Tuesday, 22 March 2011

टीवी पर क्राइम शो - जुर्म की इंतिहा


एक समय आया था जब समाचार चैनलों पर प्राइम टाइम में सिर्फ अपराध पर आधारित शो ही दिखाई देते थे। हालांकि अब जुर्म का ज्वार कम हो चुका है। लेकिन खबरिया चैनल अब भी क्राइम की खबरों को बिकाउ माल मानते हैं बिना इसका ख्याल रखे हुए कि इसका समाज पर कैसा प्रभाव पड़ेगा। आजतक पर जुर्म, स्टार न्यूज पर सनसनी, रेड अलर्ट, इंसाफ का तराजू, एनडीटीवी पर डायल 100, जी न्यूज पर क्राइम रिपोर्टर, आईबीएन 7 पर क्रिमिनल, ईटीवी पर दास्ताने जुर्म। एक वक्त ऐसा आया था कि अगर आप रात 10 से 11 बजे तक जिस किसी समाचार चैनल को पर जाएं आपको क्राइम बुलेटिन ही देखने को मिलता था।
अब एक नजर डालते हैं भारतीय टेलीविजन में अपराध पर आधारित शो के शुरूआत पर। इसका श्रेय निश्चय ही सुहैब अहमद इलियासी को जाता है जो जीटीवी पर सबसे पहले इंडियाज मोस्ट वांटेड जैसा शो लेकर आए। जामिया मीलिया इस्लामिया के स्नातक सुहैब अहमद इलियासी को भारतीय टीपी पर क्राइम शो बनाने की प्रेरणा लंदन के चैनल फोर पर दिखाए जाने वाले एक शो से मिली थी। तब भारत में 24 घंटे का कोई समाचार चैनल नहीं आया था लेकिन 1997 में ये शो टेलीविजन पर काफी लोकप्रिय हुआ। इंडियाज मोस्ट वांटेड के हर एपीसोड में किसी एक मोस्ट वांटेड अपराधी पर केंद्रित स्टोरी की जाती थी। इसके पीछे व्यापक रिसर्च होता था। अपराधी की असली तस्वीर के साथ उसकी अपराध की कहानी को महिमामंडित करके दिखाया जाता था। जीटीवी का ये शो काफी लोकप्रिय हुआ। इसकी लोकप्रियता और बढ़ गई जब इंडियाज मोस्ट वांटेड के कारण कई बड़े अपराधी पकड़ लिए गए। बाद में यही धारावाहिक फ्यूजिटिव मोस्ट वांटेड के नाम से दूरदर्शन पर भी प्रसारित हुआ। इलिसासी इसी शो को कुछ सालों बाद इंडिया टीवी पर भी लेकर गए।
जब भारतीय बाजार में कई समाचार चैनल आ गए तो लगभग हर चैनल अपने शाम के टाइम बैंड में कोई न कोई क्राइम शो लेकर आने लगा। जी न्यूज का क्राइम रिपोर्टर बहुत लोकप्रिय हुआ लेकिन उसकी टैगलाइन लोगों को खबरदार करती थी- चैन से सोना है तो जाग जाइए...ये शो काफी हद तक बच्चों के लिए डरावना था। क्राइम की हर कहानी को बाजार के चालू मुहावरे, बिल्कुल नाटकीय और फिल्मी स्क्रिप्टिंग, मामूली से अपराध कथा को भी चासनी लगाकर कहने की कला से ये सब कुछ टीवी पर पेश किया जाने लगा। अगर क्राइम से जुड़ी घटना के पर्याप्त विजुअल नहीं हों तो हर कहानी का नाट्य रूपांतरण होने लगा। स्टार न्यूज पर आने वाले शो सनसनी का टैगलाइन था- सन्नाटे को चिरती हुई सन्न कर देगी सनसनी। यानी हर ओर ऐसे शो थे जो आपके रातों की नींद को हराम कर दें। आप इतना जाग जाएं कि आपको रातों को ठीक से नींद न आए। इन कार्यक्रमों को देखकर कई बार बच्चों के मन में डर भर जाता है तो बड़ों के मन में भी घृणा और जुगुप्सा का भाव आता है। इन अपराध शो बनाने वालों के लिए हर घटना एक मसाला की तरह होती है जिसपर त्वरित गति से ये छोटी सी मर्डर मिस्ट्री वाली फिल्म बनाने की कोशिश करते हैं। ऐसे शो में हॉरर म्यूजिक, अपराध कथा वाली फिल्मों के फुटेज आदि का सहारा लेकर भी कहानी को पूरा सनसनीखेज बनाने की कोशिश की जाती है।
हिंदी फिल्मो में हॉरर मूवी जैसा कथानक लेकर आते हैं ये क्राइम शो। कई बार ये किसी जमाने की लोकप्रिय पत्रिकाएं मनोहर कहानियां और सत्यकथा की कमी को भरते भी नजर आते हैं। समाचार चैनल आईबीएन 7 ने तो अपने क्राइम शो क्रिमिनल में एक बार बड़ा भोड़ा प्रयोग किया। इस शो की एंकरिंग एक महिला से कराया जाने लगा। ये महिला पुराने फिल्मों की वैंप को कॉपी करती हुई अपराध कथा को सुनाती थी। हालांकि इस शो की इतनी आलोचना हुई कि महिला एंकर को क्राइम शो से हटाना पड़ा। कुछ समय बाद आईबीएन 7 ने अपने क्राइम शो क्रिमिनल को भी बंद करने की फैसला लिया। ये चैनल का समाज के हित में एक बुद्धिमतापूर्ण फैसला कहा जा सकता है। एक समय में तमाम समाचार चैनलों के बीच अपराध कथा को महिमामंडित करके दिखाने की होड़ सी लग गई थी। जी न्यूज के क्राइम से शो एंकर राघवेंद्र मुदगिल तो अभिनय की पृष्ठभूमि से आते थे। वे अपनी एंकरिंग में अपने अभिनेता होने की छाप छोड़ने की पूरी कोशिश करते थे।
वहीं इंडिया टीवी ने अपने क्राइम शो नया कलेवर दिया। एसीपी अर्जुन। इस शो में एंकर एक एसीपी की वर्दी में आता है और अपराध की सारी घटनाओं को एक एक कर सुनाता है। न्यूज चैनलों के सभी क्राइम शो ये बताने की कोशिश करते हैं कि उनका मकसद अपराध को समाज से खत्म करना है। लेकिन कई बार ऐसा लगता है कि इन शो में विस्तार से बताए गए अपराध के तौर तरीकों से नए अपराधी और प्रेरणा लेते हैं और बजाए अपराध घटने की बढ़ता जाता है। जैसे आपको याद होगा कि शोले फिल्म देखने के बाद बड़ी संख्या में कई अपराधियों ने ये स्वीकार किया था कि उन्हें अपराध करने की प्रेरणा शोले फिल्म को देखकर मिली। जाहिर सी बात की न्यूज चैनलों पर कोई ऐसा शो बाद में नहीं आया जो इंडियाज मोस्ट वांटेड की तरह अपराधियों को पकड़वाने में पुलिस की मदद कर सके। लेकिन एक वक्त ऐसा जरूर आया जब अपराध पर आधारित शो की टीआरपी गिरने लगी। इसके बाद एक एक करके प्राइम टाइम से अपराध के ये शो गायब होने लगे। हालांकि अभी भी तमाम चैनल क्राइम शो बना रहे हैं लेकिन अपराध पहले जैसा बिकाउ माल नहीं रह गया है।
सोनी टीवी पर लंबे समय से अपराध पर आधारित एक शो सीआईडी का प्रसारण हो रहा है। इस शो में भी किसी सच्ची घटना को आधार बनाया जाता है। लेकिन सीआईडी की टीम हर वारदात की छानबीन करती है। कई सालों से चलने वाले इस शो ने भारतीय टेलीविजन के इतिहास में लोकप्रियता के झंडे गाड़े हैं। 


