Tuesday, 25 May 2010

सरकार का एक साल

जनता ने आपका पांच साल और सरकार चलाने का मौका दिया। एक साल बाद आपने कहा सरकार हर मोर्चे पर सफल। हां सरकार सफल तो है...दूसरी बार कमान संभालने के बाद आपने जनता को चूस ही तो लिया लेकिन लोग उफ भी नहीं कर सके...चीनी इतनी महंगी कर दी नौनिहालों को बिना चीनी के दूध पीने की आदत पड़ गई। दाल इतनी महंगी हो गई कि लोगों को 100-100 ग्राम के पाउच खरीदने को मजबूर होना पड़ा। 

लेकिन आपने यहां भी सितम ढाना नहीं छोड़ा। तेल के दाम इतने बढ़ा दिए कि मिड्ल क्लास लोगों का भी सड़क पर चलना मुश्किल हो गया। हाल में खबर आई है कि प्राकृतिक गैस भी महंगी होगी तो जाहिर है कि बिजली भी महंगी होगी। जैसा कि आपके उर्जा मंत्री ने चेता ही दिया है। बिजली महंगी होगी। रसोई गैस, पाइप लाइन से आने वाली गैस, सीएनजी सबकुछ मंहगी होगी। जाहिर है आम आदमी का सफर यानी पब्लिक ट्रांसपोर्ट भी महंगा हो जाएगा। लेकिन अपनी यूपीए-2 के एक साल पूरे होने पर न जाने आप किस महंगाई पर आने वाले छह महीने में काबू कर लेने बात कर रहे हैं....

हमने माना कि तगाफुल ना करोगे लेकिन,


खाक हो जाएंगे हम तुमको खबर होने तक।


पहले आपके कृषि मंत्री ने गरीबों की गरीबी का मजाक उड़ाया था ये कहते हुए कि अगर चीनी महंगी हो गई तो ऐसी कोई चीज तो महंगी नहीं हो गई जिसके खाए बिना आदमी मर जाए। हां काफी हद तक सही भी है गरीब आदमी तो बिना चीनी के ही गुजारा कर सकता है। उसके शरीर को भला ग्लूकोज की क्या जरूरत...कुपोषण से पीड़ित लोगों को अरहर और मूंग का दाल खाने की क्या जरूरत। वे पीली मटर की दाल खाएं जिसे आप विदेशों से मंगवा रहे हैं। सुना है विदेशों में इसे जानवर खाते हैं। वहां दस रूपये किलो बिकने वाली पीली मटर की दाल अपने देश में 30 रूपये किलो बिक रही है। गरीब आदमी का क्या है वह कुछ भी खाकर गुजारा कर सकता है। आप तो अमीरों की चिंता करते हैं इसलिए सस्ती कारें बाजार में पेश कर लोगों को सब्जबाग दिखा रहे हैं...सचमुच आपकी उपलब्धियां बहुत शानदार हैं। आपके राज में निर्दोष लोगों का, गरीबों का खून हो रहा है। नक्सलवादी आम लोगों को मार रहे हैं। फौजियों को भी मार रहे हैं। देश के नक्शे में उनके वारदात की सीमाएं बढ़ती जा रही हैं। फिर भी आप अपने कार्यकाल को सफल बता रहे हैं। आपका नाम मनमोहन है तो सचमुच आपने अपनी बातों से मन मोह ही लिया है। चलिए थोड़ी देर के लिए हम भी खुश हो लेते हैं। बकौल शायर...


