Friday, 10 April 2020

लॉकडाउन डायरी - इमरजेंसी, कर्फ्यू और बेघर लोग (( 01 ))

साल 2020 के फरवरी के आखिरी सप्ताह में दिल्ली दंगों की आग में झुलसी। मुझे बनारस के दंगे याद हैं। तब में काशी हिंदू विश्वविद्यालय में पढ़ता था। हालांकि हम बीएचयू कैंपस में सुरक्षित थे। पर शहर जल रहा था। ठीक इसी तरह दिल्ली में मेरे पड़ोस में मेरे घर से चार किलोमीटर आगे का इलाका कई दिन तक झुलसता रहा है। इस असर मेरे बेटे की पढ़ाई पर पड़ा। उसके स्कूल में हो रही सालाना परीक्षाएं स्थगित हो गईं। बाद में ये परीक्षाएं शुरू हुईं। होली 10 मार्च को थी तो नौ मार्च को पहला पेपर। फिर 11 मार्च को दूसरा पेपर। ऐसे में होली कौन मनाए। अनादि की परीक्षा 19 मार्च को खत्म हो रही थी। इसलिए मैंने उनका और उनकी मां का 19 मार्च की शाम हमसफर एक्सप्रेस में पटना जाने का टिकट बना दिया था। स्कूल से संदेश था कि 7 अप्रैल को अगले सत्र में स्कूल खुलेगा।



19 मार्च की शाम को मैं उन्हें आनंद विहार रेलवे स्टेशन पर हमसफर एक्सप्रेस में विदा कर आया। इस बीच देश में कोरोना को लेकर दहशत बढ़ती जा रही थी। हर रोज कुछ नए संक्रमित मिल रहे थे। बीमारी चीन से आगे बढ़ कर स्पेन, इटली और इरान में कहर ढा रही थी। रेलवे स्टेशन पर यात्रा करने वाले दहशत में थे। होली के बाद काफी लोग अपनी छुट्टियां रद्द करा रहे थे। रेलवे ने 40 फीसदी ट्रेनें यात्री कम होने के कारण रद्द कर दी थीं।

माधवी और वंश सुबह सुबह सकुशल पटना पहुंच गए। इस बीच 19 मार्च को रात आठ बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी टीवी पर प्रकट हुए। राष्ट्र के नाम संदेश में कहा कि 22 मार्च को देश भर में आप लोग जनता कर्फ्यू लगाएं जिससे कोरोना से निपटा जा सके।

मैं 20 और 21 मार्च को अवकाश पर घर में रहा। 22 मार्च को बंद के दिन दफ्तर जाकर काम किया। इन दिनों हिन्दुस्तान हिंदी दैनिक का दफ्तर नोएडा के सेक्टर 63 में है।

आखिरी दिन कड़ी चावल का स्वाद – 21 मार्च की दोपहर में मैं अपनी कालोनी के गेट पर कड़ी चावल वाले के पास गया। ये सोचकर की खाना बनाने से अच्छा है कड़ी चावल खा लें। उससे अपने लिए एक प्लेट पैक कराया। कड़ी चावल वाले ने बताया कि आज से छुट्टी कर रहा हूं। स्टाफ को भी पैसे देकर घर भेज रहा हूं। कल देश भर में जनता कर्फ्यू है। पता नहीं ये कब तक चले। उस दुकानदार को अंदेशा हो गया था कि ये बंदी ज्यादा दिन चलने वाली है। और सचमुच ऐसा ही हुआ। 

22 मार्च जनता कर्फ्यू -  देश भर में लोगों ने 22 मार्च को जनता कर्फ्यू को सफल बनाया। पर कुछ जगह लोग नहीं माने। घंटी शंख बजाते लोगों ने अहमदाबाद, पीलीभीत में रैली निकाल दी। पर कोरोना के अंदेशे से कई राज्यों ने अपने यहां लॉकडाउन का ऐलान शुरू कर दिया। 23 मार्च को पंजाब, चंडीगढ़, महाराष्ट्र, कर्नाटक आंध्र, तेलंगाना जैसे राज्य सख्त कदम उठा चुके थे।
22 मार्च को देश भर में यात्री रेलगाडियों का संचालन बंद कर दिया गया था। बाद में रेलवे ने 25 मार्च तक रेलबंदी का ऐलान किया। 24 मार्च को रेलबंदी को बढ़ाकर 14 अप्रैल तक कर दिया गया। रेलवे के 160 साल के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ। तमाम राज्य बसों और टैक्सियों का संचालन रोक चुके हैं।

