Saturday, 16 June 2018

वह ‘फिर’ कभी लौटकर नहीं आया....

तब उत्तर बिहार के सोनपुर और दक्षिण बिहार के पटना के मध्य स्टीमर चलती थी गंगा में। हमलोगों का घर आना जाना उसी स्टीमर से होता था। एक स्टीमर यात्रा के क्रम में सोनपुर से आगे पहलेजाघाट में पिताजी के एक मित्र मिल गए। उनके साथ उनकी पुत्री थी श्वेता। ( ऐसा ही कुछ नाम था उसका ) हमलोग गंगा में स्टीमर पर सवार हो गए और स्टीमर नदी की धारा के साथ पटना की ओर चल पड़ा। पिताजी के दोस्त बोले, चलिए कैंटीन में चाय पीते हैं... मैं गांव से नया नया आया था..चीनी मिट्टी की प्लेट और प्याली में चाय पीने का अभ्यस्त नहीं था। लिहाजा पहली चुस्की में ही मेरा मुंह जल गया। श्वेता मेरी ओर देखकर मुस्कराई। मैं विचलिच हो अपने स्थान से हिला और चाय की कुछ और बूंदे गिरीं मेरे कपड़ों पर।
श्वेता ने आगे बढ़कर उसने मेरे कपड़ों से चाय की बूंदों को साफ करते हुए कहा गर्म चाय ऐसे नहीं पीते। पहले थोड़ी सी चाय प्याली में ढ़लकाते हैं, फिर उसे ठंडा करते हैं, फिर पीते हैं। मैं मंत्रमुग्ध सा कभी उसका चेहरा देखता कभी उसका चाय पीना। बहरहाल हमलोग चाय पीते पीते स्टीमर के लाउंज पर आ गए। मैं अचानक बोल उठा- ‘देखो-देखो पानी पीछे भाग रहा है।
श्वेता बोली उठी ‘नहीं रे मूर्ख, जहाज आगे जा रहा है।‘ उसके बाद ढेर सारी बातें चलती रहीं।  स्टीमर से पटना उतरने तक हमलोग अच्छे दोस्त बन चुके थे। यह सुखद संयोग ही रहा है कि आगे की रेलयात्रा में भी हमलोग साथ साथ चलने वाले थे। श्वेता अपनी उम्र के अनुसार बहुत तेज तर्रार और चालक थी। बार-बार मेरी भोली भाली बातों और सहज अज्ञानता पर हंस पड़ती। फिर मेरे समान्य ज्ञान में अभिवृद्धि के प्रयास में लग जाती। उसके खिलखिलाने के साथ उसकी मुखमुद्रा में विराजमान श्वेत, धवल दंत पंक्तियां, विद्युत रश्मि बिखेरते प्रतीत होते। मेरे उपर तो जादू सा होता चला जा रहा था।

रेलगाड़ी में हमने खिड़की के पास आमने सामने की जगह चुनी। रेल की छुक छुक पीछे भागते पेडों के मध्य हमारा परिचय और प्रगाढ़ होता रहा।
कौन से वर्ग में पढते होक्या खाना अच्छा लगता है...क्या तुम्हारे टीचर जी ने कभी तुम्हें मुर्गा बनाया...
मुर्गा...हमारे टीचर जी को हमें गधा कहते हैं। और पिता जी गुस्से में होते हैं तो बैल तक कह डालते हैं। फिर वह खिलखिलाकर हंस पड़ी।

अचानक रेल एक पुल से गुजरी। श्वेता बोल पड़ी,  देखो ये फल्गु नदी है। इसको न दशरथ जी का शाप लगा हुआ है। साल भर नदी सूखी रहती है। लेकिन इसके अंदर अंदर पानी बहता है। इसको खोदोगे न, तो पानी निकलेगा।

अचानकर अगले स्टेशन पर रेलगाड़ी धीमी होकर रूकती चली गई। गया जंक्शन आ गया था। श्वेता अपने पिताजी के साथ उतर गई। उतरते हुए वह मुझे एक चाकलेट थमा गई। प्यार की मिठास भरी। उसके आखिरी शब्द थे...गुड बाय... फिर मिलेंगे। परंतु वह ‘फिर’ कभी लौटकर नहीं आया।
-          विद्युत प्रकाश मौर्य ( नवभारत टाइम्स, 20 दिसंबर 1995 )   (SHORT STORY ) 


Thursday, 14 June 2018

आओ बेवकूफी पर दिल खोलकर हंसे..( व्यंग्य )

कई बार बहुत काबिल आदमी भी बेवकूफी कर बैठता है। कभी कभी अपनी बेवकूफी पर हंस लेना बड़ी अच्छी बात होती है। किसी की बेवकूफी का मजाक उड़ाने से अच्छा होता है कि आप बेवकूफी पर बैठकर दिल खोलकर हंस लें और बाद में ऐसी ही बेवकूफी न करने की प्रण करें।