हमको मालूम है जन्नत की हकीकत


लेकिन दिल को खुश रखने को गालिब ये ख्याल अच्छा है।


- विद्युत प्रकाश


Monday, 24 May 2010

सौ साल बाद...मार्क ट्वेन की आत्मकथा

एडवेंचर आफ टाम सायर और हकलबेरी फिन जैसी लोकप्रिय पुस्तकों के लेखक मार्क ट्वेन की आत्मकथा जल्द ही बाजार में दस्तक देने वाली है। मजेदार बात ये है कि मृत्यु के सौ साल बाद मार्क ट्वेन की आत्मकथा प्रकाशित हो रही है। 21 अप्रैल 1910 को मार्क ट्वेन की मृत्यु हुई थी। मार्क ट्वेन अपने जीवन में वसीयत कर गए थे कि उनकी आत्मकथा मृत्यु के सौ साल बाद ही प्रकाशित होनी चाहिए। कैलोफोर्निया यूनीवर्सिटी ट्वेन की आत्मकथा की पहली प्रति इसी साल नवंबर में जारी करेगी। उन्नीसवीं सदी के लोकप्रिय लेखक मार्क ट्वेन की आत्मकथा में पांच लाख शब्द होंगे। मार्क ट्वेने ने जीवन में काफी उतार चढ़ाव देखा था लिहाजा उनकी आत्मकथा के भी काफी रोचक होने के आसार हैं।



मार्क ट्वेन के पन्नों से : 1870 में लेखन शुरू करने वाले ट्वेन ने 1906 में टाइप करने के लिए लियोन को स्टेनोग्राफर नियुक्ति किया। लियोन ट्वेन के काफी करीब आ गईं थी। 1909 यानी अपनी मृत्यु से एक साल पहले ट्वेन ने लियोन को लताड़ लगाते हुए निकाल दिया। उनका कहना था कि वह उनकी संपत्ति की पावर आफ अटार्नी हासिल करने के लिए सम्मोहित कर रही थीं। ट्वेन की आत्मकथा से लियोन के साथ उनके रिश्ते के बारे में काफी कुछ पता चलेगा।






सैमुएल क्लीमेंस यानी मार्क ट्वेन का जन्म फ्लोरिडा में वर्ष 1835 में हुआ था। शरारत करने में क्लीमेंस का पहला नंबर आता था। पढ़ने-लिखने के नाम से उसे बुखार आ जाता था। जब वह बारह साल का हुआ तो पिता की मृत्यु हो गई। अब क्लीमेंस को पढ़ाई के साथ मजदूरी भी करनी पड़ी। बाईस साल की उम्र में उसने एक नाविक की नौकरी की। फिर उसे छोड़कर एक समाचार पत्र का संवाददाता बन गया। सन्‌1870 में वह एक पत्र का संपादक बन गया। इसी बीच वह हास्य व्यंग्य की कहानियाँ लिखने लगा।
एक दिन उसने सोचा कि क्यों न अपने बचपन के शैतानी भरे जीवन पर एक उपन्यास लिखूँ। उसने एक छद्म नाम से लिखना चाहा। तभी उसे 'मार्क ट्वेन' वाले बाँस की घटना उसे याद आई। और उसने अपना नाम रखा 'मार्क ट्वेन।' उसने अपने उपन्यास का नाम रखा 'टॉम सायर'। जब यह प्रकाशित हुआ तो उसे दुनिया भर के बच्चों ने पसंद किया। वह विश्व बाल साहित्य का कालजयी उपन्यास है। टॉम एक ऐसा चरित्र बन गया है जो शरारती और नटखट होकर भी चतुर है और वह अच्छे काम करना भी पसंद करता है। मार्क ट्वेन के व्यंग्य भी अंग्रेजी साहित्य की धरोहर स्वीकार किए गए।






Thursday, 20 May 2010

आचार्य राममूर्ति- कुछ यादें कुछ बातें

आचार्य राममूर्ति हमारे बीच नहीं है। आइए जानते हैं आचार्य राममूर्ति के बारे में...............


1938 में लखनऊ विश्वविद्यालय से एमए इतिहास में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होकर उन्होंने बनारस के क्वींस कॉलेज में अध्यापन कार्य किया. 1954 में कॉलेज की नौकरी छोड़कर वह श्री धीरेंद्र मजूमदार के आह्वान पर श्रमभारती खादीग्राम (मुंगेर, बिहार) पहुंचे, जहां उन्होंने श्रम-साधना, जीवन-शिक्षण और सादा जीवन के अभ्यास के साथ एक नए जीवन की शुरुआत की. यहां उन्होंने गांधी जी की कल्पना की नई तालीम का अभ्यास और शिक्षण शुरू किया.



