Tuesday, 17 March 2009

समलैंगिकता की वकालत

कुछ बुद्धिजीवियों ने भारत में भी समलैंगिकता को कानूनी जामा पहनाने की वकालत की है। इसके लिए हस्ताक्षरित पत्र राष्ट्रपति को भी लिखा गया है। इतना ही नहीं एड्स जैसी बीमारी के लिए काम करने वाली संस्था नाको ने भी इसके समर्थन में अभियान छेड़ दिया है।

 नाको के एक आंकड़े के अनुसार देश में 24 लाख से ज्यादा ऐसे लोग हैं जो समलैंगिक हैं। नाको के अनुसार वह सिर्फ छह लाख लोगों को ही कवर कर पाया है बाकि लोगों तक पहुंचने के लिए उसे काफी समय चाहिए। नाको भी चाहता है कि भारत में समलैंगिकता को कानूनी मान्यता दे दी जाए। पर अहम सवाल यह उठता है कि क्या भारत जैसे देश में समलैंगिकता को मान्यता देना कितना उचित होगा। देश में बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग इसके पक्ष में है। दुनिया के कई देशों में समलैंगिकता के पक्ष में बयार बह रही है। कई देशों में तो गे परेड और उनके अलग से फैशन शो भी आयोजित किए जाते हैं। अमेरिका में ऐसे लोग भी कानूनी मान्यता की लड़ाई लड़ रहे हैं।
पर भारत जैसे देश में यह बड़े बहस का विषय है। हालांकि यह भारत की परंपरा नहीं रही है। कुछ राज्यों में कुछ लोगों के बीच इस तरह के किस्से जरूर सुने जाते हैं।


 कुछ साल पहले वरिष्ठ पत्रकार तवलीन सिंह ने बिहार के बक्सर जिले के आसपास के ऐसे कुछ मामलों पर अध्ययन किया था। उन्होंने यह स्थापित करने की कोशिश की थी समाज में इस तरह के रिश्ते चल रहे हैं। इतिहास में यह देखने में आया है कि मुगल आक्रमण कारियों की फौज में ऐसे लोग रहते थे जिनसे सरदार समलैंगिक रिश्ते बनाता है। पर किसी भी समाज में जब ऐसे रिश्तों को मान्यता देने का कानून बनाएं तो उससे पहले हमें इस विषय पर सूक्ष्मता से विचार करना होगा। इसका समाज पर कितना बुरा प्रभाव पड़ेगा। भारत में अगर इस तरह के रिश्ते कहीं बनते हैं तो भी लोग उसको सार्वजनिक तौर पर प्रकट नहीं करना चाहते। मनोवैज्ञानिक समलैंगिक संबंधों को एक मानसिक विकृति ही मानते हैं। जबकि समलैंगिक संबंधों के पैरोकार इसे एक समान्य तौर पर लेना चाहते हैं।
इधर मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री में इस विषय पर कई फिल्में भी बनने लगी हैं। पिछले साल की हिट फिल्म पेज 3 में इस तरह के संबंधों को दिखाया गया है। इसमें फिल्मी हीरो तथा समाज के रईस लोगों को इस तरह के संबंध में लिप्त दिखाया गया है। वहीं अमोल पालेकर ने इस पर एक फिल्म बनाई है क्वेस्ट। इस फिल्म में भी हीरो के अपनी पत्नी के अलावा अपने एक दोस्त से समलैंगिक संबंध दिखाए गए हैं। एक ऐसा विषय जिस पर लोग बात नहीं करना चाहते उस पर अब कहानियां भी लिखी जाने लगी है और फिल्में भी बनने लगी हैं। हिंदी के प्रख्यात साहित्यकार दूधनाथ सिंह की लंबी कहानी नमो अंधकारम में समलैंगकता के तत्व थे तो उससे काफी पहले पांडेय बेचन शर्मा उग्र के उपन्यास चाकलेट में भी इस विषय को उठाया गया था।

समलैंगिकता के पैरोकार इंडियन पीनल कोड की धारा 377 को हटाने की बात कर रहे हैं जिसके तहत समलैंगिक संबंधों को अपराध माना गया है। पर इसी धारा के तहत अगर कोई व्यक्ति किसी बच्चे के साथ कुकर्म करता है तो उसे सजा देने का प्रावधान है। अब अगर दो व्यक्ति अपनी मर्जी से इस तरह का संबंध बनाते हैं तो उन्हें सजा मिलनी चाहिए या नहीं यह चर्चा का विषय हो सकता है। पर इस तरह के रिश्तों को अगर कोई सार्वजनिक करता है तो उसका समाज पर कतई अच्छा प्रभाव नहीं पड़ता है। इसलिए ऐसे संबंधों पर परदा रखना ही उचित है।
-विद्युत प्रकाश vidyutp@gmail.com




Monday, 9 March 2009

हाई प्रोफाइल नशा - कोकीन

कोकीन एक हाई प्रोफाइल नशा है। इसकी एक डोज ही 4000 रुपए में आती है। जाहिर है कि कोई निम्न या मध्यम वर्ग का आदमी इस नशे को नहीं ले सकता। पहले फिल्म स्टार फिरोज खान के बेटे फरदीन खान के बाद प्रमोज महाजन के बेटे राहुल महाजन इसकी गिरफ्त में हैं। वहीं हेरोइन भी इसी तरह का महंगा नशा है। जाहिर की मध्यम वर्ग के लोग इस तरह का नशा नहीं कर सकते। यह उच्च आय वर्ग के लोगों के ही वश की बात है। गरीब लोगों का तो नशा स्मैक है। अक्सर दिल्ली के फुटपाथ पर रिक्से वाले और खोमचे वाले तथा इसी प्रोफाइल के दूसरे लोग स्मैक लेते हुए दिखाई दे जाते हैं। स्मैक उन्हें गरीबी से थोड़ी देर सपनीली दुनिया में ले जाता है शायद...।


