Saturday, 15 August 2015

नागालैंड में असली सिरदर्द है खापलांग गुट

भले ही केंद्र सरकार ने 3 अगस्त को एनएससीएन आईएम के साथ शांति वार्ता का ऐलान कर वाहवाही लूट ली हो पर, नगालैंड में एनएससीएन (खापलांग) गुट असली सिरदर्द बना हुआ है। यह बेहद खतरनाक संगठन है। इसके पास 2000 उग्रवादी हैं और यह म्यांमार से संचालित हो रहा है। इसके नेता खापलांग फिलहाल यांगून में हैं।

एनएससीएन (आईएम) के साथ भले ही शांति समझौता हो गया है पर खापलांग गुट से कोई वार्ता नहीं हो सकी है। खापलांग गुट की स्थापना 30 अप्रैल, 1988 को हुई थी। यह संगठन मूल नागा अलगाववादी संगठन एनएससीएन में दो नागा जातीय समूहों- कोंयाक और तांग्खुल- में विवाद का परिणाम था। कोंयाक तबके ने खोले कोंयाक और एसएस खापलांग के नेतृत्व में एनएससीएन (के) बनाया।

27 मार्च 2015 को एनएससीएन (खापलांग गुट) ने संघर्ष विराम से अलग होने के ऐलान किया।

04 जून को एनएससीएन (के) ने असम राइफल्स पर हमला किया जिसमें 18 जवान शहीद हो गए।

07 जून 2015 को फिर एनएससीएन (के) के उग्रवादियों से असम राइफल्स के शिविर पर गोलीबारी की।

छह दशक पुरानी है नगा समस्या
नगालैंड के उग्रवादी संगठनों के साथ शांति वार्ता करके सरकार ने छह दशकों पुरानी समस्या को खत्म करने की कोशिश की है। पर ये वक्त बताएगा कि शांति की पहल को राज्य में सक्रिय सभी उग्रवादी संगठन कितनी शिद्दत से स्वीकार करते हैं।

1946 में नगा नेशनल काउंसिल को पंडित नेहरु ने भरोसा दिया था कि वे भारत में शामिल हों उनकी स्वायतत्ता का सम्मान किया जाएगा।
1956 में नगा जनजाति ने पहली बार विद्रोह किया। लेकिन ये जनजातियां जल्द ही नरमपंथी और उग्रपंथी में दलों में विभाजित हो गईं।
1957 में यह केंद्र शासित क्षेत्र बना इसे नगा हिल्स तुएनसांग कहा गया। असम के राज्यपाल इसका शासन देखते थे।
1963 नगालैंड राज्य का गठन हुआ। यह भारत का 16वां राज्य था।
16 प्रमुख जनजातियां रहतीं हैं नागालैंड में जो अपनी पहचान बनाए रखना चाहती हैं।
1950 के दशक से ही नगालैंड का क्षेत्र उग्रवाद का शिकार रहा है।
1997 अगस्त से युद्धविराम का पालन कर रहा था एनएससीएन (आई-एम), केंद्र सरकार से वार्ता के होने के बाद

सक्रिय उग्रवादी संगठन - एनएससीएन (आईएम)

नगालैंड का सबसे बड़ा उग्रवादी संगठन नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड  (आईएम) है। इसका गठन 1980 में हुआ। यह तांग्खुल तबके का प्रतिनिधित्व करता है इसके नेता आइजक चिसी स्वू और टी मुइवा हैं। ये दोनों नेता लंबे समय तक नीदरलैंड में रहकर राज्य में उग्रवादी गतिविधियों का संचालन करते रहे।

प्रमुख मांगें
2010 की वार्ता में टी मुइवा ने अपनी 30 सूत्री मांगों की सूची सौंपी थी।
ग्रेटर नगालैंड - एनएससीएन (आई-एम) और नागालैंड के कुछ अन्य संगठन उत्तरपूर्वी राज्यों के नागा इलाके के एकीकरण की मांग करते रहे हैं।  वे मणिपुर, असम और अरुणाचल के नागा-बहुल इलाकों को वर्तमान नागालैंड राज्य में मिलाकर ग्रेटर नागालिम के निर्माण की मांग करते रहे हैं। मणिपुर को इस मांग से खासतौर पर विरोध है क्योंकि उसका 60 फीसदी हिस्सा इसमें चला जाएगा।
टी मुईवा की प्रमुख मांगों में से एक है नगालैंड को संप्रभुत्ता और स्वायत्ता देने की। भारत सरकार संप्रभुत्ता पर विचार नहीं कर सकती।

असम से भी है सीमा विवाद – 1972 में नगालैंड और असम के बीच सीमा समझौता हुआ पर इसे नगा संगठन नहीं मानते।

वार्ता के प्रयास
2003 में नीदरलैंड की राजधानी एम्सटर्डम में एनएससीएन आईएम के नेताओं से भारत सरकार के प्रतिनिधिमंडल ने वार्ता की थी। इनके बाद ही नगा नेता इसाक चिसी स्वू और थ्येंगलांग मुईवा 36 साल बाद जनवरी 2003 में बातचीत के लिए सरकारी तौर पर दिल्ली आए। तीन दिनों तक आधिकारिक वार्ता में कुछ खास प्रगति नहीं हुई।