आचार्य राममूर्ति के सही जीवन की शुरुआत खादीग्राम से हुई. आचार्य विनोबा भावे के भूदान आंदोलन के सिलसिले में उन्होंने मुंगेर ज़िले की पदयात्रा की, जिसके द्वारा उन्होंने भूदान यज्ञ आंदोलन का विचार प्रसार तथा भूमिहीनता दूर करने के निमित्त जनजागरण किया. आचार्य श्री ने सांप्रदायिक एवं जातीय संघर्षों को कम करने या उन्हें समाप्त करने के कई प्रयोग किए, जिनमें बड़हिया (मुंगेर, बिहार) में बागियों को आत्मसमर्पण के लिए तैयार करना और उनका आत्मसमर्पण कराना प्रमुख था. वह सर्वोदय आंदोलन के केंद्रीय संगठन सेवा संघ के अध्यक्ष भी बने. सर्वोदय आंदोलन की पत्रिकाओं नई तालीम, भूदान यज्ञ, गांव की आवाज़ का संपादन भी आचार्य जी ने किया तथा उन्होंने गांव का विद्रोह, शिक्षा संस्कृति और समाज, जे पी की विरासत, भारत का अगला क़दमः लोकतंत्र समेत कई किताबें लिखी हैं.



आचार्य राममूर्ति मूलतः शिक्षक हैं और उन्होंने अपना सारा जीवन समाज को शिक्षित करने में लगा दिया. सन्‌ 1974 में जब जयप्रकाश जी ने भ्रष्टाचार के खिला़फ छात्र आंदोलन का समर्थन किया और उसे नेतृत्व देने का फैसला किया तो आचार्य जी उसमें कूद पड़े. आचार्य विनोबा भावे इस आंदोलन को सही नहीं मानते थे, पर आचार्य जी ने अपने साथियों सहित इस आंदोलन को सफल बनाने में जान लगा दी. आचार्य जी बिहार के कोने-कोने में गए और उन्होंने संघर्ष की वैचारिक नींव मज़बूत की. जयप्रकाश जी ने संपूर्ण क्रांति के विचार को जब देश के सामने इस आंदोलन के माध्यम से 1975 में रखा तो आचार्य जी ने इसका वैचारिक भास्य हर जगह जाकर समझाया. आचार्य राममूर्ति की भाषा इतनी सहज, सरल और तार्किक होती थी कि लोग मंत्रमुग्ध हो जाते थे. आज भी आचार्य जी की भाषा उतनी ही मीठी, प्रिय, तार्किक, सीधी और सरल है कि बुद्धि बिना ना-नुकुर के उसे सहेज लेती है.



सर्वोदय आंदोलन के कई बड़े नेता चले गए, लेकिन अभी ठाकुरदास बंग, नारायण देसाई और आचार्य राममूर्ति हमारे बीच हैं. आचार्य राममूर्ति ने धीरेंद्र मजूमदार और जयप्रकाश जी के साथ आज़ाद भारत के गांवों, उनके स्वराज्य और स्वराज का सपना देखा था. इसके लिए उन्होंने अपना सारा जीवन लगा दिया. सारा जीवन लोकशिक्षण के लिए वह यायावरी करते रहे. अब जब शरीर पूरा साथ नहीं दे रहा तो कभी पटना तो कभी खादीग्राम में रहते हैं. वी पी सिंह जब प्रधानमंत्री थे तो उन्होंने आचार्य जी को राज्यपाल बनाने का प्रस्ताव किया था, लेकिन आचार्य जी ने इसे अस्वीकार कर दिया और शिक्षा के क्षेत्र में काम करने की इच्छा जताई. तब वी पी सिंह ने उन्हें राष्ट्रीय शिक्षा नीति की समीक्षा समिति के अध्यक्ष के रूप में ज़िम्मेदारी दी. उनकी रिपोर्ट शिक्षा नीति और शिक्षा में क्रांति की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है.



आज आचार्य जी की उम्र 97 साल है. तो क्या वह अपनी वृद्धावस्था में खामोश बैठे हैं और केवल समय गुज़ार रहे हैं? आम आदमी के तौर पर इसका उत्तर हां ही हो सकता है, पर यह है नहीं. आचार्य जी ने जनवरी 2010 में अपनी नई पुस्तक लिखी है, महिला शांति सेना: शांति की नई संस्कृति के लिए एक विधायक और रचनात्मक क्रांति. 97 साल की उम्र में भी समाज के लिए सोचने एवं विचार करने के लिए सामग्री और सवाल खड़े करने वाला शख्स हम सबके सलाम का अधिकारी है.