पर हम बात कर रहे हैं इन हाई प्रोफाइल नशेड़ियों की। ये लोग फाइव स्टार होटलों में बड़ी बड़ी पार्टियां करते हैं। बड़े घरों के इन बिगड़ैल युवाओं का मासिक खर्च लाखों में होता है। ये लोग पार्टियों के बाद हाई प्रोफाइल स्मग्लरों से अपने लिए नशे का इंतजाम करवाते हैं। प्रमोद महाजन के बेटे राहुल महाजन को नशे की डोज सप्लाई करने वाला कश्मीरी युवक साहिल भी बड़े घर का बेटा है। उसके पिता का मुंबई में पांच सितारा होटल व कश्मीर इम्पोरियम है। अब इस तरह के लोगों से क्या उम्मीद की जा सकती है। मुंबई के सबसे बड़े कोकीन के तस्कर का दावा है कि मशहूर अभिनेत्री मनीषा कोईराला भी उनकी ग्राहक है। वह उनसे कोकीन की डोज लेकर जाती है। फरदीन खान इस मामले में पहले ही फंस चुके हैं। ये तो काली स्याह रात के कुछ ऐसे नाम हैं जो पकड़े जाने पर लोगों के सामने आ गए हैं। अभी इसके अलावा बहुत से ऐसे नाम हो सकते हैं जिनपर से पर्दा नहीं हट पाया है। ऐसे हाई प्रोफाइल नशेड़ी अपने रसूख के बल पर मुकदमों से छूट भी जाते हैं। अगर मीडिया उनकी खबर नहीं ले तो मामला कई बार ले देकर रफादफा हो जाता है। वैसे भी उच्च वर्ग में यह कारोबार बड़ी सफाई से चलता है। क्योंकि बेचने वाले खरीदने वाले और दलाल सभी हाई प्रोफाइल के हैं । कोई इनके मूवमेंट पर जल्दी शक नहीं करता। अगर राहुल महाजन का मामला कुछ महीने बाद प्रकाश में आया होता तो शायद भारतीय जनता पार्टी पर बड़ा कलंक लगता क्योंकि भाजपा उन्हें जल्द ही अपने पिता प्रमोद महाजन की विरासत का वारिस घोषित करने वाली थी। वे पार्टी कार्यकारिणी की बैठक में शामिल भी हुए थे। अब पार्टी के सभी बड़े नेताओं ने उनसे कन्नी काट ली है। हालांकि इस मामले मे अटल बिहारी वाजपेयी के बयान की जवानी में गलती हो जाती है पर उमा भारती की आपत्ति जायज है। क्या एक 31 साल के आदमी के गंभीर अपराध को जवानी गलती समझ कर खारिज किया जा सकता है। नहीं.. उन्हें तो ऐसी सजा मिलनी चाहिए जो दूसरों के लिए नजीर बने। उस देश में 40 फीसदी लोगों को आदमी जैसा भोजन नहीं मिलता वहां एक करोड़ रुपए किलो बिकने वाला नशा करने की इजाजत कैसे दी जा सकती है। वैसे लोग अगर किसी तरह जन प्रतिनिधि बन जाएं तो यह और भी खतरनाक है। यह बहुत अच्छा हुआ कि कोई ऐसा आदमी संसद की सीढ़ियों पर कदम रखने से पहले ही नंगा हो गया। पर राहुल महाजन, साहिल या फरदीन खान तो स्याह रात रंगीन बनाने वाले अमीर घरों के बिगड़ेल शोहदों में चंद नाम ही हैं जो लोगों को पचा चल सके हैं। अभी यह फेहरिस्त बहुत लंबी हो सकती है उन्हें बेनकाब किए जाने की जरूरत है खुद को संभ्रांत घोषित करने में लगे हैं और हर समस्या का इलाज खानदानी पैसे से ढूंढ लेना चाहते हैं। हालांकि इस पैसे को कमाने में उन्होंने खुद मेहनत नहीं की होती है।

-माधवी रंजना madhavi.ranjana@gmail.com




Monday, 2 March 2009

कंप्यूटर की जगह ले लेंगे बड़े लैपटाप

कुछ सालों में कंप्यूटर बीते जमाने की चीच हो जाएगी। जब कंप्यूटर की कीमत पर लैपटाप उपलब्ध होगा तो भला क्यों कोई कंप्यूटर खरीदेगा। इतना ही नहीं लैपटाप में भी अब 15 इंच या 17 इंच के मोनीटर का नहीं बल्कि 19 या 20 इंच के विशाल एलसीडी मानीटर वाले लैपटाप का जमाना आ रहा है। सभी लैपटाप बनाने वाली कंपनियां इस तरह के लैपटाप को विकसित करने में लगी हैं।


आमतौर पर जब आप कंप्यूटर खरीदते हैं तो उसके कई अलग अलग हिस्से होते हैं। उसका सबसे भारी हिस्सा उसका मानीटर होता है। उसके बाद सीपीयू, की बोर्ड, माउस और स्पीकर यानी पांच हिस्से। अब लैपटाप में ये पांचों हिस्से एक ही जगह इंटीग्रेट हो जाते हैं। यानी जगह की बचत। कंप्यूटर को जब आप घर में या दफ्टर में किसी एक जगह स्थापित कर देते हैं तो उसे आसानी से एक जगह से दूसरी जगह नहीं ले जाया जा सकता है। अब हम उन कारणों पर नजर डालते हैं जिनके कारण लैपटाप लोकप्रिय हो रहे हैं।
पोर्टेबलिटी- लैपटाप को आसानी से कहीं भी उठा कर ले जाया जा सकता है। एक कमरे से दूसरे कमरे में। लान में. दफ्तर में कहीं भी। आप अपनी कार में भी इस पर काम कर सकते हैं। हवाई और रेल यात्रा के दौरान भी इसे लेकर चल सकते हैं।
जगह की बचत- कंप्यूटर जहां आपके टेबल पर काफी जगह ले लेता है वहीं लैपटाप को बस थोड़ी सी जगह चाहिए। इसे कहीं भी रखा जा सकता है। इसके लिए अलग से कोई कंप्यूटर टेबल बनाने की कोई जरूरत नहीं है।
बैटरी बैकअप- कंप्यूटर के साथ कोई बैटरी बैकअप नहीं होता, जबकि लैपटाप को आप उसके बैटरी बैकअप से आराम से चार से छह घंटे चला सकते हैं। और अधिक देर तक चलाने के लिए आप चाहें तो बैटरी का दूसरा सेट भी लेकर रख सकते हैं।
आमतौर पर बाजार में अभी जो लैपटाप उपलब्ध हैं उनके स्क्रीन 15 इंच या 17 इंच के हैं। पर अब लैपटाप कंपनियां 19 इंच और 20 इंच के स्क्रीन वाले लैपटाप का निर्माण करने मे लगी हुई हैं। ये सुपरसाइज के लैपटाप नोटबुक के बजाए ब्रीफकेश ती तरह दिखाई देंगे। इसलिए इन्हें नोटबुक पीसी कहना जायज नहीं होगा। अब बाजार में 19 व 20 इंच के एलसीडी स्क्रीन प्रवेश कर रहे हैं उसके बाद उसी साइज के लैपटाप बनाने की भी कंपनियां प्रवृत हुई हैं। हालांकि उस युग में जहां मोबलिटी की बात की जाती है वहां छोटा बेहतर है का सिद्धांत चलता है ऐसे में अभी यह तय होना बाकी है कि लोग इन लैपटाप का कितना स्वागत करेंगे। उम्मीद की जाती है कि ऐसे लैपटाप उन लोगों में ज्यादा लोकप्रिय होंगे जो कंप्यूटर पर गेम खेलते हैं तथा जिन्हें सीमित मोबलिटी की जरूरत होती है। जैसे दफ्तर में ही अपने सिस्टम को कहीं ले जाना हो या घर में ही एक कोने से दूसरे कोने में ले जाना हो तो ऐसे में इस तरह के सुपर साइज लैपटाप लोकप्रिय हो सकते हैं। लैपटाप बनाने वाली कंपनी डेल और एसर 19 इंच के लैपटाप का निर्माण करने में जुटी हुई हैं। वहीं कोरियाई कंपनी सैमसंग ने भी मेगा लैपटाप बनाने की घोषणा कर दी है। एसर ने को ताइपेई में हाल में लगे कंप्यूटर शो में 20 इंच स्क्रीन वाला लैपटाप पेश कर दिया है। एसर के इस सिस्टम पर गेम और फिल्मों का बखूबी आनंद उठाया जा सकता है। इसकी खुदरा कीमत 2700 डालर (तकरीबन 1.30 लाख रुपए) रखी गई है। जबकि डेल 3500 डालर में व सैमसंग 5000 डालर में ऐसे ही माडल पेश कर रही है। देखते जाइए कीमतें तो गिर सकती हैं।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य



