हालांकि मुझे कहीं सम्मानित होते हुए संकोच होता है, पर गुरुजन ने कहा तो इनकार करना मुश्किल हो गया। कश्मीर से सकुशल लौटने के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय के हंसराज महाविद्यालय में एक कार्यक्रम के दौरान गुरुजन और वरिष्ठ पत्रकारों के हाथों सम्मानित किया गया।
Monday, 10 November 2014
Saturday, 8 November 2014
भैंस को सताना बंद करो... ( व्यंग्य)
जिसने ये कहावत बनाई अकल बड़ी है या भैंस वह जरूर भैंस का
सताया हुआ रहा होगा। कदाचित उसे किसी गुस्साई भैंस ने पटखनी मार दी होगी। पर
सदियों पुरानी इस कहावत के कारण भोली भाली भैंसों को बार-बार गुस्सा आता है। और वह
कई बार ऐसी हरकतें करती है जिसमें वह ये सिद्ध कर देती है मैं वाकइ अकल से बड़ी हूं।
ताजा मामला सूरत का है जहां भैंस ने भारी भरकम विमान को रोककर
दिखा दिया कि हवा में उडऩे वाले कैसे पल में जमीन पर आ जाते हैं। नाम है शहर का
सूरत और काम करते हैं बदसूरत। करते हैं भैंस का अपमान और कहते हैं मेरा भारत महान।
आपको पता है सारा देश भैंस का दूध पीता है। अगर भैंस नाराज हो जाए तो अमूल की
डेयरियां बंद हो जाए। यह सिद्ध हो चुका है कि
भैंस का दूध गाय के दूध से हर मामले में ज्यादा पौष्टिक है। फिर भी हम भैंस
की पूजा नहीं करते क्यों. भैंस अपमान सहती है फिर दूध घी की नदिया बहाती है।
साल 2013 की बात है हरियाणा के हिसार के एक गांव में एक भैंस बिकी 25 लाख में। यानी भैंस की कीमत मर्सडीस से भी ज्यादा। तो फिर कहावत क्या होना चाहिए भैंस बड़ी या मर्सडीज तो जवाब होगा- भैंस।
काला अक्षर भैंस बराबर – ये मुहावरा भी किसी निपट मूरख ने ही रचा होगा। उसको पता
नहीं रहा होगा कि रात काली होती है। कान्हा जी भी काले ही थे। प्रेयसी की जुल्फें
भी तो काली होती हैं जिसकी छांव में हमें घंटों बैठे रहना चाहते हैं। भला उसमें और
भैंस की पूंछ में क्या अंतर है। और जो सबसे बेहतरीन और सुरक्षित धन होता है वह भी
काला ही होता है यानी काला धन। दुनिया में ऊर्जा का बड़ा स्रोत कोयला भी काला होता
है जिसे पूरे देश के उद्योगपति लूट लेना चाहते हैं। भला भैंस काली है तो उसमें
उसका क्या कसूर है अब बताइए तो जरा।
एकऔर मूर्खतापूर्ण कहावत है – भैंस के आगे बिन बजाय भैंस रही
पगुराय। अरे भैंस क्या नागिन है जो बिन पर डांस करने लग जाए। डांस तो नागिन भी
नहीं करती है सिर्फ आप हमें भरमा रहे हो। अब बिन की हकीकत तो भैंस जानती है इसलिए
वह चुपचाप पागुर करती रहती है। भला पागुर नहीं करेगी तो थोड़ी देर बाद बच्चों के
लिए दूध कौन देगा।
भारत सरकार के इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च ने भैंसों
का महत्व समझते हुए इंटरनेट पर बुफैलोपीडिया बनाया है। ( http://www.buffalopedia.cirb.res.in/) हमें भी समय रहते चेत जाना चाहिए। हमें देश में निवास करने वाली 9.8 करोड़
भैंसो का अपमान तुरंत बंद कर देना चाहिए।
अभी वक्त ज्यादा नहीं गुजरा है। हमें भैंस को अपमानित करने
वाले मुहावरे गढ़ना बंद कर देना चाहिए और सही मायने में राष्ट्रीय पशु भैंसों से
सामूहिक माफी मांगनी चाहिए। पाठ्यक्रम से भैंस को अपमानित करने वाले सारे चुटकुलों
को निकाल कर फेंक देना चाहिए। नई पीढ़ी को गलत शिक्षा देना बंद कर देना चाहिए। नही
तो अभी गुजरात का सूरत शहर का एक एयरपोर्ट है। कल को ये भैंस संसद मार्ग पर आकर
