Friday, 28 August 2009

कई मल्टीप्लेक्स पर लग सकता है ताला

मेरे मुहल्ले में कई महीने से चल रहा स्पेंसर्स का रिटेल स्टोर बंद हो गया। मंदी के कारण स्टोर में बिक्री कम हो रही थी , लिहाजा एक दिन शटर गिर गया। अगले साप्ताहिक अवकाश में मैं फिल्म देखने गया। दिल्ली से सटे हुए भीड़भाड़ वाला मुहल्ला है शालीमार गार्डन। यहां एक शापिंग कांप्लेक्स है एसएम वर्ल्ड। इस एसएम वर्ल्ड में तीन 3 स्क्रीन मल्टीप्लेक्स है। मेरी इच्छा फिल्म देखने की हुई। तीनो आडिटोरियम में अलग अलग फिल्में चल रही थीं। मैंने लव आजकल देखने का निर्णय लिया। 

टिकट काउंटर पर जाने पर मालूम हुआ है कि लव आजकल की एक भी टिकट नहीं बिक पाई है, लिहाजा इसमें संदेह है कि शो चलेगा भी की नहीं। बुकिंग करने वाली लड़की ने सलाह दी कि आप कमीने देख लें। मैं घर से फिल्म देखने का तय करके चला था लिहाजा मैंने कमीने ही देखने को सोची। जब मैं सिनेमाघर अंदर दाखिल हुआ तो कमीने देखने वाले भी सिर्फ पांच लोग थे। पांच सौ लोगों की क्षमता वाला आडिटोरियम पूरा खाली था। यानी सिनेमाघर के एसी चलाने का भी खर्चा निकालाना मुश्किल है। 

दिल्ली के आसपास के कई मल्टीप्लेक्स का ऐसा ही हाल है। मल्टीप्लेक्स वाले सिनेमाघर तो बड़ी संख्या में बन गए हैं लेकिन फिल्में देखने आने वाले लोग कम दीख रहे हैं। क्या ये मल्टीप्लेक्स की महंगी टिकटों के कारण है या फिर आने वाली मंदी का असर।

बचपन में कस्बे के सिनेमाघर में फिल्म देखने जाता था तो कभी ऐसा नहीं सुना की पूरे सिनेमाघर में सिर्फ पांच लोग हों, या फिर लोगों की कमी से सिनेमा का शो ही नहीं चला हो। लेकिन शहरों में ऐसा हो रहा है। मल्टीप्लेक्स में टिकट की दरें कुछ ज्यादा जरूर है लेकिन मल्टीप्लेक्स वाले लोगो को अपनी ओर खींचने के लिए टिकट की दरें तो घटाने मे लग गए हैं। दिल्ली एनसीआर के कई सिनेमाघरो में मार्निंग शो की टिकट दरें कम करनी शुरू कर दी है। सौ से 125 रूपये की जगह 30 से 50 रूपये की टिकटें कर दी गई हैं। फिर भी मल्टीप्लेक्स में वीरानगी छाई दिखाई दे रही है। मल्टीप्लेक्स वाले इसके लिए सस्ती सीडी और डीवीडी को दोषी ठहरा सकते हैं। पाइरेसी में सस्ती फिल्में मिल जाती हैं, लेकिन मल्टीप्लेक्स वाले पॉपकार्न के नाम पर जो लूटपाट मचाते हैं भला उसके लिए कौन जिम्मेवार है। अब शायद ऐसा दौर आने वाला है कि कुछ मल्टीप्लेक्स में ताला लग सकता है।


बात रिटेल स्टोर से शुरू की थी, सो फिर वहीं आता हूं। मल्टीप्लेक्स में आदित्यविक्रम बिड़ला समूह का मोर रिटेल शॉप है, जहां शाम के समय भी ग्राहकों का टोटा दिखाई देता है। कई तरह के आफर हैं लेकिन खऱीददार नजर नहीं आते हैं। उपरी मंजिल पर एक और रिटेल स्टोर है। उसके मैनेजर का कहना है कि स्पेंसर रिटेल की तरह मोर पर भी ताला लग सकता है। जाहिर सी बात है, स्टाफ का वेतन, बिजली का बिल और किराया निकालना भी मुश्किल हो जाए तो कोई बड़ा उद्योगपति भी ज्यादा दिन तक रिटेल स्टोर खोल कर कैसे रह सकता है। घर फूंक कर तमाशा देखने को तैयार कोई भी नहीं हैं। तो क्या मल्टीप्लेक्स की चका चौंध अब धीमी पड़ने वाली है। पूर्वी दिल्ली का एक और शापिंग मॉल है इडीएम। इडीएम की उपरी मंजिल पर फूड कोर्टस हैं। लेकिन एक शाम को जब फूड कोर्ट सेक्सन में गया तो आठ दस बड़े बड़े रेस्टोरेंट्स में ग्राहक बहुत कम दिखाई दे रहे थे।
-विद्युत प्रकाश मौर्य

Thursday, 20 August 2009

सभी रेलगाड़ियां वातानूकुलित होंगी

 गरीब रथ के साथ एक प्रयोग की शुरुआत हुई है। आने वाले दौर में सभी लंबी दूरी की ट्रेनों को पूरी तरह वातानूकुलित करने का प्रयास किया जाएगा।

कई साल पहले भारतीय रेल ने जब एसी में थ्री टीयर कोच का प्रावधान किया तो यह काफी लोकप्रिय हुआ। एसी 2 टीयर में जहां 46 लोग ही यात्रा कर पाते थे वहीं उतने ही बड़े डिब्बे में अब 64 लोग यात्रा करते हैं। एसी थ्री से जहां लोगों को 25 फीसदी तक कम किराए में ही वातानूकुलित क्लास में सफर करने का फायदा मिला वहीं रेलवे का भी राजस्व बढ़ने लगा है। अब वातानूकुलित वर्ग मे एसी थर्ड यात्रियों को बीच सर्वाधिक लोकप्रिय है। आजकल रेल कोच फैक्ट्रियों में ज्यादा डिब्बे एसी 3 के ही बनाए जा रहे हैं। कई रेलगाड़ियों में एसी-3 के डिब्बे तुरंत भर जाते हैं पर एसी-2 खाली ही रहता है।