Monday, 23 February 2009

सोना कितना सोना है

सोना खरीदना और पहनना है भारत के लोगों का प्रिय शगल है। सदियों से सोना खरीदने पहनने और उसे बुरे दिनों के लिए संभालकर रखने की भारत के लोगों की मानसिकता है। पर क्या आपको मालूम है कि आपके पास जो सोना है वास्तव में वह कितना खरा है। क्या आपके खानदानी सुनार ने आपको अगर कोई सोने का गहना 22 कैरेट का कहकर दिया है तो वास्तव में वह 22 कैरेट ही है। आप अपनी कमाई का बहुच बड़ा हिस्सा सोना खरीदने पर लगाते हैं तो आपको इसकी शुद्धता को लेकर जागरुक होना ही चाहिए।


नब्बे फीसदी तक अशुद्ध- आपको यह जानकर अचरज होगा कि सरकार की जांच में पाया गया है कि जो सोना आप खरीदते हैं वह 90 फीसदी तक अशुद्ध हो सकता है। भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा किए गए एक सर्वे में पाया गया है कि देश के अधिकांश हिस्सो में ज्वेलरों द्वारा बेचा जाने वाला सोना शुद्धता के पैमाने पर खरा नहीं उतरता है। कई शहरों में 20 से 30 फीसदी तो कई शहरों में 90 फीसदी तक सोना अशुद्ध पाया गया है। अगर आप किसी सुनार से कोई गहना बनवाते हैं तो वह आपको 22 कैरेट कहकर कोई स्वर्ण आभूषण देता है तो वह कुछ सालों बाद उतनी मात्रा में सोना वापस लेने की गारंटी देता है। यह गारंटी कोई वास्तविक गारंटी नहीं है। अगर एक सुनार का बेचा हुआ सोना किसी दूसरे शहर का भी सुनार उतनी ही शुद्धता बताकर खरीद ले तब उसे ईमानदार सौदा माना जा सकता है। पर अधिकांश सुनार बेइमान का कारोबार सदियों से करते आ रहे हैं।
कैसी हो सोने की शुद्धता - सोना 24 कैरेट में अपने शुद्ध फार्म में माना जाता है। पर बिल्कुल शुद्ध सोना में कोई गहना नहीं बनाया जा सकता है। इसलिए उसमें कुछ फीसदी चांदी, तांबा या जिंक मिलाया जाता है। इस मिलावट के स्तर को कैरेट में मापते हैं। इसको आम भाषा में यूं समझा जाए कि किसी चीज को 24 हिस्से में बांट दिया गया तो अगर इसमें एक हिस्सा मिलावट है तो वह 23 कैरेट का सोना होगा। अगर इसे फीसदी में देखें तो 95.80 फीसदी शुद्धता होनी चाहिए। इसी तरह 22 कैरेट की शुद्धता 91.60 फीसदी होनी चाहिए।
21 कैरेट मे 87.50 फीसदी शुद्धता होनी चाहिए। इसी तरह 18 कैरेट में 75.00 फीसदी शुद्धता यानी इतना हिस्सा सोना होना चाहिए। 14 कैरेट के आभूषण में सोना 58.50 फीसदी और 9 कैरेट मे 37.50 फीसदी सोने का हिस्सा होना चाहिए। इसलिए जब कभी आप सोना खरीदें तो उसकी शुद्धता के प्रति जरूर आश्वस्त हो लें। नहीं तो आप 22 कैरेट के नाम पर 16 से 17 कैरेट के आभूषण खरीदकर कर बेवकूफ बन सकते हैं।

कैसे मापी जाए शुद्धता- परंपरागत तौर पर सुनार कसौटी पर सोना को मापते हैं। यह तरीका पूरी तरह मानक नहीं है और इसमें ठगे जाने की भी संभावना ज्यादा है। अब सोने की जांच के लिए कई नए तरीके आ गए हैं। सबसे लोकप्रिय तरीका कैरेटोमीटर का है। पर अधिकांश सुनार कैरेटो मीटर नहीं लगाते हैं क्योंकि वे आपको शुद्ध सोना नहीं बेचना चाहते। अधिकांश सोना खरीदने वाले उपभोक्ताओं को कैरट के बारे में भी सही जानकारी नहीं होती।

सोने का कारोबार करने वाली टाटा समूह की कंपनी तानिष्क ने अपने देश भर के शो रूम में कैरेटो मीटर लगा रखा है। वहां आप कहीं और से भी खरीदे गए सोने की जांच करवा सकते हैं। वहीं आप तानिष्क से खरीदे जाने वाले सोने की शुद्धता की भी जांच कर सकते हैं। कैरेटो मीटर एक्सरे सिद्धांत पर काम करता है। यह सोने में मिलावट के स्तर को काफी शुद्धता से पकड़ लेता है।