रास्ता रोक सकती है। दिल्ली मुंबई के एयरपोर्ट पर भी सामूहिक विरोध दर्ज करा सकती
है।
-
विद्युत प्रकाश मौर्य
Thursday, 6 November 2014
गांवों की सूरत बदहाल
देश की 68 फीसदी आबादी गांव में रहती है, पर देश के लाखों गांव आज भी सड़क, बिजली, पेयजल जैसी आधारभूत सुविधाओं का इंतजार कर रहे हैं। केंद्र और राज्य सरकारें गांवों की सूरत बदलने के लिए कई तरह की योजनाएं चला रही हैं पर उनका अपेक्षित परिणाम देखने को नहीं मिला है।भारत के गांव
- 6,38,365 कुल गांव हैं भारत में
- 68.84 फीसदी देश की आबादी गांव में रहती है
- 2,36,004 गांवों में 500 से ज्यादा लोग रहते हैं
- 3976 गांवों की आबादी 10,000 से अधिक है
1,07,753 गांव हैं सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में
40,000 से ज्यादा गांव हैं पश्चिम बंगाल, बिहार, ओडिशा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान में
यूनिक कोड नंबर
2011 के जनगणना में देश के हर गांव के लिए एक यूनिक कोड नंबर प्रदान किया गया है। छह अंकों वाले इस कोड नंबर के इस्तेमाल से गांवों के लिए लागू की जाने वाली तमाम विकास योजनाओं और ई-गवर्नेंस में आसानी के लिए किया गया है।
देश के बड़े गांव
बनगांव : 30,061 की आबादी वाला बनगांव बिहार ही नहीं, भारत का सबसे बड़ा गांव माना जाता है। सहरसा जिले के इस गांव में तीन पंचायतें कार्यरत हैं।
गहमर : 26250 की आबादी वाला यूपी के गाजीपुर जिले का गहमर देश के बड़े गांवों में से एक है।
पहले भी चली ग्राम विकास योजनाएं
अंबेडकर ग्राम विकास योजना : 2007 में यूपी में मायावती सरकार ने अंबेडकर ग्राम विकास योजना की शुरुआत की। 2011 में इसका नाम बदलकर अखिलेश सरकार ने लोहिया ग्राम विकास योजना कर दिया है। इसके तहत चयनित गांवों का 36 बिंदुओं के तहत विकास किया जाता है। इसके तहत संपर्क मार्ग, विद्युतीकरण, सबको आवास, शौचालय, पेयजल, तालाब, आंगनबाड़ी केंद्र, स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र की स्थापना की जाती है। तमाम सरकारी योजनाओं के कार्यान्यवयन आदि पर ध्यान दिया जाता है।
गांवों का हाल
बिजली
25752 गांवों में अभी तक नहीं पहुंचाई जा सकी है बिजली
1,08,408 गांवों में बिजली पहुंची राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना के तहत
95 फीसदी गांव विद्युतीकृत हो चुके हैं सरकारी आंकड़ों के मुताबिक (कुल गांव 5,97,464 हैं विद्युत मंत्रालय के मुताबिक)
सड़क
- 50 फीसदी गांव अभी भी देशभर में सड़क से नहीं जोड़े जा सके हैं
- 40 फीसदी गांव सड़कों से जुड़ी थीं साल 2000 में
- 2000 में प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना शुरू की गई
1.80 लाख बसावटों को सड़क से जोड़ा गया पीएमजीएसवाई से 3.72 लाख किलोमीटर नई सड़कें बनीं (विश्व बैंक की रिपोर्ट)
पेयजल-स्वच्छता
89 फीसदी ग्रामीण आबादी के पास पेयजल की सुविधा है
24 फीसदी ग्रामीण आबादी ही शौचालय का इस्तेमाल करती है
62 करोड़ देश की ग्रामीण आबादी खुले में शौच जाती है
बापू का ग्राम स्वराज्य का सपना
मेरा विश्वास है कि भारत चंद शहरों में नहीं, बल्कि सात लाख गांवों में बसा है। लेकिन हम शहरवासियों का ख्याल है कि भारत शहरों में ही है। हमने कभी यह सोचने की तकलीफ ही नहीं उठाई कि उन गरीबों को पेट भरने जितना अन्न और शरीर ढकने जितना कपड़ा मिलता है या नहीं और धूप और वर्षा से बचने के लिए उनके सिर पर छप्पर है या नहीं। (मेरे सपनों का भारत में महात्मा गांधी)