मुझे एक अपनी बेवकूफी याद आती है। एक नौकरी छूट गई थी। बेरोजगारी के दिन थे इसलिए अखबार में हर नौकरी के इस्तहार पर खास तौर पर नजर रहती थी। इसी तरह एक दिन की बात है कि एक अखबार में मेरे विषय में प्रवक्ता के पद के लिए वैकेंसी दिखी। मुझे रेगिस्तान में पानी दिखाई दिया। फटाफट विज्ञापन काटा। लिखा था कालेज के काउंटर से फार्म मिलेगा। मैंने अगले दिन वहां के लिए बस पकड़ी। कई घंटे का सफर और कई बसें बदलने के बाद कालेज के पास पहुंच गया। मैंने काउंटर पर जाकर फार्म की मांग की। कालेज के कर्ल्क ने कहा पार्थी का नाम बताइए। मैंने कहा कि प्राथी आपके सामने खड़ा है और मैंने अपना नाम बता दिया। उसने कहा कि शायद आपको पता नहीं यह कालेज लड़कियों का है। मैंने कहा तो क्या हुआ लड़कियों के कालेज में पुरूष प्रोफेसर भी तो होते हैं। उसने कहा कि लगता है आपने हमारा विज्ञापन ठीक से नहीं पढ़ा। हमने उसमे साफ साफ लिखा हुआ है कि यह पोस्ट लड़कियों के लिए ही आरक्षित है। अब मेरे पास अपनी बेवकूफी पर हंसने के सिवा कोई रास्ता नहीं बचा था। मेरा एक दिन बरबाद हुआ सो अलग। 

मुझे अपनी यह बेवकूफी कई साल बाद कुछ यों याद आई कि पटना की एक सुबह मैं आटो रिक्सा से जा रहा था। एक आदमी मेरे बगल में आकर बैठा। उसके हाथ में एक नौकरी की परीक्षा के लिए प्रवेश पत्र था। वह 100 किलोमीटर से ज्यादा दूर किसी शहर से चल कर आया था। वह शेखपूरा में किसी दफ्तर का पता पूछ रहा था। मैंने शेखपूरा में अपना घर होने के नाते बताया कि वहां तो इस नाम का कोई दफ्तर ही नहीं है। तब उसके प्रवेश पत्र को मांग कर देखा गया। तब पता चला कि उसका प्रवेश पत्र शेखपूरा जिले में उपस्थित होने के बारे में था। वह शहर पटना से कई घंटे की दूरी पर था। अगर उस व्यक्ति ने घर पर बैठे पत्र की सही ढंग से तस्दीक की होती तो शायद उसे परीक्षा से वंचित नहीं होना पड़ता। मुझे उसकी बेवकूफी पर नसीहत देने की सुझी। फिर मुझे याद आया कि इस तरह की बेवकूफी तो कभी मैं भी कर चुका हूं। लिहाजा मैंने उसे ढाढस बंधाया। कोई बात नहीं अब किसी अगली नौकरी के लिए तैयारी करो।
कई बार बड़े विद्वान लोग भी अपने जीवन में बड़ी बेवकूफी कर देते हैं। पर हमें इन बेवकूफियों से कुछ सीखना चाहिए। कहते हैं कि महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन के पास एक आदमी आया। उसने उन्हे लिफ्ट के फायदे के बारे में बताना आरंभ किया। आइंस्टीन ने सब कुछ सुन कर अपने मकान में लिफ्ट लगाने का आदेश दे किया। बाद में उन्हें अहसास हुआ कि उनका मकान तो सिर्फ एक मंजिल का ही है। इसमें लिफ्ट लगाना तकनीकी तौर पर संभव नहीं है साथ ही इसकी कोई यहां जरूरत भी नहीं है। वास्तव में हमें किसी बेवकूफ या कम बुद्धि के आदमी का भी उसकी बुद्धिमता या ज्ञान का मजाक नहीं उड़ाना चाहिए। लगातार प्रयास से कई बार बेवकूफ आदमी भी कालांतर में विद्वान बन जाता है। कई लोग स्कूल जीवन के तेज छात्र हाई स्कूल पास करके आईआईटी करके मेकेनिक हो जाते हैं वहीं कमजोर विद्यार्थी धीरेधीरे अध्ययन करते करते एक दिन यूनीवर्सिटी में प्रोफेसर बन जाता है।
---- विद्युत प्रकाश vidyutp@gmail.com



Tuesday, 12 June 2018

चली आना तू मॉल में ( व्यंग्य )