2002 में आचार्य जी ने एक नई शुरुआत की. उन्हें गांधी जी की एक बात याद आई. जब आज़ादी मिलने के कुछ दिन बाकी थे तो एक दिन पत्रकारों ने गांधी जी से पूछा, ‘‘अंग्रेजों के जाने के बाद आप कौन सा काम सबसे पहले करना चाहेंगे?’’ गांधी जी का उत्तर था, ‘‘लोकतंत्र को आगे बढ़ाना (सेटिंग डेमोक्रेसी ऑन दि मार्च)’’ आचार्य जी ने इसी सूत्र को अपना रास्ता बनाया.



सामाजिक कार्यकर्ता, राजनैतिक दलों के नेता आचार्य जी से मिलते रहते थे. वे आचार्य जी को आदर देते थे, लेकिन साथ देने का वायदा नहीं करते थे. सर्वोदय और स्वयंसेवी संस्थाएं भी खामोशी वाला उत्तर देती थीं. आचार्य जी ने एक कोशिश पंचायती राज के पंच पर की. उन्हें पंचायती राज व्यवस्था के अंदर परिवर्तन की एक संभावना नज़र आई, क्योंकि महिलाओं को एक तिहाई स्थान पंचायती राज के हर स्तर पर प्राप्त हुआ. आचार्य जी का मानना है कि महिलाओं में रचना और सृजन की अपार शक्ति छिपी हुई है. वे पंचायती राज के बहाने गांव से लेकर राज्य स्तर तक सभाओं में जाते रहे और अपनी बातें रखते रहे.



27 फरवरी 2002 को महावीर और बुद्ध की धरती वैशाली में दस हज़ार लोगों की सभा हुई, जिसे वैशाली सभा का नाम दिया गया. यहां महिला शांति सेना की घोषणा हुई. यह सभा ऐतिहासिक थी, जिसमें पांच हज़ार से ज़्यादा महिलाएं शामिल थीं. इस सभा के बाद महिला शांति सेना के शिक्षण, प्रशिक्षण और संगठन का काम शुरू हुआ. आज महिला शांति सेना बिहार के अलावा असम, अरुणाचल, मणिपुर, त्रिपुरा और उड़ीसा तक फैल चुकी है. यह पुस्तक आचार्य जी द्वारा बोले गए, लिखे गए लेखों तथा सवालों-जवाबों का अद्भुत संग्रह है. आइए, आपको झलक दिखाते हैं. ‘‘आज जिस तरह की वैचारिक और विधायक क्रांति की ज़रूरत है, वह उन्हीं लोगों से शुरू होगी, जो सभ्यता के धरातल पर मनुष्य जाति के विकास को कुछ दूर तक देख सकते हैं.’’ ‘‘स्थानीय जीवन सुखी और शांत स्थायी जीवन भारत की दुनिया को एक देन होगी और इसका श्रेय महिला शांति सेना को मिले बिना नहीं रहेगा.’’ ‘‘शांति की संस्कृति एक रचनात्मक आंदोलन है, जो जनमत की शक्ति पर विश्वास रखता है और प्रचलित सत्ता के साथ सम्मानपूर्ण सहयोग करके परिवर्तन की स्थिति पैदा करना चाहता है, क्योंकि उसका विश्वास है कि परिवर्तन पहले नागरिक का होना चाहिए और उसके बाद ही संस्थाओं और संगठन का.’’



‘‘भावी क्रांति हितों के संघर्ष की नहीं है, बल्कि एक नई मानवीय संस्कृति के निर्माण की है. परिस्थिति की इस बारीकी को जो लोग नहीं समझेंगे, वे चाहते हुए भी क्रांति के वाहक नहीं बन सकेंगे.’’



‘‘अब बंदूक़ और तलवार के भरोसे परिवर्तन का प्रयोग हमेशा के लिए छोड़ देना चाहिए. मनुष्य को आज तक जो सिखाया गया है, उसे भूलने के लिए समय तो देना ही पड़ेगा और शिक्षण की सीढ़ियां बनानी पड़ेंगी, जिन पर आदमी धीरे-धीरे चढ़ सके. हो सकता है कि कुछ सीढ़ियों पर धीरे-धीरे चढ़ने के बाद मनुष्य में छलांग लगाने की शक्ति आ जाए.’’