Sunday, 20 March 2011

छोटे परदे पर मध्यम वर्ग


क्योंकि सास भी कभी बहु थी, जैसे तमाम धारावाहिकों में उच्चवर्गीय परिवारों का ग्लैमर और उनके अहंकारों की टकराहट दिखाकर टीवी ने बड़ी संख्या में भले ही दर्शक बटोर लिए हों पर उसमें भारत का मध्यम वर्ग कहीं भी अपनी छवि नहीं देख पा रहा था। पर टीवी पर एक बार फिर से उस मध्यम वर्ग की वापसी होने लगी है। स्टार वन के दो धारावाहिक इंडिया कालिंग और ये दिल चाहे मोर जैसे धारावाहिक एक बार फिर लेकर आए हैं मध्यम वर्ग को। इंडिया कालिंग की चांदनी उसी मध्यम वर्ग की प्रतिनिधि है। चांदनी परिस्थितिवश जालंधर से मुंबई जाती है। वहां वह काल सेंटर में काम करती है। वह भले ही आधुनिक वातावरण में काम करती है, फराटे के साथ अंग्रेजी बोलना जानती है, पर वह अपने परंपरागत संस्कारों को भी नहीं भूली है। वह आगे बढ़ने के अपनी पुरानी रिवायतों को नहीं भूलना चाहती है। उसे हर रोज अपना जालंधर याद आता है। वह मुंबई में अपने बी जी बनाई सरसों की साग अपने साथिनों को भेंट करती है। वह काल सेंटर में भी पटियालवी सलवार सूट पहनती है। पर साथ ही अपनी सहकर्मी से कोंकणी सीखने की भी कोशिश करती है। दरअसल बहुत दिनों बाद टीवी पर एक अच्छा धारावाहिक देखने को मिला है जिसमें परंपरागत भारतीय मूल्यों की खुशबू है। कई साल पहले हम जाएं तो दूरदर्शन पर बुनियाद और हमलोग जैसे धारावाहिकों ने धूम मचाई थी। इन धारावाहिकों में भारतीय मूल्यों की बात रिफ्लेक्ट होती थी। बुनियाद का मास्टर हवेलीराम ऐसा चरित्र था जो अपने नैतिक मूल्यों की रक्षा की कोशिश में लगा हुआ था। उस चरित्र ने टीवी के तत्कालीन दर्शकों में अच्छी छाप छोड़ी। उसके बाद टीवी धारावाहिको में मुंबई के फिल्मों के अनुकरण की होड़ सी लग गई। कई धारावाहिकों ने कास्ट्यूम, सेटों की भव्यता में तो फिल्मों को भी पीछे छोड़ दिया। एकता कपूर ने जिस तरह के धारावाहिकों का ट्रेंड शुरू किया उनमें से अधिकांश में मध्यम वर्ग गायब था। अगर कोई मध्यम वर्ग का चरित्र आ भी गया तो वह उच्च वर्ग के लोगों के बीच जाकर उनके साथ संवाद स्थापित करने में ही व्यस्त हो जाता था। सोनी के धारावाहिक कुसुम को आम लड़की की कहानी कह कर प्रचारित किया गया था पर कुसुम की कहानी भी बाद में भटक कर रह गई। अब स्टार वन ने दो ऐसे धारावाहिक आरंभ किए हैं जिसके चरित्र भी हालांकि मुंबई भागते हैं। पर वहां मध्यम वर्ग मौजूद रहता है।
इंडिया कालिंग के बहाने जहां पंजाबी सभ्यता और संस्कृति को बड़ी मजबूती से इंट्रोड्यूस किया गया वहीं इसमें काल सेंटर का भी कल्चर है। किसी काल सेंटर के वातावरण पर बना यह पहला धारावाहिक है। इसमे काल सेंटर के अंदर के वातावरण को गंभीर लहजे में पेश किया जा रहा है। कहा नहीं जा सकता कि आने वाले दिनों में यह धारावाहिक क्या रुप लेगा पर फिलहाल टीवी पर ऐसे धारावाहिक की जरूरत महसूस की जा रही थी। वहीं स्टार वन के दूसरे धारावाहिक में एक लड़का और एक लड़की मुंबई भागते हैं दोनों की संयोगवश मुलाकात हो जाती है। उसके बाद कहानी में नाटकीय सिचुएशन बनते हैं। भारत में सपने लेकर मुंबई भागने का सिलसिला बहुत ही पुराना है। यही ट्रेंड इस धारावाहिक में नाटकीय ढंग से आरंभ हुए हैं। टीवी दर्शकों में सबसे बड़ा वर्ग मध्यम वर्ग ही है। पर टीवी के तमाम चैनलों के बीच इस तरह के धारावाहिकों का अभाव सा है जिसमें आम आदमी अपना शहर और अपना चेहरा कहीं देख सके। इसी कमी को ये धारावाहिक कहीं न कहीं पूरा करते हुए नजर आ रहे हैं।