आप खरा सोना ही खरीदें इसके लिए भारतीय मानक ब्यूरो ने शुद्ध सोने के ऊपर हालमार्क की व्यवस्था बनाई है। यह व्यवस्था सोने के खरीद फरोख्त में उपभोक्ता के साथ हो रही ठगी से निजात दिलाने के लिए की गई है। जैसे खाने पीने की वस्तुओं में एग मार्क की व्यवस्था है उसी तरह सोने की खरीद मे हालमार्क की व्यवस्था की जा रही है। सोने की हालमार्किंग के लिए देश भर मे लैब की स्थापना की गई है। वहीं आने वाले समय में तेजी से और भी लैब की स्थापना की जा रही है। सरकार चाहती है कि देश में 2008 के बाद सिर्फ हालमार्क किया हुआ सोना ही बेचा जाए। लगभग सभी प्रमुख शहरों में इस तरह की व्यवस्था आने वाले समय में लागू कर दी जाएगी। इसके लिए सरकार उपभोक्ताओं को बीच जागरुकता अभियान भी चला रही है। उपभोक्ताओं में जागरुकता को देखते हुए कई बड़े शहरों के ज्वेलरों ने हालमार्क किया हुआ सोना बेचना आरंभ भी कर दिया है। हालमार्क किया हुआ सोना थोड़ा महंगा हो सकता है पर सस्ते के चक्कर में अशुद्ध सोना खरीदना समझदारी नहीं है। अगर आप कम कीमत में ही गहने बनवाना चाहते हैं तो 18 कैरेट या 14 कैरेट में बने गहने खरीद सकते हैं। यहां तक की आप 9 कैरेट के गहने भी खऱीद सकते हैं। पर सोना जांच करवाकर ही खऱीदे हैं।
एमएमटीसी लि. - भारत सरकार की संस्था एमएमटीसी लि. सोने का कारोबार करती है। आमतौर पर विदेशी बाजार से सारा सोना एमएमटीसी के द्वारा ही भारत में आता है। एमएमटीसी खुद भी हालमार्क ज्वेलरी अपने शो रूम अथवा फ्रेंजाइजी के द्वारा बेचती है। एमएमटीसी ने सांची नाम से देश के प्रमुख शहरों में अपने शो रूम खोले हैं जहां सोने व चांदी के आभूषण खरीदे जा सकते हैं। एमएमटीसी के जिम्मे ही देश भर में सोने की शुद्धता के जांच के लिए हालमार्किंग लैब बनवाने की भी जिम्मेवारी है। इसलिए जब कभी आप सोना खरीदने की बात करें तो अपने ज्वेलर के हालमार्क की मांग जरूर करें। अगर वह कहता है कि हालमार्क किया हुआ आभूषण समान्य आभूषण से महंगा आ रहा है तो भी आप हां कहें। जिस गहने पर हालमार्क लगा हो उस पर हालमार्क का निशान उसकी शुद्धता का प्रतिशत और निर्माण का साल और निर्माता का कोड नंबर हैंड लेंस की सहायता से देखा जा सकता है। इसलिए इसको लेकर हमेशा जागरुक रहें।
कितने कैरेट का सोना खरीदें- कोई जरूरी नहीं है कि 23 या 24 कैरेट का सोना ही खरीदा जाए। आप कम मात्रा वाला भी ले सकते हैं। 23 कैरेट के आभूषण में लगभग 4 फीसदी मिलावट होती है। 24 कैरेट में डिजाइनर आभूषणों का निर्माण संभव नहीं है। भारत में लोगों में 22 कैरेट का सोना खरीदने की सर्वाधिक परंपरा है। 22 कैरेट यानी 91.60 फीसदी शुद्धता। पर कोई भी परंपरागत सुनार इतनी शुद्धता नहीं देता। आप 22 कैरेट के नाम पर 18 से 21 कैरेट का सोना खरीदें इससे तो अच्छा है कि आप सोचसमझकर 18 कैरेट ही खरीदें। इसकी कीमत 22 कैरेट से 15 फीसदी तक कम हो सकती है। वैसे दुनिया के कुछ प्रमुख सोना विशेषज्ञों का मानना है कि गहने हमेशा 18 कैरेट में ही बनवाना चाहिए। 18 कैरेट में गहने बनवाना सुविधाजनक है साथ ही 18 कैरेट का गहना 22 कैरेट की तुलना में मजबूत होता है। इससे टूटने की संभावना कम रहती है यानी यह लंबे समय तक चलेगा। अगर आप सिर्फ संभालकर रखने के लिए सोना खरीदना चाहते हैं 24 कैरेट का सोने का सिक्का खरीद सकते हैं। आजकल कई बैंक भी गारंटी के साथ ऐसा सोना बेच रहे हैं। यह 5 व 10 ग्राम में उपलब्ध है।
- vidyutp@gmail.com

Monday, 16 February 2009

फ्लाई ओवर का शहर दिल्ली

कुछ दिन में दिल्ली को फ्लाई ओवरों के शहर के रुप में याद किया जाएगा। अगर आपने दससाल पहले दिल्ली की यात्रा की हो, और अब जाएं तो दिल्ली आपको काफी बदली हुई नजर आएगी। दो दशक पहले की दिल्ली का मतलब यह होता था कि लाल बत्ती और हरी बत्ती का शहर। अगर लाल बत्ती हो तो जिंदगी ठहरी हुई है। अगर हरी बत्ती हो तो जिंदगी चल पड़ी। कितनी कहानियां और व्यंग्य रचनाएं इस लाल बत्ती और हरी बत्ती पर लिखी गई हैं। रफ्तार चाहने वाले लोगों के लिए लाल बत्ती बहुत बड़ा संकट थी। अगर आप दिल्ली में किसी से मिलने जाते हों तो न जाने कितने चौराहों पर आपको यह इंतजार करना पड़ता था कि कब हरी बत्ती होगी और आप चल पाएंगे।
दिन लदे गोल चक्कर के - इस लाल बत्ती खत्म करने के लिए बड़े चौराहों पर राउंड एबाउट की परिकल्पना को स्वरुप प्रदान किया गया। इसमें गर चौक पर एक गोल चक्कर होता है। इस गोल चक्कर में घूमते हुए आप अपने लेन का चयन कर लेते हैं। इसमें लाल बत्ती तो नहीं मिलती। पर इस राउंड एबाउट का लोगों को सही तरीक से इस्तेमाल करना नहीं आया। इसका परिणाम हुआ कि गोल चक्कर पर काफी एक्सीडेंट की घटनाएं सुनने को मिलने लगीं।
फ्लाईओवर या भूल भुलैय्या - अब बढ़ते ट्रैफिक के दबाव के कारण दिल्ली में फ्लाई ओवर बनाए जाने का सिलसिला जारी है। दिल्ली में 50 किलोमीटर के रिंग रोड पर लगभग हर चौराहे पर फ्लाई ओवर बनाए जा रहे हैं जिससे वहां कभी रेडलाइट की स्थिति न हो और ट्रैफिक निर्बाध गति से चलता रहे। अगर आप रिंग रोड पर चलें तो आजादपुर, वजीरपुर डिपो, पीतमपुरा, ब्रिटानिया, पंजाबी बाग, राजा गार्डन, राजौरी गार्डन, नारायणा, धौलाकुआं, मोतीबाग, सफदरजंग, मेडिकल, आश्रम आदि में सब जगह आपको फ्लाई ओवर मिलेंगे। दिल्ली में धौला कुआं और मेडिकल के फ्लाई ओवर तो काफी कलात्मक ढंग से बनाए गए हैं। ये इतने घुमावदार हैं कि किसी नए व्यक्ति के लिए यह समझना बहुत मुश्किल होगा कि उसे किधर जाने के लिए कौन सा लेन चयन करना चाहिए। यहां तक सालों से दिल्ली में ही रहने वालों के लिए ये फ्लाई ओवर भूलभूलैया जैसे साबित हो रहे हैं।

