थोड़े और की उम्मीद रहती है। 

विद्युत प्रकाश मौर्य ( 01 मार्च 2013 )