महानगरों में धड़ाधड़ शापिंग माल खुलते जा रहे हैं। हो सकता है ये माल लोगों की जेब को थोड़ी राहत दिलाते हों पर ये महानगर के प्रेमी प्रेमिकों के लिए वरदान बन कर उभरे हैं। अब यहां प्रेमी प्रेमिकाओं के मिलने जुलने की पूरी आजादी है।
अब भला दिल्ली की चिलचिलाती गरमी और कड़कड़ती सरदी में पार्क में या बस स्टाप पर मिलना या किसी का इंतजार करना याद करें तो कितना दुखदायक होता था। पर अब कालेज बंक कर दो दिलों को चुपके चुपके मिलना हो तो शापिंग माल बड़ी मुफीद जगह के रुप में उभर कर आई है। शापिंग माल का लान पूर्णतया वातानुकुलित तो होता ही है साथ ही वहां कॉफीआइसक्रीम पॉपकार्न भी मिल जाता है। अगर आप जेब से कड़के हैं तो कोई बात नहीं यूं ही भी वहां कुछ देर विचरण कर सकते हैं।
दिल्ली मुंबई के शापिंग माल आशिक माशूकों से गुलजार दिखते हैं। अब अगर प्रेमिका है तो उसके लिए कुछ न कुछ खरीददारी तो होगी ही। इसलिए शापिंग माल वालों की चांदी है। वे आपको यह सलाह देने की व्यवस्था भी करते हैं कि प्रेमिका के लिए बाजार में लेटेस्ट गिफ्ट क्या आ रहे हैं। अगर आप अपनी डेट के साथ कुछ एकांत भरे पल चाहते हैं तो उसी शापिंग माल में ब्रांडेड रेस्टोरेंट और काफी शाप ने भी अपना डेरा डंडा जमा रखा है। वहां की किसी टेबल पर बैठकर आप अपनी प्रेमिका की आंखों में आंखे डालकर घंटो बैठ सकते हैं। अब गरमी और सरदी से बचाव हो रहा है तो उसकी कोई कीमत भी चुकानी पड़ेगी।
दिल्ली में जब से मेट्रो रेल की शुरुआत हुई है प्यार भरे दिलों को बड़ी राहत हो गई है। पहले बसों में धक्के खाते हुए कालेज तक पहुंचते थे। अब मेट्रो के रेलवे स्टेशन और मेट्रो रेल गाड़ी भी एसी है। वहां का माहौल भी खूबसूरत और रंगीन है। साथ ही जमीन के नीचे भी मोबाइल नेटवर्क भी काम करता है। पुराने जमाने में प्रेमी प्रेमिका गीत गाते थे चली आना तू पान की दुकान में। उसके बाद गीत थोड़ा इंप्रूव हुआ आती है क्या खंडाला। पर अब नया गीत गाते हैं आती है क्या मेट्रो में। मेट्रो का टिकट खरीदो और अपनी प्रेमिका के साथ शीत ताप नियंत्रित वातावरण में गुफ्तगू करते हुए घर को पहुंचो। अगर थोड़ा और वक्त साथ देना है तो मेट्रो के बाहर निकलते ही कई जगह मेट्रो के भवन में ही शापिंग माल और काफी शाप खुल गए हैं। वह भी केएफसी और बरिस्ता जैसे अंतरराष्ट्रीय चेन भी।
सो मेट्रो रेल चलाने वालों का प्रेमी प्रेमिकाओं का शुक्रगुजार होना चाहिए। वरना पुराने लोगों से पूछकर देखो कि वे दिल्ली की गरमी में कैसे प्यार की पींगे बढ़ाते थे। तब बहुत मुश्किल थी अब बहुत आसान है। हां अगर आपको प्यार करना है जेब भरी हुई तो होनी ही चाहिए। खाली जेब वालों के पास प्रेमिकाएं कम ही फटकती हैं। या फिर ऐसी कोई दिलेर प्रेमिका ढूंढो जो आपके उपर ही रुपया खर्च कर सकती हो। कुछ सालों में दिल्ली का माहौल और बदल जाएगा। हर इलाके में एक शापिंग माल होगा और खुल कर मिलने की आजादी होगी। दुनिया के जितने भी बड़े शापिंग माल वाले भारत में आकर अपनी चेन खोलना चाहते हैं सरकार को उन्हें आने की जल्दी से जल्दी छूट प्रदान करनी चाहिए जिससे वे यहां आकर प्रेमी प्रेमिकाओं के लिए नए इंतजामात कर सकें। इन शापिंग माल में ही कोचिंग सेंटर भी खोल देना चाहिए जहां कुछ नए ढंग के कोर्स चलाए जा सकें।
-- विद्युत प्रकाश मौर्य


Sunday, 10 June 2018

चलों चलें दूर कहीं प्यारके लिए ये जगह ठीक नहीं ( व्यंग्य )

 चलों चलें दूर कहीं प्यारके लिए ये जगह ठीक नहीं। जी हां आखिर कहां जाएं प्रेमी। पार्क में अगर प्रेमी प्रेमिका बैठकर प्यार के दो मीठे बोल बोलते हैं तो पुलिस डंडे बरसाती है। लाइब्रेरी के किताबों के बीच छुप-छुप कर प्यार की बातें करो को लाइब्रेरियन बाहर जाने के कहता है। अब भला सड़क पर बैठकर प्यार की बातें तो की नहीं जा सकती। या कि अपने मम्मी डैडी के पास खुलेआम अपनी प्रेमिका को लेकर भी नहीं जाया जा सकता है। बेचारे मेरठ के प्रेमियों के पास लेदेकर वही एक अच्छा पार्क पर था पर वहां भी पुलिस आ गई रंग में भंग डालने। आपरेशन भी उसने ऐसा चलाया कि बेचारे मजनू की आत्मा भी सुबकती होगी। मजनू तो भले ही असफल प्रेमी रहा हो पर था तो वह बड़ा शरीफ व मजबूर। पुलिस वालों ने तो उसका नाम भी बदनाम करके रख दिया। मेरठ की इस घटना से दुनिया भर के प्यार करने वालों का दिल भर आया है। पाकिस्तान की एक हसीन शायरा ने लिखा है-
जब कोई दर्दे मुहब्बत की सजा पाता चोट उसे लगती हैदिल मेरा भर आता है।
सो मेरठ के प्यार करने वालों निराश न होना। जो पुलिस के डंडे के निशान तुम्हारे पीठ पर पड़े हैं उसका दर्द कश्मीर से कन्याकुमारी तक के प्यार करने वाले दिल महसूस कर रहे हैं। क्या करें प्यार करने वालों का कोई संगठन नहीं है नहीं देश भर में पुलिस के खिलाफ धरना प्रदर्शन जरूर करवाते। अब यश चोपड़ा करन जौहर या महेश भट्ट को इस प्रकरण से प्रेरणा लेकर कोई फिल्म जरूर बनानी चाहिए।
बात यहीं खत्म नहीं होती। सुना है कि दिल्ली के चिड़ियाघर में प्यार भरी मीठी बात करने वालों पर भी प्रशासन की टेढी नजर हैं। उन्हें तंग करन के लिए उनके पीछे हिजड़े छोड़ दिए जाते हैं। जहां आपने प्यार भरी बातें शुरू नहीं कि हिजड़े आ गए रंग में भंग डालने। दिल्ली में छोटे-छोटे अपार्टमेंट में रहने वाले लोगों तो घर में भी प्यार भरी बात करने का मौका नहीं मिलता। यहां तो प्रेमी प्रेमिका क्या पति पत्नी भी प्यार का व्यापार करने के लिए पार्क या चिड़िया घर में आते हैं। अब सार्वजनिक स्थानों पर वेलेंटाइन डे मनाना भी खतरनाक है। हो न हो इसक पीछे कोई विदेशी साजिश नजर आती है। हो सकते है महंगे रेस्टोरेंट की चेन चलाने वालों ने पुलिस प्रशासन को उकसाया हो कि वे प्रेमियों के परेशान करें ताकि प्यार भरे दिल उनके रेस्टोंरेंट में आएं और दिल की बात कहने के साथ बिल भी भरें और जेब भी ढीली करें। इसकी गहराई से जांच कराई जानी चाहिए। बड़े शहरों में खुलने वाले शानदार रेस्टोरेंट प्रेमियों को पूरा एकांत उपलब्ध कराते हैं। पर यहां बैठना बड़ा महंगा पड़ता है। अब भला वे प्रेमी कहां जाएंगे जिनकी जेब तो खाली होगी पर दिल तो प्यार से भरा होगा। किसी शायर ने कहा था - तेरे जितने भी चाहने वाले होंगे। होठों पे हंसी पर पावों में छाले होंगे।
 -विद्युत प्रकाश