Friday, 18 March 2011

भारतीय बाजार में विदेशी चैनल


जीटीवी के आने के पहले तक भारतीय बाजार में दूरदर्शन का एकाधिकार था। जीटीवी के आने के साथ ही सेटेलाइट चैनलों का दौर शुरू हुआ, और इसके साथ ही शुरू हुआ केबल टीवी का युग क्योंकि शुरूआती दौर में लोगों के घरों तक पहुंच का माध्यम सिर्फ केबल नेटवर्क ही था। भारत में केबल टीवी के युग की शुरूआत के साथ ही धीरे धीरे भारतीय बाजार में विदेशी चैनलों पहुंचने लगे। यानी भारत में शुरू हुआ सूचना सम्राज्यवाद का नया दौर। विदेशी चैनलों की नजर भारत की बड़ी आबादी पर है जो न सिर्फ उनके लिए बड़ा दर्शकों का बाजार है बल्कि विज्ञापनों का भी बड़ा बाजार है। शुरूआती दौर में देश में सबसे ज्यादा दर्शकों तक पहुंच सिर्फ दूरदर्शन की ही थी इसलिए विदेशी चैनल का विज्ञापन बाजार भी सीमित था, लेकिन जैसे जैसे इन विदेशी चैनलों की ज्यादा घरों में पहुंच बढ़ती जा रही है ये भारत के कुल विज्ञापन बाजार में अपनी हिस्सेदारी भी बढ़ाते जा रहे हैं।
भारतीय बाजार में घुसपैठ बनाने वाला सबसे पहला विदेशी चैनल स्टार समूह है। रूपर्ट मर्डोक ने स्टार बैनर तले नए चैलनों की शुरूआत ही खास तौर पर एशियाई देशों के लिए की थी। स्टार यानी सेटेलाइट टेलीविजन फॉर एशियन रीजन (STAR)। रूपर्ट मर्डोक विश्व के मीडिया बाजार में सबसे अग्रणी लोगों में गिने जाते हैं। वे विश्व के कई बड़े अखबारों और टीवी चैनलों के मालिक हैं। उनके बेटे जेम्स मर्डोक ने उनकी बिजनेश को और नया आयाम प्रदान किया है। ट्वेंटिएथ सेंटुर फॉक्स जैसी फिल्म निर्माण कंपनी और फॉक्स टीवी जैसे कई कंपनियों के मालिक रूपर्ट मर्डोक का मुकाबला दुनिया की दूसरी बड़ी मीडिया कंपनी सीएनएन समूह के मालिक ट्रेड टर्नर के टर्नर नेटवर्क से है। भारत में स्टार टीवी का आगमन जीटीवी समूह में हिस्सेदारी के साथ हुआ। लेकिन कुछ ही सालों में स्टार समूह को भारत में दर्शकों का बड़ा बाजार नजर आया। ऐसे में स्टार की पहली कोशिश जीटीवी की पूरी हिस्सेदारी खरीदने की रही। जैसा कि वे दुनिया के कई देशों में करते आए थे। स्टार समूह के विस्तार करने का तरीका ही कुछ ऐसा रहा है। जैसे बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है ठीक उसी तर्ज पर ये तमाम चलते हुए टीवी चैनल और समाचार पत्रों में हिस्सेदारी खरीदते हैं बाद में उस पर मालिकाना हक कायम करने पर हिस्सेदारी खरीदते हैं। लेकिन भारत में जीटी मालिकाना हक जमाने की कोशिश असफल हो जाने के बाद स्टार समूह ने भारतीय बाजार में आने का फैसला लिया। सबसे पहले भारत में आया स्टार प्लस चैनल। स्टार प्लस मनोरंजन चैनल था। जिस पर शुरूआती दौर में बोल्ड एंड द ब्यूटी फुल और सांताबारबरा जैसे धारावाहिक दिखाए जाते थे। इसके बाद आए स्टार मूवीज, स्टार वर्ल्ड, स्टार स्पोर्ट्स। बीबीसी वर्ल्ड और ईएसपीएन चैनल का भारत में वितरण अधिकार स्टार समूह के पास था।
लेकिन स्टार प्लस चैलन पर विदेशी धारावाहिकों को डब करके हिंदी में दिखाने या फिर उनके मूल रूप से अंग्रेजी में प्रसारित किए जाने पर देश के बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंचना संभव नहीं था। इसलिए स्टार प्लस ने अपने चैनल पर लोकल प्रोग्रामिंग को बढावा दिया। यानी स्टार प्लस पर शुरू हुआ भारत में बने हिंदी धारावाहिकों का दौर। इसके साथ ही स्टार समूह ने अपने चैनल पर सुबह में गुड मार्निंग इंडिया तो शाम को खबरों का शो आरंभ किया। स्टार प्लस को खबरें और न्यूज बेस्ड शो बनाने काम भारत में एनडीटीवी जैसी कंपनी करती थी। लेकिन बाद में स्टार समूह ने भारत में हिंदी में अलग से समाचार चैनल स्टार न्यूज आरंभ किया। लेकिन भारत सरकार के कानून के तहत समाचार चैनल या समाचार पत्र में कोई विदेशी कंपनी 26 फीसदी से ज्यादा निवेश नहीं कर सकती। इसलिए स्टार समूह को अपने स्टार न्यूज चैनल के अलग से कंपनी बनानी पड़ी और इस कंपनी में उसकी भारतीय हिस्सेदार आनंद बाजार पत्रिका समूह बनी। आनंद बाजार पत्रिका समूह इसी नाम से बांग्ला अखबार और अंग्रेजी के प्रतिष्ठित दैनिक टेलीग्राफ की मालिक है।
अब नजर डालते हैं स्टार समूह के दूसरे चैनलों पर मनोरंजन चैनलें की लोकप्रियता को देखते हुए स्टार ने स्टार वन नाम से एक और चैनल लांच किया। पुरानी फिल्मों के लिए स्टार का चैनल स्टार गोल्ड दर्शकों के सामने आया। स्टार समूह का दूसरा ब्रांड नाम स्काई भी है। स्काई नाम से स्टार की डीटीएच सेवा है। भारत में स्टार की डीटीएच सेवा टाटा समूह के साथ संयुक्त उपक्रम में टाटा स्काई नाम से है। अब स्टार समूह भारतीय दर्शकों के रीजनल बाजार में भी पहुंच गया है। मराठी में स्टार माझा, स्टार प्रवाह, तो बांग्ला में स्टार आनंद, दक्षिण भारत में स्टार विजय जैसे चैनल इसकी छतरी के नीचे हैं। भारत में फॉक्स टीवी और हिस्ट्री चैनल भी स्टार समूह के अंतर्गत है। इसके अलावा स्टार समूह दर्जनों दूसरे चैनलों का भारतीय बाजार में वितरण का भी काम देखती है। वितरण की दृष्टि से कई बार चैनल एक प्लेटफार्म से शिफ्ट कर दूसरे प्लेटफार्म भी चले जाते हैं।
अगर संगीत चैनलों की बात करें तो भारतीय बाजार में आने वाले दो प्रमुख चैनल एमटीवी और चैनल वी रहे। इन चैनलों ने भारतीय दर्शकों पर काफी गहराई से प्रभाव डाला। एमटीवी यानी म्यूजिक टेलीविजन का लक्षित दर्शक समूह 15 से 24 साल का युवा वर्ग है। चौबीस घंटे चलने वाले इस चैनल ने अपने एंकर और वीजे ( वीडियो जॉकी ) को सेक्सी और हॉटेस्ट इन द सिटी कह कर दर्शकों के सामने परोसा। जनवरी 1996 में भारतीय बाजार में आए एमटीवी पर देश की युवा पीढ़ी को गुमराह करने का आरोप भी बुद्धिजिवियों ने लगाया। लेकिन इसके साथ ही एमटीवी कल्चर की शुरूआत देश में हुई जिसका प्रभाव बॉलीवुड की फिल्मों पर भी देखने को मिलने लगा। हालांकि एमटीवी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी टॉम फ्रोस्टर का दावा है कि एमटीवी पर संगीतमय कार्यक्रम दिखाकर हम युवाओं को सेक्स और हिंसा से दूर ले जा रहे हैं। बाद में एमटीवी ने धीरे धीरे भारतीय बाजार के लिए भारतीय एंकरें और वीजे का चयन करना शुरू कर दिया। एमटीवी के प्रमुख प्रतिस्पर्धी चैनल म्यूजिक एशिया और चैनल वी हैं।
सोनी एंटरटेनमेंट ने पूरी तैयारी के साथ अगस्त 1995 में भारतीय बाजार में कदम रखा। आने वाले दो सालों में सोनी ने भारतीय बाजार में दर्शकों के बीच अच्छी जगह बना ली। सोनी के जर्मनी, आस्ट्रेलिया और दुनिया के अलग अलग देशों  में अलग नामों से चैनल चल रहे हैं। लेकिन भारत में सोनी समूह का आगमन विशुद्ध भारतीय तानेबाने में हुआ। इसके सारे कार्यक्रम हिंदी में थे। अगर कोई विदेशी धारावाहिक था तो वह हिंदी में डब था। नया लुक नया बुक मुहावरे के साथ सोनी ने आई ड्रिम आफ जिमी नामक लोकप्रिय कामेडी शो को हिंदी में डब करके पेश किया। इसके साथ ही बुगी वुगी, बिंदास बोल, ताक धिनाधिन जैसे शुरूआती कार्यक्रम सोनी पर खासे लोकप्रिय हुए। सोनी ने अपने हर कार्यक्रम को प्रोडक्ट की तरह लांच करने की नीति अपनाई। इसके साथ ही भारत में दिखाई जाने वाली मनोरंजक घटनाओं की भी मार्केटिंग सोनी ने की। जल्द ही सोनी जीटीवी के बाद देश का दूसरा लोकप्रिय मनोरंजक चैलन बन गया। एक समय आया जब सोनी अपने कार्य़क्रमों की बदलौत नंबर वन मनोरंजन चैलन बन गया जिसे कई सालों बाद स्टार प्लस ने नंबर वन की कुरसी से हटाया। सोनी समूह सोनी के अलावा सेटमैक्स मूवी चैनल, एएक्सएन अंग्रेजी मूवी चैनल का प्रसारण भारत में करता है। वहीं उसने श्री अधिकारी ब्रदर्स के लोकप्रिय चैनल सब टीवी को 2004 में खरीद लिया।
भारत में दिखाई देने वाला दूसरा प्रमुख समूह टर्नर नेटवर्क है। इसका न्यूज चैनल सीएनएन यानी केबल न्यूज नेटवर्क की शुरूआत खाड़ी युद्ध के दौरान हुई थी। सीएनएन की ख्याति पूरी दुनिया में दिन रात न्यूज दिखाने के कारण हुई थी। ये शुरूआती दौर से ही पे चैलन है। भारत में बाद में इसने आईबीएन समूह से समझौता कर सीएनएन आईबीएन नामक न्यूज चैनल शुरू किया। टर्नर समूह के दूसरे चैनल बच्चों के लिए कार्टून नेटवर्क है। शुरूआत में टीएनटी मूवीज और कार्टून नेटवर्क एक ही चैनल पर भारत में आए थे। यानी 12 घंटे मूवीज और 12 घंटे कार्टून बाद में ये दोनों स्वतंत्र चैनल बन गए। टीएनटी मूवीज पर हॉलीवुड की क्लासिक मूवीज का प्रसारण होता है।
एनबीसी एशिया और सीएनबीसी भारत में शुरूआत से ही पे चैनल के रूप में आए। एनबीसी को भारत में खासी लोकप्रियता नहीं मिल सकी, लेकिन सीएनबीसी ने बिजनेस चैनल के रूप में अच्छी लोकप्रियता हासिल की। अब सीएनबीसी का सीएनबीसी आवाज नामक हिंदी चैनल भी है। वहीं एनबीसी विश्व में बहुत लोकप्रिय चैनल है। इस चैनल पर प्रसारित होने वाला कार्यक्रम टू नाइट शो विद जॉय लिनो दुनिया भर में लोकप्रिय शो है। डेटलाइन एनबीसी, ओ लाला जैसे कार्यक्रम भी एनबीसी पर लोकप्रिय हैं। एनबीसी यानी नेशनल ब्राडकास्टिंग कंपनी दुनिया की जानी मानी कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक की पेशकश है।
डिस्कवरी उन विदेशी चैनलों में है जो भारतीय दर्शकों में तेजी से लोकप्रिय हुआ। डिस्कवरी समूह के भारत में डिस्कवरी, एनीमल प्लेनेट, ट्रेवेल एंड लिविंग, डिस्कवरी साइंस जैसे चैनल प्रसारित हो रहे हैं। डिस्कवरी भी भारतीय बाजार में पहले दिन से इनक्रप्टेड सिग्नल वाला चैनल था जो जल्द ही पे चैनल में बदल गया। ( डिस्कवरी के बारे में ज्यादा जानकारी शैक्षिक चैनल वाले अध्याय में)
भारत में हिंदुस्तान टाइम्स समूह और लंदन के पियरन समूह, कार्लटन समूह ने मिलकर होम टीवी की शुरूआत की। होम टीवी में मनोरंजन धारावाहिकों के अलावा समाचार और न्यूज बेस्ड प्रोग्रामिंग के लिए भी जगह थी। होम टीवी पर अम्मा एंड फेमिली जैसे धारावाहिक काफी लोकप्रिय भी हुए लेकिन कुछ ही सालों में ये चैनल बंद हो गया।
समाचारों और सामयिक कार्यक्रमों पर केंद्रित चैनल बीबीसी वर्ल्ड भारतीय दर्शकों के लिए शुरू से उपलब्ध है। अगर बच्चों के चैनलों की बात करें तो कार्टून नेटवर्क के बाद निकोलोडियन, डिज्नी चैनल, पोगो, एनीमैक्स जैसे चैनल भारतीय बच्चों के बीच जगह बना चुके हैं। जैसे जैसे भारत में केबल नेटवर्क का विस्तार होता गया डीटीटीएच प्लेटफार्म पर जगह बढने लगी भारतीय बाजार में विदेशी चैलनों की घुसपैठ तेजी बढ़ने लगी। आज भारतीय बाजार में विदेशी चैनलें की गिनती मुश्किल है। कुछ पूरी तरह विदेशी चैनलों तो कई भारतीय चैनलों में विदेशी पूंजी की बढ़ती हिस्सेदारी। ऐसे में ये कहना भी मुश्किल है कौन कितना स्वदेशी है। वायकाम समूह भारत टीवी 18 समूह के साथ समझौता कर कई चैनल ला चुका है जिसमें कलर्स जैसे मनोरंजन चैलन प्रमुख हैं। एचबीओ, ब्लूमबर्ग जैसे कई और चैनल भारतीय बाजार में अगल अलग डिस्ट्रिब्यूशन प्लेटफार्म पर पहुंच चुके हैं तो अब हाई डेफनिशन प्लेटफार्म पर कई विदेशी चैनल आने को तैयार है। देश की आबादी 1 अरब 20 करोड को पार कर चुकी है। इतनी बड़ी आबादी में दो करोड़ लोग तो डाइरेक्ट टू होम यानी डीटीएच के ग्राहक हैं, तो जाहिर है विदेशी चैनलों को बहुत बड़ा बाजार मिल रहा है।