21 दिनों का लॉकडाउन - 24 मार्च को रात आठ बजे एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी टीवी पर आए। इस बार उन्होंने आधे घंटे के भाषण में 25 मार्च से 14 अप्रैल तक देश भर में पूर्ण लॉकडाउन का ऐलान किया। यह कर्फ्यू और इमरजेंसी जैसा होगा।  हमने 1975 की इमरजेंसी नहीं देखी। पर यह इमरजेंसी से कुछ ज्यादा स्वास्थ्य इमरजेंसी। एक अदृश्य वायरस ने पूरी दुनिया को तबाह कर दिया है। मंदिर में रहने वाले भगवान से कोई उम्मीद नहीं। उनके दरवाजे भी बंद चुके हैं। देश के सारे प्रमुख मंदिरों के पट बंद किए जा चुके हैं।
चलों चलें ये शहर हुआ बेगाना...

24 मार्च की रात को दफ्तर से लौटते वक्त एनएच नौ पर देखा बड़ी संख्या में लोग सामान लिए हुए पैदल पैदल अपने घर जा रहे थे। वाहन बंद होने पर लोग कई सौ किलोमीटर दूर अपने घर पैदल चलकर जाने को मजबूर हैं। ये ऐसे लोग हैं जिनका दिल्ली में कोई स्थायी आशियाना नहीं है। काम बंद होने के बाद रोटी के लाले पड़ गए हैं। पीठ पर बैग लादे हाईवे पर चलते हुए कई लोग दिल्ली से बरेली पहुंच गए। कई इससे भी आगे। रास्ते में खाने की दुकाने बंद। पीने का पानी भी मयस्सर नहीं।

देश में 9.38 लाख शहरों में बेघर लोग रहते हैं। ये जानकारी सरकार ने संसद में दी है। पर बेघरों की वास्तविक संख्या इससे कहीं ज्यादा होगी। आखिर इस बंदी में वे लोग कहां रहेंगे। कैसे बसर करेंगे। 24 मार्च को हमारे दफ्तर ने कोशिश की। लोग घर से काम करें। हमें कंप्यूटर सिस्टम दिए गए हैं, ताकि हम घर से ही काम कर सकें।
 - vidyutp@gmail.com
 ( LOCK DOWN DAYS, DELHI, GAZIABAD ) 

Sunday, 5 April 2020

भाजपा - 40 साल का सफर


भारतीय जनता पार्टी की स्थापना 6 अप्रैल 1980 को हुई। वास्तव में यह श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा 1951 में स्थापित भारतीय जन संघ से निकली हुई नई पार्टी थी। 1977 में आपातकाल के बाद जनसंघ का विलय जनता पार्टी में हो गया था। 
पुराने जनसंघ से नई पार्टी
सन 1980 के शुरुआत में हिंदुवादी विचारों वाले पुराने जनसंघ के नेताओं अटल बिहारी, वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी भैरो सिंह शेखावत आदि ने जनता पार्टी से अलग होकर भारतीय जनता पार्टी का गठन किया। पार्टी ने गांधीवादी समाजवाद को स्वीकार किया और इसका चुनाव चिन्ह तय हुआ कमल का फूल। पार्टी के मुख पत्र का नाम कमल संदेश है।

वाजपेयी पहले अध्यक्ष
1980 में ही मुंबई में पार्टी का पहला अधिवेशन हुआ। इसमें अटल बिहारी वाजपेयी पहले अध्यक्ष चुने गए। वे 1986 तक पार्टी के अध्यक्ष बने रहे।

दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी
18 करोड़ प्राथमिक सदस्यों के साथ आज भाजपा दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है।

बड़ी होती गई जीत
02 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल की भाजपा ने सन 1984 के लोकसभा चुनाव में। यह पार्टी का पहला लोकसभा चुनाव था।

85 सांसद जीतकर पहुंचे भाजपा के 1989 के चुनाव में। इस बार भाजपा वीपी सिंह की अगुवाई में बने राष्ट्रीय मोर्चा को बाहर से समर्थन दे रही थी।

119 सीटों पर जीत हासिल कर पार्टी 1991 में प्रमुख विपक्षी दल की भूमिका में आ गई। इसी साल पार्टी ने उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश में अपनी सरकारें बनाई।

1996 लोकसभा चुनाव में भाजपा 163 सीट जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में देश में बीजेपी की सरकार बनी, हालांकि बहुमत नहीं होने की वजह से 13 दिनों में सकार गिर गई।