‘‘पूंजी से जो विकास होगा, वह थोड़े लोगों के लिए होगा, पूरे समाज के लिए नहीं होगा. पूरे समाज को ध्यान में रखकर परिवर्तन लाने की बात हो तो बेशक़ बुनियादी परिवर्तन करना पड़ेगा.’’‘‘आज की पंचायत का उद्देश्य स्थानीय जीवन को समग्र और समृद्ध करने का है. पंचायत राज्य शक्ति का अंग नहीं है, बल्कि पंचायत का क्षेत्र स्वतंत्र नागरिक शक्ति का क्षेत्र है. उसमें समता है, सहकार है और सहभागिता है.’’ जिनके मन में समाज बदलने की, कुछ करने की चाह है, उन्हें आचार्य राममूर्ति के पास जाना चाहिए और उनके अनुभव और ज्ञान को आत्मसात करना चाहिए. 97 वर्ष की उम्र में भारत के सामाजिक एवं राजनैतिक इतिहास के जीवित और सबसे विश्वसनीय व्यक्ति के पास जाना चाहिए और समझना चाहिए कि क्यों सपने पूरे नहीं होते, क्यों लोग चलते तो मंजिल की तऱफ हैं, पर क्यों भटक जाते हैं. ले सकें तो वह ताक़त भी उनसे प्राप्त करनी चाहिए कि कैसे 97 वर्ष की आयु में भी मानसिक एवं शारीरिक रूप से चेतन और सक्रिय रहा जाता है. आचार्य राममूर्ति इस समय हमारे देश में अकेले जीवित इतिहास हैं और शांतिपूर्ण बदलाव का ज़िंदा शब्दकोष हैं।



(( चौथी दुनिया से साभार ))

नहीं रहे आचार्य राममूर्ति

जाने माने गांधीवादी शिक्षाविद और समाजसेवी आचार्य राममूर्ति का निधन हो गया है। 98 साल के उम्र में पटना में उन्होने अंतिम सांस ली। आचार्य राम मूर्ति जय प्रकाश नारायण के सहयोगी थे। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने आचार्य राममूर्ति के निधन पर शोक संवेदना जताते हुए उनकी राजकीय सम्मान से अंत्येष्टि कराने की घोषणा की है। आचार्य जी के निधन पर आरजेडी अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने भी शोक जताया है। आचार्य राममूर्ति का आश्रम जमुई में था लेकिन उनकी तबीयत कई महीनों से खराब थी और पटना के इंदिरा गांधी हृदय रोग संस्थान में उनका इलाज चल रहा था। 1938 में लखनऊ विश्वविद्यालय से एमए इतिहास में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करने के बाद आचार्य राम मूर्ति ने बनारस के क्वींस कॉलेज में अध्यापन कार्य किया। 1954 में कॉलेज की नौकरी छोड़कर वे धीरेंद्र मजूमदार के आह्वान पर श्रमभारती खादीग्राम मुंगेर, बिहार पहुंचे, जहां उन्होंने सादा जीवन के अभ्यास के साथ एक नए जीवन की शुरुआत की। यहां उन्होंने गांधी जी की कल्पना की नई तालीम का अभ्यास और शिक्षण शुरू किया। आचार्य राममूर्ति की अगुवाई में 1990 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति में सुधार के लिए कमेटी का गठन किया गया था। आचार्य राममूर्ति समिति ने अपनी रिपोर्ट शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन की सिफारिश की थी।

Tuesday, 18 May 2010

रेल मंत्री शर्म करें

रेलमंत्री का ये बयान शर्मशार करने वाला है कि नई दिल्ली स्टेशन पर रविवार को जो हादसा हुआ उसमें यात्रियों की गलती थी। रेलवे एक सेवा है। सारे यात्री रेलयात्रा के एवज में किराया देते हैं।