Wednesday, 16 March 2011

गर्म है धर्म का बाजार -


याद किजिए रविवार को सुबह 10 बजे समय का जब दूरदर्शन पर रामायण धारावाहिक का प्रसारण होता था। मानो पूरा देश रूक जाता था एक घंटे के लिए। रामानंद सागर के रामायण ने टीवी को घर घर में लोकप्रिय बनाया इसके साथ ही टीवी पर धार्मिक कथानक वाले धारावाहिकों की शुरूआत हुई. लेकिन अब हालात बदल चुके हैं आज की तारीख में सेटेलाइट चैनलों की फेहरिश्त में दर्जनों धार्मिक टीवी चैनल हैं। सेटेलाइट चैनलों के आने के साथ ही धर्म और धर्मगुरूओं को काफी जगह मिली है। टीवी पर धार्मिक कार्यक्रमों की बात करें तो इसकी शुरूआत का श्रेय रामायण जैसे धारावाहिक को जाता है। रामायण के बाद बीआर चोपड़ा के महाभारत ने भी लोकप्रियता के झंडे गाड़े। जहां रामायण और महाभारत के पात्र घर घर में लोकप्रिय हुए वहीं इन धारावाहिकों ने रामायण और महाभारत जैसे धारावाहिकों की कहानी को आमलोगों के बीच काफी लोकप्रिय बनाया। बीआर चोपड़ा के धारावाहिक महाभारत का संवाद डाक्टर राही मासूम रजा जैसे साहित्यकार ने लिखा तो हरीश भिमानी की आवाज में मैं समय हूं...लोगों की मानस पटल पर आज भी गूंजता है। हालांकि रामायण और महाभारत के बाद रामानंद सागर का ही कृष्णा धीरज कुमार का ओम नम: शिवाय जैसे दर्जनों धार्मिक धारावाहिक आए। हालांकि ये सभी धार्मिक धारावाहिक रामायण और महाभारत की तरह की लोकप्रिय नहीं हो सके लेकिन इन धारावाहिकों ने सेटेलाइट चैलनों की दौर में धर्म के लिए बाजार की नींव जरूर रखी। आज 400 से ज्यादा सेटेलाइट चैनलों की फेहरिस्त में दर्जन से ज्यादा धार्मिक चैनल हैं।