अब गरीब रथ के साथ एक नई शुरूआत हुई है। अगर वर्तमान रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव का यह प्रोजेक्ट लोकप्रिय हो जाता है तो आने वाले दिनों में अधिकांश रेलगाडि़यों के सभी डिब्बों को एसी करने का प्रयास किया जाएगा। यानी आम जनता के लिए चलने वाली सभी ट्रेनें भी राजधानी और शताब्दी की तरह पूरी तरह से वातानूकुलित हुआ करेंगी। यह सब कुछ स्पेश मैनेजमेंट की नई नीति के तहत संभव हो सका है। यानी की उतनी ही जगह में ज्यादा सीटें देने की कोशिश करना। अगर यह सब कुछ सफल रहा तो मध्यम वर्ग क्या फैक्टरी में काम करने वाले मजदूर वर्ग के लोग भी वातानूकुलित क्लास में चलने का सुख उठा सकेंगे। अभी तक रेलगाड़ियों में वातानूकुलित क्लास में सफर सिर्फ उच्च वर्ग के लोग कर पाते हैं। आमतौर पर मध्यम वर्ग के लोग भी स्लीपर क्लास में ही सफर करते हैं। भारत जैसे देश में जहां पूरे देश का मौसम एक सा नहीं रहता है वहां सभी लंबी दूरी की गाड़ियों को वातानूकुलित बनाने की कोशिश स्वागत योग्य है।

लालू का अर्थशास्त्र-
अब यह देंखें की गरीब रथ के मामले में लालू का अर्थ शास्त्र कैसे काम करता है। अगर 17 डिब्बों वाली को वातानूकुलित रेलगाड़ी है तो एसी कोच में प्रति यात्री प्रति किलोमीटर 47 पैसे परिचालन दर आती है। वहीं अगर गरीब रथ हो तो यह परिचालन दर 39 पैसे आ जाती है। क्योंकि इतनी जगह में गरीब रथ में ज्यादा यात्री सफर करते हैं। रेलवे को अनुमान है कि इस तरह की व्यवस्था से रेलवे के राजस्व में 63 फीसदी तक की बढ़ोतरी हो सकती है वहीं लोग रेलगाड़ी में सस्ती यात्रा का भी सुख उठा सकते हैं।
स्पेश मैनेजमेंट
एसी 3 में जहां एक कोच में कुल 64 यात्रियों के लिए सोने की जगह होती है वहीं गरीब रथ के कोच नए डिजाइन से तैयार किए गए हैं। इनमें 74 यात्रियों के लिए सोने की जगह है। कपूरथला स्थित रेल कोच फैक्टरी ने इन डिब्बों को डिजाइन किया है। अब इसमें कुछ और बदलाव कर इसे 84 सीटों वाला करने की योजना पर काम चल रहा है। इसी तरह गरीब रथ में लंबी दूरी की यात्रा करने वालों के लिए भी चेयरकार की व्यवस्था की गई है। परंपरागत एसी चेयरकार में 70 सीटें होती हैं पर इसमें 102 सीटों का प्रावधान किया गया है। इसका किराया लगभग स्लिपर क्लास के बराबर ही रखा गया है। यह अग बात है कि लंबी दूरी की यात्रा कोई बैठकर नहीं करना चाहता है। पर लंबी दूरी की अधिकांश ट्रेनों में मजदूर वर्ग के लोग बैठकर क्या आलू प्याज की तरह ठूंसकर सफर करते भी देखे जाते हैं। उनके लिए एसी सिटिंग बहुत अच्छी रहेगी। इससे गरीब व मध्यमवर्गीय जनता को एक सुखद विकल्प भी मिल सकेगा।
-माधवी रंजना madhavi.ranjana@gmail.com




Saturday, 15 August 2009

सारा देश होता लोकल

हाल में टाटा इंडीकाम ने अपने सभी लैंडलाइन उपभोक्ताओं को देश भर में अपने नेटवर्क पर लोकल काल दरों पर बात करने की सुविधा दी है। यानी टाटा इंडीकाम का लैंडलाइन फोनधारी अब अपने पड़ोसी को फोन करे या फिर बेंगलूर मुंबई या अमृतसर कहीं भी वह 1.20 रुपए में तीन मिनट बातें कर सकेगा। इससे पहले महानगर टेलीफोन निगम लि. (एमटीएनएल) ने भी दिल्ली व मुंबई के बीच अपने नेटवर्क पर लोकल काल करने की सुविधा प्रदान कर दी है। अब उससे भी आगे बढ़कर एमटीएनल ने दिल्ली मुंबई के बीच अपने उपभोक्ताओं को लोकल काल की दर पर वीडियो कान्फ्रेंसिंग की सुविधा भी प्रदान कर दी है। इतना ही नहीं एमटीएनएल ने घोषणा की है कि वह अपने उपभोक्ताओं को और भी कई सुविधाएं लोकल काल दरों पर देने की ठानी है। यानी उपभोक्ताओं की चांदी है।
वर्तमान में अगर आप कोई एसटीडी काल करते हैं तो आपको 2.40 रुपए प्रति मिनट की दर से भुगतान करना पड़ता है। जबकि लोकल काल के लिए दर महज 40 पैसे मिनट है। यानी लोकल काल की तुलना में एसटीडी छह गुना महंगी है। पर एमटीएनएल या टाटा इंडीकाम के नेटवर्क में एसटीडी काल अब उपभोक्ताओं को छह गुनी सस्ती पड़ रही है। वैसे एसटीडी करने वाले लोगों के इंडिया वन प्लान का विकल्प मौजूद है। इसमें 200 रुपए मासिक किराया के प्लान में महज 1 रुपए मिनट एसटीडी काल की जा सकती है। पर अब अधिकांश टेलीफोन आपरेटर अपने नेटवर्क पर पूरे देश को लोकल काल में परिवर्तित करने की ओर आगे बढ़ रहे हैं। यानी आने वाले समय में ऐसा भी हो सकता है जब एसटीडी काल का कोई मतलब ही नहीं रह जाएगा। हो सकता है टाटा और एमटीएनएल से प्रभावित होकर रिलायंस और अन्य कंपनियां भी इस तरह के प्लान आफर करें। अभी देश में सबसे बड़ा लैंडलाइन नेटवर्क भारत संचार निगम लि. का ही है। इसलिए उपभोक्ताओं को सही लाभ तभी हो सकेगा जब बीएसएनएल इस तरह की कोई घोषणा करता है।
पूरे देश में लोकल काल होने का फायदा उन कंपनियों को ज्यादा हो सकता है जिनका दफ्तरों का नेटवर्क देश भर में फैला हुआ हो। जैसे मान लिजिए किसी कंपनी का एक दप्तर अमृतसर में है दूसरा बेंगलूर में। अगर कंपनी के पास दोनों जगह टाटा का ही फोन है तो दफ्तर के लोग रोज लोकल काल दरों पर आपस में जम कर बातें कर सकते हैं वहीं फैक्स आदि का आदान प्रदान भी लोकल दरों पर ही कर सकते हैं।
कई कंपनियां धीरे धीरे ही सही पूरे देश को लोकल काल दर पर लाने की ओर बढ़ रही हैं।
आने वाले समय में मोबाइल फोन पर भी कंपनियां काल दरों में और भी गिरावट करने वाली हैं। अभी मोबाइल पर प्रति मिनट एसटीडी की दर आमतौर पर दो रुपए प्रति मिनट की है। वहीं लोकल काल की दरें 49 पैसे से लेकर एक रुपए प्रति मिनट तक अलग अलग रेंज में है। पर लैंडलाइन फोन पर घटती काल दरों का असर जल्द ही मोबइल सेक्टर में भी दिखाई देगा।
भारत संचार निगम लि. सहित सभी कंपनियां एसटीडी दरों में और गिरावट करने वाली हैं। ऐसी उम्मीद की जा रही है एसटीडी की अधिकतम दरें 60 से 70 पैसे प्रति मिनट पर सिमट कर रह जाएंगी। जाहिर है कि इसका फायदा आम लोगों को और गरीब लोगों को ज्यादा मिल सकेगा।
 -विद्युत प्रकाश vidyutp@gmail.com