60 दौर से ज्यादा बातचीत हो चुकी है एनएससीएन-आईएम और भारत सरकार के प्रतिनिधिमंडल के बीच।
2005 में के बार टी मुईवा ने नगालैंड को स्वतंत्र संप्रभु देश बनाए जे की मांग एक इंटरव्यू में दुहराई।
2010 में मणिपुर सरकार द्वारा एनएससीएन (आइएम) के नेता मुइवा को अपने गांव जाने की इजाजत नहीं देने के कारण दो महीने तक नागा संगठनों ने राज्य की नाकेबंदी कर दी थी।

अवैध वसूली का नेटवर्क
नागलैंड में राज्य के संस्थानों की असफलता से उग्रवादी संगठनों ने अवैध वसूली का नेटवर्क तैयार कर लिया है। राज्य में बिना अंडरग्राउंड टैक्स के कारोबार नहीं किया जा सकता। स्थानीय लोगों के बीच हिंसा का सहारा लेकर उग्रवादी संगठनों ने अपनी पैठ मजबूत कर ली है।

- vidyutp@gmail.com
( NAGALAND, NSCN IM ) 


Friday, 14 August 2015

प्रिंट मीडिया में महिलाओं की भागीदारी पर सार्थक चर्चा

खालसा कालेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय सेमिनार

भारतीय जन संचार संघ और दौलतराम कालेज दिल्ली विश्वविद्यालय की ओर से एक राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन दिल्ली विश्वविद्यालय के खालसा कालेज सभागार में 12 अगस्त को कराया गया। इस सेमिनार में देश के अलग अलग राज्यों से 40 से ज्यादा विद्वानों, जन संचार के शिक्षकों और पत्रकारों ने अपने विचार रखे।
कार्यक्रम के उदघाटन सत्र में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल के कुलपति प्रो.बीके कुठियाला, लोकसभा के महासचिव पीडी अचारी, आकाशवाणी के पूर्व समाचार वाचक कृष्ण कुमार भार्गव, महामंडलेश्वर संत स्वामी मार्तंड पुरी, प्रो. कुमद शर्मा, दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. हरिमोहन शर्मा, हंसराज महाविद्यालय की प्रिंसिपल डा. रमा शर्मा, दौलतराम कालेज की प्रिंसिपल सविता राय वरिष्ठ महिला पत्रकार अपर्णा द्विवेदी ने अपने विचार रखे। 

भारतीय जन संचार संघ के निदेशक प्रो. रामजीलाल जांगिड ने विषय प्रवेश करते हुए कहा कि ईश्वर ने महिलाएं अपनी भूमिका को लेकर रामायण काल से ही सवाल उठाती रही हैं। लक्ष्मण जब सीता को वन में छोड़ने जा रहे थे तब सीता ने भी राम से कई सवाल किए थे। आज मुद्रित माध्यम में महिलाओं की भागीदारी पर सवाल उठना भी लाजिमी है।

प्रो. बीके कुठियाला ने कहा कि विज्ञान कहता है कि महिलाओं में संकटकाल में संघर्ष करने की क्षमता महिलाओं में पुरुषों से ज्यादा है। यानी महिलाओं को प्रकृति ने ही पुरुषों से बेहतर बनाया है। आज मीडिया में महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है। इलेक्ट्रानिक मीडिया में जहां 40 फीसदी महिलाएं काम कर रही हैं वहीं प्रिंट मीडिया में 22 फीसदी महिलाएं काम कर रही हैं।

 वहीं स्वामी मार्तंड पुरी ने कहा कि महिलाएं पुरुषों से हर मामले में श्रेष्ठ हैं। उन्होंने प्रसंगवश जिक्र किया कि मैंने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका लगा रखी है जिसमें हर दस्वावेज में माता का नाम अनिवार्य रूप से लिखे जाने की मांग की गई है। स्वामी मार्तंड पुरी ने कहा कि मां होने जहां सत्य है वहीं पिता का होना एक विश्वास है।
सेमिनार में दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, चंडीगढ़, मुंबई, उत्तर प्रदेश समेत देश के अलग अलग हिस्सों से 40 से अधिक लोगों ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए।

भारतीय जन संचार संघ और दौलत राम कालेज का आयोजन

सेमिनार में प्रो. शिल्पी झा ने महिलाओं के नाम टीवी और अखबारों में होने वाली पत्रकारिता के संदर्भ में कहा कि महिलाओं के मुद्दे पर सनसनी फैलाने वाले या फिर उनके प्रति सहानुभूति जताने वाली पत्रकारिता नहीं होनी चाहिए। बल्कि पत्रकारिता को हमेशा सच के साथ रहना चाहिए।अगर महिला भी अपराधी है तो हमें वहीं चेहरा दिखाना चाहिए। इसी क्रम में निभा सिन्हा ने महिला पत्रिकाओं के संदर्भ सामग्री का पाठकों की नजरों से तुलनात्मक विश्लेषण पेश किया। 