 16 मई को नई दिल्ली स्टेशन पर जो लोग जुटे थे वे सब घर जाने के लिए अपनी अपनी ट्रेन पकड़ना चाहते थे। इन सभी यात्रियों ने ट्रेन का टिकट खरीदा हुआ था। जाहिर है रेलवे के लिए वे सभी लोग उपभोक्ता की तरह हैं। त्योहार, गर्मी की छुट्टी और शादी के मौसम में रेलवे अतिरिक्त ट्रेने चलाता है तो वह यात्रियों को कोई खैरात नहीं बांटता बल्कि इसकी एवज में कमाई करता है। अगर वह लोगों को यात्रा के टिकट बेचता है तो उनके लिए बैठने के इंतजाम करना भी उसकी जिम्मेवारी बनती है। बिना पूरी घटना की जांच पड़ताल किए ममता बनर्जी जिस तरह टिप्पणी कर दी वह लोकतंत्र के लिए घातक है। बिहार के लोग गरीब जरुर हैं लेकिन वे लोग जिन राज्यों में जाकर नौकरी करते हैं वहां मेहनतकश होते हैं। त्योहार और शादियों के मौसम में हर कोई अपने गांव घर जाना चाहता है। भला ममता बनर्जी अपने रेलमंत्री के पुनीत दायित्वों को छोड़कर ज्यादा समय बंगाल में गुजारती हैं, आसन्न विधान सभा चुनाव में उन्हें मुख्मंत्री कुरसी नजर आ रही है, लेकिन ममता दीदी को ये समझाना चाहिए कि जैसी बंगाल की जनता है वैसी ही बिहार की जनता। अगर तृणमूल के लोग बंगाल को लेकर बेहद भावुक हैं तो उन्हें बिहार के लोगों का भी दर्द समझाना चाहिए। कुछ नहीं तो एक अच्छे सेवा प्रदाता के नेता रेलवे को अपने यात्रियों ( उपभोक्ताओं ) का पूरा ख्याल तो रखना ही चाहिए।
- विद्युत प्रकाश मौर्य

Saturday, 3 April 2010

ब्लू अम्ब्रेला- आत्मा की खुशी के लिए फायदा नुकसान नहीं देखते


इधर छुट्टी के दिन एक शापिंग मॉल में गया वहां तीन फिल्मों की सुपर डीवीडी का पैक मुझे बड़े की रियायती कीमत पर मिल गया। इसमें एक फिल्म थी विशाल भारद्वाज की ब्लू अंब्रेला। 

ये फिल्म इसी नाम पर बच्चों के नामचीन लेखक रस्किन बांड की लिखी कहानी पर आधारित है। फिल्म में पंकज कपूर का शानदार अभिनय है। फिल्म की कहानी एक नीली छतरी के आसपास घूमती है। फिल्म को देखना एक अच्छे उपन्यास को पढने जैसा ही है। फिल्म की पात्र बिनिया (श्रेया शर्मा ) को एक नीली छतरी मिल जाती है, जिस छतरी पर पंकज कपूर की बुरी नजर है। वह छतरी पाने में सफल भी हो जाता है। छतरी को पाने के पीछे उसका तर्क भी बड़ा रोचक है। सुनिए----

बारिश के पानी में नाव दौड़ाने से 

कोई फ़ायदा होता है क्या? 
सूरज को उस पहाड़ी के पीछे डूबते हुए
देखने से कोई फ़ायदा है क्या? 
आत्मा की ख़ुशी के लिए 
फ़ायदा-नुकसान नहीं देखा जाता।’


ब्लू अंब्रेला की पूरी शूटिंग हिमाचल प्रदेश के डलहौजी शहर में हुई है। पूरी फिल्म में फोटोग्राफी बहुत शानदार है। कहानी भी....भले ही फिल्म तारे जमीं पर की तरह हिट नहीं हुई लेकिन फिल्म बार बार देखने लायक है। खास कर बच्चों को दिखाई जा सकती है।
- विद्युत प्रकाश मौर्य।