Monday, 10 August 2009

आखिर कहां जाएं प्यार भरे दिल

चलों चलें दूर कहीं प्यारके लिए ये जगह ठीक नहीं। 
जी हां आखिर कहां जाएं प्रेमी। पार्क में अगर प्रेमी प्रेमिका बैठकर प्यार के दो मीठे बोल बोलते हैं तो पुलिस डंडे बरसाती है। लाइब्रेरी के किताबों के बीच छुप-छुप कर प्यार की बातें करो को लाइब्रेरियन बाहर जाने के कहता है। अब भला सड़क पर बैठकर प्यार की बातें तो की नहीं जा सकती। या कि अपने मम्मी डैडी के पास खुलेआम अपनी प्रेमिका को लेकर भी नहीं जाया जा सकता है। बेचारे मेरठ के प्रेमियों के पास लेदेकर वही एक अच्छा पार्क पर था पर वहां भी पुलिस आ गई रंग में भंग डालने। आपरेशन भी उसने ऐसा चलाया कि बेचारे मजनू की आत्मा भी सुबकती होगी। मजनू तो भले ही असफल प्रेमी रहा हो पर था तो वह बड़ा शरीफ व मजबूर। पुलिस वालों ने तो उसका नाम भी बदनाम करके रख दिया। मेरठ की इस घटना से दुनिया भर के प्यार करने वालों का दिल भर आया है। पाकिस्तान की एक हसीन शायरा ने लिखा है-
जब कोई दर्दे मुहब्बत की सजा पाता चोट उसे लगती है, दिल मेरा भर आता है।
सो मेरठ के प्यार करने वालों निराश न होना। जो पुलिस के डंडे के निशान तुम्हारे पीठ पर पड़े हैं उसका दर्द कश्मीर से कन्याकुमारी तक के प्यार करने वाले दिल महसूस कर रहे हैं। क्या करें प्यार करने वालों का कोई संगठन नहीं है नहीं देश भर में पुलिस के खिलाफ धरना प्रदर्शन जरूर करवाते। अब यश चोपड़ा करन जौहर या महेश भट्ट को इस प्रकरण से प्रेरणा लेकर कोई फिल्म जरूर बनानी चाहिए।

बात यहीं खत्म नहीं होती। सुना है कि दिल्ली के चिड़ियाघर में प्यार भरी मीठी बात करने वालों पर भी प्रशासन की टेढी नजर हैं। उन्हें तंग करन के लिए उनके पीछे हिजड़े छोड़ दिए जाते हैं। जहां आपने प्यार भरी बातें शुरू नहीं कि हिजड़े आ गए रंग में भंग डालने। दिल्ली में छोटे-छोटे अपार्टमेंट में रहने वाले लोगों तो घर में भी प्यार भरी बात करने का मौका नहीं मिलता। यहां तो प्रेमी प्रेमिका क्या पति पत्नी भी प्यार का व्यापार करने के लिए पार्क या चिड़िया घर में आते हैं। अब सार्वजनिक स्थानों पर वेलेंटाइन डे मनाना भी खतरनाक है। हो न हो इसक पीछे कोई विदेशी साजिश नजर आती है। हो सकते है महंगे रेस्टोरेंट की चेन चलाने वालों ने पुलिस प्रशासन को उकसाया हो कि वे प्रेमियों के परेशान करें ताकि प्यार भरे दिल उनके रेस्टोंरेंट में आएं और दिल की बात कहने के साथ बिल भी भरें और जेब भी ढीली करें। इसकी गहराई से जांच कराई जानी चाहिए। बड़े शहरों में खुलने वाले शानदार रेस्टोरेंट प्रेमियों को पूरा एकांत उपलब्ध कराते हैं। पर यहां बैठना बड़ा महंगा पड़ता है। अब भला वे प्रेमी कहां जाएंगे जिनकी जेब तो खाली होगी पर दिल तो प्यार से भरा होगा। किसी शायर ने कहा था - तेरे जितने भी चाहने वाले होंगे। होठों पे हंसी पर पावों में छाले होंगे।
-विद्युत प्रकाश



Wednesday, 5 August 2009

क्या नाम से जाति सूचक शब्द हटाए जाएं

भला नाम में क्या रखा है। नहीं नाम मे बहुत कुछ रखा है। पिछले दिनों एक सुझाव आया कि नाम से जातिसूचक शब्द हटाए जाने चाहिएं इससे देश में जातपात के भेदभाव को मिटाने मे मदद मिल सकती है। इसको लेकर कानून बनाने का भी सुझाव आया है। पर क्या ऐसा कोई कानून बनाया जा सकता है। क्या लोगों को इस बात के लिए कानून मजबूर किया जा सकता है कि आप अपने नाम में कोई भी जातिसूचक शब्द न लगाएं। शायद इसको लेकर कई तरह की मुश्किलें आ सकती हैं। 