( प्रस्तुति - विद्युत प्रकाश )
Friday, 31 October 2014
पापू यहीं कहीं हैं...क्योंकि शब्द रहते हैं हमेशा जिंदा
पापू नहीं रहे। हां उनके बच्चे और उनसे करीब से जुड़े हुए लोग उन्हे इसी
नाम से जानते थे। पापू यानी रॉबिन शॉ पुष्प। 30 अक्तूबर 2014 को उन्होंने अपने
तमाम चाहने वालों का साथ छोड़ दिया। लेकिन पापू जैसे शब्द शिल्पी कभी इस दुनिया से
जाते हैं भला। नहीं जाते। क्योंकि शब्द मरा नहीं करते।
| रॉबिन शॉ पुष्प के साथ पटना में। ( 1999) |
मैं जब बड़ा हो रहा तो पटना से निकलने वाली पत्रिका आनंद डाइजेस्ट में
उनकी कहानी पढी थी यहां चाहने से क्या होता है..उनकी कुछ और रचनाएं पढ़ी थी। इसलिए
मेरे जेहन में उनका नाम एक कहानीकार के तौर पर था। फणिश्वरनाथ रेणु के निधन पर
उन्होंने अदभुत श्रद्धांजलि लिखी थी उनके लिए – सोने के कलम वाला हीरामन। 1995 के साल
में जब भारतीय जन संचार संस्थान में पढ़ाई करने आया तो हमारे सहपाठी बने सुमित
ऑजमांड शॉ। दोस्ती होने पर इस शॉ पर मैं चौंका। बाद में पता चला कि सुमित रॉबिन शॉ
पुष्प के छोटे बेटे हैं।
मुंगेर से आने के बाद रॉबिन शॉ पुष्प का लंबा वक्त पटना के सब्जीबाग में
किराये के घर में गुजरा। इस रविंद्रांगन में सैकड़ो साहित्यकार आए गए होंगे जो
अपनी स्मृतियां बयां करते हैं। पुष्प जी के सानिध्य में बिहार के तमाम
साहित्यकारों ने उनके आशीर्वाद से काफी कुछ सीखा। उनका मृदुल चेहरा....बातों में
वातस्लय का का भाव...चाहे कोई भी मिलने पहुंचे वे उतनी ही आत्मीयता उड़ेलते
थे...हर युवा लेखक साहित्यकार के साथ वैसा ही प्रेम जैसे अपने बच्चों से। ऐसे
साहित्यकार कथा शिल्पी मिलते हैं भला। आसानी से नहीं मिलते।
वे जीवनभर अनवरत कुछ नया लिखते रहे। कहानी की विधा में महारत हासिल थी।
उनकी स्टोरी टेलिंग का एक अपना स्टाइल था जो उन्हें बाकी कथाकारों से काफी अलग
करता था। वे कभी पुरस्कारों और छपने की होड़ में शामिल नहीं हुए। पूरे जीवन कभी
कथाकारों साहित्यकारों के गुट में नहीं रहे। पर 1957 के बाद हर साल उनकी कहानियां
देश के प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में जगह पाती रहीं।
उनकी जीवन संघर्ष से भरा रहा। मुंगेर में भी जिंदगी आर्थिक तंगी में गुजरी।
पूरी जिंदगी उन्होंने कोई नौकरी नहीं की। फ्रीलांसर के तौर पर जीवन। कभी रेडियो से
आने वाला चेक तो कभी कहानियों का पारिश्रमिक। पटना के महात्मा गांधी नगर में घर तो
बना पर उसमें गीता जी का सहयोग रहा जो कॉलेज में प्रोफेसर थीं। उनके दोनों बेटे
जीवन में सफलता की सीढ़िया लगातार चढ़ रहे हैं। बड़े बेटे संजय ओनिल शॉ मौसम विभाग
में अधिकारी हैं तो छोटे सुमित फिल्म निर्माण के क्षेत्र में।
1999 में जब उन्हें बिहार सरकार राजभाषा विभाग से फणीश्वर नाथ रेणु
सम्मान मिला तो मैं पूरे समय उनके साथ था। सत्तर पार कर चुके थे तो हार्ट अटैक भी
हो चुके थे। पर कई बार वे बचपन में लौट आते थे। निश्चल खिलखिलाहट... पटना में उनके
आवास पर कई बार उनसे मिलना हुआ। तमाम आत्मीय बातें करते थे। कई समस्याएं भी थीं, लेकिन
कभी निराश होते नहीं देखा। भले ही अब वे सशरीर इस दुनिया में न हों...पर शब्द तो
यहीं कहीं हैं...आसपास...उनके रचना संसार के तमाम पात्र भी यहीं हैं...आसपास...तभी
तो कहता हूं... पापू यहीं कहीं हैं...क्योंकि शब्द रहते हैं हमेशा जिंदा...