विद्युत प्रकाश मौर्य ने अपने शोध पत्र में मुद्रित माध्यम में महिला पत्रकारों की समाचार पत्रों में उच्च पदों पर कम भागीदारी होने पर चिंता जताई। उनके मुताबिक मुद्रित माध्यम में बड़े पदों पर महिलाओं को मौके कम मिलते हैं। जहां मौका मिला है महिलाओं ने बेहतर काम करके अपनी उच्च दक्षता का परिचय दिया है। 

कार्यक्रम में धन्यवाद ज्ञापन करते हुए प्रो. प्रदीप माथुर ने मीडिया में भाषा के गिरते स्तर पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि हमें महिला उत्पीडन और बलात्कार जैसे मामलों की खबरों में संवदेनशील होना चाहिए।सेमिनार के दौरान पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़ के गुरमीत सिंह, गुरनानक देव यूनीवर्सिटी अमृतसर की नवजोत ढिल्लन ने अपने शोध पत्रों में ज्वलंत मुद्दों को उठाया।

सेमिनार की संयोजक डा. साक्षी चावला थीं, जबकि डा. सीमा रानी, डा. वंदना त्रिपाठी, श्रीमती गीतांजलि कुमार ने आयोजन में सक्रिय भागीदारी निभाई। भारतीय जन संचार संघ के अध्यक्ष डा.रामजीलाल जांगिड ने बताया कि सेमिनार में प्रस्तुत सभी शोध पत्रों को पुस्तक रुप में प्रकाशित किया जाएगा।

- रिपोर्ट – माधवी रंजना  

Sunday, 12 July 2015

मैजिक का मैजिक ( व्ंयग्य)

ये टाटा वालों ने बहुत शानदार गाड़ी बनाई है मैजिक। इसमें बैठी सवारियों को देखकर लगता है इसका नाम मैजिक बड़ा ही मुफिद है। कहने को तो यह सेवेन सीटर है। पर इसमें सात की जगह 17 लोग कैसे बिठाए जा सकते हैं ये समझना है तो आपको एक बार सशरीर मैजिक में सफर करना ही पडेगा। महानगर में सफर करने वाले कई लोगों ने मैजिक का जादू देखा होगा। तीन की सीट वाली जगह पर चार सवारी बैठते हैं। गाडी के आंतरिक सज्जा में थोड़ा बदलाव कर बीच में दो सीटें और लगा दी गई हैं। तो जनाब छह की जगह आठ हो गए। दो अतिरिक्त सीटों पर पांच लोग तो इस तरह हो गए 13 लोग। 

गिनते जाईए। आगे की सीट पर एक सीट पर दो लोग तो हो गए ना 15 और ड्राइवर क बगल में एक और लटक गया तो हो गए ड्राइवर समेत 17 ना। अभी इसमें खालासी भी साथ होता है तो वह गेट पर लटककर सवारी को रास्ते में आवाज लगाता हुआ चलता है। इस तरह 17 लोगों को शान से लेकर लुढकती हुई चलती है टाटा की मैजिक अपनी मंजिल की ओर। कई बार खाते पीते घरों की तंदुरुस्त महिलाएं ( मोटी नहीं कहेंगे अपमान होगा) आ जाती हैं तो तीन की जगह 4 के बैठने में एतराज करती हैं तो खालासी उन्हें कहता है कि या तो दो सवारी के पैसे दो या फिर अगली मैजिक का इंतजार करो। अब क्या करें मोहतरमा को बैठना ही पड़ता है। 

मैजिक खूब मेल कराती है। अनजान सवारियों को भी काफी एक दूसरे से चिपकर बैठना पड़ता है। मानो फेविकोल का मजबूत जोड़ हो। ये मंजिल आने के बाद ही अलग हो पाता है। तब तक आप किसी नामचीन ब्रांड के परफ्यूम का आनंद ले सकते हैं। हां कई बार सह सवारी की पसीने की बदबू भी मिल सकती है। ये आपकी किस्मत पर निर्भर करता है। इस बात पर भी निर्भर करता है कि सुबह किसता मुंह देखकर उठे थे। मैजिक वालों का बस चले तो ये छत पर भी सवारी बिठा सकते हैं। पर वे ऐसा नहीं कर पाते। मैजिक के मुकाबले कई गाड़ियां आईं पर वे मैजिक को चुनौती नहीं दे सकीं। क्योंकि जो बात मैजिक में है वह किसी और में कहां।
सात की जगह 17 सवारियां बिठाने के कारण मैजिक ड्राइवरों के घर की तिजोरी भर रही है। भला नाम मैजिक है तो मैजिक तो होगा ही न। ड्राइवर लोग रोज रतन टाटा को ऐसी नायाब गाड़ी के लिए धन्यवाद देते हैं। अगर आपकी जिंदगी बोरिंग है, और आप चाहते हैं कि थोड़ा तूफानी हो तो दिल्ली में तो जरूर किसी मैजिक की सवारी करें। हो सकता है आपको किसी मोहतरमा साहचर्य मिल जाए। और आपकी जिंदगी में भी आ जाए मैजिक। हां मगर अपनी जेब संभाल कर रखिएगा।
- विद्युत प्रकाश मौर्य ( vidyutp@gmail.com)