अगर के देश के पहले धार्मिक चैनल की बात करें तो इसका श्रेय आस्था को जाता है। आस्था ने धर्मगुरूओं के प्रवचन, धार्मिक स्थानों की यात्राएं और प्रमुख धार्मिक कार्यक्रमों को लाइव दिखाना आरंभ किया। गुजराती पृष्ठभूमि के व्यवसायी किरिट भाई मेहता ने आस्था चैनल को प्रयोग के तौर पर आरंभ किया। यह चैनल शुरूआत में इसी समूह के सहयोगी चैनल सीएमएम म्यूजिक के साथ 24 घंटे में 12 घंटे प्रसारित हुआ करता था। पर शीघ्र ही चैनल को मिली लोकप्रियता ने इसे 24 घंटे का डिजिटल धार्मिक चैनल बना दिया। चैलन की देशभर के दर्शकों में मांग थी लिहाजा इसे केबल आपरेटर प्रमुखता से दिखाते रहे।
इसके बाद इंदौर के समूह ने संस्कार नामक धार्मिक चैनल आरंभ किया। इस चैनल पर भी धर्म गुरूओं के प्रवचन के अलावा भजन और धार्मिक गीत संगीत के कार्यक्रम देखे जाते हैं। इसी दौर में भारतीय मूल के महान संत महर्षि महेश योगी ने महर्षि वैदिक विजन नामक फ्री टू एयर चैनल शुरू किया। हालांकि इस चैनल पर सिर्फ महर्षि महेश योगी से जुड़े हुए प्रवचन ही उपलब्ध थे लेकिन ये चैनल महर्षि महेश योगी के भक्तों के बीच काफी लोकप्रिय हुआ। लेकिन धार्मिक चैनल आस्था नई परिकल्पना लेकर आया। इसका किसी एक धर्म या धर्म गुरू से कोई संबंध नहीं है। बल्कि यह हिंदू धर्म के विभिन्न मतों संतों के प्रवचन नियमित सुनने को मिलते हैं। चाहें वह आसाराम बापू हों, मुरारी बापू हों, निरंकारी मिशन के स्वामी हों या फिर जैन मुनि हों। आस्था की कोशिश हर मत के लोगों को चैनल पर जगह देना रहा है। चैनल कई बार भगवती जागरण के लोकप्रिय गायकों को भी अच्छा मंच प्रदान कर रहा है।  
वैसे सभी प्रमुख मनोरंजन चैनल अपने मार्निंग बैंड में धर्म को प्रमुख स्थान देते हैं। सुबह के कुछ घंटे धर्मगुरूओं के प्रवचन के लिए निश्चित रहते हैं। सोनी चैनल पर लंबे समय तक सुबह सुबह आसाराम बापू का प्रवचन आता रहा। अब आसाराम बापू के शिष्यों ने भी एक चैनल एटूजेड शुरू कर दिया है। ये चैनल खास तौर पर आसाराम बापू के तमाम प्रवचनों को प्रमुखता से दिखाता है। इसी तरह आस्था चैनल को देश के बड़े योग गुरू बाबा राम देव के शिष्यों ने टेकओवर कर लिया है। पहले आस्था चैनल का संचालन सीएमएम लिमिडेट के पास था तो अब वैदिक ब्राडकास्टिंग लिमिटेड नामक संस्था इसका संचालन करती है। अब आस्था समूह के पास पांच धार्मिक चैनलों के लाइसेंस हैं। वहीं संस्कार टीवी समूह संस्कार के अलावा सत्संग टीवी की चैलन का भी प्रसारण करता है। यानी हर बड़ा धर्म गुरू या धार्मिक संगठन अपने भक्तों के बीच खुद को पहुंचाने के लिए किसी न किसी टीवी चैनल का सहारा लेना चाहता है। आजतक जैसे समाचार चैनल पर सुबह सुबह कृपालु महाराज का प्रवचन देखने को मिलता है। तो संत मोरारी बापू के हर प्रवचन को कोई न कोई धार्मिक चैनल लाइव दिखाता है। धर्मगुरूओं के सेटेलाइट चैनलों पर स्पेस मिलने के साथ ही वे ग्लोबल हो जाते हैं। क्योंकि दुनिया भर में फैले हुए भक्त उनके प्रवचन को लाइव देख सकते हैं। इससे न सिर्फ उनके भक्तों की संख्या में इजाफा होता है बल्कि धर्मगुरूओं का सम्राज्य भी बड़ा होता जा रहा है।
कई धार्मिक संगठनों ने तो महर्षि वैदिक विजन की तर्ज पर ही अपना स्वतंत्र सेटेलाइट चैनल भी शुरू कर दिया है। तो कई धार्मिक संगठनों ने किसी चैनल में अपने लिए टाइम स्लाट तय करा लिया है। जैसे अखिल विश्व गायत्री परिवार यानी शांतिकुंज हरिद्वार से जुड़े धार्मिक कार्यक्रम प्रज्ञा चैनल पर छह घंटे प्रसारित होते हैं। कई चैनलों ने भक्तों की मांग को देखते हुए एक्टिव दर्शन की शुरूआत की है। यानी घर बैठे माता वैष्णो देवी, काशी विश्वनाथ मंदिर या फिर तिरुपति तिरूमाला देवस्थानम आदि के दर्शन करने का लाभ टीवी  पर उठाएं। जिन धार्मिक संगठनों का बजट बहुत बड़ा है ऐसे सगंठन अपना स्वतंत्र टीवी लाने की भी योजना बना रहे हैं। आज प्रजापिता ब्रह्मकुमारी, साईं बाबा के भक्त, नारायण सेवा संस्थान जैसे तमाम धार्मिक संगठन अपना धार्मिक चैनल लाने की योजना पर काम कर रहे हैं। जैन धर्म के अनुयायियों ने पारस चैनल शुरू किया तो जैन धर्म गुरूओं के प्रवचन को लेकर जिनवाणी और णमोकार जैसा चैनल भी शुरू हो चुका है। इतना ही नहीं दुनिया के दूसरे देशों में धार्मिक चैनलों का बाजार है। ईसाई धर्म के प्रचार के लिए गॉड टीवी जैसे कई चैनल आरंभ हो चुके हैं तो इस्लाम धर्म के प्रचार के लिए भी टीवी चैनल अवतार ले चुके हैं।
धर्म के बाजार के अंदरुनी अर्थशास्त्र की बात करें तो ज्यादातर धार्मिक चैनल फायदे में हैं। सबसे पहली बात की धार्मिक चैनलों को दर्शक आसानी से मिल जाते हैं। जिस धर्म गुरू का प्रवचन जब चलता है तब उनके भक्त इन चैनलों को देखते हैं। साथ ही धार्मिक चैनलों के लिए साफ्टवेयर बनाने मे ज्यादा खर्च नहीं आता। ऐसे चैनलों पर या तो धर्म गुरूओं के प्रवचन या फिर किसी बड़े धार्मिक आयोजन का लाइव शो होता है। लेकिन इन सबके अलावा भी धार्मिक चैनलों की कमाई है। किसी नामचीन धर्म गुरू जिनके भक्तों की बड़ी संख्या का उनका प्रवचन को धार्मिक चैनल मुफ्त में दिखाते हैं वहीं ऐसे धर्म गुरू जिनके भक्तों की फेहरिस्त बड़ी नहीं है उन्हें किसी धार्मिक चैनल पर जगह पाने के लिए पैकेज डील करनी पड़ती है। यानी चैनल पर इच्छित टाइम स्लॉट पाने के लिए चैनल वाले बड़ी राशि वसूलते हैं। यानी टीवी पर धर्म का बाजार काफी गर्म है। आज तमाम धार्मिक चैनलों के पास अपने ओबी वैन हैं जिससे वे धार्मिक आयोजन का लाइव प्रसारण करते हैं। आज सेटेलाइट चैलनों के बाजार में 20 से ज्यादा धार्मिक चैनल हैं तो दर्जनों चैनल अभी बाजार में आने की तैयारी में लगे हुए हैं।       

प्रमुख धार्मिक चैनल

1.      आस्था
2.      आस्था भजन
3.      संस्कार
4.      सत्संग
5.      एमएच वन श्रद्धा
6.      जी जागरण
7.      प्रज्ञा
8.      साधना
9.      दिशा
10.  जीएनएन भक्ति
11.  कात्यायनी
12.  महर्षि वैदिक विजन
13.  गॉड टीवी
14.  जिनवाणी
15.  णमोकार
16.  पारस चैनल
17.  प्रार्थना टीवी
18.  भक्ति टीवी
19.  डे स्टार


Monday, 14 March 2011

टीवी पर हिंदी की बढ़ती ताकत


छोटे पर्दे पर हिंदी की बढ़ती ताकत साफ दिखाई देती है। देश भर के लोगों को तक पहुंचने के लिए हिंदी से बढ़िया कोई माध्यम नहीं हो सकता है, ये बात टेलीविजन ने बड़ी शिद्दत से समझा है। तभी तो जब भारत में विदेशी चैलनों ने पांव रखे तो उन्हें जल्द ही महसूस हो गया कि विदेशी धारावाहिकों को अंग्रेजी में दिखाकर लोकप्रिय नहीं हुआ जा सकता है। लिहाजा सोनी और स्टार प्लस ने धीरे धीरे अपने धारावाहिकों को हिंदी में डब करके दिखाना शुरू कर दिया।
भारत में जब विदेशी चैनलों का पदार्पण हुआ तो उन्होंने पहले हिंदी की ताकत को नहीं समझा था। परंतु कुछ ही सालों में लगभग सभी विदेशी चैनलों ने अपनी रणनीति में बदलाव लाना शुरू कर दिया। उनकी समझ में आ गया कि अंग्रेजी में कार्यक्रम पेश करके सिर्फ कुछ लाख इलीट क्लास तक ही पहुंचा जा सकता है। सोनी एंटरटेनमेंट ने सबसे पहले हिंदी के महत्व को समझा। जो भी विदेशी धारावाहिक सोनी पर आए उन्हें हिंदी में डब करके ही दर्शकों को समाने पेश किया गया। हालांकि कई डब धारावाहिक भी खासे लोकप्रिय नहीं हो सके। स्टार प्लस प्रारंभिक दौर में मूल रूप से अंग्रेजी का ही चैनल था लेकिन धीरे धीरे स्टार ने हिंदी में कार्यक्रमों का प्रसारण आरंभ कर दिया। न सिर्फ धारावाहिक और खबरें बल्कि चैनल पर फिल्में का प्रसारण शुरू कर दिया। आज स्टार पर हिंदी के कई चैनल हैं। स्टार मूवीज पर दिखाई जाने वाली फिल्मों को भी हिंदी में डब करके दिखाया जा रहा है।