- विद्युत प्रकाश
मौर्य ( 31 अक्तूबर 2014)
Wednesday, 22 October 2014
दीपावली पर बचकर रहें खतरनाक मिठाइयों से
दीपावली पर बाजार में मिठाइयों की
खरीददारी करने जा रहे हैं तो सावधान हो जाएं। कहीं सिंथेटिक मिठाईयां आपके साथ
आपके परिवार को भी बीमार न बना दे। दीपावली पर कहीं लड्डु तो कहीं बर्फी की सोंधी खुशबू तो दुकानों
में सजी स्वादिष्ट एवं खुशबूदार मिठाईयां लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है। इन
मिठाईयों के बीच सिंथेटिक मिठाईयां भी काफी मात्रा में दुकानों में सजी है। जिस की
पहचान करना काफी मुश्किल है। ये मिठाईयां दीपावली की खुशियों के रंग में भंग डाल
सकता है। ऐसी मिठाईयों की खरीददारी से बचें।
सिंथेटिक मिठाइयां - दुकानदारों ने
दीपावली पर बड़ी मात्रा में सिंथेटिक मिठाईयां बनाते हैं। बाजार में सिंथेटिक
मोतीचूर लड्डु का दाना, डोडा बर्फी, मिल्क केक, खोआ, छेना आदि मिल सकता है। यूरिया, वाशिंग
पावडर आदि केमिकल से तैयार दूध से बनी सिंथेटिक मिठाई बिक्री के लिए तैयार है। ये
मिठाईयां काफी सस्ती होती है लेकिन स्वास्थ्य के लिए काफी हानिकारक है। ये मिठाइयां दीपावली की खुशियों को काफूर करने
के लिए काफी है।
गंदी मिठाइयों का स्टाक - दीपावली के
दौरान अस्थाई तौर पर फड़ी लगाकर मिठाई बेचने वालों उभर आते हैं। इनकी मिठाइयां शुद्वता
के पैमाने पर खरी नहीं होतीं। अधिकांश हलवाई दीपावली के मौके पर बेचने के लिए एक
सप्ताह पूर्व मिठाइयां बना बना कर गोदामों में स्टॉक करने लगते हैं।
सेहत से खिलवाड़ - हलवाई अधिक मुनाफे
के चक्कर में जन साधारण के स्वास्थ के साथ जमकर खिलवाड़ करते हैं। लालच में दूध के
स्थान पर पाऊडर का खोवा बनाते हैं। बताया जाता है कि पाऊडर का खोवा बनाते समय
चिकनाई के लिए इसमें रिफाइंड ऑयल का इस्तेमाल करते हैं। यह खोवा स्वास्थय के लिए हानिकारक है। वहीं मैदा, बेसन एवं घी व रिफाइंड आदि भी घटिया किस्म का इस्तेमाल कर
मिठाइयां बनाते हैं।
क्या करें
- ब्रांडेड कंपनियों की पैक मिठाइयां खरीदें
- खोया, छेना के बजाए सोनपापड़ी पेठा जैसी मिठाई खरीदें
- मिठाई के बजाय बिस्कुट भी खरीद सकते हैं।
- दीपावली के समय मिठाई के बजाय चाकलेट के डिब्बे भी उपहार में दे सकते हैं।
- मिठाई के बजाय ड्राई फ्रूट का विकल्प भी चुन सकते हैं।
Monday, 20 October 2014
किसान नेता देशमुख ने रचा इतिहास
पीजेंट एंड वर्कर्स पार्टी के बैनर तले चुनाव लड़ने वाले 88 साल के गणपत राव देशमुख ने इतिहास रच दिया है। वे 11वीं बार चुनाव जीतने वाले वे वे देश के लोकतंत्र के इतिहास में एकमात्र विधायक बन गए हैं।
दो साल पहले 2012 में उन्होंने विधानसभा में अपनी स्वर्ण जयंती मनाते हुए 50 साल पूरे किए थे तब उन्हें सम्मानित किया गया था। राजनीति के लंबे सफर में उन्होंने ज्यादा वक्त विपक्ष की बेंच पर गुजारा है, पर वे राज्य में दो बार 1978 और 1999 में मंत्री भी रह चुके हैं।
क्षेत्र में देशमुख का इतना सम्मान है कि इस बार एनसीपी ने गणपत राव के खिलाफ यहां से कोई उम्मीदवार नहीं उतारा था। सतारा और सांगली जिले की सीमा से लगा हुआ संगोल सोलापुर जिले का छोटा सा शहर है। देशमुख का ये इलाका सूखा प्रभावित है। लगातार किसानों की समस्याएं उठाने वाले देशमुख के खिलाफ संगोल में 1962 के बाद आज तक किसी भी राष्ट्रीय पार्टी के नेता को सफलता नहीं मिल पाई।
गणपत राव देशमुख
मात्र 44 लाख की संपत्ति