Thursday, 7 June 2018

तमाम उम्र कौन साथ देता है.... ( व्यंग्य )

वे लाइफ टाइम आफर लेकर आए हैं यानी जीवन भर साथ निभाने का वादा। हमने तो सुना था कि ...तमाम उम्र कौन साथ देता है थोड़ी दूर साथ चलो...। पर उन्होंने जीवन भर साथ निभाने का वादा किया है तो बड़ी आस जगी है। आजकल की प्रेमिकाएं भी बदलती बयार जैसी हैं। वे तमाम उम्र साथ निभाने का वादा नहीं करती हैं। हां थोड़ी दूर साथ जरूर चलती हैं। जब जेब ठंडी हो जाती है तो साथ छोड़ जाती हैं। पर कई मोबाइल फोन कंपनियां अब लाइफ टाइम आफर लेकर आई हैं। यानी जीवन भर साथ निभाने का वादा। भले ही आपकी जेब में कड़की हो पर आपका मोबाइल चलता रहेगा। भला ये कैसे संभव हैकड़की में तो गर्लफ्रेंड भी साथ छोड़ जाती हैं। पर आपका फोन नहीं बंद होगा। यानी आपकी नाक बची रहेगी। कमसे कम बार बार टीवी पर आने वाला विज्ञापन तो यही कहता है।
नाक बचाए रखना है तो जीवन भर साथ निभाने वाला प्रीपेड कार्ड ले लो। साख भी बची रहेगी और नाक भी। अक्सर ऐसा होता है। कड़की के कारण आप मोबाइल फोन रिचार्ज नहीं करवा पाते हैं और आपको काल करने वाले को संदेश जाता हैदिस फोन इज टेंपरोरली आउट आफ सर्विस...। सचमुच इससे नाक जाने का खतरा रहता है। दोस्त कहते हैंगुरू हाथी तो खरीद लिए हो पर हाथी पालने की ताकत नहीं है। वैसे लोगों के लिए सचुमच लाइफ टाइम आफर वरदान बन कर आया है। यानी अब किसी के भी सामने नाक कटने का कोई संकट नहीं है।
साथ निभाना बीते जमाने की बात हो गई है। दोस्त भी बदल जाते हैं। प्रेमिकाएं बदल जाती हैं। भाई और बच्चे भी जीवन भर साथ नहीं निभाते। कठिन घड़ियों में अक्सर किनारा कर लेते हैं। कहते हैं कि मुंबई की बारिश और दिल्ली की लड़कियों का कोई भरोसा नहीं है। कब साथ छोड़ जाएं...। पर यह बड़ी राहत की बात है कि दिल्ली और मुंबई में आपका मोबाइल हमेशा साथ निभाता रहेगा। यानी आपका सच्चा साथी और सबसे अच्छा दोस्त साबित हो सकता है। अगर उनका वादा सचमुच सही है तो।
वैसे सरकार ने मोबाइल कंपनियों को इस वादे का खुलासा करने को कहा है। क्योंकि सरकार को शक है कि वास्तव में जीवन भर साथ निभाएंगे या नहीं। क्योंकि बिना किराया लिए इनकमिंग काल की सुविधा आखिर वे कब तक देते रहेंगे। पर उन्होंने वादा किया है तो फिलहाल उनपर शक करने का कोई कारण नहीं है। वैसे धोखा देने वाली प्रेमिकाओं और बीच मझधार में साथ छोड़ जाने वाले दोस्तों को इस मामले में कुछ सोचना चाहिए। उन्हें इन मोबाइल कंपनियों से प्रेरणा लेनी चाहिए और एक बार फिर से जीवन भर साथ निभाने का वादा करना चाहिए। हो सकता है लाइफ टाइम से सचमुच कुछ लोगों को प्रेरणा मिले। हो सकता है तलाक की घटनाएं कम हों।
 ---- विद्युत प्रकाश मौर्य


Wednesday, 6 June 2018

आखिर कहां रखें पैसा ( व्यंग्य )