पहले यह तय करना मुश्किल हो सकता है कि कौन शब्द जाति सूचक हैं कौन से शब्द नहीं। जैसे उत्तर भारत में शर्मा और सिंह जैसे टाइटल हैं जो कई जातियों के लोग लगते हैं। कानून बनाकर इन शब्दों के प्रयोग पर पाबंदी लगाना कठिन होगा। पंजाब में काफी लोग अपने नाम के साथ अपने गांव का नाम लगाते हैं। वहीं गुजरात में अपने नाम के साथ अपने नाम के साथ पिता का नाम लगाते हैं। उन्हें ऐसा करने से रोकना कानून बनाने से संभव नहीं हो सकेगा।
वहीं कोई भी नाम रखना और नाम के आगे कोई भी टाइटल लगाना हर किसी का मौलिक अधिकार है। इस पर कानून बनाकर रोक नहीं लगाया जा सकता है। ऐसा करने पर बड़ी संख्या में लोग विद्रोह कर सकते हैं। नाम से जाति सूचक शब्द हटाने को लेकर आपत्ति देश भर की जातीय संगठनों को भी हो सकती है। ये जाति संगठन अपने अपने समाज में लोगों को इस बात के लिए अभिप्रेरित करते हैं आप अपने नाम के साथ खुलकर जाति सूचक शब्द लगाएं जिससे की सामने वाले को आपकी जाति का पता चल जाए। दलित व पिछड़ी जातियों में पहले अपनी जाति छुपाने का प्रचलन था इसलिए इन समुदाय से आने वाले लोग बड़ी संख्या में टाइटल नहीं लगाया करते थे। पर अब पिछले एक दशक में दलित जातियों में स्वाभिमान जगा है। वे खुल कर अपनी जाति सूचक टाइटल लगाने लगे हैं।
बहुत कम लोग ऐसे हैं जो नाम से जातिसूचक शब्दों को हटाए जाने के पक्ष में हैं। दुनिया के हर देश में नाम के साथ किसी न किसी तरह का शीर्षक लगाए जाने का प्रचलन है। देश में कुछ ऐसे लोग हुए हैं जिन्होंने अपने नाम से जाति सूचक शब्द हटाए हैं। जैसे राजनीति में चंद्रशेखर। पर ऐसे लोग जो नाम के साथ जाति नहीं लगाते उनकी भी जाति लोग बखूबी जानते हैं। जो नहीं जानते वे उनकी जाति पता कर ही डालते हैं। बिहार के करिश्माई नेता का असली नाम लालू प्रसाद है पर उन्हें ज्यादा लोग लालू प्रसाद यादव या लालू यादव के नाम से बुलाते हैं। अगर लोग अपनी प्रेरणा से ही अपने नाम इस तरह के रखने लग जाएं जिससे उनकी जाति के बारे में पता न चले तो यह बड़ी अच्छी बात हो सकती है। पर इसको लेकर किसी तरह के कानून थोपने की कोई जरूरत नहीं है।
अगर कानून बनता है तो काफी लोग इस कानून के खिलाफ अपील करेंगे। सबसे बड़ी बात है किसीको कोई भी नाम रखने से रोका नहीं जा सकता है। अगर कोई दलित समाज से आने वाला व्यक्ति किसी सवर्ण जाति की कोई टाइटल को लिखना चाहता है तो उसे भी ऐसा करने से लोग अथवा कानून नहीं रोक सकते हैं। कुछ लोग को अजीबोगरीब किस्म के उपनाम रख लेते हैं। जैसे मप्र के भाजपा नेता बाबू लाल गौर। कहते हैं वे स्कूल में अपने शिक्षक की बात गौर से सुनते थे इसलिए उनका नाम शिक्षक ने ही बाबूलाल गौर रख दिया।

-विद्युत प्रकाश मौर्य


Thursday, 30 July 2009

विकास के लिए जरूरी है एसईजेड

हरियाणा में कांग्रेस के सांसद कुलदीप बिस्नोई अपनी सरकार के रिलायंस के साथ मिलकर एसईजेड यानी स्पेशल इकोनोमिक जोन बनाए जाने के फैसले के खिलाफ हैं। इसलिए उन्होंने हाल में उन पांच गांवों की तूफानी पदयात्रा की जिन गांवों की जमीनें इस आर्थिक जोन के लिए ली जाने वाली हैं। उनका आरोप है कि इस आर्थिक जोन के नाम पर किसानों की जमीन बहुत सस्ते में ली जा रही है। वे खुलेआम ऐसे किसी आर्थिक जोन का विरोध कर रहे हैं। अब किसानों की हितों की रक्षा एक मुद्दा हो सकता है। यह जरूरही है कि जिन किसानों की जमीनें इस आर्थिक जोन के लिए ली जाने वाली है, उनको अपनी जमीन का वास्तविक मुआवजा मिले। निश्चय ही किसानों के हितों की अनदेखी नहीं होनी चाहिए। पर किसी राज्य में आर्थिक जोन का अगर निर्माण किया जा रहा है तो यह किसी भी सूरत में गलत नहीं ठहराया जा सकता है।