- 1956 में पुणे विश्वविद्यालय से स्नातक गणपत राव निहायत सादा जीवन जीते हैं। पांच दशक से ज्यादा विधायक और मंत्री रहने वाले देशमुख की कुल चल और अचल संपत्ति मात्र 44 लाख रुपये है।
मार्क्सवाद से प्रभावित
गणपत राव पुणे में अध्ययन के दौरान माक्र्सवादी विचारधारा के संपर्क में आए। वे आज भी मानते हैं कि माक्र्सवाद और गांधीवादी विचार ही समाज में बदलाव ला सकते हैं।
--- vidyutp@gmail.com
दो साल पहले 2012 में उन्होंने विधानसभा में अपनी स्वर्ण जयंती मनाते हुए 50 साल पूरे किए थे तब उन्हें सम्मानित किया गया था। राजनीति के लंबे सफर में उन्होंने ज्यादा वक्त विपक्ष की बेंच पर गुजारा है, पर वे राज्य में दो बार 1978 और 1999 में मंत्री भी रह चुके हैं।
क्षेत्र में देशमुख का इतना सम्मान है कि इस बार एनसीपी ने गणपत राव के खिलाफ यहां से कोई उम्मीदवार नहीं उतारा था। सतारा और सांगली जिले की सीमा से लगा हुआ संगोल सोलापुर जिले का छोटा सा शहर है। देशमुख का ये इलाका सूखा प्रभावित है। लगातार किसानों की समस्याएं उठाने वाले देशमुख के खिलाफ संगोल में 1962 के बाद आज तक किसी भी राष्ट्रीय पार्टी के नेता को सफलता नहीं मिल पाई।
गणपत राव देशमुख
- - 25,224 मतों से इस बार शिवसेना के शाहजीबापू पाटिल को हरा 11वीं बार जीते।
- - 2009 में उन्होंने 10वीं बार जीत कर तमिलनाडु के करुणानिधि की बराबरी की थी।
- - 52 साल से वे लगातार संगोला सीट से जनता का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।
- - 1962 में पहली बार सोलापुर जिले की संगोला सीट से जीता था चुनाव।
मात्र 44 लाख की संपत्ति
- 1956 में पुणे विश्वविद्यालय से स्नातक गणपत राव निहायत सादा जीवन जीते हैं। पांच दशक से ज्यादा विधायक और मंत्री रहने वाले देशमुख की कुल चल और अचल संपत्ति मात्र 44 लाख रुपये है।
मार्क्सवाद से प्रभावित
गणपत राव पुणे में अध्ययन के दौरान माक्र्सवादी विचारधारा के संपर्क में आए। वे आज भी मानते हैं कि माक्र्सवाद और गांधीवादी विचार ही समाज में बदलाव ला सकते हैं।
--- vidyutp@gmail.com
Friday, 17 October 2014
इस बार बनाएं स्वदेशी दीपावली
अपने देश के कुंभकारों के पेट पर लात न मारें। दीपावली में
अपना घर मिट्टी के दीयों से रोशन करें। सस्ते घटिया चीन के लाइटों को हरगिज न
खरीदें। इससे हमारी गाढ़ी कमाई का करोड़ो रुपया चीन जा रहा है हर साल। हम कंगाल हो
रहे हैं और चीन की अर्थव्यवस्था मालामाल।
इस बार 23 अक्तूबर की दीपावली से पहले चीन से आए उत्पादों (मूर्तियां, पटाखे, लाइट की लड़ियो आदि)
के विरुद्ध जागरूकता अभियान चलाएं। चीनी उत्पाद न खुद खरीदें न ही पड़ोसियों को
खरीदने दें। बाजार से सिर्फ स्वदेशी मूर्तियां और दीए ही खरीदें। चीनी लड़ियों का
मोह त्याग दें।
नई आर्थिक गुलामी
वैश्वीकरण के बिना विकसित देश की कल्पना नहीं की जा सकती, लेकिन इस आड़ में खुद
का वजूद धूमिल करना कहां तक उचित है। चीन के उत्पाद यहां के बाजारों पर पूरी तरह
हावी हैं। चाहे इलेक्ट्रोनिक्स का बाजार हो, चाहे गिफ्ट आइटम या फिर सजावट का। हर तरफ चीनी
उत्पाद दुकानों पर सजे मिल जाएंगे। सस्ते के चक्कर में लोग गुणवत्ता को नजरअंदाज
कर देते हैं।
घटिया गुणवत्ता के उत्पाद
दीपावली पर्व पर बाजार चीनी उत्पादों से भरे हैं। दीपक की जगह
विद्युत झालरें तो ले ही चुकी हैं, साथ ही अब बाजारों में चीनी दीपक भी आ गए हैं। इन दीपकों
को लोग एक से अधिक बार प्रयोग कर सकते हैं। इसके अलावा चीनी मोमबत्ती में तमाम
वैरायटी इस बार बाजार में उपलब्ध हैं। इनमें गुलाब, दिल, ग्लास, बाउल,
जैली, स्टार, कलर चेंजिंग कैंडल