कई लोग परेशान है कि आखिर वे पैसे को कहां रखें। आयकर विभाग की जगह-जगह नजर है। अगर आपने ने फोन का बिल ज्यादा दिया है तब भी इनकम टैक्स वाले पूछेगें। क्रेडिट कार्ड से होटल वाले को भुगतान किया तो इस पर भी सरकार की नजर है। सेठ मक्कीचंद ने अपने घर के रजाई गद्देतकिएसब में नोटों को भर रखा है। कई जगह जमीन में खोदकर भी रुपए छुपा रखे हैं। अब उनकी समझ में नहीं आ रहा है कि रुपए को कहां रखें। छुपाने की जगह नहींखर्च करो तो भी सरकार की दस आंखे पीछा कर रही हैं। अब वह अपनी दिन भर की सारी कमाई गरीबों में जाकर लूटा तो नहीं सकते ना। हां पर्व त्योहारों में थोड़ा बहुत दान दक्षिणा जरूरत दे देते हैं ताकि उनकी समाज में दानवीर के रुप में साख बनी रही। कुछ संस्था वाले आ जाते हैं उन्हें भी डोनेशन दे देते हैं।
अब सेठ मक्कीचंद पर लक्ष्मी जी मेहरबान हैं तो भला इसमें सरकार के सिर में क्यों दर्द होता है। कुछ साल पहले तक सेठ मक्कीचंद जैसे लोगों का काम बड़े आराम से चल रहा था पर अब सरकार चालाक हो गई है। उसने इनकम टैक्स वालों को निदेश दे दिए हैं कि पैसा छुपाने के तमाम नए नए तरीके इजादो हो रहे हैं तो आप भी पैसा उगाहने के नए नए तरीके पर नजर रखो। बैंक एकाउंट पर नजर रखो। क्रेडिट कार्ड एकाउंट पर नजर रखो। फोन के बिल पर नजर रखो। विदेश यात्राक्लबों में खर्चहवाई यात्रा सब पर नजर रखो। कोई ज्यादा रुपए का लेनदेन करता है तो उसका पैन कार्ड मांगो। सेठ मक्कीचंद को लगता है कि यह उनकी आजादी पर हमला। वे कोठे वाली हीरामन बाई पर लाखों लूटा दें। इससे भला इनकम टैक्स वालों को क्या। यह उनका निजी मामला है। पर अब बहुत कम मामले निजी रह गए हैं। पहले सिर्फ महंगे उपहारों पर नजर रहती थी। अब कई और बातों पर नजर रहती है। इनकम टैक्स वाले गाना गा रहे हैंआते जाते हुए सब पे नजर रखता हूं। नाम अब्दुल है मेरा सबकी खबर रखता हूं।
सेठ मक्कीचंद अब पैसा खर्च करने के नए तरीके ढूंढ रहे हैं जिससे वे इनकम टैक्स वालों की नजरों से बच सकें। अगर आपके पास भी कोई सुझाव हो तो उन्हें बताएं। हां पर समाज सेवा का कोई तरीका मत बताइएगा। वे समाजसेवा का कोटा पहले ही पूरा कर चुके हैं। बकौल मक्कीचंद अगर वे अपनी दुकान पर लोगों को समान बेच रहे हैं तो एक तरह से समाजसेवा ही तो कर रहे हैं। हां इस सेवा के बदले वे थोड़ा सा लोगों से शुल्क लेते हैं। वैसे ही जैसे सरकार सर्विस टैक्स लेती है। अब ये सरकार को समझना है चाहिए कि पहले सर्विस टैक्स भी वसूल लेती हैफिर हमारे ऊपर वेल्थ टैक्स भी लगाती है। अब इनकम टैक्सफ्रिंज बेनिफिट टैक्स न जाने किन नए नए नामों से हमारे पीछे पड़ी है।
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 --- विद्युत प्रकाश मौर्य

Monday, 4 June 2018

सावधान, कोई देख रहा है... ( व्यंग्य )