डिस्कवरी चैनल में भी शुरूआत में कुछ कार्यक्रमों में हिंदी आडियो फीड देना आरंभ किया लेकिन अच्छा रेसपांस मिलने पर डिस्कवरी के सभी कार्यक्रम 24 घंटे हिंदी में उपलब्ध होने लगे। सबसे बडी बात है कि डिस्कवरी ने अपने चैनल पर बहुत ही शिष्ट और शालीन हिंदी को चुना है। बेहतर किस्म के अनुवाद के साथ डिस्कवरी के कार्यक्रम हिंदी में उपलब्ध हैं। अब डिस्कवरी के प्रतिस्पर्धी चैनल नेशनल ज्योग्राफिक भी हिंदी में उपलब्ध है। तो हिस्ट्री चैनल के कार्यक्रम भी हिंदी में देखे जा सकते हैं। डिस्कवरी ने हिंदी को ज्यादा मुश्किल न बनाते हुए तकनीकी शब्दावली को को आमजन तक पहुंचाने के लिए विद्वानों के टीम की मदद ली है। अपने चैनल के लिए डिस्कवरी ने तकनीकी शब्दावली की अपनी डिक्सनरी विकसित की है। आप महसूस कर सकते हैं कि डिस्कवरी के डब कार्यक्रमें की हिंदी सरकारी विभागों को बोझिल अनुवाद से कहीं बेहतर है। इसके लिए डिस्कवरी ने विद्वान पत्रकारों और साहित्यकारों के टीम की मदद ली है।

डबिंग का कारोबार

हिंदी के इस बढ़ते बाजार से लोगो को रोजगार को नए मौके मिले हैं। तमाम चैनलों पर दिखाए जाने वाले कार्यक्रमों के हिंदी अनुवाद के लिए जहां अनुवादकों की टीम को रोजगार मिला है तो डबिंग आर्टिस्टों को भी रोजगार मिला है। मूवी चैनल और दूसरे तमाम चैनलों को कार्यक्रमों को अनुवाद करने के बाद डबिंग आर्टिस्टों से डब कराया जाता है। इससे दूसरी तीसरी श्रेणी के फिल्म टीवी कलाकारों को रोजगार का नया मौका मिला है तो संघर्षशील कलाकारों को भी एक और प्लेटफार्म मिला है। डबिंग का ये कारोबार अब भारतीय बाजार में सिर्फ हिंदी तक ही सीमित नहीं है बल्कि अब डबिंग बांग्ला, तमिल, तेलगु जैसी प्रमुख भारतीय भाषाओं में भी हो रही है।

कार्टून कैरेक्टर हिंदी में

टर्नर समूह ने 1992 में 24 घंटे का कार्टून चैनल शुरू किया था। भारतीय बच्चों के बीच 1996 में कार्टून नेटवर्क आया। लेकिन जल्दी ही कार्टून नेटवर्क ने भारत के लिए सभी कार्टून धारावाहिकों की हिंदी में डबिंग आरंभ कर दी। अब दुनिया के जाने माने कार्टून कैरेक्टर हिंदी में संवाद करते नजर आने लगे। शुरूआत में कार्टून नेटवर्क ने टून तमाशा नाम से दो घंटे का सिगमेंट शुरू किया था लेकिन धीरे धीरे सभी कार्टून चैनल भारतीय बच्चों को लिए 24 घंटे हिंदी आडियो फीड प्रदान करने लगे। अब सिर्फ कार्टून नेटवर्क ही नहीं बल्कि डिज्नी, निकोलोडियन, हंगामा टीवी, पोगो जैसे सभी चैनलों पर हिंदी देखी जा सकती है।

टीवी को देखकर कहा जा सकता है कि आने वाले दिनों में हिंदी का भविष्य उज्ज्वल है। इतना ही नहीं अब हालीवुड के फिल्में के भी हिंदी में बड़ी तेजी से डबिंग होने लगी है। आजकल हर साल रिलीज होने वाले दर्जनों हालीवुड की फिल्में अंग्रेजी के साथ ही हिंदी में भी डब होकर रिलीज होती हैं। हिंदी में होने कारण ये छोटे छोटे शहरें के सिनेमाघरों तक भी जाकर अच्छा कारोबार करती हैं। जाहिर हम कह सकते हैं कि बाजार ने हिंदी की ताकत को समझा है। हिंदुस्तान मे 60 करोड़ से ज्यादा लोग हिंदी बोलते समझते, लिखते पढ़ते हैं। इसी भाषा में खाते पीते और हंसते मुस्कुराते हैं। इसकी ताकत तो विदेशी चैनलों ने भी खूब समझा है।

टीवी चूंकि दृश्य श्रव्य माध्यम है। टीवी देखने के लिए साक्षर होना जरूरी नहीं है। इसलिए टीवी की पहुंच अखबारों की तुलना में ज्यादा बड़े आडिएंश तक है। इसलिए सभी चैनल हिंदी की इस ताकत को समझ रहे हैं। वहीं लंबे कथानक वाले लोकप्रिय धारावाहिकों के कारण अहिंदी भाषी लोग भी हिंदी समझने सीखने की कोशिश कर रहे हैं। इसलिए हम कह सकते हैं हिंदी के प्रचार प्रसार में हिंदी फिल्में के बाद हिंदी में कार्यक्रम दिखाने वाले टीवी चैनलों की भी बड़ी भूमिका है। टीएमजी नामक चैनल ने टेक्नोलॉजी की खबरों को हिंदी में दिखाना शुरू किया तो सीएनबीसी चैनल ने बाजार की नब्ज पकड़ने के लिए हिंदी की मदद ली। बड़ी संख्या में शेयर बाजार में निवेश करने वाले हिंदीभाषियों के लिए सीएनबीसी आवाज नामक हिंदी चैनल आया। बिजनेस चैनलों की फेहरिस्त में ये हिंदी चैनल काफी लोकप्रिय हुआ। टीवी पर हिंदी धारावाहिकों के बदलौत हिंदी का प्रचार प्रसार विदेशों में भी हो रहा है। पड़ोसी देशों के लोग हिंदी समझ रहे हैं तो विदेशों में एनआरआई परिवारों के बच्चे भी हिंदी के कारण अपनी जड़ों से जुड़े हुए प्रतीत हो रहे हैं। यानी सूचना सम्राज्यवाद के इस दौर में हिंदी मजबूत हो रही है।

जाहिर है इससे हिंदी जानने समझने वाले और अनुवाद करने वाले प्रोफेशनलों की मांग बढ़ी है। यानी हिंदी का बाजार बढ़ता जा रहा है। कई यूनीवर्सिटियों में फंक्शनल हिंदी और फंक्शनल इंग्लिश की पढ़ाई भी शुरू हो चुकी है। अगर आप बढ़िया अनुवाद कर सकते हैं तो बाजार को आपकी जरूरत है। 




Saturday, 12 March 2011

क्या भविष्य होगा इन चैनलों का


-विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com
 जिस तरह कुछ लोग व्यसायिक हित साधने मात्र के लिए अखबार निकालते हैं उसी तरह देश में आजकल टीवी चैनलों की हालत हो गई है। कई समाचार चैनलों के छोटे छोटे प्रोजेक्ट आ रहे हैं जो कहीं दर्शकों में जगह बना पाने में सफल नहीं हो पा रहे हैं। कुछ प्रमुख समाचार चैनल जिन्हें देश भर में लोग देख रहे हैं उसके अलावा कई छोटे-छोटे समाचार चैनलों के प्रोजेक्ट आ रहे हैं जो भले ही अपनी बड़ी बड़ी योजनाओं का दावा करते हों पर उनकी दर्शकों में पैठ को देखकर कहा जा सकता है कि उनकी हालात भी कुछ वैसी ही है जैसे देश में छोटे-छोटे अखबार निकाले जाते हैं जो महज विज्ञापन के हित साधने के लिए होते हैं।