जैसी चीजें हैं। इसी तरह बाजार में सजावट के लिए कृत्रिम फूल, गुलदस्ते, झालरें भी उपलब्ध
हैं। भले ही सस्ती लगती हों पर हैं घटिया गुणवत्ता की।
परंपराएं पीछे छूटीं
आप गौर करेंगे तो पाएगे कि दीपावली के इन चीनी सामानों में
निरंतर हो रहे षड्यंत्र पूर्ण नवाचारों से हमारी दीपावली और लक्ष्मी पूजा का
स्वरुप ही बदल रहा है। हमारा ठेठ पारम्परिक स्वरुप और पौराणिक मान्यताएं पीछे
छूटती जा रहीं हैं और हम केवल आर्थिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक गुलामी को भी गले लगा
रहे हैं।
लगभग पांच लाख परिवारों की रोजी रोटी को आधार देनें वाला यह
त्यौहार अब कुछ आयातकों और बड़े व्यापारियों के मुनाफ़ा तंत्र का एक केंद्र मात्र बन
गया है। न केवल कुटीर उत्पादक तंत्र बल्कि छोटे, मझोले और बड़े तीनों स्तर पर पीढ़ियों से
दीवाली की वस्तुओं का व्यवसाय करने वाला एक बड़ा तंत्र निठल्ला बैठने को मजबूर हो
गया है।
पारंपरिक दीपदान से मेक इंडिया में योगदान
एक अनुमान के अनुसार इस साल 600 करोड़ रुपए के अवैध चीनी पटाखे भारतीय
बाजारों में उतर चुके हैं। हमें दीपावली पर ये पटाखे चलाने के बजाय पारंपरिक दीप
दान को अपनाना चाहिए। दीप दान पर्यावरण के लिहाज से बेहतर होगा, साथ ही इसके जरिए
प्रधानमंत्री के ‘मेक इन
इंडिया’ मिशन को भी
बल मिलेगा।
विद्युत प्रकाश मौर्य
Saturday, 11 October 2014
शोर, प्रदूषण, बीमारी और दीवाली
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने रात 10 बजे से सुबह छह बजे तक पटाखे चलाने पर पूरी तरह रोक लगा रखी है। पटाखों से 125 डेसीबाल तक ध्वनि प्रदूषण होता है जो बच्चों और बूढ़ों को बहरा तक बना सकता है।
देश में पटखों का सालाना कारोबार एक हजार करोड़ रूपये से ज्यादा का है। हालांकि बढ़ती महंगाई का असर इस साल पटाखों के बाजार पर भी दिखा। पटाखे 40 फीसदी तक बढ़ गए हैं। लेकिन मंदी की बयार में भी देश भर में लोगों ने जमकर आतिशबाजी की। आतिशबाजी के बाजार पर महंगाई और मंदी का कुछ खास असर नहीं दिखता। दीपावली के बाद हवा में प्रदूषण की मात्रा खतरनाक स्तर पर पहुंचजाती है। अस्पतालों में सांस के मरीजों कीतादात अचानक बढ जाती है। लेकिन आतिशबाजी करने वालों को भला इससे कहां फर्क पड़ता है....
किसी शायर ने कहा था....
तुम शौक से मनाओ जश्ने बहार यारों...
इस रोशनी में लेकिन कुछ घर जल रहे हैं....
Sunday, 5 October 2014
काम के घंटे और छुट्टियां
कोई भी आदमी
स्वस्थ और तरोताजा होकर काम कर सके इसके लिए जरूरी है कि उसे साप्ताहिक अवकाश तो
दिया ही जाए। कई निजी संस्थान अपने मुलाजिमों को छुट्टी वाले दिन भी काम पर बुलाते
हैं इसके एवज में उन्हें ओवरटाइम या फिर कभी छुट्टी दे देते हैं। वहीं कुछ शोषक
संस्थान छुट्टी के दिन बेगार करवाते हैं इसके बदले में कुछ भी नहीं देते। आदर्श
स्थिति यह होनी चाहिए कि हर संस्थान को अपने कर्मचारी को हप्ते में एक दिन छुट्टी
हर हाल में देनी ही चाहिए। इससे संस्थान के मानव संसाधन की रक्षा हो सकती है। एक
अच्छे संस्थान कुछ साल पहले अपने सभी इकाईयों को पत्र जारी किया कि अगर आप किसी
स्टाफ को एक साप्ताहिक अवकाश में काम पर बुलाते हो तो उसे दूसरे अवकाश की छुट्टी
अवश्य दो। भले ही आप उसे अवकाश का पैसा क्यों न दे रहे हो। ऐसा नहीं करने पर
कर्मचारी दिमागी तौर पर बीमार हो सकता है। बिना अवकाश लिए लगातार काम करने का असर
काम की गुणवत्ता पर अवश्य पड़ता है। खास तौर पर दिमागी काम करने वाले लोगों के