1998 के चुनाव में बार फिर से 182 सीट के साथ सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी। वाजपेयी दोबारा से देश के प्रधानमंत्री बने, हालांकि पूर्ण बहुमत नहीं होने की वजह से एक बार फिर सरकार गिर गई 

1999 के चुनाव में भाजपा ने आम चुनाव घटक दलों के सहयोग से जीता, अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार बनी और पांच साल तक सरकार चली।

2004 और 2004 के चुनाव में पार्टी सत्ता में नहीं आ सकी।

282 सीटों पर जीत हासिल की पार्टी ने साल 2014 के चुनाव में और नरेंद्र मोदी की अगुवाई में सरकार बनी।

305 सीटें जीतकर भाजपा ने 2019 में एक बार फिर दुनिया के दूसरे सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में सरकार बनाई। नरेंद्र मोदी लगातार दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने वाले पहले गैर कांग्रेसी नेता बने।


राम मंदिर आंदोलन और भाजपा
1989 में भाजपा ने देश भर में अयोध्या में राम मंदिर बनाए जाने को लेकर आंदोलन शुरू किया। लालकृष्ण आडवाणी की अगुवाई में 1990 में सोमनाथ से अयोध्या के लिए देशव्यापी रथयात्रा निकाली गई। इससे भाजपा का वोट  बैंक बढ़ा। 1993 से 1998 तक लालकृष्ण आडवाणी पार्टी के अध्यक्ष रहे। उनके कार्यकाल में पार्टी का व्यापक जनाधार बढ़ा।
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Monday, 30 March 2020

अंतहीन सड़क पर पैदल (कविता)

छह साल की मुनिया पकड़े हाथ
अंतहीन सड़क पर चला जा रहा
है बृजमोहन
न जाने की कितने दिन में
पहुंचेगा अपने गांव
उस शहर को वह पीछे
छोड़ आया है जहां
दिन भर पसीना बहाकर
जुटाता था अपने घर वालों के लिए
निवाला।

लोगों ने बताया था किसी
अदृश्य बीमारी से दुनिया डरी हुई है
तब बहुत याद आई 
अपने गांव की मिट्टी की
तो निकल पड़ा खुली सड़क पर

नन्ही मुनिया बोल रही
बापू मुझसे और चला नहीं जा रहा
न जाने कितनी दूर है 
अभी हमारा गांव

अपनी पोटली से थोड़ा
चबेना निकालकर मुनिया को देता है
चलते रहो बिटिया
एक दिन जरूर पहुंच जाएंगे
अपने गांव....

-         ------- विद्युत प्रकाश मौर्य


Sunday, 29 March 2020

रोक लो उन्हें... ( कविता)



उन्होंने ही तो
तुम्हारे घर की दीवार जोड़ी थी
जिस आलीशान अपार्टमेट में तुम
आज रहते हो
उसका रंग रोगन
उन्होंने ही तो किया था
तुम्हारे घर की बिजली जब जब
खराब है जाती है
तुम्हारे नालियां जब जब 
जाम हो जाती हैं
वे ही तो ठीक करने आते हैं।

इस महानगर में कदम कदम पर
तुम्हारी सहायता के लिए
वे खड़े मिल जाते थे।
आज उनके लिए ये शहर
बेगाना क्यों हो गया है।

अपनी छह साल की बिटिया
की उंगली पकड़े वे
एक हजार मील की पैदल यात्रा कर
अपने गांव को जाने के लिए
मजबूर क्यों हुए

आखिर उनका देश कहां है...
तुम जो रोटी खाते हो उसमें
उनका भी तो हिस्सा
रोक लो उन्हें
कि उनके बिना तुम्हारा
ये सिस्टम नहीं चल पाएगा।

एक दिन तुम्हें जब फिर
उनकी जरूरत पड़ेगी तो
वे तब बहुत दूर जा चुके होंगे।
हां रोक लो उन्हें

--- विद्युत प्रकाश मौर्य
( 29 मार्च 2020 )

Friday, 27 March 2020

तालाबंदी के बीच गांव की याद (कविता )


देश भर में तालाबंदी के बीच
दिल्ली के बहुमंजिले इमारत के छोटे से
फ्लैट में कैद होना...
ये किसी कारावास की तरह ही तो है...
आप खिड़की से झांक सकते हैं
पर बाहर कदम नहीं रख सकते।

इस अकेलेपन के बीच
बचपन का गांव खूब याद आया
नहर के किनारे का पीपल का पेड़
जेठ की दुपहरी में जिसकी छांव
भली लगती थी
कुएं के किनारे वो नीम का पेड़ भी
अब भी वहीं खड़ा है...