Tuesday, 16 March 2010

मसूरी में जूनियर तेंदुलकर


जूनियर तेंदुलकर यानी अर्जुन आजकल पहाड़ों की हसीन वादियों के बीच बल्ले पर जोर आजमाइश कर रहे हैं। सचिन तेंदुलकर इन दिनों आईपीएल का मैच खेलने में व्यस्त हैं लेकिन उनकी पत्नी अंजलि और उनके बेटे पहाड़ों की हसीन वादियों में छुट्टियां मनाने के लिए पहुंच गए है। हालांकि मसूरी सचिन तेंदुलकर की फेवरिट जगह है।
सचिन अक्सर छुट्टियां मनाने के लिए मसूरी का रूख करते हैं लेकिन इस बार सचिन मसूरी नहीं आ सके हैं, क्योंकि वे आईपीएल सीजन थ्री में व्यस्त हैं। तो क्या हुआ जूनियर सचिन अपनी स्कूलों की छुट्टियां खत्म होने के बाद पहुंच गए हैं मुंबई का कोलाहल छोड़कर मसूरी। पापा की तरह अर्जुन को भी मसूरी बहुत पसंद है। मसूरी के बच्चों को संग क्रिकेट खेलते हुए मसूरी उन सारे टिप्पस को शेयर कर रहे हैं जो उन्होंने अपने पापा से सीखा है। मसूरी के बच्चे भी जूनियर तेंदुलकर के संग गली क्रिकेट खेलकर खुद को धन्य मान रहे हैं।
दिन भर अर्जुन और उनकी मां अंजलि मसूरी की सड़कों पर घूमने और खाने पीने का जमकर लुत्फ उठा रहे हैं। हालांकि लगता है कि मन में इस बात की कसक जरूर है कि पापा सचिन भी साथ होते तो छुट्टियां मनाने का मजा कुछ और होता।

Monday, 8 March 2010

कृपालु बाबा की जय...

सचमुच जिंदगी और मौत को भगवान के हाथ में ही होती है। इसलिए यूपी के प्रतापगढ़ जिले में कृपालु महाराज के आश्रम में जिन लोगों की मौत हुई उसमें कृपालु महाराज का कोई दोष नहीं है। क्योंकि जो लोग अचानक मची भगदड़ में काल के गाल में समा गए उन्हें भगवान ने जल्दी अपने पास बुला लिया। भला इसमें कृपालु महाराज का दोष…वे तो वैसे भी इंसान को भगवान से मिलाने का काम जीवन भर करते आए हैं। 

लेकिन मैं कहता हूं कि भगवान किसी को इतनी गरीबी भी मत देना जितनी की कुंडा में कृपालु महाराज के आश्रम में जुटी भीड़ में जुटे लोगों को दे रखी थी। सुना है कि वे सभी लोग महज 20 रूपये, चार लड्डू और एक थाली ग्लास के लिए वहां जुट गए थे। हम क्या करें हिंदुस्तान के कई इलाकों में इतनी गरीबी है कि लोग दो मुट्ठी चावल के लिए दौड़ पड़ते हैं। खैर दुर्घटना के बाद कृपालु महाराज ने बहुत कृपा बरसाई है। उन्होने भंडारे का आयोजन और गरीबों को रूपये बांटने का सिलसिला जारी रखा है। लगता है महाराज के पास अनाज का भंडार और रूपये की कोई कमी नहीं है। मुझे तो लगता है कि देश भर के स्कूलों में चलाए जाने वाले मिड डे मील का ठेगा कृपालु महाराज को ही दे देना चाहिए।
- vidyutp@gmail.com 

Saturday, 6 February 2010

नहीं रहे भोजपुरी फिल्मों के सुपर स्टार सुजीत कुमार


भोजपुरी फिल्मों के लोकप्रिय स्टार सुजीत कुमार हमारे बीच नहीं रहे। कई महीने से बीमार चल रहे सुजीत कुमार ने मुंबई के एक अस्पताल में 5 फरवरी 2010 को दम तोड़ दिया। सुजीत कुमार ने कई हिट भोजपुरी फिल्मों के अलावा हिंदी फिल्मों में भी अभिनय किया था...

सुजीत कुमार को फिल्म इंडस्ट्री में पहला ब्रेक किशोर कुमार की फिल्म दूर गगन की छांव में  में मिला था। ...आपको अराधना का वह गीत तो याद है न ... मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू... इस गाने में सुजीत कुमार राजेश खन्ना की गाड़ी को ड्राईव करते हुए नजर आते हैं। गाना खूब हिट हुआ था। उन्होंने बाद में कई हिंदी फिल्मों में सहयोगी कलाकार की भूमिका निभाई। 