क्यों चाहिए आर्थिक जोन- देश के समग्र आद्योगिक विकास के लिए आर्थिक जोनों का निर्माण जरूरी है। तभी हम चीन जैसे देश से मुकाबला कर सकेंगे। रिलायंस का हरियाणा में बनने वाला प्रस्तावित आर्थिक जोन 25 हजार एकड़ का है जबकि चीन में इससे कई बड़े बड़े आर्थिक जोनों का निर्माण हो चुका है। अब पंजाब हरियाणा जैसे राज्य बड़े औद्योगिक घरानों को अपने यहां आकर आर्थिक जोन बनाने का न्योता दे रहे हैं तो इसमें कोई बुराई नहीं नजर आनी चाहिए।
आर्थिक जोन में उद्योग स्थापित होने से उद्योग जगत को लाभ है। इसमें एक खास तरह के सभी उत्पादन केंद्रों की स्थापना एक ही परिसर में की जाती है। इसके साथ ही वेयरहाउस मजदूरों व अधिकारियों के लिए आवासीय क्षेत्र का निर्माण भी इसी क्षेत्र में किया जाता है। इससे उत्पादन की प्रणाली एकीकृत हो जाती है। जाहिर है कि इसका असर उत्पादन पर भी पड़ेगा। जैसे गारमेंट के क्षेत्र सभी उद्योगों को एक खास जोन में स्थापित किया जाए। पेट्रोलियम आटोमोबाइल आदि जुड़े उद्योगों को एक ही परिसर में स्थापित किया जाए तो उत्पादन प्रक्रिया को बेहतर बनाया जा सकेगा।
सरकार की रियायतें- यह आरोप लगाया जा रहा है कि सरकार ऐसे आर्थिक जोन बनाने के नाम पर उद्योगों को रियायतें दे रही है। यह सही है कि उद्योगों को आकर्षित करने के लिए रियायतें घोषित करनी पड़ती है। उद्योगपति भी कोई उद्योग वहीं लगाएगा जहां उसे सबसे बेहतर सुविधाएं प्राप्त हो सकेंगी। अभी पिछले कुछ सालों से टाटा समूह एक लाख रुपए की कार बनाने की बात कर रहा है। हालांकि उसने यह तय नहीं किया था कि यह कार कहां पर बनाई जाएगी। कभी उत्तरांचल, कभी पं बंगाल के नाम की चर्चा चल रही थी। अंत में पंजाब सरकार से समझौते केबाद यह तय हुआ कि टाटा की सस्ती कार का यह प्रोजेक्ट पंजाब में रोपड़ जिले में लगाया जाएगा। जाहिर है कि टाटा ने वहीं प्लांट लगाना पसंद किया जहां उसे सबसे बेहतर सुविधाएं प्राप्त हुईं। उद्योगपतियों को अगर रियायत नहीं प्राप्त हो तो वे अपना उद्योग एक राज्य से उठाकर दूसरे राज्य में ले जाने की बात करने लगते हैं। पिछले कुछ सालों में कई उद्योग धंधे पंजाब से शिफ्ट होकर हिमाचल प्रदेश में शिफ्ट होने लगे क्योंकि वहां उन्हें सस्ती बिजली और कई साल तक करों में रियायत मिल रही थी। इसलिए हर सरकार को अपने यहां उद्यमियों को आकर्षित करने के लिए कई उपक्रम करने पड़ते हैं। कोई उद्योगपति सबसे पहले कानून व्यवस्था की बेहतर स्थितियां उसके बाद बिजली पानी सड़क जैसी मूलभूत सुविधाओं की ओर देखता है।
-विद्युत प्रकाश




Thursday, 23 July 2009

अश्लील एमएमएस क्या करें लड़कियां

अभी गुजरात के शहर सूरत से एक खबर आई। एक लड़के ने अपनी महिला मित्र के अंतरंग क्षणों को मोबाइल फोन से रिकार्ड कर लिया। इस रिकार्डिंग को उसने बाद में अपने दोस्तों में बांट दिया। बाद में इस एमएमएस के आम हो जाने के बाद लड़की परिवार वालों शहर छोड़कर भागना पड़ा। वहीं पुलिस ने इस मामले में कारवाई करते हुए उस लड़के को गिरफ्तार कर लिया। इससे पहले भी देश के कई कोने में इस तरह के एमएमएस कांड हो चुके हैं। कई बार लड़कियां विश्वास में आकर अपने पुरुष मित्र को अपना सब कुछ सौंप देती हैं। पर पुरुष मित्र हमेशा इमानदार नहीं होता है। वह चुपके से ऐसे क्षणों की फिल्म बना लेता है तो ऐसे में लड़कियों को क्या करना चाहिए। जाहिर है सावधान रहना चाहिए।
दोस्ती की सीमा समझें-
किसी पर ही सीमा से आगे जाकर भरोसा न करें। हर दोस्ती में एक सीमा यानी लक्ष्मण रेखा तय करें और उसका पालन करें। ऐसा नहीं करने पर कई बार आपके साथ शहर छोड़कर भागने या आत्महत्या करने जैसी स्थिति आ सकती है। अगर आपका कोई दोस्त बार-बार सीमा से आगे बढ़ने की बात करता हो तो उसे अच्छी तरह समझाएं। अगर वह न माने तो ऐसे दोस्त से अलग हो जाना ही बेहतर होगा। किसी शायर ने भी कहा है कि - ताल्लुक अगर बोझ बन जाए तो उसका तोड़ना बेहतर।
अपनी प्रतिष्ठा का ख्याल रखें
याद रखें आपकी और आपके घर वालों की हमेशा समाज में एक प्रतिष्ठा होती है। आप इसका ख्याल रखें और इसके अनुरूप ही व्यवहार करें। कोई भी कदम उठाने से पहले उसके हानि-लाभ के बारे में सोच लें। इससे आपकी बहुत सी गलतियों पर रोक खुद लग जाएगी। किसी शायर ने कहा है कि -बस एक गलत कदम उठा था राहे शौक में तमाम उम्र मंजिल मेरा रास्ता ढूंढती रही।
अति महत्वाकांक्षा बुरी
कई गलत कदम के पीछे अति महत्वाकांक्षा बहुत बड़ा कारण होती है। अगर आप अपनी इच्छाओं को सीमित रखें तो आपसे बहुत सी गलतियां नहीं होगीं। साथ ही कम इच्छाएं रखने वाला आदमी सुखी भी रहता है। वैसे अति हर चीज की बुरी होती है। कई बार किसी बड़ी इच्छा के लिए आदमी कोई गलत कदम उठाने की गलती कर बैठता है।
किसी पर भी पूरा भरोसा न रखें
प्रोफेशनलिज्म का तकाजा है कि किसी भी व्यक्ति पर पूरा भरोसा न करें। किसी के सामने अपने दिल की बात करने से पहले अच्छी तरह परख लें। जीवन में बहुत सारे निर्णय चतुराई से लिए जाते हैं। इसलिए आप कभी इमोशनल फूल न बनें। बल्कि समझदारी से काम लें। यह आपके आगे बढ़ने में सहायक होगा। हो सकता है आपके दोस्त आपके चतुर होने के कारण आपके ऊपर कुछ तोहमत लगाएं पर आप उनकी ऐसी बातों पर बिल्कुल ही ध्यान न दें। कुछ ऐसे उपाय कर आप कहीं भी अपने व्यक्तित्व को विघटित होने से बचा कर रख सकते हैं।