Tuesday, 26 May 2015

काश मेरा भी खाता स्विस बैंक में होता ( व्यंग्य)

क्या आपका स्विस बैंक में खाता है। अगर खाता ही नहीं है तो आप इस देश के सम्मानित नागरिक कैसे हो सकते हैं। इधर स्विस बैंक ने लगातार उन लोगों के नामों का खुलासा शुरू कर दिया है जिन्होंने अपना अतिरिक्त धन ( मैं काला नहीं कहूंगा) ले जाकर उनके पास जमा कराया था। मैं सोच रहा हूं काश इसमें मेरा भी नाम होता। जब सारे लोग जाकर वहां खाता खोल रहे थे मैं नहीं जा पाया था। वरना आज मेरा नाम भी मीडिया में उछल रहा होता। पर अब पछताए क्या होत जब चिड़िया जुग गई खेत। कभी किसी साहनी, किसी गुप्ता, किसी चड्ढा किसी बिरला किसी कोचर, किसी शर्मा किसी मसूद का नाम आ रहा है तो मुझे रस्क होता है कि इन लोगों की सूची में मेरा नाम क्यों नहीं। मैं इंतजार कर रहा हूं कि स्विस बैंक खाताधारियों की सूची में किसी मौर्य का भी नाम आ जाए तो मैं कह दूंगा कि वह मेरा रिश्तेदार है। मैं न सही तो रिश्तेदार ही सही। मेरा थोड़ा सा मान तो बढ़ेगा ही ना।


मेरे बेटे ने पूछा कि पापा स्विस बैंक में खाता क्यों खोलने गए ये लोग। अपने देश में भी तो बहुत से बैंक हैं। मैंने समझाया उनके पास इतना ज्यादा पैसा हो गया था कि हमारे देश के बैंकों ने रखने से इनकार कर दिया। अब हमारी गगरी तो इतनी कभी भरी ही नहीं कि देश के बैंक पैसा जमा करने से इनकार कर दें। दुनिया का स्वर्ग है स्विटजरलैंड। तो वहां के बैंक भी जरूर शानदार होंगे। तो वहां खाता खोलना और पैसा जमा कराना तो निश्चय ही गर्व की बात होगी।

आज उन उद्योगपतियों के बच्चे ये कह कर अपने दोस्तों के बीच गर्व करते होंगे कि मेरे दादा जी का फलां स्विस बैंक में खाता निकला। क्या तुम्हारे पुरखों ने क्या वहां खाता खोला था कभी। जिन लोगों के स्विस बैंक में खाते का खुलासा हो रहा है वे लोग अचानक खास हो गए हैं। उनके घर रिश्ता करने वाले लड़के वालों की लाइन लगने लगी है। भला दहेज में बोरी भर भर कर नोट मिलने की संभावना है। बहू आएगी उसका भी हो सकता है स्विस बैंक में खाता हो। सोचिए समाज में उनका कितना सम्मान बढ़ गया है। स्विस बैंकों में जिसका खाता जितना पुराना हो वह उतना ही सम्मानित व्यक्ति है। मेरे दादाजी तो किसान थे उनका बैंक खाता खुला ही नहीं था। उस समय ये प्रधानमंत्री जनधन योजना भी नहीं थी खाता खुलवाते भी तो कैसे। मैं शर्म के मारे छोटा हुआ जा रहा हूं कि मेरे परिवार या दूर-दूर तक रिश्तोंदारों में किसी ने स्विस बैंक में खाता नहीं खुलवाया।

-         विद्युत प्रकाश मौर्य

Tuesday, 19 May 2015

आठ लाख की घड़ी 40 हजार का जूता

दस लाख के कोट के बाद अब आग गई है आठ लाख की घड़ी और 40 हजार का जूता। मोदी सरकार के ग्रामीण विकास मंत्री हैं चौधरी वीरेंद्र सिंह। उन्होंने यूपी के अमरोहा में अपनी अमीरी का बखान सरेआम मंच से किया। और बताया कि वे इतनी मंहगी घड़ी और जूते पहनते हैं। मंत्री जी उस विभाग के हैं जो देश के किसानों से जुडा है। उनके पास जिम्मेवारी देश में हर रोज आत्महत्या कर रहे किसानों के जख्मों पर मरहम लगाने की है। वैसे भी मोदी जी ने वादा किया था मेरी सरकार आएगी तो कोई किसान आत्महत्या नहीं करेगा। पर ये मंत्री जी तो किसानों के बीच जाकर मंच से अपनी अमीरी का बखान कर रहे हैं। आठ लाख की घड़ी। कितने होते हैं आठ लाख। एक गरीब किसान का परिवार इस आठ लाख से आठ से दस साल तक अपने परिवार का पेट भर सकता है मंत्री जी।

आज बापू की आत्मा रो रही होगी। आजाद भारत में 70 साल बाद मंत्री आठ लाख की घड़ी पहनते हैं। बापू तो अपनी धोती फट जाने पर गमछा बनाते थे फिर गमछे के फटने पर रुमाल। मंत्री जी का मंत्रालय उसी महात्मा गांधी के नाम पर किसानों को राहत देने वाला मनरेगा कार्यक्रम चलाता है। सवाल है कि क्या इस देश में इतना शाहखर्च मंत्री होना चाहिए तो आठ लाख की घड़ी और 40 हजार के जूते पहने और सार्वजनिक तौर इसका दिखावा भी करे।