दिल्ली को 2010 में होने वाले राष्ट्र मंडल खेलों के लिए तैयार करने के लिए शहर के ट्रैफिक को बेहतर बनाने की कवायद की जा रही है। इसी के तहत फ्लाईओवर और अंडर पास बनाए जा रहे हैं। इससे पूर्व भारत में बेंगलूर शहर की सड़कों को बेहतर बनाया गया है। वहां पर चौक पर फ्लाईओवर और अंडरपास बनाए गए हैं। निश्चय ही फ्लाईओवर से समय की बचत होती है। साथ ही घंटो प्रदूषित वातावरण में रहने से छुट्टी मिल जाती है।
पदयात्रियों का भी रखे ख्याल - हां इन फ्लाईओवरों ने पैदल चलने वालों के लिए मुश्किल खड़ी जरूर की है। कई जगह सड़क पार करने के लिए आधे किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है। इससे सड़क पार करना मुश्किल हो गया है। रेडलाइट नहीं होने के कारण सड़कों पर अब हमेशा तेज गति से वाहन चलते रहते हैं। इसलिए जितनी बड़ी संख्या में फ्लाई ओवर बन रहे हैं उसी अनुपात में पैदल पार पथ भी बनाए जाने चाहिएं। इससे सड़क पार करने वालों को सुविधा हो सकेगी। साथ ही हर फ्लाईओवर के आसपास कौन सी लेन किसमें जाकर मिल रही है इसकी सूचना सही ढंग से लिखी होनी चाहिए। ऐसा नहीं होने से कई लोगों को भ्रमित होना पड़ता है।
- विद्युत प्रकाश मौर्य




Monday, 9 February 2009

कैसा हो बॉस का व्यवहार

दफ्तर में बॉस का व्यवहार कैसा हो इस पर ही काफी हद तक दफ्तर के कर्मचारियों की कार्यक्षमा निर्भऱ करती है। इसलिए आजकल मानव संसाधन के तहत बास को भी प्रशिक्षण दिया जा रहा है कि वे दफ्तर में अपने मातहत काम करने वाले लोगों के साथ कैसा व्यवहार करें। अगर बास हर बात पर गुस्सा करता हो आंखे चढ़ाता हो तो इसका बुरा प्रभाव उसके अधीन काम करने वाले लोगों पर पड़ता है। इसलिए अब इस बात की जरूरत बड़ी शिद्दत से महसूस की जा रही है कि बास का व्यवहार थोड़ा सा विनोदी होना चाहिए। साथ ही उसे अपने जूनियर लोगों के साथ मित्रवत व्यवहार करना चाहिए।


विनोदी चरित्र - चाहे कितना गंभीर मामला हो उसे बड़े ही आत्मीय और हल्के-फुल्के वातावरण में कहा सुना जा सकता है। इसका सामने वाले पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। एक दार्शनिक ने कहा है कि मनुष्य के लिए विपत्ति का सामना करने के लिए मुस्कान से बढ़कर कोई अस्त्र नहीं है। ऐसे में गंभीर बातों के बीच भी थोड़ी विनोद की फुलझड़ी छोड़ना जरूरी होता है। इससे आपके साथ बैठे लोगों का तनाव कम होता है। लोग ऐसे में अपनी बातें खुलकर रख पाते हैं। इसलिए हमेशा कड़क व्यवहार छोड़कर बॉस को कभी कभी विनोद भी करना चाहिए।
बॉस को भी ट्रेनिंग- अब कई दफ्तरों में बास को भी ट्रेनिंग दी जा रही है। ट्रेनिंग इस बात की कि वे अपने मुलाजिमों से कैसा व्यवहार करें। आज प्रतिस्पर्धा का दौर है। ऐसे में हर काबिल कर्मचारी के पास कई विकल्प होते हैं। अगर बास का व्यवहार लगातार परेशान करने वाला हो तो कई कर्मचारी नौकरी छोड़कर दूसरी नौकरी ढूंढने में लगे रहते हैं। अगर कई लोग किसी दफ्तर से नौकरी छोड़कर चले जाएं तो इससे उस बास की बदनामी होती है। प्रबंधन की नजर में बास का रिपुटेशन खराब होता है। इसलिए अब हर बास को चिंता करनी चाहिए कि उसका व्यवहार अपने जूनियरों के प्रति अच्छा हो।
छुट्टी देने में आनाकानी- अक्सर बास अपने मुलाजिमों को छुट्टी देने में आनाकानी करते हैं। अगर कोई वाजिब कारण हो तो भी जल्दी छुट्टी पास नहीं करते। इससे कई घाटा होता है। कई बार कर्मचारी झूठ बोलकर छुट्टी लेना चाहता है। कई बार वाजिब काम के लिए छुट्टी नहीं मिलने पर कर्माचारियों में तनाव बढ़ता है। हमने सेना की कई ऐसी खबरें पढ़ी हैं जिसमें सैनिक छुट्टी नहीं मिलने पर अपने साथियों की या अधिकारी ही हत्या कर देता है। इसलिए बास को हमेशा वाजिब कारण होने पर अपने मुलाजिम को छुट्टी दे देनी चाहिए। हां बास को चाहिए कि वह अपने कर्माचारियों को इस बात के लिए जिम्मेवार बनाए कि उसके नहीं रहने पर दफ्तर में कैसे काम चलेगा इसके लिए अपने साथियों को प्रशिक्षित करें।
इंटरैक्टिव प्रोग्राम करें- कई दफ्तरों में सभी कर्मचारियों और बास के बीच अच्छा तालमेल बनाए रखने के लिए इंटरैक्टिव कार्यक्रम कराए जाते हैं। इसका अच्छा प्रभाव पड़ता है। इसके तहत पिकनिक पर ले जाना, अंत्याक्षरी जैसे प्रोग्राम आयोजित करना। बास की ओर से अपने कर्मचारियों के लिए लंच देना और लंच के दौरान ही दफ्तर की बैठक कर लेना। कर्मचारियों से उनके निजी और परिवार के बारे में जानकारी लेना आदि अच्छे बॉस के लक्षण हैं। कभी कभी हर बॉस को अपने आप से पूछना चाहिए कि क्या वह अपने कर्मचारियों से अच्छा व्यवहार करता है।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य