Friday, 17 July 2009

देव सुरैय्या और पहला प्यार

कहते हैं जीवन में पहले प्यार का बड़ा ही महत्व है। उसकी खुशबू जीवन भर साथ बनी रहती है। बहुत से लोगों के जीवन में प्यार आता है। कई प्यार आते हैं। पर उनके बीच पहले प्यार का अपना अलग महत्व होता है। कहा जाता है देवानंद और सुरैय्या में काफी गहरा प्यार था। पर दोनों परिवारों को उनका मिलना पसंद नहीं था। उनके बीच धर्म की दीवार थी वहीं सुरैया परिजन यह बिल्कुल पसंद नहीं करते थे कि उनकी बेटी देवानंद के साथ प्यार के पिंग बढ़ाए।


देव-सुरैय्या का प्यार रजत पट से हटकर हकीकत था पर उस प्यार को अंजाम तक नहीं पहुंचाया जा सका। अब 80 से ज्यादा वसंत देख चुके देवानंद ने अभी हाल में एक बातचीत में सुरैया के साथ अपने प्यार को बड़ी ही शिद्दत से याद किया। उन्होंने कहा कि उन्हें सुरैय्या का प्यार नहीं मिला इसका उन्हें कोई गम नहीं है। वे मानते हैं कि अगर उन्हें सुरैय्या मिल जाती तो उनकी जिंदगी वैसी नहीं होती जैसी आज है। सुरैय्या से अलग रहकर भी उन्होंने जिंदगी को बड़े ही खूबसूरत ढंग से जीया है। देव साहब की यह स्वीकारोत्ति उन लोगों के लिए नजीर है जो प्यार के नहीं मिल पाने पर अपना बाकी समय रोते हुए या फिर शराब के नशे में गुजार देते हैं। मायूसी की चादर तानकर सालों कुछ भी नहीं करते।
किसी का प्यार बड़े नसीब से मिलता है पर अगर जिसे आप प्यार करते हैं वह आपकी जिंदगी में नहीं पाया तो उसकी याद में आप जीवन को और बेहतर ढंग से जी सकते हैं। देव साहब ने यही किया। उन्होंने एक से बढ़कर एक बेहतरीन फिल्में बनाईं। 80 से साल से अधिक की उम्र में भी उनका जोश की नौजवान की तरह ही कायम है। उनके उपर किसी भी तरह की निराशा नहीं देखी जा सकती है।
देव साहब ने कहा कि कुछ साल पहले जब सुरैय्या की मौत हुई तो वे उसके जनाजे में शामिल होनेके लिए नहीं गए। देव साहब के अनुसार किसी के प्रति अपने दुख का सार्वजनिक प्रदर्शन करने में उनकी कोई आस्था नहीं है। वे ऐसे वक्त में अकेले में रोना पसंद करते हैं। जी हां हर मजबूत आदमी भी अकेले में रोता है पर सार्वजनिक स्थलों पर अपने व्यक्तित्व में मजबूती दिखाता है। यही उसकी सफलता का बहुत बड़ा कारण होता है। अगर आप किसी को प्यार करते हैं और वह नहीं मिलता है तो उसकी याद में आप जीवन में हमेशा कुछ नए नए सृजन कर सकते हैं। जरा कल्पना कीजिए आपने किसी को किसी खास वक्त में प्यार किया हो। वह किसी कारण से आपको नहीं मिल पाया हो तो क्या आप उसकी याद में रोते हुए मिलें। जीवन को एक असफल व्यक्ति की तरह जीएं तो आपका प्यार जीवन के किसी मोड़ पर आपको दुबारा मिले तो क्या वह आपको देखकर वह खुश हो सकेगा।
आप यह मानकर चलें कि- तुमसे मिला था प्यार कुछ अच्छे नसीब थे। प्यार के उन सुंदर दिनों को याद करके आप शेष जीवन को और भी सुंदर बनाने की कोशिश में लग जाएं। जिन लोगों को जीवन में प्यार कभी आता है वह भले ही थोड़े वक्त के लिए आए उसको याद करके सारी जिंदगी काटी जा सकती है। जिंदगी में बड़े काम किए जा सकते हैं। शोख जवानी जार दिनों की मेहमान थी। छोड़कर दिल में यादों का संगीत गई।
जो लोग काम करना चाहते हैं उनके लिए यह जिंदगी बहुत बड़ी है। वे उपलब्धियों का अंबार लगा देते हैं जो नहीं करना चाहते वे सालों बैठकर जिंदगी को कोसते रहते हैं। जीवन में प्यार का मिल जाना ही सबकुछ नहीं होता यह महत्वपूर्ण है कि आपने अपने प्यार से क्या सीखा।

 - विद्युत प्रकाश vidyutp@gmail.com


Saturday, 11 July 2009

पुलिस दोस्त या खलनायक

कई सालों से पुलिस की इस भूमिका पर चर्चा हो रही है कि उसकी भूमिका दोस्त जैसी हो न कि खलनायकों जैसी। दिल्ली में तो दोस्त पुलिस के गठन की कवायद बी चल रही है। ऐसी पुलिस जो आप किसी परेशानी में हों तो आपकी मदद करे। पर मेरठ की घटना के बाद हमें पुलिस की भूमिका के बारे में सोचना होगा। पुलिस का मूल काम अपराधियों को पकड़ना है न कि प्यार करने वाले लोगों को डंडे चलना है। वह भी किसी आपरेशन के तहत। आम तौर पर जब कभी सभ्य लोगों के बीच पुलिस की चर्चा होती है तो इसका मतलब समझा जाता है कि अगर आप पुलिस के चक्कर में पड़े यानी को ई केस मुकदमा हो गया तो समझो बहुत बड़े झमेले में फंस गए। किसी के घर पुलिस आ जाए तो अड़ोस-पड़ोस के लोग शक भरी निगाहों से देखने लगते हैं।