आप कहीं भी हों हो सकता है कोई छुपा हुआ कैमरा आपका पीछा कर रहा हो। इसलिए तनिक सावधान हो जाइए। ऐसा हर लोकप्रिय आदमी के साथ हो सकता है। अगर आप लोकप्रिय हैं तो आपको इसकी कीमत तो चुकानी ही होगी। आप कहेंगे यह आपकी निजता पर हमला है। भला किसी लोकप्रिय आदमी की निजता क्या होती है। उसका सब कुछ सार्वजनिक होना चाहिए। ये जो पब्लिक है ना सब कुछ जानना चाहती है। अभी तक आप किसी अभिनेत्री या अभिनेता के बारे में पढ़ते आए थे। मसलन वह कौन से नंबर के जूते पहनता है। कौन सी ब्रांड की परफ्यूम लगता है। रात को आठ बजे के बाद वह कौन से रेस्टोरेंट में जाता है। किस हीरोईन के साथ कौन से हीरो का चक्कर चल रहा है। अब किसी दूसरे लोकप्रिय पेश के बारे में भी लोग जानना चाहते हैं। पब्लिक बड़ी खुश है। उसे हर हफ्ते किसी न किसी लोकप्रिय हस्ती की वीडियो सीडी या एमएमएस के बारे में सुनने या देखने को मिल जाता है। अब एक ही तरह की कहानी पर घिसी पिटी फिल्में भी वह भला कब तक देखती रहे। आजकल रियलिटी शो का जमाना है। ऐसे में कुछ लोकप्रिय लोगों को कारनामों की कुछ मिनटों के बारे में सुनने को मिल जाता है तो इसमें बुरा क्या है। जो लोग यह कहते हैं कि स्टिंग आपरेशन बुरा हैवे डरे हुए लोग हैं। चोर की दाढ़ी में तिनका होता है न। वे नहीं चाहते कि उनके काले कारनामों के बारे में लोग जान लें। भला मीडिया वालों का काम ही क्या है। वे तो अंदर की बात ढूंढ कर लोगों को बताएंगे ही। सुना है कि देश का पहला अखबार निकालने वाला जेम्स आगस्टस हिकी अपने बंगाल गजट के पहले पन्ने पर बड़े शान से यह छापता था कि रात को 12 बजे गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स की बीबी मुख्य न्यायधीश की बाहों में झुलती हुई देखी गई। लोग तब भी पढ़ना और सुनना चाहते थे। अब भी चाहते हैं। अब वीडियो का जमाना है तो लोग देखने का सुख भी प्राप्त करना चाहते हैं। गाली देना ही है तो पानी पी-पी कर उन्हें गाली दीजिए जिन वैज्ञानिकों ने मुआ ऐसे कैमरे बना दिए हैं जिसमें पता ही नहीं चलता है कि कैमरा है या शर्ट का बटन। हमारे सांसदों को जब लोगों ने लेन-देन करते हुए देखा तो वे शर्मशार नहीं हुए। उनमें से कई ऐसे थे जो नेशलन न्यूज में नहीं रहते थेइसी बहाने खबरों में आ गए। कहते हैं बदनाम हुए तो क्या नाम न होगा। पब्लिक सब थोड़े दिन में भूल जाती है। फिर से चुनाव लड़कर आ जाएंगे। जैसे नन्हें से बच्चे को खिलौने देकर समझा लेते हैं उसी तरह जनता को भी समझा लेंगे। पर ये लेनदेन का व्यापार तो हमारे जन प्रतिनिधि जारी रखेंगे ही। अब घोड़ा अगर घास से दोस्ती कर लेगा तो खाएगा क्या। हमारे नेता जी गर्व से कहते हैं साधु नहीं हूं। रसीला आदमी हूं ...तो रसीली बातें ही करूंगा। राजनीति को रसीलें लोगों की जरूरत भी है। इसके बिना सब कुछ नीरस सा नहीं हो जाएगा और नीरस इतिहास कभी सच्चा नहीं होता। नेहरू जी के जमाने में ये छोटे कैमरे नहीं थे नहीं तो एडविना की वीसीडी भी जरूर बनी होती। हम किस्से सुनकर ही दिल को तसल्ली दे देते हैं। देखते जाइए अभी देश में कई मोनिका लेविंस्कियां आने वाली हैं।
-- विद्युत प्रकाश मौर्य


Sunday, 3 June 2018

प्रेमी प्रेमिका और मोबाइल ( व्यंग्य )

मोबाइल फोन कंपनियों को सबसे ज्यादा फायदा प्रेमी प्रेमिकाओं से ही हुआ। इससे उनका कारोबार दिन दुगुना और रात चौगुना बढ़ता जा रहा है। हालांकि प्रेमी प्रेमिका मोबाइल सेवा देने वाली कंपनियों को अक्सर धन्यवाद देते हुए देखे जाते हैं कि फोन ने उनका मिलना जुलना सेटिंग गेटिंग और बातें करना आसान कर दिया है। अब रात को रजाई के अंदर घुस कर प्रेमिकाएं अपने प्रेमी से घंटों मोबाइल पर बातें करती रहती हैं और मां बाप को भनक तक नहीं लगती है। अगर बाप मोबाइल खरीदकर बेटी को नहीं दे तो प्रेमी मोबाइल गिफ्ट कर देता है बर्थ डे या वेलेंटाइन डे पर। हालांकि पिताओं को अपनी पुत्री की कुशल क्षेम की चिंता लगी रहती है इसलिए वे बेटी को मोबाइल देकर कालेज या बाजार भेजते हैं। पर यह मोबाइल मां बाप से ज्यादा मुए आशिक के काम आता है। वह पूछता है जानेमन तुम कहा हों। वह बोलती है इडीएम माल में घर के लिए शापिंग कर रही हूं। बस प्रेमी फटाक से बाइक का एक्सलरेटर घुमाता है और पहुंच जाते हैं दोनो माल में। माल में अब रेस्टोरेंट और काफी शाप भी खुलने लगे हैं। बस बैठकर घंटों गप्पे लड़ाते रहो। बाप का फोन आता है तो बेटी बोलती है बस पापा पैकिंग करवा रही हूं। प्रेमी प्रेमिका समझते हैं कि अंबानी या मित्तल ने उन्हें बहुत अच्छा खिलौना दे दिया है। पर वास्तव में मोबाइल सेवा प्रदान करने वाले अंबानीमित्तलटाटाओं का इन प्रेमी प्रेमिकाओं का की शुक्रगुजार होना चाहिए जो मोबाइल पर बातें करके उनका लंबा चौड़ा बिल बनाते हैं। फिर दिलेर बाप उनका बिल भरता है। बाप पूछता बेटी मोबाइल का बिल इस महीने कुछ ज्यादा आया तो बेटी कहती है पापा सहेली से होमवर्क की बातें ज्यादा करनी पड़ी। अगर मोबाइल प्रीपेड है तो उसे रिचार्ज करवाने का जिम्मा पालतू प्रेमी पर होता है। प्रेमिका कहीं उसके हाथ से छटकर कर किसी और की न हो जाए इसलिए प्रेमी अपनी प्रेमिकाओं का मोबइल नियमित चार्ज करवाते रहते हैं।
किसी जमाने में फोन को जरूरी बातें करने के लिए समझा जाता थाइसलिए फोन के पास लिखा रहता था बी ब्रीफ आन फोन यानी फोन पर संक्षेप में बातों को करके निपटाएं। अब स्थित उलट हो गई है। अब फोन ज्यादा से ज्यादा और गैर जरूरी बातें करने के लिए है। सभी कंपनियां चाहती हैं कि आप ज्यादा से ज्यादा बातें करें। जितनी ज्यादा बातें करेंगे उतना ही ज्यादा बिल बनेगा और उतनी ही ज्यादा कमाई हो सकेगी।
इसलिए कंपनी अब लोगों को तरह तरह से उकसाने में लगी रहती हैं कि आप फोन पर ज्यादा और लंबी बातें करों। चिदंबरम साहब धीरे धीरे सर्विस टैक्स भी बढ़ाते जा रहे हैं ताकि सरकार की भी जेब भरती रहे। मोबाइल कंपनियों को सबसे ज्यादा फायदा प्रेमी प्रेमिका टाइप के लोग ही पहुंचा रहे हैं क्योंकि सबसे ज्यादा लंबी लंबी वार्ता वही लोग करते हैं। बाकी लोगों पास तो फोन पर आधा घंटा से लेकर एक घंटातक बातें करने का कोई एजेंडा नहीं होता कोई इश्यू नहीं होता। पर प्रेमी प्रेमिका की वार्ता किसी बेजान से इश्यू में भी जान फूंक देती है और मोबाइल कंपनी का मीटर घंटों तक चलता रहता है। पहले कई पिताओं को अपनी बेटी की वार्ता के कारण अपना लैंडलाइन फोन कटवाना पड़ता था। अब वह टेंशन भी खत्म है। कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका को जितना ज्यादा प्यार करता है उतना ही छोटा मोबाइल प्रेजेंट करता है जो आसानी से वेनिटी केस या पर्स में छुप जाता है। मां बाप को तो पता भी नहीं होता कि उनकी बेटी के पास कोई मोबाइल फोन भी है। जो लड़कियां एक साथ तीन लड़को को लिफ्ट देती हैं वे तीन अलग अलग मोबाइल फोन रखती हैं। अलग अलग समय में तीन प्रेमियों को एक साथ भी उल्लू बनाती हैं। पर जवानी में उल्लू बनने के भी अपने मजे हैं।
-- विद्युत प्रकाश vidyutp@gmail.com