Monday, 2 February 2009

ओरकुट बनाम लोकप्रियता और प्रतिबंध

दिल्ली के प्रमुख विश्वविद्यालय जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय और दिल्ली विवि ने गूगल के लोकप्रिय साइट ओरकुट पर प्रतिबंध लगा दिया है। इन यूनिवर्सिटियों में ओरकुट की वेबसाइट चलाने से काफी परेशानी आ रही थी। इससे नेटवर्क से जुड़े सारे कंप्यूटर धीमी गति से चलने लगते थे। ओरकुट कंप्यूटर पर चलने के दौरान ज्यादा स्पेश लेता है। यानी वह कंप्यूटर के रैम में ज्यादा जगह एक्वाएर करता है।


वास्तव में इंटरनेट पर सोशल नेटवर्किंग एक बड़े लोकप्रिय समाधान के रुप में उभर कर आया है। यह एक आभासी दुनिया का सृजन करता है जहां जाकर आप अपने लिए दोस्तों की तलाश कर सकते हैं। किसी जमाने में ऐसे दोस्त ढूंढना दुस्कर कार्य था। लोग पत्रमित्रता किया करते थे। अब दोस्ती करने का इंस्टेट तरीका बनकर उभरा है इंटरनेट। यहां आकर आप अपने विचारों से मिलते जुलते या जाति समाज से जुड़े हुए लोगों का समूह बना सकते हैं। यह पत्रमित्रता की तुलना में ज्यादा फास्ट तरीका है। इसमें आपका दोस्त दुनिया के किसी भी कोने में बैठा हुआ हो सकता है। इंटरनेट पर इस दोस्ती से काफी फायदे हो रहे हैं। कई लोग दोस्ती और बाद में शादी कर रहे हैं तो कई लोग अपने प्रोफेशन के लोगों से दोस्ती करके अपने कैरियर को भी संवार रहे हैं।
इंटरनेट पर ऐसे समूह के रुप में याहू ग्रूप काफी लोकप्रिय है। याहू के इमेल यूजर अपने विचारों से जु़ड़े हुए समूह का निर्माण कर सकते हैं। जैसे लाइब्रेरी साइंस पढ़ने वालों का समूह, पत्रकारों का समूह, किसी खास जाति बिरादरी के लोगों को समूह या फिर किसी खास विचार धारा के लोगों का समूह बनाया जा सकता है। हो सकता है आपकी विचार धारा के लोग दुनिया भर में कुछ सौ ही हों तो भी ऐसे लोग एक खास मंच पर एकत्र हो सकते हैं। आप अपने विचारों से जुड़े हुए समूह को इंटरनेट पर जाकर ढूंढ भी सकते हैं। याहू के ग्रुप के बाद गूगल ने इसी तरह के समूह ओरकुट को कुछ साल पहले ही लांच किया है। यह समूह दुनिया भर में तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। छात्र और शिक्षक भी बड़ी संख्या में इस समूह के सदस्य हैं।
डीयू और जेएनयू में इस समूह के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगने से वहां के छात्रों और शिक्षकों को परेशानी भी है। उनकी सोशल नेटवर्किंग को लगाम लग गई है। कोई भी संस्थान जब अपने सदस्यों को इंटरनेट के उपयोग करने की छूट देता है तो वह टर्मिनल पर कुछ भी करने की इजाजत नहीं दे सकता है। अगर सारे लोगों को ओरकुट खोलने से सिस्टम बाधित होता है तो ऐसे में संस्थान को कोई न कोई एहितयाती कदम तो उठाने ही पड़ेंगें। आजकल कई ऐसी वेबसाइट आ रही हैं जो उपयोग करने के दौरान ज्यादा जगह लेती हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के कंप्यूटर सेंटर ने कई और वेबसाइटों को भी ब्लाक किया है। इसमें लोकप्रिय साइट यूट्यूब भी शामिल है। यू ट्यूब पर लोग अपने वीडियो जारी कर देते हैं। इन वीडियो को देखने में भी इंटरनेट कनेक्शन के ज्यादा बैंडविड्थ का इस्तेमाल होता है।
जेएनयू प्रशासन के अनुसार ओरकुट के इस्तेमाल से उन लोगों को परेशानी हो रही थी जो अपने शोध प्रबंधों पर काम कर रहे हैं। उनकी स्पीड कम हो जाती थी। हालांकि ओरकुट के इस्तेमाल करने वालों का दावा है कि यह साइट उनके अध्ययन में भी उपयोगी है क्योंकि इससे वे लोग अपने समान विचारधारा और पढ़ाई करने वालों के साथ विचारों का आदान प्रदान करते हैं।
-vidyutp@gmail.com 