पर हम चाह कर भी
अभी वहां नहीं जा सकते।  

गांव में चाचा से बात हुई फोन पर
उन्होंने कहा, सब ठीक है बबुआ
यहां कोई परेशानी नहीं है
आंगन की धूप में बैठो या फिर खेत खलिहान में
घूम के आ जाओ
अपना हाल सुनाओ
कैसे हाल सुनाऊं
मेरे पास आज शब्दों की दरिद्रता है...
भाव शून्य हैं...
मैं ही बड़ा गरीब हूं
चाचा तुम ही अमीर हो...

-         --- विद्युत प्रकाश मौर्य

Tuesday, 10 March 2020

बाबा साहेब आंबेडर के जीवन पर नई दृष्टि ( पुस्तक )

वैसे तो भीमराव आंबेडकर के जीवन पर कई किताबें लिखी गई हैं। पर क्रिस्तोफ जाफ्रलो द्वारा लिखी गई पुस्तक भीमराव आंबेडकर – एक जीवन एक शोधपरक पुस्तक है। मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई इस पुस्तक का हिंदी अनुवाद योगेंद्र दत्त ने किया है।

ये पुस्तक कोरी जीवनी नहीं है। लेखक ने खास तौर पर बाबा साहेब के जाति उन्मूलन के संघर्ष पर प्रकाश डाला है। उनके इस पक्ष का अपने तरीके से विश्लेषण किया है। डॉक्टर आंबडेकर हिंदूओं में दलित जाति से आने वाले पहले ऐसे नेता थे जिन्होंने पश्चिम के देशों में जाकर उच्च अध्ययन किया था। पीएचडी करने के बाद उनका व्यक्ति एक महान अर्थशास्त्री के तौर पर उभरा। पर पश्चिमी देशों में अध्ययन के बावजूद वे अपने जड़ों से जुड़े रहे। देश के दलित समाज के जीवन में बेहतरी लाने के लिए वे ता उम्र लड़ते रहे। लेखक प्रस्तावना में लिखते हैं कि पुस्तक पेश करने का आशय कोरी जीवनी लिखने का नहीं है। वे बाबा साहेब के समाजशास्त्रीय चिंतन को पुस्तक में प्रमुखता से रखते हैं। यह किताब बाबा साहेब के जीवन का कोई क्रमवार ब्योरा नहीं पेश करती है। पर यह एक पठनीय पुस्तक है।

पुस्तक आंबेडकर के व्यक्तित्व की व्यवहार कुशलता पर भी प्रकाश डालती है। उनके गांधी जी और अंग्रेजों से रिश्तों पर भी लेखक ने कलम चलाई है। अंतिम अध्याय उनके सामूहिक धर्मांतरण कर बौद्ध धर्म अपनाने पर प्रकाश डाला गया है।

तकरीबन 200 पृष्ठों की पुस्तक एक शोधपरक अध्ययन है। पुस्तक खासतौर पर आंबेडकर द्वारा समतामूलक समाज बनाने के प्रयासों पर फोकस करती है। लेखक मानते हैं कि भारत में आंबेडकर की लंबे समय तक सुनियोजित तरीके से उपेक्षा की गई। पाठ्यक्रमों में उनके विचारों को ज्यादा तरजीह कभी नहीं दी गई। अगस्त 1999 में जाकर इतिहास के पुस्तकों में उनके बारे में दो पृष्ठ जोड़े गए। यह बदलाव भी देश में दलित आंदोलन के कारण हो सका।

पुस्तक – भीमराव आंबेडकर एक जीवन
लेखक – क्रिस्तोफ जाफ्रलो
अनुवाद – योगेंद्र दत्त
प्रकाशक -  राजकमल प्रकाशन
मूल्य – 650 रुपये ( हार्ड बाउंड )

-         विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
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Monday, 10 February 2020

मिट्टी की खुशबू में रची बसी कहानियां

ब्रह्मभोज नाम है इस कथा संग्रह का। इसमें कुल 17 कहानियां हैं। इन सबका परिवेश बिहार झारखंड का गांव गिरांव है। पर लेखक अपनी शैली से आपको बांधे रखते हैं। कहने शैली सहज और चमत्कारी है। पहली कहानी पकड़वा दमदार है। यह बिहार के पकड़वा विवाह पर आधारित है।