जब पुलिस पार्क में बैठे प्रेमी युगलों पर डंडे बरसाने लगे तो पुलिस की भूमिका पर और भी सवाल खड़े होते हैं। क्या दो प्यार करने वालों का पार्क में बैठना गुनाह है। पार्क वह सार्वजनिक स्थल है जिसे सरकार लोगों को बैठने या घूमने के लिए ही बनवाती है। यहां जाने के लिए किसी तरह की पूर्व अनुमति की भी कोई जरूरत नहीं समझी जाती। हां पार्क में अगर अनैतिक कर्म हो रहे हों तो पुलिस को उस पर नजर रखनी चाहिए। पर पुलिस बिना कोई पूछताछ किए बिना असलियत जाने अगर लोगों पर डंडे बरसाने लगे तो लोग आखिर दो घड़ी चैन के बीताने के लिए कहां जाएं। आखिर व महफूज जगह कौन सी हो। कुछ लोगों का कहना है कि मेरठ के पार्क में प्रेमी जोड़ों के विचरण करने से आसपास के लोगों को परेशानी थी। ऐसे में भी जांच पड़ताल के कई और तरीके निकाले जा सकते हैं। दो प्रेम करने वाले उन लोगों के लाख गुने बेहतर हैं जो किसी जेब काटते हैं या किसी का गला रेत देते हैं। पुलिस का मूल का अपराध मुक्त समाज का निर्माण करना है न कि प्यार करने वालों पर पहरे लगाना। किसी भी पेश में समाज को सुधारने का काम तब संभव है जब पहले वह अपने मूल कार्य को ठीक से संपादित कर ले रहा हो उसके बाद वह अपने कर्तव्यों की बात करे। यह सही है कि देश में पुलिस का कई बार गलत इस्तेमाल होता है। पुलिस बल को अक्सर नेताओं की सुरक्षा में लगाया जाता है। ट्रैफिक कंट्रोल, शादी समारोह तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमों के मौके पर सुरक्षा में भी पुलिस लगा दी जाती है। इन सब कारणों से कई बार पुलिस अपने मूल कार्यों पर समय नहीं दे पाती है। कई साल पहले पुलिस दिल्ली में प्यार करने वालों पर पहरे लगा रही थी। पार्कों और सार्वजनिक स्थानों पर खास तौर पर पुलिस इस बात की निगरानी के लिए लगाई गई थी कि कहीं लोग इन स्थलों से देह व्यापार जैसे रैकेट न संचालित कर रहे हों। दिल्ली मुंबई जैसे महानगरों में देखा गया है कि सार्वजनिक स्थलों पर जेह व्यापार का संचालन भी हो जाता है। ऐसे मामलों पर पुलिस को निश्चय ही नजर रखनी चाहिए। पर भले घर के लोगों और ऐसे लोगों में भेद किया जा सकता है।
-विद्युत प्रकाश मौर्य, vidyutp@gmail.com


Sunday, 5 July 2009

बोरवेल में गिरे प्रिंस के बहाने

मीडिया हर बिकाउ आइटम को पकड़ता है। खासकर समाचार चैनल प्रतियोगिता में अपनी व्यूअरिशप बढ़ाने के लिए हर उस खबर को पकड़ने की कोशिश में लगे रहते हैं जिसमें बिकाउ एंगल हो। इसी क्रम में रोचक और फिल्मी खबरों को समाचार चैनलों पर ज्यादा तरजीह मिल पाती है। पर हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले में एक हैंडपंप में बोरवेल में फंसे पांच साल के नन्हें प्रिंस को बचाने का आपरेशन दिखाने के लिए कई चैनलों ने लगभग 40 घंटे का लाइव शो दिखाया। इसका टीवी चैनलों को लाभ भी हुआ। माना जाता है कि इस दौरान उनकी टीआरपी में जबरदस्त इजाफा हुआ। देश भर के लोगों की नजरें टीवी स्क्रीन की तरफ थीं। इस दौरान टीवी देखने वालों की संख्या इतनी बढ़ी जितनी की भारत पाकिस्तान मैच के दौरान भी नहीं होती। अभी तक देश में सबसे ज्यादा टीआरपी भारत पाकिस्तान के मैच के दौरान ही देखने को मिलता है। जहां प्रिंस को बचाने के आपरेशन के दौरान टीवी चैनलों के व्यूअरशिप में जबरदस्त इजाफा हुआ वहीं कुछ चैनलों ने इस दौरान विज्ञापनों से जबरदस्त कमाई भी की।
सब कुछ टीआरपी के लिए - हालांकि इस दौरान जी न्यूज जैसे चैनल ने कहा कि वह बीच में कोई विज्ञापन नहीं दिखाएगा और मानवतावादी धर्म का निर्वहन करते हुए प्रिंस को बचाने को लेकर पल पल की खबरें प्रसारित करेगा। प्रिंस प्रकरण में टीवी चैनलों को अपने बारे में एक सकारात्मक संदेश यह ज्ञापित करने का मौका मिला कि वे सकारात्मक खबरों को भी प्राथमिकता देते हैं। नहीं तो अभी तक समचार चैनलों के बारे में माना जाता था कि वे अपराध और मनोरंजन की खबरों को चासनी लगाकर परोसते हैं। इसमें काफी हद तक सच्चाई भी है। चाहे व राखी सावंत पर कोल्हापुर में मुकदमा का प्रकरण हो या फिर मीका और राखी सावंत चुंबन प्रकरण सभी समाचार चैनलों ने घंटों इसपर कवरेज की। इन घटनाओं का देश के सरोकार से कोई जुड़ाव नहीं था। हां इसका फायदा राखी सावंत और मीका जैसे लोगों को जरूर मिला। हासिए पर रहने वाले लोग अचानक लाइमलाइट में आ गए थे। पर क्या प्रिंस प्रकरण को दिखाकर टीवी चैनलों ने सचमुच में अपना मानवतावादी चेहरा प्रस्तुत किया। नहीं इसके पीछे असली मकसद तो था ज्यादा से ज्यादा दर्शक बटोरने की कोशिश। कई समाचार चैनलों के बीच आजकल असली लड़ाई इसी बात को लेकर है। हालांकि टीवी चैनलों पर शानदार कवरेज का प्रिंस को और प्रिंस के गांव हल्दाहेड़ी के लोगों को जबरदस्त लाभ हुआ है। गांव में विकास की लहर चल पड़ी है। सरकार वहां सारी सुविधाएं जुटाने में लगी है, वहीं सरकारी व गैर सरकारी संस्थाएं प्रिंस के परिवार वालों को मदद करने मे जुटी है।