देश का पहला 24 घंटे के न्यूज चैनल होने का गौरव जी न्यूज को प्राप्त है। उसके बाद आज तक, एनडीटीवी, स्टार न्यूज, आईबीएन-7, डीडी न्यूज, सहारा समय, न्यूज 24 जैसे चैनलों की बात करें तो उन्होंने अपनी राष्ट्रीय पहचान बना ली है। पर इसके बाद कुछ और नाम पर गौर फरमाएं- जैन टीवी, आजाद चैनल, एमएचवन न्यूज, टीवी-100, यूपी न्यूज, हरियाणा न्यूज, हरियाली न्यूज, पीबीसी जैसे नाम लोगों की जेहन में अभी कहां हैं। होंगे भी कैसे इन चैनलों का नाम अभी मीडिया जगत के लोगों भी ठीक से नहीं पता। इनमें से कई चैनलों का रीजनल बेस है,पर ये जिस रीजन में हैं वहां भी उनकी कोई पहचान नहीं बन पाई है। दरअसल कई समूहों के लिए टीवी चैनल खोलना ऐसा धंधा हो गया है जिससे वे अपने कारोबार के हितों को मीडिया में आकर बचाए रहना चाहते हैं। अभी दर्जनों ऐसे समूह हैं तो समाचार चैनल खोलने को तैयार बैठे हैं। कई बड़ी परियोजनाओं पर काम भी चल रहा है।
कई भाषायी चैनलों को बहुत अच्छा बाजार मिला है। आज देश में जिस भाषा के बोलने वाले तीन चार करोड़ से ज्यादा लोग हैं उनमें कई कई चैनल सफलतापूर्वक चल रहे हैं। पर हिंदी में एक राष्ट्रीय चैनल खोलने और चलाने के लिए राष्ट्रीय नेटवर्क के अलावा काफी रूपया चाहिए। इसके साथ ही स्थापित चैनलों की प्रतिस्पर्धा कर पाने के लिए कई सालों तक घाटा उठाकर बाजार में बने रहने के लिए का साहस भी चाहिए। क्योंकि समाचार चैनल खोलना तुरंत फायदा कमाने वाला कारोबार नही हैं। वहीं राष्ट्रीय चैनलों में आजकल वही चैनल सफल हैं जिनके पास कई चैनलों का समूह है, इससे वे एक नेटवर्क से मिलने वाली खबर का इस्तेमाल अलग अलग चैनलों के लिए भी कर लेते हैं। आज आजतक के पास चार चैनल, एनडीटीवी के पास पांच चैनल हैं तो आईबीएन, सहारा, जी और स्टार के पास भी कई चैनलों का समूह है। दरअसल इलेक्ट्रानिक मीडिया के लिए खबरों का संकलन एक महंगी प्रक्रिया है। इसके साथ ही काबिल पत्रकारों का पारिश्रमिक भी बढ़ता जा रहा है। ऐसे में जिस तेजी से नये समाचार चैनल आ रहे हैं उनकी सफलता पर सवालिया निशान लगना स्वभाविक है। आखिर वे कब तक प्रतिस्पर्धा में खड़े रहने का साहस लेकर मैदान में उतर रहे हैं। समाचार के मैदान में उतरने वाले नये खिलाड़ियों में नाइन एक्स, विनोद शर्मा का इंडिया न्यूज, त्रिवेणी समूह का वाइस आफ इंडिया, मराठी दैनिक साकाल का साकाल टीवी, एटीएन समूह एनई टीवी का फोकस टीवी जैसे नाम हैं। अगर रिलायंस समूह 20 टीवी चैनलों का समूह लेकर आता है तो वह कई साल तक घाटा उठाकर भी मैदान में रह सकता है। पर तमाम नए प्रोजेक्टों का क्या होगा।  
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Thursday, 10 March 2011

दौर आसमान में लड़ाई का -


नया वक्त आसमान में एक नए तरह की लड़ाई का है। यह लड़ाई आसमान में लड़ाकू विमानों से नहीं की जानी है। बल्कि इस लड़ाई में उपग्रह चैनलों का इस्तेमाल हो रहा है। जो अपने अपने चैनलों के माध्यम से ग्लोबल समाज में अपनी अपनी विचारधारा और खबरें पेश कर रहे हैं। न सिर्फ बीबीसी बल्कि सीएनएन, एनबीसी भी अपने देशों की विचारधार पेश कर रहे हैं। अब अगर स्टार समूह के चैनलों की बात करें तो रुपर्ट मर्डोक जैसे लोगों ने अपने टीवी चैनल समूह के बल पर दुनिया के कई देशों की राजनीति को प्रभावित करना आरंभ कर दिया है। एशिया देशों में अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिए ही स्टार टीवी और उसके साथ विभिन्न पैकेज चैनलों की शुरूआत की गई है। यह उसी सूचना सम्राज्यवाद का हिस्सा है।
अरब के देशों की विचारधारा को पेश करने के लिए अंतरराष्ट्रीय मंच पर कोई चैनल नहीं था, लिहाजा इस जरूरत को पूरी करने के लिए अलजजीरा जैसे चैनल को खोला गया। अब अल जजीरा पूरी दुनिया में अपनी बातों को ठीक ढंग से रखने के लिए एक अंगरेजी चैनल शुरू कर रहा है।
भारत में सबस बड़ा टीवी चैनल समूह जी न्यूज एक अंगरेजी में अंतरराष्ट्रीय चैनल शुरू करने की योजना बना रहा है। यह जी की ग्लोबल रीच की रणनीति का हिस्सा है। जब इतने लोग इस दौड़ में हैं तो भला भारत सरकार क्यों पीछे रहे है।
सरकारी मीडिया की जरूरत - दूरदर्शन भारत का एक सरकारी मीडिया है। एक दशक पूर्व दूरदर्शन को स्वायत्त संस्था बनाने की हवा बहुत तेजी से उठी थी। इसी को लेकर प्रसार भारती का गठन भी किया गया। पर जब निजी क्षेत्र जिस देश में एक दर्जन समाचार चैनल हों वहां एक स्वायत्त सरकारी चैनल की क्या जरूत है। दूरदर्शन को अब एक सरकारी मीडिया के तौर पर काम करना चाहिए। भला सरकार को अपना सरकारी पक्ष मजबूती से किसी विषय पर रखना हो तो वह किस मंच का इस्तेमाल करेगी। निजी चैनल की अपनी मर्जी है कि वे किसी विषय पर सरकारी पक्ष को कितना दिखाते हैं। इसलिए आज के दौर में मजबूत सरकारी मीडिया की भी जरूरत है। इसी के तहत दूरदर्शन का 24घंटे का समाचार चैनल शुरू किया गया है। अब इसी रणनीति के तहत ही एक अंतरराष्ट्रीय समाचार चैनल की बात की जा रही है। यह एक सही समय पर उठाया जाने वाला सही कदम है। इस तरह के किसी चैनल से पूरे विश्व पटल पर भारत का पक्ष बेहतर ढंग से प्रस्तुत किया जा सकेगा। अगर भारत आने वाले समय में विश्व शक्ति के रुप में उभरना चाहता है तो उसे पूरी दुनिया के बीच अपनी बातें रखने के लिए एक बेहतर मीडिया मिले यह समय की बहुत बड़ी जरूरत है।
यह सच्चाई है को निजी क्षेत्र का कोई भी चैनल हो चाहे वह भारतीय हो फिर विदेशी वहां अगर सरकार अपना पक्ष रखना चाहे तो वह सरकारी पक्ष को कितनी तवज्जो दे वह उस चैनल पर निर्भर करता है। वैसे भी सभी निजी चैनल खबरों में बिकाउ तत्व को प्राथमिकता दे रहे हैं। ऐसे में सरकारी पक्ष की अवहेलना होती ही रहती है। ऐसे में सरकार को राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय दोनों ही परिपेक्ष्य में अपना टीवी चैनल जरूर ही चलना चाहिए। सिर्फ सूचना प्रसारण मंत्रालय या राज्यों की जन संपर्क विभाग ही इन कार्यों को अंजाम देने के लिए पर्याप्त नहीं है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य