पुस्तक के लेखक सचिदानंद सिंह पेशे से बैंकर हैं । सेंट स्टीफेंस में पढ़ाई की है। पर उनकी कहानियों में बिहार झारखंड की मिट्टी की खुशबू रची बसी है। उनकी कहानियों के पात्र आपके अड़ोस पड़ोस में रहने वाले लोग हैं। आप जब कहानियां पढते हैं तो इन पात्रों के संग चलने लगते हैं। कहानियां मौलिकता से रची बसी हैं। वे आपका खूब मनोरंजन भी करती हैं और बिहार झारखंड के लोगों से आपका परिचय भी कराती हैं।

पुस्तक : ब्रह्मभोज
प्रकाशक : अनुज्ञा बुक्स
मूल्य : 200 रुपये

: विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com 




Wednesday, 22 January 2020

भारतीय रेल के अनोखे पुल


भारतीय रेल के अनोखे पुल विमलेश चंद्र की नई पुस्तक है। यह आपको देश के सौ से ज्यादा रेल पुलों के बारे में बताती है। यह पुस्तक आपको रेलवे के इतिहास की रोचक दुनिया में  ले जाती है। क्या आपको पता है कि रेलवे के कई पुल 150 साल से ज्यादा पुराने हैं।
दरअसल रेलगाड़ियों से सारे लोग सफर करते हैं। पर रेलवे के विकास की कहानी से ज्यादातर लोग ज्यादा अनजान रहते हैं। अहमदाबाद में पदस्थापित रेलवे में अधिकारी विमलेश चंद्र रेलवे पर कई पुस्तकें लिख चुके हैं। पर उनकी नई पुस्तक रेलवे के पुलों पर केंद्रित है। रेलवे में वैसे तो हजारों पुल हैं। पर इनमें से कई पुल तकनीक के आदर्श नमूना हैं। कई जगह रेल के साथ सड़क पुल भी बने हुए हैं। जैसे आपने वाराणसी और मुगलसराय के बीच गंगा नदी का पुल देखा होगा। इसी तरह पटना से पहले सोन नदी पर कोईलवर का ऐतिहासिक पुल है। ये पुस्तक आपको दक्षिण से लेकर उत्तर भारत के तमाम ऐसे पुलों से आपका परिचय कराती है। इन पुलों को निर्माण तकनीक और उनकी खासियत पर नजर डालती है। रेलवे में रूचि रखने वालों के लिए यह एक संग्रहणीय पुस्तक है।
प्रकाशक -  पुस्तक का प्रकाशन भारत सरकार की संस्था नेशनल बुक ट्रस्ट ने किया है। साल 2019 में आई पुस्तक 135 रुपये में उपलब्ध है। अगर एनबीटी आप बुक क्लब के मेंबर हैं तो आपको 20 फीसदी की छूट भी मिलेगी। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( RAIL, BRIDGE, BOOK, NBT, BIMLESH CHANDRA ) 



Monday, 6 January 2020

प्रेम नाम है मेरा - प्रेम चोपड़ा


प्रेम नाम है मेरा - प्रेम चोपड़ा, वैसे तो ये बड़ा चर्चित डॉयलाग है। पर हिंदी फिल्मों के मशहूर खलनायक प्रेम चोपड़ा की संस्मरणात्मक आत्मकथा की पुस्तक इसी नाम से हिंदी में प्रकाशित हुई है। प्रेम चोपड़ा अब 84 साल के हो चुके हैं। हिंदी से लेकर हॉलीवुड तक 400 फिल्मों में अभिनय करने वाले प्रेम चोपड़ा पर प्रकाशित ये पुस्तक हिंदी में यश पब्लिकेशन ने प्रकाशित की है। इसी पुस्तक के विमोचन के लिए प्रेम चोपड़ा 5 जनवरी 2020 को दिल्ली के प्रगति मैदान में चल रहे विश्व पुस्तक मेले में पधारे। उन्हे देखते ही कार्यक्रम में हर उम्र के लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। 
प्रेम चोपड़ा ने भी किसी को निराश नहीं किया। लोगों के सवालों के खूब जवाब दिए। अपने जीवन से जुड़े कई किस्से सुनाए। अपने लोकप्रिय संवाद सुनाए। - दुनिया जानती है मैं कितना शरीफ आदमी हूं। 