सबसे बड़ा लाइव शो - एक मायने में प्रिंस प्रकरण पर कवरेज ने भारतीय टेलीविजन जगत में इतिहासा रच दिया है। यह है टीवी स्क्रीन पर सबसे लंबे लाइव शो का। लगभद 40 घंटे तक कई चैनल इस प्रोग्राम का जीवंत प्रसारण करते रहे। यह रियलिटी टीवी पर दिखाए जाने वाले किसी लाइव शो की तरह ही था। इस प्रोग्राम का अंत भी सुखांत रहा क्योंकि प्रिंस को बचा लिया गया। पर इसमें टीवी चैनलों की भूमिका क्या रही। प्रिंस को तो गांव वालों के अथक परिश्रम और थल के सेना के रेजिमेंट के जवानों के विशेष प्रयास से बचाया जा सका। टीवी चैनलों ने तो इसे अपने लिए भी एक मसाले की तरह भुनाया। स्टार न्यूज ने प्रिंस और उसके परिवार वालों को मुंबई लेजाकर घुमाया। फिल्मी सितारों से मुलाकात कराई और इस घटना में इंटरटेनमेंट एंगिल निकालकर इसे कैश कराया।

सामाजिक सरोकार और मीडिया
अगर हम टीवी चैनलों की बात करें तो क्या दिन भर दिखाई जाने वाली खबरों में भला कितनी खबरें ऐसी होती हैं जिनका सामाजिक सरकोकार से कोई जुड़ाव होता है। वास्तव में आजकल ऐसी खबरें बहुत कम देखने को मिलती हैं। हर जगह बिकाउ माल पेश करने की होड़ सी लगी है। अगर कोई चीज बिकाउ नहीं है तो उसे बिकाउ कैसे बनाया जाए इसकी होड़ लगी है। सभी चैनलों ने बोरवेल में फंसे प्रिंस को सकुशल बाहर निकालने की घटना को लाइव दिखाया। हालांकि उसे बाहर निकालने में इन चैनलों की कोई खास भूमिका नहीं रही। वे इस दौरान चाहते तो अपने नेटवर्क का इस्तेमाल करते हुए देश के किसी भी कोने से विशेषज्ञ बुलाते और इस बचाव आपरेशन में मददगार भी बन सकते थे। पर गरीब प्रिंस को तो कुदरत ने ही बचा लिया। यह उसकी उत्कट जीजिविषा ही थी कि वह 50 घंटे तक बोरवेल के छेद में 53 फीट नीचे जीवित बचा रहा और बाहर से आ रही रोशनी के साथ जीवन के लिए संघर्ष करता रहा। इसके इस संघर्ष को हर किसी ने सलाम किया।

मनोरंजन का मसाला - पर प्रिंस के बचने के बाद एक टीवी चैनलों को इसमें जबरदस्त मनोरंजन का मशाला मिल गया। वह प्रिंस और उसके परिवार वालों को चुपके से मुंबई ले गया। वहां प्रिंस दो दिनों तक फिल्म इंडस्ट्री के लोगों से मिलता जुलता रहा। हालांकि किसी भी फिल्म स्टार से मिलकर प्रिंस के चेहरे पर कोई एक्सप्रेशन नहीं आ रहा था। आता भी कैसे प्रिंस कोई शहरी लड़ता तो है नहीं जो किसी फिल्म स्टार को पहचानता हो और टीवी पर उनका चेहरा देखकर खुश हो जाता हो। वह तो इन सब चीजों से निस्पृह है। उसके लिए सन्नी दयोल, अनुपम खेर, शिल्पा शेट्टी, मलयिका अरोरा, सलमान खान आदि का कोई मतलब नहीं है। सारे चेहरे अजनबी जैसे हैं। हां समाचार चैनल दो दिन तक इन सब सितारों को अनौपचारिक रुप में टीवी पर दिखाता रहा। दर्शकों को उसने आदत डलवा दिया। मनोरंजन दिखाने की समचार की शक्ल में। इसलिए उसे अपनी पसंद का साफ्टवेयर मिल गया था। पर अभागे प्रिंस को मुंबई का वातावरण पसंद नहीं आया। 50 घंटे बोरवेल में रहकर वह भले ही सकुशल रहा हो पर मुंबई से आने के बाद वह जबरदस्त बीमार पड़ गया। कई दिनों तक वह अस्पताल में पड़ा रहा। पर इस दौरान किसी ने भी प्रिंस की सुध नहीं ली।
ऐसी कितना घटनाएं होती हैं जो खबर बनती हैं। प्रिंस जैसे और भी लोग होते हैं जो आपदा में फंसे होते हैं। उनके निकालने के लिए आपरेशन होता है। पर वे मीडिया में खबर नहीं बनते। अभी गुजरात में सैकड़ों स्कूली बच्चे बाढ़ के कारण अपने बोर्डिंग स्कूल की बिल्डिंग में ही फंस गए। उन्हें भी सेना ने आपरेशन करके सकुशल निकाला। हालांकि गड्ढे में किसी बच्चे के गिर जाने की प्रिंस के रुप में कोई पहली घटना नहीं है। इससे पहले हरियाणा और मध्य प्रदेश में कई और बच्चों को ऐसी घटनाओं में सफलतापूर्वक निकाला जा चुका है। पर तब टीवी चैनलों को या तो पता नहीं चला था, या फिर तब उनको इसमें कोई बिकाउ एंगिल नहीं नजर आया था। जब भी टीवी चैनल वाले कोई खबर बनाते हैं तो उन्हें एक बार इस एंगिल से भी सोचना चाहिए कि इस खबर के साथ सामाजिक सरोकार कितना जुड़ा हुआ है। जल्दबाजी के चक्कर में अभी हाल में सोनीपत के पास नहर में गिरी स्कूली बस के प्रकरण में पहले टीवी चैनलों ने कहना शुरु कर दिया कि 50 बच्चों में से छह को बचा लिया गया है बाकि के बचे होने की कोई उम्मीद नहीं है। जबकि कुछ घंटे बाद ही यह साफ हो गया कि 29 बच्चों में से 23 को सफलतापूर्वक बचा लिया गया था।
- विद्युत प्रकाश मौर्य 
( 23 जुलाई 2006 को हरियाणा के कुरुक्षेत्र ज़िले के एक गाँव में 60 फुट गहरे गड्ढे में गिरे एक बच्चे को 48 घंटे के प्रयास के बाद भारतीय सेना के अधिकारी बचाने में कामयाब हो सके थे।)