Sunday, 25 January 2009

मोबाइल रखिए, सब कुछ जाइए भूल

अगर आपके पास मोबाइल फोन है तो कई चीजें साथ रखने की जरूरत अब नहीं होनी चाहिए। घड़ी, अलार्म घड़ी, फोन डायरी, आर्गनाइजर, कैलकुलेटर जैसी कई चीजें एक ही जगह अब समाहित हो चुकी हैं। ये सुविधाएं हर सस्ते मोबाइल हैंडसेट में भी उपलब्ध है।
घड़ी- जैसे हर मोबाइल में घड़ी होती है तो फिर अलग से कलाई घड़ी बांधने की क्या जरूरत है। साठ फीसदी मोबाइल रखने वाले लोगों ने घड़ी बांधना छोड़ दिया है। समय देखना है तो मोबाइल की स्क्रीन को देख लिजिए। यहां तक की घड़ियों के बाजार में घड़ी की बिक्री पर भी असर पड़ा है। अब कई समझदार लोग घड़ी नहीं खरीदना चाहते उनका मोबाइल स्क्रीन समय और तारीख भी बताता है।
अलार्म घड़ी- अभी तक अगर आपको जगना हो तो अलार्म लगाने के लिए अलग से एक अलार्म घड़ी रखनी पड़ती थी क्योंकि कलाई घड़ी में आमतौर पर अलार्म नहीं होता पर अब मोबाइल फोन में ही आप जब चाहें अलार्म लगा सकते हैं। कई फोन में एक बार के लिए व रिपीट अलार्म लगाने की सुविधा भी मौजूद है।
फोन डायरी - इसी तरह जेब में अलग से फोन डायरी रखने की भी जरूरत नहीं है। आपके मोबाइल में अब आमतौर पर 300 से लेकर 2000 लोगों तक के नाम पते सुरक्षित किए जा सकते हैं। फिर अलग से डायरी रखने की क्या जरूरत है। हां अपने मोबाइल में सेव किए गए नाम पते को सुरक्षा के लिए आप घर में किसी डायरी में भी लिख कर रखें तो बहुत अच्छी बात होगी।
कैलकुलेटर- पहले जहां आपको इलेक्ट्रानिक कालकुलेटर के लिए अलग से एक बड़ा डिब्बा लेकर चलना पड़ता होगा। पर आजकल लगभग हर मोबाइल में कालकुलेटर का विकल्प होता ही है। आप इसमें समान्य कालकुलेटर वाले सारे काम ले सकते हैं। हां साइंटफिक या विशेष कालकुलेटर इसमें नहीं होते। पर गाहे बगाहे जरूरत पड़ने वाले कालकुलेशन इसमें किए जा सकते हैं।
आरगनाइजर- आपको कब कहां जाना यह याद दिलाने के लिए आपका मोबाइल एक सचिव की भूमिका भी निभाता है। मोबाइल फोन ने डिजिटल आरगनाइजर का बाजार भी लगभग खत्म कर दिया है। पहले लोग खास तौर पर फोन बुक के लिए और अपने एपवाइंटमेंट याद रखने के लिए जेब में एक डिजिटल आरगाइजर लेकर चला करते थे पर अब यह सब कुछ मोबाइल में ही संभव है। विपिन बजाज एक एंश्योरेंस एडवाइजर हैं जो अपने सारे एप्वाइंटमेंट और किस दिन कौन सा काम करना यह याद करने के लिए फटाफट उसे मोबाइल में ही फीड कर लेते हैं। उनका फोन उस समय काम की याद दिला देता है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि अगर एक समान्य सा मोबाइल लिया जाए जिसमें कैमरा, एफएम रेडियो आदि न भी हो तो भी वह आपके कई तरह के काम आता है। अब लोग अपने शौक पूरे करने के लिए कैमरा, रेडियो, जीपीआरएस, इन्फ्रारेड अथवा गाने सुनने की सुविधा वाले सेट ढूंढते हैं। पर अगर इतना सब कुछ न हो तो भी दो से तीन हजार रुपए के हैंडसेट में भी कई तरह की सुविधाएं मौजूद है। अब रंगीन हैंडसेट भी तीन हजार से कम में आरंभ होने लगे हैं। आप जब मोबाइल खरीदने की योजना बना रहे हों तो यह देख लें की बातें करने के अलावा आपकी जरूरतें और क्या क्या हैं। इसके बाद ही कोई हैंडसेट खरीदें। हालांकि अब विदेशों में लोगों में ढेर सारी सुविधाओं वाले हैंडसेट का खुमार उतर रहा है। लोग अब साधारण हैंडसेट की ओर आकर्षित हो रहे हैं।
 - माधवी रंजना madhavi.ranjana@gmail.com



Saturday, 17 January 2009

फ्री में भी उपलब्ध हैं साफ्टवेयर

अगर माइक्रोसाफ्टर और एडोब जैसी कंपनियां लोगों को अपने साफ्टवेयर खरीदकर उपयोग करने के लिए प्रेरित कर रही हैं तो आपके पास दूसरी और फ्री में साफ्टवेयर लेकर इस्तेमाल करने का विकल्प खुला हुआ है। अगर आप साफ्टवेयर खरीदने पर रुपया नहीं खर्च करना चाहते हैं तो कोई बात नहीं आप इसके विकल्प ढूंढ सकते हैं। निश्चय की कंप्यूटर पर पूरी दुनिया में काम किए जाने वाले माध्यम के रुप में माइक्रोसाफ्ट का विंडोज लोकप्रिय है। पर अब विंडो का पूरा जोर लोगों असली साफ्टवेयर खरीद कर उपयोग करवाने पर है। ऐसे में आपके पास फ्री माध्यम के रुप में लाइनेक्स का विकल्प मौजूद है। दुनिया में ऐसे लोगों की एक बड़ी फौज मौजूद है जो लगातार शोध कर हर तरह के साफ्टवेयर फ्री में उपलब्ध कराने पर लगे है। उनका काम लोगों द्वारा दिए जाने वाले चंदे से चलता है।

विंडो का जवाब है लाइनेक्स - आपको यह जानकर अचरज होगा कि कंप्यूटर सर्वर के लिए लाइनेक्स साफ्टवेयर मुफीद है। दुनिया के 25फीसदी सर्वर लाइनेक्स पर ही चल रहे हैं। वहीं डेस्कटाप पीसी में यह आंकड़ा महज 2.8 फीसदी का है। यह कम इसलिए है कि मुफ्त में उपलब्ध होने के कारण इसका प्रचार तंत्र कमजोर है। पर आईबीएम, डेल और एचपी जैसे कंप्यूटर निर्माताओं को लाइनेक्स के साथ करार है। वे अपने कंप्यूटर के साथ लाइनेक्स उपभोक्ताओं को लोड करके देते हैं। जैसे जैसे विंडो अपनी पाइरेसी पर रोक लगाकर लोगों को साफ्टवेयर खरीदने को मजबूर करेगा लोग दुनिया भर में लाइनेक्स की ओर शिफ्ट करेंगे।
शौक बन गया नजीर- लाइनेक्स़ की खोज फिनलैंड के शहर हेलंसिकी के एक छात्र ने शौकिया तौर पर की थी, पर यह बाद में नजीर बन गया। 25 अगस्त 1991 को कंप्यूटर छात्र लाइनेक्स ट्रावोल्ड ने इस साफ्टवेयर की नींव रखी। बाद में इस अभियान से काफी लोग जुड़ते चले गए।