Saturday, 2 June 2018

मिस काल को न करें मिस ( व्यंग्य )

अगर आपके पास मोबाइल है तो मिस काल भी आते होंगे। कई बार आप काल बैक करते हैं तो कई बार इग्नोर कर देते हैं। कालबैक करना या अटेंड करना इस बात पर निर्भर करता है कि काल किस व्यक्ति का है। जो भी इस मिस काल की सुविधा ने मिस की जिंदगी में बहार ला दी है। उनकी जेब का बोझ अब कम हो गया है। महानगर के प्रेमी अब अपनी मिस को मोबाइल फोन गिफ्ट करते हैं तो भी वे अपने प्रेमी को फोन नहीं करतीं बल्कि मिस काल देती हैं। यानी तुम काल बैक करो। वे अपना जेब खर्च बचाती हैं उधर प्रेमी के जेब पर डबल खर्चा बढ़ता है। अब भला कोई भी प्रेमी अपनी प्रेयसी को नाराज थोड़े करना चाहेगा इसलिए हर मिस काल का जवाब देना जरूरी है।
जब से फोन पर और मोबाइल पर कालर आईडी की सुविधा आई है मिस काल आने लगी हैं। मिस काल ने ज्यादा लोगों की मुसीबतें बढ़ाई हैं। कई बार दफ्तर से आपका बास ही बार बार मिस काल करता है तब आपकी परेशानी बढ़ जाती है। किसी मुसीबत को काल बैक कैसे किया जाए। यहां हम आपको कुछ सरल टिप्स दे रहे हैं कि कैसी मिस काल का क्या किया जाए।
जब बॉस का मिस काल आएः कभी अटेंड न करें। बाद में बहाना बना दें कि जब आपका मिस काल आया मैं अपने बच्चे को घुमाने पार्क में गया था। मेरा फोन तो घर में ही छूट गया था। आप कह सकते हैं मोबाइल से मुझे मिस काल ढूंढना नहीं आता। या आप कह सकते हैं कि मैं फोन छोड़कर अस्पताल या सिनेमाघर में गया था। आप अपनी बुद्धि से सिचुएशन के अनुसार बहाना बना सकते हैं। बहरहाल बास को कभी मिस काल करना भी नहीं चाहिए। उसे चाहिए कि वह पूरी बात ही करे।
कभी मिस न करें मिस का मिस कालअगर मिस काल कोई आपको मिस कर रही हो तो उसे कभी मिस न करें। इससे मिस निराश हो सकती है। निराश होकर वह आपको छोड़कर किसी और को मिस काल करना आरंभ कर सकती है। इसलिए मिस को खुश रखने के लिए उसके हर मिस काल का तुरंत काल बैक करें। आप अपने टेलीफोन बिल की चिंता न करें। वह तो किसी न किसी तरीके से भरा ही जाएगा। अगर पैसे न हों तो उधार लेकर बिल भरें। क्रेडिट कार्ड से भुगतान कर दें अगर जरूरत पड़े तो दोस्तों से उधार ले लें। पर मिस को नाराज न करेंयह आपके हक में अच्छा होगा।
अपहचानी कालों का जवाब न देंआपके मोबाइल पर किसी ऐसे व्यक्ति का मिस काल आता हो जिसका नंबर आप नहीं पहचानते हों तो उसका हरगिज जवाब न दें। हो सकता है वह कोई रांग नंबर हो। यह भी हो सकता है कि कोई कमजर्फ आपसे कर्ज मांगने के लिए ही आपको बार बार मिस काल मार रहा हो। यह भी हो सकता है कि जिसका आपने उधार ले रखा हो वह आपको बार बार किसी बिना पहचाने जाने वाले नंबर से मिस काल मार रहा हो।
मिस काल अगर एसटीडी नंबर का आता हो तो और भी सावधान रहें भला क्या जरूरत है कि आप किसी को लंबा खर्च करके जवाब दें। पुराने जमाने में लोग बेरंग लेटर भेजा करते थेजिसमें डाक टिकट नहीं लगया जाता था इसमें चिट्ठी के पहुंचने की गारंटी तो रहती थी पर पाने वाले से डाक विभाग दुगना खर्च वसूलता है। आजकल के मिस काल ठीक उसी बेरंग लेटर की तरह ही हैं जिसमें अटेंड करने वाले को अपनी जेब से बिल भरना पड़ता है। आप भला को जहमत मोल लेना चाहते हैं। ऐश किजिए ना....