प्रेम चोपड़ा पर ये पुस्तक उनकी बेटी रितिका नंदा ने लिखी है। रितिका जाने माने उपन्यासकार गुलशन नंदा की बहू हैं। पुस्तक प्रेम चोपड़ा की फिल्म इंडस्ट्री में संघर्ष की गाथा बड़े रोचक अंदाज में बयां करती है। हालांकि प्रेम चोपड़ा हिंदी फिल्म जगत में राजकपूर और प्रेम नाथ जैसे नामचीन लोगों के रिश्तेदार थे। पर उन्हें फिल्मों में जगह बनाने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा। पुस्तक उनके संघर्ष पर भी प्रकाश डालती है।

प्रेम चोपड़ा की पहचान हिंदी फिल्मों के बड़े खतरनाक विलेन के तौर पर है। जिसके पर्दे पर आते ही लोगों को साजिश की बू आने लगती है। लोग उनसे परदे पर देखते ही नफरत का भाव मन में ले आते हैं। पर प्रेम चोपड़ा निजी जिंदगी में उस रजत पट की छवि से काफी अलग हैं।  
पुस्तक मेले में प्रेम चोपड़ा के साथ बैठे थे मशहूर पत्रकार राजीव शुक्ला, जिन्होंने प्रेम चोपड़ा के व्यक्तित्व से जुड़े कई अनछुए पहलुओं पर प्रकाश डाला। हिंदी सिनेमा में रुचि रखने वालों के लिए संग्रहणीय और पठनीय पुस्तक है - प्रेम नाम है मेरा। आप इसे प्राप्त कर सकते हैं यश पब्लिकेशंस से। 
प्रकाशक का फेसबुक पेज देखें - - https://www.facebook.com/yashprakashan/

- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com   


Wednesday, 20 November 2019

महंगा हो जाएगा भूटान घूमना


भारत के लोगों के लिए भूटान घूमना महंगा हो सकता है। भूटान क्षेत्रीय देशों से पर्यटकों के आने पर शुल्क लगाने की योजना बना रहा है। इनमें मालदीव और बांग्लादेश के साथ भारत भी शामिल है। अब तक इन देशों को भूटान में पर्यटन के लिए किसी भी तरह का शुल्क नहीं देना पड़ता था।
पर्यटन नीति के ड्राफ्ट को अगले महीने तक भूटानी मंत्रिमंडल अंतिम रूप दे देगी। इस सिलसिले में दिल्ली में भूटान के विदेश मंत्री तांदी दोरजी ने 18 नवंबर 2019 को विदेश मंत्री एस जयशंकर से मुलाकात कर बातचीत की।

भूटान की पर्यटन परिषद (टीसीबी) के तैयार किए मसौदे के मुताबिक नई शुल्क का प्रस्ताव क्षेत्र से पर्यटनों की बढ़ती तादाद के मद्देनजर पेश की गई है। बाकि देशों की तुलना में भारतीय, बांगलादेशी और माल्दीव से आने वाले पर्यटकों को किसी तरह का भुगतान करना जरूरी नहीं था और वे बिना वीजा के भी भूटान घूमने जा सकते थे।  नई नीति के अनुसार अब इन पर्यटकों को सस्टेनेबल डेवलपमेंट फीस और परमिट प्रोसेसिंग फीस अदा करना होगा।
1.80 लाख भारतीय एक साल में भूटान गए - 
2018 में भूटान जाने वाले पर्यटकों की तादाद 2 लाक 74 हजार थी। इसमें से 2 लाख क्षेत्रीय पर्यटक थे जिसमें से 1 लाख 80 हजार पर्यटक केवल भारत से गए थे।

भूटानी सरकार क्षेत्रीय पर्यटकों को ऑनलाइन पेश किए जाने वाले कम किराए के ठहरने की जगह का उपयोग करने से रोकना चाहती है क्योंकि इससे गैर-पंजीकृत गेस्ट हाउस और होम स्टे की तादाद में बढ़ोतरी हो रही है।

स्मारकों का शुल्क भी महंगा होगा
भूटान पर्यटन परिषद (टीसीबी) ने देश के विभिन्न स्मारकों में प्रवेश शुल्क को जनवरी 2020 से बढ़ाने का फैसला लिया है। पारो जिले स्थित टाइगर नेस्ट के विजिटिंग फी को 7.14 डॉलर से बढ़ाकर 14.25 डॉलर किया जाएगा। जबकि ताशिचो-जोंग, मेमोरियल चोर्टेन और सहित अन्य स्मारकों में यह फी 4.28 डॉलर से 7.14 डॉलर तक बढ़ा दिया जाएगा। हालांकि छात्रों को इस शुल्क में 50 प्रतिशत की छूट दी जाएगी।
 - विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com