वर्ड प्रोसेसर भी फ्री में - सिर्फ काम करने का माध्यम ही नहीं कई वर्ड प्रोसेसर साफ्टवेयर भी फ्री में उपलब्ध हैं। अब बाजार में माइक्रोसाफ्ट आफिस का विकल्प ओपन आफिस के रुप में उपलब्ध है। इसे दुनिया की सभी प्रमुख भाषाओं में डाउनलोड किया जा सकता है। खासतौर पर यह विंडो एक्सपी और उपर के माध्यम में बेहतर ढंग से काम भी करता है। अगर आप इंटरनेट इस्तेमाल के लिए भी किसी विकल्प की तलाश में है तो वहां भी निराशा नहीं मिलेगी। इंटरनेट एक्सप्लोरर का विकल्प फायरफाक्स के रुप में उपलब्ध है। फायरफाक्स ने तो इंटरनेट एक्सप्लोरर के लेटेस्ट वर्जन का जवाब भी पेश कर दिया है। अगर आप मुफ्त में इन्साइक्लोपाडिया देखना चाहते हैं तो आपके पास वीकिपीडिया की वेबसाइट उपलब्ध है। यानी हर खरीदी जाने वाली चीज का कोई न कोई मुफ्त विकल्प भी मौजूद है।

कैसे चलता है कारोबार - फ्री साफ्टवेयर उपलब्ध कराने का बीड़ा कुछ उत्साही कंप्यूटर के जानकारों ने उठाया है। इन सभी साफ्टवेयरों को इंटरनेट से डाउनलोड किया जा सकता है। या फिर आप वेबसाइट पर जाकर सीडी अनुरोध कर सकते हैं। आप इनके फ्री वितरण के नेटवर्क में शामिल भी हो सकते हैं। इन साफ्टवेयरों का विकास दुनिया भर के लोगों सो प्राप्त होने वाले चंदे से होता है। अगर आप समर्थ हैं तो उन्हें चंदा दे सकते हैं। अगर नहीं दे सकते हैं तो भी आप फ्री में उनके द्वारा विकसित साफ्टवेयर का इस्तेमाल तो कर ही सकते हैं।
विद्युत प्रकाश vidyutp@gmail.com


Friday, 9 January 2009

एंकरिंग के साथ अभिनय भी..

टीवी पर एक नई परंपरा चल पड़ी है अभिनय के साथ एंकरिंग करने की। खासकर समाचार चैनलों पर अपराध पर आधारित कार्यक्रमों में आप इसे बखूबी देख सकते हैं। अभी हाल में चैनल-7 ने अपने सभी कार्यक्रमों को रीलांच किया है। 
इसी क्रम में उसका अपराध पर आधारित कार्यक्रम क्रिमिनल में एंकर पुराने जमाने की अभिनेत्री नादिरा को कापी करते हुए अपराध की खबरें परोसती हुई नजर आ रही है। इसमें वह लाल रंग की स्लीवलेस ब्लाउज में नजर आती है। खबरें परोसने के साथ ही वह खास अंदाज में अपनी जुल्फों को झटकती है। कई बार वह एंकर कम विष कन्या अधिक नजर आती है। यह सब कुछ अपराध पर आधारित कार्यक्रमों को बेचने के लिए किया रहा है। समाचार चैनलों में क्राइम को बेचने के लिए बड़ी रोचक प्रतिस्पर्धा चल पड़ी है। इसकी शुरुआत हालांकि जी न्यूज और स्टार न्यूज जैसे चैनलों ने की। जी न्यूज ने चैन से जीना है तो जाग जाइए पंच लाइन के साथ अपना अपराध कार्यक्रम आरंभ किया। यह कार्यक्रम अपराध की खबरें परोसने के साथ आपको डराता भी था। इसके बाद स्टार न्यूज का कार्यक्रम सनसनी आया। इसके एंकर श्रीवर्धन त्रिवेदी अभिनय करते हुए खबरें पेश करते हैं। यानी अपराध की खबरें अपराधी के अंदाज में ही। वे स्क्रीन पर न्यूज एंकर कम अभिनेता ज्यादा नजर आते हैं। हालांकि उनका अभिनय सिर्फ बोलने के अंदाज में होता है। वे चेहरे पर कोई मेकअप नहीं करते या परिवेश में कोई बदलाव नहीं किया जाता है।
यहां तक तो ठीक था पर अब इंडिया टीवी और चैनल-7 ने नए किस्म के बदलाव किए हैं। इसके तहत अब क्राइम प्रोग्राम के लिए खासतरह का सेट डिजाइन किया गया है। इंडिया टीवी का प्रोग्राम है एसीपी अर्जुन। इसमें एंकर एक पुलिस अधिकारी की वेशभूषा में आता है। उसके हाथ में रुल भी होता है सिर पर टोपी भी। वह सभी अपराध की खबरों को पुलिसिया अंदाज में पेश करता है। वह एफआईआर की भाषा में देश भर में हो रहे अपराध की खबर लेता है। उसके संवाददाता भी कुछ इसी अंदाज में उसे रिपोर्ट करते हैं। यह खबरों की प्रस्तुति का नाटकीयकरण है। एक बारगी किसी नए आदमी के लिए यह समझना मुश्किल हो जाए कि वह कोई समाचार चैनल देख रहा है या कोई मनोरंजन चैनल पर क्राइम धारावाहिक।

ठीक इसी तरह चैनल-7 ने शुरू किया है क्रिमिनल। आपके ड्राइंग रुम, घर, बाथरुम या दफ्तर कहीं भी हो सकता है क्रिमिनल। इस तरह की पंचलाइन आपको आतंकित करने के लिए काफी है। उसके बाद की दास्तान को बड़े ही रोमांटिक अंदाज में एकंर पेश करने की कोशिश करती है। भला अपराध की खबरों को रोमानी अंदाज में कैसे सुना जा सकता है। सो यह सब कुछ बड़ा ही नाटकीय लगता है। यहां खबरों को मूल भावना खत्म हो गई लगती है। एक होड़ सी लगी है, अपराध को नाटकीय अंदाज में पेश करने की। इस होड़ में अपराध को कितना बिकाऊ बनाया जा सकता है इसकी पूरी कोशिश जारी है।

मामूली खबरें नाटकीय अंदाज में- इस होड़ में कई बार अपराध की मामूली सी खबरों को भी नाटकीय अंदाज में पेश किया जाता है। कई घटनाओं को तो किसी टीवी धारावाहिक की तरह दुबारा शूट किया जाता है। यह काम सभी चैनल कर रहे हैं। यहां तक की क्षेत्रीय चैनल भी इस तरह के प्रोग्राम लेकर आ गए है। ईटीवी बिहार और ईटीवी उत्तर प्रदेश भी इस तरह का कार्यक्रम दिखा रहे हैं। पुलिस फाइल में जो अपराधी मोस्ट वांडेट हैं उन्हें इस तरह के प्रोग्राम में शूट करके दिखाने की शुरूआत इंडियाज मोस्ट वांटेड जैसे प्रोग्राम में की गई थी। पर अब मामूली अपराधी भी इन कार्यक्रमों में बहुत ज्यादा जगह पा लेते हैं।

- विद्युत प्रकाश मौर्य