Tuesday, 8 March 2011

सारनाथ में अस्सी फीट के गौतम बुद्ध

सारनाथ में गौतम बुद्ध की 80 फीट की प्रतिमा।
वाराणसी के पास स्थित सारनाथ में वैसे तो सैलानियों कई आकर्षण है। सारनाथ के इतिहास में अब एक नया अध्याय जुड गया है। अब जब आप सारनाथ जाएंगे तो वहां भगवान बुद्ध की चलायमान अभय मुद्रा में बनी देश की सबसे ऊंची लगभग 80 फीट प्रतिमा देखने को मिलेगी। हालांकि सारनाथ में पहले से ही बुद्ध की प्रतिमा है लेकिन बुद्ध की चलायमान प्रतिमा अनूठी है।


हैदराबाद के हुसैनसागर झील में भी गौतम बुद्ध की ग्रेनाइट से बनी प्रतिमा लगी है लेकिन ये प्रतिमा 60 फीट के आसपास की है। लेकिन सारनाथ में लगी गौतम बुद्ध की प्रतिमा देश में सबसे ऊंची मानी जा रही है। इसे वाराणसी के पास चुनार से लाए गए पत्थरों से बनाया गया है। बोधगया में ज्ञान प्राप्ति के बाद सारनाथ ही वह जगह जहां गौतम बुद्ध ने अपना पहला संदेश उन पांच शिष्यों को दिया था जो कभी गौतम बुद्ध का साथ छोड़कर चले गए थे। इस घटना को धर्म चक्र परिवर्तन की संज्ञा दी गई थी। गौतम बुद्ध के जीवन में और बौद्ध धर्म के इतिहास में सारनाथ का खास महत्व है। वाराणसी जंक्शन से छह मील दूर सारनाथ में धमेक स्तूप, मूलगंध कुटी मंदिर, संग्राहालय, खंडहर, सुरंग, चिड़ियाघर जैसी कई चीजें देखने लायक पहले से ही हैं। अब सारनाथ में बौद्ध प्रतिमा बड़ा आकर्षण बन गई है। इसलिए जब आप अगली बार वाराणसी जाएं तो सारनाथ में गौतम बुद्ध की प्रतिमा के दर्शन करना न भूलें।


- विद्युत प्रकाश

Saturday, 26 February 2011

संपतलाल पुरोहित - फिल्म पत्रकारिता के पितामह

दिल्ली के दरियागंज में सात नंबर मकान का एक कमरा। संपतलाल पुरोहित का आखिरी दिनों में यही  पता था। अकेले रहते थे। एक नेपाली नौकर उनकी सेवा में होता था। पत्नी और बेटे पहले ही दुनिया से कूच कर चुके थे। जीवन के आखिरी दिनों में कई अखबारों में कालम लिखते , उससे आने वाले पैसे से उनका जीवन चलता था। 

पांच दशक से  ज्यादा फिल्म पत्रकारिता करने वाले पुरोहित जी फिल्म पत्रकारिता की चलती फिरती लाइब्रेरी थे। महबूब,  कुंदनलाल सहगल, पृथ्वी राजकपूर, राजकपूर, गुरुदत्त, देवानंद से लेकर नई पीढ़ी के सितारों निर्माता निर्देशकों की कहानी उनसे सुनी जा सकती थी। एक बार उन्होंने बताया कि एक प्रेस कान्फ्रेंस में धर्मेंद्र अपने बेटे सन्नी दयोल के साथ आए। सन्नी की पहली फिल्म बेताब आने वाली थी। धर्मेंद्र ने कहा पुरोहित जी के पांव छूकर आशीर्वाद लो। और सन्नी उनके चरणों में झुक गए। कुछ ऐसा था फिल्मी सितारों का एक पत्रकार के प्रति सम्मान। 

लगभग चालीस सालों  तक उन्होने एक फिल्म पत्रिका युगछाया का सफल संपादन किया। पुरोहित जी पहले प्रसिद्ध फिल्म पत्रिका चित्रपट के संपादक थे। 1947 में उन्होने युग छाया शुरू की और 1978 तक सफलता पूर्वक निकालते रहे। पुरोहित जी मध्य प्रदेश के धार शहर के रहने वाले थे। बचपन से ही फिल्मों में रूचि थी। सो फिल्म पत्रकार बन गए। आओ बच्चों तुम्हे दिखाएं...और ए मेरे वतन के लोगों लिखने वाले कवि प्रदीप के शिष्य रह चुके थे। पुरोहित जी हमारे समाचार पत्र कुबेर टाइम्स में एक सिनेमा पर एक नियमित कालम लिखते थे। एक बार संदेशवाहक की जगह मुझे खुद उनका कालम लाने जान पड़ा। इसी दौरान पुरोहितजी से आत्मीय परिचय हुआ।उसके बाद हर हप्ते मैं ही उनसे कालम लेने के लिए जाने लगा। इसके पीछे मेरा लोभ था। मुझे उनसे घंटेभर बातचीत का मौका मिलता और मैं उनसे सिनेमा के बारे में ढेर सारी जानकारियां लेता।

 दिल्ली में उनके समकालीन ब्रदेश्वर मदान, बच्चन श्रीवास्तव जैसे फिल्म पत्रकार थे लेकिन पुरोहित जी में बाल सुलभ सहजता थी। अपने आखिरी दिनों तक सांध्य टाइम्स में उनका नियमित कालम फिल्मी सवालों के जवाब का आता था जो काफी लोकप्रिय था। जब तक जीए पुरोहित जी पूरी आशावादिता के साथ लिखते रहे। जिंदगी ने उनसे बहुत कुछ छिना लेकिन फिर भी जीवन से कोई शिकायत नहीं थी। बुरे लम्हों को याद नहीं करते थे। हसीन लम्हों को याद कर खुश होते....जीवन चलने का नाम.....और एक दिन वे हमें छो़ड़कर चले गए।
- विद्युत प्रकाश मौर्य   

Thursday, 17 February 2011

घनश्याम पंकज की याद

जनवरी 2011 में कई महान विभूतियां हमारे बीच नहीं रहीं। 26 जनवरी को कोच्चि में 68 साल की आयु में घनश्याम पंकज ने अंतिम सांस ली। वरिष्ठ पत्रकार घनश्याम पंकज को भी काल ने हमसे छीन लिया। पंकज जी के सानिध्य में मैंने पहली नौकरी में कुबेर टाइम्स में काम किया। मैं दिल्ली में फीचर पन्ने पर काम करता था। काम के दौरान ही उनसे परिचय हुआ। दो बार लखनउ में 20 राजभवन कालोनी में बड़ी आत्मीय मुलाकाते हुईं थीं। एक महीने पहले फोन पर बात हुई तो फिर से एक बार मिलने की चर्चा हुई। लेकिन इस बीच वे कूच कर गए हमेशा के लिए।
पंकज जी वैसे हिंदी के पत्रकारों में थे जिनके संपादकीय अग्रलेख बड़े ही परिपक्व और भविष्य की दृष्टि रखने वाले माने जाते थे। बिहार के एक शहर से निकले थे.। पत्रकारिता में ऊंचा मुकाम हासिल किया। लेकिन जब तक जीए शाही जीवन रहा। दिल्ली में सफदरजंग एन्क्लेव में उनकी कोठी थी। पत्नी विनिता पंकज पहले ही उन्हें छोड़ कर इस दुनिया से जा चुकी थीं। घनश्याम पंकज समाचार एजेंसियों के बाद लंबे समय तक नवभारत टाइम्स के साथ रहे। दिनमान के भी संपादक रहे। स्वतंत्र भारत, कुबेर टाइम्स जनसत्ता एक्सप्रेस जैसे अखबारों को अपने संपादकीय कौशल से लंबे समय तक चलाने की कोशिश की। वे वैसे संपादकों में से थे जो अपने तमाम मातहतों को लंबे समय तक याद रखते थे। टीम बनाकर चलते थे और टीम को बार बार जोड़ने की कोशिश करते थे। व्यक्तित्व किसी फिल्म स्टार की तरह था। खैर उनके बेटे कबीर कौशिक एक सफल फिल्मकार बन चुके हैं। उन्होने अब तक तीन फिल्में बनाई हैं सहर, चमकू और हम तुम और घोस्ट।
-विद्युत प्रकाश मौर्य