एक पुरानी कहावत है कि जब रोम जल रहा था तो नीरो बंसरी बजा रहा था। क्या हम इतने संवेदनहीन हो गए हैं कि किसान आत्महत्या कर रहे हैं और हम उन्हें अपनी कलाई पर बंधी 8 लाख की घड़ी दिखा रहे हैं। ये हमारी गरीबी का विद्रूप मजाक है मंत्री जी।  किसी शायर ने कहा है-
तुम शौक से मनाओ जश्ने बहार यारों ...इस रोशनी में लेकिन कुछ घर जल रहे हैं...
चौधरी साहब आप भी अपनी घड़ी और जूते नीलाम कर दीजिए...इससे सैकड़ो किसानों के घरों में महीनों चूल्हा जल सकता है...



Sunday, 10 May 2015

दोगुना हो जायेगा परमाणु बिजली उत्‍पादन

देश में परमाणु से बिजली का उत्पादन बढ़ाने की सरकार की कोशिश है। इस क्रम में यूरेनियम की विदेशों से खरीद के सौदों को अंजाम दिया जा रहा है। हालांकि रेडियोधर्मिता के खतरों को देखते हुए दुनिया के कई देश अब परमाणु बिजली से मुंह मोडने लगे हैं। 


10,080 मेगावाट परमाणु बिजली पैदा करने वाला देश बन जाएगा भारत 2019 तक।
60,000 मेगावाट तक परमाणु बिजली उत्पादन का लक्ष्य है न्युक्लियर पावर कारपोरेशन ऑफ इंडिया का साल 2030 तक।
5780 मेगावाट क्षमता है फिलहाल देश में परमाणु बिजली उत्पादन की।
03 फीसदी योगदान है कुल बिजली उत्पादन में परमाणु बिजली का।
13वें नंबर पर है भारत परमाणु बिजली पैदा करने वाले देशों में।
7वें स्थान पर है भारत परमाणु रियेक्टरों की संख्या के मामले में


3400 मेगावाट की दो नई परमाणु बिजली परियोजनाओं को दी जानी है मंजूरी।


परमाणु बिजली के लिए यूरेनियम बड़ी जरूरत
2840 मेगा वाट बिजली का उत्पादन स्वदेशी यूरेनियम से होता है भारत में
5940 टन प्राकृतिक यूरेनियम चाहिए भारत को अगले पांच सालों में परमाणु बिजली के लिए।
2014  के सितंबर में हुए करार के बाद आस्ट्रेलिया भारत को परमाणु बिजली के लिए यूरेनियम देने को राजी हुआ।
3000 टन यूरेनियम की आपूर्ति कनाडा करेगा भारत को अगले पांच सालों में, जिसकी कीमत 25.4 करोड़ डालर होगी।
उजबेकिस्तान, नाइजरिया, नामिबिया जैसे देशों से भी हो रही है यूरेनियम आयात के लिए बातचीत ।

भारत में यूरेनियम
आंध्र प्रदेश के वाईएसआर जिले के अलावा झारखंड के जादूगोडा में यूरेनियम की खान है। परमाणु बिजली घरों के लिए हमारे पास यूरेनियम काफी कम है।

परमाणु बिजली
परमाणु रियेक्टर से यूरेनियम हीट एनर्जी स्टीम जेनरेटरों को देता है ये स्टीम जेनरेटर से पैदा स्टीम शेल के माध्यम से टरबाइन जेनरेटर को देते हैं जिससे बिजली बनाई जाती है।

भारत में परमाणु बिजली घर
तारापुर –( बोइसर, महाराष्ट्र) – 4 इकाइयों में उत्पादन।
राजस्थान - रावतभाटा (कोटा) 06 इकाइयों से हो रहा है उत्पादन। 1400 मेगावाट के दो निर्माण प्रक्रिया में।

मद्रास - कलपक्कम ( तमिलनाडु)- दो यूनिटें चालू।
कुडनकुलम ( तमिलनाडु) 1000 मेगावाट की 1 यूनिट चालू। 1 और यूनिट निर्माण की प्रक्रिया में।
कैगा- ( कर्नाटक) – 220 मेगावाट की 4 यूनिटें चालू।  
नरोरा – ( बुलंदशहर, यूपी) 220 मेगावाट की 2 यूनिटें चालू।
ककरापार ( सूरत, गुजरात) 220 मेगावाट की 2 यूनिटें चालू। 1400 मेगावाट के 2 निर्माण प्रक्रिया में।  

प्रस्तावित –
जैतापुर –( रत्नागिरी, महाराष्ट्र) 9990 मेगावाट की महत्वाकांक्षी परियोजना। फ्रांसिसी कंपनी अरेवा के सहयोग से होना है निर्माण।
चुटका ( मंडला, मध्य प्रदेश) 1400 मेगावाट के 2 संयत्र प्रस्तावित।  