मामले में। जो लोग किसी तरह का दिमागी काम निपटाते हैं उन्हें ज्यादा रिफ्रेशमेंट की
जरूरत है अन्यथा वे कई तरह की गलतियां का के दौरान कर सकते हैं।
जो लोग शादीशुदा
हैं और अपने परिवार के साथ रहते हैं, उनके लिए साप्ताहिक
अवकाश की बहुत अहमियत है। क्योंकि उनकी छुट्टी पर उनके परिवार वालों का भी हक बनता
है। छुट्टी के दिन परिवार के साथ कहीं बाहर घूमने जाना, सिनेमा
देखना या पार्क में घूमना एक स्वस्थ प्रक्रिया है। जो लोग छुट्टी वाले दिन घर में
सोना चाहते हैं उनके मामले में ऐसा हो सकता है कि या तो वे आलसी हैं या फिर छह दिन
के काम के दौरान वे काफी थक जाते हैं।
कई लोगों को आदत
होती है कि वे ओवर टाइम करके ज्यादा रुपए बनाने की कोशिश में छुट्टी वाले दिन भी
काम पर आना चाहते हैं। पर इसका बड़ा ही नकारात्मक परिणाम लंबे समय में जाकर पड़ता
है। आप थोड़े से पैसों के लिए ज्यादा काम तो कर लेते हैं। पर लंबे समय में आपका शरीर
कई तरह की बीमारियों से ग्रसित हो सकता है। उसमें आपको इलाज में काफी रूपया फूंकना
पड़ सकता है। आप यह भी याद रखिए कि जब आपको कोई लंबी और असाध्य बीमारी हो जाएगी तब
कोई संस्थान आपको लंबे समय तक नही ढो सकेगा। उसको आपकी जगह किसी और श्रम की जरूरत
होगी। इसके लिए वह कोई नया आदमी बहाल कर लेगा। इसलिए कभी अपने शरीर और अपने जीवन
को दांव पर लगाकर किसी संस्थान को अपनी सेवाएं देना कोई अच्छी बात नहीं है। अच्छी बात
यह है कि आप संस्थान के साथ प्रोफेशनल व्यवहार करें और संस्थान भी आपके साथ इसी तरह
का व्यवहार करे। जब आपको लगता हो कि कोई संस्थान लगातार आपका शोषण कर रहा है तो
आपको संस्थान बदलने के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए।
- माधवी रंजना
Friday, 3 October 2014
सोशल मीडिया और महिलाएं और स्त्री कुंभ
क्या सोशल मीडिया के व्यापक विस्तार से महिलाओं को खास तौर पर कोई लाभ
हुआ है। इस मुद्दे पर विचार के लिए 30 सितंबर 2014 को हंसराज कॉलेज, दिल्ली यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी पत्रिका 'मीडिया मैप' और नारी विकास केंद्र (हंसराज कॉलेज) द्वारा संयुक्त रूप से 'स्त्री कुम्भ' और 'सोशल मीडिया और
महिलाएं ' विषय पर केंद्रित
राष्ट्रीय संगोष्ठी (सेमिनार) का आयोजन किया गया। इसमें मुख्य अतिथि के रूप में सामाजिक
कार्यकर्ता श्रीमती रंजना कुमारी ने शिरकत की।
'स्त्री कुम्भ' में मीडिया शिक्षा
क्षेत्र में उल्लेखनीय काम कर रही महिलाओं को सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में
इंडियन एयरलाइंस की पहली महिला निदेशक सुषमा चावला, वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति सुयोग
पर काम करने वाली डाक्टर आरती कुमार को सम्मानित किया गया। डाक्टर आरती कुमार ने
सुयोग को न सिर्फ भारत में बल्कि संयुक्त अरब अमीरात में भी लोकप्रिय बनाया है।
योग और आयुर्वेद पर अंग्रेजी और हिंदी में कई पुस्तकें लिखने वाली डाक्टर
सुधा शर्मा को इस मौके पर सम्मानित किया गया। वहीं कार्यक्रम में महिलाओं के लिए
उल्लेखनीय कार्य करने के लिए डाक्टर रमा सहारिया ( अवकाश प्राप्त प्रिंसिपल पीजी
महिला कालेज, रामपुर) को सम्मानित किया गया।
डॉक्टर रमा को मातृशक्ति पुरस्कार
इस मौके पर हंसराज कालेज की हिंदी की शिक्षिका डॉक्टर रमा को पद्मभूषण
कल्याण देव मातृशक्ति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्हें पुरस्कार राशि के तौर
पर 51 हजार रुपये दिए गए। यह पुरस्कार उन्हें साल 2013 में भारतीय मुद्रित माध्यम