 पर सुजीत कुमार की आत्मा तो भोजपुरी में बसती थी....विदेशिया भोजपुरी की सुपर हिट फिल्म थी जिसके हीरो सुजीत कुमार थे। इस फिल्म में अपने अभिनय से सुजीत कुमार भोजपुरी जगत में काफी लोकप्रिय हो गए। उनका नाम भोजपुरी फिल्मों के अमिताभ बच्चन के तौर पर लिया जाने लगा।

विदेशिया श्वेत श्याम दौर की फिल्म थी। जब भोजपुरी में रंगीन फिल्मों का दौर आया तो दंगल में सुजीत कुमार हीरो के रूप में नजर आए। फिल्म में हीरोइन थी प्रेमा नारायण। पद्मा खन्ना के साथ भैया दूज भी भोजपुरी की सुपर हिट फिल्म थी जिसमें सुजीत कुमार हीरो के रूप में दीखे। भैया दूज भोजपुरी पट्टी में सुपर हिट रही थी। 


सुजीत कुमार ने 1983 में पान खाए सैयां हमार नामक फिल्म बनाई जिसमें अमिताभ बच्चन और रेखा अतिथि भूमिका में नजर आए। बाद के दौर में सुजीत कुमार ने कई हिंदी फिल्मों का भी निर्माण भी किया जिसमें अनिल कपूर की खेल, सन्नी देयोल की चैंपियन और ऐतबार जैसी हिंदी फिल्मों के प्रोड्यूसर भी थे। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में उनकी दोस्ती सभी बड़े सितारों से थी। 


अभी हाल में सुजीत कुमार ने अपने खास दोस्तों के बीच अपना 75वां जन्म दिन मनाया था। आज सुजीत कुमार हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन भोजपुरी फिल्मों का इतिहास की जब भी बात की जाएगी सुजीत कुमार के बिना चर्चा अधूरी रहेगी।

सुजीत कुमार:
जन्म : 7 फरवरी 1934, वाराणसी
मृत्यु : 5 फरवरी 2010, मुंबई 
हिन्दी फिल्में: अराधना,  मेरे जीवन साथी , हाथी मेरे साथी .
भोजपुरी फिल्में - बिदेशिया, दंगल, भैया दूज, पान खाए सैंया हमार आदि। 

- vidyutp@gmail.com 

Wednesday, 27 January 2010

जानकी वल्लभ शास्त्री का दर्द


जीवन के 94 वसंत देख चुके जानकी वल्लभ शास्त्री इन दिनों खासे व्यथित हैं। उनकी व्यथा जायज भी है। इस साल के पद्म पुरस्कारों के ऐलान में उनका नाम पद्मश्री के लिए चयनित किया गया है। दुखी महाकवि ने अपना नाम सुनते ही कह दिया कि मुझे नहीं लेना ये सम्मान....परिवार के लोगों को लगता है भारत सरकार को उन्हें कम से कम पद्मभूषण या फिर पद्मविभूषण तो देना ही चाहिए था.... 

हालांकि महाकवि अब पद्म पुरस्कार ले लेने को राजी हो गए हैं लेकिन उनके शब्दों में दर्द साफ झलक रहा है। महाकवि जानकी वल्लभ शास्त्री हिंदी और संस्कृत के प्रकांड विद्वान हैं। साहित्यकारों की कई पीढ़ियां उनके आंगन की छांव में बड़ी हुई हैं....महाकवि से कनिष्ठ कई लोगों को पद्मश्री से बड़ा पुरस्कार मिल चुका है। ऐसे में शास्त्रीजी की दर्द जायज है। 

दुखी शास्त्री जी बोल पड़ते हैं सालों से मेरी सुध लेने कोई नहीं आया। सच्चे साहित्यकार को सम्मान की भूख भले ही न हो लेकिन उपेक्षा का दंश जरूर उसे सालता है...महाकवि जानकी वल्लभ शास्त्री का जो हिंदी साहित्य में योगदान है उसको सिर्फ पद्मश्री से नहीं तौला जा सकता है....लेकिन सचमुच जिस सम्मान के हकदार महाकवि हैं वह हम उन्हें नहीं दे पा रहे हैं ऐसे में साहित्यकार भावुक हो उठा है।

( 7 अप्रैल 2011 को महाकवि जानकी वल्लभ शास्त्री का निधन हो गया )  -vidyutp@gmail.com