परमाणु से बिजली
31 देश बनाते हैं परमाणु से बिजली दुनिया में। जापान, फ्रांस, जर्मनी, रूस, अमेरिका, इंग्लैंड, स्वीडन, मैक्सिको जैसे देश बनाते हैं परमाणु बिजली। फ्रांस 78.5 फीसदी बिजली का उत्पादन परमाणु ऊर्जा से करता है।
15 फीसदी योगदान है दुनिया के कुल उत्पादन में परमाणु बिजली का
197 रियेक्टर लगे हैं यूरोपीय देशों में
35 फीसदी हिस्सेदारी है यूरोपीय देशों में परमाणु बिजली की कुल उत्पादन में।
30 फीसदी उत्पादन करता है जापान परमाणु रियेक्टरों से
104 परमाणु बिजली घर हैं अमेरिका में, 20 फीसदी उत्पादन।


परमाणु बिजली घर के खतरे
रेडियोधर्मी कचरे से निपटारे का कोई सुरक्षित तरीका नहीं है। प्रदूषणयुक्त पानी जलाशय में वापस छोड़ा जाने से जलाशय की मछलियां मरती हैं। प्रदूषित मछलियों को खाने और इस पानी को पीने से मनुष्य, पशु व फसलें विकिरण से प्रभावित होते हैं। इससे कैंसर, विकलांगता जैसी बीमारियां होने की आशंका रहती है।
अमेरिका, जापान जर्मनी ने लगाई नए प्लांट पर रोक
2014 के जनवरी में जापान के प्रधानमंत्री ने साफ कह दिया कि वह अब नए परमाणु बिजली घर नहीं बनाएगा। 2011 में फुकिशिमा-1 की दुर्घटना के बाद जापान ने परमाणु बिजली घर बनाने बंद कर दिए थे। अमेरिका और जर्मनी भी नए बिजली घरों का निर्माण बंद कर चुके हैं।
1986 में चेर्नोबिल परमाणु बिजली घर में दुर्घटना (यूक्रेन, रूस ) अभी तक दुनिया के सबसे भयंकर औद्योगिक दुर्घटना रही है। 
अक्षय ऊर्जा है विकल्प
सुरक्षित बिजली उत्पादन के लिए अक्षय ऊर्जा के तौर पर सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा, बायोमास, हाइड्रोइलेक्ट्रिक आदि विकल्प हो सकते हैं। ये प्रदूषण रहित, कार्बन रहित है। 18 फीसदी योगदान है अक्षय ऊर्जा का दुनिया के कुल ऊर्जा उत्पादन में।


Friday, 8 May 2015

आखिर कहां है भारत का मोस्ट वांटेड दाऊद इब्राहिम

मुंबई बम धमाकों के सिलसिले में भारतीय सुरक्षा एजेंसियां दाऊद इब्राहिम को लंबे समय से ढूंढ रही हैं। उसके ख़िलाफ़ रेड-कॉर्नर नोटिस भी जारी किया जा चुका है। दाऊद इब्राहिम के पाकिस्तान में होने की ख़बरें आती रही हैं लेकिन पाकिस्तान इससे इनकार करता रहा है। कश्मीर में आतंकवादी गतिविधियां बढ़ाने में भी दाऊद की सक्रियता मानी जाती है। शुरुआत में दाऊद सोने की तस्करी करता था लेकिन बाद में ड्रग्स, अपहरण, फिरौती और हवाला के कारोबार में भी वो उतर गया। हैरानी की बात ये है कि 56 साल के दाऊद को पिछले 24 साल में कहीं सार्वजनिक तौर पर देखा नहीं गया है न ही उसकी कोई ताजी तस्वीर सामने आई है।

कहां है दाऊद
2006  - अप्रैल में इंटरपोल ने दाऊद की तलाश के लिए सभी संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों को रेड कार्नर नोटिस जारी किया। इसमें दाऊद के पास 11 पासपोर्ट और 16 नाम होने की जानकारी दी गई। 
2008 में 26 नवंबर को मुंबई पर हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान को 20 मोस्ट वांटेड आतंकियों की सूची सौंपी उसमें दाऊद का भी नाम था।
06 नवंबर 2012 – रोम में इंटरपोल की बैठक में तत्कालीन गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने कहा, दाऊद को पाकिस्तान ने शरण दे रखी है।
10 जनवरी 2014 - तत्कालीन गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने कहा, सूचना के अनुसार दाऊद पाकिस्तान में है, उन्होंने दाऊद को भारत लाने की कोशिश में अमेरिका से मदद मांगने की बात भी कबूली।
11 जनवरी 2014 – पाकिस्तान विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने जोर देकर कहा है कि उनके देश में नहीं है दाऊद।
2014 के अप्रैल में नरेंद्र मोदी ने गुजराती चैनल संदेश को एक इंटरव्यू में कहा, क्या दाऊद को भारत लाने से पहले अखबार में खबर देनी होगी।
2014 मई में खबर आई कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से घबराकर दाऊद ने अपना ठिकाना बदल लिया है। अब वह कराची की जगह पाकिस्तान अफगानिस्तान सीमा पर कहीं चला गया है।
30 सितंबर 2014 – मोदी ओबामा के बीच वार्ता में दाऊद को पकड़ने में अमेरिका ने सहयोग का किया वादा
27 दिसंबर 2014 -  गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू ने नई दिल्ली में कहा था कि भारत ने पाकिस्तान से दाऊद को सौंपने को कहा है क्योंकि उसके खिलाफ पर्याप्त सबूत है।
2015 : मई में दिल्ली पुलिस के पूर्व आयुक्त नीरज कुमार ने एक साक्षात्कार में कहा, दाऊद ने कभी आत्मसमर्पण के लिए संपर्क किया था।