में स्त्री की छवि पर केंद्रित सर्वश्रेष्ठ पुस्तक के लिए दिया गया।
सोशल मीडिया और महिलाओं पर 30 पेपर
कार्यक्रम के आयोजन में भारतीय जन संचार संस्थान के हिंदी पत्रकारिता
विभाग के अध्यक्ष रहे डाक्टर रामजी लाल जांगिड और अंग्रेजी के अध्यक्ष रहे प्रदीप माथुर की भूमिका अग्रणी रही। कार्यक्रम में विभिन्न राज्यों से आये मीडिया
शिक्षकों ने भाग लिया। इस आयोजन के दूससे सत्र में सोशल मीडिया और महिलाएं पर 30
पेपर पढ़े गए। इसमें 15 पेपर हिंदी में थे। इस दौरान देवी अहिल्या बाई
विश्वविद्यालय इंदौर से सुनीता वर्मा, भोपाल के केशव पटेल, गुरुनानक देव
विश्वविद्यालय अमृतसर से डाक्टर पुनीत कौर, इंडिया टूडे आनलाइन से सुरेश कुमार,
पारुल जैन, वीनीता कुमार ने अपने पर्चे के द्वारा सोशल मीडिया और महिलों पर
उल्लेखनीय विचार साझा किए।
कार्यक्रम का संचालन पारूल जैन ने किया। इस दौरान बहुत से नए विचार सामने
आए। संगोष्ठी में भाग ले रहे कई वरिष्ठ पत्रकारों ने ये कहा कि इस संगोष्ठी में
उन्हें कई नई जानकारियां मिली और उन्होंने भी अपने कई अनुभव सभी के साथ बांटे।
हर साल होगा स्त्री कुंभ, सत्या जांगिड ने दिए एक लाख
नारी सशक्तिकरण में उल्लेखनीय योगदान करने वाली महिलाओं को सम्मानित करने
के लिए हर साल स्त्री कुंभ का आयोजन किया जाएगा।
इस आयोजन के लिए कालिंदी कालेज की अवकाश प्राप्त अर्थशास्त्र की प्रोफेसर डाक्टर सत्या जांगिड ने एक लाख रुपये का योगदान किया। डाक्टर सत्या जांगिड के पति और पत्रकारिता के दिग्गज प्रोफेसर डाक्टर रामजीलाल जांगिड ने बताया कि हमारी योजना एक ट्रस्ट बनाने की है जिसके पास एक करोड़ रुपये की जमा राशि हो।
इस राशि के ब्याज से हर साल छोटे छोटे कस्बे से निकल कर बड़े महानगरों में पहचान बनाने वाली नारी शक्ति को सम्मानित किया जाएगा। खुद डाक्टर सत्या जांगिड़ की बात करें तो वे गाजीपुर जैसे छोटे से शहर से आई थीं। काशी हिंदू विश्वविद्यालय से वसंत कालेज में अध्यापन के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय पहुंची।डा. सत्या जांगिड बचपन से ही स्त्री और पुरूष की बराबरी की पक्षधर थीं। स्कूली जीवन में उन्होंने घर में भाइयों की तरह क्रिकेट खेलने की जिद पूरी की।
शुरू से स्त्री शक्ति को मजबूत बनाना उनका लक्ष्य रहा। जो लोग इस स्त्री कुंभ के इस अभियान से जुड़ना चाहते हों वे इस ईमेल पर संपर्क कर सकते हैं –
इस आयोजन के लिए कालिंदी कालेज की अवकाश प्राप्त अर्थशास्त्र की प्रोफेसर डाक्टर सत्या जांगिड ने एक लाख रुपये का योगदान किया। डाक्टर सत्या जांगिड के पति और पत्रकारिता के दिग्गज प्रोफेसर डाक्टर रामजीलाल जांगिड ने बताया कि हमारी योजना एक ट्रस्ट बनाने की है जिसके पास एक करोड़ रुपये की जमा राशि हो।
इस राशि के ब्याज से हर साल छोटे छोटे कस्बे से निकल कर बड़े महानगरों में पहचान बनाने वाली नारी शक्ति को सम्मानित किया जाएगा। खुद डाक्टर सत्या जांगिड़ की बात करें तो वे गाजीपुर जैसे छोटे से शहर से आई थीं। काशी हिंदू विश्वविद्यालय से वसंत कालेज में अध्यापन के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय पहुंची।डा. सत्या जांगिड बचपन से ही स्त्री और पुरूष की बराबरी की पक्षधर थीं। स्कूली जीवन में उन्होंने घर में भाइयों की तरह क्रिकेट खेलने की जिद पूरी की।
शुरू से स्त्री शक्ति को मजबूत बनाना उनका लक्ष्य रहा। जो लोग इस स्त्री कुंभ के इस अभियान से जुड़ना चाहते हों वे इस ईमेल पर संपर्क कर सकते हैं –
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