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Friday, 1 June 2018

आप किस कालोनी में रहते हैं ... ( व्यंग्य )

सड़क पर चलते हुए एक विशाल होर्डिंग पर नजर गई- योर फाइनेस्ट एड्रेस इन साउथ दिल्ली। यानी दक्षिण दिल्ली में आपका बेहतरीन पता। भला पते में क्या रखा है। साकेत का हो, विकासपुरी का या फिर रोहिणी का। पता तो पता ही भर है। लेकिन नहीं साहब दिल्ली में तो पते से ही सब कुछ जाना जाता है।
बिहार ग्रामीण इलाके से दिल्ली आने के बाद थोड़े दिन तक मैं इस खुशफहमी का शिकार अवश्य हुआ कि दिल्ली में जातिवाद जैसी बीमारी नहीं है। ग्लोबलाइजेशन के बयार ने सबको बराबर कर दिया है। अब खाट पर सोने वाले और चौकी पर बैठने वाले में कोई भेद नहीं है। दिल्ली में तो सभी सोफे पर बैठते हैं या फिर लोदी गार्डन और बुद्धा गार्डन की हरी हरी घास पर। परंतु हमारा ये भ्रम तब टूटा जब पता चला कि दिल्ली में आपका स्टेटस इस बात से तय होता है कि आप कौन सी लोकलिटी में रहते हैं। ग्रेटर कैलाश, वसंत विहार, माडल टाउन, डिफेंस कालोनी, साउथ एक्सटेंशन, शालीमार बाग,  विकासपुरी, जनकपुरी, उत्तमनगर, संगम विहार, अंबेडकर नगर महज मुहल्ले के नाम भर नहीं है। बल्कि इन मुहल्लों के नाम पर भर लिए जाने से आपका स्टेटस तय हो जाता है। अगर आप यमुना पर शकरपुर, लक्ष्मीनगर, गणेशनगर, पांडव नगर, पटपड़गंज, मयूर विहार, दिलशाद गार्डन, प्रीत विहार जैसे इलाके में रहते हैं तो आप कुछ अलग किस्म के आदमी हो सकते हैं। दिल्ली में रहने वाले यमुना पर में रहने वालों को कुछ अलग निगाह से देखते हैं। पहले कहावत मशहूर थी- सारे दुखिया जमुना पार...लेकिन अब यमुना पार इलाका भले ही खुशहाल हो गया हो लेकिन यहां भी अलग अलग मुहल्लों के हिसाब से अलग अलग तरह की श्रेणियां बनी हुई हैं।

आप कह सकते हैं कि दिल्ली मानवों का महासमुद्र है के लेकिन इस समंदर का पानी किसी एक रंग का नहीं है। अनोखा समुद्र है जिसमें कई रंग के पानी हैं। सोचने की बात हो सकती है कि ग्रेटर कैलाश और किसी जेजे कालोनी मे रहने वालों की धमनियों में एक रंग का रक्त कैसे प्रवाहित हो सकता है। केंटुकी फ्राइड चिकेन या नाथू स्वीट्स में रस मलाई खाने वाले और किसी फुटपाथी ढाबे में अपनी पेट की आग बुझाने वाले धमनियों में एक जैसा रक्त कैसे प्रवाहित हो सकता है।

अब तो लालकिले से घोषणा कर देनी चाहिए कि दिल्ली से जातिवाद का सफाया हो गया है। अब यहां ब्रांड आधारित भेदभाव का दौर रह गया है। आपकी पहचान इस बात से होती है कि आपने घड़ी कौन से ब्रांड की बांध रखी है जींस किस लेबल का पहन रखा है, या आपका पता क्या है। दिल्ली की प्रेयसियां अपना ब्वाय फ्रेंड चुनने से पहले ये नहीं देखती हैं कि उसकी टाइटिल शर्मा, वर्मा या गुप्ता है। बल्कि ये देखा जाता है कि उसके शूज कौन सी कंपनी के हैं, वह परफ्यूम कौन से ब्रांड के लगाता है। सिगरेट कौन सी पीता है। बाइक कौन सी कंपनी का है। जाति का तो कहीं नामोनिशान नहीं है। मुझे उम्मीद है इसी तरह एक दिन पूरे देश से जातियां खत्म होंगी और ब्रांड आधारित पहचान के सुहाने दिन आएंगे। परंतु ये सब कुछ होने के साथ अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए आपका पता भी खूबसूरत होना चाहिए। सिर्फ साउथ दिल्ली में ही नहीं बल्कि साउथ दिल्ली की कोई बेहतरीन जगह। वर्ना अच्छे लोग आपको पत्र लिखने, फोन करने या मिलने से कतराएंगे।

-    विद्युत प्रकाश