कराची में रहता है दाऊद
इंटरपोल के मुताबिक दाऊद कराची में रहता है। इंटरपोल ने अपने नोटिस में उसकेकराची के दो संभावित पते भी दिए गए थे। भारत सरकार भी बार-बार कहती रही है कि दाऊद लंबे समय से पाकिस्तान में ही है। कहा जाता है कि दाऊद को लाहौर में कई सुविधाएं प्राप्त हैं यही नहीं वह अक्सर कराची और लाहौर के बीच आता जाता रहता है।


दाऊद इब्राहिम का सफर
27 दिसंबर 1955 को महाराष्‍ट्र में रत्नागिरी जिले के मुमका में एक पुलिस कांस्टेबल के घर दाऊद इब्राहिम कासकर का जन्म हुआ। 
1984 में दाऊद अंडरवर्ल्ड में आया। इससे पहले वो डोंगरी इलाके में चोरी, डकैती, लूटपाट आदि करता था। बाद में वह तस्कर हाजी मस्तान के गैंग में शामिल हो गया।
1985 में दाऊद ने डोंगरी पुलिस के इशारे पर पठान को मारा
1993 के मुंबई बम धमाकों के सिलसिले में भारत की सुरक्षा एजेंसियों को दाऊद की है तलाश
01 नंबर पर भारत के मोस्ट वांटेट आतंकवादियों की सूची में
03 नंबर पर विश्व के सबसे खूंखार आतंकवादियों की सूची में। 
बॉलीवुड और दाऊद
कई बॉलीवुड कलाकारों से दाऊद के अच्छे रिश्ते हैं। कहा जाता है कि राम तेरी गंगा मैली की अभिनेत्री मंदाकिनी कई साल तक दाऊद के साथ रही। एक और अभिनेत्री इलियाना के दाऊद से रिश्ते बताए जाते हैं। फिल्म कहो ना प्यार के लाभ में हिस्सा नहीं मिलने पर दाऊद के लोगों ने राकेश रोशन पर हमला कर दिया था। 2001 में बनी बॉलीवुड की फिल्‍म 'चोरी-चोरी चुपके-चुपके' में दाऊद ने शकील की मदद से पैसे लगाए थे।


Sunday, 1 March 2015

बीस साल का हुआ स्मार्टफोन

आईबीएम सिमॉन - आज स्मार्टफोन ने मोबाइल, कंप्यूटर और कैमरा, टीवी  समेत कई सुविधाओं को आपकी हथेली पर समेट दिया है। पर 'आईबीएम सिमॉन'  16 अगस्त 1994 में आया दुनिया का पहला स्मार्टफोन था जिसमें कॉलिंग के अलावा कंप्यूटर जैसी कई सुविधाएं उपलब्ध थीं। फोन को आईबीएम और अमेरिकी फोन कंपनी बेलसेल्फ ने बनाया था। इसे सिमॉन नाम इसलिए दिया गया, क्योंकि यह बहुत साधारण था और यह उस हर काम के लिए उपयुक्त था, जिसकी अपेक्षा स्मार्टफोन से की जाती है। इससे पूर्व 1992 में आईबीएम ने स्मार्टफोन का प्रोटोटाइप तैयार किया था।


ऐसा था पहला स्मार्टफोन
900 डॉलर कीमत थी पहले स्मार्ट फोन की।
01 घंटे मात्र थी इसकी बैटरी की क्षमता
23 सेंटीमीटर थी फोन की लंबाई
500 ग्राम था फोन का वजन
50,000 हैंडसेटों की बिक्री हुई थी इस पहने मॉडल की।

भारी भरकम फोन
इस फोन का आकार घरों में निर्माण में इस्तेमाल होने वाली ईंट के आधा था। फोन का सॉफ्टवेयर लिखने, चित्र बनाने, अपने कैलेंडर और संपर्क को अपडेट करने, फैक्स भेजने और पाने की सुविधा देता था।

हरे रंग की स्क्रीन
इसकी एलसीडी स्क्रीन हरे रंग की थी। यह टच स्क्रीन तकनीक से चलता था। इसमें नीचे स्लॉट भी था, जिससे मानचित्र, स्प्रेडशीट और गेम तक पहुंचा जा सकता था। वास्तव में यह आईफोन की दिशा में पहला कदम था।

अब लंदन के म्यूजियम की शोभा
लंदन के विज्ञान संग्रहालय में अक्टूबर में यह फोन प्रदर्शित किया जाएगा। यह संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी के इतिहास पर एक स्थाई प्रदर्शनी का हिस्सा होगा। यहां पिछले 200 सालों में बने 800 संचार उपकरण प्रदर्शित किए गए हैं।

आगे की प्रगति
1996 में नोकिया ने 9000 मॉडल पामटॉप कंप्यूटर जैसा फोन पेश किया। इसमें क्वार्टी कीबोर्ड मौजूद था।
1999 में क्वालकॉम ने सीडीएमए तकनीक का डिजिटल स्मार्ट फोन पेश किया।
2001 में कोसेरा ने ऐसा फोन पेश किया जिसमें वेब ब्राउजिंग संभव था।
03 प्रमुख प्लेटफार्म पर मौजूद हैं आज स्मार्ट फोन ( एंड्राएड, आईओएस और ब्लैकबेरी)


Saturday, 28 February 2015

बदले देश के गांवों की सूरत

देश की 68 फीसदी आबादी गांव में रहती है, पर देश के लाखों गांव आज भी सड़क, बिजली, पेयजल जैसी आधारभूत सुविधाओं का इंतजार कर रहे हैं। केंद्र और राज्य सरकारें गांवों की सूरत बदलने के लिए कई तरह की योजनाएं चला रही हैं पर उनका अपेक्षित परिणाम देखने को नहीं मिला है।


भारत के गांव
- 6,38,365 कुल गांव हैं भारत में
- 68.84 फीसदी देश की आबादी गांव में रहती है
- 2,36,004 गांवों में 500 से ज्यादा लोग रहते हैं
- 3976 गांवों की आबादी 10,000 से अधिक है
1,07,753 गांव हैं सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में
40,000 से ज्यादा गांव हैं पश्चिम बंगाल, बिहार, ओडिशा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान में

यूनिक कोड नंबर
2011 के जनगणना में देश के हर गांव के लिए एक यूनिक कोड नंबर प्रदान किया गया है। छह अंकों वाले इस कोड नंबर के इस्तेमाल से गांवों के लिए लागू की जाने वाली तमाम विकास योजनाओं और ई-गवर्नेंस में आसानी के लिए किया गया है।

देश के बड़े गांव
बनगांव : 30,061 की आबादी वाला बनगांव बिहार ही नहीं, भारत का सबसे बड़ा गांव माना जाता है। सहरसा जिले के इस गांव में तीन पंचायतें कार्यरत हैं।
गहमर : 26250 की आबादी वाला यूपी के गाजीपुर जिले का गहमर देश के बड़े गांवों में से एक है।

पहले भी चली ग्राम विकास योजनाएं
अंबेडकर ग्राम विकास योजना : 2007 में यूपी में मायावती सरकार ने अंबेडकर ग्राम विकास योजना की शुरुआत की। 2011 में इसका नाम बदलकर अखिलेश सरकार ने लोहिया ग्राम विकास योजना कर दिया है। इसके तहत चयनित गांवों का 36 बिंदुओं के तहत विकास किया जाता है। इसके तहत संपर्क मार्ग, विद्युतीकरण, सबको आवास, शौचालय, पेयजल, तालाब, आंगनबाड़ी केंद्र, स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र की स्थापना की जाती है। तमाम सरकारी योजनाओं के कार्यान्यवयन आदि पर ध्यान दिया जाता है।


गांवों का हाल
बिजली
25752 गांवों में अभी तक नहीं पहुंचाई जा सकी है बिजली
1,08,408 गांवों में बिजली पहुंची राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना के तहत
95 फीसदी गांव विद्युतीकृत हो चुके हैं सरकारी आंकड़ों के मुताबिक (कुल गांव 5,97,464 हैं विद्युत मंत्रालय के मुताबिक)

सड़क
- 50 फीसदी गांव अभी भी देशभर में सड़क से नहीं जोड़े जा सके हैं
- 40 फीसदी गांव सड़कों से जुड़ी थीं साल 2000 में
- 2000 में प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना शुरू की गई
1.80 लाख बसावटों को सड़क से जोड़ा गया पीएमजीएसवाई से 3.72 लाख किलोमीटर नई सड़कें बनीं (विश्व बैंक की रिपोर्ट)

पेयजल-स्वच्छता
89 फीसदी ग्रामीण आबादी के पास पेयजल की सुविधा है
24 फीसदी ग्रामीण आबादी ही शौचालय का इस्तेमाल करती है
62 करोड़ देश की ग्रामीण आबादी खुले में शौच जाती है


बापू का ग्राम स्वराज्य का सपना
मेरा विश्वास है कि भारत चंद शहरों में नहीं, बल्कि सात लाख गांवों में बसा है। लेकिन हम शहरवासियों का ख्याल है कि भारत शहरों में ही है। हमने कभी यह सोचने की तकलीफ ही नहीं उठाई कि उन गरीबों को पेट भरने जितना अन्न और शरीर ढकने जितना कपड़ा मिलता है या नहीं और धूप और वर्षा से बचने के लिए उनके सिर पर छप्पर है या नहीं। (मेरे सपनों का भारत में महात्मा गांधी)
( प्रस्तुति - vidyutp@gmail.com )